(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य “बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी…” ।)
☆ शेष कुशल # 54 ☆
☆ व्यंग्य – “बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी…”– शांतिलाल जैन ☆
थैंक गॉड, मैं बिहार में वोटर नहीं हूँ. होता तो इस समय इन पंक्तियों को लिखने की बजाए भगवान चित्रगुप्त की आराधना कर रहा होता. वे ही होते जो पहचान के संकट की इस घड़ी में हमारी मदद कर पाने की स्थिति में होते. माता-पिता अब इहलोक में हैं नहीं. उनका जन्म स्थान और जन्म तारीख इस समय कोई बता पाने की स्थिति में हैं तो वे सिर्फ चित्रगुप्त ही हैं. उनकी खाताबही में तो हर आत्मा का इनवर्ड आउटवर्ड दर्ज़ रहता है. पेरेंट्स के कागज़ मिल नहीं रहे हों तो चित्रगुप्त की शरण में जाने के अलावा और रास्ता ही क्या बचता है ? समस्या रहमान मियाँ को भी फेस करनी पड़ रही होती और मिस्टर थॉमस को भी. उनको और भी ज्यादा, उनके रिलिजन में आत्मा की आवाजाही का रिकार्ड रखने का कोई सिस्टम ही नहीं है. वैसे भी सारी कवायद उनके चक्कर में ही हो रही है. उनसे तो बस थोड़ी सी दर्दमंदी रखी जा सकती है. नए निज़ाम में उसके अपने खतरे हैं. बहरहाल, अपन के लिए बड़ा सवाल ये है कि चित्रगुप्त को प्रसन्न कर पाने में असफल रहने पर अपन क्या करते?
गिव-अप कर देते. भाड़ में जाए वोट देने का अधिकार. न हो वोटर लिस्ट में नाम, न सही. वोट देने से क्या ही बदल जाएगा! पहले भी कितनी बार अंगुली काली कराई है, कभी लोकसभा, कभी विधानसभा, कभी मुन्सीपाल्टी, कभी पंचायत. तर्ज़नी परमानेंट काली होने को है मगर बदला क्या? वही करप्शन, वही महंगाई, वही बेरोज़गारी, वैसी ही बदहाल सड़कें, गिरते पुल, पटरी से उतरती रेलें, वीरान से सरकारी स्कूल, उजड़े-उजड़े से खैराती अस्पताल, जनप्रतिनिधियों की बेशर्मी, झूठ, दोगलापन, पल्टियाँ, वादाखिलाफी, बिलो-बेल्ट हरकतें – अभी तक कुछ नहीं बदला तो अब क्या बदल जाएगा. बदला है तो सिरिफ अमीरों के लिए. अमीर अधिक अमीर हुए, गरीब और अधिक गरीब. अपन की गरीबी का क्या! वोट दिया तो भी बढ़नी है नहीं दिया तो भी. जितनी बार तर्जनी काली कराओ देश में कालाधन उतने गुना बढ़ जाता है, दोनों में एक खास किसम का को-रिलेशन है. एक दिन सब वोट उनका होगा, धन तो उनका है ही. अपन की तो नाम कट न जाए के चक्कर में एक दिन की दिहाड़ी कट जाने को है. रखे सरकार वोट देने का अधिकार अपने पास, जिसको देना हो दे. अपन तो निकलते हैं यहाँ से.
भ्रम और घबराहट सरजू बाबू में भी हैं मगर वे मेरी तरह पलायन में भरोसा नहीं रखते. बोले – ‘एतना अर्ली नरभस नहीं न होईएगा सांतिबाबू. तनी कोशिश करके खोजिएगा त कहीं से न कहीं से एक सेट माई-बाप का जुगाड़ हो जाएगा. अभेलेबल हुईए त उन्हीं को पेरेंट नहीं न बना लीजिएगा. दुनियादारी में सफल लोग गदहा को बाप बना लेते हैं, आपको तो…..’
‘वही तो नहीं हो पाएगा सरजू बाबू. बाप बदलने की कला आती तो अपन भी कहीं के मंत्री सांसद विधायक होते. जिन्दगी दिहाड़ी मजूरी करते पाँच किलो राशन के भरोसे कटती नहीं.’
‘डेमोकिरसी के रक्शा का सवाल बा सांतिबाबू. आपन के भोट देने का अधिकार का रक्शा तो करना ही पड़ेगा.’
‘बहुत भोले हैं आप बाबू सरजू परसाद, इनको अधिकार देना ही होता तो इनके ही जारी किए हुए दस्तावेज़ ये मान्य नहीं कर लेते. ये देने की नहीं छीनने की कवायद है. जब छिना ही जाना है तो टाईम भेस्ट क्यों करना. कोउ नृप होई हमै का हानि.’
इस बीच एक खुशख़बर आई. अपन का फॉर्म अपलोड गया. बीएलओ साब खुदऐ पूरे टोले के फॉर्म भर दिए हैं. न घर आए, न फॉर्म दिया, न दस्तखत कराए, पूरा गाँव-टोला का फॉर्म अपलोड कर दिए. इफिशियंट बिहार! लोग नाहक बदनाम करते हैं. अब डर सिर्फ इतना है कि जैसे नाम चढ़ाया है वैसे ही काट न दें. काट भी दें तो कोई बात नहीं वोट देकर क्या हासिल कर लेंगे हम. रहनुमाओं से बस इतनी सी इल्तजा है आर्यावर्त का नागरिक बना रहने दें.
ख्यालों से बाहर निकलकर बिहार से एम्पी में लौट आया हूँ. बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी. आज नहीं तो कल भगवान चित्रगुप्त की मेहर तो एम्पी में भी लगेगी. तब की तब देखी जाएगी. फिलवक्त नीली छतरीवाले का शुक्रिया अदा कर रहा हूँ – ‘थैंक गॉड, मैं बिहार में वोटर नहीं हूँ’.
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – तुरत सेवा का सुख। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # 297 ☆
☆ व्यंग्य – तुरत सेवा का सुख ☆
मिसेज़ छाबड़ा ने पति को अखबार दिखाया, बोलीं, ‘देखो यह एड छपा है। घर के काम के लिए लेडी हेल्पर आधे घंटे में पहुंचेगी। झाड़ू पोंछा, बर्तन, किचिन की तैयारी। एक घंटे का चार्ज सौ रुपये। पांच मिनट का मार्जिन। एक घंटा पांच मिनट से ज्यादा होगा तो चार्ज दोगुना। वेरी इंटरेस्टिंग।’
फिर सोच कर बोलीं, ‘लेट अस गिव इट अ ट्राइ। अपनी केसर बाई तो तीन-चार दिन बाद ही गांव से लौटेगी। बहुत नागा करने लगी है। इसको बुलाकर देखते हैं।’
उनके पति छाबड़ा जी आदर्श पति हैं। पत्नी की बात का कभी विरोध नहीं करते। सोफे पर बैठे अखबार पलटते रहते हैं या टीवी देखते हैं। या फिर बैठे-बैठे झपकी लेते हैं। पत्नी जो देती है चुपचाप खा लेते हैं और जो पहनने को कहती है वही पहनते हैं। पत्नी से पूछे बिना कोई निर्णय नहीं लेते। टहलने जाते हैं तो पत्नी के पीछे-पीछे चलते हैं। कई बार पत्नी झिड़क देती है तो ‘आइ एम सॉरी’ कह कर चुप हो जाते हैं। बच्चे बाहर हैं, इसलिए घर में पति-पत्नी के सिवा कोई नहीं है।
मिसेज़ छाबड़ा ने निर्णय लेकर फोन कर दिया। करीब आधे घंटे में एक औरत, हांफती हुई, आ गयी। ‘गुड मॉर्निंग मैडम’, ‘गुड मॉर्निंग सर’ कहने के बाद एक कोने में ढेर हो गयी। हांफते हुए बोली, ‘मैडम, दौड़ती दौड़ती आयी हूं। प्लीज़ गिव मी फाइव मिनट्स। अभी काम शुरू करती हूं।’
करीब दस मिनट बाद वह उठ खड़ी हुई। मिसेज़ छाबड़ा से बोली, ‘मैडम काम दिखा दें और टाइम नोट कर लें।’ मिसेज़ छाबड़ा उसे काम समझा कर वापस सोफे पर बैठ गयीं।
दस पन्द्रह मिनट के बाद उनके दिमाग में कीड़ा कुलबुलाने लगा। कहीं काम धीरे-धीरे हुआ तो टाइम बढ़ जाएगा और चार्ज भी बढ़ जाएगा। वे उठकर औरत के पास खड़ी हो गयीं। बोलीं, ‘थोड़ा फुर्ती से काम करो। टाइम वेस्ट नहीं करना।’
औरत ने कोई जवाब नहीं दिया। मिसेज़ छाबड़ा फिर सोफे पर आ गयीं, लेकिन उन्हें चैन नहीं था। काम एक घंटे में पूरा होना चाहिए। वे हर दस मिनट में औरत के सिर पर खड़ी हो जाती थीं। ‘प्लीज़ थोड़ा फास्ट करो। टाइम बढ़ रहा है।’
तीन-चार बार टोकने पर औरत चिढ़कर बोली, ‘मैडम, हम इंसान हैं, मशीन नहीं हैं। जितना बन रहा है उतनी तेजी से कर रही हूं। आप उधर बैठो। काम खतम होने पर हम बताएंगीं।’
मिसेज़ छाबड़ा फिर सोफे पर। पति से बोलीं, ‘ये मेरा ब्लड-प्रेशर बढ़ा रही है। एक घंटे में काम फिनिश होना ज़रूरी है।’
छाबड़ा साहब ‘हांजी, आप दुरुस्त कहती हैं’ कह कर चुप हो गये।
एक घंटा पूरा होते ही मिसेज़ छाबड़ा ने औरत को रोक दिया। अभी किचिन का काम बाकी था। बोलीं, ‘बस रहने दो। किचिन का काम मैं कर लूंगी। तुम्हारे काम की स्पीड से मेरा ब्लड-प्रेशर बढ़ रहा है।’
औरत काम रोक कर खड़ी हो गयी, बोली, ‘मैडम, काम ज्यादा होगा तो टाइम तो लगेगा। उसमें हम क्या करेगी?’
