हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २५२ – पुस्तक समीक्षा – गुल्लक और उसकी रजाई – कहानीकार : अंजना मनोज गर्ग ☆ समीक्षक – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है कहानीकार : अंजना मनोज गर्ग जी द्वारा लिखित पुस्तक – “गुल्लक और उसकी रजाई” की समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २५२ ☆

☆ पुस्तक समीक्षा – गुल्लक और उसकी रजाई – कहानीकार : अंजना मनोज गर्ग ☆ समीक्षक – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

कहानी-संग्रह : गुल्लक और उसकी रजाई

कहानीकार : अंजना मनोज गर्ग

प्रकाशन सहयोग : राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर

प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर

प्रथम संस्करण : 2026

ISBN : 978-93-7251-012-6

मूल्य : ₹199/-

समीक्षक : ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

☆ गुल्लक और उसकी रजाई : बालमन की जिज्ञासा से सामाजिक चेतना तक ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

बाल साहित्य को लेकर एक सामान्य धारणा यह रही है कि वह बच्चों के मनोरंजन और नैतिक शिक्षण का माध्यम है। किंतु आधुनिक बाल साहित्य ने इस सीमित धारणा से आगे बढ़कर बालक को उसके समय, समाज, पर्यावरण और बदलती जीवन-स्थितियों के बीच देखने का प्रयास किया है। आज का बच्चा केवल परी-कथाओं का पाठक नहीं है; वह तकनीक से परिचित है, प्रश्न करता है, अपने आसपास घट रही घटनाओं को देखता है और अनेक बार बड़ों की स्थापित धारणाओं पर भी सवाल उठाता है। इसलिए आज की बाल कहानी से अपेक्षा है कि वह बालमन की जिज्ञासा को स्वीकार करे और उसे संवेदना, विवेक तथा सामाजिक चेतना से जोड़े।

अंजना मनोज गर्ग का कहानी-संग्रह ‘गुल्लक और उसकी रजाई’ इसी बदलती हुई बाल साहित्यिक चेतना का प्रतिनिधि संग्रह कहा जा सकता है। इसमें बीस कहानियाँ हैं और लगभग प्रत्येक कहानी किसी न किसी समकालीन सरोकार को बालमन के निकट ले आती है। जल-संरक्षण, पर्यावरण, पशु-पक्षी, स्वच्छता, पुस्तकों के प्रति प्रेम, बुजुर्गों की उपेक्षा, पारिवारिक संबंध, त्योहार, प्रकृति और आधुनिक तकनीकी जीवन—ये सभी विषय संग्रह में अपनी अलग-अलग कथात्मक शक्ल में उपस्थित हैं।

इस संग्रह की विशेषता यह है कि लेखिका गंभीर विषयों को बच्चों के सामने सीधे भाषण के रूप में नहीं रखतीं, बल्कि उन्हें कहानी की स्थितियों में बदलने का प्रयास करती हैं। कहीं रजाई कथा का माध्यम बनती है, कहीं पुस्तक स्वयं अपना दर्द व्यक्त करती है, कहीं जंगल एसी की माँग करता दिखाई देता है और कहीं पक्षियों के माध्यम से प्रकृति का मौन संकट सामने आता है। यही रचनात्मक प्रयोग इस संग्रह को सामान्य उपदेशात्मक बालकथाओं से अलग करने का प्रयास करते हैं।

अंजना मनोज गर्ग के आमुख को पढ़ते हुए उनके बाल लेखन की मूल प्रेरणा स्पष्ट होती है। वे बचपन की निर्मलता, अबोधता और जिज्ञासा को अपनी रचनात्मकता का आधार मानती हैं। उनके लिए बालमन प्रश्नों का एक ऐसा संसार है, जहाँ जीवन की साधारण घटनाएँ भी कौतूहल का विषय बन सकती हैं।

उनकी रचनात्मक दृष्टि का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वे बच्चे को केवल परिवार और विद्यालय के दायरे में नहीं देखतीं। उनके बच्चे जंगल, पक्षियों, पेड़ों, मौसम, जल और घरेलू संसार से भी जुड़े हुए हैं। इसीलिए संग्रह में प्रकृति और मनुष्य का संबंध बार-बार उभरता है।

लेखिका ने यह भी स्पष्ट किया है कि उन्होंने जीवन में काम आने वाले सामान्य किंतु महत्त्वपूर्ण प्रश्नों को बालमन की जिज्ञासा में ढालकर कहानी रचने का प्रयास किया है। यही बात उनके कथा-संसार की आधारभूमि बनती है। वे बड़े प्रश्नों को छोटे प्रसंगों में बदलती हैं और बच्चों को उन प्रसंगों के बीच रख देती हैं।

आज तकनीकी विकास ने बच्चे की दुनिया को अभूतपूर्व रूप से बदल दिया है। मोबाइल, इंटरनेट और डिजिटल माध्यम उसके दैनिक जीवन का हिस्सा हैं। इस स्थिति में बाल साहित्य का दायित्व कम नहीं, बल्कि बढ़ गया है। सूचना के विस्तार के साथ संवेदना का विकास भी आवश्यक है।

तकनीक बच्चे को बहुत कुछ जानने का अवसर देती है, लेकिन साहित्य उसे यह समझने में सहायता करता है कि उस ज्ञान का मानवीय उपयोग क्या है। बाल साहित्य उसे प्रकृति से जोड़ सकता है, दूसरों के दुख को समझने की दृष्टि दे सकता है और उसके भीतर सामाजिक उत्तरदायित्व का भाव पैदा कर सकता है।

जितेन्द्र निर्मोही ने संग्रह की भूमिका में इसी संदर्भ को रेखांकित करते हुए कहा है कि आज बच्चों में तकनीकी समझ तेजी से बढ़ रही है, इसलिए उन्हें संवेदना, सामाजिक सरोकार और संस्कृति से जोड़ना भी आवश्यक है। ‘गुल्लक और उसकी रजाई’ इसी आवश्यकता को अपने कथ्य में ग्रहण करता है।

इस संग्रह की बीस कहानियाँ विषयगत रूप से एक-दूसरे से भिन्न होते हुए भी एक व्यापक सूत्र से जुड़ी हैं—बालमन के माध्यम से जीवन और समाज को देखना।

‘घमण्डी गुलाब’ से संग्रह की शुरुआत होती है। गुलाब जैसे फूल को केंद्र में रखकर निर्मित यह कथा बाल साहित्य में मानवीकरण की परंपरा का उपयोग करती है। फूल को व्यक्तित्व देना बच्चे के लिए प्रकृति को एक जीवंत सत्ता के रूप में देखने की संभावना खोलता है।

शीर्षक कहानी ‘गुल्लक और उसकी रजाई’ में सर्दी और विद्यालय जाने की स्थिति के माध्यम से कर्तव्य-बोध को कथा का आधार बनाया गया है। यहाँ रजाई केवल सर्दी से बचाने वाली वस्तु नहीं रह जाती, बल्कि बालक के आराम और उसके दायित्व के बीच एक रोचक प्रतीकात्मक स्थिति निर्मित करती है। बालक का अपने कर्तव्य की ओर लौटना कथा का केंद्रीय भाव बनता है।

