हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३३५ ☆ मी टू : अंतहीन सिलसिला… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख मी टू : अंतहीन सिलसिला। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – यह किराये का मकान है / स्वर- रुखसार, सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३३५ ☆

☆ मी टू : अंतहीन सिलसिला… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘मी टू’– एक सार्थक प्रयास, तथाकथित शोषित महिलाओं को न्याय दिलाने की मुहिम; वर्षों से नासूर बन रिसते ज़ख्मों से निज़ात पाने की अचूक मरहम …एक अंतहीन सिलसिला है। शायद यह वर्षों से सीने में दफ़न चिंगारी, ज्वालामुखी पर्वत के लावे की भांति सहसा फूट निकलती है; जो दूसरों के शांत-सुखद जीवन को तहस-नहस करने का उपादान बन; अपनी विजय-श्री का उत्सव मना रही होती है; विजय-पताका फहरा रही होती है… वहीं उसकी अभिव्यक्ति से समाज में व्याप्त संतुलन, समन्वय व सामंजस्य व समरसता का अंत भी संभाव्य है, निश्चित है।

भारतीय लोकतंत्र के चौथे स्तंभ ने आधी आबादी को समानाधिकारों के प्रति सजग करते हुए, अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने का साहस जगाया है… श्लाघनीय है। गीता में भी ‘अन्याय व ज़ुल्म सहने वाले को, ज़ुल्म करने वाले से अधिक दोषी व अपराधी स्वीकारा गया है।’ वैसे औरतों की ‘मी टू’ में सक्रिय प्रतिभागिता होने पर, समाज के हर वर्ग के रसूखदार सदमे में हैं; उनके हृदय में खलबली मची है। वास्तव में वे भयाक्रांत हैं, क्योंकि किसी भी पल किसी पर भी अंगुली उठ सकती है और वे निरपराधी होने पर भी हाशिए पर आ सकते हैं।

वैसे तो हर औरत जीवन में ऐसे हादसों की शिकार होती है। बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक कदम- कदम पर वह निकटतम परिजनों द्वारा प्रताड़ित होती है। घर हो या कार्य-स्थल…वह कहीं भी सुरक्षित नहीं है; हर चौराहे पर दुर्योधन व दु:शासन उसकी अस्मत से खिलवाड़ करने को आतुर दिखाई पड़ते हैं। चंद माह की मासूम हो या वृद्धा, वह उनकी पल भर की शारीरिक क्षुधा को मिटाने का साधन बनती है। इतना ही नहीं, उस निर्दोष पर इल्ज़ाम लगा कर कटघरे में भी खड़ा कर दिया जाता है, जो अपराध उसने किया ही नहीं। सो! इन विषम परिस्थितियों में समझौता करना, उसकी विवशता बन जाती है और मुंह बंद कर के रहना– उसे ज़िंदा रहने की कीमत के रूप में चुकानी पड़ती है ताकि परिवार का रूतबा समाज में कायम रह  सके। परंतु उस झूठी मान-मर्यादा को बरक़रार रखने के लिए उसे आजीवन तिल-तिल कर मरना पड़ता है।

