“एक भिखारिन की मौत” निश्चित ही एक सार्थक मनोवैज्ञानिक कल्पना है जिसकी चर्चा आदरणीया श्रीमती वीनु जमुआर जी ने इस समीक्षा में किया है। इस नाटक के सन्दर्भ में ई-अभिव्यक्ति में पूर्व प्रकाशित संस्मरण का लिंक दे रहे हैं जो श्री संजय भारद्वाज जी के रंगमंचीय अनुभव से आपको परिचित कराएगा।
रंगमंच ☆ “एक भिखारिन की मौत” – एक दर्शक की दृष्टि से ☆ श्रीमती वीनु जमुआर
विश्व रंगमंच दिवस की संध्या!
आयोजन – बहुचर्चित नाटक ‘एक भिखारिन की मौत ‘ के अंग्रेज़ी संस्करण का विमोचन !
जिसकी यादें मन के किसी कोने में अभी भी ठक-ठक करती हुई जीवित हैं। यह शाम ही क्यों, छः या सात वर्ष पूर्व जब ‘एक भिखारिन की मौत’ का मंचन होने जा रहा था , उस दिन भी यह प्रश्न सम्मुख खड़ा था –
मृत्यु तो जीवन का सबसे बड़ा शाश्वत सत्य है फिर एक मौत पर इतनी चर्चा ? मुझ जैसे साधारण व्यक्ति के मन का यही प्रश्न , मेरे नाटक प्रेमी हृदय की उत्सुकता बनी और मुझे खींच ले गयी थी नाट्य भवन की ओर ! और जो देखा था वह आज भी जहन में वैसे ही धरा है, संजोया हुआ !
मानव मनोविज्ञान जिसे हम अंग्रेजी में Human Psychology कहते हैं न – उसका अद्भुत प्रयोग !!
प्रयोग मैं इसलिए कह रही हूँ कि हर चीज़ के दो पहलू होते हैं- प्रत्यक्ष और परोक्ष। इस नाटक में पुरुष द्वारा सहज छुपायी जाने वाली परोक्ष वृत्ति को दृश्यमान प्रत्यक्ष में परिवर्तित करने के लिए किए गए जद्दोजहद को नाटककार नें सशक्त संवादों के माध्यम से जिस प्रकार दर्शाया है उसे अपने आपमें एक प्रयोग ही कहा जा सकता है। नाटक के दो प्रमुख पात्र, संपादक रमेश अय्यर एवं उपसंपादिका अनुराधा चित्रे के मध्य ‘हिप्नोटिज्म’ के विषय में होते संवाद कहीं दूर…हमें अपने समय के प्रसिद्ध जादूगर पी सी सरकार, के लाल आदि के सम्मोहन की दुनिया में खींच ले जाते हैं। हिप्नोटिज्म द्वारा परोक्ष को दर्शकों के समक्ष दिखाने की यह प्रक्रिया निश्चित ही नाटक को एक नया आयाम देती है।
जग जाहिर है, मनुष्य अपनी कमज़ोरियाँ प्रगट नही करना चाहता और फिर पुरुष की बात हो, वह भी समाज में सभ्य कहे जाने वाले पुरुष सत्ता की बात हो तो यह और कठिन हो जाता है।
मैं यहाँ नाटककार को बधाई देना चाहूँगी कि स्वयं एक पुरुष होते हुए प्रकृति के इस प्राकृतिक नकारात्मक वृत्ति को नाटक के माध्यम से समाज के समक्ष दर्शाने की कोशिश की है।
स्त्री के प्रति यह नाटककार के आदर, सम्मान एवं संवेदनशीलता को दर्शाता है।
वहीं दूसरी ओर इस दर्दभरी घटना से व्यावसायिक लाभ प्राप्त करने हेतु अति महत्वाकांक्षी लोगों द्वारा किए जाने वाले घृणित प्रयासों को भी रचनाकार ने बखूबी दर्शाया है।
समाज के विभिन्न वर्गों के पात्रों का चयन यथा- नज़रसाहब, एसीपी भोसले, प्रोफेसर पंत सर, रमणिकलाल एवं युवा पच्चीस वर्षीय मधु वर्मा आदि के सशक्त संवाद को माध्यम बना कर रचनाकार ने अपनी बात दर्शकों के सम्मुख बड़ी ही सशक्त तरीक़े से रखी है। और यही सशक्त संवाद इस नाटक के प्राण हैं। नाटक के सभी पात्रों ने अपनी भूमिकाएँ बड़ी ही बेबाक़ी से निभायी हैं।
मूल नाटक के लेखक,निर्देशक तथा संपादक के पात्र का अभिनय करने वाले कलाकार श्री संजय भारद्वाज स्वयं एक बहुआयामी रचनाकार हैं। विविध विधाओं में सृजन के संग आप एक मँजे हुए रंगकर्मी हैं जिन्हें अनेक पुरस्कारों से नवाज़ा जा चुका है।
अंग्रेज़ी अनुवाद लखनऊ विश्वविद्यालय के इंग्लिश एंड माॅडर्न युरोपियन लेंग्वेज़ेज विभाग की एसोसियेट प्रोफेसर डाॅ मीनाक्षी पाहवा, जो स्वयं एक अनुभवी रंगकर्मी हैं, द्वारा किया गया है। बचपन से रंगमंच से जुड़ी डाॅ मीनाक्षी न सिर्फ़ कुशल रंगकर्मी हैं, वे एक सफल लेखिका, वक्ता एवं सटीक भावानुवादों के लिए भी जानी जाती हैं। A Fulbright Scholar to New York University, she was a Mellon Fellow at Harvard University and Charles Wallace India Trust Fellow at Cambridge.
‘एक भिखारिन की मौत ‘ का मंचन उनके अनुवादित शब्दों के दर्पण में हम पुनः मंचित होते देख पायेंगे – यह मेरा विश्वास है।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।
हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ रहे थे। हम संजय दृष्टिश्रृंखला को कुछ समय के लिए विराम दे रहे हैं ।
प्रस्तुत है रंगमंच स्तम्भ के अंतर्गत महाराष्ट्र राज्य नाटक प्रमाणन बोर्ड द्वारा मंचन के लिए प्रमाणपत्र प्राप्त धारावाहिक स्वरुप में श्री संजय भारद्वाज जी का सुप्रसिद्ध नाटक “एक भिखारिन की मौत”। )
रंगमंच ☆ दो अंकी नाटक – एक भिखारिन की मौत – 4 ☆ संजय भारद्वाज
नज़रसाहब- अच्छा, बहुत अच्छा। बहुत खूबसूरत थी वह। ग़ज़ब की ख़ूबसूरत। तीन दिन लगातार उसका एक-एक अंग देखा है। कमबख्त ने पागल कर दिया था। ऐसा मन होता था…
रमेश- कैसा मन होता था?
नज़रसाहब- जाकर सीने से लगा लूँ उसको। समा लूँ उसको अपने भीतर।…उसे… उसे.. बहुत खूबसूरत थी,.. बहुत..!
(रमेश और अनुराधा का लौटना। नज़र, वासना पीड़ित यहाँ-वहाँ घूमते हुए रंगमंच पर है। धीरे-धीरे अंधकार होना।)
प्रवेश तीन
(‘नवप्रभात’ का कार्यालय।)
रमेश- सो आई वॉज़ राइट अनुराधा। नजर जैसे संभ्रांत, कुलीन और जाने-माने चित्रकार के भीतर का जानवर भी उस भिखारिन को देखकर बेकाबू हुआ था। वैसे सारा क्रेडिट तुम्हें है। तुम्हारा यह हिप्नोटिज़्म वाला प्रयोग ज़बरदस्त कामयाब रहा है। ताज्ज़ुब भी होता है न कि नज़र की उम्र का आदमी..
अनुराधा- क्यों नज़र मर्द नहीं है क्या? तुम सारे मर्द एक जैसे होते हो। औरत को एक चीज़, एक कमोडिटी बनाकर देखते हो, बस।
रमेश- बिल्कुल सही फरमाया मैडम आपने। दुनिया भर में ज़्यादातर विज्ञापनों में मॉडलिंग औरतें करती हैं। बताती हैं कि खरीदो हमें। अब जिसे खरीदना हो वह कमोडिटी ही तो हुई न। ख़ैर छोड़ो, यह बताओ कि हमारी इस इंटरव्यू वाली हिटलिस्ट में अगला नाम किसका है?
अनुराधा- हमारे हिटलिस्ट में अब वह सरकारी विभाग है जो जनता को हमेशा अपने हिटलिस्ट में रखता है याने पुलिस डिपार्टमेंट….और पुलिस डिपार्टमेंट का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं एसीपी जी.आर. भोसले।
दोनों- ( एकसाथ) सो टारगेट भोसले। (बंदूक से निशाना लगाने जैसा संकेत करते हैं।)
प्रवेश चार
(एसीपी भोसले का कार्यालय। फोन पर बातचीत में मशगूल है। उसकी बातचीत में स्थानीय भाषा का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।)
भोसले- नाही, नाही, चालणार नाही। मराठी समझता है।…नहीं…च्या आईला! याला मराठी कळत नाही, मला हिंदी नीट बोलता येत नाही। उरली इंग्रजी ती दोघानां कळत नाही अन बोलता ही येत नाही…। ( इसे मराठी नहीं आती। मैं हिंदी ठीक बोल नहीं पाता। बची अँग्रेज़ी जो न इसे आती है, न मुझे।)…हाँ देखो, हम बोला…नहीं.. मैं बोला.. क्या नाम इंस्पेक्टर मित्रा… मित्राच न।… बेंगाल का है क्या… (हँसता है।) कैसा पहचाना!.. बेंगाल पोलिस का अपना जो टीम आया है, उनको बोलो सारा बंदोबस्त कर दिया है। आज रात तीन बजे होटल में धाड़ घालने का। धाड़ घालने का म्हणजे रेड मारने का रेड।… हाँ तुम्हारा रेकॉर्डेड क्रिमिनल चैटर्जी उधर सतरा नम्बर रूम में है। हाँ देखो एक्शन कम्बाइंड होगा। पेपर में हमारा पोलिस को भी क्रेडिट जाना मांगता, क्या..! (हँसता है।) ओके गुडनाइट। (फोन पर उसकी चर्चा के दौरान रमेश और अनुराधा आ चुके हैं। उन्हें बैठने का इशारा करता है।)
भोसले- आइए, आइए मि. रमेश अय्यर, हाउ डू यू डू? कैसे हैं आप?.. हिंदी सुधर रही है ना मेरी?
रमेश- जी निश्चित। मेरी साथी पत्रकार अनुराधा चित्रे।
भोसले- चित्रे? तुम्हीं मराठी आहेत न बाई। (हँसना) कसं ओळखलं? (बहन जी, आप महाराष्ट्रीयन हैं न? कैसे पहचाना?)
