(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में अवश्य मिली है किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘दुख में सुख‘। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # १६५ ☆
☆ लघुकथा – दुख में सुख ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆
गर्मी की छुट्टियों में मायके गयी तो देखा कि माँ थोड़ी ही देर पहले कही बात भूल रही है। अलमारी की चाभी और रुपए पैसे रखकर भूलना तो आम बात हो गयी। कई बार वह खुद ही झुंझलाकर कह उठती— ‘पता नहीं क्या हो गया है ? कुछ याद ही नहीं रहता- कहाँ- क्या रख दिया ?’ झुकी पीठ के साथ वह दिन भर काम में लगी रहती। सुबह की एक चाय ही बस आराम से पीना चाहती। उसके बाद घर के कामों का जो सिलसिला शुरू होता वह रात ग्यारह बजे तक चलता रहता। रात में सोती तो बिस्तर पर लेटते ही झुकी पीठ में टीस उठती।
माँ की पीठ अब पहले से भी अधिक झुक गयी थी पर बेटियों के मायके आने पर वह सब कुछ भूलकर और तेजी से काम में जुट जाती। उसे चिंता रहती कि मायके से अच्छी यादें लेकर ही जाएं बेटियां। माहौल खुशनुमा बनाने के लिए वह हँसती-गुनगुनाती, नाती-नातिन के साथ खेलती, खिलखिलाती…?
गर्मी की रात, थकी-हारी माँ नाती – पोतों से घिरी छत पर लेटी है। इलाहाबाद की गर्मी, हवा का नाम नहीं। वह बच्चों से जोर-जोर से बुलवा रही है- ‘चिडिया, कौआ, तोता सब उड़ो, उड़ो, उड़ो, हवा चलो, चलो, चलो,’ बच्चे चिल्ला- चिल्लाकर बोलने लगे, उनके लिए यह अच्छा खेल था।
माँ उनींदे स्वर में बोली – ‘बेटी, जब से थोड़ा भूलने लगी हूँ, मन बड़ा शांत है। किसी की तीखी बात थोड़ी देर असर करती है फिर किसने क्या ताना मारा… कुछ याद नहीं। हम औरतों के लिए बहुत जरूरी है यह।’ ठंडी हवा चलने लगी थी। माँ कब सो गयी पता ही नहीं चला। चाँदनी उसके चेहरे पर पसर गयी।
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “गणेश चतुर्थी — दूर्वा पूजन…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
गणपति बप्पा को हम बुद्धि, विवेक और मंगल के देवता मानते हैं। दूर्वा उन्हें प्रिय है और दूर्वा स्वयं प्रकृति की उस सहज हरियाली का प्रतीक है, जो बिना किसी आडंबर के धरती को जीवन और सौंदर्य प्रदान करती है। फिर क्यों न इस बार गणेश आराधना के साथ प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी का संकल्प भी लिया जाए?
गणेश उत्सव केवल पूजा, आराधना और सजावट का पर्व नहीं, बल्कि नई शुरुआत का उत्सव भी है तो क्यों न इस नई शुरुआत में एक पौधा लगाया जाए, उसके संरक्षण का संकल्प लिया जाए और अपने आसपास की हरियाली को थोड़ा और बढ़ाया जाए?
एक गणेश जी के नाम एक पौधा…
एक पौधे के नाम एक जिम्मेदारी…
और हर घर के नाम थोड़ी-सी हरियाली।
गणेश जी की पूजा में दूर्वा अर्पित करते समय हम यह भी स्मरण करें कि प्रकृति हमारे जीवन का अभिन्न अंग है। सजावट में फूल-पत्तियों और अन्य प्राकृतिक सामग्री का उपयोग करें तथा प्लास्टिक और अनावश्यक कचरे से बचें। गणेश प्रतिमा के विसर्जन में भी पर्यावरण की संवेदनशीलता का ध्यान रखें। संभव हो तो मिट्टी की प्रतिमा और घर पर सुरक्षित विसर्जन जैसे पर्यावरण-अनुकूल विकल्प अपनाएँ।
क्योंकि विघ्नहर्ता गणेश जी की आराधना करते हुए हम प्रकृति के लिए स्वयं कोई नया विघ्न क्यों उत्पन्न करें?