आइए! ज़रा दृष्टिपात करें, इसके स्याह पक्ष पर…  बहुत सी महिलाएं अपना स्वार्थ साधने हेतु सम्पन्न व सज्जन पुरुषों पर निशाना दाग़ने से भी नहीं चूकतीं। वे धन-ऐश्वर्य पाने, झूठी पद-प्रतिष्ठा बटोरने व अधिकाधिक सुख-सुविधा जुटाने के निमित्त; लोक- मर्यादा की परवाह न करते हुए; हर सीमा का अतिक्रमण कर गुज़रती हैं। उदाहरणत: 498 ए के अंतर्गत दहेज मांगने के इल्ज़ाम में, पति व ससुराल पक्ष के लोगों को कटघरे खड़ा करना; जेल की सीखचों के पीछे पहुंचाना या दुष्कर्म व घरेलू हिंसा के झूठे आरोप लगाने का दम्भ भरना; अपनी कारस्तानियों को सबके सम्मुख सीना तानकर बखान करना… सोचने पर विवश करता है कि आखिर इक्कीसवीं सदी की पथ-विचलित नारी किस घने अंधकार में खो गयी है? परंतु ममता की सागर, सीने में अथाह प्यार, असीम वफ़ा व त्याग के भाव संजोए– नि:स्वार्थ, संवेदनशील, प्रसाद की दैवीय गुणों से सम्पन्न श्रद्धेय नारी की तलाश आज भी जारी है। इसके विपरीत आधुनिक समाज में ‘मी टू’ अथवा दुष्कर्म के झूठे आरोप लगाकर प्रतिशोध लेने व नीचा दिखाने का प्रचलन भी बदस्तूर जारी है; जिसके परिणाम-स्वरूप आत्महत्या के मामले भी निरंतर सामने आ रहे हैं, जो समाज के लिए घातक हैं; मानव-जाति पर कलंक हैं। सो! समाज के लिए यह स्थिति अत्यंत शोचनीय हैं, चिन्तनीय हैं, निन्दनीय हैं।

एक प्रश्न मन में अक्सर कुलबुलाता है…आखिर इतने वर्षों के पश्चात्  दमित भावनाओं का प्राकट्य क्यों… यह दोषारोपण तुरन्त क्यों नहीं? सो! इसके पीछे उनकी मंशा व प्रयोजन जानने की आवश्यकता है, जिसका ज़िक्र पहले ही किया जा चुका है। इस संदर्भ में उन महिलाओं की चुप्पी के कारणों को उजागर करने की अत्यंत आवश्यकता है…आखिर  सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने के पश्चात् सहसा यह विस्फोट क्यों? पच्चीस वर्ष तक हृदय में दफ़न दर्द के दावानल में विस्फोट क्यों?

प्रश्न उठता है— क्या ‘मी टू’ वास्तव में विरेचन है… उन चिरदमित भावनाओं का, अहसासों का, जज़्बातों का, जो कुंठाओं के रूप में लम्बे समय से उनके हृदय में सुप्तावस्था में दबी पड़ीं थीं और अवसर पाते वे जाग्रत हो गयी हैं? सो! उनका प्रदर्शन होने के पश्चात् दोनों पक्षों का व्यवहार सामान्य कैसे रह सकता है? शायद,! ‘मी टू’ शराफ़त का नकाब ओढ़े; समाज में ऊंचे-ऊंचे पदों पर काबिज़ लोगों की हक़ीक़त को उजागर करने का माध्यम हैं; उनके जीवन के कटु यथार्थ को प्रकट करने का मात्र साधन है या महिलाओं को न्याय दिलाने का उपादान भी है?

सो! इस विषय की प्रासंगिकता के साथ-साथ सकारात्मक व नकारात्मक पहलुओं पर चर्चा करना अत्यंत आवश्यक है। क्या यह दोनों पक्षों के हित में है… शायद नहीं। वास्तव में आरोपी पक्ष पर इल्ज़ाम लगाने से, कीचड़ के छींटे हमारे उजले दामन को भी मलिन करते हैं और इससे केवल दोनों परिवारों की इज़्ज़त ही दांव पर नहीं लगती, उनके घरों का सुख-चैन, शांति व सुक़ून भी नदारद हो जाता है। सो! सुप्रीम कोर्ट के मी-टू के साथ-साथ लिव-इन व विवाहेतर संबंधों पर भी  पुन: चिंतन करने की आवश्यकता का विचार मन में सहसा कौंधा, क्योंकि इससे मानसिक आघात व हंसते- खेलते परिवारों में ग्रहण लगने की अधिक संभावना है। सो! हमें अपनी संस्कृति की धरोहर को संजोए रखने का भरसक प्रयास करना चाहिए और मानव-मूल्यों के विघटन के  कारणों व समाधान के उपायों-कारकों को भी तलाशना चाहिए। शेष निर्णय व दायित्व आप पर।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # १०८ – गीत – उजड़ा कुंज… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीतउजड़ा कुंज

? रचना संसार # १०८ ?

☆ गीत – उजड़ा कुंज…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ?