रमेश- मराठी मला पण कळतय.(मराठी भाषा मैं भी समझ लेता हूँ)।
भोसले- मातृभाषा तेलुगू, अखबार निकाला हिंदी। अंग्रेजी तो सॉलिड रहेगा ही। ऊपर से मराठी भी आता है। सच्ची, यू साउथ इंडियन्स आर…. प्रामाणिकसाठी मराठीत कोणता शब्द आहे बाई? (प्रामाणिक के लिए अंग्रेजी में कौनसा शब्द है?)
अनुराधा-सिन्सिअर।
भोसले- हाँ, यू पीपल आर वेरी मच सिन्सिअर।
रमेश- सर, वैसे मेरी पढ़ाई कानपुर में हुई है, इसलिए हिंदी पर अधिकार स्वाभाविक है। फिर मुम्बई आ गया, आमची मुम्बई, मराठी कळलंच पाहिजे ( मुम्बई आ गया। मराठी भाषा आनी ही चाहिए।) वैसे भी मैं खुद को भारतीय मानता हूँ, केवल भारतीय। उत्तर भारतीय या दक्षिण भारतीय नहीं।
भोसले- दैट्स नाइस, नाइस। बोलो भाई आज इतने प्रेम से पुलिस को पत्रकारों ने कैसे याद किया? … सब ठीक तो है ना? नहीं तो साला कोई गड़बड़ हो तो तुम पत्रकारों को पहले मालूम पड़ता है और पुलिस को बाद में!
अनुराधा- नहीं, नहीं, ऐसी कोई बात नहीं। दरअसल हम एक इंटरव्यू सीरीज तैयार कर रहे हैं, मेनपोस्ट की उस भिखारिन के बारे में।
भोसले- (जोर से हँसता है) भिखारियों पर इंटरव्यू?…तो बाकी भिखारियों से पूछिए ना! आप लोग मेरे पास… (हँसता है।)
रमेश- ऐसा है भोसले साहब कि यह अपने तरह की अलग इंटरव्यू सीरीज है। मेनपोस्ट की उस चर्चित भिखारिन को इस दौरान शहर की कई जानी-मानी हस्तियों ने देखा होगा। हम जानना चाहते थे कि इन हस्तियों की क्या प्रतिक्रिया रही इस अज़ीब-सी घटना पर।
अनुराधा- और जाहिर है कि इन जानी-मानी हस्तियों में एसीपी जी.आर. भोसले का नाम तो होगा ही ना!
भोसले- वह तो होगा ही। (हँसता है।) पूछिए, क्या पूछना चाहते हैं?
अनुराधा- सर आपने उस अर्द्धनग्न भिखारिन को तो देखा ही होगा, कैसा लगा आपको?
भोसले- आप जानना क्या चाहती हैं?
अनुराधा- घबराइए मत एसीपी साहब। कैसा लगा मतलब इन जनरल। एक नागरिक के तौर पर आपकी प्रतिक्रिया क्या रही?
भोसले- मैडम हम सरकारी विभाग के हैं। हम किसी भी मामले पर नागरिकों को प्रतिक्रिया नहीं करने देते और खुद भी नागरिक की हैसियत से प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करते। (हँसता है) वैसे खूबसूरत औरतें मुझे अच्छी लगती हैं।
रमेश-मतलब यह भिखारिन खूबसूरत थी?
भोसले- ऑफकोर्स।
रमेश- लेकिन भोसले साहब, आप किस आधार पर कह सकते हैं कि यह भिखारिन खूबसूरत थी?
भोसले- आधार….? यार रमेश, तुम तो मर्द हो। तुमने उसके…..देखे थे?… सॉरी मैडम।.. रमेश मैडम साथ में हैं, नहीं तो…(हँसता है) लेकिन मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि आप लोग पूछना क्या चाहते हैं?
अनुराधा- ठीक है सर, अब सीधा, सपाट सवाल। उस भिखारिन को इस हालत में देखकर एक पुलिस ऑफिसर के रूप में आपकी प्रतिक्रिया क्या थी?
भोसले- प्रतिक्रिया क्या थी? बहुत गुस्सा आया। मेरे इलाके में इस तरह नाटक करने की क्या ज़रूरत थी? मैं तो पहले ही अपनी सख़्ती के लिए काफी बदनाम हूँ। हम तो प्रॉस्टिट्यूट्स को भी बाहर सड़क पर खड़ा नहीं होने देते।.. साली मेरा रिकॉर्ड खराब करना चाहती थी।
अनुराधा- अपना रिकॉर्ड बनाए रखने के लिए आपने क्या कदम उठाए?
भोसले- मैं तो इस मामले पर तुरंत एक्शन लेना चाहता था। यह तो आप पत्रकारों ने उसके बारे में लिख-लिख कर उसे फोकस में ला दिया था इसलिए कुछ नहीं कर पाया।…नहीं तो मेरा बस चलता तो उसके बदन का एक-एक कपड़ा निकलवा कर बुरी तरह पिटाई करता, ताबड़तोड़ ठीक हो जाती।
रमेश-एक पुलिस ऑफिसर होने से पहले आप एक नागरिक भी हैं। इंसान होने के नाते क्या आपको नहीं लगा कि ऐसी निरीह, असहाय, गरीब और भूखी की मदद की जानी चाहिए।
भोसले- यार अय्यर, मेरे को एक बात बताओ। पुलिस स्टेशन के ऊपर बड़े-बड़े शब्दों में क्या लिखा है? ‘मे आय हेल्प यू?’ क्या मैं आपकी मदद कर सकता हूँ? हम तो यहाँ बैठे ही मदद के लिए हैं। हाँ पर पुलिस से मदद चाहिए तो पुलिस के पास आना भी चाहिए न! अगर उसे किसी तरह की मदद चाहिए थी तो आ जाती पुलिस के पास। फिर हम देखते कि किसी तरह की डायरेक्ट या इनडायरेक्ट मदद की जा सकती है क्या?
रमेश- कैसे आ जाती यह देखते हुए कि आज तक जब भी कोई शोषित, असहाय औरत मदद लेने पुलिस के पास आई है तो पुलिस ने भी उसका शोषण किया है।
भोसले- एक्सेपशन्स…,अपवाद…बरोबर ना अपवाद।… अपवाद हो सकते हैं लेकिन उसको मदद चाहिए थी तो वह मेरे पास आती।… आई मीन पुलिस के पास आती।
अनुराधा- एसीपी साहब यह तो हो गई एसीपी जी.आर. भोसले की नपी-तुली, सधी हुई सरकारी प्रतिक्रिया। अब एक पर्सनल सवाल, हम जानना चाहते हैं कि इस मामले पर मर्द जी.आर. भोसले की क्या प्रतिक्रिया थी?
भोसले- क..क…क्या मतलब है आपका?
रमेश- मतलब यह कि मेनपोस्ट की उस अधनंगी भिखारिन को देखकर जी.आर. भोसले के भीतर का मर्द कैसे और कितना उबला? उस खूबसूरत औरत का वह खुला यौवन..
भोसले- मिस्टर अय्यर, आप अपनी सीमा तोड़ रहे हैं। (इस दौरान अनुराधा भोसले को सम्मोहित करती है, वह जाकर भिखारिन की मुद्रा में दर्शकों की ओर पीठ करके खड़ी हो जाती है।)
अनुराधा- भोसले, यहाँ देखो, यहाँ देखो भोसले…
रमेश- भोसले कैसी लग रही है यह?
भोसले- एकदम एकदम उस भिखारिन जैसी। वैसी ही खूबसूरत, वैसी ही जवान। ..ए,.इसको, इसको पकड़कर पुलिस स्टेशन ले आओ। .. कितनी खूबसूरत! यह मेरी है, यह मेरी है।
रमेश- पर भोसले, ये भूखी है। पहले इसे कुछ खिला-पिला तो दो।
भोसले- भूखा प्यासा तो मैं भी हूँ।..बहुत भूखा हूँ मैं….बहुत प्यासा हूँ मैं।..पहले मैं अपनी प्यास बुझा तो लूँ..। (अनुराधा पर झपटना चाहता है। रमेश उसे पकड़ता है।)
रमेश- भोसले संभालो खुद को, संभालो। (भोसले को लाकर उसकी कुर्सी पर बैठाता है। भोसले को यों ही छोड़कर अनुराधा को लेकर रमेश तेजी से निकल जाता है।)
क्रमशः …
नोट-‘एक भिखारिन की मौत’ नाटक को महाराष्ट्र राज्य नाटक प्रमाणन बोर्ड द्वारा मंचन के लिए प्रमाणपत्र प्राप्त है। ‘एक भिखारिन की मौत’ नाटक के पूरे/आंशिक मंचन, प्रकाशन/प्रसारण, किसी भी रूप में सम्पूर्ण/आंशिक भाग के उपयोग हेतु लेखक की लिखित पूर्वानुमति अनिवार्य है।
☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
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≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।
हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ रहे थे। हम संजय दृष्टिश्रृंखला को कुछ समय के लिए विराम दे रहे हैं ।
प्रस्तुत है रंगमंच स्तम्भ के अंतर्गत महाराष्ट्र राज्य नाटक प्रमाणन बोर्ड द्वारा मंचन के लिए प्रमाणपत्र प्राप्त धारावाहिक स्वरुप में श्री संजय भारद्वाज जी का सुप्रसिद्ध नाटक “एक भिखारिन की मौत”। )
रंगमंच ☆ दो अंकी नाटक – एक भिखारिन की मौत – 3 ☆ संजय भारद्वाज
नज़रसाहब- एक मिनट मियाँ। इस पेंटिंग के बारे में एक आइडिया आया है, ज़रा उसको पूरा कर लूँ। (पेंटिंग पर ब्रश से कुछ स्ट्रोक्स मारता है। रमेश, अनुराधा एक दूसरे को देख कर मुस्कराते हैं। काम पूरा करने के बाद पीकदान में पीक थूँकता है।)है।)
नज़रसाहब- हाँँ क्या पूछा था? टोक भी लिया करो भाई बीच-बीच में। वरना हम एक बार अपनी पेंटिंग में खो गए तो फिर बैठे रहियेगा यहींं दो, चार, पाँच दिन। नज़रसाहब यूँँ ही नज़रसाहब तो बने नहीं। एक बार अगर पेंटिंग में लग गए तो अरे मियाँँ चार-चार दिन होश नहीं रहता। नौकर खाना रख जाता है। खाना ज्यों का त्योंं पड़ा रहता है। बेचारा फिर वापस ले जाता है। फिर रख जाता है, फिर वापस। (हँसता है।) ये चार-चार दिन खयाल ना रहने वाली बात नोट कर लें। अपने अखबार में ज़रूर लिखें।
अनुराधा- नज़रसाहब, आपने जब उस भिखारिन को देखा तो वह क्या कर रही थी? किस तरह के कपड़े लपेटी थी? कैसी लग रही थी? आख़िर ऐसा क्या था कि उसने नज़रसाहब जैसे जाने-माने चित्रकार को इतना प्रभावित किया कि वे उसे अपनी पेंटिंग का विषय बना बैठे!