‘मकर संक्रान्ति और बरगद काका की सीख’ में प्रकृति और पक्षियों के प्रति संवेदना का स्वर है। त्योहार को केवल परंपरा के रूप में न लेकर उसके भीतर छिपी प्रकृति-संवेदना को रेखांकित करने का प्रयास कहानी को सामाजिक अर्थ देता है।

‘शुभम की नयी होली’ और ‘पानी की चोरी’ जल-संरक्षण के प्रश्न को बच्चों के सामने रखती हैं। पानी के संकट को यदि केवल तथ्य या आँकड़े के रूप में बताया जाए तो बालक उससे भावनात्मक रूप से नहीं जुड़ता। कहानी इस समस्या को अनुभव में बदल देती है। यही बाल साहित्य की शक्ति है।

‘भोलू का अपना घर’ स्वच्छता के प्रश्न को सामने लाती है। स्वच्छता यहाँ केवल व्यक्तिगत आदत नहीं, बल्कि रहने के परिवेश और जीवन की गुणवत्ता से जुड़ा विषय बनती है।

‘जंगल लौटी चिनचिन गौरैया’ और ‘चिंकी और गौरैया’ में पक्षी बाल साहित्य के माध्यम से प्रकृति के संकट के प्रतिनिधि बनते हैं। गौरैया का उल्लेख विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह पक्षी भारतीय घर-आँगन और मानवीय जीवन से गहरे जुड़ा रहा है। उसके अस्तित्व को लेकर चिंता स्वयं मनुष्य और प्रकृति के बदलते संबंधों की ओर संकेत करती है।

‘सोनू की तासीर’ संग्रह की विषय-विविधता का उदाहरण है। यह गर्म तासीर वाले फलों को किस प्रकार खाया जाए, जैसे सामान्य जीवनोपयोगी प्रश्न को बाल कथा का रूप देती है। इससे स्पष्ट होता है कि लेखिका के लिए बाल कहानी का विषय केवल बड़े सामाजिक प्रश्न नहीं, बल्कि बच्चे के दैनिक जीवन की छोटी-छोटी आवश्यकताएँ भी हैं।

‘किताबों का दर्द’ संग्रह की दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय है। पुस्तक को मानवीय संवेदना देकर उसके ‘दर्द’ को सामने रखना एक प्रभावी कल्पनात्मक युक्ति है। बच्चों द्वारा पुस्तकों को फाड़ने या खराब करने की आदत को सीधे डाँटने के बजाय यदि पुस्तक स्वयं अपनी पीड़ा व्यक्त करे तो बच्चा उसके साथ भावनात्मक संबंध स्थापित कर सकता है।

‘मेहुल और दादी का वैलेंटाइन’ और ‘दादाजी और धूप’ आधुनिक जीवन और पारिवारिक संबंधों के बीच संवाद स्थापित करती हैं। यहाँ बुजुर्ग केवल ज्ञान देने वाले पात्र नहीं हैं; वे भावनात्मक संबंधों की उस कड़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो आधुनिक व्यस्तता में कमजोर पड़ रही है।

‘गीतु-मीतु की समीरा’ और ‘रसोई बीमार है’ घरेलू और पर्यावरणीय जीवन के अलग-अलग पक्ष सामने लाती हैं। विशेषकर ‘रसोई बीमार है’ का शीर्षक ही अपने भीतर एक मानवीकरण छिपाए हुए है। रसोई का ‘बीमार’ होना वास्तव में उस घरेलू व्यवस्था की उपेक्षा का रूपक बन जाता है, जिसका प्रभाव बच्चों के जीवन पर पड़ता है।

‘जंगल में जब लगा एसी’ संग्रह की सबसे अधिक कल्पनाशील और समकालीन कहानियों में रखी जा सकती है। जंगल में एसी की आवश्यकता क्यों पड़ी—यह असंभव-सी लगने वाली स्थिति बच्चे के भीतर तुरंत प्रश्न पैदा करती है। यही प्रश्न आगे पर्यावरणीय संकट की ओर ले जाता है। एसी और रेफ्रिजरेटर से ओजोन परत को होने वाले नुकसान की ओर संकेत कहानी को वैज्ञानिक चेतना से जोड़ता है।

‘दीपावली और सफाई’ त्योहार और सामाजिक सरोकार के संबंध को रेखांकित करती है। दीपावली केवल सजावट और उत्सव नहीं, बल्कि स्वच्छता तथा सामुदायिक जीवन से जुड़ा अवसर भी है—कहानी इसी दिशा में विचार करती है।

अंतिम कहानियों में ‘नन्हें प्राशु की समझदारी’ और ‘नन्हा जलदू और बेमौसम की बारिश’ जैसी रचनाएँ बाल-बुद्धि और पर्यावरणीय संकट को केंद्र में लाती हैं। ‘नन्हा जलदू और बेमौसम की बारिश’ में कटते जंगल, उत्खनन और नदियों से रेत के दोहन जैसे प्रश्नों को कथा के दायरे में लाया गया है। इस प्रकार संग्रह का पर्यावरणीय पक्ष केवल पेड़-पौधे बचाने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विकास की उन प्रक्रियाओं पर भी संकेत करता है जो प्रकृति के संतुलन को प्रभावित करती हैं।

बालमनोविज्ञान : संग्रह का केंद्रीय आधार

इस संग्रह की सबसे बड़ी शक्ति इसका बालमनोविज्ञान है। लेखिका ने बच्चों को उपदेश ग्रहण करने वाली निष्क्रिय इकाई नहीं माना है। उनकी कहानियों में बच्चा प्रश्न करता है, देखता है, अनुभव करता है और कई बार समाधान की दिशा भी खोजता है।

यह दृष्टिकोण आधुनिक बाल साहित्य के लिए आवश्यक है। बच्चे को यदि केवल ‘यह करो’ और ‘यह मत करो’ बताया जाए तो कहानी उपदेश बन जाती है। किंतु जब वही बात किसी पात्र की समस्या और उसके अनुभव से निकलती है, तो वह कथा का स्वाभाविक निष्कर्ष बन जाती है।

मानवीकरण : कथा को रोचक बनाने का साधन

लेखिका ने कई कहानियों में मानवीकरण का प्रयोग किया है। गुलाब, किताब, रसोई, गौरैया और जंगल जैसे तत्वों को मानवीय संदर्भ देकर उन्होंने बच्चों की कल्पनाशीलता को सक्रिय किया है।

मानवीकरण बाल साहित्य का पुराना किंतु अत्यंत प्रभावी उपकरण है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि लेखक उसके माध्यम से केवल मनोरंजन करता है या कोई नया अर्थ भी निर्मित करता है। इस संग्रह में मानवीकरण का उपयोग अधिकांशतः किसी सामाजिक या पर्यावरणीय प्रश्न को बालमन के निकट लाने के लिए किया गया है।

प्रकृति एक पात्र के रूप में

संग्रह में प्रकृति केवल पृष्ठभूमि नहीं है। कई कहानियों में वह स्वयं कथा की सक्रिय शक्ति बन जाती है। गौरैया, बरगद, जंगल, बारिश, पानी और पेड़ कथानक के भीतर अपना अर्थ निर्मित करते हैं।

