हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – दिल और दिमाग के बीच ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघुकथा ☆ दिल और दिमाग के बीच ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

रीमा को विदेश की प्रतिष्ठित कंपनी से नौकरी का प्रस्ताव मिला। यह उसके वर्षों के परिश्रम का सपना था। लेकिन उसी समय उसके पिता की तबीयत बिगड़ गई। माँ की आँखों में चिंता थी और पिता के चेहरे पर मुस्कान, जो मानो कह रही थी-“तुम जाओ, हम संभाल लेंगे।”

रीमा का मन भावनाओं और वास्तविकता के बीच झूलता रहा। एक ओर अपने सपनों का भविष्य था, दूसरी ओर अपनों का वर्तमान।

उसने कुछ दिन रुकने का निर्णय लिया। पिता का इलाज करवाया और परिवार को संभाला। कुछ महीनों बाद उसने फिर आवेदन किया। इस बार उसे पहले से बेहतर अवसर मिला।

नियुक्ति-पत्र हाथ में लेकर जब वह पिता के कमरे में पहुँची, तो उन्होंने बस उसका हाथ थाम लिया। दोनों की आँखों में न कोई शिकायत थी, न कोई सफाई-सिर्फ़ एक गहरा सुकून था, जिसे शब्दों की ज़रूरत नहीं थी।

खिड़की से आती हल्की धूप कमरे में फैल रही थी। रीमा ने चुपचाप वह पत्र मेज़ पर रखा और पिता के कंधे पर सिर टिका दिया।

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – लघुकथा – ☆ मेरा  परिवार… ☆ सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ☆

सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा

(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 2 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह,मराठी में अनुवादित लघुकथा संग्रह, मराठी में अनुवादित  कहानी संग्रह, कुल 12 पुस्तकें प्रकाशित।  पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कालेलकर पुरस्कार 2013 । लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 45 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभारती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा मेरा  परिवार

? लघुकथा – मेरा  परिवार ? सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ?

अध्यापिका ने बच्चों से कहा- “ चलो बच्चों आज आप सभी अपने परिवार की जानकारी देंगे. आप सभी बताएंगे आपके परिवार में कितने सदस्य हैं और कौन-कौन हैं…  “ पहले बच्चे ने बड़े उत्साह से कहा – “मेरे परिवार में चार सदस्य हैं.  पापा, मम्मी, मैं और मेरी बहन.” दूसरे ने कहा – “मेरी फैमिली में तीन स    दस्य हैं. मैं और मेरे पापा मम्मी .”  यह गिनती 15 तक इसी तरह चलती गई. उसके पश्चात रोहन का नंबर आया वह बोला- “अध्यापक जी, मेरे परिवार में कुल 11 सदस्य  हैं. “क्लास के सभी बच्चे हंसने लगे. अध्यापक ने  भी हैरानी से पूछा- “11 सदस्य हैं… कौन-कौन  हैं…? रोहन बड़े उत्साह से बोल उठा-“ मेरे दादा दादी,  पापा मम्मी,  मैं और मेरी छोटी बहन, बड़े पापा, बड़ी मम्मी , उनका बेटा और बेटी.  दादी कहती है हम सबके साथ भगवान भी रहते हैं वह दिखाई नहीं पड़ते लेकिन वह हमारे घर में सबसे बड़े सदस्य के रूप में हमें मार्गदर्शन करते रहते हैं . इस तरह हमारे घर में कुल 11 लोग हैं…”  सभी बच्चे हैरानी से उसे देखकर हंसने लगे . एक बच्चा बोला- “लेकिन यह भगवान और दादा-दादी इनको तो मैंने कभी देखा ही नहीं.   दूसरा बोला- “हां मैंने भी उनका नाम तो सुना है लेकिन देखा नहीं…” कक्षा के कुछ और बच्चों की भी यही  प्रतिक्रिया थी. अध्यापिका के चेहरे पर गहरे तनाव की रेखाएं स्पष्ट नजर आने लगी थी. उसने भी तो लगभग इसी उम्र के अपने बेटे को अभी तक दादा दादी से नहीं मिलाया था न उनके बारे में कुछ बताया था.

