(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– प्रकृति…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # ७९ — प्रकृति —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
संसार के एक किनारे में एक विशाल रेगिस्तान पानी में डूब रहा था। प्रश्न पैदा हुआ जो रेगिस्तान पानी के लिए हमेशा तरसा कैसे हुआ कि उसके डूबने के लिए इतना पानी निकल आया? इस प्रश्न का उत्तर तत्काल न मिल कर बहुत बाद में मिला। इस तरह के प्रश्नों के उत्तर बाद में ही मिलते हैं। संसार के दूसरे किनारे में बहुत विशाल पानी था। वैसे विशाल पानी को चीर कर उससे भी बड़ा एक रेगिस्तान उभर रहा था।
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३०७ ☆ तमसो मा ज्योतिर्गमय…
दीपावली, भारतीय लोकजीवन का सबसे बड़ा त्योहार है। कार्तिक मास की अमावस्या को सम्पन्न होने वाले इस पर्व में घर-घर दीप जलाये जाते हैं। अपने घर में प्रकाश करना मनुष्य की सहज और स्वाभाविक वृत्ति है किंतु घर के साथ परिसर को आलोकित करना उदात्तता है। शतपथ ब्राह्मण का उद्घोष है,
असतो मा सद्गमय,
तमसो मा ज्योतिर्गमय,
मृत्योर्मामृतं गमय…!
‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ से भौतिक संसार में प्रकाश का विस्तार भी अभिप्रेत है। हर दीप अपने स्तर पर प्रकाश देता है पर असंख्य दीपक सामूहिक रूप से जब साथ आते हैं तो अमावस्या दीपावली हो जाती है।
इन पंक्तियों के लेखक की दीपावली पर एक चर्चित कविता है, जिसे विनम्रता से साझा कर रहा हूँ,
अँधेरा मुझे डराता रहा,
हर अँधेरे के विरुद्ध
एक दीप मैं जलाता रहा,
उजास की मेरी मुहिम
शनै:-शनै: रंग लाई,
अनगिन दीयों से
रात झिलमिलाई,
सिर पर पैर रख
अँधेरा पलायन कर गया
और इस अमावस
मैंने दीपावली मनाई !
कथनी और करनी दो भिन्न शब्द हैं। इन दोनों का अर्थ जिसने जीवन में अभिन्न कर लिया, वह मानव से देवता हो गया। सामूहिक प्रयासों की बात करना सरल है पर वैदिक संस्कृति यथार्थ में व्यष्टि के साथ समष्टि को भी दीपों से प्रभासित करने का उदाहरण प्रस्तुत करती है। सामूहिकता का ऐसा क्रियावान उदाहरण दुनिया भर में मिलना कठिन है। यह संस्कृति ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ केवल कहती नहीं अपितु अंधकार को प्रकाश का दान देती भी है।
प्रभु श्रीराम द्वारा रावण का वध करके अयोध्या लौटने पर जनता ने राज्य में दीप प्रज्ज्वलित कर दीपावली मनाई थी। श्रीराम सद्गुण का साकार स्वरूप हैं। रावण, तमोगुण का प्रतीक है। श्रीराम ने समाज के हर वर्ग को साथ लेकर रावण को समाप्त किया था। तम से ज्योति की यात्रा का एक बिंब यह भी है। स्वाभाविक है कि सामूहिक दीपोत्सव का रेकॉर्ड भी भारतीयों के नाम ही है। यह सामूहिकता, सामासिकता और एकात्मता का प्रमाणित वैश्विक दस्तावेज़ भी है।
तथापि सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि वर्तमान में चंचल धन और पार्थिव अधिकार के मद ने आँखों पर ऐसी पट्टी बांध दी है कि हम त्योहार या उत्सव की मूल परम्परा ही भुला बैठे हैं। आद्य चिकित्सक धन्वंतरी की त्रयोदशी को हमने धन की तेरस तक सीमित कर लिया। रूप की चतुर्दशी, स्वरूप को समर्पित कर दी। दीपावली, प्रभु श्रीराम के अयोध्या लौटने, मूल्यों की विजय एवं अर्चना का प्रतीक न होकर केवल द्रव्यपूजन का साधन हो गई।
उत्सव और त्योहारों को उनमें अंतर्निहित उदात्तता के साथ मनाने का पुनर्स्मरण हमें करना ही होगा। अपने जीवन के अंधकार के विरुद्ध एक दीप हमें प्रज्ज्वलित करना ही होगा। जिस दिन एक भी दीपक इस सुविधानुसार विस्मरण के अंधेरे के आगे सीना ठोंक कर खड़ा हो गया, यकीन मानिए, अमावस्या को दीपावली होने में समय नहीं लगेगा।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
नवरात्र साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी.
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – धनतेरस पर विशेष गीत – प्रभु धन दे…।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २५२ ☆
☆ धनतेरस पर विशेष गीत – प्रभु धन दे…☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “पहचान”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
कंडक्टर टिकट काट कर सुख की सांस लेता अपनी सीट तक लौटा तो हैरान रह गया। वहां एक आदमी पूरी शान से जमा हुआ था। कोई विनती का भाव नहीं। कोई कृतज्ञता नहीं। आंखों में उसकी खिल्ली उड़ाने जैसा भाव था।
कंडक्टर ने शुरू से आखिर तक मुआयना किया। कोई सीट खाली नहीं थी। बस ठसाठस भरी थी। वह टिकट काटते अब तक दम लेने के मूड में आ चुका था।
-जरा सरकिए..
उसने शान से जमे आदमी से कहा।
-क्यों?
-मुझे बैठना है।
-किसी और के साथ बैठो। मैं क्यों सिकुड़ सिमट कर तंग होता फिरुं?
-कृपया आप सरकने की बजाय खड़े हो जाइए सीट से। कंडक्टर ने सख्ती से कहा।
जमा हुआ आदमी थोड़ा सकपकाया, फिर संभलते हुए क्यों उछाल दिया।
-क्योंकि यह सीट मेरी है।
-कहां लिखा है?
