हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३३४ – कर्मण्येवाधिकारस्ते! ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३३४ कर्मण्येवाधिकारस्ते! ? श्री संजय भारद्वाज ☆

एक युवा व्यापारी मिले।  बहुत परेशान थे। कहने लगे, “मन लगाकर परिश्रम से अपना काम करता हूँ  पर परिणाम नहीं मिलता। सोचता हूँ काम बंद कर दूँ।” यद्यपि उन्हें  काम आरम्भ किए बहुत समय नहीं हुआ है। किसी संस्था के अध्यक्ष मिले। वे भी व्यथित थे। बोले,” संस्था के लिए जान दे दो पर आलोचनाओं के सिवा कुछ नहीं मिलता। अब मुक्त हो जाना चाहता हूँ इस माथापच्ची से।” चिंतन हो पाता, उससे एक भूतपूर्व पार्षद टकराए। उनकी अपनी पीड़ा थी। ” जब तक पार्षद था, भीड़ जुटती थी। लोगों के इतने काम किए। वे ही लोग अब बुलाने पर भी नहीं आते।”

कभी-कभी स्थितियाँ प्रारब्ध के साथ मिलकर ऐसा व्यूह रच देती हैं कि कर्मफल स्थगित अवस्था में आ जाता है। स्थगन का अर्थ तात्कालिक परिणाम न मिलने से है। ध्यान देने योग्य बात है कि स्थगन किसी फलनिष्पत्ति को कुछ समय के लिए रोक तो सकता है पर समाप्त नहीं कर पाता।

स्थगन का यह सिद्धांत कुछ समय के लिए निराश करता है तो दूसरा पहलू यह है कि यही सिद्वांत अमिट जिजीविषा का पुंज भी बनता है।

क्या जीवित व्यक्ति के लिए यह संभव है कि वह साँस लेना बंद कर दे?  कर्म से भी मनुष्य का वही सम्बंध है जो साँस है। कर्मयोग की मीमांसा करते हुए भगवान कहते हैं,

‘न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।’

कोई क्षण ऐसा नहीं जिसे मनुष्य बिना कर्म किए बिता सके। सभी जीव कर्माधीन हैं। इसलिए गर्भ में आने से देह तजने तक जीव को कर्म करना पड़ता है।

इसी भाव को गोस्वामी जी देशज अभिव्यक्ति देते हैं,

‘कर्मप्रधान विश्व रचि राखा।’

जब साँस-साँस कर्म है तो उससे परहेज कैसा? भागकर भी क्या होगा? ..और भागना संभव है क्या? यात्रा में धूप-छाँव की तरह सफलता-असफलता आती-जाती हैं। आकलन तो किया जाना चाहिए पर पलायन नहीं। चाहे लक्ष्य बदल लो पर यात्रा अविराम रखो। कर्म निरंतर और चिरंतन है।

सनातन संस्कृति छह प्रकार के कर्म प्रतिपादित करती है- नित्य, नैमित्य, काम्य, निष्काम्य, संचित एवं निषिद्ध। प्रयुक्त शब्दों में ही अर्थ अंतर्निहित है। बोधगम्यता के लिए इन छह को क्रमश: दैनिक, नियमशील, किसी कामना की पूर्ति हेतु, बिना किसी कामना के, प्रारब्ध द्वारा संचित, तथा नहीं करनेवाले कर्म के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।

इसमें से संचित कर्म पर मनन कीजिए। बीज प्रतिकूल स्थितियों में धरती में दबा रहता है। स्थितियाँ अनुकूल होते ही अंकुरित होता है। कर्मफल भी बीज की भाँति संचितावस्था में रहता है पर नष्ट नहीं होता।

मनुष्य से वांछित है कि वह पथिक भाव को गहराई से समझे, निष्काम भाव से चले, निरंतर कर्मरत रहे। अपनी कविता ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ उद्धृत करना चाहूँगा-

भीड़ का जुड़ना,

भीड़ का छिटकना,

इनकी आलोचनाएँ,

उनकी कुंठाएँ,

विचलित नहीं करतीं

तुम्हें पथिक..?

पथगमन मेरा कर्म,

पथक्रमण मेरा धर्म,

प्रशंसा, निंदा से

अलिप्त रहता हूँ,

अखंडित यात्रा पर

मंत्रमुग्ध रहता हूँ,

पथिक को दिखते हैं

केवल रास्ते,

इसलिए प्रतिपल

कर्मण्येवाधिकारस्ते!

 

विचार कीजिएगा।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

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संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २५ – हास्य-व्यंग्य – “डुप्लीकेट जिंदाबाद” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  डुप्लीकेट जिंदाबाद

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २५ 

☆ हास्य-व्यंग्य ☆ “डुप्लीकेट जिंदाबाद” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

बहुत सबेरे कोई मेरे घर का दरवाजा लगातार खटखटाए जा रहा था।  मैं भी बिस्तर में दुबका उसके धीरज की परीक्षा ले रहा था, किंतु लंबे समय के बाद भी जब दरवाजे पर खटखटाहट बंद नहीं हुई तो मैं समझ गया कि दरवाजे पर मेरे पड़ोसी वर्मा जी के सिवा और कोई नहीं हो सकता।  कहीं दरवाजा न टूट जाए इस आशंका से मैंने तुरंत चादर फेंका और दरवाजा खोल दिया। मेरा अनुमान सही था बाहर वर्मा जी खड़े थे। उन्होंने मुझे एक ओर करते हुए घर के अंदर प्रवेश किया और सोफे पर पसरते हुए कहा – “भाई साहब, अख़बार पढ़ा आपने, अब डुप्लीकेट ताजमहल भी बन गया !”