कुंज मनोहर ऐसा उजड़ा,

रोती बैठी हीर।

छलक रहा नयनों का निर्झर,

कैसे रखते धीर।।

**

चुभते है भँवरों की गुन-गुन,

बौराई सी प्रीत।

विकल बहुत बागों की बुलबुल ,

रूठे पावस गीत।

*

चाल चलें कितनी मायावी,

विश्वासों को चीर।।

**

मंजरियाँ सब मुरझाईं सी,

काँपे कोमल गात।

रंग बदलती गिरगिट जैसी,

चादर ताने रात ।

*

छले चंद्रमा छलिया बनकर,

नयन-कोर नम नीर।।

**

प्रेम सार सुर ढाई आखर,

चोटिल हर पल साँस।

मन मयूर करता है क्रंदन,

टूटी जीवन आस।

*

बंजारन पागल सी घूमे,

बढ़ती अंतस पीर।।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – प्रकृति ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – प्रकृति? ?

प्रकृति ने चितेरे थे चित्र चहुँ ओर

मनुष्य ने कुछ चित्र मिटाए,

अपने बसेरे बसाए।

 

प्रकृति बनाती रही चित्र निरंतर,

मनुष्य ने गेरू-चूने से

वही चित्र दीवारों पर लगाए।

 

प्रकृति ने येन केन प्रकारेण

जारी रखा चित्र बनाना

मनुष्य ने पशुचर्म, नख, दंत सजाए।

 

निर्वासन भोगती रही

सिमटती रही, मिटती रही,

विसंगतियों में यथासंभव

चित्र बनाती रही प्रकृति।

 

प्रकृति को उकेरनेवाला,

प्रकृति के ख़ात्मे पर तुला,

मनुष्य की कृति में

अब नहीं बची प्रकृति।

 

मनुष्य अब खींचने लगा है

मनुष्य के चित्र..,

मैं आशंकित हूँ,

बेहद आशंकित हूँ..!

?

© संजय भारद्वाज   

(प्रातः 10:21 बजे, 21.7.2019)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३३५ ☆ भावना के मुक्तक – सावन ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के मुक्तक – सावन)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३३५ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के मुक्तक – सावन ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

घटा घिरी तो दिल ने तो तेरा नाम लिया है।

बरसी जो बूंदें तो अधरों ने पैगाम लिया है।

सावन की फुहार में तुझे महसूस करता हूँ।

तेरी ही याद ने मुझे फिर से ही थम लिया है।

—– 

तू जब पास होती है सावन भी त्यौहार हो जाए।

तेरी हँसी से हर मौसम भी गुलजार हो जाए।

बस एक बार तेरा मैं हाथ ही थाम लूँ जानम।

सावन की हर बूँदे प्यार का इजहार कर जाए।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३१६ ☆ एक बुंदेली गीत – घर आंगन की नन्ही चिरैया… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक  विचारणीय बुंदेली गीत – घर आंगन की नन्ही चिरैया आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३१६ ☆

☆ एक बुंदेली गीत – घर आंगन की नन्ही चिरैया☆ श्री संतोष नेमा ☆

कब सें चिल्ला रई महतारी ।

ठठरी बंधे की दें खें गारी ।।

आग लगे जा मोबाइल में ।

सब के हाथ जा नै बीमारी।।

डुकरो कहे उठा ले हम खों ।

खत्म भई अब हमरी पारी ।।

अज़ब समैया आन पड़ो है।

जायदात में मारा मारी ।।

रिसबत खों कोनउ ने छूटो

सबरे खा ऱये, का पटवारी

घर आंगन की नन्ही चिरैया

फ़ांस ऱये जे तन के शिकारी

जे कल मुंहे नाम डुबा ऱये ।

कर कर खें करतूतें कारी ।।

इनखों सूली पै चढ़वा दो ।

तबै जुड़े है छाती हमारी ।।

नेता झूठई शान में डूबो  ।

डाल खें जेब में दुनिया सारी ।।

“संतोष”अब सम्हल खें चलियो

तुम्हें ने आबे दुनिया दारी

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # २२ ☆ सरसी छंद -गीत – पावस ऋतु ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं।

