हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # 54 – हाय रे तिलचट्टा ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार, बाल साहित्य लेखक, और कवि हैं। उन्होंने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज, और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने, और समन्वय करने में महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनके ऑनलाइन संपादन में आचार्य रामचंद्र शुक्ला के कामों के ऑनलाइन संस्करणों का संपादन शामिल है। व्यंग्यकार डॉ. सुरेश कुमार मिश्र ने शिक्षक की मौत पर साहित्य आजतक चैनल पर आठ लाख से अधिक पढ़े, देखे और सुने गई प्रसिद्ध व्यंग्यकार के रूप में अपनी पहचान स्थापित की है। तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (तेलंगाना, भारत, के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से), व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान (आदरणीय सूर्यबाला जी, प्रेम जनमेजय जी, प्रताप सहगल जी, कमल किशोर गोयनका जी के करकमलों से), साहित्य सृजन सम्मान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करकमलों से और अन्य कई महत्वपूर्ण प्रतिष्ठात्मक सम्मान प्राप्त हुए हैं।

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य रचना हाय रे तिलचट्टा)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # 54 – हाय रे तिलचट्टा ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

कभी-कभी जिंदगी कुछ ऐसी घटनाएँ हमारे सिर पर पटक देती है, जैसे कोई छुट्टी की सुबह, बिना अलार्म के उठा दे। घटना छोटी होती है, पर प्रतिक्रिया में पूरी पंचायत बैठ जाती है — जैसे पकोड़े में मिर्च ज्यादा पड़ गई हो। ये कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जहां एक निरीह से तिलचट्टे ने पूरे दफ्तर को वह नचाया जैसे चुनावी मौसम में वादा। चाय की प्याली से उठती भाप जितनी गरम नहीं थी, उतनी गरमी उस तिलचट्टे की फड़फड़ाहट ने फैलाई।

सुबह का समय था, टिफ़िन में पराठे थे, मन में प्रमोशन की आशा थी, और एक साथी की आँखों में किसी की शादी का ख्वाब था — तभी वह आया। नहीं नहीं, कोई अफसर नहीं… एक तिलचट्टा। जैसे ही वो उड़ा और एक महिला कर्मचारी की बाँह पर उतरा, तो लगा जैसे कोई डॉन ने हेलीकॉप्टर से एंट्री मारी हो। “आईईईईईईई…” एक चीख फूटी, ऐसी कि लग रहा था प्रेमचंद की कहानियों का दुख किसी टी-सीरीज़ की बैकग्राउंड स्कोर में बदल गया हो। कॉफी गिरी, बिस्कुट बिखरे, और एक कर्मचारी तो झोंपड़ी समझकर टेबल के नीचे छिप गया।

तिलचट्टा भी शायद चुनावी नेता था। एक बार में एक जगह नहीं रुकता। कूदता रहा — एक कुर्सी से दूसरी कुर्सी, एक मन से दूसरे मन में डर बोता रहा। पूरा ऑफिस रणभूमि बन चुका था। कोई झाड़ू ढूँढ रहा था, कोई वाइपर, और एक सज्जन तो चप्पल उतारकर  — “मारो सालो को…!” मगर साहस नाम की चीज़, वही थी जो पेंडिंग फाइल की तरह सबके दिलों में थी — दबा, बुझा और बेसुध।

उसी समय, प्रकट हुए मैनेजर साहब। बाल खिचड़ी, चाल धीमी, और चेहरा ऐसा शांत कि जैसे सब्जी में नमक कम हो फिर भी कहें — “ठीक है।” उन्होंने तिलचट्टे को देखा, जैसे डॉक्टर मरीज की एक्स-रे रिपोर्ट पढ़ता है। फिर बड़े आराम से पेपर कप से उसे फुसला कर उठाया और खिड़की से बाहर उछाल दिया। कमरे में शांति फैल गई — जैसे अचानक फिल्म में बैकग्राउंड म्यूज़िक बंद हो गया हो। लोगों ने राहत की साँस ली, कुछ ने ताली भी बजाई। लेकिन…

…शांति ज्यादा देर टिकती कहाँ है, ख़ासकर उस जगह जहां व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के ग्रेजुएट हों। एक दम आवाज़ उठी — “क्यों फेंका बाहर?” फिर दूसरा स्वर — “बिचारा जीवित था…!” एक और आवाज़ — “उसे पार्क में छोड़ सकते थे, पौधों के बीच, उसकी बस्ती में।” अचानक, जिसे नायक समझा गया था, वो खलनायक बन गया। तिलचट्टे के प्रति सहानुभूति बहने लगी, और मैनेजर पर आरोपों की बौछार। ये वही लोग थे जो पाँच मिनट पहले कुर्सी पर खड़े होकर चिल्ला रहे थे — “मार दो! बचाओ! मेरी चाय गिर गई!”

हमने सुना था कि लोकतंत्र में हर किसी को बोलने का अधिकार है। पर ये किसने कहा था कि हर बात में विरोध का ठेका भी लेना है? ऑफिस की ‘लीडरशिप कमेटी’ एक्टिव हो गई — जिसमें तीन ‘टी पार्टी’ सदस्य, दो ‘दूसरे की टाँग खींचो’ विशेषज्ञ और एक ‘कभी काम ना करने की शपथ’ ले चुका कर्मचारी शामिल थे। मीटिंग हुई — “तिलचट्टा भी तो भगवान की रचना है!” और वही लोग जिन्होंने “चप्पल से मारो इस कीड़े को!” कहा था, अब “जीवन का सम्मान करना चाहिए!” के पोस्टर बना रहे थे।

बात मैनेजर के ‘रवैये’ पर आई। “बहुत रूखे हैं,” “संवेदनशील नहीं,” “हमारे ऑफिस का माहौल बहुत टॉक्सिक हो गया है।” एक ‘सेंसिटिव बॉस’ चाहिए — ऐसा जो पहले तिलचट्टे से पूछे कि “तुम्हें कोई समस्या है?” फिर उसे कॉफी ऑफर करे, उसकी काउंसलिंग कराए, और फिर उसे हंसते-हंसते बाहर भेजे। मैनेजर साहब को मेमो मिला, “आपने पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता नहीं दिखाई।” अगली मीटिंग में तय हुआ — अगली बार तिलचट्टा आए, तो एक ‘इन्क्लूसिव स्पेस’ बनाया जाएगा — जिसमें वो “कम्फर्टेबल” महसूस करे।

दफ्तर में एक दीवार पर पोस्टर लगाया गया — “हर जीवन है अनमोल। फिर चाहे वह तिलचट्टे का ही क्यों न हो” और नीचे छोटा सा कैप्शन: “आचार से नहीं विचार से काम लें” पोस्टर के नीचे वही लोग सेल्फी ले रहे थे जो दो दिन पहले तिलचट्टे के खात्मे पर ‘थैंक यू मैनेजर सर’ वाला स्टेटस डाले थे। और मैनेजर? वही पुराने डेस्क पर बैठे, ग्रीन टी पीते, किसी इनकम टैक्स फाइल को घूरते रहे — जैसे उसमें भी कोई कॉकरोच छुपा हो।

असल में तिलचट्टा कभी समस्या नहीं था। समस्या तो इंसानी दिमाग है — जो डरते वक्त चिल्लाता है, और सुरक्षित होने पर इल्ज़ाम लगाता है। आदमी को राहत चाहिए, लेकिन उसका तरीका नहीं पसंद। सब चाहते हैं कोई आगे बढ़े, लेकिन जैसे ही कोई बढ़ता है, सबकी उँगली उसी की पीठ पर होती है — “तू क्यों बढ़ा?” और नेतृत्व का बोझ वही समझ सकता है, जिसने कभी सच्चे मन से झाड़ू पकड़ी हो।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # 7 – हास्य-व्यंग्य – “विदेशी तोता और देशी मेम” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  विदेशी तोता और देशी मेम)

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # 7

☆ व्यंग्य ☆ “विदेशी तोता और देशी मेम” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

कहते हैं कानून अंधा होता है। जैसे न्याय की देवी की आंखों में पट्टी बंधी रहती है उसी तरह प्रेम में पड़े व्यक्ति की आँखों पर भी प्रेम की पट्टी चढ़ जाती है। उसे कुछ दिखाई नहीं देता, अच्छा-बुरा समझने की शक्ति समाप्त हो जाती है। इसलिये तो कहा गया है कि “दिल लगा गधी से तो परी किस काम की”। इस मामले में एक फिल्मी गाना बिल्कुल सही मालुम होता है- “दिल तो है दिल, दिल का एतबार क्या कीजे। हो गया है किसी से प्यार क्या कीजे।”