यहीं संग्रह की पर्यावरणीय चेतना सबसे प्रभावी रूप में सामने आती है। लेखिका प्रकृति को ‘बचाने योग्य वस्तु’ मात्र नहीं मानतीं, बल्कि उसे मनुष्य के जीवन का सहभागी बनाती हैं।

पारिवारिक संबंध

दा-दादी और बच्चों के संबंध संग्रह में विशेष स्थान रखते हैं। ‘मेहुल और दादी का वैलेंटाइन’ तथा ‘दादाजी और धूप’ जैसी कहानियाँ इस बात की ओर संकेत करती हैं कि आधुनिकता के बीच बुजुर्गों की भूमिका और उनके प्रति भावनात्मक जिम्मेदारी को पुनः समझने की आवश्यकता है।

इन कहानियों का महत्त्व इसलिए भी है कि ये बच्चों को परिवार की बहु-पीढ़ीय संरचना से जोड़ती हैं। बाल साहित्य के माध्यम से पीढ़ियों के बीच संवाद स्थापित करना आज के समय में अत्यंत आवश्यक है।

भाषा और शैली

लेखिका की भाषा सहज और संप्रेषणीय है। बाल पाठक के लिए कठिन शब्दावली या अत्यधिक जटिल वाक्य-विन्यास से बचने का प्रयास किया गया है। कहानियों में कथ्य के अनुसार कल्पनात्मक और संवादात्मक शैली का उपयोग मिलता है।

जहाँ पर्यावरणीय समस्या है वहाँ विचार प्रमुख होता है, जबकि पशु-पक्षियों और वस्तुओं के मानवीकरण वाली कहानियों में कल्पना का पक्ष मजबूत हो जाता है। इस शैलीगत विविधता के कारण संग्रह एकरस नहीं बनता।

शीर्षक और कथात्मक कौतूहल

संग्रह के कई शीर्षक अपने आप में जिज्ञासा उत्पन्न करते हैं—’किताबों का दर्द’, ‘रसोई बीमार है’, ‘जंगल में जब लगा एसी’, ‘पानी की चोरी’ और ‘गुल्लक और उसकी रजाई’।

इन शीर्षकों में एक प्रश्न छिपा हुआ है। किताब को दर्द कैसे हो सकता है? रसोई बीमार कैसे हो सकती है? जंगल में एसी क्यों लगा? पानी की चोरी किसने की? यही प्रश्न बाल पाठक को कथा की ओर खींचते हैं।

नवाचार : संग्रह की केंद्रीय उपलब्धि

‘गुल्लक और उसकी रजाई’ की सबसे बड़ी साहित्यिक विशेषता उसका नवाचार है। नवाचार का अर्थ केवल नए विषय चुनना नहीं, बल्कि परिचित विषय को नई दृष्टि से प्रस्तुत करना भी है।

पर्यावरण पर हजारों रचनाएँ लिखी गई हैं, लेकिन जंगल के पशुओं को एसी की आवश्यकता पड़ने की कल्पना समस्या को एक नए कोण से देखने का अवसर देती है। पुस्तक संरक्षण पर उपदेश देने की जगह ‘किताबों का दर्द’ उनकी भावनात्मक आवाज बन जाता है। घरेलू उपेक्षा को ‘रसोई बीमार है’ के रूपक में बदल देना भी इसी रचनात्मकता का उदाहरण है।

इस प्रकार लेखिका ने कई गंभीर विषयों को बालमन के लिए प्रतीक, कल्पना और मानवीकरण के माध्यम से सुगम बनाने का प्रयास किया है।

आलोचनात्मक सीमाएँ

किसी भी कृति का मूल्यांकन केवल उसकी उपलब्धियों के आधार पर नहीं किया जा सकता। आलोचना का उद्देश्य रचना की संभावनाओं और सीमाओं दोनों को देखना है।

इस संग्रह की प्रमुख सीमा यह कही जा सकती है कि कुछ कहानियों में सामाजिक और नैतिक संदेश इतना स्पष्ट है कि पाठक के लिए निष्कर्ष तक पहुँचने की गुंजाइश कुछ कम रह जाती है। बाल कहानी की शक्ति तब और बढ़ती है जब बच्चा स्वयं कहानी के अनुभव से अर्थ ग्रहण करे।

कुछ कहानियों में पात्रों के मनोवैज्ञानिक विकास की अपेक्षा कथ्य और संदेश अधिक प्रमुख दिखाई पड़ते हैं। यदि पात्रों के आंतरिक द्वंद्व, असमंजस और संघर्ष को थोड़ा अधिक स्थान मिले तो कहानियों का साहित्यिक विस्तार बढ़ सकता है।

इसी प्रकार पर्यावरणीय कहानियों में समस्या और समाधान के बीच का तनाव कुछ और गहरा किया जा सकता था। उदाहरण के लिए जंगल, जल या वर्षा से जुड़े संकट केवल नैतिक प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक जटिलताओं से भी जुड़े हैं। बाल साहित्य में इन जटिलताओं को सरल बनाना आवश्यक है, किंतु उन्हें पूरी तरह सपाट कर देना कथा की संभावनाओं को सीमित कर सकता है। प्रूफ की कमी मखमल में टाट के पैबंद की तरह अखरती है।

फिर भी यह आलोचना संग्रह की मूल रचनात्मक उपलब्धियों को कम नहीं करती। यह लेखिका की आगामी रचनाओं के लिए संभावनाओं की ओर संकेत करती है।

निष्कर्ष

‘गुल्लक और उसकी रजाई’ समकालीन बाल साहित्य की उन रचनाओं में अपना स्थान बनाने की क्षमता रखता है, जो बालमन और सामाजिक सरोकारों के बीच संवाद स्थापित करने का प्रयास करती हैं। यह संग्रह केवल नैतिक शिक्षा देने वाली कहानियों का संकलन नहीं है। इसमें लेखिका ने बालक की जिज्ञासा को प्रकृति, पर्यावरण, परिवार और समाज के व्यापक प्रश्नों से जोड़ने का प्रयास किया है।

इसकी कहानियों में पानी है तो उसके साथ जल-संकट का प्रश्न भी है; गौरैया है तो उसके साथ प्रकृति-संरक्षण की चिंता भी है; पुस्तक है तो उसके साथ ज्ञान और पुस्तक-संस्कृति का प्रश्न भी है; दादा-दादी हैं तो उनके साथ पारिवारिक संवेदना का प्रश्न भी है; जंगल है तो उसके साथ पर्यावरणीय संकट भी है।

यही इस संग्रह की सार्थकता है।

अंजना मनोज गर्ग ने बालमन की छोटी-छोटी जिज्ञासाओं को सामाजिक और पर्यावरणीय सरोकारों से जोड़ने का जो प्रयास किया है, वह उल्लेखनीय है। उनकी कहानियाँ यह विश्वास जगाती हैं कि बाल साहित्य केवल बच्चों के लिए लिखा गया साहित्य नहीं, बल्कि भविष्य के नागरिक के मन और संवेदना को आकार देने वाला साहित्य भी है।

