हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ६२ ☆ व्यंग्य – “कोरट-कचहरियों की सम्मानजनक विदाई का स्वर्णिम दिन…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  कोरट-कचहरियों की सम्मानजनक विदाई का स्वर्णिम दिन…” ।)

☆ शेष कुशल # ६२ ☆

☆ व्यंग्य – “कोरट-कचहरियों की सम्मानजनक विदाई का स्वर्णिम दिन – शांतिलाल जैन 

सूरज आज पूरब से तो नहीं ही निकला होगा. लोकतंत्र की स्थापना के आठ दशक से भी कम में मुल्क का भ्रष्टाचारियों, अपराधियों से मुक्त हो जाना कोई छोटी मोटी कामयाबी नहीं है. ऐसी कामयाबी उसी दिन मिला करती है जिस दिन सूरज पूरब से ना निकला हो. मुझे पक्का यकीन है आज सूरज पूरब से तो नहीं ही निकला होगा.

आज हुआ ये श्रीमान् कि इसके पहले कि आला कचहरी में वकील सा. अपने मुवक्किल के निर्दोष होने की अपील-दलील पेश कर पाते, जिरह होती, गवाहों सबूतों की बिला पर अपने मुवक्किल को दोषमुक्त करा पाते – प्रॉसिक्यूशन ने केस ही वापस ले लिया!!! अभियुक्त पिछली रात नौ बजे तक अपोजिशन में था, अगली सुबह नौ बजे हाकिम के दल में शामिल हो गया. सुबह का भूला था श्रीमान्, अगले दिन सुबह घर आ गया था, सो आप उसे भूला नहीं कह सकते. कभी मिला करती थी क्लीन चिटें अदालतों से, अब हाकिम ने मुकदमा वापिस लेकर उसकी जरूरत ही ख़तम कर दी है. रख लें अदालतें अपनी चिटें अपने पास.

हाकिम ने पार्टी का बड़ा और भव्य दफ्तर बनवाया है मगर बाहर डोर-बेल नहीं लगवाई. दरवज्जे पे न्याय का घंटा जो लटकवा लिया है. बजाईए. अंदर जाईए. क्लीन चिट पाईए और पाईए एक मलाईदार ओहदा भी. स्मार्ट लीडर्स करप्शन करके कारागार का रुख नहीं करते, उनके गेट पर लटका न्याय का घंटा बजा लेते हैं और सेफ झोन में प्रवेश कर जाते हैं. ‘सत्तापक्ष में कोई भ्रष्टाचारी नहीं होता और विपक्ष में कोई ईमानदार नहीं होता.’ न्यायशास्त्र का ये नया सिद्धांत है, जो इस अवधारणा को स्थापित करता है कि एक विपक्षमुक्त मुल्क ही भ्रष्टाचार मुक्त मुल्क का पर्याय होता है. देखते देखते न विपक्ष में न कोई नेता बचा है न मुल्क में भ्रष्टाचार का कोई आरोपी. इस तरह आज का मुकदमा दीवानी अदालतों में आख़िरी मुकदमा साबित हुआ.

क्रिमिनल केसेस पहले ही अदालतों में पेश होना बंद हो चुके थे. इसे आप कल्लू मिर्ची के केस से समझिए. उसकी बदमाशी का मुआमला सामने आया और हाकिम के नुमाईंदे जेसीबी पर सवार होकर निकल पड़े. देखते देखते उसका मकान ध्वस्त कर दिया गया. लो साहब, हो गया न्याय. धरा रह गया सत्र न्यायालय और बैठे रह गये ‘युवर ऑनर’. पड़ीं रह गईं एफआईआर, तफ़्तीश, साक्ष्य, विवेचना, केसडायरी, रिमांड, जमानत, चार्जशीट, भारतीय न्याय संहिता, वकील, मुवक्किल. कोर्ट-कचहरी के चक्कर में अब ना हाकिम पड़ता है न उसके नुमाईंदे. उनकी मर्ज़ी ही ‘ड्यू प्रोसेस ऑफ लॉ’ है. मुल्क के आईन में अब अदालतों की जरूरत ही नहीं बची. पूरी न्यायपालिका एक झटके में बेरोज़गार हो गई है. वकीलों, न्यायाधीशों, कचहरी के कारकूनों का रोज़गार छिन गया हैं. जस्टिस सर की बेंच पर नया कोई केस लिस्ट हो नहीं रहा. कारकून खाली बैठे हैं. वकील मुवक्किलों की तलाश में भटक रहे हैं. ‘हाजिर हो’ की आवाजें गुम हैं, निस्तब्ध निरापद सन्नाटा पसरा पड़ा है. आज का दिन न्यायपालिका की सम्मानजनक विदाई का दिन है.

लोकतंत्र की स्थापना के आठ दशक से भी कम में ही न्यायपालिका की जरूरत का ख़त्म हो जाना कोई छोटी मोटी कामयाबी नहीं है. ऐसी कामयाबी उसी दिन मिला करती है जिस दिन सूरज पूरब से ना निकला हो. मुझे पक्का यकीन है आज सूरज पूरब से तो नहीं ही निकला होगा.

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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३४ ☆ व्यंग्य – ‘बेजोड़’ जी की पीड़ा और परसाई ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – बेजोड़’ जी की पीड़ा और परसाई  इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३३४ ☆

☆ व्यंग्य ☆ ‘बेजोड़’ जी की पीड़ा और परसाई ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

छोटेलाल ‘बेजोड़’ नगर के वज़नदार लेखक हैं। व्यंग्य लिखते हैं और व्यंग्य में ही बात करते हैं। अब तक पैंतालीस किताबें छपवा चुके हैं और  एक सौ अस्सी सम्मान या अभिनंदन करवा चुके हैं। उनकी तमन्ना भारत के हर शहर में सम्मान कराने की थी, जो पूरी हो चुकी है। हर शहर में उनका कोई न कोई चेला बैठा है जो सम्मान का जुगाड़ बैठाता रहता है।

यों तो ‘बेजोड़’ जी खासे मशहूर हैं, लेकिन लेखन में उन्हें वह मुकाम नहीं मिला जिसके वे आकांक्षी हैं। गंभीर साहित्य की दुनिया में उनकी पूछ-कदर नहीं है। यही बात ‘बेजोड़’ जी को सालती रहती है। उनकी सबसे ज़्यादा दुखती रग परसाई जी हैं। जब कहीं भी वे अपनी रचनाओं की चर्चा का जुगाड़ बैठाते हैं, घूम-घाम कर परसाई जी  रचनाओं से तुलना होने लगती है। हर बार निष्कर्ष यह निकलता है कि  ‘बेजोड़’ जी अच्छा  लिख रहे हैं, लेकिन परसाई जी से कुछ सीख लेते तो अच्छा होता। सुनकर ‘बेजोड़’ जी खिन्न हो जाते हैं। आयोजन वे जमाते हैं और तारीफ परसाई जी बटोर ले जाते हैं।

अपने वक्तव्यों में ‘बेजोड़’ जी अक्सर कहते हैं— ‘अब परसाई जी का ज़माना लद गया। अब हम जैसे लेखकों का ज़माना है। आलोचकों से  कहो कि परसाई जी को लांघ कर हम तक आयें।कब तक ‘परसाई’ ‘परसाई’ जपते रहेंगे?’