मिसेज़ छाबड़ा बोलीं, ‘कोई बात नहीं। नेक्स्ट टाइम एक घंटे में पूरा करने की कोशिश करना। अगली बार हम आपको ब्रेकफास्ट और टी देंगे।’
(ई-अभिव्यक्ति में सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री तीरथ सिंह खरबंदाजी का हार्दिक स्वागत। आपने विधि विषय में पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की है। व्यंग्य लेखन के क्षेत्र में सतत सक्रिय, विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन-प्रकाशन तथा हलफनामा, इक्कीसवीं सदी के अंतरराष्ट्रीय श्रेष्ठ व्यंग्यकार एवं हमारे समय के धनुर्धारी व्यंग्यकार, साझा संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित। वर्ष 2023 में पहला व्यंग्य संग्रह “सुना है आप बहुत उल्लू हैं” प्रकाशित हुआ। वर्ष 2024 में दूसरा व्यंग्य संग्रह “झूठ टोपियाँ बदलता रहा” प्रकाशित हुआ। वर्ष 2022 में भारतीय स्टेट बैंक द्वारा स्पंदन साहित्य सम्मान। संप्रति : इंदौर में विधि एवं साहित्य के क्षेत्र में सतत सक्रिय। आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – परीक्षा वाले दिन।)
☆ व्यंग्य ☆ परीक्षा वाले दिन☆ श्री तीरथ सिंह खरबंदा ☆
जाने कहाँ गए वो दिन जब परीक्षा होते ही बच्चे अपने मामा के घर लंबी छुट्टियाँ बिताने पहुँच जाया करते थे । अब जीवन की परीक्षा के प्रश्नों को हल करने में मामा खुद इस कदर उलझे पड़े हैं कि भांजे की सुध लेने की उन्हें फुर्सत ही भला कहाँ है और भांजे को छुट्टियों में भी कोचिंग के सवालों से फुर्सत नहीं है ।
तपती गर्मी और ऊपर से परीक्षा पास आते ही गर्मी इस कदर दोहरी हो जाती है कि नवतपे की गर्मी भी उसके सामने कहीं ठहरती नहीं है । परीक्षा के दिन नजदीक आते ही पढ़ाकू किस्म के परीक्षार्थियों पर परीक्षा का ताप तेजी से चढ़ने लगता है । भावुक किस्म के छात्र परीक्षा के बाद कॉलेज बंद होने की कल्पना मात्र से ही विरह वेदना के ताप में तपने लगते हैं ।
अब परीक्षा के दिनों में शहर के चौराहों-नुक्कड़ों पर छात्र जमाव तो नहीं होता किन्तु व्हाट्सएप ग्रुप्स पर दबाव अवश्य बढ़ जाता है । निष्क्रिय किस्म के छात्र और ग्रुप अचानक सक्रिय हो उठते हैं । कक्षा के होशियार छात्रों की पूछ परख में यकायक शेयर मार्केट सा उछाल आ जाता है ।
परीक्षा के निमित्त किताबों और भावनाओं का आदान प्रदान शुरू हो जाता है । मदद की नहरें ऊपर तक लबालब बहने लगती हैं । संभावित प्रश्नों की तलाश और महत्वपूर्ण प्रश्नों की छंटाई-बँटाई शुरू हो जाती है । पास होने की हर जुगाड़ पर गहन चिंतन-मनन होने लगता है ।
छात्र नेताओं को अपना नेतृत्व कौशल दिखाने का सुनहरा अवसर हाथ लगता है । सेवा की उत्कंठ भावना उनमें उमड़ने-घुमड़ने लगती है और परीक्षा नजदीक आते-आते वह अत्यंत वेगवान हो जाती है । ऐसे संस्कारी खुद पास होने से कहीं ज्यादा दूसरों को पास करवाकर खुश होते हैं ।
पढ़कर परीक्षा में अच्छे नंबरों से पास होना सचमुच एक बड़ी उपलब्धि होती है । अक्सर ऐसे छात्र नौकरीयों में ऊंचे पदों पर जा पहुँचते हैं । बगैर पढ़े पास हो जाना उससे भी कहीं ज्यादा बड़ी उपलब्धि है । इन्हीं छात्रों में से कई आगे चलकर एक दिन हमारा नेतृत्व करते हैं और उनमें से कुछ तो मंत्री पद की शोभा बढ़ाते हैं ।
ज्ञानी जी कहते हैं कि कई बार एक ही प्रश्न पूरी ज़िंदगी संवार देता है, इसीलिए जीवन में कभी किसी भी परीक्षा या प्रश्नपत्र के किसी भी प्रश्न को हल्के में नहीं लेना चाहिए । हरेक परीक्षा में उत्तर लिखने से पहले प्रश्न को समझना ज्यादा जरूरी होता है अन्यथा पूरक उत्तर पुस्तिकाएँ भरने वालों को भी कई बार पूरक आ जाती है ।
परीक्षा पास करने हेतु, सही उत्तर लिखने या जानने से कहीं ज्यादा जरूरी है पूछे गए प्रश्नों को ठीक से समझना तथा यह जानना कि प्रश्नपत्र का कौन सा प्रश्न हल करना अनिवार्य है तथा प्रश्नपत्र कितने समय में हल करना है अन्यथा जीवन की परीक्षा में कई महत्वपूर्ण प्रश्न छूट जाया करते हैं ।
कभी-कभी हम किसी एक ही प्रश्न में ऐसे उलझ कर रह जाते हैं कि निर्धारित समय सीमा समाप्त हो जाती है और हाथ आया समय हाथ से निकल जाता है । प्रश्न पत्र के शेष प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाते हैं । परीक्षा पास करना भी एक कला है जो कठिन अभ्यास से आती है । आजकल की परीक्षाओं ने बहुतेरों को कलाकार बना दिया है ।
सच तो यह है कि पूरी ज़िंदगी ही एक परीक्षा है, जिसमें अनेकों विषय हैं । पास फ़ेल होना हरेक की नियति है । हर दिन यहाँ एक नया प्रश्नपत्र होता है और हर सुबह कई नए प्रश्न हमारे सामने आ खड़े होते हैं । सारी ज़िंदगी प्रश्नपत्र हल करते-करते ही गुजर जाती है, कभी लिखकर तो कभी बोलकर, कभी रटकर तो कभी पढ़कर फिर भी कई प्रश्न पीछे शेष रह जाते हैं ।
अक्सर पढ़ाई में कमजोर विद्यार्थी प्रश्न के नाम से ही घबराने लगते हैं और प्रश्नपत्र सामने आते ही उनको पसीना छूटने लगता है । ज्यादा होनहार विद्यार्थी इस बात की चिंता नहीं करते कि क्या पूछा गया है उन्हें तो जो आता है बस वे वही लिख आते हैं और कमाल की बात है कि भाग्य के भरोसे वे पास भी हो जाते हैं ।
कुछ लोगों के लिए परीक्षा पास करना बाएँ हाथ का खेल है । वे इस रहस्य को समय रहते समझ लेते हैं कि इस युग में ज्ञान अर्जित करने से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण परीक्षा पास करना है जो अंतिम एवं परम लक्ष्य है । ऐसे धनुर्धारी नीपूर्णता के साथ लक्ष्य भेदने में अक्सर सफल रहते हैं, किन्तु एकलव्य के अंगूठे पर संकट जस का तस बरकरार रहता है । इस दौर में परीक्षा कोई भी हो कमजोर दिल वाले साधनों की सुचिता की चिंता करते हैं जब कि हिम्मत वाले मुन्ना भाई नायक बनकर उभरते हैं और देखते ही देखते बहुतों के प्रेरणा स्त्रोत बन जाते हैं ।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “कैसे और क्यों व्यंग्यकार बने परसाई?” ।)
भारतीय जीवन में उपवास और स्वयं पर पाबंदियों का ताना-बाना हमारी जीवन शैली का हिस्सा है। हमने हमारे देवी-देवताओ को बडी श्रद्धा और भक्ति से डाइट-कॉन्शस बना दिया है। अपने आराध्य के नाम पर उनके भक्त वेज, नानवेज या फलाहारी डाइट को लेकर बहुत सजग रहते हैं। मंगलवार को नॉनवेज नहीं, शनिवार को नॉनवेज नहीं, गुरुवार को बस पीले फल, सावन में तो सामिष भोजन बिल्कुल नहीं, और नवरात्रि में तो नानवेज भोजन का नाम भी नहीं! शायद भक्तों कोलगता है कि स्वर्ग में कोई महान डाइटिशियन बैठा है, जो दिन, हफ्ते के हिसाब से, महीने की तिथियों के हिसाब से, त्योहारों के हिसाब से. हमारे मांसाहार पर रोक लगाने का रोस्टर प्लान बनाता है। एकादशी को दिन में सिर्फ एक बार आहार, पूर्णिमा को बस मीठा, या चतुर्थी को केवल रात्रि में पूजन के बाद दूध।
मंगलवार भगवान हनुमान जी की भक्ति का दिन, माना जाता है। भगवान बजरंगबली तोब्रह्मचारी थे। शायद उनके भक्तों को लगता है कि इस दिन मांसाहार से उनकी भक्ति संशय ग्रस्त हो सकती है। सवाल ये कि अगर मंगलवार को चिकन खा लिया, तो हनुमान जी नाराज़ क्यों होंगे?उनका आशीर्वाद ‘कैलोरी-काउंट’ पर निर्भर थोड़ी है?