अब देखिए न कितने उदाहरण सामने हैं-एक से एक खूबसूरत पढ़ी लिखी मैडमें अपने पतियों से ज्यादा प्यार अपने कुत्तों-बिल्लियों से करती हैं। उन्हें अपनी छाती से चिपकाए घूमती हैं। प्रेम का एक ऐसा ही मामला हाल ही में सामने आया है। किसी शहर के बड़े हार्ट सर्जन की डॉ पत्नी का तोता लापता हो गया है। तोते के गम में पत्नी ने खाना-पीना छोड़ दिया है। अब चूंकि “दिल का हाल सुने दिल वाला”, दिल के डॉक्टर ने तोता प्रेम में डूबी अपनी पत्नी के दिल की नाजुक स्थिति भांप ली। उन्होंने अखबार के फ्रंट पेज पर तोता गुमने का विज्ञापन छपवाया, पोस्टर-पैम्फलेट बंटवाये, तोता ढूंढ कर लाने वाले के लिये एक लाख रुपये इनाम की घोषणा कर डाली। बताया गया कि डॉक्टर ने अपनी पत्नी के लिये ग्रे कलर के दो अफ्रीकन तोते 80 हजार रुपये में खरीदे थे जिनमें से कोको नाम के तोते को जब डॉक्टर की पत्नी सेव खिला रही थी तब वो उसके प्रेम को ठुकरा कर उसे विरह की अग्नि में जलता छोड़कर उड़ गया। डॉक्टर की पत्नी रो-रो कर बेहाल है “तुम न जाने किस जहाँ में खो गए, हम भारी दुनिया में तन्हा हो गए।” क्षेत्र में बात का बतंगड़ बन रहा है। डॉक्टर साहब परेशान हैं कि यदि तोता न मिला तो वे प्यार में तारे तोड़ कर लाने वालों से भरे इस संसार में अपनी इज्जत कैसे बचाएंगे ? इस समय पूरे शहरवासी एक लाख रुपये इनाम के चक्कर में तोता ढूंढने में लगे हैं। तोता मिले न मिले लेकिन यह तोता अनेक प्रश्न छोड़ गया है।

देश में कुछ दुधारू व अन्य चंद पशु-पक्षियों के अतिरिक्त सभी की खरीद-फरोख्त और उन्हें बंदी बना कर रखने, उनसे काम लेने पर सख्त रोक है। देश में पक्षी बाजार तो अब देखने ही नहीं मिलते। यदि कोई पक्षी बेचता हुआ दिख जाता है तो सरकारी विभाग के पहले जागरूक नागरिक ही उसे घेर कर पक्षियों को आजाद कर देते हैं। इसी कानून के चलते नागपंचमी उत्सव समाप्ति पर है। पशु-पक्षी कलाकारों से विहीन होकर सर्कस लगभग बंद हो चुके हैं। हाँ, इस कानून से नगरों, गांवों में आवारा कुत्तों-सुअरों की संख्या जरूर बढ़ती जा रही है। खैर, सवाल उठता है कि डॉक्टर अस्सी हजार रुपये के अफ्रीकन तोते कहाँ से ले आए ? क्या उन्होंने इन्हें खरीदने और पालने की अनुमति ली थी ? जरा सोचिए जो डॉक्टर अस्सी हजार के तोते ले सकता है और एक तोते को खोजने के लिये एक लाख रुपये का इनाम दे सकता है उसके पास कितना माल होगा ? इस तोता मालिक हार्ट सर्जन ने न सिर्फ अपनी वरन तमाम स्वास्थ्य के सौदागर डॉक्टरों की आर्थिक हैसियत देश के सामने उजागर कर दी है। शायद तोता पालक डॉक्टर और डाक्टरनी यह नहीं जानते कि तोता, कबूतर या तीतर जैसा विश्वसनीय नहीं होता और फिर उनका तोता तो विदेशी नस्ल का था। आम धारणा और विश्वास है कि विदेशी नस्ल भले ही अच्छी दिखे पर विश्वसनीय नहीं होती। पशुओं की बात तो छोड़ें, देश में तो जब-तब विदेशी नस्ल के लोगों तक पर विश्वसनीयता और समर्पण संबंधी प्रश्न उठते रहते हैं यहां तक कि विदेशी से देशी नस्ल के क्रॉस पर भी देशवासियों को भरोसा नहीं है। अब जब समाचार पत्रों के माध्यम से डॉक्टर का तोता और उसकी आर्थिक स्थिति सार्वजनिक हो चुकी है तब अवश्य ही इस पर पशु-पक्षी सुरक्षा-संरक्षण विभाग और इनकम टैक्स विभाग का ध्यान भी आकर्षित हुआ होगा। यह बात अलग है कि ये सरकारी विभाग सकारण अथवा अकारण मौन रहें। हमारे देश में कुछ भी असंभव नहीं।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # 291 ☆ व्यंग्य – गांधी बाबा का रास्ता ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय व्यंग्य – ‘गांधी बाबा का रास्ता‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 291 ☆

☆ व्यंग्य ☆ गांधी बाबा का रास्ता ☆ डॉ. कुन्दन सिंह परिहार ☆

गांधी मैदान में गहमागहमी है। छात्रों का झुंड चार  पांच दिन से धरने पर बैठा है, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही है। छात्र हंगामा नहीं करते, बस बैठे बैठे नारे लगाते रहते हैं या रामधुन गाते हैं। हाथों में अपनी मांगों के प्लेकार्ड लिये हैं।

छात्रों की शिकायतें अनेक हैं। बार-बार नौकरी की परीक्षा के पेपर लीक होते हैं, पद खाली होने पर भी अनेक वर्षों तक वे विज्ञापित नहीं होते। भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद का बोलबाला है। ज़्यादा हंगामा करने पर शासन की लाठी चलने लगती है। हाथ-पांव टूटने और जेल जाने की नौबत आ जाती है। इसीलिए छात्र शान् जोतिपूर्वक धरना दे रहे हैं।

तीस  चालीस पुलिसवाले उन पर नज़र रखें शेड में बैठे हैं। वे परेशान हैं। कब तक इन पर नज़र रखें? किसी तरह समस्या का निपटारा हो और धरना टूटे। शेड के नीचे बैठे बैठे झपकियां लेते हैं। छात्रों पर गुस्सा आता है। पता नहीं कब तक यहां फंसे रहेंगे।

दो तीन परेशान पुलिसवाले छात्रों के पास आकर खड़े हो गये हैं। एक कहता है, ‘यह कौन सा तरीका है? कुछ उपद्रव करो तो सुनवाई हो। वो एक शायर ने लिखा है, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो। ऐसे बैठे रहने से क्या फायदा?’

छात्र जवाब देता है, ‘हम गांधी के शान्तिपूर्ण विरोध और अहिंसा के रास्ते पर चल रहे हैं।’

पुलिसवाला कहता है, ‘गांधी जी यही सब ऊटपटांग बातें सिखा गये हैं। ऐसे बैठे रहने से कोई नहीं सुनने वाला। खुद भगवान राम कह गये हैं कि बिना भय पैदा किये प्रीत नहीं होती। कुछ हल्ला- गुल्ला करो तो बड़ों के कान तक बात पहुंचे।’

छात्र कहता है, ‘हम सब समझते हैं। तुम चाहते हो कि हम उपद्रव करें और तुम्हें लाठी भांज कर हमें खदेड़ने का मौका मिले। हम तुम्हारे जाल में नहीं फंसने वाले।’

पुलिसवाले मुंह बनाये वहां से विदा हो गये।

दो-तीन दिन और ऐसे ही निकल गये। पुलिसवालों का धैर्य चुकने लगा। अचानक एक रात एक समूह कहीं से प्रकट हुआ और पुलिस की तरफ पत्थरबाज़ी शुरू हो गयी। पुलिस तत्काल हरकत में आयी और वॉकी-टॉकी पर फटाफट संदेशों का आदान-प्रदान होने लगा। पत्थर फेंकने वालों का समूह रहस्यमय ढंग से ग़यब हो गया।

ऊपर से आदेश मिलते ही पुलिस वाले लाठियां लेकर छात्रों की तरफ दौड़े और जल्दी ही  वहां अफरातफरी मच गयी। छात्रों को दूर तक खदेड़ दिया गया और मैदान खाली हो गया।

छात्रों से बात करने वाले पुलिसवाले अब आपस में वार्तालाप कर रहे थे— ‘हमने समझाया था, लेकिन समझ में नहीं आया। अब गांधी बाबा के रास्ते पर चलना है तो गांधी बाबा की तरह भोगो।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 696 ⇒ व्यंग्य – पंचनामा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका व्यंग्य – “पंचनामा।)

?अभी अभी # 696 ⇒ व्यंग्य – पंचनामा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