जमे हुए आदमी ने गुस्से में भर कर कहा।
-हुजूर, आपकी पीठ पीछे लिखा है। पढ़ लें।
सचमुच जमे हुए आदमी ने देखा, वहां साफ साफ लिखा था। अब उसने जमे रहने का दूसरा तरीका अपनाया। बजाय उठ कर खड़े होने के डांटते हुए बोला-मुझे पहचानते हो मैं कौन हूं? लाओ कम्पलेंट बुक। तुम्हारे अभद्र व्यवहार की शिकायत करुं।
-वाह। तू होगा कोई सडा अफसर और क्या? तभी न रौब गालिब कर रहा है कि मुझे पहचानो कौन हूं मैं। बता आज तक कोई मजदूर किसान भी इस मुल्क में इतने रौब से अपनी पहचान पूछता बताता है? चल, उठ खड़ा हो जा और कंडक्टर की सीट खाली कर। बड़ा आया पहचान बताने वाला। कम्पलेंट बुक मांगने वाला। कम्पलेंट बुक का पता है, कंडक्टर सीट का पता नहीं तेरे को?
उसने बांह पकड़ कर उसे खड़ा कर दिया। अफसर अपनी पहचान बताये बगैर खिड़की से लटक कर रह गया!
☆ संस्मरण☆ ~ पश्चिम उत्तर प्रदेश का आध्यात्मिक वैभवस्थल शुकतीर्थ (शुक्र ताल) ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
☆
समृद्ध पश्चिमी उत्तर प्रदेश का जनपद मुजफ्फरनगर, गन्ने की चीनी मिले एवं दूर दूर तक फैले गन्ने की फसलों के बीच मेरा वाहन आगे बढ़ रहा था। एक भ्रमण कार्यक्रम के सिलसिले में मेरा इस जनपद में आना हुआ। आर्थिक रूप से समृद्ध इस जनपद की साहित्यिक समृद्धि के विषय में जानने की उत्कंठा को मुजफ्फरनगर के प्रख्यात साहित्यकार एवं चिकित्सक डॉ. बी.के. पाण्डेय जी ने एवं डॉ. राकेश कौशिक ने पूर्ण किया।
जब से मैं यहां आया मेरी खोजी नजर इस क्षेत्र की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक समृद्धि को ढूंढ रही थी। मुझसे मेरे बड़े भाई श्री उमेश दत्त शर्मा जी से इस विषय बात हुई और होती भी क्यों नहीं, जब मैं उनके गृह जनपद के भ्रमण पर था।
भोपा, अथाई, सब कुछ मेरे जेहन में था। यात्रा का अंतिम पड़ाव पार करने के उपरांत समय की सुई सांय के पाँच से ऊपर के समय को पार कर चुकी थी। मेरी नजर एक मार्ग निर्देशिका की तरफ गयी। जिसपर शुकतीर्थ – तीन किलोमीटर लिखा हुआ दिखाई दिया। शुकतीर्थ शब्द मेरे मन मस्तिष्क में ज्योहीं आए एक विशेष स्पंदन की स्थिति उत्पन्न हुई।
आध्यात्मिक अभिरुचि एवं उस तपोभूमि से जुड़ी हुई कथाएं मेरे मन में मचल रही थी। अब मेरे पास मुजफ्फरनगर की आध्यात्मिक समृद्धि के दर्शन करने का अवसर आ गया था।
श्री सलित जी, जिन्हे स्थानीय रूप से हमारे सहयोग के लिए नामित किया गया था, शायद उन्होंने मेरे मन की बात को समझ लिया था।
सर..मैं समझ रहा हूं आप पावन तीर्थ ‘ शुकतीर्थ ‘की ओर चलना चाहते हैं।
डॉ.रजनीश ने एक पंक्ति में भागवत भगवान के प्राकट्य स्थल की बात और शुकदेव जी की एक लघुकथा कार में बैठे बैठे सामने धर दी। मैं और मेरे दो सहयोगी मित्र हम चारों शुकतीर्थ की पावन भूमि पर पहुंच चुके थे। थोड़ी ऊंचाई पर पैदल चलते-चलते हम उस पावन तीर्थ के प्रवेश द्वार की सीढ़िया पर पहुंचे तो मेरी नजरों के आगे वह अक्षय वटवृक्ष दृष्टिगत हो उठा जिसके नीचे बैठकर सुखदेव जी ने परीक्षित महाराज को भागवत भगवान की प्रथम महिमा कथा सुनाई थी।
यह क्या…!! मंदिर की सीढ़ियों से आगे कुछ ही कदम पड़े थे कि हमें एक पावन दिव्य युवा संत के दर्शन हुये। हम स्वयं ऐसे संत के दर्शन कर रहे थे और वे अगवानी के भाव में हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे।
दिव्य युवा विभूति कोई और नहीं थी बल्कि इस मंदिर को अपनी साधना एवं अध्ययन भूमि बनाने वाले पूज्य श्री अचल कृष्ण शास्त्री जी थे। दोनों हाथों को जोड़कर हम दोनों ने एक दूसरे के अभिवादन को स्वीकार किया। लेकिन हम स्वतः ही बाएं की तरफ मुड़ गए और हम पहुंच गए, उस अद्भुत, दिव्य, आध्यात्मिक स्थल पर जिस स्थान पर बैठकर शुकदेव जी ने महाराजा परीक्षित को श्री भागवत् भगवान की कथा सुनाई थी। आज भी यह पवित्र अक्षयबट वृक्ष जो कि लगभग साढे पांच सौ वर्षों से यहां पर इस रूप में है, मानो आज भी शुकदेव जी यहां पर विराजमान है।
लोग पीत सूत्रों से लिपटे हुए इस वृक्ष के समीप आकर पूजा अर्चन करते हैं।
भजन कीर्तन चल रहा था मंदिर में शुकदेवजी महाराज और महाराजा परीक्षित एवं उनकी कथा सुनती हुई मूर्तियां विराजमान थी।
वार्ता के केंद्र में परीक्षित महाराज की चर्चा हुई तो मुझे अतीत के वे दिन याद आ गए जब, मैं बचपन में मेरठ जनपद के नगर मवाना मैं रहता था, जहां से मात्र सात किलोमीटर की दूरी पर महाभारत काल का, हस्तिनापुर और परीक्षितगढ़ किला सब कुछ मुझे याद आ रहा था। दो ढाई सौ किमी वृतीय दायरे में फैला यह वही भूभाग है जहां महाभारत काल में नाना प्रकार की घटनाएं घटी। पांडवों की राजधानी हस्तिनापुर हो या उनका दूसरा नगर इंद्रप्रस्थ ( दिल्ली ) हो या अभिमन्यु जी के पुत्र महाराज परीक्षित जी का परीक्षितगढ़ किला हो या कुरुक्षेत्र का मैदान जहां आध्यात्मिक इतिहास की सबसे बड़ी घटना घटी जब भगवान श्री कृष्ण यानी परम ब्रह्म के स्वमुख से श्रीमद्भागवत गीता जी का प्राकट्य हुआ या वह स्थान जिसे आज शुकतीर्थ कहते हैं जहां महाराज परीक्षित ने सुखदेव जी से भागवत भगवान की पावन कथा सुनी थी।
