हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३९ – हास्य-व्यंग्य – “नरेन्द्र और देवराज इंद्र” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक व्यंग्य  “नरेन्द्र और देवराज इंद्र”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३९ ☆

☆ व्यंग्य ☆ “नरेन्द्र और देवराज इंद्र” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆☆

नारायण – नारायण कहते हुए नारद मुनि भगवान विष्णु के पास पहुंचे। विष्णु जी ने आइये ऋषिवर, कहां से आगमन हुआ कहते हुए नारद जी का स्वागत किया। नारद मुनि बोले – प्रभु पृथ्वी पर स्थित आपके प्रिय जम्बुद्वीप का भ्रमण करके लौट रहा हूं। वहां की अराजक स्थिति को देखकर अत्यंत दुखी हूं। जनता में हाहाकार मचा है। देश की केंद्र सरकार और प्रदेश सरकारों के बढ़ते टैक्सों ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है, जिसके पास धन और सत्ता है वे सुख भोग रहे हैं। गरीबों, कमजोरों पर तरह – तरह के अत्याचार हो रहे हैं। प्रतिभा और योग्यता दर – दर भटक रही है, गधे पंजीरी खा रहे हैं। दबंगों के साथ – साथ अनेक साधु वेशधारी भी महिलाओं से दुष्कर्मों में लिप्त हैं। झूठ और फरेब का बोलबाला है। देवी – देवताओं के वंशज पथ भ्रष्ट हो गए हैं। धन्वन्तरि के वंशज चिकित्सा के क्षेत्र में, कुबेर के वंशज व्यवसाय में, बुद्धि दाता गणेश के वंशज मीडिया और न्याय में, विश्वकर्मा के वंशज तकनीक और नवनिर्माण में, माँ अन्नपूर्णा के वंशज कृषि और अनाज के क्षेत्र में लूट और भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। प्रभु आपने ही बताया था कि धरती पर शांति और अनुशासन के लिए एक ही परम शक्ति ने अलग – अलग रूपों में जन्म लिया है। फिर देवी – देवताओं और अन्य धर्मों के प्रमुखों के नाम पर भोली – भाली जनता को भ्रमित करके क्यों लड़वाया और लूटा जा रहा है ? प्रभु अब जम्बुद्वीप पर आपके पुनः जन्म लेने का समय आ गया है। विष्णु जी बोले – ऋषिवर मैं यह कार्य अनेक बार कर चुका हूं, अब इसे कोई अन्य देवता करे। नारद मुनि निराश होकर देवराज इंद्र के दरबार में पहुंचे। उन्होंने देवराज को जम्बुद्वीप की हालत और विष्णु देव से मुलाकात की जानकारी दी। नारद की बात पर देवराज ने मुस्कुराते हुए कहा – हे ऋषिवर भारतवासियों और पड़ोसी देशों के समाचारों से हम सभी देवता चिंतित हैं। “देव सरकार” भी विष्णु जी से जम्बुद्वीप पर अवतार लेकर वहां पुनः व्यवस्था कायम करने का आग्रह कर चुकी है, किंतु विष्णु जी का कथन भी सही है कि वे यह कार्य अनेक बार कर चुके हैं, अतः अब किसी अन्य देवता को भेजा जाए। ऋषिवर विष्णु जी के धरती पर अनुभवों को देखते हुए हमने उनसे अनुरोध किया है, हमें विश्वास है कि वे एक बार फिर जम्बुद्वीप पर अवतार लेने राजी हो जाएंगे। वैसे भी उनका “कल्की अवतार” लेना अभी बाकी है।

नारद मुनि ने नारायण – नारायण कहते हुए गहरी सांस ली और बोले – प्रभु कहीं विष्णु जी को पहुंचने में देर न हो जाए। जम्बुद्वीप में इन दिनों नरेंद्र नामक व्यक्ति सर्वोच्च पद पर आसीन है, कोई अमित उनका सारथी है। ये दोनों ही तीक्ष्ण बुद्धि के स्वामी हैं। नरेंद्र तो चक्रवर्ती सम्राट बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उसने पूरे जम्बुद्वीप को एक रंग में रंग दिया है। अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान सहित विश्व के तमाम बड़े – छोटे देशों को अपनी वाणी से मोह लिया है, चीन पर भी डोरे डाल रहा है। जम्बुद्वीप का सारा विपक्ष भी एकजुट होकर उसका मुकाबला करने में असमर्थ साबित हो रहा है। यदि नरेंद्र के विजय रथ को शीघ्र नहीं रोका गया तो अनर्थ हो जाएगा। चिंतातुर देवराज बोले – हे ऋषिवर स्पष्ट बोलें – क्या अनर्थ हो जाएगा ?

नारद मुनि ने पुनः गहरी सांस ली और कहा – प्रभु जम्बुद्वीप के चंद राज्य ही उसके ध्वज से बचे हैं। जैसे ही वह संपूर्ण जम्बुद्वीप पर अपना ध्वज लहराकर और सम्पूर्ण विश्व के नेताओं को जादू की झप्पी दे देकर चक्रवर्ती सम्राट बनेगा वैसे ही उसकी नजर आपकी कुर्सी पर होगी। मैं पहले ही कह चुका हूँ कि वह बहुत चतुर है। उसके पास अमित जैसा कुशल सारथी और “मामा” जैसे घोषणा वीर हैं। नारद की बातों से चिंतित देवराज अपना आसन छोड़ विष्णु जी से मिलने रवाना हो गए। वे नहीं चाहते थे कि कलयुग में कोई धरती पुत्र इतना शक्तिशाली हो जाए कि उसके कारण इंद्रासन डोलने लगे।

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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २८३ ☆ # “माता के दरबार में…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “माता के दरबार में…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २८३ ☆

☆ # “माता के दरबार में…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

चलो दीपक जलाएं

माता के दरबार में

श्रद्धा के सुमन चढ़ाएं

माता के दरबार में

 

नवरात्रि के पावन पर्व पर

नौ रूपों पर गर्व कर

हम भक्ति के पुष्प चढ़ाएं

माता के दरबार में

 

पृथ्वी अंबर डोल रहा है

माता की जय बोल रहा है

भक्त जन जस गा रहे हैं

माता के दरबार में

 

गली चौराहे पर पंडाल खड़ा है

माता पर श्रृंगार चढ़ा है

हर कोई भोग लगा रहा है

माता के दरबार में

 

