(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “ग्रेट ब्रिटेन में लोकतंत्र का रंगमंच: सत्ता की नजाकत और प्रेस की तलवार” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१८ ☆
☆ इन दिनों लन्दन से ☆
आलेख – ग्रेट ब्रिटेन में लोकतंत्र का रंगमंच: सत्ता की नजाकत और प्रेस की तलवार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
ब्रिटेन की राजनीति इन दिनों एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है जहाँ प्रधानमंत्री निवास एक रैन-बसेरा सा बन गया है। वहां की राजनीतिक अस्थिरता इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र में प्रेस की आज़ादी और जनता की अपेक्षाओं का दबाव किस हद तक बढ़ चुका है। बोरिस जॉनसन का जाना हो या फिर हाल ही में कीर स्टार्मर का पद छोड़ना, ये घटनाएं सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या ब्रिटेन के प्रधानमंत्री अब प्रेस और जनता के निरंतर डर के साये में काम करने को मजबूर हैं।
ब्रिटिश राजनीति में जवाबदेही के मानक अत्यंत कड़े हैं। वहां का लोकतान्त्रिक संस्कार किसी भी छोटे से छोटे नैतिक स्खलन को भी स्वीकार नहीं करता। हाल के वर्षों में प्रधानमंत्रियों के इस्तीफों की सूची को देखें तो कारण अक्सर बड़े नीतिगत संकटों के बजाय व्यक्तिगत नैतिकता और आचरण से जुड़े रहे हैं। कभी कोविड नियमों के उल्लंघन का छोटा सा विवाद (पार्टीगेट), कभी पारिवारिक सदस्य की फीस या निजी खर्चों से जुड़ी पारदर्शिता का अभाव, तो कभी मामूली से प्रतीत होने वाले राजनीतिक फैसलों पर मीडिया का आक्रामक रुख, इन छोटी-छोटी बातों ने सरकार की नींव हिला दी। प्रधानमंत्री बदल गए । यह अस्थिरता दर्शाती है कि वहां का नेतृत्व अब एक ऐसी सूक्ष्म परीक्षा से गुजर रहा है जहाँ कोई भी मानवीय त्रुटि उसके राजनीतिक करियर का अंत कर सकती है।
आज के सोशल मीडिया और डिजिटल दौर में, जहाँ हर छोटी घटना पल भर में सुर्खियों में आ जाती है, वहां के राजनेताओं की निजता और राजनीतिक आज़ादी लगातार सिमट रही है। प्रेस की भूमिका वहां एक सजग प्रहरी से बढ़कर सीधे तौर पर एक निर्णायक की हो गई है। जब मीडिया किसी व्यक्तिगत आचरण या पारदर्शिता के मुद्दे को राष्ट्रहित का नाम देकर उछालता है, तो वहां के प्रधानमंत्री के लिए अपनी कुर्सी बचाए रखना एक कठिन चुनौती बन जाता है। प्रधानमंत्री की आज़ादी का अर्थ वहां निरंकुशता से नहीं, बल्कि स्थिरता से है, जो अक्सर मीडिया के निरंतर दबाव में बिखरती दिखती है।
भारत की संसदीय प्रणाली ब्रिटिश डेमोक्रेसी की ही जड़ से निकली है, लेकिन इनके काम करने के तरीकों में बड़ा अंतर है। ब्रिटेन में नैतिक आधार पर इस्तीफा देना एक स्थापित राजनीतिक परंपरा है और वहां का जनमत त्वरित परिणामों की मांग करता है, जिससे नेतृत्व पर दबाव बहुत जल्दी बढ़ जाता है। इसके विपरीत, भारत में जवाबदेही की परिभाषा थोड़ा अलग है। यहां की सरकारें अक्सर एक बड़े और व्यापक जनादेश के साथ काम करती हैं। हालांकि प्रधानमंत्री सीधे जनता द्वारा नहीं चुने जाते, फिर भी वे स्वयं को सारी आबादी के प्रतिनिधि के रूप में प्रोजेक्ट करते हैं। भारतीय राजनीति में मीडिया का दबाव और विमर्श तो चलता है, लेकिन हमारा तंत्र अधिक लचीला है। यहां सत्ता को केवल मीडिया के शोर से हिला पाना कठिन है, क्योंकि भारतीय राजनीति का ढांचा नैतिक शुद्धता के साथ-साथ शासन की निरंतरता और स्थायित्व को भी प्राथमिकता देता है।