परसाई जी के वामपंथी होने पर भी बेजोड़ जी तल्ख टिप्पणी करते हैं। कहते हैं— ‘वामपंथी अच्छा लेखक हो ही नहीं सकता। वह एक विचारधारा में कैद हो जाता है, जड़ हो जाता है, कूपमंडूक हो जाता है। उसे अपनी नाक से आगे का कुछ दिखायी नहीं पड़ता। वह एक आंख से ही दुनिया को देखता है, दूसरी नहीं खोलता। इसीलिए मैं परसाई को महान लेखक नहीं मानता। लेखक को तो समुद्र की तरह विशाल हृदय वाला होना चाहिए। विचारधारा के फेर में नहीं पड़ना चाहिए। वामपंथियों ने ज़बरदस्ती तारीफ कर कर के परसाई को महान बना दिया है।’

कई बार वे कहते हैं— ‘परसाई जी ने लिखा क्या है? कहीं वे लिखते हैं कि जिन राज्यों में दंगे हुए हैं उन्हें गणतंत्र दिवस की झांकी में दंगे ही दिखाना चाहिए। कहीं कहते हैं कि लड़कों को अपने बाप का आदेश नहीं मानना चाहिए। कहीं लिखते हैं कि पुरानी पीढ़ी नयी पीढ़ी के कंधों पर सवार हो गयी है। कहीं सुशीला उस लड़की को कहते हैं जो भाग कर शादी कर लेती है और बाप का पीएफ का पैसा बचा देती है। यह सब नयी पीढ़ी को बरगलाना नहीं तो और क्या है? नयी पीढ़ी को उत्तम संस्कार देने के बजाय ऊलजलूल बातें सिखा रहे हैं और फिर भी महान बने हुए हैं।’

कुछ दिनों से ‘बेजोड़’ जी एक नयी थियरी लेकर सामने आये हैं। कहते हैं, ‘एक रात मुझे सोचते-सोचते अचानक समझ में आया कि परसाई को महान क्यों माना जाता है। दरअसल  वे इसलिए बड़े माने जाते हैं क्योंकि विरोधियों के हाथों उनकी पिटाई हो गयी थी। इसमें कोई शक नहीं कि व्यंग्यकार के जीवन में प्रताड़ना का बहुत महत्व होता है। पिटाई हो जाए तो व्यंग्यकार एकदम ऊपर उठ जाता है। परसाई जी के बड़प्पन का यही राज़ है।

‘यह समझ में आने के बाद मैं लगातार कोशिश में हूं कि मेरी भी वाजिब पिटाई हो जाए ताकि मैं परसाई जी से आगे निकल जाऊं। इसी कोशिश में दो बार पटना में छात्रों के धरने में शामिल हो गया, लेकिन मेरे बालों की सफेदी देखकर पुलिस ने छोड़ दिया। उत्तर प्रदेश के किसी आंदोलन में शामिल होने की सोची थी, लेकिन हिम्मत नहीं हुई क्योंकि वहां पिटाई से ज़्यादा ‘एनकाउंटर’ होते हैं। अब राजस्थान जाने की सोच रहा हूं, वहां बेरोज़गारों के आंदोलन की संभावना है। हरयाणा में एक कज़िन पुलिस में हैं, उनसे भी कह रखा है। वे बुलाएंगे तो वहां चला जाऊंगा। वे पिटाई का इंतज़ाम कर देंगे। परसाई जी का पैर खराब था, चलने फिरने से मजबूर थे, इसलिए उन्हें जबलपुर में ही पिटना पड़ा। मैं तो देश में कहीं भी पिट सकता हूं। पिटने  के बाद फोटो के साथ अखबारों में भेज दूंगा। छपते ही मेरा  कद एकदम बढ़ जाएगा। फिर परसाई को न कोई याद करेगा, न कोई पढ़ेगा। सब तरफ हम ही हम होंगे।’

अब ‘बेजोड़’ जी के चेले मनाते हैं कि ‘बेजोड़’ जी की मनोकामना शीघ्र पूरी हो और वे साहित्य में ऐसी बुलन्दी पर पहुंचें जहां उन्हें चुनौती देने वाला कोई न हो, परसाई भी नहीं।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २५ – हास्य-व्यंग्य – “डुप्लीकेट जिंदाबाद” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  डुप्लीकेट जिंदाबाद

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २५ 

☆ हास्य-व्यंग्य ☆ “डुप्लीकेट जिंदाबाद” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

बहुत सबेरे कोई मेरे घर का दरवाजा लगातार खटखटाए जा रहा था।  मैं भी बिस्तर में दुबका उसके धीरज की परीक्षा ले रहा था, किंतु लंबे समय के बाद भी जब दरवाजे पर खटखटाहट बंद नहीं हुई तो मैं समझ गया कि दरवाजे पर मेरे पड़ोसी वर्मा जी के सिवा और कोई नहीं हो सकता।  कहीं दरवाजा न टूट जाए इस आशंका से मैंने तुरंत चादर फेंका और दरवाजा खोल दिया। मेरा अनुमान सही था बाहर वर्मा जी खड़े थे। उन्होंने मुझे एक ओर करते हुए घर के अंदर प्रवेश किया और सोफे पर पसरते हुए कहा – “भाई साहब, अख़बार पढ़ा आपने, अब डुप्लीकेट ताजमहल भी बन गया !”

मैंने आंखें मलते हुए कहा, वर्मा जी मुझे अख़बार पढ़ने की जरूरत कहां पड़ती है, आप ही सारी खबरें सुना जाते हैं और रही डुप्लीकेट ताजमहल की बात तो वह तो मेरे घर की आलमारी में भी बंद है। वर्मा जी बोले – “भाई साहब मैं आपकी आलमारी वाले ताजमहल की बात नहीं कर रहा, मैं तो उस विशाल डुप्लीकेट ताजमहल की बात कर रहा हूं जो एक पंजाबी उद्योगपति ने कुछ समय पहले 40 लाख अमरीकी डॉलर खर्च करके दुबई में बनवाया है। मैंने कहा भाई साहब इससे आपको क्या परेशानी हो रही है ? आजकल तो जमाना ही डुप्लीकेट का चल रहा है, वह समय गया जब किसी वस्तु या व्यक्ति का डुप्लीकेट होना सम्मानजनक नहीं समझा जाता था अब तो डुप्लीकेट की मांग ने ओरिजनल को पछाड़ दिया है। साबुन से लेकर सिंदूर तक सब डुप्लीकेट मिल रहा है। टी वी, कैमरा, सीडी की बात तो छोड़ो अब तो गीत और संगीत भी डुप्लीकेट मिलने लगे हैं और पसंद किए जा रहे हैं। डुप्लीकेट सामान के निर्माण में लोगों ने इतनी तरक्की कर ली है कि अब ओरिजनल के पहले डुप्लीकेट सामग्री बाजार में आ जाती है। दुकानदार ग्राहक को ओरिजनल सामान दिखाने की कोशिश करता है तो वह डुप्लीकेट चाहिए कहकर दुकान से बाहर हो जाता है। डुप्लीकेट सामान बेचना दुकानदारों की भी मजबूरी बन गई है। बाजार में डुप्लीकेट की बढ़ती मांग के कारण देश के न जाने कितने उद्योगपतियों ने ओरिजनल वस्तुओं की जगह डुप्लीकेट का कारोबार शुरू कर दिया है। ओरीजनल समान बनाने और बेचने वाले अलसेट (मुसीबत) में हैं, डुप्लीकेट बनाने और बेचने वाले चांदी पीट रहे हैं।