‘गुल्लक और उसकी रजाई’ का महत्त्व इस बात में है कि यह बच्चे को केवल कहानी सुनाकर छोड़ नहीं देता; वह उसके आसपास की दुनिया को देखने की उसकी दृष्टि में हल्का-सा परिवर्तन करने का प्रयास करता है।

अंततः कहा जा सकता है कि यह संग्रह बालमन की निर्मलता, प्रकृति की पुकार और सामाजिक संवेदना को एक साथ समेटे हुए बीस कहानियों का ऐसा गुलदस्ता है, जिसमें मनोरंजन के साथ विचार और विचार के साथ संवेदना भी खिलती है। अंजना मनोज गर्ग की यह कृति बाल साहित्य की वर्तमान धारा में अपने विषय-नवाचार और समकालीन सरोकारों के कारण ध्यान आकर्षित करती है और लेखिका के आगामी रचनात्मक विकास के लिए एक आशाजनक आधारभूमि तैयार करती है।

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© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

08/10/2026

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # ३१३ ☆ बाल गीत – बच्चे बनकर हम तो खेले… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३१३ ☆ 

☆ बाल गीत – बच्चे बनकर हम तो खेले…  ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

☆

हमने सुख-दुख हँसकर झेले।

सच ने देखे बड़े झमेले।

* 

जिनको कहते थे हम अपना

जीते जी वे लगे पराए।

संबंधों की बदली भाषा

जुल्म उन्होंने जब-तब ढाए।

 *

अपने से ही बातें कर-कर

नहीं लगे हम रहे अकेले।

 **

इच्छा और अपेक्षाएँ गुमसुम

हम निष्काम बने योगी।

मन का घोड़ा कसा तभी से

रोती रहीं इन्द्रियाँ भोगी।

 *

नहीं बुढ़ापा हमें सताए

रहते हैं सदैव नवेले।

 **

हर कोई है सुख का साथी

दुख में काम नहीं आएं।

भय संशय में लोग रहें अब

कब वे अपना प्रेम लुटाएं।

 *

सबकी चाहत धन दौलत है

बच्चे बनकर हम तो खेले।।

☆

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १६६ – बुन्देली कविता – ”उनखें सत्ता, शासन चइये ” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “उनखें सत्ता, शासन चइये “।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १६६ ☆

☆  बुन्देली कविता – “उनखें सत्ता, शासन चइये “ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

उनखें सत्ता, शासन चइये 

हमखें उन्ना, राशन चइये 

 *

हमें चाउने खरी मजूरी 

लबरे हमें न भाषन चइये 

 *

किसना कौ मन जिनमें रीझत 

गौयें, ग्वालें, ग्वालन चइये 

 *

जौ फिसले ईमान हमाओ 

धन की काइ न फिसलन चइये 

 *

छप्पन भोग न चाहे कान्हा 

प्रेम भरो दधि-माखन चइये 

 *

हम दाइज कौ पाप न लादें 

हमखौं बस कन्या धन चइये 

 *

तीन लोक से न्यारो अपनो 

‘भगवत’ बो बिंद्राबन चइये

☆

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २१८ ☆ “अस्मि” – उपन्यासकार : सुश्री शिखा वार्ष्णेय ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है उपन्यासकार : सुश्री शिखा वार्ष्णेय जी द्वारा लिखित  “अस्मि” पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २१८ ☆

☆ “अस्मि” – उपन्यासकार : सुश्री शिखा वार्ष्णेय ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆/

पुस्तक : अस्मि 

उपन्यासकार : शिखा वार्ष्णेय

प्रकाशक : शिवना प्रकाशन

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, (लंदन)

☆ अस्मि’: अपने होने की पहचान की तलाश – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

किसी पुस्तक पर चर्चा करना केवल उसकी कथा सुनाना नहीं होता।  उसके भीतर छिपे विचारों, संवेदनाओं और जीवन-दृष्टि को समझने का प्रयास  है। मेरे लिए अस्मि ऐसी ही एक कृति है, जो एक स्त्री की कहानी कहते हुए हम सबके सामने एक बुनियादी प्रश्न रखती है,दूसरों के लिए जीते हुए क्या स्त्रियाँ अपने लिए जीना भूल जाती हैं?

‘अस्मि’ का अर्थ होता है—‘मैं हूँ’। यह छोटा-सा शब्द अपने भीतर एक बड़ा जीवन-दर्शन समेटे है। हम अपने जीवन में अनेक भूमिकाएँ निभाते हैं। किसी के माता-पिता, जीवनसाथी, बेटे-बेटी और मित्र होते हैं। इन रिश्तों के साथ जिम्मेदारियाँ जुड़ी होती हैं। लेकिन इन सबसे अलग हमारा अपना व्यक्तित्व भी है। हमारी इच्छाएँ, रुचियाँ और सपने भी हैं। क्या हम उन्हें पहचान पाते हैं? क्या हमारे जीवन में उनके लिए जगह बचती है? शिखा वार्ष्णेय का उपन्यास इन्हीं सवालों को कथा का आधार बनाता है।

शिखा वार्ष्णेय पत्रकारिता और साहित्य, दोनों से जुड़ी रही हैं। उन्होंने मॉस्को स्टेट यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता की पढ़ाई की। लंदन में रहते हुए भी उनका लेखन भारतीय पाठकों से निरंतर संवाद करता है। ‘लंदन नामा’ जैसी स्तंभ-लेखन यात्राएँ उनके अनुभवों को पाठकों तक पहुँचाती रही हैं। यात्रा-वृत्तांत और अन्य लेखन के माध्यम से उन्होंने अपने अलग अनुभव-संसार का परिचय दिया है। अस्मि में भी बाहरी परिवेश के साथ मनुष्य के भीतर चलने वाले द्वंद्व को समझने का प्रयास स्पष्ट दिखाई देता है।

उपन्यास की केंद्रीय पात्र एला एक शिक्षित महिला है। उसका परिवार है, पति राजीव है और बेटा अंकुर है। बाहर से उसका जीवन सामान्य और व्यवस्थित दिखाई देता है। लेकिन भीतर वह अकेली है। परिवार की अपेक्षाएँ पूरी करते-करते उसकी अपनी रुचियाँ और कलात्मक अभिरुचियाँ पीछे छूट गई हैं। वह धीरे-धीरे स्वयं से दूर होती जाती है। उसके जीवन में सुविधाएँ हैं, लेकिन संतोष नहीं। अपने लोगों के बीच रहते हुए भी उसे अपने होने का एहसास नहीं मिलता।

एला की यह स्थिति उपन्यास को हमारे समय से जोड़ती है। हमारे आसपास ऐसे अनेक लोग हैं, जो दूसरों की जरूरतों का ध्यान रखते हैं, लेकिन उनकी अपनी जरूरतें अनदेखी रह जाती हैं। विशेष रूप से महिलाओं से परिवार के लिए त्याग और समर्पण की अपेक्षा की जाती है। इसमें कोई बुराई नहीं, यदि यह समर्पण उनकी अपनी पहचान को मिटाने की कीमत पर न हो। परिवार महत्वपूर्ण है, लेकिन परिवार के भीतर प्रत्येक व्यक्ति का स्वतंत्र व्यक्तित्व भी महत्वपूर्ण है।

एला मानसिक तनाव और अवसाद से गुजरती है। इसी बीच एक पैराडाइव स्पोर्ट्स दुर्घटना उसके जीवन की दिशा बदल देती है। वह एक दूरस्थ पहाड़ी गाँव में पहुँच जाती है। वहाँ के लोग उसके परिचित नहीं हैं। वे उसके परिवार, सामाजिक स्थिति या अतीत के बारे में कुछ नहीं जानते। फिर भी वे उसकी देखभाल करते हैं और उसे अपनापन देते हैं।

कथा का यह मोड़ ध्यान देने योग्य है। जिस एला को अपने परिचित परिवेश में अकेलापन महसूस होता था, उसे अनजान लोगों के बीच आत्मीयता मिलती है। यह अनुभव एक सहज प्रश्न उठाता है, क्या संबंध केवल रक्त, विवाह और परिचय से बनते हैं? या मनुष्य की संवेदना भी ऐसा रिश्ता बना सकती है, जो कभी-कभी स्थापित रिश्तों से अधिक गहरा हो?