लोकतंत्र के इस रंगमंच पर एक संतुलन की आवश्यकता है। एक स्वस्थ समाज के लिए प्रेस का स्वतंत्र होना अनिवार्य है, लेकिन उसे जज की भूमिका से निकलकर एक सुझावकर्ता की भूमिका को भी समझना होगा। उसे यह अहसास होना चाहिए कि अत्यधिक अस्थिरता अंततः राष्ट्र के विकास की गति को बाधित करती है। दूसरी ओर, सत्ता में बैठे नेतृत्व को भी यह स्वीकार करना होगा कि डिजिटल युग में पारदर्शिता ही उनकी सबसे बड़ी सुरक्षा है।
अंततः, लोकतंत्र की सार्थकता इसमें नहीं है कि कौन कितनी जल्दी इस्तीफा देता है, बल्कि इसमें है कि व्यवस्था चुनौतियों के बीच भी कैसे निरंतरता बनाए रखती है। ब्रिटेन का उदाहरण हमें सीख देता है कि यदि हम अति-संवेदनशीलता और निरंतर दबाव की संस्कृति को बढ़ावा देंगे, तो प्रशासन केवल अगली हेडलाइन को मैनेज करने में ही उलझा रहेगा। भारत के लिए भी यह एक दिशा-दर्शन है कि उत्तरदायी शासन और स्वतंत्र प्रेस के बीच एक ऐसा सेतु बने, जहां सवाल तो बेबाकी से पूछे जाएं, लेकिन सरकार की स्थिरता और राष्ट्र की कार्ययोजना को दांव पर न लगाया जाए। लोकतंत्र की खूबसूरती इसी संतुलन में छिपी है।
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “भारतीय संस्कृति से जुड़ा मानसून आगमन…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९१ ☆
☆भारतीय संस्कृति से जुड़ा मानसून आगमन… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
मानसून भारतीय जीवन का केवल एक मौसम नहीं, बल्कि प्रकृति और संस्कृति के सुंदर मिलन का पर्व है। वर्षा की पहली फुहार के साथ ही धरती नवजीवन से भर उठती है और वातावरण में हरियाली का संदेश फैलने लगता है। यही कारण है कि पौधारोपण के लिए वर्षाकाल को सबसे उपयुक्त समय माना गया है।
पौधे लगाने से पूर्व भूमि की तैयारी, जैविक खाद का उपयोग तथा स्थानीय जलवायु के अनुकूल पौधों का चयन आवश्यक है। वर्षा का प्राकृतिक जल पौधों की जड़ों को मजबूती देता है और उनके विकास में सहायक बनता है। किंतु पौधारोपण का वास्तविक उद्देश्य केवल पौधे लगाना नहीं, बल्कि उनकी देखभाल कर उन्हें वृक्ष बनने तक संरक्षित रखना है।
भारतीय संस्कृति में भी वर्षा और हरियाली का विशेष महत्व रहा है। सावन, हरियाली अमावस्या, तीज तथा नागपंचमी जैसे पर्व प्रकृति के प्रति सम्मान और संरक्षण की भावना को सुदृढ़ करते हैं। हमारे लोकगीतों, लोकपरंपराओं और धार्मिक मान्यताओं में वृक्षों को जीवनदाता और पुण्य का प्रतीक माना गया है। इस प्रकार मानसून की रिमझिम फुहारें केवल खेतों और बागों को ही नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना को भी सिंचित करती हैं।
आज आवश्यकता है कि हम वर्षा ऋतु को केवल मौसम परिवर्तन के रूप में न देखें, बल्कि इसे हरियाली बढ़ाने और प्रकृति से अपने संबंधों को मजबूत करने के अवसर के रूप में अपनाएँ। एक पौधा लगाना पर्यावरण संरक्षण का कार्य है, तो उसकी देखभाल करना संस्कृति और संवेदना का निर्वाह। वास्तव में वर्षा, वृक्ष और संस्कृति का यह संगम जीवन को संतुलित, सुंदर और समृद्ध बनाता है।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “|| रोंगटे ||“।)
अभी अभी # १०२९ ⇒ आलेख – || रोंगटे || श्री प्रदीप शर्मा
(GOOSE BUMPS)
हमारा शरीर भी विचित्र है। हमारी त्वचा में असंख्य रोमकूप हैं। जो भक्त होते हैं, उनके रोम रोम में राम व्याप्त होते हैं। हम जब अनजाने में, तनिक से स्पर्श से सिहर उठते हैं, तो ये भी अपनी अपनी हैसियत के अनुसार सक्रिय हो जाते हैं। इन्हें हम रोएँ भी कहते हैं।
हमारे रोमांच में रोम का बड़ा हाथ होता है। Rome was not built in a day.