इन सभी स्थानों की बात मै इसलिए कह गया कि जब मैं मंदिरके किनारे ऊंचे स्थान से श्री हनुमान जी का विशाल विग्रह और गंगा मैया के कछार का क्षेत्र देख रहा था, तो मुझे वह पूरा भूभाग समझ में आ रहा था। मेरे मन में महाभारत काल की बातें और ये सारे महत्वपूर्ण स्थान के दर्शन हो रहे थे। मैं एक अलग ही अनुभूति कर रहा था कि यह वही क्षेत्र है जहां ये सारी घटनाएं घटी थीं।
पुनः में शुकतीर्थ की ही बात करता हूं। पश्चिम उत्तर प्रदेश के इस क्षेत्र में बोली जाने वाली कौरवी बोली, जो हिन्दी के शाब्दिक अर्थ को बदलकर रखने का सामर्थ्य रखती है, इस स्थान को शुकर ताल बोला जाता रहा। यद्यपि न यहाँ शुक्राचार्य जी महाराज का स्थान है न ही कोई ताल है, बल्कि यहाँ गंगा कछार है। खैर पूज्य माननीय आदरणीय मुख्यमंत्री जी की दृष्टि इस पावन तीर्थ पर पड़ी और यह स्थान अब अपने पुरातन नाम शुकतीर्थ के रूप अपने आध्यात्मिक वैभव को प्राप्त कर रहा है।
मेरे सहयोगी श्री सनित कुमार में मुझे हजारों वर्ष प्राचीन इस अक्षय बट की एक शाखा के दर्शन हुए जिसमें श्री गणेश भगवान का स्वयं प्राकट्य रूप और शुकदेव जी ( शुकरूप ) की आकृति स्पष्टरूप से दिखाई दे रही थी। इस बीच जब मेरी नज़रें ऊपर की तरफ गई तो अनेकानेक शुक यानी तोते पंक्षियों के जोड़े दिखाई दे रहे थे। ये इस बात को बयां कर रहे थे कि आज से करीब साढ़े पांच हजार वर्ष पूर्व इसी स्थान पर श्री शुकदेव जी महाराज ने महाराजा परीक्षित को इस पावन कथा का श्रवण कराया था।
अब हम सभी पूज्य अचल कृष्ण शास्त्री जी के विराजित स्थल पर पहुंच चुके थे। महाराज श्री अचल शास्त्री जी ने श्री भागवत भगवान के प्राकट्य की संक्षिप्त कथा सुनाइ, यह तो हमारा अमृत पान सा था। साथ ही साथ आपने प्रसाद और छाछ भी प्रदान किये जिसने हमें आत्मिक रूप से महाराज से जोड़ दिया।
पूज्य अचल शास्त्री जी महाराज अभी युवा है लेकिन बौद्धिक रूप से आपने प्रचुर आध्यात्मिक ज्ञानअर्जन कर लिया है, ऐसा मुझे उनसे बात करने के उपरांत आभासित हो रहा है। भागवत भगवान की कथा के वाचक आचार्य अचल कृष्ण शास्त्री जी ने बताया कि प्रतिवर्ष इस स्थान पर हजारों लोग आते हैं और यहां अस्थाई रूप से कुछ दिनों के लिए रुकते हैं। भागवत कथा को सुनते हैं। उन सभी मानना है कि जिस स्थान पर राजा परीक्षित जी ने प्रथम भागवत कथा सुनी थी। हमको भी उस स्थान पर इस पावन कथा का श्रवण कर स्वयं को धन्य करना है।
अब मैं चर्चा करुंगा एक ऐसे संत की जिन्होंने इस तीर्थ के पुनरोत्थान/ जीर्णोद्धार में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया यह संत भगवान थे स्वामी कल्याण देव जी महाराज। भारत में सैकड़ों ट्रस्टॉ, आध्यात्मिक पीठों की स्थापना करने वाले स्वामी कल्याण देव जी को पद्म भूषण, पद्म विभूषण जैसी उपाधियों से भारत की सरकार ने न सिर्फ सम्मानित किया बल्कि भारत के पहले प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद जी एवं प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लेकर माननीय पपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई जी ने इस स्थान पर आकर या अन्य स्थानों पर सम्मान सम्मान करने हेतु महाराज जी को बुलाकर उनके दर्शन प्राप्त किये। ये सारे चित्र हमें इस स्थान पर निर्मित संग्रहालय में देखने को मिलते हैं। हमें स्वामी कल्याण देव जी की से जुड़े उन सारी सामग्रियों के भी पावन दर्शन हुए जो हमें उनके साक्षात दर्शन की पावन अनुभूति करा रहे थे।
हमारे प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री जी जो स्वयं में योगी है, उनका संतों के प्रति और आध्यात्मिक तीर्थं स्थानों के प्रति लगाव होना स्वाभाविक है। ऐसा इस स्थान के साथ भी है और हमें उनके कुछ चित्र को इस स्थान पर देखकर लग भी रहा था।
इस स्थान पर स्थाई रूप से बना हुआ हेलीपैड इस बात को बयां कर रहा है कि माननीय मुख्यमंत्री जी अक्सर इस स्थान पर आते हैं।
इस पावन यात्रा के समाप्ति पर पूज्य अचल शास्त्री जी ने हमें भेंट स्वरूप एक पुस्तिका ” ऐतिहासिक शुकतीर्थ संक्षिप्त परिचय ” दी, जिसके लेखक हैं स्वामी ओमानंद जी एवं प्रकाशक है श्री सुखदेव आश्रम स्वामी कल्याण देव सेवा ट्रस्ट सुख तीर्थ ( शुक्र ताल ), मुजफ्फरनगर उत्तर प्रदेश।
इस आध्यात्मिक यात्रा ने मुझे न सिर्फ पश्चिम उत्तर प्रदेश के आध्यात्मिक वैभव की यात्रा कराया बल्कि इस यात्रा की समाप्ति पर मैं अपने साथ साहित्यिक आध्यात्मिक और भौतिक अनुभूतियों को लेकर वापस जा रहा हूं।
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण पूर्णिका “पिता…“.)
