(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “बाल मजदूर (कलूवा)”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६८ ☆
🌻लघुकथा🌻 🪔 बाल मजदूर (कलूवा) 🪔
मिट्टी के दिये बनाये जा रहे थे। लगभग पचास मजदूरों का समुह काम कर रहा था। अपनी माँ के साथ नन्हा कलूवा जो अभी सिर्फ दस वर्ष का हुआ था। आज अपनी माँ के साथ जिद्द से दिये बनाने आ गया था।
ठेकेदार देखते ही बोला— “इसे लेकर आई हो काम क्या करोगी?”
“नही साहेब सब कर लूंगी ये चुपचाप बैठा रहेगा।”
“चल तू भी दिये बना। यदि बना लिया तो नगद राशि भी दूंगा और सबके कपड़ों के साथ महिने भर का राशन भी दूंगा।”
कलूवा मिट्टी ले नन्हें नन्हें हाथों से दिये बनाने लगा। देखते- देखते दिये की ढेरी लगा दिया।
आसपास के सभी मजदूर कहने लगे – “भगवान ही हमें हिम्मत ताकत देता है। आज कलूवा की माँ को नई साड़ी मिल जायेगी। बरसों से तरस गई थी।”
“कलूवा जैसा दीपक होने के बाद हमारे घर तो उजाला ही होगा।”
ठेकेदार ने मिट्टी से सने नन्हें कलूवा को ह्रदय से लगा लिया।
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “राजनीति के कान”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
– मंत्री जी, बड़ा कहर ढाया है ,,,आपने।
– किस मामले में भाई?
– अपने इलाके के एक मास्टर की ट्रांस्फर करके।
– अरे , वह मास्टर? वह तो विरोधी पार्टी के लिए भागदौड़,,,
– क्या कहते हैं हुजूर?
– उस पर यही इल्जाम है।
– ज़रा चल कर कार तक पहुंचने का कष्ट करेंगे?
– क्यों?
– अपनी आंखों से उस मास्टर को देख लीजिए। जो चल कर आप तक तो पहुंच नहीं पाया। बदकिस्मती से उसकी दोनों टांगें बेकार हैं। और भागदौड़ करना उसके बस की बात कहां? जो अपने लिए भागदौड़ नहीं कर सकता, वह किसी के विरोध में क्या भागदौड़ करेगा?
– अच्छा भाई। तुम तो जानते हो कि राजनीति के कान बहुत कच्चे होते हैं और आंखें तो होती ही नहीं। खैर। आपने कहा है तो मैं इस गलती को दुरुस्त करवा दूंगा।
खिसियाए हुए मंत्री जी ने कहा जरूर लेकिन आंखों में कहीं पछतावा नहीं था।
☆ लघुकथा ☆ ~ संशय~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
☆
महेंद्र को उम्मीद थी कि, वे एक दिन उसके घर जरूर आयेंगें । वह पलक पावड़े बिछाए उनका बराबर इंतजार करता रहता था । अपने मन में वह तमाम ख्वाहिशों को बुनता और सोचता कि अगर वे उनके घर आये तो वह अपनी टूटी चारपाई पर एक फटा ही सही लेकिन सुन्दर साफ बढ़िया सा चादर बिछायेगा। छोटी सी कटोरी में गइया के थोड़े से दूध में जमी मीठी दही खिलायेगा।
कई बार उसे ऐसा लगता था कि वे आज उसके घर की तरफ आ रहे हैं, बस चंद पलों में आ ही जायेगे, ये सब सोच कर उसका मन बाँसो उछलने लगता था ।
वह स्वयं तो रोज उनके घर जाता, उनको नमस्ते कर हालचाल भी पूछता, उनके हर दुख सुख में अपने सामर्थ्य के हिसाब से खड़ा रहताl
पिछले दिनों जब उनके घर में उनका लड़का करोना से बीमार था, तब उनके अपने लोग दूर से झाँक कर चले गए थे, लेकिन महेन्द्र इन बातों से बेफिक्र न सिर्फ उनके घर गया था, बल्कि उनका हाल चाल पूछते हुए बोला था कि बाबूजी, भईया ठीक हो जायेगे, मैंने भईया के लिए हनुमान जी से मन्नत मांगी है ।