पाप बढ़ गए हैं संसार में

धार करो मां अपने वार में

ताकि हर पापी शीश नवाएं

माता के दरबार में

 

प्रबल हो गई दुष्ट शक्तियां

लाचार हो गई भक्तों की भक्तियां

इनका संहार करो मां

माता के दरबार में

 

तेरे नाम से शक्तिपीठ है चलते

निर्धन भक्तों को हरदम है  छलते

सब पाखंडियों की हाजिरी लगाओ

माता के दरबार में

 

मन से करो पूजा

नहीं है कोई मार्ग दूजा

अपना सब कुछ दिल से लूटाओ

माता के दरबार में

 

तन मन से जो करता है भक्ति

उस पर प्रसन्न होती है शक्ति

उसको मिलता है प्रसाद

माता के दरबार में /

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१२७ – किसी का यहां कोई नहीं… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘किसी का यहां कोई नहीं…‘।)

☆ अभिव्यक्ति # १२७ ☆

☆ किसी का यहां कोई नहीं… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

तूने अजब रचा ये संसार,

किसी का यहां कोई नहीं,

कहने को तो सब हैं यहां,

पर संगी साथी कोई नहीं,

तूने अजब…

 

मिथ्या जगत है, मिथ्या रिश्ते,

मिथ्या सब नाते हैं,

कोई किसी के साथ न चलता,

मिथ्या सब बातें हैं,

कैसी लीला ये तेरी करतार,

किसी का यहां कोई नहीं,

तूने अजब…

 

साँस चल रही, जब तक तेरी,

रिश्ते बने हैं, सुहाने,,

ज्यों ही तेरी, सांस ये छूटे,

कोई न तुझे पहचाने,

कैसे जीवन हुआ लाचार,

किसी का यहां कोई नहीं,

तूने अजब…

 

जैसी तेरी करनी होगी,

वैसी तेरी भरनी होगी,

कर्म की गठरी लेकर तुझको,

राह अकेले चलनी होगी,

बिछे राह में शूल अपार,

किसी का यहां कोई नहीं,

तूने अजब रचा ये संसार,

किसी का यहां कोई नहीं.

 

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३५० ☆ कथा-कहानी – प्रेम-प्यार ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम लघुकथा – ‘प्रेम-प्यार‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३५० ☆

☆ कथा-कहानी ☆  लघुकथा – प्रेम-प्यार ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

उस कार्यक्रम में शायद वह कहीं पीछे बैठा था। वहां से उठकर ठीक मेरे पीछे वाली कुर्सी पर आ गया, फिर गर्दन लंबी करके बोला, ‘नमस्ते चाचाजी।’

मैं चौंका। यहां ‘चाचा जी’ संबोधन करने वाला कौन आ गया? उसे सात-आठ साल बाद देख रहा था। मैंने पूछा, ‘कैसे हो? यहां कैसे?’

वह बोला, ‘मैं तो डेढ़ साल से इसी शहर में हूं। किसी दिन आपसे मिलने आने वाला ही हूं। अभी तक नहीं आ पाया।’

फिर बोला, ‘चाची जी की डेथ के बारे में पता चला था। बहुत भली थीं। अ ग्रेट लेडी। मुझे तो बेटे जैसा मानती थीं। उनकी बहुत याद आती है। आई कैन नेवर फ़ॉरगेट हर। वाइफ़ भी आप लोगों को बहुत याद करती है।’

वह थोड़ी देर तक अफ़सोस में सिर हिलाता रहा, फिर बोला, ‘बेटे दोनों कैसे हैं? अब तो बड़े हो गये होंगे।’

मैंने कहा, ‘हां, अभी दोनों कॉलेज में हैं।’

वह सिर हिलाता बैठा रहा। पंद्रह सोलह साल पहले वह किसी रिश्तेदार का पत्र लेकर नौकरी के लिए मेरे शहर आया था और मेरे घर पर दस-पंद्रह दिन रहा था। मेरी पत्नी ने उसे खूब लाड़ से रखा था। फिर उसने किराये पर मकान ले लिया था। कुछ दिन बाद उसकी शादी हो गयी थी और वह गृहस्थ हो गया था। उसके बाद उसका मेरे घर आना कम होता गया था। वह कब शहर छोड़ कर चला गया मुझे पता ही नहीं चला। पता चला उसने पुरानी नौकरी छोड़ दी थी। शहर छोड़ने के बाद उसने मुझसे संपर्क करने की कोई कोशिश नहीं की थी।

उसके दोस्तों से मालूम हुआ कि वह कई बार उनकी शादियों में शरीक होने के लिए शहर आया था, लेकिन वह कभी मुझसे नहीं मिला। लेकिन अभी वह मेरे पास बैठा पुरानी बातों को खोद खोद कर निकाल रहा था।

बात करते-करते वह हंसने लगा, बोला, ‘आपके आर्टिकिल पढ़ता रहता हूं। बहुत मज़ा आता है। साथियों को बताता हूं कि आप मेरे पिता जैसे हैं। मुझे बहुत स्नेह करते हैं।’

कार्यक्रम ख़त्म हुआ तो वह मेरे साथ मेरे स्कूटर तक आया। पांव छूकर बोला, ‘इतने दिनों बाद आपको देखकर बहुत अच्छा लगा। आशीर्वाद देते रहें। मैं जल्दी ही घर आकर आपसे इत्मीनान से बात करूंगा।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# १२१ – उद्घोष… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– उद्घोष…” ।) 

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # १२१ — उद्घोष — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

अज्ञानी तो क्या, वह तो विद्वानों के मुँह पर भी कह देता था वह भगवान को नहीं मानता। लोग तो यही सोचते होंगे भगवान सुन रहा है। पर भगवान सुनता भी हो तो आदमी को किसी प्रकार का अंतर नहीं पड़ता। बल्कि वह तो आजीवन सुखी संपन्न रहा। उसके अंत में इतना ही हुआ वह भी भगवान को मानने वालों की तरह अरथी में सजा और उसके लिए श्मशान तक उद्घोष एक ही हुआ, “राम नाम सत्य है।”

 © श्री रामदेव धुरंधर

10 – 10 – 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३५६ – नव साधना ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३५६ ☆ नव साधना… ?