मैंने आंखें मलते हुए कहा, वर्मा जी मुझे अख़बार पढ़ने की जरूरत कहां पड़ती है, आप ही सारी खबरें सुना जाते हैं और रही डुप्लीकेट ताजमहल की बात तो वह तो मेरे घर की आलमारी में भी बंद है। वर्मा जी बोले – “भाई साहब मैं आपकी आलमारी वाले ताजमहल की बात नहीं कर रहा, मैं तो उस विशाल डुप्लीकेट ताजमहल की बात कर रहा हूं जो एक पंजाबी उद्योगपति ने कुछ समय पहले 40 लाख अमरीकी डॉलर खर्च करके दुबई में बनवाया है। मैंने कहा भाई साहब इससे आपको क्या परेशानी हो रही है ? आजकल तो जमाना ही डुप्लीकेट का चल रहा है, वह समय गया जब किसी वस्तु या व्यक्ति का डुप्लीकेट होना सम्मानजनक नहीं समझा जाता था अब तो डुप्लीकेट की मांग ने ओरिजनल को पछाड़ दिया है। साबुन से लेकर सिंदूर तक सब डुप्लीकेट मिल रहा है। टी वी, कैमरा, सीडी की बात तो छोड़ो अब तो गीत और संगीत भी डुप्लीकेट मिलने लगे हैं और पसंद किए जा रहे हैं। डुप्लीकेट सामान के निर्माण में लोगों ने इतनी तरक्की कर ली है कि अब ओरिजनल के पहले डुप्लीकेट सामग्री बाजार में आ जाती है। दुकानदार ग्राहक को ओरिजनल सामान दिखाने की कोशिश करता है तो वह डुप्लीकेट चाहिए कहकर दुकान से बाहर हो जाता है। डुप्लीकेट सामान बेचना दुकानदारों की भी मजबूरी बन गई है। बाजार में डुप्लीकेट की बढ़ती मांग के कारण देश के न जाने कितने उद्योगपतियों ने ओरिजनल वस्तुओं की जगह डुप्लीकेट का कारोबार शुरू कर दिया है। ओरीजनल समान बनाने और बेचने वाले अलसेट (मुसीबत) में हैं, डुप्लीकेट बनाने और बेचने वाले चांदी पीट रहे हैं।

लंबा बोलने के बाद जैसे ही मैंने सांस ली, वर्मा जी ने तुरन्त फायदा उठाया। बोले भाई साहब “आपने तो डुप्लीकेट पर भाषण ही दे डाला। मैं तो डुप्लीकेट ताजमहल की बात कर रहा था। ” मैने कहा – भाई जी आप ताजमहल को पकड़ का क्यों बैठे हैं ? अपने चारों ओर देखिए, हर तरफ डुप्लीकेट की माया है। आपको देश में दूध, दही, घी, तेल, सौंदर्य प्रसाधन, टी वी, कैमरा, रेडियो, कपड़ों से लेकर दवाएं तक डुप्लीकेट मिल जाएंगी। डुप्लीकेट गोविंदा, शाहरुख, सलमान, अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्या, करीना तो हैं ही डुप्लीकेट गांधी और मोदी भी घूम रहे हैं। “डुप्लीकेट जिंदाबाद” बोलिए और विदा लीजिए।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१०६ – माँ… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता माँ।)

☆ अभिव्यक्ति # १०६ ☆ माँ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

मां तो केवल मां होती है,

मां को न कुछ और कहो,

सभी देवता गोद में खेले,

तुम तो बस चरणों में रहो.

**

जन्म दिया हो या पाला हो,

भेद न कोई ममता माने,

अपना पराया कोई नहीं है,

मां तो सबको अपना माने.

*

मां की ममता का मोल नहीं,

ममता है अनमोल कहो,

मां तो केवल मां होती है,

मां को न कुछ और कहो.

**

मां की महिमा का बखान,

सुर नर मुनि भी गाते हैं,

वेद पुराण के पन्ने भी,

लिख कर नहीं अघाते हैं.

*

सब रिश्तों से ऊपर है मां,

इससे ऊपर कोई न हो

मां तो केवल मां होती है,

मां को न कुछ और कहो.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६३ ☆ # “एक अधूरा ख्वाब…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता एक अधूरा ख्वाब…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६३ ☆

☆ # “एक अधूरा ख्वाब…” # ☆

पूर्णिमा की रात थी

चांदनी की बरसात थी

चांद आसमान में खिला हुआ था

सितारों से जाकर मिला हुआ था

चंद्र किरण के लिए जो प्यासा था चकोर

जन्मों की प्यास बुझाकर हो रहा था विभोर

रातरानी की सुगंध महक रही थी

सुप्त भावनाएं धीरे-धीरे बहक रही थी

चांदनी रात में हम दोनों थे साथ में

बरसती चांदनी में हाथ थे हाथ में

पारिजात की गंध में बेसुध वो छुई-मुई

केवड़े के तने से जैसे लिपटी नागिन हो कोई

मादक पवन में मदहोश चमन में

अंगारे दहक रहे थे दोनों के बदन में

आगोश में एक दूसरे के खोए हुए थे

नाग नागिन से लिपटकर सोए हुए थे

मध्य रात्रि में कोई प्रेम राग गा रहा था

सारी कायनात पर नशा छा रहा था

ना संसार की चिंता ना खुद की खबर थी

पहलू में सोए चांद के चेहरे पर नजर थी

रात की खामोशी दे रही थी सदाऐं

प्रीत के गीत गा रही थी सारी दिशाएं

पता ही नहीं चला कब रात ढल गई

भोर की लालिमा प्रीत को छल गई

बिछड़ने की पास जब आई घड़ी

उसके नैनों से अश्रु की लग गई झड़ी

वो बेख़बर बेहोशी में गई मुझे छोड़कर

अरमानों से भरा मेरा मासूम सा दिल तोड़ कर

एक मधुर सा सपना नींद में ही टूट गया

एक अधूरा ख्वाब नींद और चैन दोनों लुट गया /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ३५ आणि ३६ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ३५ आणि ३६ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. ३५ 

असे हो जया अंतरी भाव जैसा|

वसे हो तयार अंतरी देव तैसा |

अनन्यास रक्षीतसे चापपाणी |

नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी|३५|

अर्थ :  आपल्या मनात परमेश्वराबद्दलचा जसा भाव असेल त्याप्रमाणे परमेश्वर आपल्या अंतरामध्ये वसतो म्हणजे त्याचे अस्तित्व जाणवते. अनन्यभावाने परमेश्वराला जो शरण जातो त्याचे रक्षण हा धनुर्धारी राम नक्कीच करतो. आपल्या भक्तांची तो कधीही उपेक्षा करत नाही.

(अनन्य – एकनिष्ठ, चापपाणी – हाती धनुष्य धारण केलेला /भगवंत.)

विवेचन : आधीच्या श्लोकात समर्थ देव आपल्या भक्तांचे रक्षण करतो असे आपल्याला सांगतात. या श्लोकात ते आपल्याला परमेश्वर कोणत्या भक्तांचे रक्षण करतो ते सांगतात. परमेश्वर सर्व प्राणीमात्रांच्या ठिकाणी वास करतो. परंतु त्याच्याबद्दलची आपली जाणीव किती तीव्र आहे यावर आपल्याला त्याची होणारी अनुभूती ठरते. भगवंताविषयीची भावना जर आपल्या अंतःकरणात तीव्र असेल तर तो प्रकट होण्यास वेळ लागत नाही.