 न जाने क्यों, पंच से मुंशी प्रेमचंद की कहानी पंच परमेश्वर याद आ जाती है। परमेश्वर तो एक होता है, लेकिन जब पाँच सयाने एक जगह इकट्ठा हो जाते हैं, तो वे परमेश्वर ही तो कहलाते हैं। पंच विक्रमादित्य की तरह पंचायत में न्याय तो करते ही हैं, दोषी को दंड भी सुनाते हैं। न्याय का हथौड़ा जब प्रहार करता है, तब वह भी एक तरह का punch ही तो होता है।

पुलिस बरामद सामग्री का पंचनामा बनाती है। कुछ गवाहों के सामने वस्तुओं को सील कर दिया जाता है और एक दस्तावेज तैयार किया जाता है, जिस पर सभी के हस्ताक्षर होते हैं। बैंकों में लॉकर भी सील किए जाते हैं और अदालत बजावरी भी चस्पा करती है। एक महान मुक्केबाज मोहम्मद अली भी हुए थे, जिनका पंच, विरोधी मुक्केबाज को दिन में तारे दिखला देता था।।

कार्टून और व्यंग्य सृजन की ऐसी विधा है, जिसमें punch का प्रयोग किया जाता है। Punch तत्कालीन व्यवस्था एवं विसंगति पर एक ऐसा करारा तमाचा है कि जिसका न तो बचाव संभव है और न ही प्रतिकार। तानाशाहों को इस प्रहार की आदत नहीं होती इसलिए अक्सर अभिव्यक्ति की आज़ादी के इन पंचों पर उनकी सदा वक्र दृष्टि ही रहती चली आई है। कई बार इन पंचों का ही पंचनामा बना दिया जाता है और उन्हें सेंसर यानी प्रतिबंधित कर दिया जाता है।

कलम तलवार से अधिक खतरनाक होती है। इसका जितनी बार सर कलम करो, यह उतनी ही पैनी होती चली जाती है। कार्टून और व्यंग्य में अगर पंच ना हो वह किसी बिना तड़के वाली फीकी दाल से कम नहीं।

इंग्लैंड से प्रकाशित कार्टून मैग्जीन punch अपने १५१ वर्ष पूर्ण कर सन् १९९२ में आख़िरी सांसें लेने को मजबूर हो गई। वे लोग भाग्यशाली रहे जिन्होंने अंग्रेजी में प्रकाशित पत्रिका Shankar’s Weekly का आनंद लिया। हिंदी में भी शंकर्स वीकली का कुछ समय के लिए प्रकाशन हुआ, लेकिन इसका भी बेड लक खराब ही निकला।

टाइम्स ऑफ इंडिया में आर.के.लक्ष्मण लगातार कई वर्षों तक व्यवस्था की परवाह किए बगैर अपने तीखे, करारे और तिलमिलाते कार्टून परोसते रहे। व्यवस्था को जनता से उतना खतरा नहीं होता जितना प्रिंट मीडिया से होता है। एक आपातकाल ने ऐसा सबक सिखाया, सब लाइन पर आ गए। आज न आर.के.लक्ष्मण का कॉमन मैन है और न ही धर्मयुग के कार्टून कोने में ढब्बू जी। बस व्यंग्य और कार्टून के नाम पर लालू, पप्पू और ममता से ही काम चला लो। साफ सुथरे, शालीन व्यंग्य और कार्टून जो आप घर में बच्चों के साथ भी देख सकें।।

एक चेन्नई के पत्रकार, कार्टूनिस्ट चो रामास्वामी हुए थे और एक मुंबई के शिवाजी बाल ठाकरे, जो राजनीति के घिघौने चरित्र पर प्रहार ही नहीं करते थे, उसका डटकर सामना भी करते थे और आज हालत देखिए, उनके ही ऊधो पर लोग कार्टून बना रहे हैं।

व्यंग्य और कार्टून की खेती के लिए भूमि का उर्वरा होना भी जरूरी है। श्रीलाल शुक्ल कांग्रेस के जमाने में शिवपालगंज ढूंढ पाए, तो राग दरबारी का सृजन संभव हुआ, आर.के.लक्ष्मण के समय में नेहरू और इंदिरा जैसे चरित्र थे, जिनके चेहरे को देख, कम से कम कूची तो चलाई ही जा सकती थी। आज सभी साफ सुथरे, कमल से कोमल, निष्पाप, निष्कलंक चेहरों पर क्या कार्टून बनाए जाएं और क्या सत्तासीन पर व्यंग्य लिखा जाए। बड़ा धर्मसंकट है। डर है, कहीं कार्टून और व्यंग्य जैसी विधा का पंचनामा ही ना बनाना पड़ जाए …!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # 53 – क्लिक करो, आह भरो ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार, बाल साहित्य लेखक, और कवि हैं। उन्होंने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज, और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने, और समन्वय करने में महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनके ऑनलाइन संपादन में आचार्य रामचंद्र शुक्ला के कामों के ऑनलाइन संस्करणों का संपादन शामिल है। व्यंग्यकार डॉ. सुरेश कुमार मिश्र ने शिक्षक की मौत पर साहित्य आजतक चैनल पर आठ लाख से अधिक पढ़े, देखे और सुने गई प्रसिद्ध व्यंग्यकार के रूप में अपनी पहचान स्थापित की है। तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (तेलंगाना, भारत, के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से), व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान (आदरणीय सूर्यबाला जी, प्रेम जनमेजय जी, प्रताप सहगल जी, कमल किशोर गोयनका जी के करकमलों से), साहित्य सृजन सम्मान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करकमलों से और अन्य कई महत्वपूर्ण प्रतिष्ठात्मक सम्मान प्राप्त हुए हैं।

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य रचना क्लिक करो, आह भरो)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # 53 – क्लिक करो, आह भरो ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

गाँव के चौराहे पर डिजिटल इंडिया का रंगीन होर्डिंग लगा था – “हर हाथ में मोबाइल, हर जेब में इंटरनेट।” बगल में खड़ा रामलाल, जो अब तक मोबाइल को टार्च और गाना सुनने की मशीन समझता था, ठिठक गया। उसे लगा जैसे कोई अलौकिक बात कह दी गई हो। उसके मन में सवाल उमड़ पड़ा – “ये इंटरनेट का कीड़ा कहाँ से पकड़ते हैं, मास्टरजी?” मास्टरजी मुस्कराए और बोले, “अब सबकुछ ऑनलाइन है, रामलाल। खेत, खलिहान, राशन, विवाह, मृत्यु प्रमाण पत्र… सब मोबाइल में समा गया है।” रामलाल ने अपने पुराने कीपैड वाले मोबाइल को देखा और बोला, “हमारे मोबाइल में तो बस सिग्नल ही नहीं आता, इंटरनेट कहाँ से आएगा?” चौराहे की चाय की दुकान पर बैठे लोग हँस पड़े।

रामलाल ने निर्णय लिया – अब उसका बेटा डिजिटल बनेगा। उसे शहर भेजा कि कुछ सीखे, कुछ कमाए। बेटे ने एक साल में कंप्यूटर सीखा, ऑनलाइन फॉर्म भरना सीखा, ‘माउस’ को हाथी का बच्चा समझना छोड़ दिया। गाँव लौटा तो साथ में था एक लैपटॉप, जो खुद ही चार्ज माँगता रहता था। गाँव में न बिजली, न नेट। जैसे ही खेत में बैठकर उसने किसान योजना का ऑनलाइन फॉर्म भरा, वेबसाइट ने लिखा – “सर्वर डाउन है। कृपया पुनः प्रयास करें।” रामलाल बोला, “बेटा, ये सर्वर कौन सी फसल है जो हर बार सूखा मारता है?” बेटे ने सिर पकड़ लिया। गाँव में पहली बार डिजिटल शब्द को लोग अपशब्द की तरह लेने लगे।

गाँव में एक दिन सरकारी जीप आई, डेक से बजता था – “डिजिटल साक्षरता अभियान में भाग लें।” सबको लगा कि अब सचमुच जादू होगा। सचिव जी बोले, “अब जमीन के काग़ज़ भी मोबाइल में होंगे।” रामलाल बोला, “जब जमीन में पानी नहीं, तो मोबाइल में काग़ज़ रखके क्या हल जोतूंगा?” अधिकारी बोला, “अब ऑनलाइन आवेदन करना होगा।” एक बुजुर्ग बोले, “बेटा, पहले ये बता दो कि आवेदन की बोरी कहाँ मिलती है?” अधिकारी मुस्करा कर बोला, “बोरी नहीं, वेबसाइट होती है।” भीड़ में खुसर-पुसर शुरू हुई – “लगता है अब खेती भी बिना हल के होगी, सब मोबाइल से।” डिजिटल इंडिया गाँव में आ गया था, पर गाँव डिजिटल नहीं हो पाया।