रमेश- पहली प्रतिक्रिया वाली बात भी पूछ लेना अनुराधा।
नज़रसाहब- हमें ध्यान है। है ध्यान हमें। एक-एक कर सारी बातों का खुलासा करेंगे हाँ..(पीक थूकता है)। कहाँ थे हम?
रमेश- मेनपोस्ट पर।… मतलब मेनपोस्ट तक पहुँच गए थे।
नज़रसाहब- हां जब हम मेनपोस्ट पर उतरे और सामने वाले फुटपाथ पर नज़र डाली तो वहाँ अच्छी-ख़ासी भीड़ इकट्ठा हो रखी थी। अब हम तो उसे यों जाकर देख नहीं सकते थे न। आख़िर नज़रसाहब कोई ऐसे आदमी तो हैं नहीं कि कहीं भी भीड़ में खड़े हो जाएँ। भई अपने फैन्स जीना मुश्किल कर दें।
रमेश- तो फिर आपने…?
नज़रसाहब- उस फुटपाथ के साथ ही हमारे हुसैन मियाँ घड़ीसाज़ हैं न, हुसैन वॉच रिपेअर्स, वह दुकान है ना। पहुँच गए वहाँ, कह दिया घड़ी थोड़ा पीछे चलती है। हुसैन मियाँ ने कुर्सी दी, चाय का इंतज़ाम किया तो हम वहाँ आराम से बैठ गए। वहाँ से हमारे और भिखारिन के बीच बमुश्किल पाँच-सात हाथ का फ़ासला होगा। हमारी नज़र उस भिखारिन पर पड़ी और देखते ही रह गए, मियाँ देखते ही रह गए हम। करीबन उन्नीस-बीस साल की छोकरी। उलझी हुई बालों की लटों से बाहर आती हवा से उड़ती थोड़ी-सी जुल्फें। पतली, हल्की-सी उठी हुई नाक, बहुत बड़ी-बड़ी बोलती आँखें, आसमान की ओर देखती हुई, दुनिया से बेभान, ख़ूबसूरती से झुके हुए कंधे। अपने भीतर सारे जहां की खूबसूरती समेटे, दुनिया भर के जोबन से लदे दो घड़े,…सब कुछ यूँ ही खुला छोड़े, अधनंगी..! बदन के साथ लाजवाब एंगल बनाए पतली-सी कमर, कमर के नीचे केवल एक निकर पहने…, दोनों टांगें मोड़े, उन टांगों पर चढ़ आई मिट्टी की लकीरें भी भीतर की ख़ूबसूरती को छिपा नहीं पा रही थी…देखते ही रह गए हम…और हमने उन बोलती ख़ूबसूरत आँखों, सैलाबी जवानी की मुमताज़ मूरत, खूबसूरती को खुद में खूबसूरत ढंग से समेटे उस ज़िंदा पेंटिंग को नाम दिया ‘खूबसूरत।’
रमेश- नज़रसाहब, इस खूबसूरत ज़िंदा पेंटिंग को आपने भीख में सौ-दो सौ रुपये तो दे ही दिए होंगे।
अनुराधा- रमेश, यह भी कोई पूछने की बात है। ‘खूबसूरत’ पर रिकॉर्ड दाम की बोली चढ़ेगी। इस पेंटिंग की प्रेरणा को नज़रसाहब ने रुपयों से तौलने की सोची हो तो भी ताज्ज़ुब नहीं होना चाहिए।
नज़रसाहब- लो कर लो बात। तुम दोनों ने कभी किसी तरह की छोटी-मोटी पेंटिंग भी की है।… नहीं ना.., तभी इस तरह की वाहियात बातें कर रहे हो। हम तो उसके किसी एंगल में एक परसेंट भी फर्क नहीं चाहते थे। तीन दिन हर रोज हुसैन की दुकान में बैठकर उसे देखते रहे। हुसैन मियाँ भी समझ गए थे कि घड़ी तो बहाना है, कोई और निशाना है।….. अच्छा हुआ इन तीन दिनों में शायद उसे किसी ने कुछ नहीं दिया था। उसके बदन में एक सूत का भी फ़र्क आ जाता तो ऐसी ग्रेट पेंटिंग नहीं बन पाती, कभी नहीं बन पाती। इस पेंटिंग का पहला एक्जिबिशन हम लंदन में करेंगे। वहां रॉयल फैमिली के एक मेम्बर के हाथों इसका इनॉगुरेशन होगा। तारीख अभी तय नहीं हुई है पर अगले महीने के पहले हफ्ते के आसपास होगा।… अब खास तौर से लिखें कि इनागुरेशन यूके के राजघराने के एक मेम्बर के हाथों होगा। ‘खूबसूरत’, ‘खूबसूरत’ एन इंटरनेशनल पेंटिंग बाय नज़रसाहब, द इंटरनेशनल पर्सेनेलिटी। (हँसता है)।
रमेश- नज़रसाहब, यह तो हुई चित्रकार नज़रसाहब की प्रतिक्रिया। मैं नज़रसाहब के भीतर छिपे पुरुष, एक मर्द की ईमानदार और सच्ची प्रतिक्रिया जानना चाहूँगा।
नज़रसाहब- क्या मतलब?
रमेश- मतलब कि.. एक जवान औरत को खुले बदन देखकर भीतर का मर्द कहीं ना कहीं तो…
नज़रसाहब- लाहौल विला कूवत, लाहौल विला कूवत! ऐसे ओछे और छिछोरे सवाल नज़रसाहब से करने की हिम्मत कैसे हुई तुम्हारी? शर्म आनी चाहिए। नज़रसाहब आज केवल हिंदुस्तान में नहीं, दुनिया में एक जाना- माना नाम है। उसके कैरेक्टर पर इस तरह कीचड़ उछालना.., लाहौल विला कूवत! गंदगी की भी कोई हद होती है! (अनुराधा नज़रसाहब को सम्मोहित करती है।)
अनुराधा- मेरी आँखों में देखो, मेरी आँखों में देखो, मेरी आँखों में देखो।
(नज़रसाहब का सम्मोहित होना। अनुराधा, दर्शकों की ओर पीठ करके खड़ी होती है। कुर्ते के ऊपर डाले जैकेट को उतारने की मुद्रा में फैलाती है। पात्र की वेशभूषा के अनुसार ऐसा संकेत देना है जैसे वह भिखारिन की तरह शरीर के ऊपरी भाग को अनावृत किए हुए है। नज़र का बौखलाना।)
रमेश- नज़र, तुम्हें यह चाहिए न?
नज़रसाहब- हाँ,..हाँ..।
रमेश- भिखारिन को खुले बदन देखकर कैसा लगा?
नज़रसाहब- अच्छा, बहुत अच्छा। बहुत खूबसूरत थी वह। ग़ज़ब की ख़ूबसूरत। तीन दिन लगातार उसका एक-एक अंग देखा है। कमबख्त ने पागल कर दिया था। ऐसा मन होता था…
क्रमशः …
नोट-‘एक भिखारिन की मौत’ नाटक को महाराष्ट्र राज्य नाटक प्रमाणन बोर्ड द्वारा मंचन के लिए प्रमाणपत्र प्राप्त है। ‘एक भिखारिन की मौत’ नाटक के पूरे/आंशिक मंचन, प्रकाशन/प्रसारण, किसी भी रूप में सम्पूर्ण/आंशिक भाग के उपयोग हेतु लेखक की लिखित पूर्वानुमति अनिवार्य है।
☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
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≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।
हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ रहे थे। हम संजय दृष्टिश्रृंखला को कुछ समय के लिए विराम दे रहे हैं ।
प्रस्तुत है रंगमंच स्तम्भ के अंतर्गत महाराष्ट्र राज्य नाटक प्रमाणन बोर्ड द्वारा मंचन के लिए प्रमाणपत्र प्राप्त धारावाहिक स्वरुप में श्री संजय भारद्वाज जी का सुप्रसिद्ध नाटक “एक भिखारिन की मौत”। )
रंगमंच ☆ दो अंकी नाटक – एक भिखारिन की मौत – 2 ☆ संजय भारद्वाज
अनुराधा- (रमेश को सम्मोहित करती है।) यहाँँ देखो… मेरी आँखों में देखो…मेरी आँखों में देखो… मेरी आँखों में देखो… (थोड़े से प्रतिरोध के बाद रमेश सम्मोहित हो जाता है।)
अनुराधा- क्या नाम है तुम्हारा?
रमेश- रमेश अय्यर।
अनुराधा- क्या करते हो?
रमेश- ‘नवप्रभात’ अख़बार का संपादक हूँ।
अनुराधा- उपसंपादक कौन है?
रमेश- अनुराधा चित्रे।
अनुराधा- कौन?
रमेश-अनुराधा चित्रे।
अनुराधा- बोलते रहो।
रमेश- अनुराधा चित्रे, अनुराधा चित्रे, अनुराधा चित्रे। (अनुराधा सम्मोहन समाप्त करती है।)
रमेश- अज़ीब-सा क्या हुआ था मुझे?