या श्लोकात ‘भाव ‘ हा शब्द अतिशय महत्त्वाचा आहे. हा शब्द वेगवेगळ्या अर्थाने वापरला जातो. जसा भाव तसा देव किंवा देव भावाचा भुकेला असे आपण म्हणतो. कोणी भक्त स्वतःला परमेश्वराचा दास म्हणून घेतात समर्थ स्वतःला रामाचा दास म्हणून घेत असत. ही दास्यभक्ती. काही भक्त परमेश्वराला आपला पती समजून त्याची पत्नी भावाने आराधना करतात अशा प्रकारच्या भक्तीला मधुरा भक्ती असे म्हटले जाते. काही भक्त परमेश्वराला आपली आई मानून त्याची भक्ती करतात. ही वात्सल्य भक्ती. तर काही परमेश्वराला आपला मित्र किंवा सखा मानून त्याची भक्ती करतात. ही झाली सख्ख्य भक्ती. असे भक्तीचे म्हणजेच भावाचे विविध प्रकार आहेत. आपली भक्ती ज्या प्रकारची असेल तशा स्वरूपात परमेश्वर आपल्याला दर्शन देतो. त्या अनादी अनंत आणि निर्गुण निराकाराला कोणत्याही रूपात प्रकट होण्यासाठी अडचण नाही.

शेगावीचे महान संत श्री गजानन महाराज यांनी आपल्या भक्तांना वेगवेगळ्या स्वरूपात दर्शन दिले होते. कोणाला त्यांनी समर्थ रामदासांच्या रूपात दर्शन दिले तर कोणाला विठ्ठलाच्या रूपात. परमेश्वराने सुद्धा आपल्या भक्तांना त्यांच्या इच्छेप्रमाणे विविध रूपात दर्शन दिले आहे. अर्जुनाला तर त्याने विश्वरूप दर्शन सुद्धा घडवले. अडचण परमेश्वराकडून नाही. अडचण आपल्याकडून असते. आपल्या मनामध्ये तेवढा समर्पण भाव नसतो.

परमेश्वर कोणाचे रक्षण करतो या प्रश्नाचे उत्तर समर्थ श्लोकातील तिसऱ्या ओळीत देतात. ते म्हणतात, ” अनन्यास रक्षीतसे चापपाणी. ” अनन्य म्हणजे कोण हे समजून घेणे महत्त्वाचे आहे. एका परमेश्वराशिवाय आपल्याला दुसरा कोणताही आधार नाही, आश्रय नाही अशा प्रकारची भावना ज्याच्या मनामध्ये असते तो अनन्य भक्त ! अशा भक्तांचे तो धनुर्धारी राम रक्षण करतो.

आपली भक्ती ही सकाम भक्ती असते. आपण देवाची भक्ती केली म्हणजे देवाने आपले रक्षण करावे, आपल्याला सुख, समाधान, यश आणि ऐश्वर्य प्रदान करावे अशी आपली इच्छा असते. अर्थात त्यात फार काही चुकीचे आहे अशातला भाग नाही. परमेश्वर आपल्या संकटात जर धावून आला नाही तर आपली त्याच्यावरील श्रद्धा डळमळीत होते. मी एवढे देवाचे करतो परंतु काही उपयोग होत नाही असे आपण म्हणतो. परंतु याला परमेश्वराची अनन्यभावाने भक्ती म्हणता येणार नाही. मला इतर गोष्टी नाही मिळाल्यात तरी चालतील. मला फक्त परमेश्वर हवा आहे, त्याचे दर्शन हवे आहे अशा प्रकारची भावना जेव्हा आपल्या मनामध्ये तीव्रतेने निर्माण होईल तेव्हाच परमेश्वराचे दर्शन आपल्याला घडू शकेल. श्रीकृष्णाचा भक्त सुदामा आणि त्याची पत्नी श्रीकृष्णाचे अनन्य भक्त होते. त्यांच्यावर प्रपंचामध्ये अनेक संकटे आली, प्रचंड दारिद्र्य पाचवीला पुजले होते. मुलांना प्रसंगी उपाशी झोपावे लागत होते. परंतु परमेश्वरावरील त्यांची श्रद्धा कधीच डळमळीत झाली नाही. आपल्याला जे काही अन्न प्राप्त झाले असेल त्याच्यातीलच काही भाग बाजूला काढून ते परमेश्वराला अर्पण करत असत. आणि मगच स्वतः भोजन करीत. ही झाली अनन्यभक्ती. परमेश्वराने भलेही त्यांची परीक्षा पाहिली असेल परंतु अशा अनन्यभक्तांचे परमेश्वराने रक्षण केले आहे.

स्वसंवाद (नवीन) : 

१) माझी भक्ती कोणत्या प्रकारची आहे – दास्य, सख्य, वात्सल्य की मधुरा ? माझा नैसर्गिक भाव कोणता हे मी ओळखले आहे का ?

२) “जसा भाव तसा देव. ” माझ्या मनात परमेश्वराविषयी खरोखर कोणता भाव आहे ? दृढ श्रद्धा की केवळ भीती ?

३) सुदाम्याने दारिद्र्यातही आधी परमेश्वराचा वाटा काढला. तसा माझ्या जीवनात मी परमेश्वराला आधी प्राधान्य देतो का ?

४) “अनन्य” म्हणजे एकच आधार. माझ्या संकटात परमेश्वर हाच माझा खरा आधार आहे असे मला मनापासून वाटते का ? (क्रमशः)

– – – – – 

श्लोक क्र. ३६

सदा सर्वदा देव सन्निध आहे |

कृपाळूपणे अल्प धारिष्ट पाहे|

सुखानंद आनंद कैवल्यदानी |

नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी |३६|

अर्थ : परमेश्वर कायम आपल्याजवळच आहे. फक्त तो आपली परीक्षा आणि धैर्य पाहतो. सुख, आनंद आणि कैवल्य यांचा तो दाता आहे. असा हा परमेश्वर आपल्या भक्तांचा अभिमानी असून त्यांच्याकडे तो कधीही दुर्लक्ष करत नाही.

(सन्निध – समीप/जवळ, अल्प धारिष्ट – परीक्षा/कसोटी, कैवल्य – मोक्ष.)

विवेचन : आधीच्या श्लोकात समर्थ परमेश्वर आपल्या कोणत्या भक्तांचे रक्षण करतो ते आपल्याला सांगतात. तर या श्लोकात हा परमेश्वर कोठे आहे, त्याचा वास कोठे आहे हे ते आपल्याला सांगतात. ते म्हणतात सदा सर्वदा देव सन्निध आहे म्हणजे जवळच आहे. व्यवहारामध्ये आपण सन्निध या शब्दाचा अर्थ जवळ किंवा समी र असा घेतो परंतु अध्यात्मामध्ये सन्निध म्हणजे अंतर्यामी. त्या परमेश्वराला शोधायला दूर कुठेही जावे लागत नाही. त्याचा वास आपल्या अंतर्यामीच असतो. आणि तिथे तो सदा सर्वदा म्हणजे कायमस्वरूपी असतो. दुसऱ्या शब्दात सांगायचे झाले तर परमेश्वर आणि आपण वेगळे नाहीच आहोत.