© नरेन्द्र कौर छाबड़ा

संपर्क –  सी-१२०३, वाटर्स एज, विशालनगर, पिंपले निलख, पुणे- ४११०२७ (महाराष्ट्र) मो.  9325261079 

Email-  narender.chhabda@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – लघुकथा ☆ तीन फिटनेस सर्टिफिकेट और एक अंतिम सत्य ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🌷लघुकथा ☘️ तीन फिटनेस सर्टिफिकेट और एक अंतिम सत्य 🌺

आज सुबह सैर के लिए निकला तो देखा कि एक अख़बार का हॉकर रामचरितमानस की चौपाइयाँ गुनगुनाते हुए बड़ी तन्मयता से अख़बार बाँट रहा था। भोर की ताज़ी हवा में तुलसीदास की वाणी का वह मधुर स्वर कुछ ऐसा घुला कि कदम अनायास ही ठिठक गए। 

मैंने मुस्कराकर कहा, “भाई, यह तो बहुत सुंदर बात है। सुबह-सुबह प्रभु का स्मरण भी हो रहा है और पूरी लगन से अपना काम भी।”

बातों-बातों में उसने बताया कि वह कभी फ्रीस्टाइल रेसलिंग करता था। स्वस्थ रहने के लिए आज भी रोज़ सुबह अख़बार बाँटता है और दिन में अपना दूसरा काम करता है। फिर उसने मेरी ओर देखा। मेरे सफ़ेद होते बालों और उम्र का सम्मान करते हुए बोला, “सर, आप इस उम्र में भी बिल्कुल फिट हैं!”

मन ही मन मैंने उस युवक को आशीर्वाद दिया।

थोड़ा आगे बढ़ा तो पार्क के बाहर एक फिटनेस ट्रेनर मिल गया। मुझे दूर से आते देखकर बोला, “आपको देखकर ही अच्छा लग जाता है। आपने अपने आपको बहुत अच्छी तरह मेंटेन रखा है।”

अभी इस प्रशस्ति का सुख पूरी तरह आत्मसात भी नहीं कर पाया था कि पार्क के भीतर एक योग प्रशिक्षक ने भी लगभग वही बात दोहरा दी—“आप हमेशा प्रसन्न रहते हैं, और इस उम्र में भी एकदम फिट हैं।”

बस, फिर क्या था! पंद्रह मिनट के भीतर तीन-तीन फिटनेस सर्टिफिकेट मिल चुके थे। मन मयूर-सा नाच उठा। प्रसन्नचित्त, हल्के कदमों और कुछ अधिक ही सीधी कमर के साथ घर लौटा।

घर पहुँचते ही यथार्थ ने बड़ी आत्मीयता से मेरा स्वागत किया।

स्वर गूँजा—“पार्क में ठीक से वॉक क्यों नहीं करते? बार-बार झूले पर जाकर बैठ जाते हो। नियमित योग भी नहीं करते। तोंद निकलने लगी है, कंधे भी झुकने लगे हैं। थोड़ा फिटनेस पर ध्यान दो। ट्रैकिंग पर भी चलना है!”

मैंने बिना किसी प्रतिवाद के सब कुछ शांत भाव से सुना।

आख़िर बाहर की दुनिया हमें उत्साह देती है, और घर की दुनिया हमें वास्तविकता से जोड़े रखती है।

ऐसे अवसरों पर मैं स्थितप्रज्ञ हो जाना ही श्रेयस्कर समझता हूँ।☺️

© श्री जगत सिंह बिष्ट

साधक

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिंदी साहित्य – लघुकथा ☆ सुबह की मुस्कान😊 ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🌱 सुबह की मुस्कान😊

आज सुबह हमारे अपार्टमेंट की लिफ़्ट के कपाट जैसे ही ग्राउंड फ्लोर पर खुले, एक मधुर स्वर कानों में घुला — “गुड मॉर्निंग!”

मैंने मुड़कर देखा। एक प्रफुल्लित दंपत्ति मुस्कुराते हुए लिफ़्ट से बाहर निकल रहे थे। मैंने भी मुस्कान के साथ उनके अभिवादन का उत्तर दिया।

न जाने क्यों, लिफ़्ट से बाहर आते ही दोनों विपरीत दिशाओं में चल पड़े—पति बाईं ओर, पत्नी दाहिनी ओर।

पति ने हँसते हुए पुकारा, “अरे, उधर नहीं… इधर!”

पत्नी ने भी मुस्कुराकर अपनी दिशा बदल ली।

मैंने हल्के से चुटकी ली, “लगता है, आजकल रास्ते भी थोड़े-थोड़े भटकने लगे हैं!”