अनुराधा- श्रीमान रमेश अय्यर, प्रधान संपादक, ‘नवप्रभात’ को पता होना चाहिए कि अखबार की उपसंपादिका अनुराधा चित्रे को सम्मोहनशास्त्र का अच्छा ज्ञान है। इस ज्ञान को अभी-अभी वह साबित कर चुकी है। यदि संपादक महोदय चाहेें तो इस ज्ञान का उपयोग लोगों के भीतर के पशु को बाहर लाने के लिए किया जा सकता है।
रमेश- फैंटेस्टिक! वाह अनुराधा! सुपर्ब।
अनुराधा- और सुनो। मैंने तुम पर बहुत हल्के सम्मोहन का प्रयोग किया था। हम जिसका इंटरव्यू करेंगे, उस पर इसका गहरा सम्मोहन इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके चलते उसे इंटरव्यू के दौरान पूछी बातें याद आने में सात से आठ दिन का वक्त लग सकता है।
रमेश- इतने वक्त में तो हम सीरिज़ पूरी कर प्रकाशित भी कर देंगे। बस अब देखो, हर तरफ नवप्रभात, नवप्रभात, नवप्रभात।
अनुराधा- ओके रमेश, मैं ऐसे चुनिंदा लोगों की लिस्ट तैयार करती हूँ जिन्होंने उस भिखारिन वहाँँ देखा था। मेरे ख्याल से हम आज दोपहर से इंटरव्यू शुरू कर सकते हैं।
रमेश- राइट। लिस्ट तैयार करके ले आओ। 1:00 बजे निकलते हैं। लंच बाहर कहीं होटल में ले लेंगे।….अरे अनुराधा, कल के फ्रंट पेज के लिए उस भिखारिन की लाश के चार फोटोग्राफ्स हैं। जरा देख लो, कौन सी डाली जाए। मेरे ख्याल से यह दो तो डाल नहीं सकते, कथित अश्लील हैं।
अनुराधा- यह बैक पॉश्चर डाल देना।
रमेश- देख लो फिर कहीं अश्लीलता, वल्गैरिटी….।
अनुराधा- नॉट अट ऑल। फ्रंट पोर्शन को लोग वल्गर मानते हैं और बैक पॉश्चर को आर्ट (हँसती है)। ओके देन, सी यू एट वन ओ क्लॉक, बाय।
रमेश- (तस्वीर हाथ में है) शहर की चर्चित भिखारिन की लाश।
प्रवेश दो
(प्रसिद्ध चित्रकार नज़रसाहब का घर है। यहाँँ-वहाँँ बेतरतीब-सा पड़ा सामान। एक ओर दो-तीन कुर्सियाँ। एक तिपाई। बीच में स्टैंड पर लगभग पूरी तैयार एक अर्द्धनग्न महिला की पेंटिंग। तिपाई पर रंग, ब्रश आदि बिखरे पड़े हैं। प्रकाश होने पर रमेश, अनुराधा और नज़रसाहब दिखाई देते हैं। ग़ज़ल का एक रेकॉर्ड बज रहा है।)
अनुराधा- नज़रसाहब, सुना है कि आपकी आने वाली पेंटिंग जिसे आपने ‘खूबसूरत’ नाम दिया है, उस मेनपोस्ट वाली भिखारिन से प्रेरित है।… तो ऐसा क्या था उस भिखारिन में जिसने आपको इतना प्रभावित किया।
नज़रसाहब- यह सच है कि हमारी पेंटिंग ‘खूबसूरत’ मेनपोस्ट वाली भिखारिन से प्रेरित है। दो-चार रोज से अखबारों में उस भिखारिन का चर्चा हो रहा था। नेचुरली हमारे भीतर का चित्रकार भी उसे देखने की तमन्ना करने लगा।
रमेश- तो आपने….
नज़रसाहब- भाई जब कोई बात कर रहे हों तो पूरा करने दिया करो। बीच में टोकने से मज़ा नहीं आता। हाँ तो क्या कह रहे थे हम?
अनुराधा- उस मेनपोस्ट वाली भिखारिन की चर्चा सुनकर आपके इच्छा होने लगी थी उसे देखने की।
नज़रसाहब- हूँ….और उस इच्छा के चलते हम एक दिन…. जुमां के पहले वाला दिन था, हाँँ, बृहस्पतिवार की बात है। सो बृहस्पतिवार को हमने फैसला कर लिया उस भिखारिन को देखने का।…… ऐसे मुँँह क्या देख रहे हो तुम दोनों?…. पूछो फिर क्या हुआ?…. एकदम नौसिखिए, नए-नए जर्नलिस्ट हुए दिखते हो। इंटरव्यू लेते वक्त बीच-बीच में टोकते रहना चाहिए।
रमेश- जी आपने ही तो कहा था कि…. एनीवे, हम जानना चाहेंगे नज़रसाहब कि आपने उस भिखारिन को कब देखा? आई मीन कौन से दिन, किस वक्त, दोपहर, शाम, रात या फिर सुबह?
नज़रसाहब- किबला….(पानदान में पान थूकता है।) कहा ना कि बृहस्पतिवार के अख़बार में उसके बारे में पढ़ा तो सोच लिया कि आज तो इस बला को देखना ही पड़ेगा। मियाँ दोपहर हो गई थी नहाने-धोने में। तब तक बड़े बेचैन-से रहे हम। लगता रहा कि बस उसे जब तक एक बार देख लेंगे चैन नहीं पड़ेगा। तैयार होकर करीबन दो बजे निकले होंगे घर से। शायद सवा दो बज रहा हो। हो सकता है कि ढाई बजा हो। अबे कमबख़्त वक्त भी तो ठीक से याद नहीं रहता ना।
रमेश- जब आप मेनपोस्ट पहुँँचे…
नज़रसाहब- ठहरो यार! कोई भी बात पूरी बताने दिया करो। फिर अगला सवाल पूछो….और ये तुम टोका मत करो बीच में। हमारा सारा टोन खराब हो जाता है।.हाँँ तो..
अनुराधा- आप कह रहे थे कि आप की घड़ी में सवा दो बजा था।
नज़रसाहब- हां तो सवा बजे हम घर से निकले। नीचे जाकर टैक्सी के लिए खड़े हो गए। तुम लोग तो जानते ही हो कि आजकल तो टैक्सी भी जल्दी नहीं मिलती। खड़े रहे, खड़े रहे.., खड़े-खड़े तकरीबन आधा घंटा गुज़र गया।
रमेश- तो आधा घंटे बाद आपको टैक्सी मिल गई।
नज़रसाहब- मिलना ही थी। दरअसल उस आधा घंटे में कोई टैक्सी वहाँँ से गुज़री ही नहीं। जो पहली टैैक्सी आई, ख़ुुुद-ब-ख़ुद आकर ठहर गई पास। बड़े अदब से दरवाज़ा खोला बेचारे ने और इज्ज़त से बोला, ‘ तशरीफ़ लाइए नज़रसाहब।’ हम तो भौंंचक्के रह गए। पूछा, ‘मियाँँ, पहचानते हैं आप हमें?’ जानते हैं क्या जवाब दिया उसने? बोला, ‘आपको तो सारा हिंदुस्तान जानता है। इतना भी बेशर्म सिटिजन नहीं हूँ जो आपको न पहचानूँ। नज़रसाहब को नहीं जाननेवाला हिंदुस्तान को नहीं जानता।’… यह बात ख़ास तौर पर नोट करें और लिखें अपने परचे में।… और एक और ख़ास बात यह कि टैक्सीवाले ने हमसे पैसे भी नहीं लिए।
रमेश- तो आप पहुँँच गए मेनपोस्ट पर।
नज़रसाहब- पहुँँचना ही था भाई।
रमेश- जब आप की निगाहें पहले पहल उस भिखारिन पर पड़ी तो आपके मन में आई पहली, तुरंत पहली प्रतिक्रिया क्या थी?
नज़रसाहब- एक मिनट मियाँ। इस पेंटिंग के बारे में एक आइडिया आया है, ज़रा उसको पूरा कर लूँ। (पेंटिंग पर ब्रश से कुछ स्ट्रोक्स मारता है। रमेश, अनुराधा एक दूसरे को देख कर मुस्कराते हैं। काम पूरा करने के बाद पीकदान में पीक थूँकता है।)
क्रमशः …
नोट-‘एक भिखारिन की मौत’ नाटक को महाराष्ट्र राज्य नाटक प्रमाणन बोर्ड द्वारा मंचन के लिए प्रमाणपत्र प्राप्त है। ‘एक भिखारिन की मौत’ नाटक के पूरे/आंशिक मंचन, प्रकाशन/प्रसारण, किसी भी रूप में सम्पूर्ण/आंशिक भाग के उपयोग हेतु लेखक की लिखित पूर्वानुमति अनिवार्य है।
☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
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≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।
हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ रहे थे। हम संजय दृष्टिश्रृंखला को कुछ समय के लिए विराम दे रहे हैं ।
आज से प्रस्तुत है रंगमंच स्तम्भ के अंतर्गत महाराष्ट्र राज्य नाटक प्रमाणन बोर्ड द्वारा मंचन के लिए प्रमाणपत्र प्राप्तधारावाहिक स्वरुप में श्री संजय भारद्वाज जी का सुप्रसिद्ध नाटक “एक भिखारिन की मौत”। )
रंगमंच ☆ दो अंकी नाटक – एक भिखारिन की मौत – 1 ☆ संजय भारद्वाज
पात्र परिचय
‘एक भिखारिन की मौत’ के कुल 8 स्तंभ हैं। रमेश और अनुराधा पत्रकार हैं। छह अन्य पात्र अलग-अलग क्षेत्र के प्रतिनिधि हैं। रमेश और अनुराधा द्वारा लिए जाने वाले साक्षात्कारों के माध्यम से और इन पात्रों की भूमिका द्वारा शनै:-शनै: कथानक का विकास होता है। कथानक की शीर्ष नायिका ‘भिखारिन’ जिसके इर्द-गिर्द कथा चलती है, मंच पर कहीं नहीं है। कथानक के विकास में सहयोगी बने पात्रों का चरित्र चित्रण करते समय नाटककार की कल्पना में चरित्र कैसा था, इसका वर्णन करना ही इस परिचय का उद्दिष्ट है। इससे नाटककार की कल्पना मंच पर उतारने में निर्देशकों को आसानी होगी। नाटककार के निर्देशक होने का लाभ भी अन्य निर्देशकों को मिल सकेगा।
नज़रसाहब – नज़रसाहब चित्रकार है। आयु लगभग 65 वर्ष। अपने आप में खोया चरित्र। प्रसिद्धि की ऊँँचाइयों पर होते हुए भी प्रसिद्धि की प्यास मरी नहीं है। स्वाभाविक रचनात्मक अहंकार का शिकार। अपने मोह में दूसरे को महत्व न देने वाला, पत्रकारों को बीच-बीच में टोकते रहने के लिए कहनेवाला पर टोकने पर मना करने वाला, एक खास तरह की सनक ओढ़ा हुआ व्यक्तित्व।
मंच पर कुर्ता-पायजामा पहने, मेहंदी रंगे लाल से बाल और चेहरे पर उच्चवर्गीय लाली पात्र को बेहतर स्वरूप दे सकती है। उसकी भाषा में उर्दू की बहुतायत और बोलने का ख़ास उर्दू लहज़ा है।
एसीपी भोसले – आयु लगभग 45 वर्ष। पारंपरिक भारतीय पुलिस का पारंपरिक असिस्टेंट कमिश्नर। खुर्राट, बेहद चालाक किस्म का चरित्र। एक ओर मीडिया से गहरी मित्रता का स्वांग करता है तो दूसरी ओर पत्रकारों से बातचीत में बेहद सतर्क भी रहता है। यह उसकी प्रोफेशनल एफिशिएंसी भी है। पुलिसिया चरित्र में वरिष्ठ स्तर का ओढ़ा हुआ काईंयापन उसके चरित्र में है।