लंबा बोलने के बाद जैसे ही मैंने सांस ली, वर्मा जी ने तुरन्त फायदा उठाया। बोले भाई साहब “आपने तो डुप्लीकेट पर भाषण ही दे डाला। मैं तो डुप्लीकेट ताजमहल की बात कर रहा था। ” मैने कहा – भाई जी आप ताजमहल को पकड़ का क्यों बैठे हैं ? अपने चारों ओर देखिए, हर तरफ डुप्लीकेट की माया है। आपको देश में दूध, दही, घी, तेल, सौंदर्य प्रसाधन, टी वी, कैमरा, रेडियो, कपड़ों से लेकर दवाएं तक डुप्लीकेट मिल जाएंगी। डुप्लीकेट गोविंदा, शाहरुख, सलमान, अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्या, करीना तो हैं ही डुप्लीकेट गांधी और मोदी भी घूम रहे हैं। “डुप्लीकेट जिंदाबाद” बोलिए और विदा लीजिए।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३३ ☆ व्यंग्य – साहित्यकारी के दांव-पेंच ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘साहित्यकारी के दांव-पेंच‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३३३ ☆

☆ व्यंग्य ☆ साहित्यकारी के दांव-पेंच डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

सयानेलाल ‘साहित्यप्रेमी’ जल्दी ही साहित्य के मामले में सयाने, समझदार हो गये। कुछ दिन कविता कहानी लिखी, फिर समझ गये कि इससे कुछ ठोस हासिल होने वाला नहीं। ऊसर में खेती करना है। संपादक, प्रकाशक के चक्कर काटते रहो। कोई लेखक दूसरे को पढ़ता नहीं, पाठक पीठ देकर बैठा है। कितनी भी चिरौरी करो, कान नहीं देता।

लेकिन इस मायूसी के बीच सयानेलाल ने साहित्य में निहित मुनाफे की संभावनाओं को खोज लिया। लिखने से भले कुछ न मिले, साहित्य-सेवा के और भी आयाम हैं जो फलदायी हो सकते हैं। ‘जिन खोजा तिन पाइयां।’ सिर्फ  अक्ल दौड़ाने की ज़रूरत है। उन्होंने सोच विचार करके लेखन के बजाय सम्मान-विमोचन का तुरत फल देने वाला धंधा शुरू कर दिया। अब दस-बीस लेखक उनके चक्कर लगाते रहते हैं, दिन भर फोन आते हैं— ‘बड़े भैया, दो साल से सम्मान नहीं हुआ। कब तक सबर करें? एक बार तो करा दो।’

जल्दी ही सयानेलाल पूरे प्रदेश में सम्मान-विमोचन के विशेषज्ञ के रूप में मशहूर हो गये। अब साल में तीन चार सम्मान कार्यक्रम हो ही जाते हैं। हर कार्यक्रम में कवि-लेखक परिवार और इष्ट-मित्रों सहित पहुंचते हैं। मेले का माहौल बन जाता है। कई सम्मानित भावुक होकर परिवार से लिपटकर रोते हुए दिखायी पड़ते हैं।

सयानेलाल जी की पॉलिसी बिल्कुल साफ है। सम्मान-विमोचन का पूरा खर्चा लेखक को उठाना पड़ेगा। खर्चे की रकम और हिसाब सयाने लाल जी  के पास रहेंगे। हिसाब पूछने की मुमानियत है। जो पूछे उससे आंखें तरेरकर कहते हैं, ‘हिसाब मांगना है तो अब आगे सम्मान कराने के लिए हमारे पास मत आना। दो ठो दोहे लिखे नहीं कि सम्मान की लाइन में लग गये।’ सम्मानित सिकुड़ जाता है, दांत निकाल कर कहता है— ‘रहने दीजिए। गुस्सा मत होइए। हमने तो वैसइ पूछ लिया था।’ ज़ाहिर है खर्चे में से सयानेलाल पर्याप्त सेवा-शुल्क बचा लेते हैं।

सयानेलाल पर दबाव सिर्फ विमोचन और सम्मान के लिए ही नहीं होता, उनके कार्यक्रमों में अध्यक्ष या मुख्य अतिथि बनने के लिए भी होता है। कुर्सी-प्रेमी अनेक लोग अध्यक्ष या मुख्य अतिथि बनने के लिए कुछ ‘त्याग’ करने को भी तैयार हो जाते हैं।

एक दिन सयानेलाल नगर के जाने-माने विद्वान डॉक्टर त्रिपाठी के पास पहुंचे। चरण छूकर  बोले, ‘आदरणीय,16 तारीख को बीस पच्चीस लेखकों का सम्मान करना है। आप कृपा करके कार्यक्रम की अध्यक्षता स्वीकार कर लें तो कार्यक्रम में चार चांद लग जाएंगे।’ त्रिपाठी जी भले आदमी थे। राज़ी हो गये। बोले, ‘वाहन की व्यवस्था कर देना। मैं आ जाऊंगा।’

सयानेलाल जी पुन: चरण छूकर खुशी खुशी विदा हुए।

कार्यक्रम से तीन दिन पहले अचानक वे फिर त्रिपाठी जी के घर उपस्थित हुए। बड़ी देर तक बैठे उंगलियां मरोड़ते रहे, जैसे किसी असमंजस में हों। थोड़ी देर में बोले, ‘आदरणीय, बड़े धर्मसंकट में हूं। कैसे कहूं? आप विकल जी को जानते होंगे। कविता लिखते हैं। वे पीछे पड़ गये हैं कि इस कार्यक्रम की अध्यक्षता का मौका उनको दूं। दरअसल वे अगले महीने बेटी के पास बंबई जा रहे हैं। कह रहे थे पता नहीं कब लौटना हो, इसलिए मेरे मार्फत आपसे प्रार्थना की है कि इस कार्यक्रम की अध्यक्षता उन्हें कर लेने दें। कहा है कि इस कृपा के लिए आपके बहुत आभारी होंगे। लेकिन मेरे लिए यह बड़े संकट की बात है।’

त्रिपाठी जी ठहरे सज्जन व्यक्ति। तुरंत बोले, ‘ठीक है। वे ही अध्यक्षता करें। क्या फर्क पड़ता है?’