आज प्रस्तुत है ‘सरसी छंद -गीत – पावस ऋतु’।)

☆ मंजिरी साहित्य # २२ ☆

? सरसी छंद -गीत – पावस ऋतु ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

धरती ओढ़े हरी चुनरिया, प्रकृति करे  श्रृंगार l

पावस ऋतु मेघो का गर्जन, हो रिमझिम बौछार ll

*

भीगी धरा निकलती ऊष्मा, बुझा रही है प्यास l

चातक हुआ तृप्त जल पीकर, हलधर बांधे आस ll

झूमे डाली नाच मयूरा, खुश होता संसार l

पावस ऋतु मेघो का गर्जन, हो रिमझिम बौछार ll

*

किट -किट करते कीट पतंगा, झरना गाते गीत l

हरी भरी हरियाली सुंदर, सबको लगते मीत ll

कलकल करती नदियाँ लहरें, गान लगे मल्हार l

पावस ऋतु मेघो का गर्जन, हो रिमझिम बौछार ll

*

बादल गरजे बिजली छिटके, रिमझिम पडती बूंद l

बूढ़े बच्चे मन हर्षाये, मिलता गात मुकुंद ll

गर्म हवा से व्याकुल मन को, मिलती शीतल धार l

पावस ऋतु मेघो का गर्जन, हो रिमझिम बौछार ll

© सुश्री मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०७२ ⇒ शेर और शेर दिल ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “शेर और शेर दिल।)

?अभी अभी # १०७२ ⇒ आलेख – शेर और शेर दिल ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

शेर तो खैर जंगल का राजा है, और उसका दिल शेर का दिल ही कहलाएगा। हर इंसान जो शेर दिल होता है, किसी राजा से कम नहीं होता। एक शायर भले ही शेर कहता हो, लेकिन उसका दिल कभी शेर दिल नहीं होता। जिसका दिल बार बार टूटे, उसे आप शेर दिल नहीं कह सकते।

शेर दिल को आप दरिया दिल तो कह सकते हैं, लेकिन kind hearted, यानी दयालु नहीं कह सकते। जो आसानी से पिघल जाए, वह कैसा दिल। जिसका दिल दरिया दिल के साथ मजबूत भी हो, वही शेर दिल कहलाने का अधिकारी होता है।

बहादुर बच्चे गिरने पर रोते नहीं, किसी से मार खाने पर घर आकर मम्मी से शिकायत नहीं करते। पूरा हिसाब बराबर करने के बाद ही विजयी मुस्कान लिए घर लौटते हैं, और उनके घर लौटने के पहले ही उनकी बहादुरी के किस्से घर पहुंच जाते हैं। ऐसे होते हैं शेर बच्चे।।

शेर का दिल किसी बच्चे का दिल नहीं होता। एक शायर दिवाना हो सकता है, एक शेर का दीवानगी से क्या काम। हमने नहीं सुना, किसी शेर ने कभी किसी को दिल दिया हो। एक मदारी भले ही पब्लिक में बंदर बंदरिया को रस्सी से बांधकर नचा ले, उनकी शादी करा दे, सर्कस में भी शेर, शेर ही होता है। उसे नचाने के लिए भी हंटर की जरूरत पड़ती है। वैसे असली शेर आजकल जंगल में नहीं संसद में दहाड़ते हैं, जिनकी दहाड़ आज तक में भी सुनी जा सकती है।

कल विश्व शेर दिवस था। हम जंगल तो नहीं जा पाए, लेकिन संसद में कल एक शेर दो घंटे तेरह मिनिट तक दहाड़ा, किसी भी शेर का यह विश्व रेकॉर्ड है। मैने देखा, उसने देखा, सबने देखा, कहां देखा, टीवी पर देखा, अपने मोबाइल में देखा।।

एक शायर बदनाम हो सकता है, लेकिन उसके शेर का भी बहुत नाम होता है। शेर कभी चरित्रहीन नहीं होते, कोई सुंदर हिरनी कभी उसे अपने जाल में नहीं फांस सकती। वह शेर दिल होता है, दिल फेंक नहीं। वह किसी को दिल नहीं देता, उसका कलेजा चीर देता है।