असे जर आहे तर मग आपल्याला त्याचे अस्तित्व का जाणवत नाही ? आपली देहबुद्धी एवढी प्रबळ असते की त्यामुळे हा देह म्हणजे मी नाही आणि आपल्या अंतरात्म्यात त्याचा वास आहे हे आपल्याला जाणवतच नाही. सकाळी उठल्यानंतर आपण ” कराग्रे वसते लक्ष्मी, कर मध्ये सरस्वती, करमूले तू गोविंदम प्रभाते कर दर्शनम्” हा श्लोक म्हणतो त्याचा अर्थ हाच आहे. आपल्या अंतर्यामी परमेश्वर वसतो आहे.

आपल्याला त्याचे अस्तित्व जाणवत नाही परंतु साधकांना मात्र पदोपदी त्याच्या अस्तित्वाची जाणीव होते. आपण आपले मूळ स्वरूप विसरल्यामुळे आपल्याला त्याच्या अस्तित्वाची जाणीव होत नाही. परंतु तुकाराम महाराजांसारखे संत ईश्वर चिंतनातच रममाण झालेले असल्यामुळे त्यांना स्वतःचे असे वेगळे अस्तित्व नसते. परमेश्वर कायम आपल्याबरोबरच आहे याची जाणीव त्यांना होत असते. म्हणूनच ते म्हणतात, ” जेथे जातो तेथे तू माझा सांगाती |चालविशी हाती धरुनिया ||

परंतु परमेश्वराची अशी कृपा होण्याआधी तो आपली परीक्षा पाहतो. ही परीक्षा पाहण्यामागे आपल्या भक्ताला मानसिक दृष्ट्या खंबीर करावे, आपल्या कृपेसाठी पात्र करावे अशीच सध्या भगवंताची इच्छा असते. आई आपल्या मुलाला चालायला शिकवते. पण कधी कधी त्याचे धरलेले बोट सोडून देते. एखादेवेळी तो पडेल हे तिला माहिती असते. परंतु त्याला स्वतःला चालता यावे, तो स्वावलंबी व्हावा म्हणून ती हे करत असते. अनेक संतांनी सुद्धा आपल्या अनुयायांना अनुग्रह देण्यापूर्वी त्यांची परीक्षा पाहिली आहे. आपल्या कृपेसाठी आपला शिष्य पात्र आहे की नाही याची खात्री झाल्यानंतरच गुरु त्याच्यावर कृपा करतात. प्रत्यक्ष जीवनात सुद्धा यशस्वी होण्यासाठी आपल्याला नाना प्रकारच्या परीक्षा उत्तीर्ण व्हाव्या लागतात. पण ज्याला पुढे जायचे आहे तो अशा प्रकारच्या परीक्षांना, संकटांना न डगमगता सामोरा जातो.

तसेच भगवंताच्या एकनिष्ठ भक्ताचे आहे. “देह जावो अथवा राहो, पांडुरंगी दृढ भावो” अशी त्याची वृत्ती असते. खरा भक्त संकटप्रसंगी डगमगत नाही. परमेश्वरावरील त्याची श्रद्धा अविचल असते. परमेश्वराचा भक्त असलेल्या छोट्या प्रल्हादावर अनंत संकटे येतात. परंतु तरीदखील परमेश्वरावरील त्याची श्रद्धा ढळत नाही. मागील श्लोकात समर्थ आपल्याला जी अनन्यभक्ती सांगतात ती हीच !

अशी आपली त्याच्यावर संपूर्ण निष्ठा असली आणि त्याने घेतलेल्या परीक्षेत एकदा का आपण उत्तीर्ण झालो की मग त्याच्या कृपेचे जणू भांडारच खुले होते ! अनंत हस्ते कमलावराने देता किती घेशील दो कराने अशी भक्ताची अवस्था होते. सुख, समाधान, आनंद आणि कैवल्य म्हणजे मोक्षमार्गाचा दाता असलेला परमेश्वर आपल्याला या सर्व गोष्टी सहजच प्रदान करतो.

स्वसंवाद : 

१) “परमेश्वर अंतर्यामी आहे” हे मी जाणतो पण माझ्या दैनंदिन जीवनात मला त्याची प्रत्यक्ष जाणीव होते का ?

२) आईने बोट सोडले तरी ती दूर नसते. माझ्या संकटकाळात परमेश्वराबद्दल अशी भावना माझी असते का ?

३) परमेश्वर परीक्षा पाहतो हे मान्य आहे. माझ्या आयुष्यातील समस्यांकडे मी त्या दृष्टीने पाहतो का ?

४) “अनंत हस्ते” देणारा भगवंत आहे. मग मी त्याच्याकडे क्षुल्लक गोष्टींचीच मागणी करत राहतो का ? 

– क्रमशः श्लोक ३५ आणि ३६.

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ “समिधाच सख्या या!!” — रत्नावली – लेख क्र. ५ ☆ प्रा.भारती जोगी ☆

प्रा.भारती जोगी

? इंद्रधनुष्य ?

☆ “समिधाच सख्या या!!” — रत्नावली – लेख क्र. ५. ☆ प्रा.भारती जोगी ☆

(चित्र पुढील माहितीनुसार काल्पनिक.)

निसर्गाने रौद्र रूप धारण केलेले… भयंकर पाऊस सुरू… कालिंदी नदीला महापूर आलेला… आणि अशा या प्रतिकूल परिस्थितीत अर्ध्या रात्री एक तरूण पती माहेरी गेलेल्या पत्नीच्या आठवणीत विरहदग्ध, मिलनातूर, विकल मनाने वेड्यासारखा थेट पोचतो पत्नीच्या माहेरी, तिच्या पुढ्यात… सामोरा!! नदी पार करतांना काष्ट समजून एका मानवी शवाचा आधार घेत, भिंतीवर चढण्यासाठी दोर समजून सापाला धरून… बेभान अवस्थेत!! 

पत्नी चकीत होते… पण दुसऱ्याच क्षणी सत्य कळल्यावर, तिला आपल्या रूप आणि यौवनाचा धिक्कार करावासा वाटला. आणि तिच्या तोंडून उद्विग्न उद्गार बाहेर पडले…

लाज न लागत आपको, दौरे आहे साथ, 

धिक धिक ऐसे प्रेम को, कहा कहौ मैं नाथ !! 

आणि असा धिक्कार करत तिनं पुढे त्याला ही उन्मादावस्थेतून जागं केलं…

अस्थि चर्ममय देह, यांमे ऐसी प्रीती

जो होती रघुनाथ मंह, होती न तो भवभीती!! 