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – भाग-८ – काठमांडू ☆ श्री सुरेश पटवा
भक्तपुर से वापसी में काठमांडू के प्रसिद्ध स्थानों को देखते हुए आये। भक्तपुर- काठमांडू मार्ग पर नेपाली संसद जिसे संघीय परिषद कहते हैं, के साथ विभिन्न मंत्रालय भवन बने हुए हैं। राजधानी बहुत ही सघन तरीक़े से बस चुकी है। कहीं भी ख़ाली जगह नहीं दिखती।
राजमहल जो कि लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू होने के बाद से संग्रहालय बना दिया गया है, उसे देखा। उसके बाद काठमांडू के हनुमान ढोका दरबार देखने गये। मल्ल युगीन वास्तुकला के भवन और मंदिर देखे। वहाँ से स्वयंभू नाथ मंदिर पहुँचे। मंदिर एक पहाड़ी पर स्थित है। स्थान भ्रमण पूर्व वहाँ का इतिहास जानना ज़रूरी है। तब ही हम भ्रमण का आनंद ले सकते हैं।
काठमांडू का प्राचीन इतिहास इसके पारंपरिक मिथकों और किंवदंतियों में वर्णित है। स्वयंभू पुराण के अनुसार, वर्तमान काठमांडू कभी “नागदहा” नाम की एक विशाल और गहरी झील थी, क्योंकि यह सांपों से भरी हुई थी। बोधिसत्व मंजुश्री ने अपनी तलवार से सरोवर को काट कर वहां से पानी निकाल दिया गया। इसके बाद उन्होंने मंजुपट्टन नामक एक शहर की स्थापना की, और धर्मकार को घाटी की भूमि का शासक बनाया। कुछ समय बाद, एक राक्षस ने निकासी बंद कर दी, घाटी फिर से एक झील में बदल गई। तब भगवान कृष्ण नेपाल आए, राक्षस का वध किया और सुदर्शन चक्र से चोभर पहाड़ी के किनारे को काटकर फिर से पानी निकाला। वह अपने साथ कुछ गोपालों को लाये और भुक्तमन को नेपाल का राजा बनाया। शिव पुराण की कोटिरुद्र संहिता, अध्याय 11, श्लोक 18 इस स्थान को नयापाल शहर के रूप में संदर्भित करता है, जो अपने पशुपति शिवलिंग के लिए प्रसिद्ध था। नेपाल नाम की उत्पत्ति संभवत: इसी शहर नयापाला से हुई है।
काठमांडू शहर दुनिया के सबसे पुराने बसे हुए स्थानों में से एक है। इसकी स्थापना दूसरी शताब्दी ईस्वी में हुई थी। घाटी को ऐतिहासिक रूप से “नेपाल मंडला” कहा जाता था और यह नेवार लोगों का घर रहा है, जो हिमालय की तलहटी में एक शहरी सभ्यता थी। यह शहर नेपाल साम्राज्य की शाही राजधानी था और नेपाली अभिजात वर्ग के महलों, मकानों और उद्यानों में अतिथियों की मेजबानी करता था। यह 1985 से दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ (सार्क) का मुख्यालय रहा है। काठमांडू नेपाल के बागमती प्रांत में स्थित नेपाली गणराज्य सरकार की राजधानी है।
काठमांडू कई वर्षों से नेपाल के इतिहास, कला, संस्कृति और अर्थव्यवस्था का केंद्र रहा है। हिंदू और बौद्ध बहुमत के साथ बहु-जातीय आबादी वाला नगर है। धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव काठमांडू में रहने वाले लोगों के जीवन का एक प्रमुख हिस्सा हैं। पर्यटन अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। 2013 में, काठमांडू को दुनिया के शीर्ष दस पर्यटन स्थलों में तीसरा स्थान दिया गया था, और एशिया में पहले स्थान पर था। शहर को नेपाली हिमालय का प्रवेश द्वार माना जाता है। यह कई विश्व धरोहर स्थलों का घर है: जिनमें दरबार स्क्वायर, स्वयंभूनाथ, बौधनाथ और पशुपतिनाथ प्रमुख हैं। 2010 में विश्व बैंक के अनुसार काठमांडू घाटी प्रति वर्ष 4 प्रतिशत की दर से फैल रही है, जिससे यह दक्षिण एशिया में सबसे तेजी से बढ़ते महानगरीय क्षेत्रों में से एक बन गया है। नेपाल में पहला क्षेत्र है जो तेजी से शहरीकरण और आधुनिकीकरण की अभूतपूर्व चुनौतियों का सामना कर रहा है।
भूगर्भीय प्लेटों के खिसकने से हिमालयी बसावटों में भूकम्प आते रहते हैं। एक बहुत बड़ा भूकम्प 1934 में आया था। काठमांडू और भक्तपुर के हेरिटेज भवनों को भारी नुक़सान हुआ था। फिर अप्रैल 2015 में 7.8 रीऐक्टर से आए भूकंप ने काठमांडू के ऐतिहासिक क्षेत्र बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिए थे। कुछ इमारतों को बहाल कर दिया गया है जबकि कुछ पुनर्निर्माण की प्रक्रिया में हैं। जिन्हें हमने आज के भ्रमण में देखा।
काठमांडू के लिए स्वदेशी नेपाल भासा शब्द येन है। नेपाली नाम काठमांडू काठमंडपम से आया है, जो दरबार स्क्वायर में खड़ा था। संस्कृत में काष्ठ का अर्थ है “लकड़ी” और मण्डपम का अर्थ है “मंडप”। यह सार्वजनिक मंडप है जिसे नेवाड़ी में मारू सत्ता के नाम से भी जाना जाता है। इसका पुनर्निर्माण 1596 में राजा लक्ष्मी नरसिंह मल्ल के काल में बिसेठ द्वारा किया गया था। तीन मंजिला संरचना पूरी तरह से लकड़ी से बनी थी और इसमें न तो लोहे की कीलों का इस्तेमाल किया गया है और न ही किसी अन्य सहारे का। किंवदंतियों के अनुसार, शिवालय के निर्माण के लिए उपयोग की जाने वाली सभी लकड़ी एक ही पेड़ से प्राप्त की गई थी। अप्रैल 2015 में एक बड़े भूकंप के दौरान वह संरचना ढह गई। अभी सहारा देकर खड़ी की जा रही रही है। कई लकड़ी के खम्भे और मियारें बदली जा रही हैं।