शनिदेव की पेंचदार नज़र से बचने के लिए शनिवार की साधना निर्धारित है। शनिवार को नॉनवेज निषेध दिवस मनाया जाता है। काले भैंसे पर सवार भक्तों के इष्ट आपका आहार नहीं आचरण देखते हैं यह तथ्य भक्तों की समझ से परे क्यों है। क्या शनिदेव वेजिटेरियनिज़म के ब्रांड एम्बेसडर हैं?शनिवार कोसिर्फ साबूदाना की खिचड़ी खाने मात्र से शनिदेव क्यों प्रसन्न हो सकते हैं, इसका उत्तर केवल आस्था और विश्वास में ही है।
भगवान शिव की घर वापसी का पवित्र समय सावन का महीना होता है। दादी ने सावन में नॉनवेज वर्जित कर रखा है। भोलेनाथ तो खुद नीलकंठ हैं, विष पीने वाले! उनका आभूषण सर्प हैं, वस्त्र व्याघ्रचर्म! क्या वे सचमुच नाराज़ हो सकते हैं, यदि कोई भक्त सावन माह में चिकन बिरयानी का डिनर कर ले? शायद यह प्रतिबंध इसलिए है कि बारिश के मौसम में मांस खाने से भक्तों का पेट खराब हो सकता है, और इस वैज्ञानिक तथ्य को भगवान की भक्ति का भय दिखाकर, मानने के लिए विवश किया गया हो।
नौ रातों का महापर्व, नवरात्रि माँ दुर्गा की आराधना का समय होता है। इस अवधि में सामिष भोजन का पूर्ण बहिष्कार किए जाने की परंपरा है। विचित्र विरोधाभासपश्चिम बंगाल में देखने मिलता है जहां नवरात्रि के अंत में पशु बलि की प्रथा है। नौ दिन कठोर उपवास, दसवें दिन बकरे की बलि, माँ दुर्गा की शाकाहारी थाली में मांस का प्रसाद चढ़ाए जाने पर भी मां मुस्कुराती हैं। और भक्तों को मन मांगे वरदान देती हैं। भक्तों ने अपनी परम्परा के अनुसार सामिष भोजन हेतु देवीमां के ‘मूड स्विंग’ की कल्पना की हुई है।
मांसाहार की इन पाबंदियों के पीछे निश्चित ही पवित्रता, संयम और श्रद्धा का भाव है। कभी-कभीलगता है कि भक्तों की डाइट, स्वर्ग में बैठे देवताओं के हाथों में है। हमारे पेट पर रिमोट कंट्रोल से हमारे इष्ट नज़र रखते हैं।
भगवान सुबहकैलेंडर देखते हैं “अरे वाह! आज तो शनिवार है! किसी मूर्ख ने अंडा खाया कि नहीं? चलो, उसकी कुंडली में थोड़ा ‘काल सर्प’ योग डाल देते हैं, उसे निरामिषभोजन का सबक सिखाने के लिए!”
दरअसल हमारे आहार तथा भोजन परहमारी संस्कृति और आस्था का व्यापक प्रभाव है।
इनका पालन संपूर्ण श्रद्धा से करें। पर हाँ, इन विसंगतियों पर मुस्कुराना भी तो ज़िंदगी का हिस्सा है! हो सकता है, खान पान के ये सब नियम असल में हमें संतुलन, अनुशासन और प्रकृति के साथ तालमेल सिखाने के लिए हमारे ऋषि मुनियों की गहरी सोच है। पेट तभी खुश हो सकताहै जब हम कभी कभार उसे भी’होली’डे’ देने की पेशकश करें!तो अगली बार जब आप मंगलवार को मटन की खुशबू से बचते हुए सब्जी की दुकान की ओर बढ़ें, तो एक पल के लिए मुस्कुराइए और सोचिए की, कहीं दूर स्वर्ग में, भगवान के नाम पर बनाडाइट चार्ट हमारे विद्वान सांस्कृतिक संवाहकों की सूक्ष्म अवलोकन क्षमता के सुदीर्घ सांस्कृतिक दर्शन का प्रतिसाद है।
(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य “जिन्दगी जो निज़ाम की बद्नज़र से बार-बार बच जाती है…” ।)
☆ शेष कुशल # 53 ☆
☆ व्यंग्य – “जिन्दगी जो निज़ाम की बद्नज़र से बार-बार बच जाती है…”– शांतिलाल जैन ☆
कांग्रेचुलेशंस शांतिबाबू. बधाई, मुबारक हो कि आप पुरी गए थे, लौट आए, भीड़ में कुचलकर मरे नहीं. पाँच सौ से ज्यादा घायल हुए, उसमें भी बच गए! क्या बेहतरीन किस्मत लिखाकर लाए हो गुरु! प्रयागराज भी गए थे आप. न तो नईदिल्ली रेलवे स्टेशन पर कुचले गए न मेले में. बड़ी बात है. निज़ाम ने इंतजामात् में इतनी कमियाँ रखीं, लापरवाही से काम लिया, इन्फ्रा खड़ा करने में कट लिया, पुलिस वीआईपी मूवमेंट में मुब्तिला रही, जिम्मेदारियाँ इस-उस पर डालीं, फिर भी मौत ने आपको छुआ तक नहीं. मौत को आप बैंगलोर में चकमा दे आए. आरसीबी की जीत का जश्न देखने गए, भगदड़ मची भी मगर आप बचकर आ गए. ठाणे से मुम्ब्रा जानेवाली लोकल ट्रेन में लटक कर जानेवालों में आप भी तो थे, चार-छह गिरकर मरे. आप बच गए. रोज़ लटक कर जाते हो, रोज जिंदा वापस आ जाते हो. कितनी बधाईयां दें आपको, हर दिन घर से निकलते हो, हर पल मौत का सामना करते हो, हर बार बचकर निकल आते हो.
कोई तो अदृश्य शक्ति है जो प्रशासन की मर्ज़ी के विरुद्ध जाकर भी बार बार आपको मौत मुँह से निकाल लाती है. उस रोज़ सरकारी डिस्पेंसरी वालों ने आपको नकली दवाएँ खिला दीं तब भी बच गए आप. आपके शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता है मगर प्रतिरोध का साहस नहीं है. उज्जैन-इंदौर के बीच पचास किलोमीटर की दूरी में बत्तीस घंटे जाम में फंसे रहे, आपके हमराही उसी जाम में वहीं मर गए, आप बच गए. और तब तो चमत्कार ही हो गया जब स्ट्रीट लाईट बंद थी, सड़क के बीचोंबीच गढ्ढे में आपकी एक्टिवा गिरी, आपको सिर में गहरी चोट लगी और आपका सीटी स्कैन नार्मल निकला. सोचो सीईओ म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन को अपने विभाग की विफलता पर कितना दुःख हुआ होगा. उसकी मेहर से खड़ा होर्डिंग गिरा आप पर और आप बाल-बाल बच गए. आपके बच जाने से अस्पताल प्रशासन भी कम दुखी नहीं है, आप एडमिट थे कि आग लग गई. अबोध नवजात शिशु तक मर गए मगर किस्मत आपको फिर बचा ले गई वरना प्रशासन ने अपनी तरफ से कोई कसर बाकी रखी नहीं थी. आपके पार कर लेने के कुछ ही पलों बाद पुल भरभरा कर गिर पड़ा, फिर बच गए आप. पुरखों से विरासत में मिले जल-जंगल से झोपड़ी सहित बेदख़ल कर दिए गए आप तब भी मर जाने की नहीं सोची आपने. शहर में आकर झुग्गी तान ली. बुलडोज़र आपकी उस झुग्गी को भी जमींदोज़ करके चला गया. मलबे पर बैठी आपकी जिजीविषा ने आपको तब भी जिलाए रखा.
आर्यावर्त में जिंदा रहने के जोग कुंडली में सुपर टॉप क्लास लोग लिखाकर लाते हैं शांतिबाबू. आप जैसा मामूली से भी कमतर आदमी जितना जिंदा रह जाए उतना एक संयोग है. संयोग है कि कभी फेक एनकाउंटर के शिकार बने नहीं आप, गंदगी साफ़ करने के दौरान चैंबर की गैस में दम घुटा नहीं आपका, रेट-माईनर्स की तरह खदान में घुटकर भी नहीं मरे. सिस्टम की तमाम कोशिशों के बावजूद आप मणिपुर में भी जीवित रह जाते हो, उरी-पुंछ-राजौरी में भी, बिहार की बाढ़ में भी, वायनाड के जल प्रलय में भी, तेलंगाना के कारखानों की आग में, हरदा की पटाखा फेक्ट्री के विस्फोट में भी. जिंदा हैं तो शांतिबाबू हैं, मर जाते तो पानी के एक बुलबुले सी खबर बन कर रह जाते, एक बेमतलब का नाकाबिल-ए-ज़िक्र आँकड़ा. खुश रहिए कि रेंगती-घिसटती ही सही लाईफ चल तो रही है.
निज़ाम की बद्नज़र से कब तक बचोगे शांतिबाबू. बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी! रेल भी यहीं है, गिरने वाले पुल भी, गढ्ढ़ों वाली सड़क भी, निज़ाम भी यही है, उसका बुलडोज़र भी यहीं है. एक दिन सिस्टम आपकी बलि तो लेकर रहेगा. देखते जाईए आप भी यहीं हैं और हम भी.
जननायक को ट्विटर पर शोक सन्देश लिख देने के सुख से लम्बे समय तक वंचित नहीं रख सकेंगे आप. तब तक के लिए कांग्रेचुलेशंस शांतिबाबू.