रामलाल के मोबाइल पर एक दिन संदेश आया – “आपके खाते में ₹6000 की सब्सिडी जमा हुई है।” खुशी के मारे बैंक भागा। बैंक ने कहा – “आपका खाता आधार से लिंक नहीं है।” रामलाल ने पूछा – “आधार कौन सी गाय है जो बैंक में दूध नहीं देती?” उसे आधार कार्ड बनवाने भेजा गया, पर केंद्र की मशीनें ‘नेटवर्क इश्यू’ में थी। तीन दिन की भागदौड़ के बाद भी आधार नहीं बना। बैंक मैनेजर बोला, “सरकार पैसा भेज रही है, लेकिन आप पकड़ नहीं पा रहे।” रामलाल बोला, “भैया, मैं किसान हूँ, पैसा नहीं पकड़ता, मिट्टी पकड़ता हूँ।” पूरे गाँव में चर्चा थी – सरकार हमें उड़ाना चाहती है लेकिन पंख नहीं दे रही।

रामलाल को समझ आया – डिजिटल इंडिया केवल विज्ञापन में चमकता है। बेटे से कहा – “बेटा, गाँव छोड़ो, शहर चलो। वहाँ बिजली, इंटरनेट और शायद इंसान भी होंगे।” शहर में आने पर लगा कि लोग मोबाइल में जी रहे हैं। हर दूसरा व्यक्ति ‘मोबाइल झाँककर्मी’ बन चुका है। बेटा बोला – “पिताजी, यहाँ दिल नहीं धड़कते, मोबाइल वाइब्रेट होते हैं।” रामलाल ने कहा – “बेटा, ये शहर तो बिना आत्मा का शरीर है। गाँव की गरीबी बेहतर थी। कम से कम आँखें तो पहचानती थीं।”

एक दिन रामलाल बीमार पड़ गया। अस्पताल गया, डॉक्टर बोला – “ऑनलाइन अपॉइंटमेंट लो।” रामलाल ने कहा – “बीमारी मेरे शरीर में है, मोबाइल में नहीं।” डॉक्टर मुस्कराया, “ये है नया भारत।” जब अपॉइंटमेंट नहीं मिला, तो एक कंपाउंडर बोला – “साहब, अगर ‘कनेक्शन’ है तो इलाज हो जाएगा।” रामलाल ने पूछा – “कौन सा कनेक्शन? बिजली का, पानी का या नेताजी का?” डॉक्टर बोला – “जो भी चले, इलाज भी वहीं चलेगा।” अस्पताल की दवाई ऑनलाइन थी, लेकिन दर्द ऑफलाइन था।

रामलाल की हालत बिगड़ती गई। बेटे ने कहा – “पिताजी, गाँव चलिए। शायद वहाँ सुकून मिलेगा।” गाँव में सब बदला हुआ था। चौराहे पर अब बुजुर्ग नहीं बैठते थे, सब मोबाइल में व्यस्त थे। रामलाल की आँखें खोजती रहीं पुराने चेहरों को, लेकिन सब स्क्रीन में समा गए थे। रामलाल बोला – “बेटा, मुझे वो दुनिया लौटा दे, जहाँ लोग एक-दूसरे को नाम से बुलाते थे, यूजरनेम से नहीं।” पर गाँव अब ऐप बन चुका था, रिश्ते ‘लॉगिन’ हो गए थे।

आख़िरी साँस लेते हुए रामलाल ने कहा – “बेटा, मुझे माफ करना, मैंने तुझसे डिजिटल होने को कहा था, इंसान बने रहना भूल गया।” बेटे की आँखों में आँसू थे, पर उसके हाथ में मोबाइल था। पिता की चिता जल रही थी, और बेटा इंस्टाग्राम पर ‘आरआईपी डैज’ लिखकर स्टोरी डाल रहा था। हज़ारों लाइक्स आए, लेकिन कोई कंधा देने नहीं आया। डिजिटल इंडिया में रामलाल अंततः एक पोस्ट बनकर रह गया – जिसे स्क्रॉल करते समय कोई आह भी न करता था।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ खबरों से बेखबर मीडिया ☆ श्रीमती समीक्षा तैलंग ☆

श्रीमती समीक्षा तैलंग

 

☆ खबरों से बेखबर मीडिया ☆ श्रीमती समीक्षा तैलंग  ☆

काकी कहिन – खबरों से बेखबर मीडिया

आज सुबह टहलते हुए पुराने साथी पत्रकार टकरा गए। अब टकराहट की आवाज तो होनी ही थी। जैसे अभी पाक पर हमले की आवाज पूरी दुनिया में गूँजी। रिटायर हो गए तो पंचायत सूझने लगी अगले को।

कहने लगे कि “आजकल मीडिया में खबरों के अलावा सब आने लगा है”।

हमने कहा “जे बात तो सही है। खबरची बचे नहीं तो खबरें लाएगा कौन?”

बोले “हमारे समय में देखो कैसे ढूँढ-ढूँढकर खबरें लाते थे। समझो कि तीनों तल एक कर देते थे”।

“हमने कहा कि वही आदत तुम्हें खा गई”।

“ कैसे?”

“तुम क्या हमें इतने मासूम समझते हो?”

“नहीं”।

“बाकी हमें हकीकत सारी पता है”।

“कैसी हकीकत? आजकल जिसे देखो वो हकीकत की खोज में है। सामने जो है उसे झूठ ही मानता है”।

“तुम्हें याद है! तुमने एक फोटू खेंची थी। हम मना करते रहे कि किसी की निजी जिंदगी में दखल मत दो मगर तुम नहीं माने। हमें पता है कि तुम्हारी दुकान क्यों तोड़ी गई!”

“फोटो का दुकान से क्या लेना-देना?”

“या तो तुम हमें मूरख समझते हो या सच्चाई छुपा रहे हो। ट्रम्प की सच्चाई नहीं छुपी तो तुम कौन से तोपची हो?”

“मैंने तो ढेरों फ़ोटो ली। तुम किसकी बात कर रही हो?”

“अच्छा तो सारी फ़ोटो लेने के बाद दुकान टूटी? ऐसा है कि अतिक्रमण वाला क्षेत्र वही माना जाता है जब उसके ब्लैक होल को लक्ष्मी से भरा न जाए। और तुमने तो उनकी बिटिया की उसके दोस्त के साथ वाली फोटो ली थी। उस फोटो की कभी खबर बनी?”

“नहीं”।

“कभी विचार नहीं किया कि खबर क्यों नहीं बनी? ऐसे ब्लैक होल हर जगह हैं। वहाँ तुम्हारे ऊपरवालों ने ब्लैक मेल करके होल भरवा लिए। और यहाँ तुम अपनी हेकड़ी में रहे कि कौन हाथ लगाएगा! उसके बाद तुम कहीं नहीं टिक पाए”।

“तुम्हें सब पता है! कहाँ से पकड़ लेती हो सब!”

“छोड़ो वो सब! अब देखो बेहिसाब बारिश हो रही है। सोचा कि टीवी पर इसकी खबर देख लें। पहले नेशनल चैनल लगाए तो वो पाक-पाक चिल्ला रहे थे। आंचलिक लगाए तो वो भी पाक-पाक चिल्लाकर बागी हुए जा रहे थे। इस पाक की लड़ाई में हमारे देश की प्राचीन संस्कृतमय पाककला पर भी कुछ लोगों की नापाक दृष्टि पहुँच गई। ये देखने के बाद आश्चर्य की सीमा भी खत्म हो गई थी कि अभी तक हमारा मीडिया पानी में डूबा कैसे नहीं? पता चला कि अभी तक वो पाक में ही डूबा है”।

“सही है। भूकंप आने पर यही मीडिया काँपने लगता है। कोई मर रहा हो तब ये वहीं जाकर उस मरते आदमी से बाइट लेकर आता है। उनके घरवालों के लिए जैसे ये स्नेक बाइट हो!”