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी ” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४३१ ☆
आलेख – #लंदन_डायरी – जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
लंदन के Natural History Museum में आज एक ऐसी आकृति के सामने खड़ा था, जिसे देखकर विज्ञान कुछ और कहता है और मन कुछ और।
काँच के भीतर रखी सफेद, लहरदार संरचना को पहली नजर में देखा तो लगा, यह तो मेरे गणेश जी हैं! गोल-सा उदर, उभरती हुई मुखाकृति, सूँड़ जैसा आकार और दोनों ओर कानों का-सा विस्तार। किसी कुशल शिल्पकार ने मानो श्वेत पत्थर में गजानन को उतार दिया हो।
लेकिन यह किसी मूर्तिकार की बनाई प्रतिमा नहीं है। संग्रहालय इसे Gogotte कहता है, प्राकृतिक रूप से बनी एक विचित्र बलुआ-पत्थर संरचना। यह Lasting Impressions Gallery में प्रदर्शित है, जहाँ संग्रहालय पृथ्वी के अतीत की ऐसी प्राकृतिक वस्तुओं को प्रस्तुत करता है।
संग्रहालय स्वयं Gogotte को लगभग एक “solidified sandstone sculpture” जैसा बताता है। यह नमूना 2017 में संग्रहालय को सर डेविड एटनबरो के 90वें जन्मदिन के सम्मान में दिया गया था।
विज्ञान उसकी रचना की प्रक्रिया समझाता है। मेरी आँखें उसमें गणेश खोज लेती हैं।
यही भारतीय दृष्टि का सौंदर्य है। “जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।” गणेश को देखने के लिए हमेशा किसी मंदिर में स्थापित प्रतिमा की आवश्यकता नहीं। भारत में किसी वृक्ष के तने की आकृति में वे दिखाई दे जाते हैं, किसी अनगढ़ पत्थर में सूँड़ उभर आती है और किसी चट्टान का प्राकृतिक उभार गजानन का आभास देने लगता है।
गणेश स्वयं प्रकृति और कल्पना के बीच एक सहज सेतु बना देते हैं।
वे हमारे मन में बसते हैं।
मूर्तिकार मिट्टी से गणेश गढ़ता है।
भक्त पत्थर में गणेश देख लेता है।
और कभी-कभी प्रकृति ऐसी आकृति बना देती है कि दोनों के बीच का अंतर ही मिट जाता है।
लंदन में गणेश की यह कहानी यहीं समाप्त नहीं होती।
कुछ दूरी पर British Museum के संग्रह में भारत से आई गणेश की अनेक प्राचीन प्रतिमाएँ हैं।
ओडिशा की 12वीं शताब्दी की एक बलुआ-पत्थर प्रतिमा में गणेश चार भुजाओं के साथ कमल पर खड़े हैं और उनके पास उनका वाहन मूषक भी अंकित है। दूसरी, 13वीं शताब्दी की प्रतिमा में गणेश लक्ष्मी के साथ विराजमान हैं। यह पंचमुखी गणेश का अत्यंत विशिष्ट रूप है।
एक और 13वीं शताब्दी की गणेश प्रतिमा, जिसे British Museum ने Figure of Ganesha के रूप में दर्ज किया है, कभी लंदन के Horniman Museum और Brent Museum की Celebrating Ganesha प्रदर्शनियों में भी दिखाई गई थी। यानी लंदन में गणेश केवल किसी प्रवासी समुदाय की धार्मिक आस्था का हिस्सा मात्र नहीं हैं। भारतीय कला के इतिहास और वैश्विक संग्रहालय संस्कृति में भी उनकी अपनी जगह है।
Wimbledon में Shree Ghanapathy Temple है। इसकी कहानी तो जैसे लंदन में गणेश की जीवंत यात्रा है। 1979 में कुछ श्रीलंकाई हिंदू परिवार एक स्थानीय सभागार में गणेश की एक प्रतिमा के साथ नियमित पूजा के लिए जुटने लगे। वही प्रतिमा आज मंदिर की Utsavar Ghanapathy मानी जाती है। 1981 में पुराने Presbyterian Church भवन को रूपांतरित करके मंदिर का महाकुंभाभिषेक हुआ। मंदिर अपने इतिहास में इसे यूरोप का पहला पूर्णतः हिंदू मंदिर बताता है।
यह रोचक है कि पुराने चर्च में अब मंदिर है। इसी तरह पिछले दिनों मैने हैरो में आयोजित कवि गोष्ठी का उल्लेख अपनी डायरी में किया था , वह आयोजन स्थल भी मंदिर है, जो पहले चर्च ही था।
Tejendra Sharma
इस समय तो लंदन में गणेशोत्सव का वातावरण भी है। London Ganesh Utsava Samithi ने 14 से 26 सितंबर 2026 तक प्रतिदिन गणेश पूजा, विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों और 26 सितंबर को विसर्जन का कार्यक्रम घोषित किया है।
इस तरह एक ही शहर में गणेश के कितने रूप दिखाई देते हैं।
कहीं वे प्रकृति की अनायास रचना हैं।
कहीं सदियों पुराने भारतीय शिल्प में सुरक्षित हैं।
कहीं वे प्रवासी समुदाय की स्मृतियों और आस्था के साथ जीवित हैं।
और संग्रहालय में खड़े हुए मेरे भारतीय मन को अचानक फ्रांस से आए पत्थर में वे परिचित स्वरूप में दर्शन देते हैं।
मुझे आज Natural History Museum की इस Gogotte ने यही सोचने को विवश किया कि शायद आस्था केवल पूजा का विषय नहीं, दृष्टि का भी विषय है।
भूविज्ञानी उस आकृति में पृथ्वी का इतिहास पढ़ता है।कलाकार उसकी आकृतियों में सौंदर्य देखता है।
और भक्त उसमें गणेश दर्शन करता है।
कौन सही है?