क्षण भर में तीनों की निश्छल हँसी एक साथ फूट पड़ी। लगा, सुबह की हवा में किसी ने थोड़ी-सी खुशबू, थोड़ी-सी आत्मीयता और थोड़ी-सी हँसी घोल दी हो।🥰

© श्री जगत सिंह बिष्ट

साधक

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२२ – सुविधा शुल्क… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – सुविधा शुल्क।)

☆ लघुकथा # १२२ – सुविधा शुल्क श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

सुबह से सीमा घर के कामों में लगी थी। किसी को चाय चाहिए, किसी के लिए नाश्ता, बच्चों का टिफिन, सास की दवा—हर आवाज़ पर वह दौड़ रही थी।

“सीमा! मेरी कमीज़ प्रेस हुई कि नहीं?”

“मम्मी, मेरी बोतल भर दो।”

“बहू, ज़रा चश्मा तो ढूँढ़ दो।”

एक साथ उठती आवाज़ों के बीच वह रसोई से बाहर निकली ही थी कि उसका पैर फिसल गया। वह ज़ोर से गिरी और दर्द से चीख उठी।

पति दौड़े, पर पहला वाक्य था, “इतनी भी क्या जल्दी थी? अब सारा काम रुक जाएगा!”

सास बड़बड़ाईं, “ज़रा-सा भी ध्यान नहीं रहता।”

बच्चे बोले, “अब हमारा टिफिन कौन बनाएगा?”

तभी कामवाली बाई आई। उसने सबकी बातें सुनीं, बिना कुछ कहे सीमा को सहारा दिया, ऑटो बुलाया और अस्पताल ले गई।

पीछे घर में बहस छिड़ गई—”खाना कौन बनाएगा?” “बर्तन कौन धोएगा?” “बच्चों को कौन देखेगा?”

अस्पताल से लौटते समय सीमा खामोश थी। बाई मुस्कुराकर बोली, “बीबीजी, आज समझ आया… इस घर में आपकी नहीं, आपके काम की कीमत है।”

सीमा ने खिड़की से बाहर देखा। उसे पहली बार महसूस हुआ कि इस घर में वह सदस्य कम, सुविधा अधिक है।

घर पहुँची तो सबने एक साथ पूछा, “अब कैसी हो?”

सीमा हल्की-सी मुस्कुराई और बोली— “सुविधा चाहिए… तो अब उसका शुल्क भी लगेगा।”

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७१ – सिलाई मशीन ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “सिलाई मशीन”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७१ ☆

🌻लघु कथा🌻 सिलाई मशीन 🌻

पैरदान सिलाई मशीन पर बैठी सिलाई करते – करते अचानक अंजू रुक गई। तारिख— ओहहहहहहहहहहह आज तो उसका जन्मदिवस है। पूरे साठ बरस की हो गई। कितने सैकड़ों डिजाईनर कपड़े बनाकर देती रही। परन्तु आज भी उसने भाभी- बहु के उतरे साड़ी ब्लाउज पहन रखे हैं। क्योंकि उसने अपने वैवाहिक जीवन को चरक प्रेस करके मजबूत तो बनाया परन्तु समय के अनुसार चलन पर लटकन- झटकन, डोरी फुदरा सलमा सितारें नही टाँक सकी।

नतीजा आज वह मायके में भैया – भाभी के साथ पूरी जिंदगी बीता रही है। अचानक सुई ऊँगली पर चूभ गई, परन्तु आज यह चूभन  उसे रुला नही रही थी बल्कि पुरानी बातों को याद दिला रही थी।

सिलाई मशीन बनना और सिलाई करने का मतलब वह आज समझ चुकी थीं पर समय बीत चुका था।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “बचपन” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “बचपन” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

मेरे छोटे भाई के बेटे का जन्मदिन था । इसलिए ऑफिस से जल्दी छुट्टी लेकर आया । घर के अंदर खूब रौनक और, खुशी के माहौल । बाहर क्या देखता हूं हमारी कामवाली का छोटा सा बेटा बर्तन मांज रहा है और रोते रोते मां से कह रहा है – मुझे भी केक दिलवाओ। मुझे भी जन्मदिन मनाने है ।

मां बेबस । झांक रही अपने अंदर । मैं सोच रहा हूं कि जन्मदिन किसका मनाऊं ?