प्राचीन पांडुलिपियों के कॉलोफ़ोन, काठमांडू को नेपाल मंडल में काठमांडप महानगर के रूप में संदर्भित करते हैं। बौद्ध लामा आज भी इसका पाठ काठमनाप करते हैं। इस प्रकार, काठमांडू को काठमांडप के नाम से भी जाना जाता है। मध्ययुगीन काल के दौरान, शहर को कभी-कभी कांतिपुर कहा जाता था। यह नाम संस्कृत के दो शब्दों – कांति और पुर से मिलकर बना है। कांति एक ऐसा शब्द है जो “सौंदर्य” के अर्थ में प्रयुक्त होता है। सौंदर्य ज्यादातर प्रकाश से जुड़ा है और पुर का अर्थ है स्थान, इस प्रकार इसका अर्थ “प्रकाश का शहर” है।
स्वदेशी नेवार लोगों में, काठमांडू को ये डे (नेवार: येँ दि) के नाम से जाना जाता है, और पाटन और भक्तपुर को क्रमशः याला डे (नेवार: कील दे) और ख्वापा डे (नेवार: ख्वाप द्) के नाम से जाना जाता है। “येन” यंबू (नेवार: यम्बु) का छोटा रूप है, जो मूल रूप से काठमांडू के उत्तरी भाग को संदर्भित करता है। पुरानी उत्तरी बस्तियों को यांबी कहा जाता था जबकि दक्षिणी बस्ती को यांगला के नाम से जाना जाता था। वर्तनी “काटमांडू” का प्रयोग अक्सर पुराने अंग्रेजी भाषा के पाठ में किया जाता था। हाल ही में, हालांकि, अंग्रेजी में “काठमांडू” वर्तनी अधिक सामान्य हो गई है।
काठमांडू के कुछ हिस्सों में पुरातात्विक खुदाई में प्राचीन सभ्यताओं के प्रमाण मिले हैं। मालीगांव में पाई गई सबसे पुरानी एक मूर्ति 185 ईस्वी सन् की थी। ढांडो चैत्य की खुदाई में ब्राह्मी लिपि में एक शिलालेख के साथ एक ईंट का पता चला है। पुरातत्वविदों का मानना है कि यह दो हजार साल पुराना है। पाषाण शिलालेख नेपाल के इतिहास के प्रमुख स्रोत हैं।
काठमांडू का सबसे पहला पश्चिमी संदर्भ पुर्तगाली जेसुइट के एक उल्लेख में प्रकट होता है। जोआओ कैब्राल जो 1628 के वसंत में काठमांडू घाटी से गुजरे थे और उस समय के राजा, शायद काठमांडू के राजा लक्ष्मीनरसिंह मल्ल द्वारा तिब्बत से भारत के रास्ते में उनका स्वागत किया गया था। उन्होंने बताया कि वे नेपाल साम्राज्य की राजधानी “कैडमेन्डु” पहुंचे।
मध्ययुगीन लिच्छवी शासकों से पहले की अवधि के बहुत कम ऐतिहासिक अभिलेख मौजूद हैं। नेपाली राजशाही की वंशावली गोपालराज वंशावली के अनुसार, लिच्छवियों से पहले काठमांडू घाटी के शासक गोपाल, महिपाल, आभीर, किरात और सोमवंशी थे। किरात वंश की स्थापना यलम्बर ने की थी। किरात युग के दौरान, पुराने काठमांडू के उत्तरी भाग में यंबू नामक एक बस्ती मौजूद थी। कुछ चीनी-तिब्बती भाषाओं में, काठमांडू को अभी भी यंबू कहा जाता है। येंगल नामक एक और छोटी बस्ती मंजुपट्टन के पास पुराने काठमांडू के दक्षिणी हिस्से में मौजूद थी। सातवें किरात शासक, जितेदास्ती के शासनकाल के दौरान, बौद्ध भिक्षुओं ने काठमांडू घाटी में प्रवेश किया और सांखू में एक वन मठ की स्थापना की।
1950 के दशक में काठमांडू और इसके आसपास के अन्य शहरों जैसे पाटन में जनसंख्या में बड़ी वृद्धि देखी गई। हालांकि, भक्तपुर राजधानी से बहुत दूर था और काठमांडू घाटी के अन्य शहरों में हुए विकास से बचा हुआ था। भक्तपुर भी केंद्रीय शक्तियों द्वारा बहुत अलग-थलग और उपेक्षित था। जब एक नया राजमार्ग बनाया गया, तो यह शहर को पूरी तरह से बायपास करता था और इसके बजाय बाहरी इलाके से होकर गुजरता था। 1962 में भक्तपुर का हवाई दृश्य देखने पर दूर दाईं ओर न्यातापोला मंदिर और पृष्ठभूमि में लंगटांग पहाड़ दिखता था। पहाड़ टूटने और बारिश से सघन हरियाली ने उनको ढँक दिया है।
********
18 जून 2022 को सुबह सात बजे काठमांडू से पोखरा जाने हेतु बस में सवार हुए। बस स्थानक पर भारत में सात रुपयों में मिलने वाली चाय तीस रुपयों में ख़रीद कर पी। एक आरामदायक सोफ़ानुमा सीट वाली बस में सबसे पीछे की सीट मिली। पोखरा नेपाल के पश्चिमांचल विकास क्षेत्र जिसकी सीमा उत्तराखंड से मिलती है, का एक पर्यटन नगर है। यह गण्डकी अंचल के कास्की जिला के पोखरा घाटी मैं स्थित है। पोखरा नेपाल का दूसरा बडा शहर है। पोखरा नेपाल के पश्चिमांचल विकास क्षेत्र, गण्डकी अंचल और कास्की जिला का सदरमुकाम है।