आपल्या पतीला हे असे खडे बोल सुनावणारी ही सुंदर रूप यौवना, युवती होती… रत्नावली!!! 

आणि तो युवक, तिचा पती होता… तुलसीदास उर्फ रामबोला!!! 

रत्नावली… सौंदर्य आणि बुद्धी दोन्हीं लेऊन आलेली एक धर्मपरायण युवती ! जी लावण्यम् अंतर्मन: ही होती. म्हणूनच तिने दाखवून दिले की, भारत देशातील नारी; तिने ठरवलं तर आपल्या पतीला युवावस्थेच्या उन्माद क्षणांमधून ईश्वर भक्तीकडे उन्मुख करण्यास सक्षम असते.

रत्नावली चे हे शब्द तुलसीदास ने ऐकले आणि त्याच्या मनावरील उन्माद, मोह, भ्रांती या सगळ्याचा पडदा दूर झाला. पूर्वजन्मीचे संस्कार प्रदिप्त झाले. आणि आता डोळ्यांसमोर श्रीरामाचे मंगलकारी शुभ रूप, संपूर्ण सौंदर्यासहीत दृग्गोचर झाले. आणि तो निघाला विरक्ती च्या वाटेवर, संन्यस्त वृत्ती ने, प्रभु रामचंद्र च्या कृपादृष्टी च्या लाभासाठी! 

रत्नावली जिने दाखवून दिलं की, प्रेम जेव्हा ईश्वरा प्रती नेणारे असते तेव्हा ते एक गहन परिवर्तन, एक उच्चतम आव्हान स्वीकारायला तयार असते. आणि म्हणूनच समर्पित जीवन स्वीकारायला ही तयार असते.

रत्नावली ने एक चैतन्य तुलसीदास च्या मनात चेतविले. त्याच्या चेतनेला जागवलं… आणि तुलसीदास ला ही… या… समिधेच्या शब्दस्पर्शातलं स्फुल्लिंग जाणवलं! त्याला कळलं… हाच तो क्षण! हीच ती वेळ!!! काम कडून राम कडे जाणाऱ्या भक्ती मार्गावरील जीवनयात्रा सुरू करण्याची!! तुलसीदास पुन्हा वळून न पाहण्यासाठी, निघून गेला त्या वाटेला! एक गृहस्थ, संन्यासी झाला.

त्याच्या हातून रामचरितमानस या महान ग्रंथाचं, आणि अशाच अनेक ग्रंथांचे सृजन झालं. घरा-घरात राम भजन निनादलं! तुलसीदास संत तुलसीदास पदाला पोहोचला.

पण… या सगळ्यात सगळ्यांनाच विसर पडला त्या पहिलं चैतन्य स्फुल्लिंग चेतवणा-या समिधेचा! रत्नावली ख-या अर्थाने गुरू ठरली तुलसीदास ला योग्य मार्गदर्शन करणारी, त्याला राम भेटवणारा योग्य मार्ग दाखवणारी! किती महान स्त्री म्हणावी ती… जिच्या हृदयात अगाध भक्ती भाव तर होताच, पण पतीवर ही प्रगाढ प्रेम होतं! म्हणूनच तर तिच्या दिव्य दृष्टीला आपल्या पतीचं दिव्यत्व जाणवलं ना! 

हे विसरून कसं चालेल की…

रत्ना नसती तर तुलसीदास सारखं रत्न झालंच नसतं, आणि तुलसीदासला ही राम रतन धन प्राप्त झालंच नसतं! 

रत्नावली ने दाखवून दिलं की, खरं प्रेम तेच, जे ईश्वरा जवळ घेऊन जाते. 

रत्नावली चं एकाकी जीवन स्विकारण्याचं पेललेलं आव्हान उपेक्षून नाहीच ना चालणार!! 

शेवटी तीसुद्धा एक स्त्री च होती. तिला ही वाटलंच असेल ना, की पतीने प्रपंच आणि परमार्थ दोन्ही साधून जीवन आपल्याबरोबर व्यतीत करावे!! तो असा कायमचा त्यागून निघून जाईल, हा तिच्या साठी धक्काच होता. एक आव्हान तिने पेरलं पतीच्या मनात, तर एक आव्हान तिच्या ही वाट्याला आलंच पेलण्यासाठी! एकाकी जीवन, आजीवन जगण्याचं! 

मग रत्नावली ने आपलं एकटेपणाचं दु:ख, ती बोचणारी सल, ती विरह व्याकुळ, झुरणा-या मनाची विकल अवस्था तिने… अनेक, असंख्य दोह्यांत, झरझर वाहणा-या अश्रूंच्या साक्षीने प्रतिबिंबित केली. वियोगाचं दु:ख स्पष्ट दिसतं त्यांत!! इतकंच नाही तर, रत्नावली च्या ज्ञानाचं, विद्वत्तेचे ही प्रतिबिंब दिसतं त्यात! तिचे दोहे, त्यांची भाषा आणि त्यांतील भाव हे दोन्ही उच्च कोटीचे आहेत. काही ठिकाणी तर तुलसीदास पेक्षाही उत्कृष्ट आहे, सरस आहे ती! पण तिची ही काव्यप्रतिभा उपेक्षितच राहिली. मुळात प्रत्येक यशस्वी पुरुषामागे खंबीरपणे, ठामपणे उभी राहणा-या स्त्री चा त्याग, समर्पण, एकाकीपण, तिचं मोठेपण… नेहमीच अलक्षित, उपेक्षित, दुर्लक्षित राहतं! 

तीच उपेक्षा रत्नावली च्या ही वाट्याला आली.

पण हे विसरून चालणार नाही की…

रत्नावली ने पतीला धिक्कारले नसते तर रामबोलागोस्वामी तुलसीदास कसा बरं झाला असता?? 

 पतीच्या मनात रामभक्तीचं स्फुल्लिंग चेतवणारी, चैतन्य जागवणारी, तेजोमयी समिधा च ना ही रत्नावली!! 

रत्ना अगर ना होती तो तुलसी जैसा रतन नहीं होता!

– लेख क्र. ५.

© प्रा.भारती जोगी

पुणे.

 फोन नंबर..९४२३९४१०२४.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३१२ ☆ मैत्र… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३१२ ?