सयाने जी चेहरे पर पश्चात्ताप का भाव पहने बाहर निकले, लेकिन स्कूटर पर बैठते ही उनका भाव बदला और वे मुस्कराते हुए आगे बढ़ गये।

दूसरे दिन त्रिपाठी जी के पास नगर के साहित्यकारों में ‘नारद’ की उपाधि पाये ‘बेदर्द’ जी का फोन आ गया। पूछने लगे, ‘सुना है आप सयाने के कार्यक्रम की अध्यक्षता नहीं कर रहे हैं?’ त्रिपाठी जी ने पूरी जानकारी दी तो ‘बेदर्द’ जी बोले,  ‘सयानेलाल बहुत काइंयां है और आप बहुत भोले हैं। विकल जी बड़े प्रचार-प्रेमी हैं। उन्होंने  अध्यक्षता के लिए सयाने  को ग्यारह  हज़ार रुपये का वादा किया है। वे अपने साथ सौ रुपये की दिहाड़ी पर बीस पच्चीस श्रोता भी लाएंगे। साथ ही वे सभी श्रोताओं की चाय का खर्चा भी उठाएंगे। यह सब मुझे खुद सयानेलाल ने बताया। वह विकल जी को बुलाकर बहुत खुश है। आप आजकल की साहित्यकारी के लटके झटके से वाकिफ़ नहीं हैं।’

त्रिपाठी जी हंसकर बोले, ‘ठीक कहते हो, भैया। यह आजकल की साहित्यकारी समझना हम जैसे अनाड़ियों के बस का नहीं है।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३३३ – स्टैच्यू..! ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३३३ स्टैच्यू..! ?

संध्याकाल है। शब्दों का महात्म्य देखिए कि प्रत्येक व्यक्ति उनका अर्थ अपने संदर्भ से ग्रहण कर सकता है। संध्याकाल, दिन का अवसान हो सकता है तो जीवन की सांझ भी। इसके सिवा भी कई संदर्भ हो सकते हैं। इस महात्म्य की फिर कभी चर्चा करेंगे। संप्रति घटना और उससे घटित चिंतन पर मनन करते हैं।

सो अस्त हुए सूर्य की साक्षी में कुछ सौदा लेने बाज़ार निकला हूँ। बाज़ार सामान्यत: पैदल जाता हूँ। पदभ्रमण, निरीक्षण और तदनुसार अध्ययन का अवसर देता है। यूँ भी मुझे विशेषकर मनुष्य के अध्ययन में ख़ास रुचि है। संभवत: इसी कारण एक कविता ने मुझसे लिखवाया, ‘उसने पढ़ी आदमी पर लिखी किताबें/ मैं आदमी को पढ़ता रहा।’

आदमी को पढ़ने की यात्रा पुराने मकानों के बीच की एक गली से गुज़री। बच्चों का एक झुंड अपने कल्लोल में व्यस्त है। कोई क्या कह रहा है, समझ पाना कठिन है। तभी एक स्पष्ट स्वर सुनाई देता है, ‘गौरव स्टेच्यू!’ देखता हूँ एक लड़का बिना हिले-डुले बुत बनकर खड़ा हो गया है। . ‘ ऐ, जल्दी रिलीज़ कर। हमको खेलना है’, एक आवाज़ आती है। स्टैच्यू देनेवाली बच्ची खिलखिलाती है, रिलीज़ कर देती है और कल्लोल जस का तस।

भीतर कल्लोल करते विचारों को मानो दिशा मिल जाती है। जीवन में कब-कब ऐसा हुआ कि  परिस्थितियों ने कहा ‘स्टैच्यू’ और अपनी सारी संभावनाओं को रोककर  बुत बनकर खड़ा होना पड़ा! गिरना अपराध नहीं है पर गिरकर उठने का प्रयास न करना अपराध है। वैसे ही नियति के हाथों स्टैच्यू होना यात्रा का पड़ाव हो सकता है पर गंतव्य नहीं। ऐसे स्टैच्यू सबके जीवन में आते हैं। विलक्षण होते हैं जो स्टैच्यू से निकलकर जीवन की मैराथन को नये आयाम और नयी ऊँचाइयाँ देते हैं।

नये आयाम देनेवाला ऐसा एक नाम है अरुणिमा सिन्हा का। अरुणिमा, बॉलीबॉल और फुटबॉल की उदीयमान युवा खिलाड़ी रही। दोनों खेलों में अपने राज्य उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व कर चुकी थी। सन 2011 में रेलयात्रा करते हुए बैग और सोने की चेन लुटेरों के हवाले न करने की एवज़ में उन्हें चलती रेल से नीचे फेंक दिया गया। इस बर्बर घटना में अरुणिमा को अपना एक पैर खोना पड़ा। केवल 23 वर्ष की आयु में नियति ने स्टैच्यू दे दिया।

युवा खिलाड़ी अब न फुटबॉल खेल सकती थी, न बॉलीबॉल। नियति अपना काम कर चुकी थी पर अनेक अवरोधक लगाकर सूर्य के आलोक को रोका जा सकता है क्या? कृत्रिम टांग लगवाकर अरुणिमा ने पर्वतारोहण का अभ्यास आरम्भ किया।  नियति दाँतो तले उँगली दबाये देखती रह गयी जब 21 मई 2013 को अरुणिमा ने माउंट एवरेस्ट फतह कर लिया। अरुणिमा सिन्हा स्टैच्यू को झिंझोड़कर दुनिया की सबसे ऊँची चोटी पर पहुँचने वाली पहली दिव्यांग पर्वतारोही बनीं।

चकबस्त का एक शेर है,

कमाले बुज़दिली है, पस्त होना अपनी आँखों में

अगर थोड़ी सी हिम्मत हो तो क्या हो सकता नहीं।

स्टैच्यू को अपनी जिजीविषा से, अपने साहस से स्वयं रिलीज़ करके, अपनी ऊर्जा के सकारात्मक प्रवाह से अरुणिमा होनेवालों  की अनगिनत अद्भुत कथाएँ हैं। अपनी आँख में विजय संजोने वाले कुछ असाधारण व्यक्तित्वों की प्रतिनिधि कथाओं की चर्चा उवाच के अगले अंकों में करने का यत्न रहेगा। प्रक्रिया तो चलती रहेगी पर कुँवर नारायण की पंक्तियाँ सदा स्मरण रहें, ‘हारा वही जो लड़ा नहीं।’..इति।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ हनुमान साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी। 🕉️ 💥 

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९३ – व्यंग्य – यादों की अर्थी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – यादों की अर्थी)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९३ – व्यंग्य  – यादों की अर्थी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

वह दोपहर किसी सड़ी हुई कढ़ी जैसी चिपचिपी थी। कार के भीतर का तापमान और मेरी पत्नी सुजाता के तेवर, दोनों ही चालीस डिग्री के पार थे। सामने डैशबोर्ड पर रखा मोबाइल फोन किसी देवता की तरह चमक रहा था, जिसमें एक निर्जीव स्त्री की आवाज़ हमें स्वर्ग का रास्ता दिखा रही थी। “अगले सौ मीटर पर बाएं मुड़ें,” उस आवाज़ में वह भरोसा था जो अक्सर धोखेबाज वकीलों की बातों में होता है। मैंने स्टीयरिंग घुमाया, पर सामने सड़क नहीं, एक गहरा नाला था जो शहर की सारी गंदगी समेटे इतिहास की तरह बह रहा था। सुजाता ने ठंडी आह भरी, “मैंने कहा था न, वह दाहिने कह रही है, तुम हमेशा औरतों को गलत समझते हो।” मैंने मोबाइल की स्क्रीन की तरफ देखा, वह नीली रेखा अब किसी घायल सांप की तरह छटपटा रही थी। मुझे लगा जैसे वह नक्शा नहीं, मेरा चरित्र प्रमाण पत्र है, जिसे एक उपग्रह अंतरिक्ष से बैठकर लिख रहा है।