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय व्यंग्य – “आभासी आदर्श बनाम वास्तविक व्यवहार” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 358 ☆
व्यंग्य – आभासी आदर्श बनाम वास्तविक व्यवहार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
अजब दौर है, हर कोई अपनी ‘वाल’ या ‘स्टेटस’ पर ऐसी चमकती-दमकती बौद्धिकता और आदर्शवाद का प्रदर्शन करता है, मानो गांधी, नेल्सन मंडेला और दलाई लामा का संयुक्त स्वरूपउनके कीबोर्ड में निवास करता हो। “सर्वे भवन्तु सुखिनः” की स्टोरी, कहीं पर्यावरण बचाने का जोशीला स्टेटस, तो कहीं नारी सशक्तिकरण पर विद्वतापूर्ण उपदेश। देखकर लगता है कि धरती पर स्वर्ग उतर आया है और उसके मुख्य देवदूत हमारे फ्रेंडलिस्ट में विराजमान हैं।
लेकिन ज्योंही इस आभासी आभा से निकलकर हम इन ‘आदर्श पुरुषों’ और ‘आदर्श नारियों’ के वास्तविक जीवन में कदम रखते हैं, त्योंही चश्मे के शीशे टूट जाते है। वही सज्जन, जिनकी वाल पर “क्षमा वीरस्य भूषणम्” (क्षमा वीरों का आभूषण है) टंगा होता है, सड़क पर गलती से टकरा जाने पर ऐसी गालियों का वर्षा करते हैं जो शायद ही किसी डिक्शनरी में मिले। वही महानुभाव, जो स्टेटस में “सादा जीवन उच्च विचार” का पाठ पढ़ाते हैं, असल जिंदगी में ब्रांडेड कपड़ों और महंगी गाड़ियों के पीछेदौड़ लगाते हैं, मानो सादगी कोई संक्रामक रोग हो।
पारिवारिक मोर्चे पर तो यह विसंगति महाकाव्य बन जाती है। फेसबुक पर “मातृ-पितृ भक्ति सबसे बड़ा धर्म” का उद्घोष करने वाला युवक, घर पहुंचते ही मां के “जरा पानी ला दो” कहने पर ” मम्मी, मैं बिजी हूं!” का तीखा जवाब देता है। ट्विटर पर “समानता और सम्मान” की पैरोकार करने वाली सुश्री, घर की बहू-बेटियों के साथ बर्ताव में ऐसा पुरातनपंथी रवैया अपनाती हैं, कि स्टेटस खुद शर्म से पानी-पानी हो जाए।
कार्यालयों में तो यह व्यवहार रोज का रंगमंच है। जो साहब लिंक्डइन पर “टीम वर्क” और “इथिकल लीडरशिप” पर लेख लिखते नहीं थकते, वही कार्यालय में अपने जूनियर की बढ़ती प्रतिभा से इतने क्षुब्ध रहते हैं कि उसकी प्रमोशन रिपोर्ट खराब करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते। और “सत्यमेव जयते” वाला स्टेटस लगाने वाला कर्मचारी? उसके तो ऑफिस टाइम में पर्सनल काम और पर्सनल टाइम में ऑफिस के झूठ बनाने का शेड्यूल इतना टाइट होता है कि ‘सत्य’ तो बस उसकी प्रोफाइल पिक्चर तक ही सीमित रह जाता है।
इस विडंबना के मूल में छवि का भूत होता है। सोशल मीडिया’इमेज मेकिंग फैक्ट्री’ बन गया है। यहां आप जो दिखाना चाहते हैं, वही दिखाते हैं, आप जो हैं, वह नहीं। यह एक सुविधाजनक मास्क है, जिसे पहनकर वास्तविकता के दाग-धब्बों को छिपाने की कोशिश में हर प्रोफाइल जुटा हुआ है।
आदर्शवादी, प्रबुद्ध और संवेदनशील दिखने वाले पोस्ट्स को आभासी जगत में सामाजिक स्वीकृति और प्रशंसा मिलती है। यह एक डोपामाइन रश है।
आत्ममंथन करके अपने चरित्र को सुधारना एक कठिन, दीर्घकालिक प्रक्रिया है। उसके मुकाबले किसी महान व्यक्ति का कोट कॉपी-पेस्ट करके तुरंत ‘अच्छा इंसान’ दिख जाना सरल है। यह समय है कि हम अपनी ‘वाल’ को सजाने से पहले, अपने ‘व्यवहार’ को संवारने पर ध्यान दें। आदर्शवाद वह नहीं जो टाइप होता है, बल्कि वह है जो जीवन के कैनवास पर चरित्र के रंगों से चित्रित होता है।
(डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार, बाल साहित्य लेखक, और कवि हैं। उन्होंने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज, और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने, और समन्वय करने में महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनके ऑनलाइन संपादन में आचार्य रामचंद्र शुक्ला के कामों के ऑनलाइन संस्करणों का संपादन शामिल है। व्यंग्यकार डॉ. सुरेश कुमार मिश्र ने शिक्षक की मौत पर साहित्य आजतक चैनल पर आठ लाख से अधिक पढ़े, देखे और सुने गई प्रसिद्ध व्यंग्यकार के रूप में अपनी पहचान स्थापित की है। तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (तेलंगाना, भारत, के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से), व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान (आदरणीय सूर्यबाला जी, प्रेम जनमेजय जी, प्रताप सहगल जी, कमल किशोर गोयनका जी के करकमलों से), साहित्य सृजन सम्मान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करकमलों से और अन्य कई महत्वपूर्ण प्रतिष्ठात्मक सम्मान प्राप्त हुए हैं।
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य रचना ऑनलाइन ज़माना, ऑफ़लाइन ड्रामा ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # 57 – ऑनलाइन ज़माना, ऑफ़लाइन ड्रामा ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
हैदराबाद की सड़कें, रात के आठ बज रहे थे और मैं अपने नए AI-संचालित स्मार्टफ़ोन के लिए लेटेस्ट चिपसेट ढूँढ रहा था। जब निकला था, तो शाम के पाँच बज रहे थे, अब आठ बज चुके थे, और मुझे लगने लगा था कि हैदराबाद ने ‘तकनीकी संतुष्टि’ से नाता ही तोड़ लिया था। टेक-पार्कों के बाहर कैब की लाइनें इतनी लंबी थीं, जितनी कि किसी IPO के लिए निवेशकों की। महंगे गैजेट की दुकानें, वीगन कैफे और ‘को-वर्किंग’ स्पेस ठसाठस भरे थे। ऑनलाइन गेमिंग सेंटर के बाहर बच्चे ऐसे चिपके थे, जैसे उनका भविष्य यहीं दाँव पर लगा हो। लेटेस्ट चिपसेट? वो तो शायद किसी डार्क वेब के कोने में पड़ा अपनी कीमत का इंतज़ार कर रहा था, ठीक वैसे ही जैसे कुछ स्टार्टअप इन्वेस्टर के पैसे का। मुझे लगा, इस डिजिटल दुनिया में कम से कम एक कप ऑर्गेनिक ग्रीन टी ही मेरी आत्मा को शांति दे दे। एक हिपस्टर कैफे में घुस गया, लेकिन वहाँ भी शांति कहाँ! मेरे अंदर का ‘सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर’ जाग उठा, जो अमूमन ऐसी परिस्थितियों में ‘रील्स’ बनाने लगता है। मुझे याद आया, जब मार्क ज़करबर्ग ने कहा था, “तेज़ बढ़ो और चीज़ें तोड़ो।” तो क्या ये लेटेस्ट चिपसेट की कमी, इस शहर के ‘फास्ट-ग्रोथ’ कल्चर को मुंह चिढ़ा रही थी? मुझे खुद पर हंसी आ गई। मैं क्या, मेरी तो डिजिटल पहचान ही ‘बफरिंग’ पर थी। क्या मैं भी उन्हीं में से एक था जो ‘नो-कोड’ टूल्स से ‘कोडिंग’ खरीदने की फ़िराक़ में थे? शायद हाँ! इस शहर में हर चीज़ का ‘सब्स्क्रिप्शन प्लान’ था, सिवाय मानवीय सरोकारों के। मुझे लगा जैसे मैं किसी मेटावर्स में फँसा हूँ, जहाँ हर कोई अपने ‘अवतार’ की कीमत पर दाँव लगा रहा है, और मैं सिर्फ़ एक ‘यूज़र’ हूँ, जिसके पास सिवाय ‘स्क्रॉल’ करने के कुछ नहीं। बाहर निकला तो एक ‘डिजिटल डिटॉक्स’ सेंटर के बाहर एक युवक ने हाथ फैलाया—’मालिक, एक डेटा पैक दे दो, तुम्हारा इंटरनेट सुखी रहे।’ मुझे लगा, काश मेरे पास एक ‘गीगाबाइट’ होता, जिससे मैं उसकी ‘कनेक्टिविटी’ ही बदल पाता, लेकिन मेरे पास थी सिर्फ़ एक ‘स्टोरी’, एक ‘थ्रेड’, एक ‘मीम’।
मेरी ‘थिंकिंग क्लाउड’ ऐसे सरपट दौड़ रही थी जैसे 5G नेटवर्क, और उस युवक का चेहरा मेरे दिमाग में किसी ‘लूपिंग GIF’ की तरह घूम रहा था। पच्चीस-तीस की उम्र, शरीर दुबला-पतला लेकिन आँखों में एक अजीब सी ‘नो-वाईफ़ाई’ चमक। क्या वह कोई ‘डिजिटल भिखारी’ था या कोई ‘टेक-सेवी’ फ्रॉड? उसकी फटी टी-शर्ट और पुरानी जींस, किसी ‘स्मार्ट-कैज़ुअल’ ड्रेस कोड को मुँह चिढ़ा रही थी। मैंने जेब में हाथ डाला, ‘पाँच-सौ एमबी’ ढूंढने निकला तो ऐसा लगा जैसे कोई ‘आर्कियोलॉजिस्ट’ किसी पुरानी हार्ड ड्राइव में ‘डिलीटेड फ़ाइल्स’ खोज रहा हो। बचे-खुचे डेटा पैक्स के बीच छिपा वो ’50 एमबी का प्लान’ मिला तो लगा जैसे किसी ‘खोई हुई सभ्यता का डेटा’ हाथ लग गया हो। लेकिन जब आँखें उठाईं, तो युवक गायब! ‘इनविज़िबल यूज़र’—मुझे लगा मैंने किसी नए ‘साइबर-क्राइम’ की कहानी गढ़ दी है। क्या वो सचमुच चला गया था या मेरे ‘डेटा-शेयरिंग’ की गति इतनी धीमी थी कि उसने सोचा, ‘भाई साहब, जितनी देर में तुम सिक्का निकालोगे, उतनी देर में तो मैं चार और लोगों से भीख मांग लूँगा?’ पास की गली में एक ‘बैटरी-लो’ आइकन तेज़ी से गायब हुआ, और मेरा दिमाग चिल्लाया—’कनेक्टेड!’ वही था, मेरा ‘डेटा-बचाओ-अभियान’ का हीरो! ‘अरे… ये ले डेटा!’ मैंने आवाज़ लगाई, लेकिन वो तो ऐसा ‘नोटिफ़िकेशन-म्यूट’ कर चुका था जैसे किसी ‘टेक-जायंट’ ने यूज़र की प्राइवेसी पर ध्यान देना बंद कर दिया हो। एक बड़े चार्जिंग स्टेशन पर मेरी ओर पीठ कर बैठ गया, चेहरा हाथों से छिपाकर। मुझे लगा, ये ‘यूज़र’ नहीं, ये तो कोई ‘डिजिटल डिप्रेशन का शिकार’ है। एलन मस्क ने कहा था, “हम ऐसे भविष्य में हैं जहाँ ‘टेस्ला’ सड़कों पर चल रही है, लेकिन लोग अभी भी पैदल चल रहे हैं।” लेकिन ये ‘डिजिटल’ भिखारी तो अपनी ‘डिस्कनेक्टिविटी’ को छिपा रहा था, जैसे किसी ने उसकी ‘अन-प्लग्ड’ ज़िंदगी का भी ‘मोनिटाइज़ेशन’ कर लिया हो। क्या ये सिर्फ़ ‘डेटा-हंगर’ था या इस शहर का एक जीता-जागता ‘डिजिटल व्यंग्य’?