भारतीय नाट्य शास्त्र में केवल भाव भंगिमा से ही मन में उत्पन्न सभी भावों का सजीव चित्रण किया जाता है। चेहरे पर संचारी भावों का सफलतापूर्वक प्रदर्शन ही तो नृत्य है। जिनमें श्रृंगार, शांत, भय, रौद्र, वीर और वीभत्स रस भी शामिल है। कहीं नटवर है तो कहीं नटराज। वैसे भी तांडव नृत्य मंच पर ही देखना अच्छा लगता है।।
हम भी अजीब हैं। जब हमें गुस्सा आता है, तो हमारे तेवर देखिए और जब हम खुद डर जाते हैं, तो हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। मानो उन्हें कक्षा में मास्टर जी ने जोर से डांटकर फटकारा हो, ऐ मिस्टर तुम ! खड़े हो जाओ। स्कूल में क्या नींद निकालने के लिए आते हो।
ये रोंगटे भी अजीब हैं। यूँ तो आराम से सोते रहेंगे, लेकिन जरा भी खतरे की घंटी बजी, तो खड़े हो जाते हैं, जैसे अफसर की घंटी से बाहर स्टूल पर ऊंघता चपरासी झट से आया साहब कहता हुआ खड़ा हो जाता है।।
क्या डर के मारे खड़े हुए रोंगटे किसी मास्टर जी के आदेश की प्रतिक्षा करते रहते हैं, कि ठीक है, बैठ जाओ, या खड़े ही रहते हैं। यह भी एक पहेली ही है। पहेली तो वैसे यह भी है कि ये संख्या में कितने हैं और इनकी आपस में एकता देखिए, मुसीबत में, या भय की स्थिति में, सब एक साथ खड़े हो जाते हैं। और जब संकट टल जाता है, तब सभी निश्चिंत होकर एक साथ चैन से बैठ जाते हैं।
आप भी कभी डरे होगे, आपके भी रोंगटे खड़े होते होंगे। कभी इनसे बात कीजिए, इनके हालचाल पूछिए। आप कैसे हैं मिस्टर रोंगटे ! इनकी संख्या कितनी है और ये शरीर में कहाँ कहाँ विराजमान हैं, इन्हें कोई तकलीफ तो नहीं?
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “इंतज़ार” ।)
(वरिष्ठ साहित्यकारश्री अरुण कुमार दुबे जी,उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “तबाही रोकिए अब…“)
श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक रचना – आवारगी में गुजारे दिन…।)
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है पुस्तक समीक्षा – “तुम, न आए लौटकर (काव्य-संग्रह)… “।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६८ ☆
पुस्तक समीक्षा – तुम, न आए लौटकर (काव्य-संग्रह)… कवि – महेन्द्र वर्मा ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
पुस्तक का नाम – तुम, न आए लौटकर (काव्य-संग्रह)
कवि – महेन्द्र वर्मा
प्रकाशक – आस्था प्रकाशन गृह, जालंधर-नई दिल्ली-कनाडा
संस्करण – 2026
मूल्य – 325 रु.