“री-रूटिंग…” फोन से आवाज़ आई। यह शब्द सुनते ही सुजाता का चेहरा ऐसा हो गया जैसे मैंने उसकी शादी का गहना गिरवी रख दिया हो। “देखो, यह मशीन भी मान रही है कि तुम भटक गए हो। इसे दोष मत दो, यह तो विज्ञान है। तुम्हारी बुद्धि ही पत्थर की हो गई है।” गाड़ी अब एक ऐसी संकरी गली में थी जहाँ धूप भी घुसने से पहले दो बार सोचती होगी। बगल की दुकान पर बैठे एक बूढ़े ने हमें ऐसे देखा जैसे हम किसी दूसरे ग्रह से आए शरणार्थी हों। मैंने चीखकर कहा, “यह बाएं बोल रही है, पर यहाँ तो दीवार है!” सुजाता ने मोबाइल छीन लिया और उसे अपनी छाती से ऐसे लगा लिया जैसे वह उसका सर्वस्व हो। “बेचारी को डराओ मत, वह सही कह रही है, तुमने ही इसे ठीक से पकड़ा नहीं होगा। देखो, वह रो रही है!” वास्तव में, स्क्रीन पर पसीने की एक बूंद गिरी थी, जो सुजाता के विलाप का हिस्सा लग रही थी।

कार अब एक सुनसान श्मशान घाट के गेट पर खड़ी थी। जीपीएस की वह स्त्री अब फुसफुसा रही थी, “आप गंतव्य पर पहुँच चुके हैं।” चारों तरफ खामोशी थी, सिवाय इंजन की गड़गड़ाहट और सुजाता की सिसकियों के। “देखा? पहुँच गए न? अब खुश हो? अपनी ज़िद के चक्कर में तुमने इसे भी पागल कर दिया।” उसने फोन को डैशबोर्ड पर पटक दिया। मुझे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। हम यहाँ क्यों आए? हमें तो अपनी बेटी की शादी के रिसेप्शन में जाना था, जो शहर के सबसे बड़े होटल में था। मैंने खिड़की से बाहर देखा, वहाँ कोई लाइट नहीं थी, कोई संगीत नहीं था। बस कुछ टूटी हुई कब्रें थीं और उन पर जमी धूल। सुजाता ने ज़ोर-ज़ोर से रोना शुरू कर दिया, “तुमने इस बेचारी मशीन को इतना प्रताड़ित किया कि इसने हार मान ली। तुमने इसे गलत साबित करने के लिए पूरा रास्ता ही बदल दिया!”

मैंने कांपते हाथों से फोन उठाया। स्क्रीन धुंधली थी। तभी मेरी नज़र पीछे वाली सीट पर पड़ी। वहाँ एक सफेद लिफाफा रखा था। वह शादी का कार्ड नहीं था। वह मेमोरी लॉस और अल्जाइमर की मेडिकल रिपोर्ट थी, जिस पर मेरा नाम बड़े अक्षरों में लिखा था। मैं हक्का-बक्का था। होटल? शादी? वह तो पिछले साल हो चुकी थी। तभी मेरी नज़र बगल वाली सीट पर पड़ी—वह खाली थी। वहाँ न सुजाता थी, न उसकी सिसकियाँ, बस उसकी एक पुरानी बनारसी साड़ी की गंध हवा में तैर रही थी। अचानक बिजली की तरह दिमाग में एक कौंध गई और दिल की धड़कनें किसी ढहती इमारत की तरह बैठ गईं। सुजाता को मरे हुए तो तीन साल बीत चुके थे; इसी श्मशान की आग ने उसे राख में बदला था। अल्जाइमर के अंधेरे गलियारों में भटकता मेरा दिमाग हर बार जीपीएस की उस नीली रेखा को सुजाता की आवाज़ समझ बैठता था। मैं हर शाम अपनी यादों के मलबे में दबी उसकी चिता तक खिंचा चला आता था। वह मशीन गलत नहीं थी, मेरा अस्तित्व ही ‘री-रूटिंग’ के जाल में फंसा था। उस निर्जन कब्रिस्तान में फोन फिर बोल उठा—”गंतव्य पर पहुँच चुके हैं।” सामने सुजाता की चिता जल रही थी। मैं अपनी ही याददाश्त की अर्थी उठाए खड़ा था। फोन पर वही नीली रेखा अब स्थिर हो चुकी थी। फोन से अब कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। मैंने खुद से पूछा, “बाएं मुड़ना था या दाएं?” तभी जीपीएस की आवाज़ फिर गूंजी, “वापस मुड़ें, आप फिर से अपनी यादों के गलत मोड़ पर आ गए हैं।” उस सन्नाटे में मुझे अहसास हुआ कि मैं जीपीएस को गलत नहीं ठहरा रहा था, मैं तो उस हकीकत से लड़ रहा था जो मेरी सुध-बुध के साथ ही दफन हो चुकी थी। कार वहीं खड़ी थी, और मैं मैप की उस आखिरी बिंदु पर था, जहाँ से आगे कोई सड़क नहीं थी, सिर्फ एक गहरा अंधेरा था।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९२ – व्यंग्य – थाली का रेगिस्तान: एक विलाप ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – थाली का रेगिस्तान: एक विलाप।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९२ – व्यंग्य  – थाली का रेगिस्तान: एक विलाप ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

हवा में घुटन थी, जैसे किसी पुरानी हवेली के तहखाने में सदियों से बंद सन्नाटा। अलख निरंजन जी अपनी मेज पर वैसे ही विराजमान थे, जैसे कोई क्रूर तानाशाह अंतिम डिक्री जारी करने वाला हो। उनके सामने बैठी सुधा के हाथ कांप रहे थे, मानो वह रसोई से कोई पकवान नहीं, बल्कि अपनी किस्मत का फैसला लेकर आई हो। अलख जी की नजरें पहली थाली पर गिरी। उन्होंने नाक सिकोड़ी, जैसे किसी ने उनके सामने कोई सड़ा हुआ तर्क रख दिया हो। “भिंडी? यह लेडी फिंगर नहीं, किसी बूढ़ी सभ्यता की सड़ी हुई उंगलियां हैं, दांतों में फंसकर मेरी हालत खराब कर देंगी।” सुधा ने चुपचाप थाली बदली। दूसरी आई तो उन्होंने उसे अपराधी की तरह घूरा। “बैंगन? यह तो बे-गुन है, शरीर में वायु का ऐसा तांडव मचाएगा कि घर भूकंप की चपेट में आ जाएगा।” उनके चेहरे पर छाई वह कुटिल गंभीरता किसी कसाई की मुस्कान जैसी थी, जो छुरी चलाने से पहले मंत्र पढ़ता है।