“आजकल नेशनल पर फलाने शहर की गली नंबर एक का छुरा भोंकने वाला केस दिखाया जाता है। और हवाई जहाज के टर्बुलेंस से जहाज के घायल होने की खबर खबरों के टर्ब्युलेंस में फंस जाती है। खबर पढ़ने के लिए अगली सुबह का इंतजार करना पड़ता है। कब अखबार आए और पढ़ने मिले”।

“अखबार में सही खबर मिल जाती है? वहाँ भी विचारधारा हावी रहती है। कोई अखबार किसी पार्टी की तो कोई किसी पार्टी की जयकारा करता है”।

“देखो! जयकारा एक तरह का जयघोष होता है। विचारधारा हावी होती रहे मगर आमजन की खबरें तो मिल ही जाती हैं। देश के इतने बड़े वैज्ञानिक हमारे बीच से चल बसे। इधर मीडिया कुंभकर्ण की नींद सो रहा है। एक स्ट्रिप नहीं चलायी। इतना बड़ा नक्सली मारा गया। कोई खबर नहीं चली। गधा मजदूरी इसी को कहते होंगे! अब सारी मुख्य खबरें सोशल मीडिया से मिलती हैं।”

“कैसे चलायेंगे! आजकल मीडिया का अर्थ केवल राजनीतिक खबरें बचा है। उसमें भी आधी झूठी निकल आती हैं। बाकी रही-सही कसर फर्जी डीबेट पूरी कर देती है। इससे अच्छी चर्चा हमारे घर के ओटलों पर हो जाया करती थी। देश-दुनिया की खबरों के साथ पास-पड़ौस की भी मालूमात होती थी। अब तो हाल ये है कि चौबीस घंटे चलने वाली न्यूज के बीच भी हम बेखबर हैं। सतत न्यूज़ का दबाव असली न्यूज़ को ही दबा देता है”।

“हमारी पड़ौसन आजकल इन एंकरों की तरह चिल्लाने लगी है। पता चला पूरा टाइम न्यूज़ चैनल देखने से उसके दिमाग पर असर हो गया है। इंजक्शन लग रहे हैं। एक वो जमाना था साढ़े आठ वाला। आजकल के लोग देख लें तो शांति के कारण उनके कानों से ज्वालामुखी फटने लगेगा। उन्हें शोर की आदत जो पड़ी है। इस शोर में सच दब जाता है। कौन बताए इन मीडिया वालों को कि खबरों का एक्सीडेंट करके उन्हें पेश करने से एक्स-रे साफ नहीं आता।

(स्वदेश – साप्ताहिक सप्तक – 25 मई 2025)

© श्रीमती समीक्षा तैलंग 

पुणे

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # 6 – हास्य-व्यंग्य – “बात बतंगड़ – डॉक्टर और पड़ोसन के मुर्गे” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  “यहां सभी भिखारी हैं)

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # 6

☆ व्यंग्य ☆ “बात बतंगड़ – डॉक्टर और पड़ोसन के मुर्गे” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

जितने लोग उतनी परेशानियाँ। कोई अकेलेपन से, एकांत से परेशान है तो कोई भीड़भाड़ और शोर से। इंदौर के एक कैंसर स्पेशलिस्ट डॉक्टर अपनी पड़ोसन के मुर्गों की बाँग से परेशान हैं। उन्होंने पड़ोसन पर पब्लिक न्यूसेंस का केस दर्ज करा दिया है। डॉक्टर साहब का कहना है कि सुबह-सुबह जब उनकी नींद लगती है तब पड़ोसन द्वारा पाले गए मुर्गे जोर-जोर से कुकड़ूँ कूं चिल्लाकर याने बाँग देकर उनकी नींद खराब कर देते हैं। डॉक्टर साहब का कथन सही है लेकिन क्या हम शेरों को दहाड़ने, हाथियों को चिंघाड़ने, कुत्तों को भौंकने, चिड़ियों को चहचहाने और मुर्गों को कुकड़ूँ कूं चिल्लाने के उनके नैसर्गिक अधिकार से वंचित कर सकते हैं ? बोलने के अधिकार की आड़ में नेता क्या-क्या, कैसा-कैसा बोल रहे हैं और लोगों को सुनना पड़ रहा है पर मुर्गों की कुकड़ूँ कूं से तकलीफ हो रही है ! बेचारे मुर्गों ने तो अपने परिजनों के काटे जाने की कभी कोई शिकायत नहीं की। उन्होंने कभी नहीं कहा कि जब मारने की मंशा से हमें बड़ा करते हो तो हमारे रहने के ठिकानों को “कुक्कुट पालन केंद्र” क्यों कहते हो उन्हें “मारण केंद्र” कहो।

मुझे लगता है कि अपने समय के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक न्यूटन ने अपने अति बुद्धिमान होने की जिस समस्या के चलते अपनी बड़ी और छोटी बिल्ली के लिए दरवाजे में दो छेद करवाने की योजना बनाई थी कुछ वैसी ही अति बुद्धि की समस्या से किसी नगर के ये डॉक्टर भी पीड़ित हैं जो मुर्गों की कुकड़ूँ कूं से परेशान होकर लंबी कानूनी लड़ाई में फंस गए हैं। अरे इतनी बड़ी समस्या का छोटा सा इलाज था- वे अपने कानों में रुई लगाकर सोना शुरू कर देते। पड़ोसन के मुर्गों को दाना चुगाते, उन्हें प्यार करते तो पड़ोसन से भी उन्हें कुछ अच्छा रिटर्न मिलता। क्या किया जा सकता है शरीर विज्ञान वाले मन का विज्ञान क्या जानें वरना पड़ोसन से सम्बंध बढ़ाने मुर्गे कितने अच्छे माध्यम थे। खैर अब तो रिपोर्ट दर्ज हो चुकी है। हो सकता है कि पुलिस डॉक्टर से सेट हो जाये लेकिन अगर कहीं पशु-पक्षी प्रेमी तक यह खबर पहुंच गई कि डॉक्टर को मुर्गों की बाँग नापसंद है तो फिर क्या होगा भगवान ही जाने। यों पशु-पक्षी संरक्षण कानून के चलते आवारा कुत्तों, सुअरों, बंदरों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। उनके हमलों से लोग परेशान हैं पर कुछ कर नहीं सकते। कुत्तों आदि की संख्या नियंत्रित करने देश में करोड़ों रुपयों से इनकी नसबंदी की योजना चलाई जा रही है, लेकिन सूत्र बताते हैं कि जिस कुत्ते की रजिस्टर में नसबंदी हो चुकी है वह प्रतिवर्ष अनेक पिल्लों का बाप बन रहा है।

 भाइयो/बहनों, मुर्गों को तो सीमित ज्ञान है उन्हें क्या पता कि सोने में, निद्रा में कितना आराम, निश्चिंतता और सुख है, मीठे-मीठे सपनों का संसार है पर जागना कितना कष्टदायक होता है। सारे दुख, चिंता, परेशानी, संघर्ष जागने पर ही सामने आते हैं। इसीलिये लोगों को सोना पसंद है। मुर्गों को समझना चाहिए कि जिन्हें भगवान राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर सहित समय समय पर धरती पर आए ज्ञानी संत-महात्मा और गुरु नहीं जगा पाए उन्हें भला मुर्गा क्या जगायेगा। मुर्गों की भलाई इसी में है कि वे सुबह बाँग देना बंद कर दें अथवा उसका समय आगे बढ़ा दें। जब सब सोकर उठ जाएं तब बाँग दें। यद्यपि डॉक्टर साहब नींद खराब करने का पूरा दोष मुर्गों पर मढ़ रहे हैं तथापि मेरा पुलिस प्रशासन से आग्रह है कि वह मामले की गहराई से जांच करे। हो सकता है कि डॉक्टर की नींद किसी अन्य कारण से उड़ी रहती हो और दोषी मुर्गे ठहराए जा रहे हों। कहावत है –

 “प्रेम न जाने जात-कुजात

 नींद न जाने टूटी खाट

 भूख न जाने बासो भात

 प्यास न जाने घोबी घाट”

 अतः मैं तो समझता हूँ कि डॉक्टर साहब को पड़ोसन और मुर्गों को दोष देने के बजाय अपनी कच्ची नींद का कारण खोज कर उसका इलाज कराना चाहिए।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # 290 ☆ व्यंग्य – लेखक की दावत ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘लेखक की दावत‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 290 ☆

☆ व्यंग्य ☆ लेखक की दावत

एक बड़े लेखक एक साहित्यिक गोष्ठी में आमंत्रित होकर एक छोटे शहर में पहुंचे। नाम– सोमेश्वर जी। बड़े लेखक सब तरह के होते हैं। कुछ ऐसे जो हमेशा ऐसा श्रेष्ठता का भाव पहने रहते हैं कि उनसे बात करने में हलक़ सूखता है। बहुत से बड़े लेखक सहज होते हैं। कोई ढोंग नहीं फैलाते ।मेज़बान जेही विधि राखे, रह लेते हैं। हर स्थिति में एडजस्ट कर लेते हैं।