वह सरकारी वर्दी में है। उसकी भाषा में उच्चारण में स्थानीय भाषा का पुट रहेगा। नाटककार ने स्थानीय प्रभाव की दृष्टि से मराठी का प्रयोग किया है। अन्य प्रांतों में प्रदेश धर्म के अनुरूप भाषा का परिवर्तन चरित्र को दर्शकों से ज्यादा आसानी से जोड़ सकेगा।
मधु वर्मा – हिंदी फिल्मों में जगह बनाने के लिए संघर्षरत अभिनेत्री। सफलता के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार है। आयु लगभग 20 वर्ष। निर्माता की इच्छा और सफलता की चाह के बीच व्यावसायिक संतुलन की समझ रखने वाली। स्वाभाविक रूप से आलोचकों से चिढ़ने वाली।
मधु को आधुनिकतम वस्त्रों में दिखाना अपेक्षित है। उसकी भाषा पर अंग्रेजी का बहुत अधिक प्रभाव है। हिंदी के जरिए पेट भरकर अंग्रेजी बोलने वाले कलाकारों का प्रतीक है मधु वर्मा। उच्चारण में हिंदी का कॉन्वेंट उच्चारण उसके चरित्र को जीवंत करने में सहायक सिद्ध होगा।
प्रोफेसर पंत – विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र का विभागाध्यक्ष। आयु लगभग 55 वर्ष। केवल अपनी बात कहने का आदी होने के कारण दुराग्रही चरित्र। ज्ञानी पर अभिमानी। उसके विचारों से असहमति उसे मान्य नहीं होती।
कोट-पैंट, मोटे फ्रेम का चश्मा चरित्र के अनुकूल होगा। प्रोफेसर की भाषा शुद्ध है। कहने का, समझाने का अपना तरीका है। अपनी बात को अपने आग्रहों और अपनी तार्किकता से रखने वाला चरित्र।
रमणिकलाल – एक छुटभैया नेता। आयु लगभग 50 वर्ष। नेताई निर्लज्जता और टुच्चेपन का धनी। प्रचार का ज़बरदस्त भूखा, चरित्रहीन व्यक्तित्व। अख़बार में अपने प्रेस नोट भेजकर उन्हें प्रकाशित देखने की गहरी ललक रखनेवाला, प्रचार के लिए उल-जलूल बेसिर-पैर का कोई भी हथकंडा अपनाने के लिए तैयार।
उसे कुर्ता, पायजामा, टोपी में दिखाया जा सकता है। उसकी भाषा पर देहाती उच्चारण का प्रभाव है। अपेक्षित है कि वह ‘श’ को ‘स’ बोले जिससे उसके चरित्र को उठाव मिलेगा।
रूबी – पेशे से कॉलगर्ल। आयु लगभग 25 वर्ष। सकारात्मकता का नकाब ओढ़े हुए सारे नकारात्मक चरित्रों के बीच एकमात्र सच्चा सकारात्मक चरित्र है वह। उसके भीतर और बाहर कोई अंतर नहीं है। अपने भोगे हुए यथार्थ के दम पर खड़ी एक ईमानदार पात्र। समाज का काला मुँँह देख चुकी है, अतः समाज के प्रति उसके मन में आक्रोश फूट-फूटकर भरा है। बेबाक बात कहनेवाली। गहरी संवेदनशील।
रूबी की वेशभूषा में स्कर्ट ब्लाउज या स्कर्ट टी-शर्ट अपेक्षित है। उच्चारण में कोई खास पुट नहीं है किंतु भाषा कथित अश्लील है। जिन शब्दों को सभ्य समाज घुमा-फिराकर कहता है, उन्हें वह सीधे-सपाट कहती है। आक्रोश के क्षणों में उसकी भाषा में गालियों का समावेश है।
अनुराधा – रमेश के साथ नाटक की सूत्रधार। समाचारपत्र की उपासंपादिका। आयु लगभग 35 वर्ष। पत्रकारिता की आवश्यकता और अपेक्षा को पूरी करनेवाली। रमेश के साथ तालमेल रखते हुए वह इंटरव्यू सीरीज़ को सफल करने में जुटी है। चूँकि उसे सम्मोहन का ज्ञान है, वह इस नाटक के सारे सूत्र हाथ में रखते हुए मंच पर नायिका के रूप में उभरती है। सम्मोहन के दृश्यों में विविधता लाने उससे अपेक्षित है। उसके चरित्र में मंचन की दृष्टि से ढेर सारे रंग हैं।
अनुराधा की भाषा साफ़ और उसके पेशे के अनुकूल है। हर चरित्र का इंटरव्यू करते समय भिन्न वस्त्रभूषा का प्रयोग किया जा सकता है। सम्मोहन के दृश्यों को दृष्टिगत रखते हुए पोशाकों का चयन करें। संभव हो तो कुछ दृश्यों में सम्मोहन के लिए सायक्लोड्रामा का उपयोग करें।
रमेश – समाचारपत्र का संपादक। पूरे नाटक का प्रधान सूत्रधार। आयु लगभग 40 वर्ष। सुलझा हुआ पेशेवर चरित्र। अपने अख़बार को आगे ले जाने की इच्छा रखने वाला। इस इच्छा के चलते ‘बदनाम होंगे तो क्या नाम ना होगा’ का सूत्र अपनाने में उसे कोई हिचक नहीं है। पत्रकारिता के हथकंडों के साथ अपने विषय का ज्ञानी। संपादक के रूप में सामने वाले को पढ़ सकने में समर्थ।
रमेश की भाषा शुद्ध है। चूँकि अनुराधा के साथ लह भी पूरे समय मंच पर है, अत: विविधता की दृष्टि से पोशाकों में परिवर्तन अपेक्षित है। थोड़े बढ़े हुए बाल, दाढ़ी, जींस- कुर्ता, सफारी आदि का प्रयोग किया जा सकता है।
प्रथम अंक
प्रवेश एक
(रंगमंच पर विशेष नेपथ्य की आवश्यकता नहीं है। बाएं भाग में एक मेज, कुर्सी, कैलेंडर आदि लगाकर दैनिक ‘नवप्रभात’ का कार्यालय दिखाया जा सकता है। दाएं भाग में अन्य पात्रों के लिए आवश्यक नेपथ्य इस तरह से लगाया जाए कि पात्रानुसार थोड़े बहुत परिवर्तन के साथ उसी मंचसज्जा का उपयोग किया जा सके।
रंगमंच पर समतोल बनाए रखने के लिए कुछ पात्रों को बाएं भाग में प्रस्तुत करना भी निर्देशक से अपेक्षित है। पर्दा उठने पर रमेश खबर पढ़ते हुए नजर आता है। वह रंगमंच के अगले हिस्से पर है। उसके लिए एक स्पॉटलाइट का प्रयोग किया जा सकता है।)
रमेश- कल देर रात अर्द्धनग्न भिखारिन मेन पोस्ट के सामने वाले फुटपाथ पर मरी मिली। आश्चर्यजनक बात यह थी कि लाश के शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं था। वह पूरी तौर से…, ऊँ हूँ, ख़बर में दम नजर नहीं आता। किसी और ढंग से लिखा जाए। फिर यह ख़बर फ्रंट पेज पर शॉर्ट न्यूज़ में क्यों? दिस केन बी सेंसेशनल हेडलाइन, न्यूड डेड बॉडी एंड डेड सेंसेटिविटी। …एक नंगी मुर्दा औरत और मुर्दा संवेदनशीलता! वाह! साला सारे अखबारों की हेडलाइंस को पीछे छोड़ देगी यह ख़बर! हड़कंप मच जाएगा। लोग ‘नवप्रभात’ खरीदने के लिए टूट पड़ेंगे।मुखपृष्ठ पर एक बड़ी सारी तस्वीर होगी उस भिखारिन की। तस्वीर के नीचे शीर्षक होगा, ‘चर्चित भिखारिन की रहस्यमयी नंगी लाश! …चर्चित! ‘ (अनुराधा प्रवेश करती है।)
अनुराधा- हाँँ वह भिखारिन चर्चित तो थी ही। सभ्य समाज में कोई स्त्री योंं अर्द्धनग्न शरीर के ऊपरी हिस्से में बगैर कुछ पहने, कमर पर लिपटे जरा से वस्त्र से खुद को थोड़ा बहुत ढके, वह मुख्य शहर के मुख्य चौक पर भीख मांगने बैठी थी।
रमेश- एक बात समझ में नहीं आती। वह चौक में भीख मांगने बैठी ही क्यों थी?… केवल चर्चित होने के लिए..? पर उसे चर्चा की ज़रूरत ही क्या थी? चर्चा उसकी ज़रूरत तो हो ही नहीं सकती।
अनुराधा- पता नहीं। हो सकता है हाँ, हो सकता है ना। फिर भी ऐसा नहीं लगता रमेश कि सारा समाज कितना स्वार्थी और कितना पत्थर-सा हो गया है। निष्प्राण हैं हम सब। पिछले चार दिनों से यह औरत शहर भर में अपनी नग्नता की वजह से चर्चित रही और इस दौरान किसी ने उसके बदन पर एक टुकड़ा कपड़ा भी नहीं फेंका।
रमेश- यू आर राइट। संवेदनशीलता का संकट एक कड़वा सच है। हज़ारों लोग गुज़रे होंगे मेनपोस्ट के उस फुटपाथ से जहाँँ वह भिखारिन बैठी थी। कितने ही लोगों ने उसे इस हालत में हाथ फैलाते देखा होगा लेकिन..!
अनुराधा- लेट इट बी। चाय पिओगे रमेश?
रमेश- पूछने की क्या जरूरत है? पत्रकारों के सबसे ज्यादा रुचि दो ही बातों में होती है। एक, कोई सेन्सेशनल न्यूज़ और दूसरा चाय का प्याला।
अनुराधा- हाँ चाय या कॉफी का प्याला ना हो तो देश और समाज की घटनाओं पर घंटों बुद्धिजीवी चर्चाएँ कैसे होंगी?
रमेश- (चाय पीते हुए) अनुराधा, एक विचार आया है मन में। इस भिखारिन की मौत फिलहाल शहर का सबसे ‘हॉट इशू’ है। क्यों न हम इस पर एक इंटरव्यू सीरीज़ करें!
अनुराधा- कैसी इंटरव्यू सीरीज़?
रमेश- हम शहर के कुछ ऐसे चुनिंदा लोगों का इंटरव्यू करें जिन्होंने इस भिखारिन को वहाँँ उस हालत में भीख मांगते देखा है। अलग-अलग क्षेत्र के अलग-अलग व्यक्तित्व। देखें कि इनडिविजिल रिएक्शन, व्यक्तिगत मत क्या है और सामूहिक प्रतिक्रिया क्या है? हम लगभग एक सप्ताह तक इस सीरीज़ को चला सकते हैं। ‘नवप्रभात’ की ज़बरदस्त चर्चा होगी और अखबार अपने आप ज़्यादा बिकेगा।
अनुराधा- यू आर ए टैलेंटेड एडिटर। ‘नवप्रभात’ को एस्टेब्लिश करने का अच्छा मौका है। लेकिन रमेश कल प्रेस क्लब में पोद्दार मिला था। ‘माय सिटी’ शायद इस मामले पर पाठकों की प्रतिक्रिया इकट्ठा कर रहा है। हाँँ लेकिन एक बड़ा फ़र्क आया है। कल तक वह भिखारिन ज़िंदा थी जबकि आज उसकी मौत के बाद संदर्भ बदल गए हैं।
रमेश- वैसे मेरा विचार कुछ अलग था। हम लोगों का इंटरव्यू तो करें पर….!