शायद प्रश्न ही गलत है।
हर दृष्टि अपने अनुभव का अर्थ लेकर आती है। विज्ञान हमें बताता है कि यह आकृति कैसे बनी। आस्था हमें बताती है कि उसे देखकर हमारे भीतर क्या जागा।
फ्रांस की धरती पर करोड़ों वर्ष पहले बनी इस प्राकृतिक संरचना को लंदन में देखकर मेरे भीतर गणेश जागे।
और मन में यही आया—
गणेश शायद केवल मंदिर में विराजते देवता नहीं हैं। वे उस क्षण में भी हैं, जब हमारी दृष्टि किसी अनगढ़ वस्तु में अर्थ, सौंदर्य और मंगल का आकार पहचान लेती है।
आज मैंने गणेश जी को लंदन में खोजा नहीं।एक प्राकृतिक पत्थर ने मुझे उन्हें दिखा दिया।
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “मेरा साया” ।)
(वरिष्ठ साहित्यकारश्री अरुण कुमार दुबे जी,उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “छू के फूलों से बदन को देखू…“)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १६७ ☆
छू के फूलों से बदन को देखू… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆
श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – नाव का धर्म…।)
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – “समझ से परे… “।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७९ ☆
लघुकथा ☆ समझ से परे… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
“पापा पापा गणपति बप्पा आने वाले हैं। मैं गणपति बप्पा के आने पर फटाके छुड़ाऊंगा”, चिंटू बोला। पापा ने कहा, “बप्पा घर आएंगे तो तुम फटाके छुडाओगे, पर क्यों?” “बप्पा के आने की खुशी में! जब बड़े लोग बप्पा को लेकर जुलूस निकालते हैं तो खूब जोर जोर से डीजे बजाते हैं तो बप्पा को खुश करने के लिए ही न।”
“तुम्हें कैसे मालूम कि ऊंची आवाज और शोर से बप्पा खुश होते हैं”, पापा ने पूछा।
“खुश होते होंगे तभी तो लोग ऊंची ऊंची आवाज करते हैं और गाते हैं। जैसे शादी ब्याह में बैंड बाजे और डीजे पर ऊंची आवाज में गाने गाकर खुशी मनाते हैं वैसे ही।” चिंटू मासूमियत से बोला।
“पर इससे यह पता कहां चलता है कि शोर शराबे से गणपति बप्पा खुश होते होंगे। बप्पा के कान तो बड़े होते हैं और उन्हें छोटी सी आवाज भी सुनाई दे जाती होगी तो ज्यादा आवाज से उन्हें तकलीफ़ ही होती होगी। आदमी भी सोचता है कि शोर शराबे से उसे खुशी मिलती है। पर ऐसा है नहीं।” ऊंची आवाज किसी के कानों को अच्छी नहीं लगती।” इतना बोल कर पापा ने चिंटू की ओर देखा।
चिंटू कुछ सोच रहा था। थोड़ी देर बाद बोला, “पापा आप ठीक कहते हैं। ज्यादा शोर मेरे कानों को अच्छा नहीं लगता तो बप्पा को तो बिल्कुल अच्छा नहीं लगेगा। बप्पा के सामने गाने नाचने से वे खुश हो सकते हैं पर ऊंची आवाज से नहीं।”
“नहीं पापा, मैं फटाके नहीं छुड़ाऊंगा और न ही जोर से संगीत बजाऊंगा। जो मेरे कानों को अच्छा लगेगा वही बप्पा के कानों को अच्छा लगेगा। “
“थैंक्यू पापा।”
और पापा के ओठों पर एक मुस्कान आई। उन्होंने गणपति बप्पा की ओर देखा तो उन्हें लगा कि वे भी हल्के से मुस्कुरा रहे हैं। उन्होंने मन ही मन कहा कि बप्पा सब कुछ समझ से परे है।