सोमेश्वर जी ऐसे ही सर्वहारा किस्म के लेखक थे। थ्री टायर का मार्ग-व्यय मिल जाए, भोजन-निवास की व्यवस्था ठीक हो तो वे कहीं भी जाने को तैयार हो जाते थे। जिस साहित्यिक संस्था ने उन्हें आमंत्रित किया था उसके अध्यक्ष ने अपने घर पर ही एक कमरे में उनके रुकने की व्यवस्था कर दी थी। वे उसी में संतुष्ट थे। उन्हें ‘वीआईपी ट्रीटमेंट’ की आदत नहीं थी।

शाम को शहर के साहित्यकार और साहित्यकारों के ‘फ़ैन’ सोमेश्वर जी से मिलने पहुंचे। सोमेश्वर जी सबसे बड़े प्रेम से मिले। बड़ी देर तक बातचीत होती रही। सोमेश्वर जी का मन प्रसन्न हो गया।

दूसरे दिन सवेरे सोमेश्वर जी कार्यक्रम की तैयारी कर रहे थे कि एक सज्जन अवतरित हुए। उम्र  यही तीस-पैंतीस, कुर्ता-पायजामा और कंधे पर झोला। हाथ जोड़कर नब्बे डिग्री पर झुक गये, बोले, ‘सेवक को इस इलाके में बेचैन के नाम से जानते हैं। सभी स्थानीय अखबारों में मेरी कविताएं छपती रहती हैं। जब से आपके आने का सुना तभी से बेचैन था। दर्शन करके धन्य हुआ।’

सोमेश्वर जी ने शिष्टतावश बैठाया, कुशलक्षेम पूछी। वैसे बेचैन जी को किसी प्रोत्साहन की ज़रूरत नहीं थी। वे खुद ही अपने गुण-ग्राहक थे। झोले में से दो कविता संग्रह निकाल कर बोले, ‘ये यहीं से छपे हैं। आपकी सेवा में भेंट कर रहा हूं। तीस पैंतीस पांडुलिपियां तैयार हैं। कोई समझदार प्रकाशक नहीं मिल रहा है। एक भी संग्रह ठीक से छप जाए तो आपके चरणों की सौगंध, सब तरफ अपना डंका बजेगा।’

सोमेश्वर जी का साबिका इस तरह के लिक्खाड़ों से पड़ता रहता था। बोले, ‘क्यों नहीं।’

बेचैन जी हाथ जोड़कर बोले, ‘मैं बड़ी उम्मीद से एक प्रार्थना करने आया था। आज कार्यक्रम के बाद दोपहर का भोजन इस सेवक के घर पर हो। आप जैसे महान साहित्यकार की चरण-  धूल पड़ने से मेरा घर पवित्र हो जाएगा।’

सोमेश्वर जी संकोच में बोले, ‘मुझे कोई एतराज़ नहीं है। मेरे मेज़बान से पूछ लीजिए।’

बेचैन जी आत्मविश्वास से बोले, ‘उनकी चिन्ता छोड़िए। उन्हें मैं बता दूंगा।’

बेचैन जी का भक्ति भाव देखकर सोमेश्वर जी और अधिक प्रसन्न हुए।

दस ग्यारह बजे गोष्ठी हुई। सोमेश्वर जी का व्याख्यान हुआ। श्रोता काफी  थे। सबने श्रद्धा भाव से सुना। सबसे आगे वाली पांत में बेचैन जी विराजमान थे। वे सोमेश्वर जी के हर वाक्य पर गद्गद् होकर ऐसे सिर हिला रहे थे जैसे कान में अमृत टपक रहा हो। सोमेश्वर जी पूरे कार्यक्रम से बड़े संतुष्ट हुए।

सोमेश्वर जी बाहर निकले तो उन्हें  स्थानीय साहित्यकारों और प्रशंसकों ने घेर लिया।  बाहर बेचैन जी खड़े इस तरह उन्हें देख रहे थे जैसे कोई बिल्ली चूहे को दूर से देखती है, कि कब मौका मिले और झपट्टा मारे। वे स्कूटर लेकर आये थे। थोड़ा सा मौका मिलते ही वे सोमेश्वर जी को स्कूटर की तरफ ले गये और एक तरह से उनका अपहरण कर ले भागे।

घर पर उन्होंने बड़ी गर्मजोशी से सोमेश्वर जी का सत्कार किया। उनके हाथ सारे समय ऐसे जुड़े रहे कि टीवी पर फेविकॉल के विज्ञापन की याद आती थी। उनके कमरे में पचास  साठ फोटो टंगे थे जिनमें कई छोटे बड़े साहित्यकार उनके कंधे पर हाथ रखे या कमर में हाथ डाले मुस्करा रहे थे।

भोजन में नाना प्रकार के व्यंजन थे। बेचैन जी ने इसरार कर कर के खिलाया। ‘थोड़ा यह लीजिए’, ‘थोड़ा वह लीजिए’, ‘बस एक और’, ‘आप तो कुछ ले ही नहीं रहे हैं।’ नतीजा यह हुआ कि सोमेश्वर जी भूख से ज़्यादा खा गये। अफ़रा चढ़ गया। भोजन के बाद बेचैन जी ने उन्हे एक सुगंधित पान पेश किया।

उन्होंने पहले से ही सोमेश्वर जी के लिए एक पलंग बिछवा दिया था। बोले, ‘थोड़ी देर विश्राम कर लीजिए। भोजन के तुरन्त बाद जाना ठीक नहीं होगा।’

सोमेश्वर जी खुद इस हालत में नहीं थे कि तुरन्त वापस जा सकें। अति भोजन के कारण शरीर शिथिल हो रहा था। वे पलंग पर लेट गये और बेचैन जी एक कुर्सी डालकर उनकी बगल में बैठ गये। उनका झोला कुर्सी की पीठ पर लटका था।

सोमेश्वर जी ने देखा बेचैन जी कुछ बेचैन थे। उन्होंने अपना झोला गोद में रख लिया था और बार-बार उसमें हाथ डालकर कुछ टटोल रहे थे।

सोमेश्वर जी आसन्न संकट से अनभिज्ञ थे। पान चबाते हुए बोले, ‘बड़ा स्वादिष्ट भोजन था। अपनी पत्नी को मेरी तरफ से धन्यवाद दीजिएगा।’

बेचैन जी के हाथों ने फिर फेविकॉल का असर दिखाया, बोले, ‘कैसी बातें कर रहे हैं? हम तो धन्य हो गये। यह हमारे जीवन का अविस्मरणीय दिन है।’

सोमेश्वर जी चुप हो गये। बात करने को कुछ नहीं था। वैसे भी उन पर नींद की खुमारी चढ़ रही थी।

इस बीच बेचैन जी ने अपने रहस्यमय झोले से एक कॉपी निकाल ली थी। एकाएक बोले, ‘अनुमति हो तो सेवा में एक कविता प्रस्तुत करूं?’

सोमेश्वर की उस समय बेचैन जी के सत्कार से प्रसन्न और पान के स्वाद में खोये थे। इत्मीनान से बोले, ‘सुनाइए, सुनाइए।’

बेचैन जी को जैसे प्रवेश पत्र  मिला। कविता पाठ शुरू हो गया। सोमेश्वर जी आंखें मींचे ‘हूं हूं’ करते जा रहे थे।कविता खत्म हुई तो टिप्पणी की, ‘अच्छी है।’

बेचैन जी ने बिना उन्हें कोई और मौका दिए कहा, ‘एक और सेवा में पेश कर रहा हूं। तवज्जो चाहता हूं।’

वे फिर शुरू हो गए और सोमेश्वर जी फिर ‘हूं हूं’ करने लगे। दूसरी के बाद तीसरी और फिर चौथी। आठ कविताएं सुनाते सुनाते एक घंटे से ज़्यादा हो गया। सोमेश्वर जी का दिमाग ठनठन करने लगा। नींद भाग खड़ी हुई। पान  फीका हो गया। लेकिन करें क्या? बेचैन जी के पास अभी बहुत कविताएं और बहुत सी कॉपियां थीं और सोमेश्वर जी के पेट में उनका नमक बोल रहा था।

चौदह कविताओं के बाद सोमेश्वर जी ने नमकहरामी करने का निश्चय कर लिया। बोले, ‘आप बहुत अच्छा लिखते हैं, लेकिन बहुत समय हो गया। वहां लोग इन्तज़ार कर रहे होंगे।’

बेचैन जी बोले, ‘अरे आप भी किन लोगों के चक्कर में पड़े हैं। वे सब लुच्चे हैं। अभी आपके लिए बढ़िया चाय बनवाता हूं। तब तक आप एक दो उत्तम कोटि की कविताएं सुनिए। एक उर्मिला के विरह पर है और दूसरी कैकेई के चरित्र पर। एकदम मौलिक नजरिया है।’