भला हो कोरोना का, शायद वह भी उसके प्रेम और समर्पण को समझ गया था, यही कारण था कि चौदह दिन बीतने के बाद उसका नन्हका भी पहले की तरह स्वस्थ होकर किलकारी भर रहा था।
लेकिन महेन्द्र को एक बात समझ में आ रही थी कि वे उसके घर तो नही आते है लेकिन उनके मन में मेरे बाबू के प्रति ममता और प्यार तो जरूर है।
आखिर वे मेरे घर क्यों नही आते है, इस बात का उसे उत्तर नहीं मिल रहा था ।
एक जब उसने थोड़ा दिमाग लगाया, तो उसे हल्का हल्का समझ में आया कि इसमे तो पद और कद का मामला है, जिसके बढ़ने और घटने का संकट या संशय है । बस..बस.. बस यही बात है कि वह नही आते है ।
चलो उनके इस संशय – संकोच पर भी आंच न आये । वे भले ही न आएं, लेकिन उनकी यशकीर्ति और ऊंचाइया छुए, अंततः वह ऐसा सोच कर खुश हो गया थाl
(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – लघु कथा – पहचाना जब मुझे वृक्ष ने।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ # ३२५ – साहित्य निकुंज ☆
☆ लघु कथा – पहचाना जब मुझे वृक्ष ने ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆
☆
कॉलेज के दिनों की बात है। उन दिनों पर्यावरण संरक्षण पर हमें बड़े प्रेरक पाठ पढ़ाए जाते थे। अध्यापक बताते थे कि वृक्ष केवल प्रकृति की शोभा नहीं, बल्कि मानव जीवन के आधार हैं। उनकी बातें मेरे मन में इतनी गहराई से उतर गईं कि मैंने निश्चय कर लिया है जीवन में जहाँ भी अवसर मिलेगा, मैं वृक्ष अवश्य लगाऊँगा।
उस दिन के बाद वृक्षारोपण मेरे लिए केवल एक सामाजिक कार्य नहीं रहा, बल्कि एक भावनात्मक दायित्व बन गया। किसी के जन्मदिन पर, किसी के विवाह के अवसर पर या किसी शुभ कार्य के आरंभ में मैं एक पौधा अवश्य लगाता। मुझे विश्वास था कि यदि प्रत्येक व्यक्ति एक-एक वृक्ष भी लगाए, तो धरती की हरियाली कभी समाप्त नहीं होगी।
समय अपनी गति से आगे बढ़ता रहा। देखते ही देखते कई वर्ष बीत गए। एक दिन मुझे उस गाँव जाने का अवसर मिला जहाँ वर्षों पहले मैंने आम का एक पौधा लगाया था। गाँव पहुँचते ही लोगों ने बड़े प्रेम से मेरा स्वागत किया और खाने के लिए ताज़े आम लाकर रख दिए। आमों का स्वाद अद्भुत था। बातचीत के दौरान किसी ने मुस्कराकर कहा, “ये उसी वृक्ष के फल हैं जिसे आपने वर्षों पहले लगाया था।”
यह सुनते ही मैं कुछ क्षणों के लिए मौन रह गया। मेरी आँखें अनायास उस वृक्ष को खोजने लगीं। सामने एक विशाल आम का वृक्ष खड़ा था, जिसकी शाखाएँ फलों से लदी हुई थीं। मुझे लगा जैसे वह वृक्ष मुझे पहचान रहा हो। बरसों पहले मेरे हाथों से मिट्टी में रोपा गया छोटा-सा पौधा आज एक विशाल वृक्ष बनकर न केवल फल दे रहा था, बल्कि अनेक लोगों को छाया और सुख भी बाँट रहा था। उस क्षण मेरे हृदय में जो संतोष और प्रसन्नता थी, उसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन है।