गाँव में एला धीरे-धीरे अपने भीतर लौटने लगती है। वह चित्र बनाती है। घरों और दीवारों को रंगों से सजाती है। बच्चों के साथ समय बिताती है। अपने वनस्पति-विज्ञान के ज्ञान से गाँव के लोगों की मदद करती है। उसकी प्रतिभा अब केवल उसकी निजी रुचि नहीं रहती। वह समुदाय के जीवन का हिस्सा बन जाती है। लोग उसके काम को महत्व देते हैं। उसे लगता है कि वह उपयोगी है और उसके होने का कोई अर्थ है।

मनुष्य को केवल भौतिक सुविधाएँ नहीं चाहिए। उसे यह अनुभव भी चाहिए कि उसके जीवन का कोई उद्देश्य है। उसकी प्रतिभा का उपयोग हो रहा है। उसकी उपस्थिति किसी के लिए मायने रखती है। एला को गाँव में यही अनुभव मिलता है। वह दूसरों के जीवन में रंग भरते हुए अपने जीवन में भी रंग वापस ले आती है।

गाँव का अरलू उसे जापानी अवधारणा ‘इकिगाई’ से परिचित कराता है। इसका आशय उस उद्देश्य से है, जो हमें हर सुबह उठने का कारण देता है। जीवन में कोई ऐसा काम, संबंध या लक्ष्य होना, जिससे हम भीतर से जुड़े रहें। एला के लिए चित्रकला, बच्चों के साथ जुड़ाव और गाँव के लोगों की सहायता ऐसे ही उद्देश्य बन जाते हैं। उसे किसी बड़ी उपलब्धि की तलाश नहीं है। उसे अपने काम में अर्थ दिखाई देने लगता है।

उपन्यास का संदेश उपदेश के रूप में नहीं, बल्कि एला के अनुभवों के माध्यम से सामने आता है। अपने जीवन को अर्थ देने के लिए हमेशा किसी बड़ी सफलता या सामाजिक मान्यता की आवश्यकता नहीं होती। कभी-कभी किसी बच्चे को सिखाना, किसी घर की दीवार पर रंग भरना या किसी जरूरतमंद की सहायता करना भी जीवन को नई दिशा दे सकता है।

लेकिन इस कथा का वास्तविक संघर्ष तब सामने आता है, जब एला का बेटा अंकुर उसे खोजते हुए गाँव पहुँचता है। वह चाहता है कि उसकी माँ उसके साथ लौट चले। उसकी चिंता स्वाभाविक है। वह माँ से प्रेम करता है और उसे सुरक्षित देखना चाहता है। दूसरी ओर, एला अब उस जीवन में लौटने के लिए तैयार नहीं है, जिसमें वह अपनी पहचान खो बैठी थी। वह अंकुर को समझाती है कि गाँव ने उसे वह आत्मीयता और उद्देश्य दिया है, जिसकी उसे तलाश थी।

अंकुर के लिए माँ के निर्णय को स्वीकार करना आसान नहीं है। लेकिन वह कुछ समय गाँव में बिताता है। धीरे-धीरे उसे समझ आता है कि उसकी माँ यहाँ सचमुच खुश है। अंततः वह उसके निर्णय का सम्मान करता है।

मेरी दृष्टि में यह उपन्यास का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है। यहाँ प्रेम और अधिकार के बीच का अंतर सामने आता है। हम अपने प्रियजनों के लिए निर्णय लेना चाहते हैं, क्योंकि हमें लगता है कि हम उनके लिए बेहतर जानते हैं। लेकिन क्या प्रेम का अर्थ उनकी ओर से जीवन चुनना है? या उनके निर्णय को समझने और स्वीकार करने का प्रयास करना भी प्रेम है?

एला का निर्णय हमें रिश्तों की एक नई व्याख्या की ओर ले जाता है। परिवार से जुड़ाव का अर्थ अपने व्यक्तित्व का विसर्जन नहीं होना चाहिए। किसी स्त्री का माँ या पत्नी होना उसकी पहचान का एक हिस्सा है, संपूर्ण पहचान नहीं। उसे अपनी रुचियों, अपने निर्णयों और अपनी खुशी के लिए भी जगह चाहिए। यह बात केवल स्त्रियों के लिए नहीं, हर उस व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण है, जो सामाजिक अपेक्षाओं के बीच अपने भीतर की आवाज खो देता है।

हिंदी साहित्य में स्त्री-अस्मिता और आत्मनिर्णय पर गंभीर लेखन हुआ है। मन्नू भंडारी और कृष्णा सोबती जैसी लेखिकाओं ने स्त्री के स्वतंत्र व्यक्तित्व और उसकी आंतरिक दुनिया को अपनी रचनाओं में स्थान दिया।

 शिखा वार्ष्णेय की अस्मि इस व्यापक साहित्यिक विमर्श को आज के जीवन, प्रकृति और सामुदायिक संवेदना के संदर्भ में प्रस्तुत करती है। इसकी विशेषता यह है कि एला की पहचान केवल विचार या विद्रोह से नहीं बनती। वह अपने काम, अपनी कला और दूसरों से जुड़ाव के माध्यम से स्वयं को खोजती है।

उपन्यास में पहाड़ी गाँव भी केवल कथा की पृष्ठभूमि नहीं है। वह ऐसे जीवन का प्रतीक है, जहाँ एला अपने व्यक्तित्व को व्यक्त कर पाती है। वहाँ सुविधाएँ कम हैं, लेकिन आत्मीयता है। यह कहना उचित नहीं होगा कि गाँव का जीवन हर समस्या का समाधान है या शहर का जीवन संवेदनहीन है। उपन्यास का संकेत अधिक सूक्ष्म है। मनुष्य को ऐसा परिवेश चाहिए, जहाँ उसे सुना जाए, उसके काम का सम्मान हो और उसे अपनी राह चुनने की स्वतंत्रता मिले।

यहाँ प्रकृति की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। प्रकृति के निकट रहते हुए एला अपने भीतर की आवाज सुन पाती है। वह जीवन को केवल जिम्मेदारियों की सूची के रूप में नहीं देखती। उसे अपने आसपास के छोटे-छोटे कामों में आनंद मिलने लगता है। इस तरह उपन्यास आत्म-खोज को प्रकृति, कला और सामुदायिक जीवन से जोड़ता है।