अनुराधा- पर…?
रमेश- अनुराधा, मेरी समझ से हर व्यक्ति में एक पशु छिपा है। ख़ासतौर पर जिस विकृत मानसिकता में हमारा समाज जीता है, उसमें यह पशु ज्यादा प्रभावी और हिंसक है।
अनुराधा- मैं समझी नहीं।
रमेश- अनुराधा, यह भिखारिन युवा थी, फिर लगभग नग्न। मेरी स्पष्ट समझ है कि जिस किसी ने भी उसे देखा होगा, उसके भीतर का पशु थोड़ी देर के लिए ही क्यों न सही, अनियंत्रित ज़रूर हुआ होगा। सवाल यह है कि कोई भी व्यक्ति अपने भीतरी पशु के अनियंत्रित होने की बात पत्रकारों के सामने स्वीकार कैसे और क्यों करेगा?
अनुराधा- पर क्या हासिल होगा रमेश?
रमेश- ज़बरदस्त विवाद। इस भिखारिन के बहाने हम समाज के हर वर्ग का चेहरा देखेंगे।.. और मान लो कोई बड़ी हस्ती ‘नवप्रभात’ के खिलाफ गई तो भी लाभ हमें ही होगा। जितना विवाद होगा, उतनी ही चर्चा भी तो होगी। इस इंटरव्यू सीरीज़ से मैं सात महीने पुराने ‘नवप्रभात’ को सत्तर साल पुराने अखबारों के बराबर लाकर खड़ा कर देना चाहता हूँँ।… लेकिन समस्या वही है कि कोई भी व्यक्ति अपने अनियंत्रण का स्वीकार कैसे करेगा?
अनुराधा- (रमेश को सम्मोहित करती है।) यहाँँ देखो… मेरी आँखों में देखो…मेरी आँखों में देखो… मेरी आँखों में देखो… (थोड़े से प्रतिरोध के बाद रमेश सम्मोहित हो जाता है।)
क्रमशः …
नोट-‘एक भिखारिन की मौत’ नाटक को महाराष्ट्र राज्य नाटक प्रमाणन बोर्ड द्वारा मंचन के लिए प्रमाणपत्र प्राप्त है। ‘एक भिखारिन की मौत’ नाटक के पूरे/आंशिक मंचन, प्रकाशन/प्रसारण, किसी भी रूप में सम्पूर्ण/आंशिक भाग के उपयोग हेतु लेखक की लिखित पूर्वानुमति अनिवार्य है।
☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
9890122603
≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈
☆ रंगमंच ☆ नाटकावर बोलू काही: आनंद – स्व विष्णु वामन शिरवाडकर ‘कुसुमाग्रज’ ☆ श्रीमती उज्ज्वला केळकर ☆
‘नटसम्राट’ या नाटकाचे लेखक आणि या नाटकासाठी ज्ञानपीठ पुरस्कार मिळालेले वि. वा. शिरवाडकर यांची ‘वीज म्हणाली धरतीला’, ‘आनंद’, दूसरा पेशवा, ‘कौंतेय’, विदूषक, अशी आणखीही अनेक उत्तम नाटके आहेत. ही सारी नाटके बघू जाता, त्यांना नाट्यलेखनाचे सम्राटच म्हणायला हवं. ‘आनंद’ हे असंच एक उत्तम नाटक. या नाटकाचा पहिला प्रयोग, नाट्यसंपदा मुंबई या संस्थेद्वारे १८ ऑक्टोबर १९७५ रोजी साहित्य संघ मंदिर मुंबई इथे सायंकाळी ७ वाजता सादर करण्यात आला. पुढे या नाटकाचे किती प्रयोग झाले माहीत नाही. नाटकापेक्षा यावरचा चित्रपट अधीक गाजला पण एखादी कलाकृती किती वाजली-गाजली यावर काही त्या कलाकृतिचे मोल ठरत नाही.
‘आनंद’ नाटकाचे मूळ श्री हृषिकेश मुखर्जी यांच्या ‘आनंद’ चित्रपटातलेच आहे. मरण समोर उभे असताना, एक मनुष्य, हसत-खेळत, प्रत्येक परिचितात स्वत:ला गुंतवून घेत, भोवतालच्या जीवनात सुखाच्या लहरी निर्माण करीत आपला अस्तकाल एका बेहोष धुंधीत व्यतीत करतो, ही कल्पना मला अतिशय हृद्य वाटली.’ असं सुरूवातीला, श्री हृषिकेश मुखर्जी यांचे आभार मानताना वि. वा. शिरवाडकर यांनी म्हंटले आहे. ‘कथासूत्र मूळ चित्राचेच असले, तरी त्याला नाट्यरूप देताना मी मला इष्ट वाटले, ते बदल त्यात केले आहेत. त्यामुळे पडद्यावरचेच सारे काही आपण नाटकात पाहात आहोत, असे प्रेक्षकांना अथवा वाचकांना वाटणार नाही, असा मला विश्वास वाटतो,’ असेही त्यांनी पुढे म्हंटले आहे.
‘आनंद’ नाटकात लेखकाने आनंद ही अफलातून व्यक्तिरेखा निर्माण केली आहे. नाटकातील डॉ. संजय सांगतो त्याप्रमाणे तो थोडा कवी आहे. थोडा नट आहे. थोडा विदूषकही आहे. कवी असल्यामुळे तो खूपसा कल्पनेत रमणारा आहे. क्वीकल्पनानेकदा सत्याच्या अधीक जवळ जाते. आनंदचे बोलणेही तसेच आहे.
नाटकाचं थोडक्यात कथानक असं – डॉ. संजय आणि डॉ. उमेश मित्र आहेत. त्यांचा तिसरा मित्र डॉ. शिवराज नागपूरला आहे. तो आपला मित्र आनंद याला त्यांच्याकडे पाठवतो. आनंद हा खरं तर जगन्मित्र. त्याला लिफोसारकोमा इंटेस्टाईन हा दुर्धर आजार आहे. तो संजयकडे येतो. संजय, उमेशचा मित्र बनतो. मेट्रन डिसूझाचा मुलगा जोसेफ बनतो. मुरारीलाल किंवा महम्मदभाईचा, फ्रेंड, फिलॉसॉफर, गाईड बनतो. संजायच्या बायकोचा भाऊ आणि उमेशच्या प्रेयसीचा राजलक्ष्मीचा दीर बनतो. मुरारीलाल्ला तो सरकारी कोट्यातून चित्रपट निर्माण करण्यासाठी कर्ज मिळवून देतो. डॉ. उमेशचं अबोल प्रेम मुखरीत करतो. आनंदची प्रेयसी मधुराणी नाटकात ३-४ वेळा आपल्याला भेटते. ३ वेळा त्याचा आठवणीतून आणि अगदी शेवटी वास्तवात. आनंदला आपल्या आजाराची कल्पना आहे, म्हणूनच त्याने तिला प्रत्यक्षात दूर सारलय पण मानाने ती त्याला बिलगूनच आहे.
आनंदचा स्वत:चा प्रयत्न आपलं दुर्धर आजारपण विसरण्याचा आहे पण त्याच्या जवळीकीच्या माणसांच्या डोळ्यात त्याच्या मृत्यूचा भय तरळताना त्याला दिसतय, त्यामुळे तो कासावीस होतोय. नाटकाची अखेर त्याच्या मृत्यूनेच होते पण त्यापूर्वी नाटकाचा एक भाग म्हणून केलेले स्वागत आणि शेवटी टेपवर म्हंटलेलं तेच स्वागत, अप्रतिम!
आनंद क्वीमानाचा आहे. त्यामुळे नाटकात अनेक सुंदर कवितांचा वापर झालेला आहे. इतकंच नव्हे, तर यातले गद्य संवादही काव्याचा बाज घेऊन येतात. ‘काही बोलायाचे पण बोलणार नाही,’ हे लोकप्रिय गाणं आणि
‘प्रेम नाही अक्षरांच्या भातुकलीचा खेळ
प्रेम म्हणजे वणवा होऊन जाळत जाणं
प्रम म्हणजे जंगल हून जळत राहणं
प्रेम कर भिल्लासारखं बाणावरती खोचलेलं
मातीमध्ये उगवूनसुद्धा मेघापर्यंत पोचलेलं’
ही प्रसिद्ध आणि रसिकप्रिय कविता यातलीच.
नाटकाचं सूत्रगीत आहे,
माझ्या आनंदलोकात चंद्र मावळत नाही
दर्या अथांग प्रेमाचा कधी वादळत नाही.
माझ्या आनंदलोकात केले वसंताने घर
आंब्या आंब्याच्या फांदीला फुटे कोकिळेचा स्वर
सात रंगांची मैफल वाहे इथे हवेतून
इथे मारणही नाचे मोरपिसारा लेउन
नाटकाची भाषा भर्जरी वैभव मिरणारी, तिचा तलम, मुलायम, कोमल, हळवा पोत, या सार्यावर अत्तरासारखा विनोदाचा शिडकावा आणि मुख्य म्हणजे त्यातून व्यक्त झालेलं आनंदचं तत्वज्ञान, ’ उद्या येणार्या पाहुण्याच्या ( मृत्यूच्या) फिकिरीत माझी जिंदगी आज मी जाळून टाकणार नाही. मी असा जगेन की माझा जगणं क्षणाक्षणाला तुम्हाला जाणवत राहील. आषाढातल्या मुसळधार पावसासारखं…’ किती किती म्हणून या नाटकाची वैशिष्ट्ये सांगावीत!
एखाद्या नाट्यसंस्थेने नव्याने हे नाटक रंगांमंचावर आणायला हवं.वाचकांनी हे नाटक एकदा तरी वाचायला हवं आणि त्याचा सारा ‘आनंद’ आपल्यात सामावून घ्यायला हवा.