सार्त्र ने कहा था – “सब कुछ गुजर जाता है। आंधी, तूफान, सुनामी, सब आते हैं, रुकते नहीं, थमते नहीं, पतझड़ में रंग-बिरंगे पत्ते, अपनी शाख से, आज़ादी पा, मंडराते हैं, खिलखिलाते हैं और फिर बिखर जाते हैं ज़मीं पर”… किसी काव्य-संग्रह में सार्त्र का नाम होना ही कवि की उच्चता दर्शाता है, क्योकि ज्याँ पॉल सार्त्र बीसवीं सदी के सुविख्यात फ्रांसीसी अस्तित्ववादी दार्शनिक थे, जिन्होंने अपनी रचनाधर्मिता को बनाए रखते हुए नोबेल पुरस्कार भी लेने से इंकार कर दिया था।
विदेश में विदेशी भाषा के माध्यम से हिंदी पढ़ाने वाले महेन्द्र वर्मा जी जैसा व्यक्तित्व जब कविता रचेगा तो उसमें अपने उत्स और विदेश की धरती पर अपनों परायों के बीच जीवन जीना कितना अनुभूत, कितना परानुभूत होगा, यह उनकी कविताओं से थोड़ा सा परिलक्षित होता है, थोड़ा सा इसलिए कि अपनी भाषा की सुगंध को विदेशी भाषा की सुगंध में अवगुंठित करना और अपनी मांटी की सौंध से सात समुंदर पार की धरती तक के वितान पर अनुभवों की रेखा खींच पाना एक काव्य-संग्रह में संभव नहीं है, परंतु सात समुंदर पार भी अपनी मांटी की सौंध को अपने में बसाये रखने वाले महेन्द्र वर्मा जैसे व्यक्तित्व की एक ही कविता ऐसी हो सकती है कि पाठक उसे पढ़कर बरसों प्रभावित रह सकता है।
महेन्द्र वर्मा की अपनी पहली कविता, “क्या खोया, क्या पाया”, में ही बयान कर देते हैं-
अक्तूबर का दिन था
खुशनुमा दिन
जब आया था न्योता
सात समंदर पार
यू.के. से
एक नहीं
दो-दो
यॉर्क और मेनचेस्टर से।
करना है
मजबूत-प्रवास में
हिंदी की नींव को
यॉर्क ने,
दूर से दी थी आवाज।“
इस कविता में ही उन्होंने अपनी यात्रा का ऐसा वर्णन कर दिया है कि पाठक पढ़कर सोचता रह जाता है। आगे पढने के लिए उसे हिम्मत जुटानी पड़ती है। आगे वर्मा जी सोचें लेकिन उनकी यात्रा हिंदी से ही पूरी होती है, जो उनका बहुत बड़ा संबल भी बनती है। इसी कव्ता में आगेलिखते हैं-
“प्रवासी को
हाथ बढ़ा कर
दे दिया
हिंदी ने
इतना कुछ,
विधि में
मिलता नहीं
सदा
सब कुछ।
कुछ खोया, कुछ पाया।“
लेकिन विरासत उन्हें कुछ भूलने नहीं देती। दूसरी कविता “विरासत” में वे कह उठते हैं-
“है संबंध अनूठा
मानवता औ विरासत का,
है एक विशाल कोश
वेदों औ पुराणों में
विरासत का
करता है प्रदान जो
मानवता को अंतर्दृष्टि।
……
मिला दर्शन
वसुधैव कुटुंबकम्
सर्वे भवंतु सुखिना
औ’
ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत
का भी।”
विदेश में रहते वे रामायण, गीता, मानस, तमिल कंब रामायण, मलयालम अध्यातम रामायणम्, नानक, गौतम और महावीर के साथ-साथ शंकर और चार्वाक किसी को नहीं भूलते।