वे भीतर जाकर चाय का आदेश दे आये, और फिर कॉपी लेकर शुरू हो गये। सोमेश्वर जी का दिमाग अब बिलकुल ठस हो गया था, काठ के टुकड़े जैसा। उन्हें बेचैन जी का स्वर तो सुनायी पड़ रहा था, लेकिन शब्द दिमाग तक नहीं पहुंच रहे थे।

वे हर कविता के बाद पूछते, ‘चाय नहीं आयी?’ और बेचैन जी जवाब देते, ‘बस, आ रही है।’  फिर चार कविताओं के बाद सोमेश्वर जी बोले, ‘चला जाए।’ और  बैचैन जी फिर भीतर तक जाकर लौट कर बोले, ‘बस आ रही है।’

उन्होंने फिर चार कविताएं सुनायीं। चाय का अब तक कहीं अता-पता नहीं था। आखिरकार सोमेश्वर जी सख़्त स्वर में बोले, ‘मना कर दीजिए। अब जाऊंगा।’

बेचैन जी भीतर गये और सचमुच चाय लेकर आ गये। चाय के चलते चलते उन्होंने एक कविता और सुना डाली। सोमेश्वर जी अब चुपचाप दबे आक्रोश से बेचैन जी को ऐसे  देख रहे थे जैसे कोई शोषित शोषक को देखता है। बेचैन जी ने भोजन का भुलावा देकर दो चार किलो कचरा उनके दिमाग में झोंक दिया था। वे अभी भी, दीन-दुनिया से बेखबर, कविता पढ़े जा रहे थे।

बेचैन जी ट्रे भीतर रखकर लौटे तो देखा सोमेश्वर जी दरवाज़े के बाहर खड़े थे। बोले, ‘अरे, आप तो बाहर आ गये। आइए, स्कूटर पर विराजिये।’

सोमेश्वर जी गुस्से में बोले, ‘नहीं, मैं रिक्शे से जाऊंगा।’ बेचैन जी विस्मय से बोले, ‘रिक्शे से क्यों जाएंगे? मैं छोड़ देता हूं। मुझे सेवा का अवसर दें।’ 

सोमेश्वर जी बोले, ‘आप काफी सेवा कर चुके। अब रिक्शे से ही जाऊंगा। अकेला जाऊंगा।’

बेचैन जी बोले, ‘आप यहां के रास्तों से परिचित नहीं हैं। भटक जाएंगे।’

सोमेश्वर जी ने जवाब दिया, ‘आप मेरी चिन्ता छोड़कर घर पर ही विश्राम कीजिए। मैं बिलकुल ठीक-ठाक पहुंच जाऊंगा। थोड़ी देर एकान्त-सेवन की इच्छा है।’

मजबूरी में बेचैन जी ने फिर नब्बे डिग्री पर झुक कर प्रणाम कर सोमेश्वर जी को विदा किया। फिर लौटकर पत्नी से बोले, ‘ये लेखक भी सनकी होते हैं। कहा स्कूटर से छोड़ दें, लेकिन  रिक्शे से गये। फिर भी हैं बढ़िया आदमी। मेरी कविताएं बहुत धीरज से सुनीं। बहुत दिनों बाद ऐसा गुण-ग्राहक मिला।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # 52 – बोल बच्चन बनायेंगे भारत! ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार, बाल साहित्य लेखक, और कवि हैं। उन्होंने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज, और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने, और समन्वय करने में महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनके ऑनलाइन संपादन में आचार्य रामचंद्र शुक्ला के कामों के ऑनलाइन संस्करणों का संपादन शामिल है। व्यंग्यकार डॉ. सुरेश कुमार मिश्र ने शिक्षक की मौत पर साहित्य आजतक चैनल पर आठ लाख से अधिक पढ़े, देखे और सुने गई प्रसिद्ध व्यंग्यकार के रूप में अपनी पहचान स्थापित की है। तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (तेलंगाना, भारत, के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से), व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान (आदरणीय सूर्यबाला जी, प्रेम जनमेजय जी, प्रताप सहगल जी, कमल किशोर गोयनका जी के करकमलों से), साहित्य सृजन सम्मान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करकमलों से और अन्य कई महत्वपूर्ण प्रतिष्ठात्मक सम्मान प्राप्त हुए हैं।

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य रचना बोल बच्चन बनायेंगे भारत! )  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # 52 – बोल बच्चन बनायेंगे भारत! ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

नेताजी एक दिन अचानक मंच से चीख पड़े—”हमें नया भारत बनाना है!” जनता पहले तो समझी कोई नया टीवी सीरियल आ रहा है, फिर ताली बजा दी। नेताजी ने सोचा कि यह ताली उनके जोशीले भाषण के लिए है, पर असल में ताली इस बात की थी कि दो घंटे बाद होने वाली नल-जल योजना की घोषणा टल गई थी। नेताजी के मुंह से ये नारा ऐसा फिसला जैसे साबुन के केस से गीला साबुन—फिसल गया, पर महक छोड़ गया। उन्होंने पहली बार जब कहा “नया भारत”, खुद भावविभोर हो गए, मानो उन्होंने ‘शोले’ का डायलॉग मारा हो—”इस हाथ ले, उस हाथ दे!” अब नेताजी को इस वाक्य से ऐसा मोह हो गया जैसे बेरोजगार युवक को सरकारी नौकरी से। हर बार, हर मंच, हर पंचायत, हर शादी और यहाँ तक कि हर शौचालय उद्घाटन में भी नेताजी वही बात दोहराते—”हमें नया भारत बनाना है!” लोग कहते—”पहले शौचालय तो बना लो बाबू, भारत बाद में बनाना!”

जिनके घर की छत टपक रही थी, वे भी इस नारे से प्रभावित होकर बाल्टी हटाकर ताली बजाने लगते। नेताजी के भाषण में अब इतना लोहा था कि किसी दिन सुनते-सुनते जूते भी पिघल जाएँ। उनके हर भाषण के बाद जनता का मन करता कि भाषण के बदले कुछ ‘ईंट-रेत’ ही गिरवा देते तो अच्छा था। पर नेताजी को तो सिर्फ बोलने से फुर्सत नहीं थी। उनका हर भाषण ‘नये भारत’ की नयी किस्त लगता, पर किस्त बिना ब्याज की नहीं थी—हर बार वोट के ब्याज की डिमांड जुड़ी रहती। वो मंच से चिल्लाते—”देखो, नया भारत ऐसा होगा जैसे फिल्म ‘बाहुबली’ की सेटिंग!” जनता सोचती—”पर हम तो ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ ज़िंदगी जी रहे हैं!”

नेताजी से जब किसी पत्रकार ने पूछा—”नया भारत कब बनेगा?” नेताजी बोले—”पहले पुराना कुछ और खराब हो ले, फिर बनाएंगे!” जैसे डॉक्टर बोले—”पहले बुखार 105 पहुँचे, फिर दवा दूँगा!” नेताजी की विकास योजना ‘पेंडिंग’ नहीं, ‘पोस्टमार्टम’ में पड़ी रहती। वह कहते—”हम नया अस्पताल बनाएंगे, जहाँ मशीनें नहीं, मिशन होंगे!” फिर गांव की कोई प्रसूता महिला ट्रैक्टर की ट्रॉली में तड़पते तड़पते दम तोड़ देती। अस्पताल बना नहीं, कागज़ में खुल चुका होता। नेताजी फिर कहते—”ये एक योजनागत दुर्घटना थी।”

‘नया भारत’ अब ऐसा नारा बन चुका था कि बच्चों की लोरी से लेकर सरकारी फाइलों तक में गूंजता था। स्कूलों में किताबें न सही, पोस्टर थे—”हमें नया भारत बनाना है।” मास्टर साहब कहते—”बच्चो, पढ़ो मत, सिर्फ नारे लगाओ। UPSC अब नारे से ही निकलेगी!” एक बार नेताजी ने पुल का उद्घाटन करते हुए कहा—”यह पुल पुराने भारत की याद दिलाता है, नया भारत तो बिना पुल के ही जुड़ जाएगा!” लोग बोले—”तो क्या अब नाव से सफर करेंगे?” नेताजी बोले—”बिलकुल, नया भारत है, हर समस्या में अवसर ढूंढो।”

फिर एक दिन नेताजी को किसी ने टोका—”बोलिए मत, कुछ करिए!” नेताजी बोले—”कहना भी तो एक कला है, हर कोई नहीं कह सकता!” फिर उन्होंने नये भारत के लिए सौ नई योजनाएं घोषित कीं, जिनमें से 98 की फाइलें खो गईं, एक योजना ठेकेदार की ससुराल चली गई, और एक योजना एक सरकारी कर्मचारी की पेंशन से शादी कर बैठी। सब तरफ ढोल बजने लगे—”नेताजी नया भारत बना रहे हैं!” और वास्तव में कुछ बना भी—VIP गेट, नई गाड़ियाँ, और 5-स्टार मीटिंग हॉल। गाँव के चबूतरे में अब भी गोबर था, पर उसके ऊपर नया पोस्टर लग गया था—”नया भारत, हर गांव की शान!”

