हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३१३ ☆ संतोष के मुक्तक – कड़वाहट सच्चाई की… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है  – संतोष के मुक्तक – कड़वाहट सच्चाई की… । आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३१३ ☆

☆ संतोष के मुक्तक – कड़वाहट सच्चाई की… ☆ श्री संतोष नेमा ☆

☆

कभी खुद को भी अंदर  से झांक  लिया करो

खुद को जमाने की नजर से आंक लिया करो

मत  पालो  गलत फहमी  सिकंदर  बनने की

कड़वाहट  सच्चाई  की  भी  फांक  लिया करो

*

वह  जितने  दूध  के  धुले  हैं

उतने अवगुण  उनमें  घुले  हैं

ये वहम पाल कर खुश  न हों

राज सब आपके यहां खुले हैं

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # १८ ☆ आलेख – समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – ३ ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं।

आज प्रस्तुत है आपका आलेख ‘समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – ३‘।)

☆ मंजिरी साहित्य # १८ ☆

? कविता – आलेख – समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – ३ ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

1 कोरी = 2 अधियो = 4 पयालो = 8 ढाबू = 16 ढिगलो = 24 दोकड़ो = 48 त्राम्बियो

जी हाँ ये सारी कच्छ रियासत की अपनी स्वयं की मुद्राएं थींl ये सोने, चांदी और ताँबे के सिक्कों से बनी होती थींl इन सभी सिक्कों के एक तरफ कच्छ के राजा का नाम देवनागरी लिपी में और राजघरानों के चिन्ह त्रिशूल, कटार और अर्धचंद्र उकेरे होते थेl

कच्छ का मांडवी तट जो अरब सागर का एक तट था यहाँ चौरासी देश की ध्वजाएं लहराती थींl इसी कारण से इसे चौरासी झंडो का बंदरगाह भी कहते थेl ये झंडे कच्छ के व्यापारिक साम्राज्य को दर्शाते थेl यहाँ हाथी दाँत, खजूर, लकड़ी, मसाले आदि आयात होते थेl और हस्तशिल्प, घी, चमड़ा, नमक आदि निर्यात होते थेl

उन दिनों वस्तु विनिमय होता था परन्तु कच्छ में व्यापारियों को प्रवेश करने से पहले इन मुद्राओं को खरीदना होता था, तभी वो मुद्राओं से व्यापार कर सकते थेl

सिर्फ समुद्री मार्ग से नहीं अपितु सडक मार्ग से भी व्यापार राजस्थान, सौराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, मध्यप्रदेश और मुंबई में भी होता थाl सड़क व्यापार अधिकतर ऊँट से होता थाl ये खराई ऊँट होते थेl ये पानी में भी तैर सकते थेl ये ऊँट समुद्र के आसपास के मैंग्रोज खाते थेl ये कई दिनों तक मीठे पानी के बिना भी जीवित रह सकते थेl

ऊन दिनों मांडवी बंदरगाह पर जहाजों को दिन और रात के समय रास्ता दिखाने की बड़ी ही अनोखी तकनीक होती थीl दिन में किले के सबसे ऊपरी स्तम्भ से दूरबीन की सहायता से समुद्री जहाजों को देखकर अधिकारी रंगीन झंडे लहराते थेl ज्वार का इंतजार करते ये किनारे से लग जाते थेl

वहीं रात्रि में किले के सबसे ऊपरी स्तम्भ पर बहुत बड़ी सी मशाल जलती थी जो लाइट हाउस का काम करती थीl जब दूर से आने वाले जहाज की लाइट दिखती तब मांडवी के नाविक अपनी नावों में मशालें जलाकर उनके पास पहुंचते और उन्हें अपने साथ सुरक्षित ले आते थेl जब ठंड के दिनों में कोहरा होता तब एक समयावधि पर तोप दागते थे और विशाल नगाड़े भी बजाते थेl जिससे जहाजों को बंदरगाह की दिशा मालूम हो जाती थीl

जब 1947 में हमें आजादी मिली तब कच्छ को भी भारत में मिला लिया गयाl उस समय के अंतिम शासक मदनसिंह जी ने अंतिम सिक्का बनवाया जिसपर देवनागरी लिपि में जयहिंद लिखवाया थाl