नवरात्रि शक्तिपर्व है। शास्त्रोक्त एवं परंपरागत पद्धति के साथ-साथ इन नौ संकल्पों के साथ देवी की उपासना करें। निश्चय ही दैवीय आनंद की प्राप्ति होगी।

1. अपने बेटे में बचपन से ही स्त्री का सम्मान करने का संस्कार डालना देवी की उपासना है।

2. घर में उपस्थित  माँ, बहन, पत्नी, बेटी के प्रति आदरभाव देवी की उपासना है।

3. दहेज की मांग रखनेवाले घर और वर तथा घरेलू हिंसा के अपराधी का सामाजिक बहिष्कार देवी की उपासना है।

4. स्त्री-पुरुष, सृष्टि के लिए अनिवार्य पूरक तत्व हैं। पूरक न्यून या अधिक, छोटा या बड़ा नहीं अपितु समान होता है। पूरकता के सनातन तत्व को अंगीकार करना देवी की उपासना है।

5. स्त्री को केवल देह मानने की मानसिकता वाले मनोरुग्णों की समुचित चिकित्सा करना / कराना  भी देवी की उपासना है।

6. हर बेटी किसीकी बहू और हर बहू किसीकी बेटी है। इस अद्वैत का दर्शन देवी की उपासना है।

7. किसीके देहांत से कोई जीवित व्यक्ति शुभ या अशुभ नहीं होता। मंगल कामों में विधवा स्त्री को शामिल नहीं करना सबसे बड़ा अमंगल है। इस अमंगल को मंगल करना देवी की उपासना है।

8. गृहिणी 24×7 अर्थात पूर्णकालिक सेवाकार्य है। इस अखंड सेवा का सम्मान करना तथा घर के कामकाज में स्त्री का बराबरी से या अपेक्षाकृत अधिक हाथ बँटाना, देवी की उपासना है।

9.स्त्री प्रकृति के विभिन्न रंगों का समुच्चय है। इन रंगों की विविध छटाओं के विकास में स्त्री के सहयोगी की भूमिका का निर्वहन, देवी की उपासना है।

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।

शारदीय नवरात्रि की हार्दिक मंगलकामनाएँ।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ दि. 11 अक्टूबर 2026 से नवरात्रि साधना आरम्भ होगी। 🕉️

💥

इस साधना के लिए देवीमंत्र इस प्रकार होगा-

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

💥

💥 इसके साथ ही महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् का एक पाठ नियमित रूप से करने का प्रयास करें। तथापि जो लोग किन्हीं कारणों से महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् न कर पाएँ, वे कम से कम इसे सुनें अवश्य।

अपेक्षित है कि नवरात्रि साधना में साधक हर प्रकार के व्यसन से दूर रहे, शाकाहार एवं ब्रह्मचर्य का पालन करे।

सदा की भाँति आत्म-परिष्कार तथा मौन साधना तो साथ चलेंगी ही। 💥

≈≈हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २९५ – आदि शक्ति दुर्गा वंदना ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – सामयिक गीत – पुरुष दिवस।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २९५ ☆

☆ आदि शक्ति दुर्गा वंदना ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

☆

आदि शक्ति जगदम्बिके, विनत नवाऊँ शीश.

रमा-शारदा हों सदय, करें कृपा जगदीश….

*

पराप्रकृति जगदम्बे मैया, विनय करो स्वीकार.

चरण-शरण शिशु, शुभाशीष दे, करो मातु उद्धार…..

*

अनुपम-अद्भुत रूप, दिव्य छवि, दर्शन कर जग धन्य.

कंकर से शंकर रचतीं माँ!, तुम सा कोई न अन्य..

परापरा, अणिमा-गरिमा, तुम ऋद्धि-सिद्धि शत रूप.

दिव्य-भव्य, नित नवल-विमल छवि, माया-छाया-धूप..

जन्म-जन्म से भटक रहा हूँ, माँ ! भव से दो तार.

चरण-शरण जग, शुभाशीष दे, करो मातु उद्धार…..

*

नाद, ताल, स्वर, सरगम हो तुम. नेह नर्मदा-नाद.

भाव, भक्ति, ध्वनि, स्वर, अक्षर तुम, रस, प्रतीक, संवाद..

दीप्ति, तृप्ति, संतुष्टि, सुरुचि तुम, तुम विराग-अनुराग.

उषा-लालिमा, निशा-कालिमा, प्रतिभा-कीर्ति-पराग.

प्रगट तुम्हीं से होते तुम में लीन सभी आकार.

चरण-शरण शिशु, शुभाशीष दे, करो मातु उद्धार…..

*

वसुधा, कपिला, सलिलाओं में जननी तव शुभ बिम्ब.

क्षमा, दया, करुणा, ममता हैं मैया का प्रतिबिम्ब..

मंत्र, श्लोक, श्रुति, वेद-ऋचाएँ, करतीं महिमा गान-

करो कृपा माँ! जैसे भी हैं, हम तेरी संतान.

ढाई आखर का लाया हूँ, स्वीकारो माँ हार.

चरण-शरण शिशु, शुभाशीष दे, करो मातु उद्धार

☆

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१८-४-२०१४

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (12 अक्टूबर से 18 अक्टूबर 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (12 अक्टूबर से 18 अक्टूबर 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

जय श्री राम। भगवान श्री राम के परम भक्त श्री हनुमान जी के गुणगान के लिए श्री हनुमान चालीसा की रचना हुई। परंतु इस चालीसा के हर चौपाई का असर श्रद्धा पूर्वक संपुट पाठ करने से हमें मंत्र के समान लाभ प्राप्त होता है। श्री हनुमान चालीसा के किस चौपाई के जाप करने से कौन सा कार्य सिद्ध होगा इसको मैं आपको लगातार बता रहा हूं। इस प्रकार मैंने आपको सभी चौपाइयों के संपुट पाठ से होने वाले लाभ के बारे में बता दिया है। अब आज श्री हनुमान चालीसा के अंतिम दोहा के बारे में बताऊंगा।

पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।

राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥

इस दोहे के संपुट पाठ करने से जीवन में मंगल होता है तथा सभी प्रकार के संकटों से मुक्ति मिलती है।

“नाशे रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

अब मैं पंडित अनिल पाण्डेय आपको इस सप्ताह अर्थात 12 अक्टूबर से 18 अक्टूबर 2026 तक के सप्ताह के साप्ताहिक राशिफल के बारे में बताऊंगा। मगर इस राशिफल के पहले इस सप्ताह के ग्रहों के गोचर पर नजर डाल लें।