सिलसिला थमा नहीं, वह तो एक लंबी शवयात्रा की तरह आगे बढ़ता गया। गोभी को उन्होंने “फूलों का कब्रिस्तान” कहकर ठुकरा दिया और मटर को “हरे रंग की गोलियां” बताया जो पेट में धमाका कर सकती हैं। लौकी को देखकर वे ऐसे बिदके जैसे सामने नागिन फन फैलाए खड़ी हो—”यह तो पानी का छल है, इसमें आत्मा कहाँ है?” करेले पर तो उन्होंने अपनी पूरी दार्शनिक क्षमता झोंक दी, बोले, “इतनी कड़वाहट तो समाज में भी नहीं, जितनी इस अधम फल में है।” आलू को उन्होंने “अहंकार का प्रतीक” माना और पनीर को “धोखेबाज रईस।” कटहल उन्हें मांस का स्वांग लगा, तो टमाटर रक्त के धब्बों जैसा। अरबी को उन्होंने फिसलन भरी राजनीति का नाम दिया और मूली को सामाजिक मर्यादा का दुश्मन। सुधा की आँखों से आंसू नहीं, मानो पिघला हुआ धैर्य बह रहा था। वह बीसवीं बार रसोई की ओर गई, एक ऐसी सब्जी लेकर जिसे ठुकराने का मतलब था अस्तित्व का अंत।

सुधा ने अगली सब्जी सामने रखी—तोरई। अलख जी ने उसे छुआ और पीछे हट गए जैसे करंट लग गया हो। “यह? यह तो किसी बीमार की अंतिम वसीयत जैसी पीली और मरी हुई है। इसे खाकर तो यमराज भी रास्ता भूल जाए।”  पत्नी की सहनशीलता अब अपने चरम पर थी। कमरे का तापमान गिर रहा था। अलख जी ने मेज को धक्का दिया और चीख पड़े, “सुधा, इस घर में इतनी सारी सब्जी हैं, पर एक भी ऐसी नहीं जो मेरी अंतरात्मा को तृप्त कर सके। क्या तुम चाहती हो कि मैं भूखा मर जाऊं?” दुखी होते हुए बोले। सुधा स्थिर खड़ी थी। उसने अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा और अलख जी के बहुत करीब जाकर खड़ी हो गई। उसकी आँखों में इतना गुस्सा था कि शब्दों में बयान करना मुश्किल है। अलख जी डरकर कुर्सी से चिपक गए।

अचानक सुधा ने अलख जी के सामने एक खाली प्लेट रखी। बिल्कुल कोरी, चांदी जैसी चमकती हुई। अलख जी ने हकलाते हुए पूछा, “इसमें… इसमें क्या है?” सुधा ने एक अदृश्य निवाला तोड़ा और अलख जी के मुँह के पास ले गई। “खाओ,” उसने आदेश दिया। अलख जी ने मुँह खोला, कुछ महसूस नहीं हुआ। “स्वाद कैसा है?” सुधा ने पूछा। अलख जी की आँखें फटी की फटी रह गईं, “अरे! यह तो अद्भुत है! ऐसा स्वाद तो स्वर्ग में भी नहीं होगा! क्या है यह?” सुधा धीरे से मुस्कुराई। उसने कहा, “यह आपका अपना ‘अहंकार’ है। पिछले चालीस मिनट से आप वही तो उगल रहे थे। मैंने बस उसे ही फ्राई करके परोस दिया है। इतनी सारी सब्जियां तो केवल बहाना थीं, असली व्यंजन तो आपका वह कुतर्क था जिसे दुनिया ‘नखरा’ कहती है।” अलख जी ने प्लेट देखी, वह अभी भी खाली थी, पर उनके पेट से डकार आई। वे हतप्रभ थे कि उन्होंने बिना कुछ खाए अपना पूरा अस्तित्व ही डकार लिया था।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २४ – हास्य-व्यंग्य – “महिला आरक्षण बिल और वर्मा जी” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय हास्य – व्यंग्य “महिला आरक्षण बिल और वर्मा जी

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २४ ☆

☆ हास्य – व्यंग्य ☆ “महिला आरक्षण बिल और वर्मा जी” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

बहुत सुबह डोरवेल बजी, मैं समझ गया कि अवश्य ही किसी समस्या के साथ वर्मा जी आए होंगे। दरवाजा खोला, मेरा अनुमान सही था। वर्मा जी अंदर आकर चुपचाप पालथी मारकर सोफे पर बैठ गए। मैं अखबार पढ़ने लगा।

वर्मा जी का मौन टूट ही नहीं रहा था। कुछ देर बाद मैंने पूछा – क्या बात है वर्मा जी ? वे बोले – बहुत बुरा हुआ भाई साहब और फिर मौन हो गए ! इतने में मेरी पत्नी चाय लेकर आ गई। वर्मा जी की मुद्रा देख कर उसने भी प्रश्न किया – क्या बात है वर्मा जी आज इतनी उदासी के साथ मौन ? वे चाय की चुस्की लेते हुए बोले – भाभी जी बहुत बुरा हुआ। मैंने कहा – भाई जी, बुरा कहां हुआ ? कल आपके घर गैस का सिलेंडर आ गया है, डीजल, पेट्रोल भी मिल रहा है। ट्रंप का दिमाग दुरुस्त चलते ईरान – अमेरिका युद्ध भी समाप्त होने की ओर बढ़ रहा है और आप कह रहे हैं कि बहुत बुरा हुआ ? वे बोले – भाई साहब आज गैस, पेट्रोल, ईरान – अमेरिका की बात नहीं, मैं तो संसद में महिला आरक्षण बिल फेल हो जाने के संदर्भ में कह रहा हूं कि बहुत बुरा हुआ। मैंने कहा भाई जी इस बिल के पीछे सरकार और विपक्ष का जो भी नजरिया या राजनीति हो वह अलग बात है, लेकिन यहां मुझे फिल्म “बाजीगर” का एक डायलॉग याद आ रहा है जिसे शाहरुख खान ने हीरोइन के पिता से जानबूझ कर कार रेस हारने के बाद बोला था – “जीतने के लिए हारने वाले को बाजीगर कहते हैं”। सब जानते हैं कि मोदी जी “बाजीगर” हैं, उनकी हार के पीछे कोई राज हो सकता है ! वैसे महिला आरक्षण बिल फेल हो जाने से देश के स्वार्थी पुरुष अवश्य ही खुश हो रहे होंगे। मेरी बात सुनकर वर्मा जी का दर्द छलक पड़ा, आँखें डबडबाई आईं। वे बोले – भाई साहब, मेरे सपने तो चकनाचूर हो गए। सोचा था अपनी पत्नी को लोकसभा का चुनाव लड़ाउंगा और सरपंच पति, पार्षद पति, विधायक पति की तरह सांसद पति कहलाऊंगा, पर हाय री किस्मत। मैंने कहा – वर्मा जी, दुखी न हों 29 में न सही 34 के चुनाव तक तो महिला आरक्षण लागू हो ही जाएगा। 34 के चुनाव के लिए अभी पर्याप्त समय है आप भाभी जी के नाम से समाज सेवा और चुनाव प्रचार तो चालू कर ही दें ताकि जीत पक्की हो जाए। जब भाभी जी समाज सेविका और लोकसभा की भावी प्रत्याशी कहलाएंगी तब भी आपकी ही इज्जत बढ़ेगी। वे राहत की सांस लेते हुए बोले – भाई साहब आपने सही कहा, लेकिन 34 के चुनाव के लिए अभी लगभग 9 साल हैं इतना लंबा समय कटेगा कैसे ? मैंने कहा- भाई जी आप तो भाभी जी की समाज सेवी और भावी लोकसभा प्रत्याशी की छवि बनाने में जुट जाइए समय तो चुटकियों में बीत जाएगा, बल्कि कहीं ऐसा न हो कि समय कम पड़ जाए और आपको पछताना पड़े।