कैफे की सीढ़ियाँ उतरते ही मुझे लगा, मैं किसी ‘वेब-सीरीज़’ के सेट पर आ गया हूँ। गली के बीचों-बीच, टूटे हेडफ़ोन में लिपटी एक युवती, गोद में एक साल का बच्चा, और उसके माथे पर गिरती ‘टच-स्क्रीन’ की बूंदें—ये दृश्य इतना ‘पिक्सेलेटेड’ था कि मेरा ‘4K विज़न’ भी कुछ देर के लिए धुँधला सा गया। वो ‘इमोजी’ की तरह रो रही थी, मानो उसके आँसुओं में इस पूरे शहर का ‘बग’ समा गया हो। मैंने देखा, उसका रुदन कम हुआ, उसने मुझे ‘क्यूआर कोड’ की तरह देखा और ‘सर…’ कहकर प्रणाम किया। तभी मुझे याद आया, ये वही ‘कंटेंट क्रिएटर’ परिवार था जिससे मैं दो साल पहले ‘वायरल वीडियो’ बनाते समय एक वर्कशॉप में मिला था। ‘तुम्हारा ‘फॉलोअर’ है?’ मैंने पूछा, और उसने ‘जी सर…’ कहकर अपनी ‘लाइफ़-स्टोरी’ शुरू कर दी। मुझे लगा, जॉर्ज ऑरवेल अगर इस दृश्य को देखते तो शायद अपनी अगली ‘डिस्टोपियन’ नॉवेल का प्लाट यहीं से उठा लेते। वो दुबली-पतली, ‘बैटरी-लो’ जैसी युवती, और उसका पति जिसकी ‘नेटवर्क बार’ ऐसे झूल रही थी मानो कभी भी ‘डिस्कनेक्ट’ हो जाए। मुझे लगा, ये ‘ग़रीबी’ नहीं, ये तो ‘डिजिटल डिवाइड’ का प्रदर्शन है। मैंने बिना पूछे ही उनकी कहानी समझ ली। ‘टियर-2’ शहर से आए ‘कंटेंट क्रिएटर’, ‘व्यूज़’ की तलाश में दर-दर भटकते हुए, और मुझे याद आया वो पहला दृश्य जब मैंने उनकी ‘लो-रिज़ॉल्यूशन’ स्थिति देखी थी और मेरा ‘लाइक’ बटन करुण-क्रंदन कर उठा था। लेकिन अब मेरा ‘दिल’ ‘अन-लाइक’ हो चुका था, ऐसा ‘हार्डवेयर’ जिसे अब कोई ‘सॉफ़्टवेयर’ पिघला नहीं सकता था। मुझे लगा, इस देश में ‘डिजिटल दरिद्रता’ कोई समस्या नहीं, बल्कि एक ‘ट्रेंडिंग हैशटैग’ है, जिसमें हर कोई अपनी-अपनी भूमिका बखूबी निभा रहा है।
“कितनी ‘वीडियोज़’ बनाने के उपरांत हुआ था ये ‘वायरल’ बच्चा। आज एक ‘लाइक’ के लिए तरस रहा है।” उस युवती के ये शब्द मेरे कानों में ऐसे गूँजे जैसे किसी ‘बफ़रिंग’ वीडियो की आवाज़। मैंने बच्चे को देखा, वह ‘गोल-मटोल’ था, लेकिन उसकी हालत ऐसी थी जैसे किसी ‘बढ़ते सब्सक्राइबर’ को अचानक ‘चैनल डिलीट’ कर दिया गया हो। ‘लो-बैटरी’ वाला वो बच्चा अपना ‘अंगूठा’ चूस रहा था, और मुझे लगा, ये बच्चा ‘अंगूठा’ नहीं, बल्कि इस समाज की ‘डिजिटल एथिक्स’ चूस रहा था। मैंने उसके हाथ में एक ‘ऑनलाइन ट्रांज़ैक्शन’ कर दिया, और उस युवती ने उसे ऐसे लिया जैसे किसी ने उसे दुनिया की सबसे बड़ी ‘बिटकॉइन’ दे दी हो। ‘कोई ‘रिमोटी’ जॉब हो तो दिला दो मालिक, हम दोनों ‘फ़्रीलांसिंग’ करेंगे, हमको ‘वाईफ़ाई’ कनेक्ट किए तीन दिन हो गए हैं।’ तीन दिन! मुझे लगा, ये लोग ‘डिजिटल डेप्रिवेशन’ से मर रहे हैं और मैं यहाँ ‘मीम्स’ लिख रहा हूँ! हरिशंकर परसाई ने कहा था, “जिस देश में ‘गाली’ देने की आज़ादी हो, उस देश में ‘सच्चाई’ बोलने की आज़ादी की ज़रूरत नहीं होती।” मुझे लगा, क्या मैं भी ‘डिजिटल पाखंड’ में लिप्त हो रहा था, सिर्फ़ अपनी ‘कीबोर्ड’ चलाने के लिए? मैंने कहा, ‘ऑनलाइन जॉब मिलना आसान नहीं है। जो भी हो, एक हफ़्ते बाद मुझसे ‘लिंक्डइन’ पर मिलो।’ और अपना ‘प्रोफ़ाइल’ दे दिया। पति-पत्नी ने ‘थैंक्यू’ की ‘इमोजी’ के साथ मेरी ओर देखा, लेकिन पति के चेहरे पर एक ऐसी ‘सिग्नल-लॉस’ वाली वेदना थी, जिसे शब्दों में बयां करना असंभव था। उसकी आँखें जैसे चिल्ला रही थीं, ‘मुझे ‘ऑनलाइन चैरिटी’ नहीं, मुझे ‘रियल’ काम चाहिए!’ ये व्यंग्य नहीं, ये तो ‘आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस’ का एक ऐसा ‘ग्लिच’ था, जिसने मेरे सारे ‘एल्गोरिदम’ को धूल चटा दी। मुझे लगा, इस देश में ‘डिजिटल डिवाइड’ से बड़ा कोई ‘वायरस’ नहीं, और ‘रोज़गार’ से बड़ा कोई ‘सॉफ़्टवेयर अपडेट’ नहीं।
इलेक्ट्रॉनिक्स मार्केट की सड़क पर चलते हुए मुझे दो साल पहले की वो मुलाक़ात याद आ गई, जब मैं अपने नए ‘आई-फ़ोन’ के लिए ‘जेनुइन एक्सेसरीज़’ ख़रीदने आया था। ‘फ़ास्ट चार्जिंग’ हब तैयार खड़ा था, और मेरा सामान ‘डिजिटल लॉकर’ में रखने के बाद मैं ‘एक्सपीरिएंस ज़ोन’ में बैठ गया। बाहर का नज़ारा? एक ओर ‘ब्रोकन स्क्रीन’ वाले फ़ोन, ‘रिपेयर शॉप्स’, ‘ई-वेस्ट’ का अंबार—बिल्कुल वैसे ही जैसे किसी ‘साइबर-क्राइम’ सीन होता है, बस ‘मल्टीमीडिया’ का रंग थोड़ा फीका था। दूसरी ओर ‘डेटेड ऑपरेटिंग सिस्टम’ वाले गैजेट, जिसमें बच्चे ऐसे ‘गेम’ खेल रहे थे जैसे ‘प्रोफ़ेशनल ई-स्पोर्ट्स एथलीट’, और ‘इन-ऐप परचेज़’ ऐसे माँग रहे थे जैसे उनका ‘लाइफ़टाइम सब्स्क्रिप्शन’ हो। ‘यूज़र्स’ जो पैसे ‘इन-गेम आइटम्स’ पर खर्च करते, वे बच्चे उनको झट ‘हैक’ कर निकाल लेते। ‘पिक्सेल-पिक्सेल’ पर उनका पैसों के पीछे ‘टैप’ करना, मेरे मन को दर्द भरा ‘डिजिटल एंटरटेनमेंट’ सा लग रहा था। मुझे लगा, ये बच्चे नहीं, ये तो ‘डेटा माइनर्स’ थे, जो अपनी ‘ब्रेड-बटर’ के लिए ‘वर्चुअल दुनिया’ में गोता लगा रहे थे। मेरे ‘पॉकेट वाईफ़ाई’ वाले सेक्शन में एक ‘टेक-उद्यमी’ और एक ‘इन्फ्लुएंसर’ चढ़े, ‘बिजनेस पार्टनर’ लग रहे थे। देखकर लगा जैसे ‘फंडिंग’ की मनौती माँगकर ‘साइबराबाद’ से आए थे। ‘पिचिंग सेशन’ में ‘हैक’ होने के बाद ‘डेटा-करप्टेड’ हालत में अपने ‘स्टार्टअप’ लौट रहे थे। ‘इनक्यूबेटर’ के बाहर उनके सहायक दो ‘एंजेल इन्वेस्टर’ खड़े थे, और उद्यमी ने ‘फ़ाइव थाउज़ेंड डॉलर’ का ‘चेक’ उनकी ओर बढ़ाया। ‘पांच हज़ार डॉलर ही दिए हैं… बाक़ी?’ इन्वेस्टर की आवाज़ ऐसी थी जैसे वह कोई ‘वेंचर कैपिटलिस्ट’ हो, जो अपनी ‘इक्विटी’ वसूल रहा हो। मैंने सोचा, ये इन्वेस्टर नहीं, ये तो ‘डिजिटल मनी लॉन्डरर्स’ हैं!