इस सप्ताह बुध तुला राशि में, गुरु और मंगल कर्क राशि, वक्री शुक्र तुला राशि में, वक्री शनि मीन राशि में, और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे। सूर्य प्रारंभ में कन्या राशि में रहेगा तथा 18 तारीख को 10:34 दिन से तुला राशि में प्रवेश करेगा।

इन सबके अलावा इस बार इस सप्ताह में कर्क राशि में उच्च के गुरु और अपनी निम्न राशि में मंगल विराजमान है। 14 और 15 तारीख को चंद्र देव भी अपनी नीच राशि वृश्चिक में रहेंगे। यह तीनों ग्रहों मिलकर के इस सप्ताह विभिन्न राशियों में जबरदस्त रूप से परिवर्तन ला सकते हैं। एक बार फिर से जय श्री राम, जय श्री हनुमान।

मेष राशि

यह सप्ताह अविवाहित जातकों के लिए उत्तम है। उनके विवाह के अच्छे प्रस्ताव आ सकते हैं। व्यापारियों के व्यापार में वृद्धि होगी। धन लाभ होगा। गलत रास्ते से भी धन आने का योग है। आपकी प्रतिष्ठा में कुछ लोग बाधक बन सकते हैं जिनसे आपको थोड़ा सतर्क रहना चाहिए। कार्यालय में आपकी स्थिति में सुधार होगा। आपको अपने संतान से मामूली सहयोग प्राप्त हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 12 और 13 अक्टूबर विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए उचित है। 14 और 15 अक्टूबर को आपको सावधान रहकर के अपने कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

वृष राशि

इस सप्ताह आप को अपने संतान से सहयोग प्राप्त होगा। भाई बहनों के साथ संबंध नरम और गरम रहेंगे। कार्यालय में आपको अपनी वाणी पर थोड़ा नियंत्रण रखना चाहिए। धन आने का योग है। धन की मात्रा अच्छी भी हो सकती है। यह आपके प्रयासों पर निर्भर है। इस सप्ताह आपके शत्रु थोड़ा शांत रह सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए थोड़ा चैलेंज है। प्रत्येक काम को करने के लिए आपको अधिक परिश्रम करना पड़ेगा। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव को दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

मिथुन राशि

इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त होगा। भाग्य के स्थान पर इस सप्ताह आपको अपने पुरुषार्थ पर विश्वास करना चाहिए। इस सप्ताह आपको प्रत्येक कार्य को करने के लिए अधिक परिश्रम करना चाहिए। आपकी प्रतिष्ठा बढ़ सकती है। माताजी और पिताजी का स्वास्थ्य पहले जैसा ही रहेगा। आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य ठीक-ठाक रहेगा। 14 और 15 तारीख को आप अपने शत्रुओं को अपने प्रयासों से परास्त कर सकते हैं। 16 17 और 18 तारीख आपको विभिन्न कार्यों के लिए परिणाम दायक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

कर्क राशि

कर्क राशि में उच्च के गुरु और अपनी निम्न राशि में मंगल विराजमान है। इसके अलावा 14 और 15 तारीख को चंद्र देव भी अपनी नीच राशि वृश्चिक में रहेंगे तथा पंचम भाव में विराजमान रहेंगे। इस कारण आपका आत्मविश्वास ऊपर नीचे होता रहेगा। आपका अपने भाई बहनों के साथ संबंध सामान्य रहेंगे। भाग्य से थोड़ी बहुत मामूली मदद मिल सकती है। कचहरी के कार्यों में आपको सावधान रहना चाहिए। कर्मचारी और अधिकारियों को भी इस सप्ताह सावधान होकर कार्य करना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 12 और 13 तारीख विभिन्न कार्यों के लिए लाभदायक है। 16, 17 और 18 को आपको सतर्क रहना चाहिए। 14 और 15 तारीख को अगर आपके किसी परीक्षा का रिजल्ट आ रहा है उसमें आपको सफलता मिल सकती है। आपके संतान को भी उसी दिन अगर कोई रिजल्ट आता है तो सफलता मिलेगी। संतान का अच्छा सहयोग भी आपको मिलेगा। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन सोमवार है।

सिंह राशि

इस सप्ताह कचहरी के कार्यों में सफलता का योग है। परंतु आपको इसके लिए सावधानी के साथ प्रयास करने होंगे। धन आने का भी योग है। भाई बहनों के साथ संबंध सामान्य रहेंगे। भाग्य से कोई विशेष लाभ मिलने की उम्मीद नहीं है। आपको अपने कर्मों पर विश्वास करना पड़ेगा। इस सप्ताह आप अपने शत्रुओं को आसानी से पराजित कर सकते हैं, परंतु थोड़ा प्रयास तो करना ही पड़ेगा। इस सप्ताह आपके लिए सप्ताह के सभी दिन एक जैसे हैं। 14 और 15 तारीख को आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति तथा माता जी के स्वास्थ्य के प्रति थोड़ा ध्यान देना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन सोमवार है।

कन्या राशि

इस सप्ताह आपका आत्मविश्वास उत्तम रहेगा। धन आने का भी योग है। व्यापार अच्छा चलेगा। भाई बहनों के साथ थोड़ा तनाव हो सकता है। शत्रु शांत रहेंगे। अगर आप बहुत प्रयास करेंगे तो आप उनको समाप्त कर सकते हैं। भाग्य से मामूली सहयोग प्राप्त हो सकता है। आपके माता-पिता जी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 16, 17 और 18 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए मददगार है। 14 और 15 तारीख को आपको अपने भाई बहनों के प्रति सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

तुला राशि

इस सप्ताह बुद्ध का गोचर आपकी ही राशि में है। इस कारण से आपके व्यक्तित्व में आकर्षण और निखार आएगा। निर्णय लेने की क्षमता मजबूत होगी। सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ेगी और व्यापार में नई योजनाओं को लागू करने के लिए यह समय बहुत उत्तम है। अगर आप अविवाहित हैं तो विवाह के उत्तम प्रस्ताव आएंगे। कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए यह सप्ताह थोड़ा सावधान रहने का है। इस सप्ताह आपको अपने कर्म पर विश्वास करना चाहिए, भाग्य पर नहीं। इस सप्ताह आपके लिए 12 और 13 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों में फल दायक है। 14 और 15 तारीख को आपको धन की प्राप्ति हो सकती है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