मेरी बात सुनकर वर्मा जी उठ खड़े हुए। मैंने पूछा क्या हुआ, कहां जा रहे हैं ? वे बोले – भाई साहब, देर नहीं करना चाहता, पत्नी की छवि बनाने का कार्य शुरू कर ही दूं।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३२ ☆ व्यंग्य – विष्णु भगवान को रिमाइंडर ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य  – ‘विष्णु भगवान को रिमाइंडर‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३३२ ☆

☆ व्यंग्य ☆ विष्णु भगवान को रिमाइंडर डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

 

प्रभु,

कई साल पहले मैंने आपको एक पत्र के द्वारा निवेदन किया था कि चूंकि अब मेरी उम्र आपके प्रत्यक्ष दर्शन के लायक हो गयी है, अतः मेरे सपने में किसी प्रतिनिधि को भेज कर जानकारी मुहैया करायें कि स्वर्ग और नरक में इंतज़ामात कैसे हैं। अभी कथावाचकों से जो जानकारी मिलती है उससे बहुत समाधान नहीं होता। अफसोस है कि मेरे निवेदन का आज तक कोई उत्तर नहीं मिला। लगता है आपके दफ़्तरों में कामकाज ठीक नहीं है।

मुझे यह निवेदन इसलिए करना पड़ा क्योंकि यहां मृत्युलोक में हमारी लाइफ़-स्टाइल में बहुत तरक्की हो गयी है। हम बहुत आराम-पसन्द हो गये हैं। हमारे बाप-दादा ने टेबिल-फ़ैन भी नहीं देखा था, लेकिन हम ए.सी. की हवा ले रहे हैं, भले ही बार-बार ज़ुकाम से पीड़ित हो रहे हों। हमारे बहुत से काम अब ‘रोबो’ और ‘रिमोट’ कर रहे हैं। आदमी को हिलने-डुलने की ज़रूरत नहीं है। एक दिन सीधा बिस्तर से ट्रांसफर होकर अर्थी पर चढ़ जाएगा।

प्रभु, यह ध्यान रहे कि अब हम रथ की सवारी के लायक नहीं रहे। हम में से ज़्यादातर ‘ऑस्टियोपोरोसिस’ और ‘आर्थ्राइटिस’ के मरीज़ हैं। ‘जंक फ़ूड’ खाते-खाते हमारी हड्डियां कमज़ोर हो गयी हैं। रथ पर बैठेंगे तो निश्चय ही दो-चार हड्डियां टूटेंगीं। यहां तो साधु-सन्यासी भी करोड़ों की कार में घूम रहे हैं और करोड़ों का सोना पहन रहे हैं। इसलिए निवेदन है कि हमारी हालत के मद्देनज़र आरामदेह ट्रांसपोर्ट का इंतज़ाम हो। डायबिटीज़ और ब्लड-प्रेशर के मरीज़ों के लिए वहां क्या इंतज़ाम है, यह भी शंका बनी हुई है।

एक विशेष बात जिसके लिए मैं यह पत्र लिख रहा हूं यह है कि आपके चित्रों में आप अपनी ससुराल यानी समुद्र में शेषशैया पर लेटे हैं और आपकी पत्नी लक्ष्मी आपके चरण चांप रही हैं। देख कर कुछ अजीब लगता है। एक तो आपका इतने दिन तक ससुराल में रहना ठीक नहीं है। हमारे यहां कहावत है ‘ससुरार सुख की सार, रहै दिना दो चार।’ यानी ससुराल में सुख मिलता है, बशर्ते कि दो-चार दिन ही रहा जाए। इसलिए समझना मुश्किल है कि आप वहां कैसे हज़ारों साल से डेरा जमाये हैं। ससुर साहब आपके लिहाज में कुछ न बोलते होंगे, लेकिन आपका वहां इतने लंबे समय तक घरजमाई की तरह टिकना उचित नहीं लगता।

लक्ष्मी जी का लगातार आपके चरण चांपना आपके बहुत से भक्तों को अटपटा लग रहा है। यह नारी-अस्मिता और स्त्री-स्वातंत्र्य का ज़माना है। करवा चौथ और तीजा को छोड़ दें तो आज की नारियां पति के चरण छूते हुए फोटो खिंचाने से हिचकती हैं। एक पुरानी फिल्म में पत्नी को पति-भक्ति में गाते हुए सुना था— ‘कौन जाए मथुरा, कौन जाए काशी, इन तीर्थों से मुझे क्या काम है; मेरे घर में ही हैं भगवान मेरे, उनके चरनों में मेरे चारों धाम हैं।’ ऐसे गीत अब सुनायी नहीं पड़ते। पतिदेव का मर्तबा भी पहले जैसा नहीं रहा। इस बीच नारी-अस्मिता के बड़े-बड़े आंदोलन हो गये, जिनके मार्फत स्त्री को समझा दिया गया कि पति नाम का प्राणी ‘परमेश्वर’ नहीं, महज़ हाड़-मांस का मामूली पुतला है। परिणामत: कई घरों में पति की इज़्ज़त दो कौड़ी की हो गयी है।

एक और बात यह कि आप अपने चार हाथों में से एक में पद्म यानी कमल धारण किये हैं और आपका एक हाथ अभय मुद्रा में उठा है। मुश्किल यह है कि कमल और हाथ हमारे यहां पार्टियों के चुनाव-चिन्ह हैं, इसलिए यहां दो पार्टियों के बीच सिरफुटव्वल हो रही है। दोनों आपके चित्रों की दुहाई देकर कहती हैं कि आपका आशीर्वाद उन्हें प्राप्त हो रहा है। इस संबंध में आपकी तरफ से कुछ स्पष्टीकरण मिल सके तो यह खींचतान बंद हो। गनीमत है कि आपके शंख और चक्र किसी पार्टी के चुनाव चिन्ह नहीं हैं, अन्यथा और बवाल मचता।

अन्त में मेरा आपसे पुनः निवेदन है कि  ‘वहां’ के इंतज़ामात के बारे में मेरे द्वारा चाही गयी जानकारी मुहैया करायें ताकि मेरे जैसे लोग निश्चिंत होकर स्वर्ग या नरक में प्रवेश कर सकें। दूसरे, आप जल्दी लक्ष्मी जी के साथ ससुराल छोड़कर अपने घर लौटें ताकि भक्तों का असमंजस दूर हो सके।