“बाक़ी क्या, पांच हज़ार डॉलर की बात हुई थी,” उस उद्यमी ने पास खड़े ‘सीईओ’ की ओर इशारा करते हुए कहा, “मेरे लिए ये पाँच हज़ार डॉलर ठीक हैं, इसको तीन हज़ार डॉलर दे दीजिए।” साथ खड़ी इन्फ्लुएंसर ने कहा, “…और तीन हज़ार डॉलर? एक हज़ार डॉलर भी नहीं दूँगी। तुम दोनों को कुल पाँच हज़ार डॉलर देने की बात तय हुई थी।” मुझे लगा, ये ‘स्टार्टअप पिच’ नहीं, ये तो किसी ‘ब्लैक मार्केट’ का सौदा था, जहाँ ‘इक्विटी’ भी मोलभाव का विषय बन गई थी। उसके पति ने एक हज़ार डॉलर निकालकर उस दूसरे इन्वेस्टर की ओर बढ़ाया। उसने लेने से साफ़ इनकार कर दिया। “तीन हज़ार डॉलर से एक पैसा भी कम हुआ तो हम नहीं लेंगे। पहले के पाँच हज़ार डॉलर भी वे लौटाने लगे।” दूसरे इन्वेस्टर ने ‘डाउनलोड-फ़ेल’ के स्वर में कहा, “ऐसे ‘बजट-कंजूस’ स्टार्टअप्स को कहाँ से ‘यूनिकॉर्न’ बनेंगे?” ‘रैनसमवेयर अटैक’ की भांति उसके शब्द मुझे आ लगे। वह उद्यमी ‘फ़्रीज़’ हो गया, उसकी पत्नी इन्फ्लुएंसर के चेहरे पर बदलते ‘इमोजी’ दयनीय लग रहे थे। एकाएक उसकी ‘बैटरी’ ‘छलछला’ आई। ‘पावर बैंक’ से आँसू पोंछती हुई वह बोली, “तीन हज़ार डॉलर ‘स्कैम’ करिए इसके मुँह पर।” इतनी घटिया हरकत से पैसे कमाने वाले वे दोनों ‘मॉक-सीईओ’ खीसें निपोरते हुए चले गए। ‘फ़ाइल ट्रांसफर’ भी चालू हो गया, परंतु उसकी ‘स्क्रीन’ की रुलाई बंद नहीं हुई। उसके पति ने उसे कितना ‘डीबग’ किया, लेकिन वह उसी तरह रोती रही। तड़पते हुए ‘एरर-मैसेज’ के स्वर में बोली, “ऐसे ‘फेक-प्रोफ़ाइल’ वाले लोगों के मुंह से इन शब्दों को सुनने हम इतनी दूर आए थे?” मुझे लगा, ये स्त्री नहीं, ये तो ‘डिजिटल फ्रॉड’ का शिकार थी। मैंने उसके ‘करप्टेड डेटा’ पर ‘रिकवरी सॉफ़्टवेयर’ लगाते हुए दो शब्द कहे, लेकिन मेरा दखल उन्हें अच्छा नहीं लगा। कुछ देर बाद वह ‘रीबूट’ हो गई। मुझे लगा, इस देश में ‘वेब-3.0’ भी अपनी ‘फ़ीस’ वसूलते हैं, और अगर ‘ब्लॉकचेन’ कम पड़े तो ‘एनएफ़टी’ का डर दिखाते हैं।
हैदराबाद में वे ‘टेक-वर्कर्स’ थे। पति-पत्नी दोनों ‘रिमोट’ काम करते थे। वह ‘कोड’ लिखता था। पत्नी ‘डेटा’ एनालाइज़ करती। ‘फ़िक्स्ड-इंकम’ से घर चलाते थे, अच्छी ‘सेविंग’ कर लेते थे। मुझे लगा, ये लोग ‘न्यू-एज इंडिया’ की असली तस्वीर थे, जो अपने दम पर ‘डिजिटल’ जीवन जी रहे थे, बिना किसी ‘सरकारी स्कीम’ के। उनकी शादी हुए आठ साल हो गए थे लेकिन ‘बच्चा’ नहीं था। पति इस ओर से बेपरवाह था, पर पत्नी ऐसा नहीं कर पा रही थी। ‘आईवीएफ’ के लिए एक साल से पैसे जमा कर रही थी। पति को चाहे इस पर विश्वास नहीं था, लेकिन पत्नी की ख़ातिर चला आया था। मुझे लगा, ये ‘मेडिकल टूरिज़्म’ नहीं, ये तो ‘बायोटेक होप’ थी, जिसे लोग ‘क्लीनिक’ में जाकर ढूंढते हैं। ‘ऑनलाइन कंसल्टेशन’ से ‘हैदराबाद’ जाने तक मैं उन लोगों से बातें करता रहा। पति-पत्नी में अत्यंत ‘केमिकल लोचा’ वाला प्रेम था। दोनों ने सफर का भरपूर ‘डिजिटल’ सुख और आनंद लिया। जितने ‘चैरिटी लिंक्स’ आए, उन्हें पैसे दिए। किसी ‘ऐप’ से ‘डिलिवरी’, तो किसी से ‘सब्स्क्रिप्शन’, तो किसी से ‘प्रीमियम फ़ीचर्स’ खरीद-खरीदकर वे दोनों मज़े कर रहे थे। मुझे लगा, ये लोग ‘खुशी’ ‘ऑनलाइन’ खरीदना जानते थे, भले ही वो ‘वर्चुअल’ ही क्यों न हो। हैदराबाद आते ही हम लोगों ने जब विदा ली तो लगा, जैसे बरसों के ‘कनेक्शन’ अब ‘डिस्कनेक्ट’ हो रहे हों। मुझे लगा, इस देश में लोग जितनी जल्दी ‘फ़ॉलो’ कर लेते हैं, उतनी ही जल्दी ‘अन-फ़ॉलो’ भी कर देते हैं। वे जहाँ बैठे थे, वह स्थान एक ‘वाईफ़ाई ज़ोन’ की दूरी पर था। कम-से-कम आज उन्हें मेरे दिए गए ‘यूपीआई’ से भोजन मिलेगा, यह सोचकर मुझे अत्यंत संतोष हो रहा था। मुझे लगा, मेरी ‘डिजिटल नेकी’ कुछ देर के लिए तो जिंदा हो गई थी।
सामने से ‘बिखरे पिक्सल’ सहित रोती हुई एक युवती दौड़ती हुई आई। मेरे सामने खड़ी होकर मुझे ‘बग’ की तरह घूरने लगी। मैंने भी उसकी ओर देखा। उन आँखों से छलकती ‘एरर’। वह वही ‘कंटेंट क्रिएटर’ थी। ‘सर, क्या आपने मेरे ‘अकाउंट’ को देखा? मेरे ‘चैनल’ को देखा?’ ‘तुम्हारा ‘अकाउंट’! वही जो ‘डिलीटेड’ था?’ ‘हाँ, वही… उसे कोई ‘हैक’ कर ले गया।’ मेरे मुंह से निकला, ‘वह कहीं नहीं जाएगा। डरो मत, तुम्हारा पति कहाँ है? चलो ‘साइबर सेल’ में रिपोर्ट दर्ज कर देते हैं।’ उसे समझाते हुए मैं उसके साथ उसके ‘आईपी एड्रेस’ की ओर चल पड़ा। रात के आठ बज चुके थे। कोई और ‘सॉफ़्टवेयर’ नहीं था, सो मैंने ‘अधिक दाम’ में बिकने वाले ‘विदेशी वीपीएन’ से ही ‘कनेक्शन’ खरीदा और उसी ‘डार्क वेब’ के रास्ते उसके घर आया। वहाँ उसका पति ‘हार्ड डिस्क’ पर हाथ रखे अत्यंत शोचनीय अवस्था में बैठा था। वह मुझे ‘ब्लू स्क्रीन ऑफ़ डेथ’ की भांति देखने लगा। ‘यहां इनके पास ‘चैनल’ छोड़ ‘क्लाउड स्टोरेज’ लाने गई थी। लौटी तो देखा वह गायब है।’ उसने कहा। उसके बाद वह मेरे सामने नहीं ठहरी। ‘माउस’ और ‘कीबोर्ड’ को पीटती हुई पुकारती… ‘मेरा ‘वायरल’ बेटा, तू कहाँ गया… हा… चिल्लाती ‘फ़िशिंग साइट्स’ के बीच ‘गली’ में चली गई। आने-जाने वालों में जिसका ‘अकाउंट’ ‘रिकवर’ होता, उससे ‘जिरह’ करती। रुदन और क्रंदन बढ़ता ही जा रहा था। ‘चलो ‘साइबर सेल’ में रिपोर्ट दर्ज कर दें।’ मैंने उसके पति से कहा। ‘मैंने सब जगह ‘स्कैन’ कर लिया है। ‘पुलिस’ को भी ‘कम्पलेन’ कर दी है।’ पाँच मिनट वहाँ रुककर मैं घर की ओर बढ़ने लगा। कितने सालों की ‘नेटवर्किंग’ के बाद ‘फॉलोअर’ प्राप्त हुआ था। अब कहाँ ‘गायब’ हो गया?’ घर में जब मेरी पत्नी ‘टैब’ में बेटे को उठाए मेरे पास आई तो मुझे ‘डेटा लॉस’ हुए उस बच्चे और ‘तड़पती मदरबोर्ड’ की याद हो आई। बच्चे को लेकर मैंने ‘ज़ूम’ किया। दो दिन गुजर गए। ‘ऐप डेवलपर’ बाहर से आवाज दे रहा था। मैं ‘ऐप डेवलपर’ को आवाज लगाता हुआ बाहर आया। ‘ऐप डेवलपर’ और कोई नहीं, सेलम का वही ‘टेक-वर्कर’ था। उसने अच्छे-अच्छे ‘ऐप्स’ ‘प्ले स्टोर’ में सजा रखे थे। ‘प्ले स्टोर’ को ‘लैपटॉप’ नुमा स्थान पर रख मैं ‘ऐप’ चुनने लगा। उसके होंठ काँपे, आँखें भर आई। ‘अकाउंट मिला?’ मैंने पूछा। ‘वह नहीं मिलेगा।’ ‘क्यों नहीं मिलेगा?’ ‘अकाउंट ‘हैक’ नहीं हुआ है, उसे इस पापी ने पचास ‘डॉलर’ में बेच दिया है।’ ‘बच्चे को बेचा है तुमने…’ वह ‘लैपटॉप’ पर बैठ आँखें पोंछता हुआ बोला, ‘बच्चे को बचाने के लिए यह ‘ऑफ़लाइन’ रहकर प्राण देने को तैयार थी। जो कुछ ‘डिजिटल कंटेंट’ मिलता बेटे को दे देती। इतना देने के बाद भी बच्चे का ‘डेटा’ नहीं भरता था साब…’ ‘तो?’ ‘तो कमाई का और कोई ‘लूपहोल’ नहीं सूझा।’ ‘बाहर से आए एक ‘डार्क वेब किंग’ ने बच्चे को माँगा। अच्छी ‘प्रोफ़ाइल’ बनाने का वादा किया। सबकी भलाई इसी में है, ऐसा सोचकर मैंने ‘अकाउंट’ बेच दिया। मेरी पत्नी को इस बात की जानकारी नहीं है।’ मैंने उच्छ्वास ली। ‘इस पापी ने इन्हीं ‘क्लिक्स’ से बच्चे को बेचा है। उन्हीं रुपयों से ‘ऐप डेवलपमेंट’ कर रहा हूँ। हर रोज़ दो-चार ‘डॉलर’ मिल जाते हैं। पत्नी से कह दिया है कि ‘फंडिंग’ करने के लिए आपने पैसे दिए हैं। बच्चे को बेचने की बात का पता चले तो पगली ‘सिस्टम क्रैश’ कर देगी।’ ‘तुम्हारा ‘नैतिक एल्गोरिदम’ कैसे हुआ…? ‘साइबराबाद’ से ‘फंडिंग’ माँगकर इस ‘अकाउंट’ को तुमने पाया था?’ मैंने कहा। मेरी बात सुनकर वह सिर्फ एक लंबी ‘बफरिंग’ लेता रहा, जैसे उस ‘लोडिंग’ में उस बच्चे की हर एक ‘क्लिक’, उस माँ का हर एक ‘आँसू’ और उस पिता की हर एक ‘एरर’ समा गई हो। मुझे लगा, इस दुनिया में ‘डिजिटल डिवाइड’ से बड़ा कोई ‘वायरस’ नहीं, और ‘भूख’ से बड़ा कोई ‘साइबर अटैक’ नहीं। और अंत में, मैं सिर्फ इतना कह सका, ‘वाह रे ‘ऑनलाइन ज़िंदगी’, तेरा यह कैसा ‘बिजनेस मॉडल’, जहाँ माँ का ‘लाइक’ और पिता का ‘सब्सक्रिप्शन’ भी बिकता है।