हमने कभी शेर को घास खाते नहीं देखा। गुजरात के गिर में कुछ सफेद शेर होते हैं, जो खेतों में भी घूमते पाए जाते हैं, एक खोजी फोटोग्राफर का तो यह भी कहना है कि ये सफेद शेर इतने शांत होते हैं कि इन्हें वहां मशरूम भी

खाते देखा गया है। हमारे कल के एंग्री यग मैन महानायक और आज के शेर दिल, केबीसी के बिग बी आपको यदा कदा गुजरात आने का निमंत्रण दिया करते हैं।।

अगर आपकी वास्तविक शेर में रुचि हो तो जंगल में नहीं, भारतीय संसद में जाएं, जहां एक अकेला सब पर भारी है और अगर आपकी रुचि शेर दिलों में है तो हमारे पंजाब आइए। यहां आपको शेर, सिंह, सभी मिलेंगे।

जितने शेर आज जंगल में नहीं हैं, उतने सिंह हमारे अकेले पंजाब में हैं और सभी जाबांज, शेरदिल। यहां के सभी सिंह आपको भांगड़ा करते नजर आएंगे। ये सभी सिंह जंगल में मंगल ही करते हैं, दंगल नहीं। अगर ये सिंह गुरुद्वारे में शीश नवाते हैं तो मुल्क के लिए अपना शीश कटाते भी हैं। इनके राज में कोई प्राणी भूखा नहीं सोता, इनका लंगर सबके लिए है। सेवा ही इनकी सीख है, समर्पण ही इनकी सीख है, बलिदान ही इनकी सीख है, मुल्क की रक्षा ही इनकी सबसे बड़ी सीख है।।

जो निर्भय है, निडर है, अपने मुल्क की रक्षा में सक्षम है, वही सच्चा शेर है। आज शेर दिल लायंस क्लब में नहीं, बहादुर इंसानों में पाये जाते हैं, जो खुद भी चैन से रहते हैं, और सबके अमन चैन की चिंता करते हैं। शेर बनें, शेर दिल बनें, भीगी बिल्ली नहीं ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ३६ – कविता – मेरे भीतर… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता मेरे भीतर।)

☆ शशि साहित्य # ३६ ☆

? कविता – मेरे भीतर…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

किसने रखे हैं कदम इस चमन में,

पत्थर भी खिल के फूल हो गए हैं…

कुछ आहट है पहचानी सी,

वीरानियां भी खोकर, मधुमास हो गई है…

 

क्या हुआ जो आसमान से गिरने वाली यह बूंदें,

आजकल क्यों मोतियों की लड़ी होने लगी हैं…

बहुत लंबी, धनी काली रात, का साया…

अंधियारी को चीर कर किरणें नाचने लगी हैं…

 

यह कमजोर लरजते भीगे पंख,

हिम्मत करके ये छोटी चिरैया, पंख फड़फड़ाने लगी है…

यह कदमों की आहट, यह मधुमास का होना…

यह मोतियों की लड़ी, ये नाचती हुई किरणें…

यह छोटी सी चिड़िया की, बड़ी सी हिम्मत…

ये सब तो मेरे भीतर है, आंखें बाहर क्या खोजने लगी हैं??

 

अरसे से राह देख रही थी, उम्मीदों की…

अब तो जिंदगी, बेकार से कर्जों को उतारने लगी है…

शुक्र है तेरा, और रहमत है तेरी…

बुझने वाली चिंगारी, अब ज्वालामुखी होने लगी है…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # ३०४ – शब्द‌ सौंदर्याचा साज…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # ३०४– विजय साहित्य ?