अब प्रकाशक शिवना प्रकाशन की चर्चा भी जरूरी है। किसी पुस्तक को पाठकों तक पहुँचाना साहित्यिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। शिवना प्रकाशन ने हिंदी की विभिन्न विधाओं में पुस्तकों के प्रकाशन के साथ प्रवासी लेखकों की रचनाओं को भी मंच दिया है। प्रवासी साहित्य हिंदी को नए अनुभवों और नए परिवेश से जोड़ता है। भाषा किसी एक देश की सीमा में बंद नहीं रहती। वह जहाँ भी रची जाती है, वहाँ के जीवन और संवेदना से समृद्ध होती है। इस दृष्टि से ऐसे प्रकाशन और साहित्यिक आयोजन हिंदी के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

 मैं कहूँगा कि अस्मि का महत्व केवल एला की कहानी में नहीं, बल्कि उस प्रश्न में है जो यह पाठक के सामने छोड़ती है। क्या हम अपने प्रियजनों को उनकी स्वतंत्र पहचान के साथ स्वीकार कर पाते हैं? क्या हम अपनी जिम्मेदारियाँ निभाते हुए अपने लिए भी कुछ बचा पाते हैं? और क्या हम यह समझते हैं कि जीवन का अर्थ केवल दूसरों की अपेक्षाएँ पूरी करना नहीं है?

एला की यात्रा हमें याद दिलाती है कि स्वयं को पहचानना स्वार्थ नहीं है। यह अपने जीवन के प्रति सजग होना है। जब व्यक्ति अपने भीतर के संसार से जुड़ता है, तभी वह दूसरों से भी अधिक सच्चाई और संवेदना के साथ जुड़ पाता है।

‘अस्मि’ का सार शायद इसी एक वाक्य में है—मैं दूसरों के लिए हूँ, लेकिन मेरा अपना होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

शिखा वार्ष्णेय जी को इस संवेदनशील उपन्यास के लिए हार्दिक बधाई।

 

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २३८ – रिश्तों में खट्टास का ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “रिश्तों में  खट्टास का”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २३८ ☆

☆  रिश्तों में  खट्टास का ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

☆

रिश्तों में खट्टास का, बढ़ता जाता रोग ।

समय अगर बदला नहीं, तो रोएँगे लोग ।।

*

लोभ मोह में लिप्त हैं, आज सभी इंसान ।

ऊपर बैठा देखता, समदर्शी भगवान ।।

*

अगला पिछला सब यहीं, करना है भुगतान ।

पुनर्जन्म तक शेष ना, कभी रहेगा जान ।।

*

जीवन का यह सत्य है, ग्रंथों का है सार ।

जो बोया तुमने सदा, वही काटना यार ।।

*

संस्कृति कहती है सदा, यह मोती की माल ।

गुथी हुयी उस डोर से,  टूटे ना हर हाल ।।

*

रिश्तों में बंधकर रहें, हँसी खुशी के साथ ।

बरगद सी छाया मिले, सिर पर होवे हाथ ।।

*

रिश्ते नाते हैं सदा, खुशियों के भंडार ।

सदियों से हैं रच रहे, उत्सव के संसार  ।।7

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २८० – शुभ नवरात्रे ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है नवरात्र पर्व पर विशेष कविता  “शुभ नवरात्रे”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २८० ☆ 

🌻कविता🌻 शुभ नवरात्रे ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

☆

आओं हे जगतारिणी, भक्त खड़े हैं द्वार।

दीप जोत ले आरती, बोल रहे जयकार।।

शिव शक्ति हे साधिका, शिव शंकर है नाथ।

नैना सुंदर आपकी, ढेरों प्यार दुलार।।

*

पावन सुंदर रूप है, नव दुर्गा अवतार।

पाँव पखारे नीर से, श्रद्धा भक्ति अपार।।

नव दुर्गा नव रूप को, जोड़े दोनों हाथ।

पल- पल खुशियाँ बाँटती, जग की पालनहार।।

*

सर्व शक्ति माँ शारदा, अनुपम हैं शृंगार।

अष्ट भुजा से शोभिता, देख रहीं संसार।।

नमन तुम्हें हे मंगला, कुल कुंटुब के साथ।

चरणों में अब माथ है, कर दो बेड़ापार।।

☆

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १९६ – World Mental Health Day: 10 Oct. – ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १९६ ☆ देश-परदेश – World Mental Health Day: 10 Oct. ☆ श्री राकेश कुमार ☆

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस विगत 1992 से मनाया जाना आरंभ हुआ था। इस का तात्पर्य तो, ये हुआ उससे पूर्व हम सबका मानसिक स्वास्थ्य ठीक ही रहता होगा।

हमें याद आती है, अपनी युवावस्था जब घर के बड़े हमेशा ये ही कहते, थकते नहीं थे, कि आज की औलादों का तो दिमाग ही खराब हो गया है।

आज हम भी अपने बच्चों को ये ही तो कह रहें है, कि ये तो अलग तरह की पीढ़ी है। इतनी बिगड़ी हुई है, कभी सोचा भी नहीं था। जेन जी की भाषा और हाव भाव देख सुन कर हमारी आयु वर्ग के लोगों के दिमाग का दही बन जाता है।

हमारे पिताश्री ने घर में पहली बार टीवी को देखकर एक माह तक हमसे बात नहीं करी थी। आज टीवी के नेटफ्लिक्स चैनल पर स्तरहीन भाषा और दृश्यों को देखकर हमने भी अपने बच्चों का एक माह बहिष्कार किया था।

देखा जाय, तो मानसिक स्वास्थ्य को खराब करने के लिए समय समय पर नए नए कारण मिलते हैं। हम आज को पहचानने के स्थान पर अपना पुराना समय और परिस्थितियों में अटके रहते हैं। वर्त्तमान को नकार कर पूर्वकाल के साये से निकल नहीं पाते हैं।

आज का समय यू ट्यूब, फेस बुक से भी बहुत आगे जा चुका हैं। आने वाला समय और कुछ लाएगा। ये सिलसला सतत चलता रहेगा।

हमारे कुछ करीबी मित्र तो हमारे मुंह पर ये भी कह देते है, कि हमारा दिमाग कुछ हिल गया है, इसलिए प्रतिदिन कुछ भी लिख कर व्हाट्स ऐप पर पोस्ट करते रहते हैं। भले ही कोई पढ़े या ना पढ़ें।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # ३०१ – “प्राण पखेरू उड़े अचानक…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​  2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “प्राण पखेरू उड़े अचानक...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # ३०१ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “प्राण पखेरू उड़े अचानक...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

सारे बेटे रहे पालते

” पापा ” को स्नेह से

मरे एक दिन किन्तु पिताजी

हत्यारी मधुमेह से

 

कोई दवा काम ना

आयी तरह तरह बदली

जब भी जिस ने जो

बतलायी वह गोली निगली

 

सोया करते पूज्य पिता

तब बाहर की दालान में

जिस में भीग भीग जाते

थे चौमासे के मेह से

 