मेरी बातों को अन्यथा न लें। कृपा बनाये रखें।

आपका परम भक्त

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४६ – व्यंग्य- बस, कुछ जुगाड़ कीजिए ‘वह’ मिल जाएगा – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य बस, कुछ जुगाड़ कीजिए ‘वह’ मिल जाएगाकी समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४६ 

☆ व्यंग्य- बस, कुछ जुगाड़ कीजिए ‘वह’ मिल जाएगा ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

मन नहीं मान रहा था। स्वयं के लिए स्वयं प्रयास करें। मगर, पुरस्कार की राशि व पुरस्कार का नाम बड़ा था। सो, मन मसोस कर दूसरे साहित्यकार से संपर्क किया। बीस अनुशंसाएं कार्रवाई। जब इक्कीसवे से संपर्क किया तो उसने स्पष्ट मना कर दिया।

“भाई साहब! इस बार आपका नंबर नहीं आएगा।” उन्होंने फोन पर स्पष्ट मना कर दिया, “आपकी उम्र 60 साल से कम है। यह पुरस्कार इससे ज्यादा उम्र वालों को मिलता है।”

हमें तो विश्वास नहीं हुआ। ऐसा भी होता है। तब उधर से जवाब आया, “भाई साहब, वरिष्ठता भी तो कोई चीज होती है। इसलिए आप ‘उनकी’ अनुशंसा कर दीजिए। अगली बार जब आप ‘सठिया’ जाएंगे तो आपको गारंटीड पुरस्कार मिल जाएगा।”

बस! हमें गारंटी मिल गई थी। अंधे को क्या चाहिए? लाठी का सहारा। वह हमें मिल गया था, इसलिए हमने उनकी अनुशंसा कर दी। तब हमने देखा कि कमाल हो गया। वे सठियाए ‘पट्ठे’ पुरस्कार पा गए। तब हमें मालूम हुआ कि पुरस्कार पाने के लिए बहुत कुछ करना होता है।

हमारे मित्र ने इसका ‘गुरु मंत्र’ भी हमें बता दिया। उन्होंने कहा, “आपने कभी विदेश यात्रा की है?” चूंकि हम कभी विदेश क्या, नेपाल तक नहीं गए थे इसलिए स्पष्ट मना कर दिया। तब वे बोले, “मान लीजिए। यह ‘विदेश’ यात्रा यानी आपका पुरस्कार है।”

“जी।” हमने न चाहते हुए हांमी भर दी। “वह आपको प्राप्त करना है।” उनके यह कहते ही हमने ‘जी-जी’ कहना शुरू कर दिया। वे हमें पुरस्कार प्राप्त करने की तरकीबें यानी मशक्कत बताते रहे।

सबसे पहले आपको ‘पासपोर्ट’ बनवाना पड़ेगा। यानी आपकी कोई पहचान हो। यह पहचान योग्यता से नहीं होती है। इसके लिए जुगाड़ की जरूरत पड़ती है। आप किस तरह इधर-उधर से अपने लिए सभी सबूत जुटा सकते हैं। वह कागजी सबूत जिन्हें पासपोर्ट बनवाने के लिए सबसे पहले पेश करना होता है।

सबसे पहले एक काम कीजिए। यह पता कीजिए कि पुरस्कार के इस ‘विदेश’ से कौन-कौन जुड़ा है? कहां-कहां से क्या-क्या जुगाड़ लगाना लगाया जा सकता है? उनसे संपर्क कीजिए। चाहे गुप्त मंत्रणा, कॉफी शॉप की बैठक, समीक्षाएं, सोशल मीडिया पर अपने ढोल की पोल, तुम मुझे वोट दो मैं तुम्हें वोट दूंगा, तू मेरी पीठ खुजा मैं तेरी पीठ खुजाऊंगा, जैसी सभी रणनीति से काम कीजिए। ताकि आपको एक ‘पासपोर्ट’ मिल जाए। आप कुछ हैं, कुछ लिखते हैं। जिनकी चर्चा होती है। यही आपकी सबसे बड़ी पहचान है। यानी यही आपका ‘पासपोर्ट’ होगा।

अब दूसरा काम कीजिए। इस पुरस्कार यानी विदेश जाने के लिए अर्थात पुरस्कार पाने के लिए वीजा का बंदोबस्त कीजिए। यानी उस अनुशंसा को कबाडिये जो आपको विदेश जाने के लिए वीजा दिला सकें। यानी आपने जो पासपोर्ट से अपनी पहचान बनाई है उसकी सभी चीजें वीजा देने वाले को पहुंचा दीजिए। उससे स्पष्ट तौर पर कह दीजिए। आपको विदेश जाना है। वीजा चाहिए। इसके लिए हर जोड़-तोड़ व खर्चा बता दे। उसे क्या-क्या करना है? उसे समझा दे।

सच मानिए, यह मध्यस्थ है ना, वे वीजा दिलवाने में माहिर होते हैं। वे आपको वीजा प्राप्त करने का तरीका, उसका खर्चा, विदेश जाने के गुण, सब कुछ बता देंगे। बस आपको वीजा प्राप्त करने के लिए कुछ दाम खर्च करने पड़ेंगे। हो सकता है निर्णयको से मिलना पड़े। उनके अनुसार कागज पूर्ति, अनुशंसा या कुछ ऐसा वैसा छपवाना पड़ सकता है जो आपने कभी सोचा व समझ ना हो। मगर इसकी चिंता ना करें। वे इसका भी रास्ता बता देंगे।

बस, आपको उनके कहने अनुसार दो-चार महीने कड़ी मेहनत व मशक्कत करनी पड़ेगी। हो सकता है फोन कॉल, ईमेल, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम आदि पर इच्छित- अनिच्छित व अनुचित चीज पोस्ट करनी पड़े। इसके लिए दिन-रात लगे रहना पड़ सकता है। कारण, आपका लक्ष्य व इच्छा बहुत बड़ी है। इसलिए त्याग भी बड़ा करना पड़ेगा।

इतना सब कुछ हो जाने के बाद, जब आपको विदेश जाने का रास्ता साफ हो जाए और वीजा मिल जाए तब आपको यात्रा-व्यय तैयार रखना पड़ेगा। तभी आप विदेश जा पाएंगे।

उनकी यह बात सुनकर लगा कि वाकई विदेश जाना यानी पुरस्कार पाना किसी पासपोर्ट और वीजा प्राप्त करने से कम नहीं है। यदि इसके बावजूद विदेश यात्रा का व्यय पास में न हो तो विदेश नहीं जा पाएंगे। यह सुनकर हम मित्र की सलाह पर नतमस्तक हो गए। वाकई विदेश जाना किसी योग्यता से काम नहीं है। इसलिए हमने सोचा कि शायद हम इस योग्यता को भविष्य में प्राप्त कर पाएंगे? यही सोचकर अपने आप को मानसिक रूप से तैयार करने लगे हैं।

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© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

29-01- 2025

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

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