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘उनकी गिरफ्तारी‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # 295 ☆
☆ व्यंग्य ☆ उनकी गिरफ्तारी ☆
(व्यंग्य)व्यंग्य
वे सदल-बल विवादित स्थल पर जा रहे हैं। पब्लिसिटी काफी हो चुकी है। तीन-चार दिन से अखबार लगातार यही छाप रहे हैं कि वे जा रहे हैं।
जा रहे हैं तो क्या होगा? विवादित स्थल तक तो उन्हें पहुंचने नहीं दिया जाएगा। यह उन्हें भी मालूम है। बीच में ही कहीं गिरफ्तारी की औपचारिकता हो जाएगी। गिरफ्तारी में कोई मामूली आदमी की तरह हथकड़ी तो लगनी नहीं है। ऐसे ही मोटर में बैठा कर ले जाएंगे और दूर ले जाकर छोड़ देंगे। अखबार सारी कार्रवाई छाप देंगे और वे वापस हो जाएंगे। फिर अगले करतब की तैयारी होगी।
वे जा रहे हैं। काफिला साथ है। कार धीरे-धीरे जा रही है ताकि जनता देख ले कि वे उसके हित में लड़ने जा रहे हैं। बीच-बीच के गांवों में उनके दल के कार्यकर्ताओं ने स्वागत का इन्तज़ाम किया है। लोकप्रियता के प्रमाण के लिए स्वागत ज़रूरी है। सब कुछ हमेशा की तरह सुनिश्चित है। गांव की चार छः औरतें तिलक लगाती हैं, आरती उतारती हैं, जैसे ‘लाम’ पर जा रहे हों। आठ दस आदमी ‘जिन्दाबाद जिन्दाबाद’, ‘नेताजी आगे बढ़ो, हम तुम्हारे साथ हैं’ के नारे लगाते हैं। वैसे नया कुछ नहीं है। नया यही है कि गिरती लोकप्रियता को नये सिरे से उठाना है।
विरोध का मुद्दा मिलता है तो विरोधी नेताओं को प्राण मिलते हैं। सत्ता पक्ष की गलती विरोध पक्ष की संजीवनी होती है। विरोध का मुद्दा न हो तो मंच पर किस बहाने से आयें, किस बहाने से भृकुटि तान कर गुस्से का इज़हार करें, किस बात को लेकर देश और समाज के प्रति अपना संताप व्यक्त करें? किस बात को लेकर आठ आठ आंसू रोयें?
सत्ता पक्ष ने मौका दिया है तो मौका चूकना नहीं है। राजनीति चौबीस घंटे की जागरूकता मांगती है। सावधानी हटी और लोकप्रियता घटी। जहां विरोध का मौका मिले, फौरन घंटा-घड़ियाल लेकर दौड़ो, धरना दो, प्रदर्शन करो और इस सबसे ज़रूरी यह कि भरपूर पब्लिसिटी करो। भले ही आपका चेहरा टमाटर और पेट काशीफल हो रहा है, लेकिन खाली पेट और सूखे चेहरों की बात करके लंबी आहें भरो।
तो वे जा रहे हैं। वे जानते हैं और सारा देश भी जानता है कि उन्हें घंटे दो घंटे के लिए गिरफ्तार होना है और फिर वापस होना है। मतलब यह है कि मामला सिर्फ प्रतीकात्मक है। उनकी सुरक्षा की पूरी गारंटी है। वे चोट खा जाएं तो सत्ता- पक्ष बदनाम हो जाएगा, और उन्हें सत्ता पक्ष की ज़्यादती साबित करने का एक और मौका मिलेगा। इसलिए इन्तज़ाम ऐसा है कि उन्हें कोई फूल से भी चोट न पहुंचा पाये।
वे जा रहे हैं और विवादित स्थल से पहले पुलिस वाले उनका इन्तज़ार कर रहे हैं। जिन-जिन नेताओं को अपनी लोकप्रियता की फिक्र है और जिनके सितारे गर्दिश में हैं, सब उनके साथ हैं। ऐसा मौका छोड़ने की चीज़ नहीं है।
पुलिस वालों के दिल में धुक-धुक हो रही है। वैसे वे सत्ता में नहीं हैं, लेकिन महत्वपूर्ण तो हैं ही। महत्वपूर्ण राजनीतिज्ञों की गिरफ्तारी लफड़े का काम है। ज़रा सी गुस्ताखी हो जाए तो चेले-चपाटे आसमान सिर पर उठा लेंगे। अखबारों में हंगामा करेंगे। और ऊपर वाले अफसरों पर कुछ संकट आया तो नीचे वाले इंस्पेक्टर का तबादला पक्का।
इसलिए धुकधुकी मचती है। नेताजी उनके पास पहुंचते हैं तो इंस्पेक्टर धीरे से बांह पर हाथ लगाकर मोटर की तरफ इशारा करता है, ‘उधर चलें, श्रीमान।’ नेताजी एकाध बार शहीदाना अन्दाज़ में कहते हैं, ‘नहीं, मुझे आगे जाना है।’ फिर पुलिस वालों के कष्ट का ध्यान करके गाड़ी में बैठने की कृपा करते हैं। उनका उद्देश्य पूरा हो चुका है। उनकी फौज भी थोड़ी नारेबाज़ी के बाद मोटर में सवार हो जाती है। नारेबाज़ी बराबर चालू रहती है। सबके नाम और फोटो अखबार में छपते हैं। अब विवादित स्थल पर जाकर क्या करना है?
यह देश का सौभाग्य है कि उसका हित चाहने वाले नेता बहुत हैं। बड़े नेता तो थोड़े हैं, छोटे इतने हैं कि हर झाड़ को हिलाने पर चार छः टपकेंगे। ‘होल टाइमर’ बहुत हैं। जो खुद राजनीतिज्ञ नहीं हैं वे राजनीतिज्ञों की सेवा और उनके संपर्क से अपना कल्याण कर रहे हैं और इस तरह देश का कल्याण कर रहे हैं, क्योंकि राष्ट्र का कल्याण व्यक्ति के कल्याण पर निर्भर होता है। अब हम उनकी देशभक्ति की तारीफ न करें तो यह हमारी एहसान-फरामोशी होगी।
ऐसे ही एक ‘होल टाइमर’ देश- सेवक को मैं जानता हूं। वे एक बड़े नेता के समर्पित चमचे रहे और उन्हीं के बल पर आतंक पैदा करके पूजा-अर्चना का प्रसाद प्राप्त करते रहे। फिर वे चम्मच से बढ़कर बोतल तक पहुंचे। दुर्भाग्य से उनके ‘धर्मपिता’ का पराभव हुआ और चमचे जी महल से लुढ़क कर सड़क पर आ गये। फिलहाल वे सड़क पर हैं, लेकिन क्या पता कब उन्हें फिर कोई ‘धर्मपिता’ मिल जाए और वे फिर देश सेवा करने की स्थिति में आ जाएं। राजनीतिक कब आपको उछाल दे और कब उखाड़ दे, जान पाना मुश्किल है।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका व्यंग्य – “पान खाए गैया हमार…“।)
अभी अभी # 720 ⇒ पान खाए गैया हमार श्री प्रदीप शर्मा
मैं पान नहीं खाता। मैने पान नहीं खाने की कोई कसम भी नहीं खाई। जब हमारे पास कोई कारण नहीं होता, तो हमारा एक तकिया कलाम होता है, बस यूं ही ! सबकी खाने पीने की अपनी पसंद होती है। आप किसी पर अपनी पसंद थौंप नहीं सकते। बहुत से लोग चाय नहीं पीते। वे मानते हैं, चाय उन्हें नुकसान करती है। कुछ कॉफी तो कुछ ग्रीन टी पसंद करते हैं। मुझे पान पसंद नहीं।
आयुर्वेद के हिसाब से पान न केवल भोजन को पचाता है, यह मुखशुद्धि का भी काम करता है। हमारे यहां वैसे भी चाय पान का रिवाज है। पहले चाय वाय, फिर पान वान ! सरकारी दफ्तरों में तो चाय पानी का अलग ही मतलब होता है।।
पान को ताम्बुल भी कहते हैं। लक्ष्मी पान भंडार को कहीं कहीं मैने तुलसी ताम्बुल सदन भी लिखा देखा है। सभी जानते हैं, पान एक पत्ता होता है। खाते वक्त वह मीठा पत्ता हो जाता है। सबसे पहले उसका डंठल काटा जाता है, फिर उसे करीने से तराशा जाता है। इस तरीके से पान को सजाया जाता है मानो कोई मां, अपने बच्चे को स्कूल भेजने के लिए तैयार कर रही हो। थोड़े छींटे चूने के और बाद में, कत्थे का लेप। मानो बच्चे को पहले सर में तेल लगाया हो और बाद में गर्दन और चेहरे पर पावडर। उसके बाद पान का सोलह श्रृंगार शुरू।
सुपारी के भी कई प्रकार होते हैं, चौरसिया जी जानते हैं, बाबू जी कौन सी सुपारी खाते हैं। कहां बोल्डर डालना और कहां बारीक सिकी सुपारी ! पिपरमेंट, इलायची, खोपरा, गुलकंद, केसर में कोई कसर नहीं रह जाती। पान की सतहों को तह में बंद किया जाता है, एक लौंग से उसे लॉक कर दिया जाता है, और कहीं चांदी तो कहीं सोने का बरक। और हां, किमाम वालों का खास ख़याल रखा जाता है।।