नेपाल का पृथ्वी राजमार्ग राजधानी काठमाण्डौ, भरतपुर और देश के पूर्वी क्षेत्र से पोखरा को जोडता है। सिदार्थ राजमार्ग भैरहवा के सिमा से बुटवल होते हुए पोखरा को जोडता है। पोखरा-बाग्लुंग-बेनी सडक पोखरा को उत्तर पश्चिम के मुक्तिनाथ, मुस्तांग से जोडती है। शहरी यातायात सहज है। टैक्सी कहीं भी मिल सकती है। पोखरा मैं एक अंतर्देशीय विमानस्थल है। इस विमानस्थल को अन्तराष्ट्रीय बनाने का प्रयास हो रहा है। अभी यहाँ से काठमाण्डौ, भरतपुर व जोमसोम तक की उडान उपलब्ध है। पोखरा से दिल्ली तक सीधी बस सेवा भी उपलब्ध है। आप नेपाल में हैं तो गांधी मार्ग, नेहरू चौक, शास्त्री नगर, इंदिरा मार्केट जैसे शब्दों जिनसे कुछ लोगों की चिढ़ होती है, उनसे मुक्त हैं। बस को चले एक घंटा होने को आया है परंतु आप अभी काठमांडू से बाहर नहीं निकले हैं। जब आप बस्ती पीछे छोड़ेंगे तब हिमालय के पहाड़ों से बातें कर रहे होंगे। नेपाल में रेल नहीं होने से सड़क यातायात एकमात्र आवागमन का साधन है तो ट्राफ़िक की कल्पना की जा सकती है। हम एक पहाड़ की चढ़ाई से गुज़र रहे हैं। सोचा अब काठमांडू से बाहर निकल जाएँगे। लेकिन यह क्या, पहाड़ पार करते ही फिर मकानों की क़तार शुरू हो गई। समतल ज़मीन नहीं होने से सभी मकान चार मंज़िला हैं। भूकम्प संवेदी क्षेत्र होने से अधिक ऊँचे मकान बना नहीं सकते। पहाड़ों को ही कटना मिटना होगा। पहली बस्ती चंद्रागिरी आई। थोड़ी देर में पता चला कि आगे एक घाटी में पूरी बस्ती आबाद है। जैसे-जैसे आबादी का दबाव बढ़ता जाएगा घाटियाँ और पहाड़ियाँ आबाद होती जायेंगी।
आपने अक्सर नेपालियों के उदास कठोर चेहरों को देखा होगा। उनकी लम्बाई ज़्यादा नहीं होती है। पहाड़ों पर चढ़ने-उतरने से शरीर के पिछले तरफ़ मोटापा नहीं होकर सपाट होता है। वे अपने इलाक़े का प्रतिबिम्ब होते हैं। पहाड़ी लोग चेहरे पर एक अजीब सी उदासी लिए होते हैं वहीं सागरों के नज़दीकी लोग लहरों सी चंचलता से आँखें मटकाते रहते हैं। पहाड़ों पर उदासी का आलम होता है परंतु यहाँ के पहाड़ सदाबहार हैं। यहाँ पर्णपाती वन नहीं होते। बारिश और समुद्रतल से ऊँचाई के कारण हमेशा पेड़ों की मखमली चादर से ढँके पहाड़ों पर बादलों के सफ़ेद टुकड़े और आती जाती धुँध उदासी को निराशा में नहीं बदलने देती। ढाबे या रास्तों के होटल को खाजा घर लिखते हैं। एक खाजा घर पर बस रुकी। चना मसाला प्याज़ नीबू के साथ पिछत्तर रुपए में लिया। बस चलने लगी तो चना ज़ोर गरम बस में ही खाया।
एक घंटे बाद बस ड्राइवर ने त्रिशूली नदी के किनारे एक खाजा घर पर पच्चीस मिनट का लंच स्टॉप दिया। नदी किनारे पराठा और टमाटर चटनी का भोजन ग्रहण करते नदी की प्रकृति को निहारते रहे। सामने ही नदी एक भँवर बना रही थी। पानी की तरह आदमी को भी थोड़ी सी अधिक जगह मिले तो वह भी पसरने लगता है। वहीं दिल का भँवर बनता है। दिल का भँवर करे पुकार-प्यार का राग सुनो। जीवन के तेज बहाव में जो कचरा इकट्ठा होता है वह पीछा नहीं छोड़कर वहीं घूमता है। आदमी भी घूमने लगता है। भँवर से निकलने के लिए हिकमत और हिम्मत दरकार होती है। अन्यथा जीवन का भँवर आदमी को शराब की प्यालियों के साथ ग़म के सागर में डुबो देता है।
एक बड़ी बस्ती चरौंदी आई। उसके बाद एक लम्बा दर्रा शुरू हुआ है, जिसमें भू-ऋखलन होने से बस चींटी की तरह रेंगती रही। दाहिनी तरफ त्रिशूली नदी संकरे पहाड़ी दर्रे से चिपकी सड़क के साथ चलती रही। नदी के भूरे से पानी और ऊँची पहाड़ी हरियाली के बीच चींटी की तरह रेंगते रहे। एक छोटी बस्ती मुग्लिंग के बाद सड़क के बाएँ तरफ़ से एक नदी साथ चलने लगी। दाहिनी तरफ़ वाली नदी का साथ छूट गया। ज़िंदगी में आदमियों का साथ भले ही छूट जाए पर पहाड़ों में झरनों और नदियों का साथ नहीं छूटता। वे घूमफिर कर कहीं न कहीं मिल जाते हैं। आपको अकेला नहीं छोड़ते। समतल ज़मीन पर पहुँचा कर आगे निकल जाते हैं। थोड़ी बड़ी बस्तियाँ आंबुखैरेनी, तनहुँ, दामौली के बाद दोनों नदियों का संगम हो गया। वे फिर पश्चिम की तरफ़ चल पड़ीं। वहाँ गंडक नदी उनका रास्ता देख रही है। बारिश के दिनों में तीनों मिलकर बिहार की तराई में तबाही मचा कर गंगा में मिलेंगी और गंगा भारतीय संस्कृति की तरह सबको समाहित करके बंगाल की खाड़ी में आश्रय पायेगी।
पोखरा
पोखरा शहर नेपाल के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक है। यह काठमांडू के बाद नेपाल का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। यह अन्नपूर्णा पर्वत श्रृंखला में स्थित है। यह एवरेस्ट ट्रैकिंग बेस कैंप सहित कई बाहरी गतिविधियों का केंद्र है। यहाँ अन्नपूर्णा सर्किट ट्रैक होने के कारण ट्रैकरों की भारी भीड़ रहती है। ऊँची पहाड़ी चोटियाँ, झील व नदी इस शहर के सौंदर्य में इज़ाफा करते हैं। आप इस शहर की साहसिक यात्रा कर सकते हैं और आसान दर्शनीय स्थलों की यात्रा का भी आनंद ले सकते हैं। काठमांडू के बाद सर्वाधिक लोग इस जगह की यात्रा करते हैं। पोखरा के सुंदर दृश्य, पहाड़ों पर सूर्य और चंद्रमा की लाल, पीली, सुनहरी और धवल छाया, प्राचीन झील के किनारे राहत की साँस सुप्त जीवन को जगाने में उपयोगी सिद्ध हो सकते है।