वृश्चिक राशि

इस सप्ताह आपको लंबी दूरी की यात्रा या बड़ी कंपनियों/कार्यों से लाभ मिलने की अच्छी संभावना है। हालांकि, खर्चों में अचानक बढ़ोतरी हो सकती है, इसलिए बजट का ध्यान रखें। कानूनी या अदालती मामलों में सतर्कता बरतें। आपके आत्मविश्वास में थोड़ी कमी हो सकती है परंतु उसकी गिरने मत दें। धन लाभ होने की पूर्ण संभावना है। व्यापार अच्छा चलेगा। पहले से कर्ज है तो उसमें कमी आ सकती है। 16 17 और 18 तारीख ठीक-ठाक है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधानी से कार्य करना है। 14 और 15 तारीख को आपका मन उदास हो सकता है। 14 और 15 तारीख को ही आपको भाग्य से विशेष मदद मिल सकती है। 14 और 15 तारीख को आपको ऐसे काम करना चाहिए जिसमें आपको भाग्य की मदद की जरूरत हो। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें तथा मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर उनकी पूजा करें। पिता का शुभ दिन रविवार है।

धनु राशि

आर्थिक दृष्टि से यह सप्ताह आपके लिए अच्छा साबित हो सकता है। आय के नए स्रोत बनेंगे। पुराने निवेश से बढ़िया रिटर्न मिल सकता है। बड़े भाई-बहनों और मित्रों का पूरा सहयोग प्राप्त होगा।। व्यापार में वृद्धि होगी। लाभ बढ़ेगा। कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए यह सप्ताह अच्छा है। लंबी यात्रा का योग बन सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 16, 17 और 18 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए अनुकूल हैं। 14 और 15 तारीख को कचहरी के कार्यों में आपको मदद मिल सकती है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

मकर राशि

कार्यक्षेत्र और नौकरी में उन्नति के योग हैं। अधिकारियों के साथ आपके संबंध सुधरेंगे। यदि पदोन्नति (Promotion) या नई नौकरी की तलाश में थे, तो सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं। आपके पिताजी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। इसके अलावा राज्य का भी आपके समर्थन प्राप्त होगा। व्यापार विस्तार के लिए भी समय अनुकूल है। इस सप्ताह 14 और 15 तारीख को आपको धन लाभ होने की विशेष उम्मीद है। इस सप्ताह आपके लिए 12 और 13 तारीख विशेष रूप से कार्यों के करने के लिए लाभप्रद है। 16, 17 और 18 को आपको सतर्कता के साथ कार्य करना चाहिए। सप्ताह का शुभ दिन सोमवार है।

कुंभ राशि

इस सप्ताह आपको भाग्य का पूरा साथ मिलेगा। अटके हुए काम गति पकड़ेंगे। धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों में रुचि बढ़ेगी। उच्च शिक्षा के इच्छुक विद्यार्थियों के लिए समय अनुकूल है। लंबी दूरी की यात्राएं फलदायी होंगी। इस सप्ताह आपके शत्रु शांत रहेंगे परंतु परास्त नहीं हो पाएंगे। उनको पराजित करने के लिए आपको विशेष प्रयास करने पड़ेंगे। इस इस सप्ताह आपको 14 और 15 तारीख को सतर्कता पूर्वक कार्य करना चाहिए, विशेष रूप से वे जो किसी संस्थान में कर्मचारी या अधिकारी हैं। सप्ताह के बाकी दिन ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मीन राशि

अचानक कोई रुका हुआ धन मिल सकता है। वाणी पर थोड़ा संयम रखें और स्वास्थ्य को लेकर लापरवाही न बरतें। रिसर्च, ज्योतिष या गुप्त विद्याओं से जुड़े लोगों के लिए समय बेहतरीन है। आपके माता और पिताजी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आपकी संतान को भी सुख प्राप्त होगा। संतान का सहयोग आपको मिलेगा। इस सप्ताह आपके लिए 16, 17 और 18 तारीख परिणाम दायक हैं। 14 और 15 तारीख को आपको भाग्य की मदद नहीं मिल पाएगी। कृपया भाग्य के भरोसे ना रहे। अपने कर्मों पर ध्यान दें। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह शुभ दिन रविवार है।

 

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ११७ आणि ११८ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ११७ आणि ११८ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. ११७ – – – 

धुरु लेकरू बापुडे दैन्यवाणे ।

कृपा भाकिता दीधली भेटि जेणें ।

चिरंजीव तारांगणी प्रेमखाणी ।

नुपेक्षी कदा देव भक्ताभिमानी ।।११७।।

अर्थ : ध्रुव बाळ बिचारा दीनवाणा बालक होता. त्याने भगवंताजवळ कृपेची याचना केली तेव्हा प्रसन्न होऊन भगवंताने त्याला दर्शन दिले. आपल्या प्रेमभक्तीने त्याचे जीवन परिपूर्ण करून भगवंताने त्याला तारकामंडळात अढळ स्थान दिले. भगवंत आपल्या भक्तांचा अभिमानी असून तो त्यांची कधीही उपेक्षा करीत नाही. 

(धुरु – ध्रुव बाळ, बापुडे – बिचारा, दैन्यवाणा – ज्याची कीव यावी असा, कृपा भाकणे – कृपेची याचना करणे, चिरंजीव – अमर, प्रेमखाणी – प्रेम/भक्तीचा साठा /उगम)