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ६० – लघुकथा – अंधकार ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ६० ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ अंधकार ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

बच्चे ने सूरज की किरणों को मुट्ठी में बाँध लिया। सूरज का असमंजस यह था कि उसे धरती पर नया सवेरा लाना था, जो कि उसकी किरणों के बिना संभव नहीं था। धरती लोक के लोगों की चाहत यह थी कि उन्हें हर एक ईश्वर प्रदत्त चीज को अपने बस में करना था, सो उन्होंने बच्चे को इस काम के लिए भेजा। इधर बच्चे की माँ दहाड़े मार कर इसलिए रो रही थी, क्योंकि घने अंधकार मे उसे अपना बच्चा ढूंढे नहीं मिल रहा था।

 ♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२१ – कौन अपना? ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – कौन अपना?।)

☆ लघुकथा # १२१ – कौन अपना? श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

श्मशान की लपटें शांत हो चुकी थीं। माँ की सूनी आँखें अब भी बेटी की चिता की राख को निहार रही थीं। जिस बेटी को उसने नौ महीने कोख में रखा, उँगली पकड़कर चलना सिखाया, उसी को आज अपने हाथों विदा करना पड़ा।

सबसे अधिक पीड़ा बेटी की मृत्यु की नहीं, बल्कि उन रिश्तों की थी जो उसके साथ ही मर गए। जीते-जी जिसे घर की लक्ष्मी कहा गया, उसके अंतिम सफ़र में वही लोग साथ छोड़ गए।

पास खड़ी एक वृद्धा की भर्राई आवाज़ गूँजी—

“हे ईश्वर! यदि संतान ऐसी हो, जो अपने ही रिश्तों का धर्म भूल जाए, तो निःसंतान रहना ही कहीं अधिक अच्छा है।”

चिता की राख हवा में उड़ रही थी और उसके साथ समाज के खोखले रिश्तों का सच भी।

 

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४० ☆ कथा-कहानी – माया-मोह की फांस ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय कथा – ‘माया-मोह की फांस‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३४० ☆

☆ लघुकथा ☆ माया-मोह की फांस ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

नायक जी के दुआरे पर बड़ा समूह इकट्ठा है। पुरुष और स्त्रियां दोनों हैं। दरअसल नायक जी नर्मदा यात्रा पर निकल रहे हैं। करीब पंद्रह दिन नर्मदा के किनारे किनारे चलेंगे। फिर अगली बार यात्रा वहीं से उठाएंगे जहां से उसे छोड़ा था। ऐसे ही किश्तों में यात्रा होती है।

नायक जी के साथ आठ दस लोग जा रहे हैं। उनकी पत्नियां उन्हें विदा करने आयी हैं। समूह में दो बोझा ढोने वाले हैं जो बहंगी में सामान लेकर चलेंगे। बोझा मतलब राशन-पानी, खाना खाने और बनाने के बर्तन। कुछ तैयार नाश्ते का सामान भी।

भीड़ में गोपाल भी है। सामान की उठा-धराई में मदद कर रहा है।

दल का एक सदस्य गोपाल से पूछता है, ‘तुम भी चल रहे हो?’

जवाब मिलता है, ‘नहीं, अभी नहीं। अभी नर्मदा मैया की कृपा नहीं है।’

सदस्य कहता है, ‘क्यों! चलो। ऐसा मौका फिर कहां मिलेगा? पुन्य कमाने का मौका बार-बार नहीं मिलता।’

गोपाल जवाब देता है, ‘क्या करें! बड़ी मजबूरी है। पिताजी की तबियत ठीक नहीं है। डेढ़ साल से उठने बैठने से लाचार हैं। हमीं को पूरी देखभाल करनी पड़ती है। चौबीस घंटे की ड्यूटी है। कहीं जाने की कहूं तो हाथ पकड़ कर रोने लगते हैं।

सदस्य कहता है, ‘घर में और लोग भी तो होंगे। लड़के बच्चे तो होंगे।’

गोपाल बोला, ‘सब हैं, लेकिन पिताजी हमें ही ढूंढ़ते हैं। और किसी को अपने को छूने नहीं देते।’

सदस्य बोला, ‘फालतू माया-मोह में फंसे हो। एक बार निकल पड़ो। लौट कर पाओगे कि तुम्हारे बिना भी सब ठीक-ठाक चलता है। हम तो अपना झोला उठाकर निकल पड़ते हैं। लौट कर आते हैं तो सब ठीक मिलता है। लेकिन हम सोचते हैं कि दुनिया हमारे बिना नहीं चल सकती।’

गोपाल हाथ जोड़कर बोला, ‘आप ठीक कहते हो, लेकिन हमारा मन नहीं मानता। उन्हें छोड़कर कैसे चले जाएं?’

जत्था ‘नर्मदे हर’ का घोष करके रवाना हो गया और गोपाल अपने घर की तरफ चल पड़ा जहां उसके पिता नींद से जाग कर उसके लिए गुहार लगा रहे थे।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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