आप पोखरा शहर में अन्नपूर्णा पर्वत की तलहटी में छुट्टी बिता सकते हैं। शहर और उसके आसपास चलने और ट्रेकिंग परीक्षणों का आनंद ले सकते हैं, पर्वतारोहण भी कर सकते हैं। पोखरा शहर की गलियों और बाजारों में खरीदारी कर सकते हैं। पेड़ों के साये में शहर के परिदृश्य का शानदार नजारा देख सकते हैं। शहर की सड़कों पर भोजनालय, क्लब और बार कई स्थान पर खुले मिलते हैं। जहां आप भोजन के साथ मनोरंजक गतिविधियों का आनंद ले सकते हैं। पोखरा अतुलनीय नज़ारों का भंडार है जो साल भर पर्यटकों को आकर्षित करता है। यहाँ आकर अविस्मरणीय सफर की नींव रखी जा सकती है।
हमारी बस शाम को चार बजे पोखरा पहुँच गई। जवाहर जी ने होटल आयस्लेंड में कमरा बुक कर रखा था। कमरे में पहुँच एक कप गरम चाय पीकर अपना एनर्जी स्विच ऑन किया। नहा धोकर दिन भर की थकान उतारी। तैयार होकर पैदल ही फेवा झील किनारे घूमने निकल गये। अधिक दूर नहीं थी। दस मिनट में फेवा झील पहुँच गये। नौकायन का आनंद लिया।
यह नेपाल की दूसरी सबसे बड़ी झील है। इसकी खास बात यह है कि इसके पारदर्शी जल में अन्नपूर्णा व धौलागिरी पर्वत श्रृंख्लाओं का प्रतिबिंब साफ झलकता है। लेकिन बादल और बारिश की संगत से प्रतिबिम्ब का कोई पता नहीं था। हाँ आस-पास के पहाड़ी पेड़-पौधे स्वच्छ जल में लहराते दिखे जिससे झील का पानी हरा नज़र आ रहा था। नज़ारा इतना अद्भुत कि आप बिना पलक झपकाए घंटों तक बस इस झील के पानी को देख सकते है। आपको किसी साथी की भी ज़रूरत महसूस नहीं होगी। यहाँ बैठकर दुनिया के सबसे मनोरम सूर्यास्त के आप गवाह बन सकते थे परंतु बारिश की रिमझिम में सूर्य भगवान भी छिपे रहे। गंगा आरती की तरह यहाँ भी शाम को झील किनारे देवी आरती होने लगी है।
झील में नौकायन हेतु भावताव की प्रक्रिया में आधा घंटा निकला लेकिन छै सौ रुपया में जाने वाली नौका तीन अन्य सैलानियों के साथ साझा करने से तीन सौ में सौदा तय हुआ। नौका से वराही मंदिर द्वीप पर गये। इसके अन्य नाम है – झील मंदिर व वराही मंदिर। यह मंदिर वराही देवी को संमर्पित है जिन्हें माँ दुर्गा का ही रूप माना जाता है। यहाँ दो मंज़िला पगोड़ा भी है। इस द्वीप की मान्यता हिन्दूओं व बौद्धिष्टों दोनों के बीच एक समान है। यह मंदिर अराधना का केन्द्र है। इसकी मुख्य मूर्ति पारंपरिकता की झलक बिखेरती है जो लकड़ी, ईंट व पत्थर से बनी है। यह मान्यता है कि माँ दुर्गा ने वराही का अवतार राक्षसों को मारने के लिए धारण किया था। यह मंदिर शक्ति का प्रतीक है। मंदिर की परिक्रमा करके नौकायन सम्पन्न हुआ। नौकायन के बाद झील के किनारे ही घूमते रहे। अंत में एक अच्छे से दिखते रेस्टोरेंट में भोजन करके होटल में आराम किया।
(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा रचित – “कविता – रामचरित मानस…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्वप्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।)
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख अनुभव और निर्णय। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # २९६ ☆
☆ अनुभव और निर्णय… ☆
अगर आप सही अनुभव नहीं करते, तो निश्चित् है कि आप ग़लत निर्णय लेंगे–हेज़लिट की यह उक्ति अपने भीतर गहन अर्थ समेटे है। अनुभव व निर्णय का अन्योन्याश्रित संबंध है। यदि विषम परिस्थितियों में हमारा अनुभव अच्छा नहीं है, तो हम उसे शाश्वत् सत्य स्वीकार उसी के अनुकूल निर्णय लेते रहेंगे। उस स्थिति में हमारे हृदय में एक ही भाव होता है कि हम आँखिन देखी पर विश्वास रखते हैं और यह हमारा व्यक्तिगत अनुभव है–सो! यह ग़लत कैसे हो सकता है? निर्णय लेते हुए न हम चिन्तन-मनन करना चाहते हैं; ना ही पुनरावलोकन, क्योंकि हम आत्मानुभव को नहीं नकार सकते हैं?
मानव मस्तिष्क ठीक एक पैराशूट की भांति है, जब तक खुला रहता है, कार्यशील रहता है–लार्ड डेवन का यह कथन मस्तिष्क की क्रियाशीलता पर प्रकाश डालता है और उसके अधिकाधिक प्रयोग करने का संदेश देता है। कबीरदास जी भी ‘दान देत धन न घटै, कह गये भक्त कबीर’ संदेश प्रेषित करते हैं कि दान देते ने से धन घटता नहीं और विद्या रूपी धन बाँटने से सदैव बढ़ता है। महात्मा बुद्ध भी जो हम देते हैं; उसका कई गुणा लौटकर हमारे पास आता है–संदेश प्रेषित करते हैं। भगवान महाबीर भी त्याग करने का संदेश देते हैं और प्रकृति का भी यही चिरंतन व शाश्वत् सत्य है।
मनुष्य तभी तक सर्वश्रेष्ठ, सर्वोत्तम, सर्वगुण-सम्पन्न व सर्वपूज्य बना रहता है, जब तक वह दूसरों से याचना नहीं करता–ब्रह्मपुराण का भाव, कबीर की वाणी में इस प्रकार अभिव्यक्त हुआ है ‘मांगन मरण एक समान।’ मानव को उसके सम्मुख हाथ पसारने चाहिए, जो सृष्टि-नियंता व जगपालक है और दान देते हुए उसकी नज़रें सदैव झुकी रहनी चाहिए, क्योंकि देने वाला तो कोई और…वह तो केवल मात्र माध्यम है। संसार में अपना कुछ भी नहीं है। यह नश्वर मानव देह भी पंचतत्वों से निर्मित है और अंतकाल उसे उनमें विलीन हो जाना है। मेरी स्वरचित पंक्तियाँ उक्त भाव को व्यक्त करती हैं…’यह किराये का मकान है/ जाने कौन कब तक ठहरेगा/ खाली हाथ तू आया है बंदे/ खाली हाथ तू जाएगा’ और ‘प्रभु नाम तू जप ले रे बंदे!/ वही तेरे साथ जाएगा’ यही है जीवन का शाश्वत् सत्य।