विवेचन : देव आपल्या भक्ताचा कैवारी कसा आहे ते समर्थ या श्लोकातही आपल्याला सांगतात. ध्रुव बाळाची गोष्ट लहानपणी आपण सगळ्यांनी बहुतेक ऐकलेली असते. परंतु परमेश्वराची कृपा काय असते ते समर्थ या श्लोकातून सांगतात. ध्रुव हा उत्तानपाद राजाचा मुलगा. या उत्तानपाद राजाला दोन राण्या होत्या. सुनिती ही मोठी राणी होती आणि धाकटी होती सुरुचि. सुरुचि ही राजाची लाडकी आणि त्यामुळेच गर्विष्ठ झालेली होती. सुनीति मात्र अत्यंत समजूतदार आणि गुणी होती. तिचाच मुलगा ध्रुव. सुरुचि ही सुनीतिचा आणि तिच्या मुलाचा अतिशय द्वेष करीत असे. राजा तर पूर्णपणे सुरुचिच्याच कह्यात गेला होता. एक दिवस खेळता खेळता छोटा ध्रुव राजाच्या म्हणजे आपल्या पित्याच्या मांडीवर जाऊन बसला. सुरुचिला ते अजिबात आवडले नाही. तिने राजाच्या मांडीवरून ओढून त्याला हाकलले आणि ओरडून म्हणाली, ” जा चालता हो. पुन्हा इथे यायचे नाही. राजाची मांडी किंवा राज्याचे सिंहासन यावर बसण्याची तुझी पात्रता नाही.” ध्रुव बिचारा रडत आपल्या आईकडे गेला. त्याने आईला ही घटना सांगितली. आईला खूप वाईट वाटले पण ती काही करू शकत नव्हती. तिने त्याची समजूत घातली. ती म्हणाली, ” बाळा, मागील जन्मी काहीतरी पातक आपल्या हातून घडले असेल. त्यामुळे आज असे दिवस आपल्याला पाहावे लागत आहेत. पण एक लक्षात ठेव. राजाची मांडी किंवा सिंहासन या तात्पुरत्या गोष्टी आहेत. तू परमेश्वराची आराधना कर. तो सर्वांचे पालन करणारा आहे. तो प्रसन्न झाला म्हणजे तुला कोणी कुठूनही हाकलू शकणार नाही. “

आपल्या आईचे हे उद्गार ऐकून ध्रुव बाळाने परमेश्वराला प्रसन्न करून घेण्याचा निश्चय केला. तो लहान असला तरी दृढनिश्चयी होता. त्याने जंगलाचा रस्ता धरला. वाटेत त्याची आणि नारदमुनींची भेट झाली. नारदांनी त्याची हकीगत जाणून घेतली. त्याला मंत्र देऊन भगवद्भक्तीचा मार्ग सांगितला. ध्रुवाने तहान -भूक कशाचीच पर्वा न करता कठोर तपश्चर्या केली. त्याच्या भक्तीने भगवान विष्णू प्रसन्न झाले. 

ध्रुव भगवंताच्या नामस्मरणात एवढा मग्न होता की प्रत्यक्ष देव त्याच्यासमोर उभा राहिला तरी त्याला त्याचे भान नव्हते. शेवटी भगवंताने त्याला म्हटले, ” बाळ, डोळे उघड. मी प्रत्यक्ष परमेश्वर तुझ्या भक्तीने प्रसन्न होऊन तुला वर देण्यासाठी आलो आहे.”

देवाचे मनोहर रूप पाहताच ध्रुव आपल्याला काय मागायचे आहे हे विसरला. भगवंताने आपल्या दिव्य शंखाचा स्पर्श त्याच्या गालाला करताच त्याला ज्ञान प्राप्त होऊन तो भगवंताची स्तुती करू लागला. भगवान विष्णूंनी त्याला त्याचे राज्य तर दिलेच परंतु आकाशातील तारकासमूहात त्याला असे अढळ स्थान प्राप्त करून दिले की जिथून त्याला कोणीही उठ म्हणू शकणार नाही. आपण आकाशात पाहतो तोच तेजस्वी ध्रुवतारा म्हणजे बाळ ध्रुव. तो परमेश्वरकृपेने चिरंजीव झाला. 

परमेश्वर आपल्या भक्तांना न मागता सर्व काही देतो हे आपल्याला मागील श्लोकातील उपमन्यू किंवा या श्लोकातील ध्रुव बाळाच्या उदाहरणावरून समजते. तो आपल्या भक्तांचा कैवारी आहे. त्यांची तो उपेक्षा करीत नाही. उपमन्यू किंवा ध्रुव बाळाची कथा या प्रतीकात्मक आहेत असे आपण मानले तरी परमेश्वराची कृपा काय असते हे या उदाहरणांवरून आपल्याला दिसते. राजाची मांडी किंवा सिंहासन या प्रतीकात्मक गोष्टी आहेत. त्या ऐहिक सुखाचे प्रतिनिधित्व करतात. आत्मस्वरूपाचे ज्ञान झाले की काही मिळवायचे शिल्लक राहत नाही. म्हणून आपण भक्तिमार्गाचा अवलंब केला पाहिजे असे समर्थ यातून सूचित करतात. 

स्वसंवाद

१. ध्रुव बाळाप्रमाणे माझ्या आयुष्यात जेव्हा कुणी माझा अपमान करतं, तेव्हा मी सूडबुद्धीने रागावत बसतो, की त्या दुःखाचे रूपांतर एखाद्या उच्च ध्येयाच्या (किंवा ईश्वराच्या) आराधनेत करतो?

२. “राजाची मांडी किंवा सत्ता ही तात्पुरती आहे, ” या सुनीतीच्या उपदेशाप्रमाणे, मला हे समजले आहे का की संसारातील भौतिक पदे क्षणभंगुर असून केवळ सत्कर्म आणि भक्तीच अढळ असते?

३. ध्रुव बाळासारखा दृढनिश्चय माझ्या अंगी आहे का? एखादे चांगले काम किंवा साधना हाती घेतल्यावर तहान-भूक विसरून मी त्यात पूर्णपणे मग्न होतो का?

४. जेव्हा मला ईश्वराची कृपा किंवा आयुष्यात मोठे यश प्राप्त होते, तेव्हा मी भौतिक गोष्टींची हाव न धरता केवळ कृतज्ञतेने ‘स्तुती’ (समाधान) करायला शिकलो आहे का?

===== 

श्लोक क्र. ११८ – – –

गजेंद्र महा संकटी वास पाहे ।

तयाकारणे श्रीहरी धावताहे ।

उडी घातली जाहला जीवदानी ।

नुपेक्षी कदा देव भक्ताभिमानी ।।११८।।

अर्थ : गजेंद्रावर जिवावरचे संकट आले. त्याने भगवंताचा धावा केला आणि तो त्याची वाट पाहू लागला. त्याच्या सुटकेसाठी भगवंत धावून आले. (त्या संकट समयी) उडी घालून भगवंताने आपल्या भक्ताचे प्राण वाचवले. आपल्या भक्ताचा अभिमानी असलेला भगवंत त्याची कधी उपेक्षा करीत नाही. 