लेकिन उसी यात्रा में एक ऐसा दृश्य भी देखने को मिला जिसने मन को उदासी से भर दिया। सड़क के किनारे मैंने बरगद, पीपल और आँवले के कई पौधे लगाए थे। मैं उत्सुक था कि वे अब बड़े वृक्ष बन चुके होंगे और राहगीरों को छाया दे रहे होंगे। परंतु जब वहाँ पहुँचा, तो देखा कि सड़क चौड़ी करने के लिए उन सभी वृक्षों को काट दिया गया था। जहाँ कभी हरियाली लहराती थी, वहाँ अब केवल धूल, पत्थर और कंक्रीट दिखाई दे रहे थे।
उन कटे हुए ठूँठों को देखकर ऐसा लगा मानो किसी ने मेरे अपने परिवार के सदस्य छीन लिए हों। मन भारी हो गया। एक ओर उस आम के वृक्ष की सफलता का आनंद था, तो दूसरी ओर कटे हुए वृक्षों का दर्द। उसी क्षण मुझे अनुभव हुआ कि वृक्ष केवल पेड़ नहीं होते, वे हमारी स्मृतियों, भावनाओं और भविष्य से जुड़े होते हैं।
घर लौटकर मैंने अपने आँगन में लगे उन वृक्षों को देखा जिन्हें मैंने स्वयं रोपा था। वे हवा में झूम रहे थे। उनकी हरी पत्तियाँ मानो मुझे संदेश दे रही थीं-“जो हमें जीवन देता है, हम उसे कई गुना लौटाते हैं।”
मैंने उसी दिन फिर एक संकल्प लिया कि चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों, वृक्षारोपण का कार्य कभी नहीं छोड़ूँगा। कटे हुए वृक्षों का दुःख मनाने से अधिक आवश्यक है नए वृक्ष लगाना। क्योंकि वृक्ष केवल हमें ऑक्सीजन नहीं देते, वे आशा देते हैं, जीवन देते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुंदर संसार छोड़ जाते हैं।
आज भी जब उस आम के वृक्ष की याद आती है, तो ऐसा लगता है मानो वह मुझे आशीर्वाद दे रहा हो। तब मेरे मन से एक ही बात निकलती है-वृक्ष लगाना प्रकृति की सेवा ही नहीं, बल्कि आने वाले कल के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी है।
(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में अवश्य मिली है किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय ऐतिहासिक लघुकथा ‘सत्य का साहस। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # १६१ ☆
☆ ऐतिहासिक लघुकथा – सत्य का साहस ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆
दरबार खचाखच भरा हुआ था। पेशवा राज्य के प्रधान न्यायधीश राम शास्त्री, नारायणराव की हत्या के संदर्भ में अपना निर्णय सुनानेवाले थे।
सत्ता के लोभ में रघुनाथराव ने अपने भतीजे नारायण राव की हत्या करवा दी थी। जनता सच जानती थी लेकिन जल में रहकर मगर से बैर कैसे करे? पेशवा के खिलाफ आवाज उठाने का साहस भी किसी में नहीं था। नारायणराव की हत्या से मन ही मन व्यथित कुछ लोगों ने पेशवा राज्य के प्रधान न्यायधीश राम शास्त्री के पास जाकर न्याय की गुहार लगाई।
राम शास्त्री अपने निष्पक्ष न्याय के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने रघुनाथराव पर लगे आरोपों की गहरी जाँच-पड़ताल की और पेशवा के दरबार में अपना निर्णय सुनाया –‘मैं पेशवा राज्य का प्रधान न्यायधीश हूँ। तमाम तथ्यों के आधार पर प्रमाणित होता है कि रघुनाथराव और आनंदीबाई ने मिलकर योजनाबद्ध तरीके से नारायणराव की हत्या करवाई है। सत्य सबके सामने है। महाराष्ट्र की जनता ही आपको दंड देगी, अब मैं आपके राज्य में नहीं रह सकता।‘ यह कहकर वह निडर न्यायधीश वहाँ से चला गया।