जब भी कोई व्यक्ति

माँगने दरवाजे आता

उसे मना की नहीं कभी

वह खुश होकर जाता

 

कीर्तिमान यह रहा पिता

का कुछ न कुछ देते

कहा किये थे याचक ना

खाली जाये इस गेह से

 

बहुत तसल्ली थी उनको

जायेंगे माघ मेला

तभी राम ने उन से था

खेला ऐसा खेला

 

प्राण पखेरू उड़े अचानक

रोक नहीं पाये

लगा कि सारा नेह चुक गया

उनका था इस देह से

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

15-09-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ७० ☆ व्यंग्य – “अमीर को अमीर बनाए रखने की कीमियागिरी…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  “अमीर को अमीर बनाए रखने की कीमियागिरी…” ।)

☆ शेष कुशल # ७० ☆

☆ व्यंग्य – “अमीर को अमीर बनाए रखने की कीमियागिरी…” – शांतिलाल जैन ☆

लोकतंत्र जम्बूदीप में भी है. जाहिर है वहाँ एक संसद भी है और संसद की कार्यवाही को कवर करनेवाले न्यूज़ चैनल भी. यू-ट्यूब पर उपलब्ध ऐसे ही एक चैनल के बुलेटिन का ट्रांसक्रिप्ट कुछ इस प्रकार है.

“नमस्कार. मैं हूँ अनाम और आप देखना शुरू कर चुके हैं दी जम्बूदीप टाइम्स. सरकार ने आज संसद में दो अधिनियम प्रस्तुत किए, जिन्हें भारी हंगामे के बीच बिना बहस के ध्वनि मत से पारित कर दिया गया. आज के बुलेटिन में हम दोनों कानूनों पर विस्तार से बात करेंगे.

पहला है मिनिमम वेजेस फॉर सुपर रिच एक्ट, 2026. इस क़ानून के तहत देश के शीर्ष एक प्रतिशत लोगों को एक करोड़ रुपए रोज़ाना की न्यूनतम आय की गारंटी प्रदान की गई है. इसे हर पाँच साल में संशोधित किया जाएगा और प्राइस इंडेक्स के अनुसार इसमें वृद्धि की जा सकेगी. उद्देश्य है रिच लाइफ़ स्टाइल में जीवनयापन के लिए एक तयशुदा बुनियादी आय का भरोसा दिलाया जाना.

दूसरा है वेल्थ क्रिएशन एंड एसेट होल्डिंग फॉर सुपर रिच एक्ट, 2026. इस क़ानून में देश के शीर्ष एक प्रतिशत लोगों को उनके क़ब्ज़े में अब तक आ चुकी राष्ट्र की चालीस प्रतिशत संपदा में कमी नहीं आने देने की गारंटी प्रदान की गई है. उद्देश्य है अमीरों को गरीब होने से बचाना. कानून यह सुनिश्चित करेगा कि कल को आर्थिक समानता लाने की सनक में कोई सिरफिरा जननायक अमीरों की संपदा कम न कर बैठे.

सूत्र बताते हैं कि अंदरखाने सरकार चिंतित है कि कुछ बिजनेस टाइकून्स और टॉप सीईओज की इनकम और सैलरी लगातार घट रही है. कहीं कहीं तो यह पचपन लाख रुपए प्रतिदिन तक रह गई है. जबकि उनकी फैक्ट्रियों में मजदूरों की आय पंद्रह बेसिस पॉइंट के इज़ाफ़े के साथ तीन सौ पंद्रह रुपए रोज़ हो गई है. ऐसे में सुपर रिच सेगमेंट को शोषण से बचाने की जरूरत महसूस की जा रही थी. प्रस्तावित क़ानून यह देखेगा कि बिजनेस टाइकून्स की इनकम बेंच मार्क इनकम से कम न होने पाए. यदि ऐसी स्थिति निर्मित होती है तो शासन इंसेटिवाइज करके अंतर की राशि की आपूर्ति करेगा. बिल पेश करते हुए सरकार ने इसे कल्याणकारी राज्य की दिशा में एक जनहितकारी कदम बताया है.

कॉर्पोरेट फंडेड थिंक टैंक के एक अर्थशास्त्री से हमने कुछ देर पहले बात की. उन्होंने जम्बूदीप टाइम्स को बताया कि सुपर रिच परिवार इन दिनों फाइनेंशियल स्ट्रेस से गुजर रहे हैं. एक करोड़ रुपए रोज़ की मामूली आमदनी से घर खर्च बमुश्किल निकल पाता है. निजी विमान से यात्रा का खर्च,  विदेशों में होने वाली कांफ्रेसेज का खर्च,  प्राईवेट आईलैंड पर हॉलिडेईंग का खर्च और परिवार में परिणय-प्रसंग पड़ जाए तो चार-पाँच हज़ार करोड़ की मामूली सी रकम में सादगी से निपटाने की मजबूरी. स्थिति इतनी गंभीर है कि पाँच सितारा होटल्स में दो जून की रोटी का खर्च निकालपाना दुश्वार होता जा रहा है. अधिनियमों का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा कि विकसित जम्बूदीप बनाने के लिए गरीबों को अमीरों के पक्ष में त्याग करने के लिए तैयार रहना चाहिए. सरकार के विधिक सलाहकारों का अभिमत है कि तीन सौ रुपए रोजाना कमाने की लक्झरी में जी रही पचास प्रतिशत आबादी स्वेच्छा से कुर्बानी न दे तो शासन क़ानून बनाकर ऐसी कुर्बानी ले सकता है, लेना भी चाहिए. गरीब और मध्यम वर्ग की कुर्बानियाँ जीएसटी के रूप में हो सकती हैं. बढ़ी हुई आयकर की दरों के रूप में या सर्विस चार्जेज के रूप में भी हो सकती है, जल, जंगल, जमीन के अधिग्रहण के रूप में भी.

अधिनियम पारित होने के बाद जननायक ने प्रेस से बात करते हुए कहा है कि आर्थिक समानता की बात करनेवाले बुद्धिजीवी जम्बूदीप में अराजकता फैलाना चाहते है. पचास प्रतिशत आबादी के पास देश की संपदा का छह प्रतिशत हिस्सा अभी भी  है. यह विलासिता है. संपत्ति रखने की उसे जरूरत ही क्या है?  रोज़ कमाना रोज़ खाना है. पाँच किलो अनाज हम दे ही रहे हैं, उतना अपने पास रखकर शेष अमीरों में बाँट देना चाहिए.

अधिनियम को सफलतापूर्वक लागू करने के लिए सरकार ने एक रोडमैप भी बनाया है. मान लो किसी बड़े घराने की संपदा घटने लगी तो सरकार उसे एक दो हवाई अड्डे देगी,  कुछेक सी-पोर्ट दे देगी,  कुछ खदानें,  नॉमिनल दरों पर जमीन और कॉर्पोरेट टैक्स में छूट देकर उन्हें गरीब होने से बचाएगी. लोन के डिफाल्टर हुए तो नब्बे प्रतिशत से ज्यादा का हेयरकट देकर भी उनके सुपर रिच स्टेटस की रक्षा करेगी. सरकार अपनी प्राथमिकताएँ समझती है, अमीरों को और अधिक अमीर बनाना सरकार की प्राथमिकताओं में हमेशा ही शुमार रहा है.