☆ शब्द‌ सौंदर्याचा साज…! कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

नव्या युगाचे पोवाडे

बिजलीचा न्यारा बाज

सैन्य चाललेले पुढे

शब्द सौंदर्याचा साज…! १

 *

अतींद्रीय प्रतिमांची

नादवती शब्दकळा

साधनेचा सपादक

लावी‌ रसिकांसी लळा..! २

 *

राष्ट्रसेवा दल आणि

साने गुरूजींनी साथ

साहित्यिक प्राध्यापक

मूळ नाव विश्वनाथ..! ३

 *

दिशा अकरावी दिली

काव्य सकीना मानसी

शिंग फुंकले रणी ते

शब्द तेजसी राजसी..! ४

 *

सामाजिक विषमता

हाताळली शिताफिने

आंग्ल,‌संस्कृत‌ बंगाली

भाषा गुंफिली खुबीने..! ५

 *

चळवळ स्वातंत्र्याची

केले भारत दर्शन

शब्द लावण्याचा ऋतू

जाणिवांचे संकर्षण…! ६

 *

बारा गावच्या पाण्यात

संकलित लोककला

अभिजात शृंगारीक

बहरला शब्दमळा..! ७

 *

जन जागृती करोनी

दिले विचारांचे दान

गाजविली अकादमी

काव्य दर्शनाची खाण…! ८

 *

बाल साहित्यात ठसा

नेले परीच्या‌ राज्यात

फुलराणी गिरकीने

चंगामंगा साहित्यात..! ९

 *

सामाजिक‌ सांस्कृतिक

साहित्यिक योगदान

परीपक्व मितभाषी

नैसर्गिक शब्दखाण..!१०

 *

पुरस्कार विभुषीत

लाभे अध्यक्षीय मान

नाम वसंत‌ बापट

काव्य दर्शनाची शान…!११

 *

लावणीच्या लावण्यात

रमे वसंत लेखणी

शारदीय सारस्वती

सेतू संपदा देखणी..!१२

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ९३ आणि ९४ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ९३ आणि ९४ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. ९३ – – 

जगी पाहता देव हा अन्नदाता ।

तया लागली तत्त्वता सार चिंता ।

तयाचे मुखी नाम घेता फुकाचे ।

मना सांग पा रे तुझे काय वेचें ।।९३।।

अर्थ : खरे पाहिले तर जगामध्ये परमेश्वर हा सर्वांचे भरणपोषण करणारा आहे असे दिसते. त्याला खरोखरच सर्वांची काळजी आहे. तेव्हा, हे मना, त्याचे फुकटचे नाम घेण्यासाठी तुला काही खर्च करावा लागतो का?

(तत्त्वता – वास्तविक पाहता, सार – सगळी, वेचे – खर्च होणे)

विवेचन : या जगात आपण जन्माला आलो आहोत, तेव्हा आपल्या उदरनिर्वाहाची काळजी परमेश्वराला असतेच. कोणत्याही जीवाला जन्माला घालण्यापूर्वी त्याच्या जगण्याची व्यवस्था तो करतो. मूल जन्माला येण्यापूर्वी आईच्या स्तनात दूध निर्माण होते. मूल थोडे मोठे होईपर्यंत मग त्याला बाहेरचे काही द्यावे लागत नाही. आई त्याचं सर्व प्रकारचं भरणपोषण करते. जशी त्याची शारीरिक भूक ती भागवते, तसेच आईच्या सहवासात बाळाचे मानसिक आणि भावनिक देखील भरणपोषण होते. पुढे मग ती आपल्याजवळ उपलब्ध असणारे अन्न त्याला भरवते. जशी आई, तशीच परमेश्वर ही आपली माउली आहे. तिला आपली चिंता असतेच. आपल्याभोवती असणारा निसर्ग आपल्याला फळे, फुले देतो. शेतातील अन्न आपले भरणपोषण करते. ते पिकवण्यासाठी लागणारी बुद्धीदेखील आपल्याला त्यानेच दिली आहे. आईप्रमाणेच निसर्ग सुद्धा आपल्याला मानसिक, भावनिकदृष्टया समृद्ध करीत असतो. निसर्गातील नदी, वृक्ष, समुद्र असा प्रत्येक घटक आपल्याला कसे वागावे याचा काही ना काही संदेश देत असतो.