जब इतना स्वादिष्ट पान खाया, चबाया जाता है, तो फिर उसे थूका क्यों जाता है ! बस इतनी सी बात पर क्या कोई पान खाना छोड़ दे। बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद। मैने तो खैर कभी पान चखा ही नहीं। कई बार दोस्तों के पान के आग्रह को ठुकराकर उनके कोप का भाजन बन चुका हूं, फिर भी मुझे अक्ल नहीं आई। चूना, कत्था मेरी पसंद नहीं, ना सही, सादा पान भी बनता है, वह क्यों नहीं खाते ? बस, नहीं खाते तो नहीं खाते।
वा, नहीं खाते तो मत खाओ, हमें क्या।
लेकिन स्वच्छ भारत अभियान ने जब से थूकने पर पाबंदी लगा दी है, बेचारे पान वाले वैसे ही परेशान चल रहे थे, उसमें कोरोना के कारण और सर मुढ़ाते ही ओले पड़े। अजय देवगन की तो लग गई। दाने दाने में केसर का दम दिखने लगा। आदमी किसी भी गुट का, मुंह में उसके गुटका।।
आइए, अब गैया को पान खिलाते हैं ! हुआ यूं कि, ज्यादा बोलने की आदत तो मुझे है नहीं, क्यूंकि पान तो मैं खाता नहीं। अब किसी ने थोड़ी जबरदस्ती कर ली, तो हमने भी कह दिया, अच्छा बनवा ही लो। लो साहब, बीच बाजार में हमारा बढ़िया पान बनकर तैयार हो गया और हमने भी कोई कसम तो खाई नहीं थी, इसलिए धर्मसंकट में पड़ गए थे, अब क्या करें।
इतने में मानो वैकुंठ से हमारे लिए गौ माता का अवतरण हुआ ! एक गैया हमारे सामने खड़ी हमें निहार रही थी। बस हमने सोचा, आज ही गौ सेवा हो जाए, और हमारा वह पान हमने गऊ माता को पेश कर दिया। वे थोड़ी झिझकी, उन्होंने पहले हमें निहारा, फिर पान को सूंघा और फिर जब पान ने उनके मुखारविंद में प्रवेश किया, तो उनका भाव देखने लायक था। हमने दो पान और उन्हें समर्पित किए। वे संतुष्ट हो, हमें आशीर्वाद दे, वहां से प्रस्थित हुई। बोलिए गऊ माता की जय ! सब संतन की जय। पान के आनंद की जय।।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक अप्रतिम व्यंग्य – “ईश्वर की प्रोडक्ट, पैकिंग इंडस्ट्री और इंसान” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 357 ☆
व्यंग्य – ईश्वर की प्रोडक्ट, पैकिंग इंडस्ट्री और इंसान श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
ईश्वर की प्रोडक्शन और पैकिंग इंडस्ट्री वाकई अद्वितीय है, अद्भुत है, बेमिसाल है। एक छोटी सी मूंगफली देखिए ना! हर दाना गुलाबी पन्नी की चादर में लिपटा हुआ, मखमली नर्मी के साथ, ब्राउन टफ कवर में एकदम सुरक्षित। कोई खरोंच नहीं, कोई दाग नहीं। बाहर से कुरकुरा अंदर से मुलायम। पैकेजिंग पर्फेक्शन का परचम। मटर के दाने? हरी-भरी चमकदार रैपर में सजे हुए, जैसे छोटे-छोटे हरे मोती। वे भीतर से ताजगी भरे, बाहर से चमकदार। और नारियल? भला उस जैसे सख्त, भारी-भरकम उत्पाद के लिए हार्ड कवर से बेहतर क्या हो सकता है? जंगल की गर्मी, समुद्र की नमी, ऊंचे पेड़ से गिरने का झटका सब झेल लेता है वह हार्ड शैल। सचमुच, ईश्वर का हर काम समयबद्ध, व्यवस्थित और पैकेजिंग मास्टरपीस है।
फिर आता है मानव “ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना”। यहीं पर ईश्वर की उस अद्भुत पैकिंग फैक्ट्री और प्रॉडक्ट की कहानी में एक मोड़ आ जाता है। क्या वाकई मानव का पैकेजिंग जीनियस उसी स्तर का है? थोड़ा गहराई से देखने पर तस्वीर कुछ और ही बयां करती है।
सोचिए, ईश्वर की डिवाइन पैकेजिंग कंपनी में बैठे डिजाइनर्स ने मनुष्य के लिए क्या-क्या प्लान किया होगा। शायद उन्होंने सोचा होगा “चलो, इस बार कुछ बहुत खास करते हैं। सबसे कॉम्प्लेक्स मशीनरी, सबसे एडवांस्ड सॉफ्टवेयर , दिमाग, इमोशनल रेंज से लैस, क्रिएटिविटी के साथ। सुपर प्रीमियम प्रोडक्ट!” लेकिन जब पैकेजिंग की बारी आई… कहीं न कहीं कुछ चूक हो गई लगती है।
पहला सवाल तो यही उठता है ,क्या “सर्वश्रेष्ठ रचना” के लिए यह पैकेजिंग उचित है? मूंगफली को गुलाबी पन्नी मिली, मटर को हरी रैपर, नारियल को हार्ड शैल। मनुष्य को मिला क्या? एक नाजुक चमड़ी का आवरण, जो धूप से झुलस जाता है, ठंड से कांपता है, थोड़ी सी खरोंच से खून बहने लगता है। इंसान सन क्रीम , पाउडर , नाइट क्रीम खरीद कर भी परेशान है।
पीठ का डिजाइन? एक ऐसी रीढ़ की हड्डी जो सीधे खड़े होने के लिए तो बनी है, लेकिन डेस्क जॉब, भारी बैग और गलत मुद्रा के आगे बहुत जल्दी विद्रोह कर देती है स्लिप डिस्क, बैक पेन की शिकायतें आम हैं। आंखें, जो दुनिया देखने का अद्भुत साधन हैं, लेकिन उम्र के साथ या तो कमजोर पड़ जाती हैं या मोतियाबिंद की शिकार हो जाती हैं, बिना चश्मे या लेजर सर्जरी के काम नहीं करतीं। क्या यह वही परफेक्ट पैकेजिंग है जो मूंगफली के दाने को मिली? दो दो किडनी की लक्जरी पर फिर भी डायलिसिस का झंझट।
और फिर फंक्शनल डिफेक्ट्स। एपेंडिक्स एक ऐसा अंग जिसका कोई ज्ञात काम नहीं, लेकिन जब चाहे फटकर जानलेवा बन जाता है। दांतों की कहानी? बचपन में दूध के दांत गिरते हैं, फिर परमानेंट आते हैं जो जीवन भर चलने चाहिए, लेकिन चीनी, एसिड और बैक्टीरिया के आगे बहुत जल्दी घुटने टेक देते हैं, बिना डेंटिस्ट के बचाव असंभव। घुटने और कूल्हे के जोड़ चलने-फिरने की मूलभूत आवश्यकता के लिए पर कितनी आसानी से घिस जाते हैं, रिप्लेसमेंट सर्जरी की मांग करते हैं। क्या ईश्वर की पैकिंग लाइन पर कोई क्वालिटी चेक नहीं होता था इन “सर्वश्रेष्ठ मॉडल्स” के लिए?
सबसे बड़ी पैकेजिंग चूक तो मेंटल हार्डवेयर के साथ लगती है। ईश्वर ने अद्भुत दिमाग दिया, सोचने-समझने, रचनात्मकता, प्रेम करने की अद्भुत क्षमता। लेकिन साथ ही साथ, इसमें डिप्रेशन, एंग्जाइटी, फोबिया, जैसे “सॉफ्टवेयर बग्स” क्यों पैक कर दिए? क्या ये वो गुलाबी पन्नी या हार्ड शैल के बराबर की सुरक्षा है जो अन्य उत्पादों को मिली? एक मूंगफली का दाना अपनी पैकेजिंग में सुरक्षित और खुश रहता है। मनुष्य अक्सर अपने ही दिमाग के भीतर कैद और पीड़ित महसूस करता है। क्या यही था “सर्वश्रेष्ठ” का मापदंड?
और हां, सबसे बड़ा मिसिंग आइटम, इस्तेमाल करने का निर्देश , यूजर मैनुअल। नारियल के हार्ड कवर को तोड़ने के तरीके तो लोग जानते हैं। मटर को रैपर से निकालना आसान है। मूंगफली की पन्नी उतारने में कौन सी बुद्धिमानी लगती है? पर मनुष्य? उसे कोई क्लियर मैनुअल नहीं मिला। कैसे जियें? कैसे तनाव मैनेज करें? कैसे दूसरों के साथ रहें? कैसे इस जटिल मशीन शरीर और मन की देखभाल करें? इसकी जगह हमें धर्म, दर्शन, विज्ञान और ट्रायल-एंड-एरर के भरोसे छोड़ दिया गया। नतीजा? भारी भ्रम, संघर्ष और गलतियां। क्या यह उस परफेक्ट पैकिंग इंडस्ट्री की शान के अनुरूप है?
तो क्या निष्कर्ष निकालें? क्या ईश्वर की पैकिंग इंडस्ट्री मनुष्य के मामले में फेल हो गई? या फिर यह एक जानबूझकर किया गया एक्सपेरिमेंट था? शायद “सर्वश्रेष्ठ रचना” का मतलब यह नहीं कि वह सबसे परफेक्टली पैक्ड है, बल्कि यह कि उसमें खुद को ठीक करने, सीखने, अनुकूलित होने और अपनी पैकेजिंग की कमियों को पूरा करने की अद्भुत क्षमता दी गई है? हम चश्मा लगाते हैं, घुटने बदलवाते हैं, थेरेपी करते हैं, ज्ञान अर्जित करते हैं। शायद मानव की असली “सर्वश्रेष्ठता” उसकी अपूर्ण पैकेजिंग के बावजूद या शायद उसी की वजह से खुद को सुधारने, संवारने और जीवन की चुनौतियों से लड़ने की अदम्य क्षमता में निहित है। मूंगफली सिर्फ खाई जा सकती है, मनुष्य खुद अपनी पैकेजिंग को री-डिजाइन करने का प्रयास करता रहता है। यही शायद उसकी सच्ची महानता है। ईश्वर की प्रोडक्शन, पैकिंग में एक जानबूझकर छोड़ा गया, रहस्यमय और चुनौतीपूर्ण, लेकिन संभावनाओं से भरा अधूरापन। बाकी सब तो बस पन्नी और रैपर का खेल है! डोंट जज एनी थिंग ऑन बेसिस ऑफ कवर ओनली।