अधिनियम के प्रावधानों में कुशल, अर्धकुशल और अकुशल श्रेष्ठीजनों में वर्गीकरण नहीं किया गया है. जो कुशल है वो धनाढ्य भी हो यह जरूरी नहीं है. जो धनाढ्य है वो कुशल है. प्रस्तावित अधिनियम में संरक्षण पाने का अधिकारी है. इस अधिनियम में कार्य घंटे और कार्य दिवस भी परिभाषित नहीं किए गए है. ‘वंस ए अमीर इज आलवेज ए अमीर’ के सिद्धांत का अनुपालन किया गया है. विपक्ष ने इन दोनों अधिनियमों का विरोध किया है लेकिन हमने अपनी पड़ताल में पाया है कि जब वे ट्रेझरी बेंच पर क़ाबिज़ थे तब उनकी नीतियाँ भी प्रो-रिच-सुपर-रिच ही रहीं. बहरहाल, पूरे जम्बूदीप में सरकार के इन क़दमों का स्वागत किया जा रहा है. सुपर रिच खुश तो हैं लेकिन न्यूनतम दैनिक आय एक करोड़ से बढ़ाकर दो करोड़ रुपए रोज़ाना करने की मांग भी कर रहे हैं.

दोनों अधिनियमों पर आपकी क्या राय है हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएँ. अभी के लिए बस इतना ही. नमस्कार”

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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३९ – हास्य-व्यंग्य – “नरेन्द्र और देवराज इंद्र” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक व्यंग्य  “नरेन्द्र और देवराज इंद्र”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३९ ☆

☆ व्यंग्य ☆ “नरेन्द्र और देवराज इंद्र” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆☆

नारायण – नारायण कहते हुए नारद मुनि भगवान विष्णु के पास पहुंचे। विष्णु जी ने आइये ऋषिवर, कहां से आगमन हुआ कहते हुए नारद जी का स्वागत किया। नारद मुनि बोले – प्रभु पृथ्वी पर स्थित आपके प्रिय जम्बुद्वीप का भ्रमण करके लौट रहा हूं। वहां की अराजक स्थिति को देखकर अत्यंत दुखी हूं। जनता में हाहाकार मचा है। देश की केंद्र सरकार और प्रदेश सरकारों के बढ़ते टैक्सों ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है, जिसके पास धन और सत्ता है वे सुख भोग रहे हैं। गरीबों, कमजोरों पर तरह – तरह के अत्याचार हो रहे हैं। प्रतिभा और योग्यता दर – दर भटक रही है, गधे पंजीरी खा रहे हैं। दबंगों के साथ – साथ अनेक साधु वेशधारी भी महिलाओं से दुष्कर्मों में लिप्त हैं। झूठ और फरेब का बोलबाला है। देवी – देवताओं के वंशज पथ भ्रष्ट हो गए हैं। धन्वन्तरि के वंशज चिकित्सा के क्षेत्र में, कुबेर के वंशज व्यवसाय में, बुद्धि दाता गणेश के वंशज मीडिया और न्याय में, विश्वकर्मा के वंशज तकनीक और नवनिर्माण में, माँ अन्नपूर्णा के वंशज कृषि और अनाज के क्षेत्र में लूट और भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। प्रभु आपने ही बताया था कि धरती पर शांति और अनुशासन के लिए एक ही परम शक्ति ने अलग – अलग रूपों में जन्म लिया है। फिर देवी – देवताओं और अन्य धर्मों के प्रमुखों के नाम पर भोली – भाली जनता को भ्रमित करके क्यों लड़वाया और लूटा जा रहा है ? प्रभु अब जम्बुद्वीप पर आपके पुनः जन्म लेने का समय आ गया है। विष्णु जी बोले – ऋषिवर मैं यह कार्य अनेक बार कर चुका हूं, अब इसे कोई अन्य देवता करे। नारद मुनि निराश होकर देवराज इंद्र के दरबार में पहुंचे। उन्होंने देवराज को जम्बुद्वीप की हालत और विष्णु देव से मुलाकात की जानकारी दी। नारद की बात पर देवराज ने मुस्कुराते हुए कहा – हे ऋषिवर भारतवासियों और पड़ोसी देशों के समाचारों से हम सभी देवता चिंतित हैं। “देव सरकार” भी विष्णु जी से जम्बुद्वीप पर अवतार लेकर वहां पुनः व्यवस्था कायम करने का आग्रह कर चुकी है, किंतु विष्णु जी का कथन भी सही है कि वे यह कार्य अनेक बार कर चुके हैं, अतः अब किसी अन्य देवता को भेजा जाए। ऋषिवर विष्णु जी के धरती पर अनुभवों को देखते हुए हमने उनसे अनुरोध किया है, हमें विश्वास है कि वे एक बार फिर जम्बुद्वीप पर अवतार लेने राजी हो जाएंगे। वैसे भी उनका “कल्की अवतार” लेना अभी बाकी है।

नारद मुनि ने नारायण – नारायण कहते हुए गहरी सांस ली और बोले – प्रभु कहीं विष्णु जी को पहुंचने में देर न हो जाए। जम्बुद्वीप में इन दिनों नरेंद्र नामक व्यक्ति सर्वोच्च पद पर आसीन है, कोई अमित उनका सारथी है। ये दोनों ही तीक्ष्ण बुद्धि के स्वामी हैं। नरेंद्र तो चक्रवर्ती सम्राट बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उसने पूरे जम्बुद्वीप को एक रंग में रंग दिया है। अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान सहित विश्व के तमाम बड़े – छोटे देशों को अपनी वाणी से मोह लिया है, चीन पर भी डोरे डाल रहा है। जम्बुद्वीप का सारा विपक्ष भी एकजुट होकर उसका मुकाबला करने में असमर्थ साबित हो रहा है। यदि नरेंद्र के विजय रथ को शीघ्र नहीं रोका गया तो अनर्थ हो जाएगा। चिंतातुर देवराज बोले – हे ऋषिवर स्पष्ट बोलें – क्या अनर्थ हो जाएगा ?

नारद मुनि ने पुनः गहरी सांस ली और कहा – प्रभु जम्बुद्वीप के चंद राज्य ही उसके ध्वज से बचे हैं। जैसे ही वह संपूर्ण जम्बुद्वीप पर अपना ध्वज लहराकर और सम्पूर्ण विश्व के नेताओं को जादू की झप्पी दे देकर चक्रवर्ती सम्राट बनेगा वैसे ही उसकी नजर आपकी कुर्सी पर होगी। मैं पहले ही कह चुका हूँ कि वह बहुत चतुर है। उसके पास अमित जैसा कुशल सारथी और “मामा” जैसे घोषणा वीर हैं। नारद की बातों से चिंतित देवराज अपना आसन छोड़ विष्णु जी से मिलने रवाना हो गए। वे नहीं चाहते थे कि कलयुग में कोई धरती पुत्र इतना शक्तिशाली हो जाए कि उसके कारण इंद्रासन डोलने लगे।

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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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