(वास पाहे – वाट पाहत होता, जीवदानी – जीवदान देणारा)

विवेचन : आपल्या भक्ताच्या रक्षणासाठी भगवंत कसा धावून येतो हे समर्थ आपल्याला विविध उदाहरणांद्वारे पटवून देत आहेत. आधीच्या श्लोकात आपण अंबरीष राजा, उपमन्यू आणि ध्रुव बाळाचे उदाहरण पाहिले. या श्लोकात समर्थ आपल्याला गजेंद्राचे उदाहरण देत आहेत. हा श्लोक समजून घेण्यासाठी आपल्याला ही पौराणिक कथा जाणून घ्यावी लागेल. भागवत आणि पद्मपुराणात या कथेचा उल्लेख येतो. फार पूर्वी पांड्य देशात इंद्रद्युम्न नावाचा एक राजा अत्यंत धार्मिक वृत्तीचा होता. एकदा त्याची भेट घेण्यासाठी त्याच्याकडे अगस्ती ऋषी आले. त्यावेळी राजा पूजेत मग्न होता. आपल्या स्वागतासाठी राजा आला नाही म्हणून अगस्ती ऋषी रागावले. ते म्हणाले, ” हे राजा तू उन्मत्त झाला आहेस. ऋषींचे आदरातिथ्य करण्याचे तुला भान नाही. तेव्हा तू माझ्या शापामुळे एक मदोन्मत्त हत्ती म्हणून जन्माला येशील.” राजाने त्यांची क्षमा मागितली. तेव्हा ऋषींनी त्याला उ:शाप दिला की हत्ती असताना जेव्हा तू प्राणांतिक संकटात सापडशील आणि भगवंताचा धावा करशील, तेव्हा भगवंत स्वतः येऊन तुझा उद्धार करतील. ऋषींच्या शापानुसार हत्ती झालेला हा राजा नंतर गजेंद्र म्हणून ओळखला गेला. तो एका हत्तींच्या कळपाचा नायक झाला. 

एके दिवशी आपल्या समूहासह तो एका तळ्यात जलक्रीडा करीत असताना एका मगराने त्याचा पाय पकडला. त्याने सुटकेसाठी आपली संपूर्ण शक्ती खर्च करूनही मगराच्या तावडीतून तो स्वतःला सोडवू शकला नाही. त्याच्या कळपानेही त्याला मदत करण्याचा प्रयत्न केला. परंतु काहीही उपयोग झाला नाही. आता आपल्यापुढे दुसरा कोणताच मार्ग शिल्लक नाही असे लक्षात आल्याने त्याने भगवंताचा आर्ततेने धावा केला. तशाही जखमी अवस्थेत आपल्या सोंडेने तळ्यातील एक कमळ उपटून आकाशाच्या दिशेने फेकले. त्याचा आर्त धावा ऐकून भगवंत धावून आले. त्यांनी आपल्या सुदर्शन चक्राच्या साहाय्याने त्या मगराचा वध केला आणि गजेंद्राचा उद्धार केला. 

या कथेतील जो मगर आहे, तो देखील आधीच्या जन्मात गंधर्व होता. परंतु देवल ऋषींच्या शापामुळे त्याला मगराचा जन्म प्राप्त झाला. या प्रसंगी भगवंताच्या हातून मृत्यू आल्याने मगराचा देखील उद्धार झाला आणि तो पुन्हा गंधर्व लोकात परत गेला. इंद्रद्युम्न राजा वैकुंठात भगवंताचा सेवक झाला. 

थोडक्यात सांगायचे तर “माणसाचे स्वतःचे बळ जिथे संपते, तिथे भगवंताचे बळ सुरू होते. संकटसमयी सर्व अहंकार सोडून मनोभावे आणि अनन्यभावाने ईश्वराचा धावा केल्यास तो भक्ताच्या रक्षणासाठी नक्कीच धावून येतो.” हाच या कथेचा मुख्य संदेश आहे.

स्वसंवाद  

१. माझ्यावर जेव्हा मोठे संकट येते, तेव्हा मी माझ्या स्वतःच्या बळाचा, पैशाचा किंवा ओळखीचा अहंकार बाळगून लढत राहतो, की माझ्या मर्यादा ओळखून ईश्वराला शरण जातो?

२. गजेंद्राने प्राणांतिक संकटातही जसे मनोभावे तळ्यातील कमळ भगवंताला अर्पण केले, तसा निस्सीम आणि शुद्ध भाव माझ्या प्रार्थनेत कधी असतो का?

३. “माणसाचे स्वतःचे बळ जिथे संपते, तिथे भगवंताचे बळ सुरू होते” या सत्यावर माझा खरोखरच अढळ विश्वास आहे का?

४. संकटाच्या वेळी मदतीला न येऊ शकणाऱ्या जगावर विसंबून राहण्यापेक्षा, जो ‘भक्ताभिमानी’ माझी कधीच उपेक्षा करणार नाही त्या ईश्वराचा मी खऱ्या मनाने धावा करतो का?

– क्रमशः श्लोक ११७ आणि ११८

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ६९ – आलेख – ‘पथरीला सोना’ में पितरों और पूर्वजों के प्रति आस्था और सांस्कृतिक मूल्य ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ६९ ☆

☆आलेख ☆ ~ ‘पथरीला सोना’ में पितरों और पूर्वजों के प्रति आस्था और सांस्कृतिक मूल्य  ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

(भारतीय संस्कृति में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का विशेष महत्व है – (पितृ पक्ष विशेष))

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(मॉरीशस साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर के ऐतिहासिक उपन्यास पथरीला सोना – खंड सात के एक छोटे से अंश पर आधारित लेख )

जब मैं पितृपक्ष के अवसर पर पितरों और पूर्वजों के प्रति अपनी आस्था और संस्कृति की बात करता हूँ तो मेरे मन में साहित्य से जुड़े हुए कुछ विशेष पक्षो पर लिखने की भी इच्छा होती है। हिंदी साहित्यकार रामदेव धुरंधर जी का ऐतिहासिक उपन्यास पथरीला सोना, के कुल सात खंड है। भारत से मॉरीशस पहुंचे, श्रमिकों की संपूर्ण व्यथा कथा को इन सात खंड के उपन्यास में बहुत बेहतरीन ढंग से बयां किया गया है। श्री रामदेव धुरंधर जी की लेखन शैली में, न सिर्फ जादू है बल्कि आपकी लेखन शैली, कदम कदम पर भारत और मॉरिशस की संस्कृति को भी जोड़ते हुये चलती है। आगे आलेख उपन्यास के एक अंश पर चर्चा करेंगे इसके पहले श्री रामदेव धुरंधर जी के लेखन शैली एवं का एक अनुपम उदाहरण देखते हैं।