☆ मैत्र… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

हे तुझे दुटप्पी वागणे नव्हे बरे

सूज्ञ तू तुला समजावणे नव्हे बरे 

 *

बेगडी तुझे सारे विचार साजणी

नेहमीच संधी साधणे नव्हे बरे

 *

वागणे तुझे वा-यापरीच स्वैरसे

स्वार्थ सोहळे जोपासणे नव्हे बरे

 *

शब्द शस्त्र आहे लागता मनावरी

डंख नित्य सकळा मारणे नव्हे बरे

 *

जर नसे जिवाला शांतता “प्रभा” तिथे

मैत्र हे असे सांभाळणे नव्हे बरे

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – २२ ☆ सौ.मंजिरी येडूरकर ☆

श्री मंजिरी येडूरकर

? इंद्रधनुष्य ?

☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – २२ ☆ श्री मंजिरी येडूरकर ☆

श्री रविंद्रनाथ टागोर

जवळजवळ १६५ वर्षांपूर्वी कोलकत्ता जवळच्या ‘जोरासांको’ येथील ठाकूर घराण्याच्या महाल सदृश घरात ७ मे १८४१ रोजी रविंद्रनाथांचा जन्म झाला. वडील महर्षी देवेंद्रनाथ व आई शारदा देवी यांचं ते चौदावं अपत्य होते. साहजिकच त्यांना आईचा सहवास फार वर्षे लाभला नाही. वडील पण सतत प्रवासांत असत. ऋषीतुल्य व्यक्तिमत्वाचे देवेंद्रनाथ वरचेवर हिमालयात भटकंती करत, तिथे जाऊन रहात, त्यामुळे त्यांचा सहवास देखील फारसा मिळायचा नाही. पण जेंव्हा रविंद्र उर्फ ‘रोबी’ ने शाळे विषयीच्या तक्रारी त्यांना सांगितल्या तेंव्हा त्यांना फार वाईट वाटले व त्यांनी रोबीला शाळेतून काढले ते कायमचेच.

घरीच वडील त्यांना शिकवू लागले. प्रवासात ते रोबीला आपल्या सोबत घेऊन जाऊ लागले. तिथे निसर्गाच्या सानिध्यात शाळेत न मिळणारं, पण बौद्धिक व भावनिक जग समृद्ध करणारे शिक्षण सहज बोलता बोलता रोबीला मिळू लागलं. वडिलांबरोबर केलेला प्रवास, हिमालयातील भटकंती, निसर्गाकडून व वडिलांकडून मिळालेलं ज्ञान हा रविन्द्रनाथ यांच्या जीवनातला सुवर्णकाळ होता. याच काळात या शाळा सोडून दिलेल्या तथाकथित अज्ञानी मुलाचं रूपांतर एका सुसंस्कृत मुलात झालं. (The ugly duckling was transformed into an admired swan) ही शिदोरी त्यांना नोबेल पुरस्कारा पर्यंत घेऊन गेली व शिक्षणपद्धतीचा कायापालट करणाऱ्या शिक्षणमहर्षी या पदवीपर्यंत घेऊन गेली. पूर्ण भारताने नाही तर जगाने त्यांना कलाक्षेत्र, शिक्षणक्षेत्र, समाजसुधारणेचं क्षेत्र, तत्वज्ञानाचे क्षेत्र अशा अनेक क्षेत्रांतील गुरुपद बहाल केलं व गुरुदेव या पदवीने सन्मानित केलं. कोणतेही समाजमान्य पारंपारिक शिक्षण न घेतलेला, कोणत्याही विद्यापीठाची कसलीही पदवी गाठीशी नसलेला हा माणूस शिक्षणक्षेत्रात ‘न भूतो न भविष्यति’ असा प्रयोग यशस्वीपणे करून दाखवतो ही गोष्ट अचंबित करणारी आहे.

त्यांच्या मनात शाळेविषयी तिरस्कार निर्माण करणाऱ्या, त्या काळी सर्वसंमत असणाऱ्या, मुलांना शारीरिक क्लेश देणाऱ्या, अपमानास्पद शिक्षा करणाऱ्या पद्धतीचे जगाने खरंतर आभारच मानायला हवेत कारण त्यामुळेच रविंद्रनाथांनी शाळा सोडली. वडिलांकडून, निसर्गाकडून, पुस्तकां कडून ज्ञान मिळवून ते संवेदनशील विचारवंत, हरहुन्नरी कलाकार बनले.

रविंद्रनाथांनी लहानपणीच तीन तीन क्रांतीकारी चळवळी खूप जवळून पाहिल्या, अनुभवल्या. एक म्हणजे राजा राममोहन रॉय यांची धार्मिक पुनरुत्थानाची चळवळ, ज्यातून ब्राह्मो

समाजाची निर्मिती झाली. दुसरी म्हणजे बंकिमचंद्र चटर्जी यांनी चालू केलेली साहित्यिक चळवळ, ज्यामुळे भारतीय, वाङ्मयीन विश्व खडबडून जागे झाले. आणि तिसरी राजकीय चळवळ ‘Indian National movement’, जी राजकीय व सांस्कृतिक दडपशाहीचा निषेध करत होती. या तीनही चळवळींत टागोर कुटुंबियांचा सक्रिय सहभाग होता व त्यामुळे बालपणी व तरुणपणी रविंद्रनाथांनी या सर्व हालचाली खूप जवळून पाहिल्या होत्या.

पौर्वात्य व पाश्चिमात्य दोन्ही संस्कृतीतील चांगल्या गोष्टी एकत्र आणून संघर्षाशिवाय मानवजातीच्या कल्याणासाठी काम करावं अशी भावना कदाचित या तिन्ही चळवळींचा त्यांच्या कोवळ्या मनावर झालेल्या परिणामाचा परिपाक असावा.

वयात बरंच अंतर असूनही वडीलबंधू सत्येंद्रनाथांबरोबर रविंद्रनाथांचे वडिलांप्रमाणेच मित्रत्वाचे संबंध होते. आय ए एस असलेल्या सत्येंद्रनाथांच्या देशातील निरनिराळ्या शहरांत बदल्या व्हायच्या पण तिकडे जाऊन रोबी त्यांच्याबरोबर रहात, वेद, उपनिषदे, संत वाङ्मय यांचे वाचन करीत व त्यांच्याबरोबर चर्चा करून आपल्या ज्ञान कक्षा विस्तारित असत.

‘रोबी’ या आपल्या आत्मकथनपर पुस्तकात त्यांनी म्हटलय की, ” ज्या देवाचा व प्रेमाचा माझ्या सर्व साहित्यात संदर्भ आला आहे तो या जीवनाचा देव (God of life) आहे व ते प्रेम जीवनावरील प्रेम आहे. ” त्यांच्या शब्दांतून उमटणारे दैवी सूर, धर्म, भाषा, देश अशा सर्व सीमा लांघून सर्व विश्वात घुमले. आपल्या एका कवितेत ते स्वतःलाच सांगतात, “Move out of yourself, stand out in the open, you will hear the music of the universe in your heart. “

—–

☆ गीत : ६४ ☆

ON the slope of the desolate river among tall grasses I asked her, “Maiden, where do 

you go shading your lamp with your mantle? My house is all dark and lonesome ⎯ lend 

me your light! ” She raised her dark eyes for a moment and looked at my face through 

the dusk. “I have come to the river, ” she said, “to float my lamp on the stream when the 

daylight wanes in the west. ” I stood alone among tall grasses and watched the timid 

flame of her lamp uselessly drifting in the tide.