पण परमेश्वराने जरी व्यवस्था केलेली असली तरी कोणतेही अन्न आपल्याला जागेवर बसून मिळत नाही. ते मिळवण्यासाठी हालचाल, कष्ट करावेच लागतात. ही धडपड हेच त्याच्या जगण्याचे बळ आहे. या धडपडीतूनच सजीवाला जगण्याचे ध्येय आणि जीवन जगण्यासाठीची ऊर्जा प्राप्त होत असते. पण होते काय की इतर प्राणी सोडले तर या जगण्याच्या शर्यतीत मनुष्य कमालीचा स्वार्थी बनतो. तो आपल्या गरजेपुरते न घेता इतरांच्या वाट्याचेही ओरबाडून घेतो. निसर्गालाही ओरबाडतो. त्यामुळे परमेश्वराने निर्माण केलेल्या या सुंदर जगात कोणाजवळ संपत्तीचा प्रचंड साठा केंद्रित होतो, तर कोणाला दोन वेळच्या जेवणाचीही भ्रांत पडते. ही विषमता मानवनिर्मित आहे. सध्या जगात सुरु असलेली युद्धे याच संपत्तीच्या आणि सत्तेच्या हव्यासापायी होताना दिसत आहेत.

या जगात आपण मोजू शकणार नाही इतके अगणित प्राणी आणि जीवजंतू आहेत. त्यांची जगण्याची व्यवस्था आपण करतो का? तो परमेश्वरच त्यांना जन्माला घालतो, तोच त्यांचे भरणपोषण करतो. इतके असूनही माणसाला आपल्या कर्तृत्वाचा किती अहंकार असतो! घरात एखादा कुटुंबप्रमुख एकटा कमावता असेल तर त्याला वाटते मी कमावतो म्हणून या सर्वांना बसून खायला मिळते. माझ्यामुळेच घर चालले आहे. आपण नोकरी करतो. जिथे काम करतो तो मालक किंवा ते व्यवस्थापन आपल्याला त्याबद्दल पगार देते. पण त्या मालकाला देखील देणारा कोणीतरी असतोच ना! थोडक्यात म्हणजे मालकाचा देखील कोणीतरी मालक आहेच. त्या मालकाला तुम्ही आम्ही का ओळखत नाही? हा मालक म्हणजे परमेश्वर. व्यापक अर्थाने तो सर्वांचे हित पाहणारा आहे.

नवऱ्याने एखादा दागिना घेतला तर बायकोला कोण आनंद होतो! ती मोठया कौतुकाने सगळ्यांना सांगत सुटते. आपल्या नवऱ्याची तारीफ करते. पण ज्या भगवंताने तो दागिना घालण्यासाठी तुला हे सुंदर शरीर दिले आहे, त्याची कधी आठवण येते? त्याची तारीफ तू करतेस का? म्हणूनच समर्थ म्हणतात की परमेश्वर जर सर्वांची काळजी घेतो, पालनपोषण करतो, तर त्याचे स्मरण आपण का करत नाही? जेवल्यानंतर आपण ‘ अन्नदाता सुखी भव ‘ असे म्हणून जेवण देणाऱ्याला धन्यवाद देतो. मग खरा अन्नदाता तर तो आहे. त्याला देतो का आपण धन्यवाद? त्याचे नाम घेण्यासाठी तर काही पैसे खर्चावे लागत नाहीत. ‘ कृतघ्नता ‘ हे सर्वात मोठे पाप आहे. अन्नदाता असणाऱ्या भगवंताबद्दल आपण कृतज्ञ राहून त्याचे नित्य स्मरण करायला हवे. त्यासाठी काही खर्च करावा लागतो का? तुकाराम महाराजांचा अभंग फार सुंदर आहे. ते म्हणतात

का रे नाठविसी कृपाळू देवासी । पोसतो जनासी एकला तो ।

बाळा दुधा कोण करितें उत्पत्ति । वाढवी श्री-पति सवें दोन्हीं ॥

फुटे तरुवर उष्ण-काळ-मासीं । जीवन तयांसी कोण घाली ।

तेणें तुझी काय नाहीं केली चिंता । राहें त्या अनंता आठवूनी ।

तुका म्हणे ज्याचे नांव विश्वंभर । त्याचे निरंतर ध्यान करीं ॥

 स्वसंवाद :: 

१. “माझ्यामुळेच माझे घर आणि कुटुंब चालले आहे” अशा कुठल्या खोट्या अहंकाराच्या ओझ्याखाली मी वावरत आहे का?