फिल्मी संवादों की तर्ज़ पर नेताजी बोले—”हम वो नया भारत बनाएंगे, जहाँ कोई भूखा न सोये!” जनता बोली—”पर अभी तो कई भूखे मारे गए हैं।” नेताजी बोले—”वो पुराने भारत के नागरिक थे!” फिर बोले—”हम नया भारत बनाएंगे, जहाँ बेटियाँ सुरक्षित रहेंगी।” तभी खबर आई कि मंत्रीजी की बहू का केस बंद हो गया है। नेताजी बोले—”हम न्याय में यकीन रखते हैं, लेकिन हमारी प्राथमिकता नया भारत है, न कि पुराने मामले!” अब जनता समझ चुकी थी—यह नया भारत एक सपना है, जिसे बस सपने में ही देखा जा सकता है। जैसे ट्रेन में बर्थ के लिए सपना देखते यात्री।

एक बार नेताजी के समर्थकों ने पूरे गांव को तंबू में बसा दिया—”क्योंकि पुरानी इमारत गिर रही है और नयी बनने वाली है।” छह महीने बीत गए। तंबू अब फटे हुए थे, लोग बारिश में भीग कर कहते—”कितना सुंदर सपना है, नये भारत का!” बच्चों को स्कूल के नाम पर नेताजी के भाषण दिखाए जाते। एक बच्चा पूछ बैठा—”सर, हमें पढ़ना नहीं है?” मास्टर जी बोले—”पढ़ाई की जरूरत किसे है, जब नया भारत बन रहा है?” एक बुजुर्ग दादी, जिनकी झोपड़ी गिर गई थी, कहती—”बेटा, नया भारत तो बन जायेगा, पर मैं कहाँ रहूँगी?” उत्तर में सिर्फ एक फोटो मिला—‘नेताजी ने आज पुनः घोषणा की—हमें नया भारत बनाना है।’

नेताजी अब भी भाषण दे रहे हैं—”हम नया भारत बनाएंगे जो आधुनिक होगा, आत्मनिर्भर होगा!” पर गाँव की सड़कों पर बच्चे आज भी मिट्टी में खेल रहे हैं, अस्पताल में बिन बिजली के मरीज मर रहे हैं, और स्कूलों में पढ़ाई के नाम पर छुट्टी मिल रही है। एक दिन नेताजी के मंच के नीचे एक लाचार माँ अपनी बीमार बेटी को लिए बैठी थी। जब नेताजी चिल्लाए—”हम नयी संजीवनी योजना ला रहे हैं!”—तब बच्ची ने माँ की गोद में दम तोड़ दिया। भीड़ चुप हो गई। नेताजी बोले—”यह एक व्यक्तिगत दुखद घटना है।” माँ फूट-फूट कर रो पड़ी—”नया भारत बना लो बाबू, पर मेरी बेटी तो पुराने भारत की थी!” ताली नहीं बजी। कैमरा बंद हुआ। भाषण स्थगित हुआ। नेताजी मंच से उतरे और बोले—”अगली बार इसे कवरेज मत देना। मिजाज खराब हो जाता है!”

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # 5 – हास्य-व्यंग्य – “विवाह की उम्र पर बतंगड़…” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  “यहां सभी भिखारी हैं)

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # 5

☆ व्यंग्य ☆ “विवाह की उम्र पर बतंगड़…” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

“गोरी चलो न हंस की चाल जमाना दुश्मन है, तेरी उमर है सोलह साल जमाना दुश्मन है”। जी हाँ, न सिर्फ हमारे देश में वरन विश्व भर में लड़कियों के यौवन की शुरूआत को उनके सोलहवें वर्ष से ही माना जाता है। सभी देशों, भाषाओं में सोलह वर्ष की तरुणी के रूप सौंदर्य, यौवन, अदाओं और नाज-नखरों से न सिर्फ गीत-कविताएं वरन गद्य साहित्य भरा पड़ा है। “पसंद आ गई है एक काफ़िर हसीना, उमर उसकी सोला बरस 6 महीना”। ऐसा नहीं है कि सोलह बरस की लड़की को देखकर सिर्फ लड़कों के दिल में ही “कुछ कुछ होता है”, लड़कों को देखकर लड़कियों का हाल भी बेहाल हो जाता है-“मैं सोला बरस की, तू सतरा बरस का। मिल न जाएं नैना, इक दो बरस जरा दूर रहना। कुछ हो गया तो फिर न कहना…। ” हमारे देश में प्राचीन सामाजिक व्यवस्था के अनुसार लड़कों को तो 25 वर्ष की उम्र तक ब्रम्हचर्य का पालन करने का नियम था, किन्तु लड़कियों के विवाह की आयु 16 वर्ष के आसपास ही रखी गई थी। विवाह होते ही लड़की अपने पति और घर में व्यस्त हो जाती थी। शायद यही कारण था कि तब यौन अपराध भी नगण्य थे।

अभी हाल ही में लड़कियों की विवाह आयु भी लड़कों की आयु के समान ही 21 वर्ष तय कर दी गई है।। इसके पूर्व सरकार द्वारा लड़कियों के विवाह की निर्धारित आयु 18 वर्ष थी। प्राकृतिक रूप से भले ही 18 वर्ष से कम आयु में लड़की बालिग हो जाती हो पर 18 वर्ष के पूर्व उसके साथ विवाह करना या उसकी मर्जी से भी उसके साथ सम्बन्ध बनाना दण्डनीय अपराध था। अब यह उम्र 21 वर्ष हो गई है। कानून के भय से कुछ बंदिश तो लगी पर सम्पूर्ण समाज का दृष्टिकोण न बदल सका, चोरी छिपे बाल विवाहों की ख़बरें और अविवाहित युवतियों से छेड़छाड़-बलात्कार अथवा उनकी सहमति से यौन शोषण और फिर धोखाधड़ी की ख़बरें रोज के समाचारों का हिस्सा हो गई हैं। सरकार ने लड़कियों के बालिग होने की कानूनी उम्र तो 21 वर्ष निर्धारित कर दी, किन्तु साहित्य सृजन में लड़कियों के यौवन पर चर्चा करने उम्र की बंदिश नहीं लगाई। यौवन के गीत 16 वर्ष पर ही बनते रहे- “सोला बरस की बाली उमर को सलाम, ए प्यार तेरी पहली नज़र को सलाम। ” एक समय मध्यप्रदेश में लड़कियों की शादी की उम्र को लेकर विवाद छिड़ गया था। प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री लड़कियों के लिए विवाह की उम्र 21 वर्ष करना चाहते थे जबकि एक पूर्व मंत्री का कहना था कि जब चिकित्सकों के अनुसार लड़कियां 15 वर्ष की आयु में प्रजनन योग्य हो जाती हैं तो शादी की उम्र 21 वर्ष करने की क्या जरूरत है ? मंत्री जी के तर्क शायद लड़कियों के प्राकृतिक परिपक्वता के पक्ष में थे। वैसे आप सभी जानते हैं कि नेताओं की आदत मुहं चलाने की होती है। वे आम आदमी का ध्यान समस्याओं से हटाने के लिए दिनभर फालतू बातें करते हैं। अपने विरोधियों की बातों का बतंगड़ बनाना इनके लिए कठिन काम नहीं। व्यर्थ गाल बजाते रहना और अपनी बात पर कभी शर्मिंदा न होना, नेता के रूप में सफलता पाने की पहली शर्त है। विवाह की आयु बढ़ाने के पक्षधरों से मेरा कहना है कि आप तो विवाह का लड्डू खा चुके हैं अब आयु सीमा और बढ़ाकर नई पीढ़ी को क्यों तरसाना चाहते हैं ? जनसंख्या नियंत्रण हेतु बहुसंख्यकों के लिए फैमिली प्लानिंग तो है ही फिर विवाह के लिए आयु सीमा में वृद्धि की क्या आवश्यकता ? एक गोपनीय बात – मेरे एक परिचित ने अपना मुहं मेरे कान के पास लाकर कहा-“भाई साहब युवक/युवतियों को परेशान होने की जरूरत नहीं, बात सिर्फ विवाह के लिए उम्र बढ़ाने की चल रही है। “दिल विल-प्यार व्यार” को कौन रोक पाया है ? अस्तु, मैं तो यही कहूंगा नेताओं की बातों में मत पड़िये- “उम्र का हर दौर मजेदार है, अपनी उम्र का मजा लीजिये…। ”

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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