स्वतंत्रता के पश्चात कच्छ को मुंबई के एक जिले रूप में सम्मिलित कियाl तब कच्छ की सरकार मुंबई से चलती थीl पर भाषाओं को ध्यान में रखकर मुंबई का विभाजन हुआ तब कच्छ को मुंबई से अलग कर गुजरात में शामिल कर दिया गयाl

☆

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ३२ – कविता – वो मेरा मार्गदर्शक… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘वो मेरा मार्गदर्शक…‘।)

☆ शशि साहित्य # ३२  ☆

? कविता – वो मेरा मार्गदर्शक…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

☆

एक पूरा समुद्र उफान पर है दिल में मेरे,

एक बूंद को भी आंसू बनने से रोका है मैंने…

*

जज्ब कर ली है, कठोरता सारे जहान की,

खुद को मोम की तरह पिघलने से रोका है मैंने…

*

परख लिया है, पहले हर एक पैमाने को,

खुद से रूबरू होने का, फिर फैसला लिया मैंने…

*

सिर्फ,फूलों सी नाजुक, पावन मुस्कुराहटें रोकती है मुझे,

और सारे बंधनों से खुद को आज़ाद कर लिया मैंने…

*

ना कर कोशिश, कि टूट कर जर्रा जर्रा हो जाऊं,

टूट कर लाख गुना हो जाना खुद का, चुन लिया मैंने…

*

उंगली पकड़कर जब “वो ” करें अगुवाई मेरी…

हर फिक्र को धुआं धुआं कर लिया मैंने…

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २९५ ☆ गुरु : जीवन पथ के आलोक स्तम्भ… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “गुरु : जीवन पथ के आलोक स्तम्भ…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९५ ☆

☆ गुरु : जीवन पथ के आलोक स्तम्भ… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

☆

चरण वंदना आपकी , करता सकल जहान ।

तीन लोक भी कर रहे, नित्य सतत गुणगान ।।

*

बिन गुरुवर नहि मिल सके,कभी किसी को ज्ञान ।

प्रीत हृदय प्रिय धारते, शिष्य लगा कर ध्यान ।।

*

काज सहज बनने लगे, जब हो  गुरु आशीष ।

इनके पूजन से मिलें, जगदीश्वर जगदीश ।।

*

 सम्पूरण विश्वास से, सहज साधना साध्य।

ज्योतित जलती लौ रहे, गुरुवर को आराध्य।।

☆

गुरु पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आत्मबोध का उत्सव है। यह उस दिव्य चेतना के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का दिन है, जो अज्ञान के अंधकार को हटाकर ज्ञान का दीप प्रज्वलित करती है। गुरु केवल शास्त्रों का ज्ञान नहीं देते, वे जीवन को देखने की दृष्टि प्रदान करते हैं। उनके सान्निध्य में व्यक्ति स्वयं को पहचानता है, अपने भीतर छिपी संभावनाओं को जागृत करता है और सत्य की ओर अग्रसर होता है।

भारतीय संस्कृति में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समकक्ष स्थान इसलिए मिला है, क्योंकि वे मनुष्य के व्यक्तित्व का पुनर्जन्म कराते हैं। वे केवल शब्दों से नहीं, अपने आचरण, तप, त्याग और करुणा से शिक्षा देते हैं।

आइए, इस गुरु पूर्णिमा पर हम अपने जीवन के प्रत्येक गुरु—माता-पिता, शिक्षक, प्रकृति और उन सभी अनुभवों—के प्रति श्रद्धा व्यक्त करें, जिन्होंने हमें बेहतर मनुष्य बनने की प्रेरणा दी। यही सच्ची गुरु वंदना है, और यही ज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ने का श्रेष्ठ मार्ग भी।

साचे मन आराधिए, गुरुवर गुण की खान ।

पूरण सारे काज हों,  बढ़े मान सम्मान ।।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २११ ☆ “ईमान का बोझा (व्यंग्य संग्रह)” – लेखक : डॉ. अनुराग वाजपेयी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है डॉ. अनुराग वाजपेयी जी द्वारा लिखित  “ईमान का बोझा (व्यंग्य संग्रह)…” पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २११ ☆