“भारतीय तीन तलवार के साथ न जाकर, अपनी संस्कृति धरोहर के साथ जाते थे और वही रहते स्वयं साधु जीवन में ढल जाते थे। भारतीय धरती ने कैसे इस तरह के संस्कार स्वयं में पल्लवित – पुष्पित किए हों और लगे हाथ लोगों में इस तरह की प्रेरणा का संचार किया हो-

“मुट्ठी भर लेकर दूसरे देश जाओ, जहाँ इसे रोप दो कि उगे तो स्वयं वहाँ भारत उगे। ” (पथरीला सोना खंड-७ पृष्ठ ३३३)

श्री रामदेव धुरंधर

मॉरीशस साहित्यकार रामदेव धुरंधर जी के ऐतिहासिक उपन्यास पथरीला सोना का सातवाँ खंड मेरे हाथों में है।

मैं इस उपन्यास को लगातार ही पढ़ रहा था। आज पितृ पक्ष के प्रथम दिवस पर मैं श्री रामदेव धुरंधर जी के इस उपन्यास के अंतिम पैराग्राफ पर आधारित एक लेख लिखने का एक विचार आया। इस पैराग्राफ में एक प्रपौत्र जो भारत में रहता है का मॉरीशस में रहने वाले पितामह के प्रति प्रेम का चित्रण किया गया है। उपन्यास का यह पैराग्राफ भारत और मॉरीशस के रिश्तों के मध्य रची बसी भारतीय संस्कृति को प्रदर्शित करता हुआ प्रतीत होता है।

पितृ पक्ष के अवसर पर भारतीय संस्कृति में पूर्वजों के प्रति व्यक्त किए जाने वाले श्रद्धा के संदर्भ में यह पैराग्राफ अत्यंत सामयिक है। आइये श्री धुरंधर जी के इस उपन्यास के अंतिम पैराग्राफ को पढ़ते हैं और देखते हैं कि उपरोक्त विषय पर इस श्रेष्ठ उपन्यासकार का साहित्यिक चिंतन कहाँ तक जाता है –

परदादा स्वदेश से मिलने के लिए उसके परपोते अनूप और मंजुला दोनों मॉरीशस आने का जतन करते हैं।

“ड्राइवर ने आदमी से कहा कि उसके साथ भारतीय पति पत्नी है जो स्वदेश से मिलने आ रहे हैं।” (पथरीला सोना खंड-७ पृष्ठ ३३९)

लेकिन जब वह पहुँचते हैं तो –

“आदमी ने इशारे से ड्राइवर को बताया स्वदेश का घर कहाँ है। ड्राइवर को उस आदमी से स्वदेश के घर का तो मालूम हुआ, लेकिन उस परिचय में एक दुखद समाचार शामिल था। कल शाम को स्वदेश की मृत्यु हो गई थी” ( पथरीला सोना खंड-७ पृष्ठ ३३९)

 उपन्यास का अंतिम पैराग्राफ :-

“अनूप और स्वदेशी के बीच परदादा और परपोते का जो धागा जुड़ गया था इसके अनुरूप हुआ यह कि परपोता अपने परदादा को मुखाग्नि दे। अनूप ने इस जिम्मेदारी को सिर झुकाकर स्वीकार किया। मन्त्रोंचार के साथ अरथी पूरी विशालता से उठी। श्मशान में शव दाह हो जाने के बाद लोग वापस लौटे। यहाँ जो कर्मकांड होना था अनूप उसके केंद्र में था। कल अस्थि विसर्जन होना था इसलिए अनूप रात को यहीं रहता। मंजुला के साथ यह बात तय हो जाने से वह टैक्सी से होटल लौट गई। अनूप के सेवा सत्कार में यहाँ के लोगों ने कोई कमी नहीं छोड़ते। शाम को पड़ोसी के घर से खाना आया। अनूप ने अपने पैसे से कुछ करना चाहा तो लोगों ने उसे मना किया। यह आत्मीयता का बड़ा ही सुंदर भावभीना पक्ष था। अनूप रात को स्वदेश के घर में रहा। पड़ोस के अमरनाथ सिम्हाद्री और दो-चार लोगों ने साथ दिया।

अगली सुबह अनूप लोगों के साथ श्मशान घाट गया। उसने अस्थि विसर्जन के लिए गंगा का चयन किया था। लोगों ने उसे सुनने हाथ जोड़कर उसकी बात का सम्मान किया। मॉरीशस का स्वदेश भारत की गंगा में जा मिले, उसका परम सौभाग्य….!

– (पथरीला सोना खंड-७ पृष्ठ ३४१)

उपन्यास की अंतिम पैराग्राफ में आलेख के संदर्भित विषय से संबंधित प्रत्येक सामग्री शब्दसह पिरोई गयीं है। इसमें ऐसे दो देश है, जो दूर होते हुए भी अपनी संस्कृति के साथ एक है। इसमें संस्कार है जिसमें परपोते को अपने परदादा को मुखाग्नि देना है। उपन्यास का यह अंश भारतीय संस्कृति में मंत्र और मंत्रोचार, अस्थि विसर्जन आदि के महत्व को जहाँ बिम्बित करता है, वही अतिथि देवो भव : की भावना को दर्शाती हुईं उपन्यास की निम्न पंक्ति पाठक मन पर गहरी छाप छोड़ती है

“अनूप के सेवा सत्कार में यहाँ के लोगों ने कोई कमी नहीं छोड़ते”

 भारतीय संस्कृति का इससे सुन्दर उदाहरण क्या ही हो सकता है। उपन्यास के इस अंश की अंतिम पंक्ति में तब और अधिक धन्य हो जाती है, जब श्रेष्ठ उपन्यासकार ने उपन्यास के इस अंश में लिखा कि –

“उसने (अनूप ने) अस्थि विसर्जन के लिए गंगा का चयन किया था। लोगों ने उसे सुनने हाथ जोड़कर उसकी बात का सम्मान किया। मॉरीशस का स्वदेश भारत की गंगा में जा मिले, उसका परम सौभाग्य…!

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© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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