महेन्द्र वर्मा जी का काव्य कौशल उस समय ऊंचाइयों की पराकाष्ठा पर होता है जब वे “पतझड़” को एक नया सकारात्मक स्वरूप प्रदान करते हैं, जो किसी कवि ने नहीं दिया। वे लिखते हैं-
“पतझड़ है यह तो
ज़मीं पर बिखरी पत्तियाँ
सूरज की
सुनहली रोशनी में
चमकती-दमकती
इठला रही हैं,
मुक्ति मिली है
आज”
अंग्रेजी कवि कीट्स की कविता को उन्होंने आगे बढ़ाया है। इसी कविता में आगे लिखते हैं—
“और मिला है
वह अंतिम सुख
जब बटोर- बटोर कर
माली ने
किया
उनका अंतिम संस्कार।”
प्रकृति का अवलोकन ही नहीं अवीक्षण भी उनका अभूतपूर्व है। “कली बोली” कविता उऩकी दृष्टि देखिए—
“कली बोली-
मैं अधखिली रह गयी,
था मेरे
यौवन का क्षण, वह
तुषारापात कर दिया
अचानक
जब तुमने।”
और वे “गुलमोहर” से पूछ बैठते हैं—
“गुलमोहर से पूछो
खुल कर, खिलखिला कर बोलेगा,
पतझड़ आया तो क्या
चला गया
हर वर्ष
जाड़ा भी आकर।”
ऐसा कोई कवि नहीं हुआ, जिसने येन-केन-प्रकारेण सृष्टि पर कुछ न लिखा हो। प्रकृति और सृष्टि कवियों के चहेते विषय हैं, तो वर्मा जी पीछे कैसे रहते, “सृष्टि” कविता में लिखते हैं—
“सृष्टि का भी तो
अजीबो-ग़रीब
रंगो-रिवाज़ है।
सुनामी आती तो है
पर
दस्तक देकर ,
चली भी जाती।”
उनकी कल्पना शक्ति “सुगंध” नामक कविता में तो देखते ही बनती है। अमूर्त को मूर्त कैसे बनाया जाता है उसकी बानगी इस कविता में है—
“निःशब्द हो
तुम सुगंध,
पर निष्प्राण नहीं।
धार्मिक अनुष्ठानों में
मंदिर हो या मस्जिद
कहाँ नहीं मिलती हो तुम
….
सुगंध, तेरी है विचित्र कहानी
पवन का दामन छोड़
पहुँच जाती हो
जब अंतरिक्ष में
फैलादेती हो ऐसा
अपना सुवास, अपना सौरभ
बतला नहीं पाती,
रह जाती है
नाकाम
अंतरिक्ष निर्वात में
नाक हमारी।”
सड़कों के किनारे वृक्ष लगाए जाते हैं और वे ऊंचे होकर सड़क को ढंकते हुए मिल जाते हैं। ऐसा मैंने देखा है। आपने भी देखा होगा। और महेन्द्र वर्मा ने भी देखा, लेकिन कैसे, उनकी कविता “आमने-सामने” में देखिए—
“रख दिया तुमने मुझे
अपनों से दूर
जमा दिया सड़क के
इस पार- उस पार
आमने-सामने
,………
प्यार का नशा हो जाए
तो लगती हैं खिसकने
दूरियाँ।
उम्र बढ़ती गयी
और हम पास आते गए
आलिंगन होने लगा
फुनगियाँ, फुनगियों से मिलती रहीं
हमारी दूरियाँ फिसलती गयीं।”
सृष्टि, प्रकृति पर ही उनकी निगाह नहीं गई, अपितु विज्ञान पर गहरी नजर गई और वैज्ञानिकों को सुनाया भी। उनकी “विज्ञान और वैज्ञानिक” कविता में है—
“विज्ञान नहीं, वैज्ञानिकों,
कर डाला तुमने
क्या
विज्ञान का।
……
पैदा कर दी है
वैमनस्यता कैसी
भेद डाल
मित्रता में
विज्ञान औ प्रकृति की।
….