☆ रंगमंच ☆ नाट्यउतारा: आनंद – स्व विष्णु वामन शिरवाडकर ‘कुसुमाग्रज’ ☆ श्रीमती उज्ज्वला केळकर’ ☆
आनंद
(आनंद नाटकातील आनंद आणि डॉ. उमेश म्हणजेच आनंदचा बाबूमोशाय, यांच्यातील एक संवाद)
आनंद: (रुद्ध स्वरात) बाबूमोशाय, कितीदा कितीदा मला आठवण करून देशील- की तुझं आयुष्य आता संपलं आहे. – शेवटाची सुरुवात झाली आहे. बाबूमोशाय, चांदयापासूंच नव्हे, तर माझ्या मरणापासूनही मी दूर आलो होतो. वाटलं होतं, तुम्हा लोकांच्या जीवनाच्या बहरलेल्या ताटव्यातून हिंडताना माझी आयुष्याची लहानशी कणिकाही डोंगरासारखी मोठी होईल. थेंबाला क्षणभर समुद्र झाल्यासारखा वाटेल. पण- नाही- बाबांनो- मरणाला मारता येत नाही. आपल्या मनातून काढलं तर समोरच्या डोळ्यात ते तरंगायला लागतं-तुमच्या प्रत्येकाच्या डोळ्यात मी माझं मरण पाहतो आहे- पण बाबूमोशाय, तू म्हणतोस, ते खरं आहे. मी क्षमा मागतो तुझी – तुम्हा सर्वांची- इथं येऊन तुमच्या आयुष्यात असा धुडगूस घालण्याचा मला काहीही अधिकार नव्हता. – मी चुकलो- मी- मी – उद्या चांदयाला परत जाईन बाबूमोशाय-
उमेश: (उठून त्याचे खांदे धरून ओरडतो ) तू जाऊ शकत नाहीस, आनंद – माझ्या लाडक्या- तू आता कुठंही जाऊ शकत नाहीस- तू मरणार असशील तर इथे – माझ्या घरात – माझ्या बाहुपाशात मरणार आहेस-
आनंद: (हसतो.) भाबी घरात आल्यावर तुझे बाहुपाश मोकळे सापडले पाहिजेत मात्र –
ओ.के. बाबूमोशाय, ती – कविता- मैं टेप शुरू करता हूं.
उमेश: कोणती कविता ?
आनंद: शर्त
उमेश: एका अटीवर
आनंद: कोणत्या?
उमेश: नंतर तूही काही तरी म्हंटलं पाहिजेस. आपले दोघांचे आवाज एकत्र टेप करायचे. कबूल?
आनंद: कबूल. कर सुरुवात (टेप चालू करतो.)
उमेश: (कविता म्हणतो.)
एकच शर्त की
तुटताना धागे
वळोनिया मागे
पाहायचे नाही
वेगळ्या वाटेची
लाभता पायकी
असते नसते
म्हणायचे नाही.
वांझोटया स्वप्नांचा
उबवीत दर्प
काळजात सर्प
पाळायचा नाही
दिवा हातातील
कोणासाठी कधी
काळोखाच्या डोही
फेकायचा नाही.
उमेश: आता तू-
आनंद: पण मी काय म्हणू?
उमेश: काहीही. चल, मी रेकॉर्ड करतो.
आनंद: पण- (हसतो) हं, आठवलं. पण असं नाही- थांब – हं-
(उमेश टेप चालू करतो. आनंद युवराजाचा पवित्रा घेऊन उभा राहतो. तेवढ्यात काही लक्षात येते. तसाच मागे जाऊन एक चादर काढतो, डोक्याला गुंडाळतो आणि फुलदाणीतील फूल हातात घेतो. टेप चालूच असते. नंतर:)
आनंद: (नाटकी स्वरात ) बाबूमोशाय, बाबूमोशाय, – उद्या मी नसेन, पण आज आहे आणि आज इतका आहे अब्बाहुजूर, की उद्या मी असेन की नसेन याची मला चिंता वाटत नाही. उद्या येणार्या पाहुण्याच्या फिकिरीत माझी जिंदगी आज मी जाळून टाकणार नाही. मी शेवटच्या श्वासापर्यंत जगेन जहापनाह आणि असा जगेन की माझं जगणं तुम्हाला क्षणाक्षणाला जाणवत राहील. आषाढातल्या मुसळधार पावसासारखं. मरणावर मात करण्याचा हाच रास्ता आहे, हुजूर, ते येईपर्यंत जगत राहणं. मी जीवंत आहे तोपर्यंत तुम्हीच काय, जगातली कोणतीही सत्ता मला मारू शकत नाही. हा: हा: हा:!
(आनंद उमेशला मिठी मारतो. दोघेही गळ्यात गळा घालून खळखळून हसतात.)
वि. वा.शिरवाडकर यांच्या आनंद नाटकातील एक उतारा
– स्व विष्णु वामन शिरवाडकर ‘कुसुमाग्रज’
≈ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता
☆ रंगमंच-सिनेमा ☆ दर्शकों को हंसा कर खुशी मिलती है पर सुकून संगीत में : सुगंधा मिश्रा ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
कॉमेडी कर दर्शकों को हंसा कर खुशी मिलती है लेकिन खुद को सुकून संगीत में मिलता है। यह कहना है कपिल शर्मा शो, कॉमेडी सर्कस, कॉमेडी क्लासिक, लॉफ्टर चैंपियन और लॉफ्टर के फटके आदि अनेक कॉमेडी शोज में हंसाने वाली सुगंधा मिश्रा का।
सुगंधा मिश्रा मूल रूप से जालंधर पंजाब से हैं और जालंधर व हिसार दूरदर्शन केंद्रों के निदेशक रह चुके संतोष मिश्रा की बेटी हैं। सुगंधा ने बताया कि जब पापा हिसार दूरदर्शन के निदेशक थे तब वह हिसार भी कुछ दिनों के लिए आई थीं। जालंधर के एपी जे कॉलेज से एम ए गायन किया। सुगंधा का परिवार संगीतमय परिवार है और चौथी पीढ़ी है जो इंदौर घराने से जुड़ी हुई है। जालंधर में बिग एफ एम में रेडियो जॉकी का काम भी किया कुछ समय।
-किससे प्रेरणा मिली संगीत में आने की?
-वैसे तो पूरा परिवार ही संगीत से जुड़ा हुआ है लेकिन चौथी कक्षा में थी जब दादा शंकरलाल मिश्रा जी ने सिखाना शुरू कर दिया था।
-कॉलेज में क्या योगदान रहा?
-युवा समारोहों में राष्ट्रीय स्तर तक पहुंची और पुरस्कार प्राप्त किये। कपिल शर्मा और भारती भी गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी की टीम में होते थे।
-और क्या क्या किया मंच पर?
-थियेटर, मिमिक्री। एक बार में पचास पचास आवाजें निकाल लेती थी। शास्त्रीय, पाश्चात्य गायन और सबमें पुरस्कार।
-फिर कॉमेडी में कैसे?
-सन् 2009 में युवा समारोह की वजह से ही अवसर मिला। ऑफर आया जब प्रतिभा खोज के लिए बुलाया मुम्बई से। लॉफ्टर चैलेंज के लिए। कहा कि पसंद न आए तो एक एपीसोड के बाद निकल जाना।
-फिर क्या रहा?
-आपके सामने है मेरी यात्रा। वहां मैंने म्यूजिकल कॉमेडी बनाई बिना किसी स्क्रिप्ट के। ऐसे मैं सेमीफाइनल तक पहुंच गयी। शत्रुघ्न सिन्हा जी आए थे। इस तरह कॉमेडी में मेरी पहचान बन गयी। वैसे सा रे ग म प में भी गयी और सेकेंड रनर अप रही। वैसे भी यदि पंजाब में अगर रहती तो एक संगीत प्राध्यापिका ही बन कर रह जाती। वह मेरी मंजिल नहीं थी।
-गायन का मौका नहीं मिला?
-दो साल बहुत संघर्ष किया लेकिन एक दो मूवीज में मौका मिला भी तो गाने हिट नहीं हुए।
– और किन किन कॉमेडी शोज में आईं?
-कपिल शर्मा के शो में लगभग डेढ़ साल। कॉमेडी सर्कस, कॉमेडी क्लासिज, लॉफ्टर चैंपियन, लॉफ्टर के तड़के आदि। फिर तो कॉमेडी मे गाड़ी चल निकली। मुम्बई में ही ठिकाना हो गया और विदेशों में भी लाइव शोज मिलने लगे। मम्मी पापा भी साथ देते रहे।
-संगीत की दुनिया से कॉमेडी में आ जाने से कैसा लगा?
-लक्ष्य तो आज भी संगीत और गायन ही है। एक म्यूजिक एप खोलना चाहती हूं। दर्शक जब मेरी कॉमेडी पर हंसते हैं तो खुशी होती है। हो सकता है यह कला मुझमें छिपी हो जिसे मुम्बई ने पहचान लिया। पर सुकून संगीत में ही मिलता है।
-कौन पसंदीदा गायिका?
-लता जी तो हैं ही। उनके अंदाज को फॉलो करके दिखाया। ऑल टाइम फेवरिट किशोर दा, आशा भौंसले। वे गज़ल भी उतनी ही खूबसूरती से गाती हैं।
– कॉमेडी मे कौन पसंद?
-श्रीदेवी। उतनी ही बढ़िया कॉमेडी करती थी जितना भावपूर्ण अभिनय।
-पुरस्कार?
-युवा समारोहों में राष्ट्रीय पुरस्कार तक। हरबल्लभ संगीत सम्मेलन में गाना भी किसी पुरस्कार से कम नहीं। पंडित रवि शंकर जी से जूनियर आर्टिस्ट पुरस्कार। प्राचीन कला केंद्र और रेडियो मिर्ची से भी।
-अपने आप को क्या कहना पसंद करोगी -गायिका या कमेडियन?