☆ “ईमान का बोझा (व्यंग्य संग्रह)” – लेखक : डॉ. अनुराग वाजपेयी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

ईमान का बोझा (व्यंग्य संग्रह)

(समकालीन विसंगतियों का आईना)

लेखक – डॉ. अनुराग वाजपेयी

प्रकाशक – प्रकाशन, जयपुर

(संस्करण – 2026)

मूल्य-  रु 250/-

☆ समकालीन विसंगतियों का आईना – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

आजादी के बाद से देश ने प्रत्येक क्षेत्र में खूब प्रगति की है।

यदि कुछ ह्रास हुआ है तो वह है नैतिकता , आचरण और जीवन मूल्यों में लगातार गिरावट स्पष्ट दिखती है।

साहित्य की विभिन्न विधाओं में व्यंग्य वह  औजार है जो इन विसंगतियों पर सफलता से प्रहार कर रहा है।

डॉ. अनुराग वाजपेयी उनके पिछले आधा दर्जन व्यंग्य संग्रहों के माध्यम से अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कर चुके हैं। उनके द्वारा रचित यह नव प्रकाशित व्यंग्य संग्रह ‘ईमान का बोझा’ इसी कसौटी पर खरा उतरने वाला एक प्रभावशाली संग्रह है। यह किताब समकालीन भारतीय समाज, राजनीति, प्रशासन और आधुनिक जीवनशैली की उन परत-दर-परत विसंगतियों को खोलती है, जिनसे आज का सामान्य नागरिक नित्य जूझ भी रहा है, तथा विडंबना और हास्यास्पद है कि जहां भी जिसे जो अवसर मिल रहा है वह बेइमानी से बाज नहीं आ रहा। बेईमानी नया सामाजिक लोकाचार बनता जा रहा है।

पुस्तक का शीर्षक ‘ईमान का बोझा’ मार्मिक और व्यंग्यात्मक है। लेखक ने बड़े ही तीखेपन से यह स्थापित किया है कि आज के दौर में ईमानदारी एक भारी पत्थर की तरह है, जिसे ढोना कठिन हो गया है। जो व्यक्ति जितना अधिक ‘हल्का’ (यानी सिद्धांतहीन) है, वह उतनी ही तेजी से सफलता की सीढ़ियां चढ़ रहा है। यह आधुनिक भौतिकवादी समाज में कड़वा यथार्थ है।

लेखक ने प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली, बाबुओं की मानसिकता और भ्रष्टाचार के जो चित्र खींचे हैं, वे यथार्थ के दर्शन करवाते हैं। रिश्वतखोरी के नए तौर-तरीकों पर कटाक्ष करते हुए लेखक दिखाते हैं कि कैसे समाज में अनैतिकता को अब ‘सभ्यता’ का लबादा ओढ़ा दिया गया है।

कोरोना काल, एवं लॉकडाउन के कुछ व्यंग्य किताब में शामिल हैं। इससे स्पष्ट है कि ये सारे व्यंग्य समय समय पर लिखे हुए हैं, तथा इस पुस्तक में  संकलित हैं।डिजिटल युग के प्रभावों को जिस तरह से पुस्तक में पिरोया गया है, वह पाठकों को वैचारिक मंथन के लिए विवश करता है। ‘छुट्टियों’ के प्रति देश के उत्साह और ‘हैप्पीनेस इंडेक्स’ के नाम पर किए जा रहे छलावे पर लेखक की टिप्पणियां व्यंग्य की शास्त्रीय परंपरा को पुष्ट करती हैं।

व्यंग्य के मूल्यों की कसौटी पर परखें, तो ‘ईमान का बोझा’  समाज को आईना दिखा रहा है। लेखक  केवल हास्य  रंजन करने वाले व्यंग्यकार नहीं हैं।  वे समाज के प्रति अपनी ‘अकुलाहट’ और चिंता उनकी कलम से व्यक्त करते हैं।

अनुराग वाजपेयी की भाषा सहज है, वाक्य रीडर्स फ्रेंडली हैं। लेकिन उसमें कटाक्ष की धार पैनी है। वे कठिन विषयों को भी रोचक किस्सागोई के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं, जो व्यंग्य अभिव्यक्ति की  बड़ी ताकत है।