पेशवा रघुनाथराव अपने सिंहासन पर बैठे राम शास्त्री को दृढतापूर्वक जाते हुए देखते रह गए।
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – “उपयोग… “।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६७ ☆
लघुकथा – उपयोग… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
जबसे बच्चे अलग रहने लगे हैं तबसे वह बदल गई है। किसी से कोई शिकायत नहीं करती। बेटे बहू नहीं चाहते कि उनकी माँ जीवन काम करती रहे इसलिए खाना बनाने के लिए बाई नियुक्त करदी है। पूरे समय सोना आसान नहीं है। बाकी के लोग अपने काम में लगे रहते हैं।उसे व्यर्थ की राजनीति की बातें अच्छी नहीं लगती। इसलिए यूट्यूब पर भगवान कृष्ण संबंधी कार्यक्रम सुनती रहती है। आपने एक बार कोई कार्यक्रम यूट्यूब पर देखा तो दूसरे दिन अपने आप एक दर्जन कार्यक्रम आज जाते हैं और उनमें से चयन करना पड़ता है। अब सर्च नहीं करना पड़ता।
एक दिन एक रेसिपी का वीडियो अपने आप आ गया। उसने देखा तो हर रोज नये नये रेसिपी वीडियो आने लगे। उसे वे अच्छे लगने लगे। न सास बहू का टेंशन न नंद भौजाई की नोंक झोंक, क्योंकि पारिवारिक वीडियो में यही सब कुछ रहता है। इसलिए आज उसने एक नई डिश बनाई भाप पर और फिर एक चम्मच तेल से छोंक दिया। चखने के लिए कहें या खाने के लिए, एक पति ही उपलब्ध है तो सारे एक्सपेरीमेंट उसी पर। पति को अच्छी लग गई तो पड़ोसियों को भी अच्छी लगेगी इसलिए बाँट आई। उसके बाद देखा गया कि उस नई डिश का जो कुछ बचा खुचा था उसे वह खा रही थी।डिस्कवरी और डिश बनाने का उपाय करती रहती है खाने को तो दो ही जाने हैं तीसरा तो कोई है कुछ बना करके और कोशिश करने लगी कोई अच्छा करें वह वही करें वह अपने लिए बचा कुछ खाने को बैठे हैं । मेरी समझ में नहीं आया लोग अच्छे-अच्छे व्यंजन बनाते हैं और खाते हैं लेकिन यह महिला है कैसी कि अपने लिए ना बनाकर औरों के लिए बनाती है। हालांकि अब उम्र का प्रभाव हो गया है और अब उतना कम नहीं कर पाती फिर भी दूसरों के लिए काम करने की भावना उसमें है । रेसिपी के नये वीडियो उसका समय अवश्य काटने में मदद कर रहे हैं। लगता है मोबाइल का अच्छा उपयोग सीख लिया है।
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – टूटता हुआ घर।)
संध्या धीरे-धीरे रात की बाँहों में समा रही थी। आँगन में रखे तुलसी चौरे का दीपक टिमटिमा रहा था। हल्की हवा में चमेली की भीनी सुगंध घुली थी, पर घर के भीतर वातावरण भारी और उदास था।
रसोई में खड़ी सविता दर्द से कराहते हुए भी चुपचाप खाना बना रही थी। सुबह से पैरों में सूजन थी, शरीर बुखार से तप रहा था, लेकिन पति और परिवार की चिंता में उसने अपनी तकलीफ़ को जैसे भीतर ही कैद कर लिया था।
चूल्हे की आँच से उसका चेहरा लाल हो गया था। माथे से पसीने की बूंदें लगातार टपक रही थीं।
उधर बैठक में बैठे उसके पति विकास बार-बार घड़ी देख रहे थे। स्वभाव से वह अत्यंत गुस्सैल और अहंकारी थे। उन्हें ज़रा-सी देरी भी बर्दाश्त नहीं होती थी।
सविता ने थरथराती आवाज़ में कहा—
“खाना तैयार है…”
बस इतना सुनना था कि विकास भड़क उठे।
“अब याद आया खाना? क्या कर रही थी इतनी देर से?”