मानव अहंनिष्ठता के कारण निर्णय लेने से पूर्व औचित्य- अनौचित्य व लाभ-हानि पर सोच-विचार नहीं करता और उसके पश्चात् उसे पत्थर की लकीर मान बैठता है, जबकि उसके विभिन्न पहलुओं पर दृष्टिपात करना आवश्यक होता है। अंततः यह उसके जीवन की त्रासदी बन जाती है। अक्सर निर्णय हमारी मन:स्थिति से प्रभावित होते है, क्योंकि प्रसन्नता में हमें ओस की बूंदें मोतियों सम भासती हैं और अवसाद में आँसुओं सम प्रतिभासित होती हैं। सौंदर्य वस्तु में नहीं, दृष्टा के नेत्रों में होता है। इसलिए कहा जाता है ‘जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि।’ सो! चेहरे पर हमारे मनोभाव प्रकट होते हैं। इसलिए ‘तोरा मन दर्पण कहलाए’ गीत की पंक्तियाँ आज भी सार्थक हैं।
दोषारोपण करना मानव का स्वभाव है, क्योंकि हम स्वयं को बुद्धिमान व दूसरों को मूर्ख समझते हैं। परिणामत: हम सत्यान्वेषण नहीं कर पाते। ‘बहुत कमियाँ निकालते हैं/ हम दूसरों में अक्सर/ आओ! एक मुलाकात/ ज़रा आईने से भी कर लें।’ परंतु मानव अपने अंतर्मन में झाँकना ही नहीं चाहता, क्योंकि वह आश्वस्त होता है कि वह गुणों की खान है और कोई ग़लती कर ही नहीं सकता। परंतु अपने ही अपने बनकर अपनों को प्रताड़ित करते हैं। इतना ही नहीं, ‘ज़िन्दगी कहाँ रुलाती है/ रुलाते तो वे लोग हैं/ जिन्हें हम अपनी ज़िन्दगी समझ बैठते हैं’ और हमारे सबसे प्रिय लोग ही सर्वाधिक कष्ट देते हैं। ढूंढो तो सुक़ून ख़ुद में है/ दूसरों में तो बस उलझनें मिलेंगी। आनंद तो हमारे मन में है। यदि वह मन में नहीं है, तो दुनिया में कहीं नहीं है, क्योंकि दूसरों से अपेक्षा करने से तो उलझनें प्राप्त होती हैं। सो! ‘उलझनें बहुत हैं, सुलझा लीजिए/ बेवजह ही न किसी से ग़िला कीजिए’ स्वरचित गीत की पंक्तियाँ उलझनों को शीघ्र सुलझाने व शिक़ायत न करने की सीख देती हैं।
उत्तम काम के दो सूत्र हैं…जो मुझे आता है कर लूंगा/ जो मुझे नहीं आता सीख लूंगा। यह है स्वीकार्यता भाव, जो सत्य है और यथार्थ है उसे स्वीकार लेना। जो व्यक्ति अपनी ग़लती को स्वीकार लेता है, उसके जीवन पथ में कोई अवरोध नहीं आता और वह निरंतर सफलता की सीढ़ियों पर चढ़ता जाता है। ‘दो पल की है ज़िन्दगी/ इसे जीने के दो उसूल बनाओ/ महको तो फूलों की तरह/ बिखरो तो सुगंध की तरह ‘ मानव को सिद्धांतवादी होने के साथ-साथ हर स्थिति में खुशी से जीना बेहतर विकल्प व सर्वोत्तम उपाय है।
बहुत क़रीब से अंजान बनके निकला है/ जो कभी दूर से पहचान लिया करता था–गुलज़ार का यह कथन जीवन की त्रासदी को इंगित करता है। इस संसार म़े हर व्यक्ति स्वार्थी है और उसकी फ़ितरत को समझना अत्यंत कठिन है। ज़िन्दगी समझ में आ गयी तो अकेले में मेला/ न समझ में आयी तो भीड़ में अकेला…यही जीवन का शाश्वत् सत्य व सार है। हम अपनी मनस्थिति के अनुकूल ही व्यथित होते हैं और यथासमय भरपूर सुक़ून पाते हैं।
तराशिए ख़ुद को इस क़दर जहान में/ पाने वालों को नाज़ व खोने वाले को अफ़सोस रहे। वजूद ऐसा बनाएं कि कोई तुम्हें छोड़ तो सके, पर भुला न सके। परंतु यह तभी संभव है, जब आप इस तथ्य से अवगत हों कि रिश्ते एक-दूसरे का ख्याल रखने के लिए होते हैं, इस्तेमाल करने के लिए नहीं। हमें त्याग व समर्पण भाव से इनका निर्वहन करना चाहिए। सो! श्रेष्ठ वही है, जिसमें दृढ़ता हो; ज़िद्द नहीं, दया हो; कमज़ोरी नहीं, ज्ञान हो; अहंकार नहीं। जिसमें इन गुणों का समुच्चय होता है, सर्वश्रेष्ठ कहलाता है। समय और समझ दोनों एक साथ किस्मत वालों को मिलती है, क्योंकि अक्सर समय पर समझ नहीं आती और समझ आने पर समय निकल जाता है। प्राय: जिनमें समझ होती है, वे अहंनिष्ठता के कारण दूसरों को हेय समझते हैं और उनके अस्तित्व को नकार देते हैं। उन्हें किसी का साथ ग़वारा नहीं होता और एक अंतराल के पश्चात् वे स्वयं को कटघरे में खड़ा पाते हैं। न कोई उनके साथ रहना पसंद करता है और न ही किसी को उनकी दरक़ार होती है।
वैसे दो तरह से चीज़ें नज़र आती हैं, एक दूर से; दूसरा ग़ुरूर से। ग़ुरूर से दूरियां बढ़ती जाती हैं, जिन्हें पाटना असंभव हो जाता है। दुनिया में तीन प्रकार के लोग होते हैं–प्रथम दूसरों के अनुभव से सीखते हैं, द्वितीय अपने अनुभव से और तृतीय अपने ग़ुरूर के कारण सीखते ही नहीं और यह सिलसिला अनवरत चलता रहता है। बुद्धिमान लोगो में जन्मजात प्रतिभा होती है, कुछ लोग शास्त्राध्ययन से तथा अन्य अभ्यास अर्थात् अपने अनुभव से सीखते हैं। ‘करत- करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान’ कबीरदास जी भी इस तथ्य को स्वीकारते हैं कि हमारा अनुभव ही हमारा निर्णय होता है। इनका चोली-दामन का साथ है और ये अन्योन्याश्रित है।