In the silence of gathering night I asked her, “Maiden, your lights are all lit ⎯ then where do you go with your lamp? My house is all dark and lonesome, ⎯ lend me your light. ” 

She raised her dark eyes on my face and stood for a moment doubtful. “I have come, ” she said at last, “to dedicate my lamp to the sky. ” I stood and watched her light 

uselessly burning in the void.

In the moonless gloom of midnight I asked her, “Maiden, what is your quest holding the 

lamp near your heart? My house is all dark and lonesome, ⎯ lend me your light. ” She 

stopped for a minute and thought and gazed at my face in the dark. “I have brought my light, ” she said, “to join the carnival of lamps. ” I stood and watched her little lamp uselessly lost among lights.

—–

☆ मराठी भावानुवाद : गीत :६४ ☆

नदीच्या उतरणीला उभा मी असताना,

मज दिसली ती, झाकुनि एक दीप नेताना

 

निघालीस कोठे हा दीप 

तुझा घेउनि?

देशील कां, घर माझे

आले अंधारुनि?

 

डोळे मोठ्ठे करूनि क्षण

मजकडे पाही

म्हणे मावळतीला सोडेन नदी प्रवाही

 

भित्री ज्योत थरथरुनि

वहातच गेली 

निशेच्या तमी पुन्हा दिवा घेउनि दिसली 

 

आता तरी देशील कां,

घर माझे उजळण्या?

म्हणे दिवा हा आणिला

नभासि अर्पिण्या

 

अवकाश पोकळीत दीप व्यर्थ तेवला

गडद रात्री, आली फिरुनि,

दीप छातीशी धरिला 

 

पुन्हा मी पुसले, टक लावुनि, पहात म्हणते

आनंदोत्सव असे दिव्यांचा, त्याचसाठी नेते

 

अनंत दिवे, ध्येय रहित, तेवती प्रकाशात

ती अन् तिचा दीप दोन्ही हरवले गर्दीत

 

भक्तीचा दीप न मिळे, असा आयता कोणास

ज्याचा त्याने तो ठेवावा चेतवुनि हृदयास

 

भावानुवाद ©️ मंजिरी येडूरकर 

संपर्क: ९४२१०९६६११

—–

☆ गीत : ६५ ☆

WHAT divine drink wouldst thou have, my God, from this overflowing cup of my life?

My poet, is it thy delight to see thy creation through my eyes and to stand at the portals 

of my ears silently to listen to thine own eternal harmony?

Thy world is weaving words in my mind and thy joy is adding music to them. Thou givest 

thyself to me in love and then feelest thine own entire sweetness in me.

—–

☆ मराठी भावानुवाद : गीत: ६५ ☆

*

भरुनी वाहतो देवा

सुखी जीवनाचा ठेवा

*
तूच दिले मज हे जीवन

विविध रसांनी नटवून

*

कोणता रस तुजला

अर्पू मी न कळे मला

*

तूच निर्मिलेले जग 

मम नेत्री पाहशील का?

संगीत तूच निर्मिलेले

मम श्रोत्री ऐकशील का?

*

विश्व तुझेच मम हृदयी

गोफ विणे शब्दमयी

*

अलौकिक तव आलापी

सुखदायक हो भवतापी

*

बली सम तू दाता असशी

मम चेतसी तुलाच देशी

*

तव माधुरी मी हृदयी धरी

तव हृदयांगण जी तृप्त करी

भावानुवाद ©️ मंजिरी येडूरकर

संपर्क: ९४२१०९६६११

—–

☆ गीत ६६ ☆

SHE who ever had remained in the depth of my being, in the twilight of gleams and of glimpses; she who never opened her veils in the morning light, will be my last gift to thee, my God, folded in my final song.

Words have wooed yet failed to win her; persuasion has stretched to her its eager arms in vain.

I have roamed from country to country keeping her in the core of my heart, and around her have risen and fallen the growth and decay of my life.

Over my thoughts and actions, my slumbers and dreams, she reigned yet dwelled alone and apart.

Many a man knocked at my door and asked for her and turned away in despair.

There was none in the world who ever saw her face to face, and she remained in her 

loneliness waiting for thy recognition.

—–

☆ मराठी भावानुवाद : गीत: ६६ ☆

*

जी अंतरात माझ्या, ती संधीप्रकाश किरणात

कुणी न तिज पाहिले, दिवसाच्या प्रकाशात

*

प्रेमयाचना शब्दांची, फोल तिला जिंकण्यास 

प्रयत्न निष्फळ होत, तिचे मन वळविण्यास

*

देशोदेशी फिरलो, हृदयात तिज स्थापुनि

आयुष्याचे चढउतार, भोवती तिच्या गुंफुनि

*

अनन्य भक्ती तुजप्रती, हृदयी येई उमलुनि

मार्ग चाललो, जो दिला तिनेच मला दावुनि 

*

सत्ता तिचीच, मम स्वप्न, विचार वा कृती

निराश झाले, ज्यांना ती मागून हवी होती

*

वाट पाहते, तव मान्यतेची, एकटीच राहुनि

अर्पण करी, तिज देवा, अखेरच्या गीतातुनि

*

– क्रमशः भाग २२..

मूळ इंग्लिश काव्य : श्री. रविंद्रनाथ टागोर.