पुस्तक केवल समस्याओं को नहीं गिनाती, बल्कि उन कारणों पर भी प्रहार करती है जो व्यक्ति को ‘बेईमान’ बनने के लिए प्रेरित करते हैं।

‘ईमान का बोझा’ आज के दौर का यथार्थ पाठ है। यह पुस्तक उन लोगों के लिए है जो व्यवस्था की चक्की में पिस रहे हैं और जो ईमानदारी का बोझ ढोकर भी मुस्कान बनाए रखना चाहते हैं।

डॉ. अनुराग वाजपेयी ने इस संग्रह के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि व्यंग्यकार का काम केवल व्यवस्था को कोसना नहीं, बल्कि पाठकों के भीतर छिपे उस जागरूक नागरिक को जगाना है, जो शोर-शराबे में कहीं खो रहा है।

यह संग्रह व्यंग्य साहित्य के प्रेमियों और  अध्येताओं के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।

किताब खरीद कर पढ़ने की सलाह है। ये 100 पृष्ट एक दस्तावेज हैं। 34 आलेख हैं, सभी एक दूसरे से बेहतर सुगठित ललित साहित्यिक मूल्यों पर खरे हैं।

 

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

साहित्य अकादमी भोपाल से सम्मानित लेखक, समालोचक, समीक्षक, व्यंगयकार

(लंदन से, ई बुक पढ़कर)

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # ३०४ ☆ पाँच शिशु कविताएँ… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३०४ ☆ 

☆ पाँच शिशु कविताएँ…  ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

☆

 १. सूरज नारंगी 

☆

साँझ ढली सूरज नारंगी

चले जा रहे पश्चिम ओर।

करें नमस्ते हाथ जोड़कर

कल को आकर करें सुभोर।।

☆☆☆☆

 २. चिड़ियाँ आकर हमें जगातीं 

☆ 

सूरज करते रोज सवेरा।

दूर भगाते रोज अँधेरा।

चिड़ियाँ आकर हमें जगातीं

आलस सारा दूर भगातीं।।

☆☆☆☆

३. हाथी जैसी सूंढ़ न मेरी 

☆

भिन – भिन – भिन – भिन ,

भिन – भिन – भिन ।

मच्छर हूँ कानों से सुन ।

गज जैसी सूंढ़ न मेरी,

काटूँ जैसे चुभती पिन।।

☆☆☆☆

४. इन्हें न तोड़ो नटखट बंदर 

☆

फूल बड़े होते हैं सुंदर।

इन्हें न तोड़ो नटखट बंदर।

तोड़ेगे तो पाप पड़ेगा।

कहतीं नदियाँ कहे समुंदर।।

☆☆☆☆

५ . दाना खातीं फुदक – फुदक कर 

☆

चीं – चीं – चीं – चीं गीत सुनातीं।

सूरज के उगते आ जातीं।

दाना खातीं फुदक – फुदक कर।

पानी पीतीं मटक – मटक कर।।

☆

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १६० ☆ देखकर इक फ़क़ीर का हुज़रा… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “देखकर इक फ़क़ीर का हुज़रा…“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १६० ☆

✍ देखकर इक फ़क़ीर का हुज़रा… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे  ☆

☆

ग़म हुए दूर हम ख़ुशी से मिले

आप आये तो ज़िंदगी से मिले

 *

इश्क़ में क्या बड़ा है क्या छोटा

काश सागर भी आ नदी से मिले

 *

बेअ‘दब बेटे का करुँ तो क्या

बाप की आज बेबसी से मिले

 *

देखकर इक फ़क़ीर का हुज़रा

ऐसा लगता कि सादगी से मिले

 *

गिर गया कितना आदमी लगता

जब भी मसली गई कली से मिले

 *

आ‘ब जिसमें मिले हो उस रंग का

आदमी ऐसा ही किसी से मिले

 *

करता दावा मिला वो दुनिया से

आदमी काश आप ही से मिले

 *

अश्क़ कितने अरुण छुपे इसमें

खिलखिलाती तेरी हँसी से मिले

☆

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ६४ – स्वतंत्र पहचान… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – स्वतंत्र पहचान…।)