रख दिया ताक पर
सृष्टि के मूल्यों को
मत दो विध्वंस का नुस्खा,
दे दो संजीवनी की औषधि।”
इंतज़ार पर उन्होंने तीन कविताएँ लिखी हैं। तीनों हृदयस्पर्शी हैं। लेकिन एक “इंतजार-2” मेरे दिल को भेद गई, आंसू ढल आए। आप भी देखिए—
“व्यग्रता से था
माँ को इंतज़ार
बेटा आएगा
लौट कर युद्ध से।
आया तो अवश्य
पर, अंतिम संस्कार के लिए।”
इंतज़ार 1 और 3 भी बहुत गंभीर रचनाएँ हैं। वर्मा जी लिखते हैं तो कविता लेकिन दर्शन उनकी हर बात में रहता है। वास्तव में वे एक भाषावैज्ञानिक कवि ही नहीं अपितु दार्शनिक कवि हैं। उनकी प्रतीक्षा नामक कविता में ऐसे दिखता है—
“करूँ प्रतीक्षा किस की
कब तक
..
उस मौसम की
जो कभी न आया।
प्रतीक्षा में नींद आने की
रात को थाम लेता हूँ,
रात आती तो है
पर फटकने देती नहीं,
नींद को पास
और हो जाती है सुबह।”
ऐसे ही प्रतीक्षा की घड़ी कविता में लिखते हैं—
“खिसकती जा रही है
प्रतीक्षा की घड़ी
सूइयाँ फिर भी
थकती नहीं
अनवरत चलती जा रही हैं,
घूम-घूम कर
मोक्ष का दामन पकड़े
मुक्ति की आशा
रख रही है-
ज़िंदा उन्हें।”
उन्होंने खूब लिखा है। पर माँ को नहीं भूलते—
“माँ बैठी है, चुपचाप
आँखें हो गयी हैं
पथरायी-सी
बाट जोहते-जोहते
उसकी
जो कभी न लौटा,
लौटा भी तो तब
जब बंद हो चुकीं थीं
माँ की आँखें।”
मुक्ति कविता में वर्मा जी लिखते हैं—
“ईश्वर ने
मानव से पूछा-
मुक्ति मेरी
कब आएगी
उत्तर आया-
जब मेरी होगी।”
आगे पाठक स्वयं पढ कर देखेंगे कि और क्या उत्तर आता है। “ऐसे ही लोगे कब तक परीक्षा,” “कब तक रहोगा उदास”, “जी करता है” उऩकी बहुत मर्मस्पर्शी कविताएँ हैं। उनका प्रवासी मन मसोस उठता है।
“जी करता है
कुछ बोलूँ,
क्या बोलूँ
किस से बोलूँ
कैसे बोलूँ
बतियाऊँ भी तो
किस भाषा में”
अकेलापन तो वे बड़े नज़दीक से महसूस करते हैं। लिखते हैं—
“खड़ा हूँ
अब अकेला अंतिम पड़ाव पर।
दिखते बहुत हैं लोग
मुड़कर देखता कोई नहीं।
कैसा है अकेलापन यह।”
वर्मा जी विदेश में रहते हैं, पर संस्कारों का पूरा ध्यान रखते हैं और संस्कार पर कविता लिखना नहीं भूलते, लिखते हैं-
“तुम्हारे संस्कार, औ’ मेरे संस्कार
क्या दोनों का सामंजस्य
नहीं हो सकता .
जीवन का अर्थ क्या है.
जीने का मतलब क्या है.