भावानुवाद : कवयित्री : © सौ.मंजिरी येडूरकर

लेखिका व कवयित्री, मो – 9421096611

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १४६ – बुन्देली कविता – ”सज्जन, गुनी, रहीस लगत है” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – सज्जन, गुनी, रहीस लगत है।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १४६ ☆

☆  बुन्देली कविता – सज्जन, गुनी, रहीस लगत है ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

सज्जन, गुनी, रहीस लगत है

कड़ बच्चों की फीस भरत है

कोट कचहरी के बाहर बो

अजी लिखत, नबीस लगत है

 *

दोनऊँ पहलमान एकई से

कौनउ नई ऊरीस लगत है

 *

बो काये गुमसुम बैठो है

चुभ रउ कौनउ टीस लगत है

 *

अंड-गंड बातों में नइयाँ

सदा निपोत खबीस लगत है

 *

बार और नाखून बड़े हैं

भिनकत रति खबीस लगत है

 *

भगवत’ सबहें देखन भर के

इन सब में बो बीस लगत है

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २०१ ☆ “आपकी अरु” – लेखिका… अर्चना नायडू ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है डॉ. सुलभा कोरे जी द्वारा लिखित  शिव और शिवालय – ज्ञात से अज्ञात तक…पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २०१ ☆

☆ “आपकी अरु” – लेखिका… अर्चना नायडू ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक चर्चा

कृति : आपकी अरु

कहानी संग्रह

प्रकाशक इंडिया नेट बुक्स , नोएडा

लेखिका : अर्चना नायडू

☆ स्त्री मन की परतों को लिपि बद्ध करती कहानियाँ  – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

ई. अर्चना नायडू जी द्वारा रचित कहानी संग्रह ‘आपकी अरु’ समकालीन हिंदी साहित्य में एक ताजीऔर मानवीय संवेदनाओं से भरपूर कृति है।

​यह संग्रह वर्तमान परिवेश की स्त्री विमर्श लेखन केंद्रित जीवंत समस्याओं और मानवीय रिश्तों के सूक्ष्म जालों को बड़ी ही कुशलता से बुनता है। पुस्तक की अनूठी विशेषता इसकी केंद्रीय पात्र ‘अरु’ है। लेखिका ने एक ही नाम के माध्यम से स्त्री के विभिन्न आयु वर्गों किशोरी, युवती, और प्रौढ़ा, की मानसिक अवस्थाओं और उनके संघर्षों का प्रभावी चित्रण किया है। एक तरह से उपन्यास ही है आपकी अरु । अरु के बिंब तथा परिवेश में हम आप और पाठिकाएं स्वयं के ही कई स्वरूप देख समझ सकते हैं । यह किताब महीने से ज्यादा मेरी तकिया के निकट टेबल पर अपनी स्थिति बदलती रही है।इसकी कहानियों में मध्यमवर्गीय परिवारों के संस्कार, आधुनिकता का द्वंद्व और टूटते-जुड़ते रिश्तों की कसक दिखाई देती है। अर्चना जी का लेखन ‘मालती जोशी’ जी की परंपरा को आगे बढ़ाता हुआ प्रतीत होता है, जहाँ सादगी ही सबसे बड़ा अलंकार है।

​’लिव-इन रिलेशनशिप’,   कहानी में लेखिका ने इस आधुनिक मुद्दे को पारिवारिक दृष्टिकोण से देखा है। जब अरु को पता चलता है कि उसका बेटा आदित्य और सौम्या एक साथ रहते हैं, तो वह क्रोध करने के बजाय समझदारी और सहजता दिखाती है। वह सौम्या से कहती है “तुमने बिरला मंदिर नहीं देखा है न, चलो हम परसों चलते हैं… हम मंदिर में ही तुम दोनों की इंगेजमेंट कर देते हैं। क्यों ठीक है न मेरी बहू रानी!”, यह संवाद पीढ़ीगत अंतराल को सहानुभूति से पाटने का सुंदर उदाहरण है।

इसी प्रकार ​’पुनर्मिलन बनाम रीयूनियन’ कहानी दबी हुई प्रेम भावना और वर्तमान कर्तव्य के बीच के संतुलन को दर्शाती है। कॉलेज के पुराने साथी ऋषि कुमार से मिलने पर अरु के मन में उद्वेलन होता है, लेकिन वह एक आदर्श भारतीय स्त्री की तरह अपनी भावनाओं को अनुशासित रखती है। अंत में वह  कंधे पर सिर रखकर मौन स्वीकृति देती है, जो भारतीय समाज की ‘प्रेम को दबाकर जीने वाली स्त्री’ के यथार्थ को स्पष्ट करता है।

​’आपकी अरु’ (शीर्षक कहानी) , कहानी पिता-पुत्री के निश्छल प्रेम और कर्तव्यपरायणता पर आधारित है। पिता की मृत्यु के शोक के बीच भी अरु अपनी परीक्षा देने जाती है क्योंकि उसके भाई ने कहा था, “अगर अरु यह एग्जाम देगी तो यह पापा के लिए अंतिम श्रद्धांजलि होगी”। अरु तनाव में भी अपनी जिम्मेदारी पूरी करती है, जो उसके चरित्र की दृढ़ता को रेखांकित करता है।

​कहानी लेखन का आर्ट इन कहानियों में परिलक्षित होता है। अर्चना नायडू की शैली सरल, सुबोध और प्रवाहमयी है। उनके वाक्य छोटे और स्पष्ट हैं, जो पाठक को पात्रों के साथ सीधे संवाद का अनुभव कराते हैं। उन्होंने ‘यथार्थ’ को बिना किसी लाग-लपेट के प्रस्तुत किया है। भाषा में एक सहज लय है,  जो कहानी को पानी की धार की तरह बहने में मदद करती है। उनके पास समृद्ध शब्द भंडार तथा अभिव्यक्ति की क्षमताएं हैं।

​ इन कहानियों का मुख्य उद्देश्य समाज में व्याप्त विरोधाभासों और विडंबनाओं को दूर कर एक सकारात्मक राह दिखाना है। लेखिका का लक्ष्य केवल समस्या बताना नहीं, बल्कि ‘व्यक्ति को व्यक्ति से जोड़ना’ और खत्म होते जा रहे मानवीय मूल्यों को बचाना है। ये कहानियाँ एक बेहतर मनुष्य बनने की मर्मस्पर्शी शिक्षा देती हैं।

​’आपकी अरु’ केवल कहानियों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह बदलते हुए समाज का दर्पण है। जिस सहजता से अर्चना नायडू जी ने स्त्री मन की परतों को लिपि बद्ध किया है, वह आने वाले समय में निश्चित ही उन्हें कथा-साहित्य के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाएगा। भविष्य में यह पुस्तक उन पाठकों के लिए एक मार्गदर्शिका सिद्ध होगी जो आधुनिकता की चकाचौंध में भी अपनी जड़ों और संस्कारों की मिठास को जीवित रखना चाहते हैं। इस लेखन में मानवता को जोड़ने की जो प्रबल संभावना है, वह निसंदेह इसे एक दीर्घजीवी कृति बनाती है। मेरी अशेष मंगल कामनाएं अर्चना जी के इस सारस्वत प्रयास के साथ हैं। इंडिया नेट बुक्स से डॉ संजीव कुमार चुनिंदा साहित्य प्रकाशित कर रहे हैं, उन्हें भी बधाई।

पुस्तक अमेजन पर सुलभ है, खरीदकर पढ़ने लायक है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

सेवा निवृत मुख्य अभियंता विद्युत मंडल

स्वतंत्र लेखक ,आलोचक

ई अभिव्यक्ति के हिंदी संपादक.

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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