☆ हेमंत साहित्य # ६४ ☆

✍ स्वतंत्र पहचान… ☆ श्री हेमंत तारे  ☆

☆

इससे पहले कि,

खो जाये स्वतंत्र पहचान,

और हो जाये विलय,

किसी डबरे,

पोखर,

तालाब,

नदी या नाले में

 

पानी के हर टपके ने

बनाया

वर्तुल वलय एक

और,

मना लिया उत्सव

अपनी सम्भावित

विस्तारित सम्प्रभुता का ।

☆

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७२ ☆ हम और जीवन ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – “हम और जीवन“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७२ ☆

✍ कविता – हम और जीवन ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

☆

औरों का श्रम खरीदते हैं हम

और महंगे दामों पर बेचते हैं हम

जितना सस्ता खरीदे महंगा बेचे,

उसी को बड़ा आदमी कहते हैं हम।

*

वही बड़े आदमी नीतियाँ बनाते हैं

गरीबों के नाम पर स्वहित साधते हैं

विकास करते हैं और खूब कमाते हैं,

श्रम करने वाले श्रम करते ही जाते हैं।

*

मन के श्रम को कीमत सदा मिलती

शरीर को श्रम करते बीमारी मिलती

दोनों से ऊपर समझता है अब आदमी,

ईश्वर समझने की सदा इच्छा है रहती।

*

सब सुनाना चाहते हैं पर सुनना नहीं

फोलोवर चाहते हैं, फोलो करना नहीं

कोई हम से मैं कोई मैं से हम बनता है

पर आदमी बनना कोई चाहता नहीं।

*

क्षण भंगुर जीवन को जी न पाते हम

धरती आसमान पर कब्जा जमाते हम

और कर्ता बन समझ इठलाते हैं हम,

जड़ चेतन पर फिर भी बतियाते हैं हम।

*

कुछ नाटक करके जागरूक कर रहे

कुछ जागरूकता का नाटक कर रहे

पता ही नहीं कुछ नाटक के पात्र बने,

हम ऐसे ही अब जीवन यापन कर रहे।

☆

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२२ – सुविधा शुल्क… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – सुविधा शुल्क।)

☆ लघुकथा # १२२ – सुविधा शुल्क ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

सुबह से सीमा घर के कामों में लगी थी। किसी को चाय चाहिए, किसी के लिए नाश्ता, बच्चों का टिफिन, सास की दवा—हर आवाज़ पर वह दौड़ रही थी।

“सीमा! मेरी कमीज़ प्रेस हुई कि नहीं?”

“मम्मी, मेरी बोतल भर दो।”

“बहू, ज़रा चश्मा तो ढूँढ़ दो।”

एक साथ उठती आवाज़ों के बीच वह रसोई से बाहर निकली ही थी कि उसका पैर फिसल गया। वह ज़ोर से गिरी और दर्द से चीख उठी।

पति दौड़े, पर पहला वाक्य था, “इतनी भी क्या जल्दी थी? अब सारा काम रुक जाएगा!”

सास बड़बड़ाईं, “ज़रा-सा भी ध्यान नहीं रहता।”

बच्चे बोले, “अब हमारा टिफिन कौन बनाएगा?”

तभी कामवाली बाई आई। उसने सबकी बातें सुनीं, बिना कुछ कहे सीमा को सहारा दिया, ऑटो बुलाया और अस्पताल ले गई।

पीछे घर में बहस छिड़ गई—”खाना कौन बनाएगा?” “बर्तन कौन धोएगा?” “बच्चों को कौन देखेगा?”

अस्पताल से लौटते समय सीमा खामोश थी। बाई मुस्कुराकर बोली, “बीबीजी, आज समझ आया… इस घर में आपकी नहीं, आपके काम की कीमत है।”

सीमा ने खिड़की से बाहर देखा। उसे पहली बार महसूस हुआ कि इस घर में वह सदस्य कम, सुविधा अधिक है।

घर पहुँची तो सबने एक साथ पूछा, “अब कैसी हो?”

सीमा हल्की-सी मुस्कुराई और बोली— “सुविधा चाहिए… तो अब उसका शुल्क भी लगेगा।”

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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