जीवन एक जैसा नहीं रहता हमेशा,
नहीं रहते संदर्भ और मूल्य एक जैसे।”
मानव मन के अध्येता के रूप में वर्मा जी तब उभर कर आते हैं जब घृणा पर कविता लिखते हैं। घृणा पर शायद ही किसी ने ऐसी कविता लिखी हो, विदेश में नस्ल भेद और घृणा को उन्होंने स्वयं भोगा है शायद। दृष्टव्य है—
“घृणा करना कितना
घिनौना होता है
इंसान जब इंसानियत
भूल बैठता है
नस्ल के नशे में
……
नस्ल, धर्म, जाति, पंथ, रंग
के नाम पर
घिनौनी हरकतें
जब कभी भी
दूसरों का रंग
उसे लगता है बदरंग। ”
वे व्यक्ति को सचेत भी करते हैं कि—
“दीप
दीप तो
कभी न कभी
सारे बुझेंगे ।
सोच कर यह
हो जाना
अकर्मण्य
विपरीत है
धर्म के।”
वे शब्दों के चितेरे हैं, तभी तो शब्द पर तीन कविताएं लिखी हैं। शब्दों की शक्ति में लिखते हैं—
“शब्दों में समाहित है
संगीत की शक्ति,
होती है शब्दों में
कोलाहल को भेदने की शक्ति,
शब्दों में शक्ति होती है
ममता औ’ मनुहार करने की,
लड़ने औ लड़ मरने की भी।”
महेन्द्र वर्मा जी एक दार्शनिक कवि हैं। उनकी हर कविता में दर्शन झलकता है। जैसे “नाम” शीर्षक वाली कविता में लिखते हैं—
“सोचता हूँ कभी-कभी
क्या धरा है मात्र नाम में.
सोचता हूँ फिर,
हुआ होगा
सृष्टि में
कभी क्या
बिना नाम के संबोधित
कोई कभी.”
ऐसे ही उत्सव की परिभाषा में –
“होता है, मुक्ति का उत्सव
त्यागने पर अपना शरीर।
उत्सव, उत्सव हो सकता है
सारा जीवन ही उत्सव।”
“बेसलन, रूस” कविता में वे आतंकवादियों को ललकारते हैं—
“कितने बच्चे थे
मासूम
नन्हें-नन्हें
नए जीवन की
करने शुरुआत,
……
जब किया प्रहार
निर्दयी आतंकवादी
तुमने।“
फिर “मौत” कविता में जज़्बाती भी हो जाते हैं—
“जब भी आती है
मौत
कभी दस्तक
देती नहीं।“
अपने देश से दूसरे देश में बसने वाले या प्रवास करने वाले प्रवासियों की पीड़ा को वर्मा जी से अच्छा कौन
बता सकता है, “प्रवासी की पीड़ा” में देखिए—
“समझ गया मैं।
देसी कभी
नहीं समझोगे मुझको.
रंग भेद है
जाति भेद है
नस्ल भेद है
…..
करा दिया
स्वीकार तुम्हीं ने,
अंश नहीं
बन सकता
तेरी धरती का मैं।
वर्मा जी भाषाविज्ञानी तो हीं ही, विदेश में पढाया भी है। लेकिन भाषा और मातृभाषा को काव्य में भी नहीं भूलते, जैसे, “आप्रवासी की मातृभाषा” में देखिए—
“पहचानो, समझो मुझको।
अंग्रेजी नहीं जानतीं
पर, नहीं हूँ बिन भाषा के मैं ।
मेरी माँ की भाषा
भी सशक्त थी जब,
शिक्षा द्वार पहुँचते ही
दुत्कारा मेरी भाषा को
तुमने।”
भाषा के नाम पर अपनी रोटी सेंकने वालों और स्वार्थलिप्सा में बंधे विद्वानों को भी नहीं छोड़ते, “भाषा हितैषी” कविता में लिखते हैं—
“और तुम
बहुत व्यस्त रहे तुम,
भाषाकर्मी बन
शोध जगत में।
….
बहुत कर लिए
शोध तुम ने।
शोधक भी हो गए
और संशोधक भी।
…..
दिखता नहीं तुम्हें क्या
होती जा रही है लुप्त
मेरी अपनी भाषा।
बनी रहेगा पीड़ा उसकी
पीढ़ी-दर-पीढ़ी तक।
…..