उन्होंने क्रोध में भरी गरम दाल की थाली उठाकर ज़ोर से फर्श पर फेंक दी।
थाली पलट गई।
उबलती दाल पास खड़ी सात वर्ष की बेटी गुड़िया के हाथ और चेहरे पर गिर गई।
“माँऽऽ…!”
उसकी दर्दभरी चीख पूरे घर में गूँज उठी।
सविता का कलेजा काँप गया।
वह बदहवास होकर बेटी को सीने से चिपकाए अस्पताल की ओर भागी।
डॉक्टर मरहम लगाते हुए बोले—
“जलन तो ठीक हो जाएगी… लेकिन बच्ची बहुत डर गई है।”
गुड़िया लगातार काँप रही थी।
उसकी छोटी-सी उँगलियाँ माँ का आँचल कसकर पकड़े थीं।
सविता की आँखों से आँसू बहते रहे।
शायद दर्द बेटी के हाथ से ज्यादा उसके अपने हृदय में था।
रात गहरा चुकी थी। घर लौटकर वह चुपचाप बरामदे में बैठ गई।
पास ही बैठी दादी सब देख रही थीं। उनकी बूढ़ी आँखों में अनगिनत प्रश्न तैर रहे थे।
उन्होंने मन ही मन सोचा—
“कैसा दुर्भाग्य है… लोग मंदिरों में सिर झुकाते हैं, रामायण-महाभारत देखते हैं, पर अपने भीतर बैठे रावण को नहीं पहचानते।”
इतने में दरवाज़ा खुला।
विकास भीतर आए।
चेहरा बुझा हुआ था। हाथ में कुछ कागज़ थे और आँखों में टूटा हुआ अभिमान।
माँ ने धीरे से पूछा—
“क्या हुआ बेटा?”
विकास कुर्सी पर ढहते हुए बोले—
“आज मेरा प्रमोशन रुक गया…
बॉस ने साफ कह दिया—
‘जिस इंसान को अपने गुस्से पर नियंत्रण नहीं, वह दूसरों का नेतृत्व नहीं कर सकता।’”
कमरे में सन्नाटा फैल गया।
माँ उठीं, बेटे के सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं—
“बेटा…अहंकार इंसान से पहले उसका सुख छीनता है, फिर अपनों का विश्वास… और अंत में उसका सब कुछ।”
फिर उनकी भर्राई आवाज़ कमरे में गूँज उठी—
“अहंकार की आग में, जल जाते संबंध, रावण जैसा ज्ञान भी, नहीं बचा पाया वंश।”
विकास की नज़र धीरे-धीरे गुड़िया के जले हाथों पर गई…
फिर सविता के सूजे पैरों पर…
और अंत में अपने हाथ में पकड़े अस्वीकृत प्रमोशन पत्र पर टिक गई।
उन्हें पहली बार एहसास हुआ—
आज उनका प्रमोशन नहीं रुका था…
आज उनका घर टूटते-टूटते बचा था।
उनकी आँखों से आँसू बह निकले।
वह धीरे से सविता के पास गए और काँपती आवाज़ में बोले—
“सविता… मुझे माफ़ कर दो…
मैं अपने अहंकार में इतना अंधा हो गया था कि तुम्हारा दर्द भी नहीं देख पाया।”
सविता ने कुछ नहीं कहा।
बस उसकी आँखों से बहते आँसू वर्षों से दबे दर्द की कहानी कह रहे थे।
उधर तुलसी चौरे का दीपक अब भी जल रहा था—
धीमा, शांत…मानो टूटते रिश्तों को फिर से रोशनी देने की प्रार्थना कर रहा हो।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – बुत युग
सारे बदहवास थे। इस तरह की बीमारी इससे पहले न देखी, न सुनी। उस लेटे हुए आदमी के अंग एक-एक कर धीरे-धीरे पत्थर होते जा रहे थे।
अचानक एक औरत की चीख सन्नाटे को चीरने लगी। एक आदमी बालों से पकड़कर औरत को लात, मुक्कों से बेदम मार रहा था। वह चीख रही थी, मदद की गुहार लगा रही थी। भीड़ चुप थी। आदमी ने हैवान की मानिंद चाकू से कई वार औरत पर किए।