-एक एंटरटेनर। फुल एंटरटेनर। जो संगीत, अभिनय, गायन और कॉमेडी सब कर सकती है और कर रही है।
((श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। आजकल आप हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम युग की फिल्मों एवं कलाकारों पर शोधपूर्ण पुस्तक लिख रहे हैं जो निश्चित ही भविष्य में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज साबित होगा। हमारे आग्रह पर आपने साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्मोंके स्वर्णिम युग के कलाकार के माध्यम से उन कलाकारों की जानकारी हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना स्वीकार किया है जिनमें कई कलाकारों से हमारी एवं नई पीढ़ी अनभिज्ञ हैं । उनमें कई कलाकार तो आज भी सिनेमा के रुपहले परदे पर हमारा मनोरंजन कर रहे हैं । आज प्रस्तुत है आलेख हिंदी फ़िल्मों के स्वर्णयुग के कलाकार : शख़्सियत: गुरुदत्त…6।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्म के स्वर्णिम युग के कलाकार # 21 ☆
☆ शख़्सियत: गुरुदत्त…6 ☆
गुरुदत्त (वास्तविक नाम: वसन्त कुमार शिवशंकर पादुकोणे,
जन्म: 9 जुलाई, 1925 बैंगलौर
निधन: 10 अक्टूबर, 1964 बम्बई
फ़िल्म कागज़ के फूल के बाद गुरु दत्त ने यह फ़ैसला लिया था कि अब वह कभी भी कोई भी फिल्म का निर्देशन नहीं करेंगे और यही वजह थी कि साहिब बीबी और ग़ुलाम का निर्देशन उनके लेखक दोस्त अबरार अलवी ने किया था।
गुरु दत्त ने पहले इस फ़िल्म को निर्देशित करने के लिए सत्येन बोस और फिर नितिन बोस से बात की। लेकिन जवाब न मिलने पर यह फ़िल्म अबरार अलवी को निर्देशित करने के लिए दे दी गई। गुरु दत्त चाहते थे कि भूतनाथ का किरदार शशि कपूर निभायें लेकिन समय न होने के कारण शशि कपूर ने मना कर दिया और गुरु दत्त को ही यह किरदार निभाना पड़ा। वहीदा रहमान छोटी बहू का रोल चाहती थीं लेकिन गुरु दत्त ने उनकी कम उम्र को देखते हुये मना कर दिया। फिर वहीदा ने अबरार अलवी से कह कर अपने लिए इस फ़िल्म में रोल लिखवाया और फ़िल्म का हिस्सा बनीं।
फ़िल्म वर्तमान से शुरु होती है। कई वर्ष बीत चुके होते हैं और अब अधेड़ उम्र का अतुल्य चक्रवर्ती उर्फ़ भूतनाथ (गुरु दत्त), जो कि एक वास्तुकार है, अपने कर्मचारियों के साथ एक हवेली के खण्डरों को गिराकर एक नयी इमारत का निर्माण करने जा रहा है। उन खण्डरों को देखकर उसे पुराने दिनों की याद आ जाती है।
फ़िल्म फ़्लेश बैक में चली जाती है और भूतनाथ गांव से कोलकाता शहर नौकरी की तलाश में अपने मुँह बोले बहनोई के यहाँ आता है जो इसी हवेली के मुलाज़िमों की रिहाइशगाह में रहता है। यह हवेली शहर के बड़े ज़मीनदारों में से एक, चौधरी ख़ानदान की है जो तीन भाई थे-बड़े बाबू, मंझले बाबू (सप्रू) और छोटे बाबू (रहमान)। फ़िल्म में पहले से ही बड़े बाबू का इन्तक़ाल हुआ दिखाया गया है। भूतनाथ को मोहिनी सिंदूर बनाने वाले कारख़ाने में नौकरी मिल जाती है जिसके मालिक़ सुबिनय बाबू (नज़ीर हुसैन) हैं, जो कि एक ब्रह्म समाजी हैं और उनकी एक बेटी है जबा (वहीदा रहमान)। रात को जब भूतनाथ हवेली में चल रहे क्रियाकलापों को देखता है तो अचंभे में पड़ जाता है। हर रात छोटे बाबू बग्घी में बैठकर तवायफ़ के कोठे की ओर निकल पड़ते हैं। वह छिपकर हवेली में ही चल रही मंझले बाबू की महफ़िल का भी आनन्द लेता है।
भूतनाथ कारख़ाने के शीघ्र छपने वाले विज्ञापन को ठीक कराने के लिए सुबिनय बाबू के पास जाता है लेकिन जबा वहाँ होती है जो भूतनाथ को विज्ञापन पढ़ने को कहती है। उस विज्ञापन में ऐसी चमत्कारी बातें लिखी होती हैं कि यदि पत्नी या प्रेमिका उस सिंदूर को धारण कर अपने पति या प्रेमी के सामने पड़ती है तो पति अथवा प्रेमी उस पर मोहित हो जायेगा। उस रात छोटे बाबू का नौकर बंसी (धुमाल) भूतनाथ के पास आता है और कहता है कि छोटी बहू (मीना कुमारी) उसे बुला रही है। दोनों छिपकर छोटी बहू के कमरे में जाते हैं और छोटी बहू भूतनाथ को सिंदूर की डिबिया थमाकर कहती है कि इसमें मोहिनी सिंदूर भर के लाये ताकि वह अपने बेवफ़ा पति को अपने वश में कर सके। भूतनाथ छोटी बहू की ख़ूबसूरती और संताप से मंत्रमुग्ध हो जाता है और न चाहते हुये भी उसके राज़ों का भागीदार हो जाता है। भूतनाथ अगले दिन मोहिनी सिंदूर की सच्चाई सुबिनय बाबू से सुनना चाहता है लेकिन सुबिनय बाबू इस बात को टाल जाते हैं। फिर भी वह छोटी बहू के संताप से इतना व्याकुल हो जाता है कि वह उस सिंदूर को छोटी बहू के पास ले जाता है। इसी बीच भूतनाथ का मुँह बोला बहनोई एक स्वतंत्रता सेनानी निकलता है जो बीच बाज़ार अंग्रेज़ पुलिस पर बम का हमला कर देता है और उसके बाद चली गोली-बारी में भूतनाथ की टांग ज़ख़्मी हो जाती है। जबा भूतनाथ का उपचार करती है। चोट ठीक हो जाने के बाद भूतनाथ एक अच्छे वास्तुकार का सहयोगी बन जाता है और कुछ समय के लिए अपने काम में इतना तल्लीन हो जाता है कि वह न ही जबा और न ही छोटी बहू की ख़बर लेता है।
भूतनाथ द्वारा छोटी बहू को दिए गए सिंदूर का असर तो नहीं होता है अलबत्ता छोटे बाबू छोटी बहू से कहते हैं कि यदि वह नाचने वालों की तरह उनके साथ शराब पीकर सारी रात रंगरलियाँ मनाये तो वह घर में रुकने को तैयार हैं। छोटी बहू यह चुनौती भी स्वीकार कर लेती है और अपने पति को घर में रखने के लिए शराब पीना और तवायफ़ों के जैसा बर्ताव भी शुरु कर देती है। तरक़ीब कुछ दिनों के लिए तो कामयाब हो जाती है और छोटे बाबू छोटी बहू के ही साथ वक़्त बिताने भी लगते हैं। लेकिन ऐयाशी के शिकार छोटे बाबू एक दिन अपनी प्रिय तवायफ़ के कोठे में पहुँचते हैं तो पाते हैं कि उनका दुश्मन छेनी दत्त उसके रास में डूबा है। छेनी दत्त और उसके साथी छोटे बाबू को लहु-लुहान कर देते हैं और वह अपंग हो जाते हैं। जब कुछ समय बाद भूतनाथ वापस आता है तो पाता है कि छोटी बहू को तो शराब की लत लग गयी है और छोटे बाबू अपंग पड़े हैं। वह जब जबा के पास जाता है तो पता चलता है कि अभी-अभी सुबिनय बाबू का देहान्त हो गया है और जबा म्लेछ न होकर एक सम्भ्रांत परिवार की लड़की है और सुबिनय बाबू जबा को गांव से चुराकर लाये थे लेकिन एक साल की उम्र में ही उसका उसी गांव के अतुल्य चक्रवर्ती (जो कि भूतनाथ स्वयं है) से विवाह कर दिया गया था।
((श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। अभी हाल ही में नोशन प्रेस द्वारा आपकी पुस्तक नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) प्रकाशित हुई है। इसके पूर्व आपकी चारों पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। आजकल वे हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम युग की फिल्मों एवं कलाकारों पर शोधपूर्ण पुस्तक लिख रहे हैं जो निश्चित ही भविष्य में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज साबित होगा। हमारे आग्रह पर उन्होंने साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्मोंके स्वर्णिम युग के कलाकार के माध्यम से उन कलाकारों की जानकारी हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना स्वीकार किया है जिनमें कई कलाकारों से हमारी एवं नई पीढ़ी अनभिज्ञ हैं । उनमें कई कलाकार तो आज भी सिनेमा के रुपहले परदे पर हमारा मनोरंजन कर रहे हैं । आज प्रस्तुत है आलेख हिंदी फ़िल्मों के स्वर्णयुग के कलाकार : शख़्सियत: गुरुदत्त…5।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्म के स्वर्णिम युग के कलाकार # 20 ☆
☆ शख़्सियत: गुरुदत्त…5 ☆
गुरुदत्त (वास्तविक नाम: वसन्त कुमार शिवशंकर पादुकोणे,
जन्म: 9 जुलाई, 1925 बैंगलौर
निधन: 10 अक्टूबर, 1964 बम्बई
लखनऊ शहर में इस्लामिक संस्कृति पनपी है। इस शहर में रहने वाले दो सबसे अच्छे दोस्तों को जमीला नाम की महिला से प्यार हो जाता है, असलम (गुरुदत्त) और नवाब (रहमान) इस प्रेम त्रिकोण में जमीला (वहीदा रहमान) के साथ दो दोस्त जुड़ जाते हैं। गुरुदत्त फिल्म का एक अभिन्न हिस्सा जॉनी वॉकर हास्य भूमिका में हैं जबकि फरीदा मिर्जा मसरदिक की भूमिका में है।
गुरुदत्त के पहले की फ़िल्मों के संगीतकार, एसडी बर्मन ने उन्हें कागज़ के फूल (1959) नहीं बनाने की चेतावनी दी थी, जिसकी कहानी उनके खुद के जीवन से मिलती जुलती थी। जब गुरुदत्त ने फिल्म बनाने पर जोर दिया, तो एसडी बर्मन ने कहा कि गुरुदत्त के साथ उनकी आखिरी फिल्म होगी। इसलिए, संगीतकार रवि को इस फिल्म के संगीत की पेशकश की गई थी और समीक्षकों द्वारा प्रशंसित किया गया था, और उनके सभी पसंदीदा पसंदीदा शकील बदायुनी ने गीत लिखे थे। यह गुरुदत्त की एक रचनात्मक पसंद थी, जिसका शीर्षक रंग में था जबकि बाकी फिल्म काले और सफेद रंग में थी।
सर्वश्रेष्ठ पुरुष पार्श्वगायक का फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड – मोहम्मद रफ़ी (1961) – “चौदहवीं का चाँद” (1960) के लिए
सर्वश्रेष्ठ गीतकार के लिए फिल्मफेयर अवार्ड – शकील बदायुनी (1961) – “चौदहवीं का चाँद” (1960) के लिए
सर्वश्रेष्ठ कला निर्देशन के लिए फिल्मफेयर अवार्ड – बीरेन नाग
साहिब बीबी और ग़ुलाम गुरु दत्त द्वारा निर्मित और अबरार अलवी द्वारा निर्देशित १९६२ की भारतीय हिन्दी फ़िल्म है। यह बिमल मित्रा द्वारा लिखी गई एक बंगाली उपन्यास, शाहेब बीबी गोलाम पर आधारित है और ब्रिटिश राज के दौरान १९वीं शताब्दी के अंत तथा २०वीं शताब्दी की शुरुआत में बंगाल में ज़मींदारी और सामंतवाद के दुखद पतन की झलक है। फ़िल्म एक कुलीन (साहिब) की एक सुंदर, अकेली पत्नी (बीबी) और एक कम आय अंशकालिक दास (ग़ुलाम) के बीच एक आदर्शवादी दोस्ती को दर्शाने की कोशिश करती है। फ़िल्म का संगीत हेमंत कुमार और गीत शकील बदायूँनी ने दिए हैं। फ़िल्म के मुख्य कलाकार गुरु दत्त, मीना कुमारी, रहमान, वहीदा रहमान और नज़ीर हुसैन थे।
इस फ़िल्म को कुल चार फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों से नवाज़ा गया था जिनमें से एक फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म पुरस्कार भी था।