मेरी पीड़ा है साक्षी
उस भाषाई भेदभाव की।
डिगा दिया है जिसने
संस्कृति की वह नींव हमारी।”
“मम्मी-डैडी” कविता में हिंदी-अंग्रेजी ध्वनियों की बात करते हैं तो “पनप न पाएगी” कविता में कहते हैं—
“कर लो कितनी भी कोशिश
पनप न पाएगी
इस धरती पर,
तेरी, उनकी भाषाएँ।”
इसके भी आगे “मेरी भाषा-तेरी भाषा” कविता में लिखते हैं—
“तेरी भाषा
मेरी भाषा
भाषा तो भाषा ही है
जैसी तेरी
वैसी मेरी।”
महेन्द्र वर्मा प्रवासी तो रहे पर जहाँ रहे वहाँ प्रकृति के बनके रहे, जैसे “ट्यूलिप के फूल” कविता में—
“आता है वसंत
औ’ निकल पड़ते तुम
गर्भ से ज़मीं के,
सुर्ख लाल,पीले
रंग-बिरंगे।
…
चंद दिनों का तुम्हारा जीवन
मुर्झाने लगता है,
मानकर
नियति के नियम को
हो जाते हो
धीरे-धीरे लुप्त
स्वीकार कर
आने-जाने के दर्शन को।”
“यूस्टन स्टेशन” का दर्शन वे कुछ इस तरह कराते हैं—
“भाग रहे हैं
भाग रहे हैं
सब के सब
बस दौड़ रहे हैं,
यह जाना पहचाना
यूस्टन का स्टेशन।”
“तुम, न आए लौट कर” कविता में उनका गहन सोच, दर्शन बहुत सुंदर ढंगे से प्रस्फुटित होता है—
“तुम न आए लैट कर
सृष्टिकर्ता,
रच तो दिया
इस अद्भुत सृष्टि को,
पर न आए लौट कर।”
“तुम, न आए लौटकर” काव्य संग्रह में कुल अस्सी कविताएँ हैं। हर कविता एक से बढकर एक, चयन करना मुश्किल, क्योंकि महेन्द्र वर्मा जी का शब्दों और अर्थों पर पूरा अधिकार है। काव्य संग्रह पढ़कर ही सुधी पाठक उसका आनंद उठा पाएंगे।
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – धरती माँ की पुकार।)
पर्यावरण दिवस पर शहर के एक बड़े विद्यालय में भव्य कार्यक्रम आयोजित था। मंच पर बड़े-बड़े भाषण गूँज रहे थे—
“पेड़ बचाओ… पानी बचाओ… धरती बचाओ…”
सभागार तालियों से गूँज उठा। कार्यक्रम के बाद लोगों ने जलपान किया और जाते-जाते आधी भरी प्लेटें, प्लास्टिक की बोतलें और बचा हुआ पानी यूँ ही इधर-उधर फेंक दिया।
भीड़ छँटने लगी तो एक शिक्षक की नजर विद्यालय के बाहर सूखे पेड़ के नीचे बैठी एक नन्ही बच्ची पर पड़ी। वह जमीन पर गिरी अधूरी पानी की बोतलों से बचा पानी अपनी छोटी-सी बोतल में भर रही थी।
शिक्षक उसके पास गए और स्नेह से बोले,
“बेटी, ये क्या कर रही हो?”
बच्ची ने मासूम आँखों से उनकी ओर देखा—
“अंकल, माँ कहती हैं… पानी और अन्न कभी व्यर्थ नहीं फेंकना चाहिए। ये धरती माँ का आशीर्वाद होते हैं।”
शिक्षक कुछ क्षण निरुत्तर खड़े रहे।
तभी बच्ची ने पास खड़े सूखे पेड़ को सहलाते हुए कहा—
“जब पेड़ रोते होंगे ना अंकल… तब ही बारिश कम हो जाती होगी। फिर खेत सूख जाते होंगे… और गरीबों को दो जून की रोटी भी नहीं मिलती होगी…।”
उसकी बात सुन शिक्षक का मन भीतर तक भीग गया। मंच पर दिए गए सारे भाषण उस मासूम बच्ची की एक बात के आगे फीके पड़ गए थे।
उन्होंने देखा—
धरती को बचाने की बातें करने वाले लोग ही धरती का सबसे ज्यादा नुकसान कर रहे थे।