औरत अब लोथड़ा थी। आदमी जा चुका था। भीड़ मर चुकी थी।
उधर शोर उठा, ‘अरे आदमी बुत में बदल गया, आदमी बुत में बदल गया।’ लेटा हुआ आदमी ऊपर से नीचे तक पूरा पत्थर हो चुका था।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
१७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी। इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:।
इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “शोभा की सुंदरता ”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६७ ☆
🌻लघुकथा🌻 शोभा की सुंदरता 🌻
आज सुबह शोभा कार्यक्रम का वीडियो बना रही थी। सामने मोबाइल पर अपना चेहरा देख अंर्तमन से आवाज आई– अब तुम बूढ़ी हो चली। सफेद होते केश झुर्रियाँ लटकते गाल, शिकन पड़े ललाट और होठों पर बरसों की चुप्पी साधे। वह घटना जिसने उसके मुस्कान पर ताला लगाया।
जीना तो सीखा, धैर्य सहनशीलता की मूरत बन पति का असमय संग छोड़ जाना, पूरा कारोबार संभाला, बच्चों की परवरिश करते उसने हिम्मत और हौसला बुलंद रखा।
मोबाइल का स्क्रीन बंद करते हुए वह बोल पड़ी— अब मैं बूढ़ी हो चली। सामने बैठी सहेली उठी धीरे से मुस्कुराया और उसने शोभा के उलझे बंधे लटों को खोल होठों पर लाली लगाई और छोटी सी लाल बिंदी माथे पर लगा बोली– शोभा कभी बूढ़ी नहीं होती। चाहे सृष्टि हो, सरिता हो, सृजन हो, प्रकृति हो, पूजन हो, धर्म हो, कर्म हो, अपने हो, सपने हो, खुशियाँ हो और हरियाली हो, कल आज और कल शोभा न कभी बूढ़ी हुई है और न कभी होगी।
उसकी सुंदरता सदैव रहती है तुम वही शोभा हो। दोनों एक दूसरे के गले लग मुस्कुरा उठी।
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– श्रद्धा सुमन…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # १०९ — श्रद्धा सुमन —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
भारतीय आप्रवासी मजदूरों में से बहुतों ने मॉरिशस में साहसिक जीवन शैली की छाप छोड़ी थी। मैंने उन पर आधारित खूब लिखा है। मैं अपने शब्द लेखन को उनके प्रति श्रद्धा सुमन मानता हूँ। आज मैं आप्रवासी भारतीय मजदूर हल्कू को शब्दों का श्रद्धा सुमन समर्पित कर रहा हूँ। जवान अविवाहित हल्कू बिहार से आया था। वह बेल्ज़ामें नाम के आततायी फ्रांसीसी गोरे जमींदार का बंधुआ सा मजदूर था। उसने किसी तरह युक्ति से बेल्ज़ामें की हत्या की और दूसरे इलाके में भाग गया। उसने वहीं बस कर शादी कर ली। नब्बे बरस के बुढ़ापे में उसकी मृत्यु के दिन उसकी पत्नी ने कहा उसे मालूम था वह एक नीच को जान से मार कर यहाँ आया था। इतने बरस दर बरस दोनों समानता के स्तर पर बड़े ही प्रेमल पति पत्नी हुए। आज जाने वाला उसका पति उसके लिए देवता बन कर चला। इनकी संतान नहीं थी।