२. रोज जेवताना ‘अन्नदाता सुखी भव’ म्हणताना, चराचरातील अनंत जीवांचे विनासायास पालनपोषण करणाऱ्या त्या खऱ्या ‘विश्वंभराची’ मला आठवण होते का?

३. ज्या भगवंताने मला हे सुंदर शरीर, बुद्धी आणि जगण्याची साधने दिली, त्याच्याप्रती कृतज्ञता व्यक्त करण्यासाठी विनामूल्य असणारे नाम घेताना माझे काय ‘वेचते’ (खर्च होते)?

४. तुकाराम महाराजांनी म्हटल्याप्रमाणे उन्हाळ्यात वाळलेल्या झाडांनाही पालवी फुटणारे पाणी देणारा तो ‘अनंत’ जर माझी काळजी वाहण्यास समर्थ आहे, तर मी संसाराची व्यर्थ चिंता का करत बसलो आहे?  

===== 

श्लोक क्र. ९४ – – 

तिन्ही लोक जाळू शके कोप येता ।

निवाला हरू तो मुखे नाम घेता ।

जपे आदरे पार्वती विश्वमाता ।

म्हणोनि म्हणा तेचि हे नाम आता ।।९४।।

अर्थ : भगवान शंकर जर कोपले आणि त्यांनी आपला तिसरा नेत्र उघडला तर तिन्ही लोक जाळून भस्म करू शकतात.अशा महासामर्थ्यशाली भगवान शंकरांनी जेव्हा त्यांच्या अंगाचा दाह होऊ लागला, तेव्हा रामनामाचा आश्रय घेतल्यावरच तो शांत झाला. माता पार्वती देखील अत्यंत आदराने रामनाम जपते. म्हणून आपण देखील त्याच रामनामाचा आश्रय घ्यावा.

(तिन्ही लोक -स्वर्ग-मृत्यू-पाताळ, निवाला – शांत झाला, हरू – भगवान शंकर)

विवेचन : या ठिकाणी रामनामाचे महत्व स्पष्ट करण्यासाठी समर्थ पुन्हा भगवान शंकरांचे उदाहरण देतात. त्यामागे आपल्या हिताची कळकळ आहे. एखाद्या अभ्यास न करणाऱ्या मुलाला आईवडील जसे एखाद्या अभ्यास करणाऱ्या मुलाचे उदाहरण पुन्हा पुन्हा देतात, तसेच हे आहे. भगवान शंकर देवांमध्ये श्रेष्ठ. म्हणून ते ‘ महादेव ‘ ब्रह्मदेव जगाची निर्मिती करतात, विष्णू जगाचे पालनपोषण करतात तर शंकर हे संहारकर्ते मानले जातात. त्यांच्या ठायी एवढे सामर्थ्य आहे की त्यांनी केवळ आपला तिसरा नेत्र उघडला तर क्रोधाने ते हे त्रिभुवन जाळून भस्म करून टाकू शकतात. 

अशा सामर्थ्यशाली भगवान शंकरांनी जेव्हा अखिल प्राणिमात्रांच्या कल्याणाच्या हेतूने हलाहल विष प्राशन केले, तेव्हा त्यांच्या कंठाचा प्रचंड दाह होऊ लागला. शीतल चंद्र माथी धारण करून, पवित्र आणि शीतल अशा गंगेला शिरावर धारण केले. एवढे करून देखील त्यांचा दाह शमला नाही. पण अमोघ अशा रामनामामुळे त्यांचा दाह शांत झाला. एवढे सामर्थ्य रामनामाचे आहे. जी विश्वमाता आहे, जगज्जननी आहे अशी माता पार्वती देखील रामनामाचा जप करते. म्हणून आपणही तेच नाम घ्यायला हवे असे समर्थ आपल्याला उदाहरणासह पटवून देतात.

या श्लोकाचा अर्थ आपल्याला वेगळ्या प्रकारेही घेता येतो. आपण मानव म्हणजे गुणदोषांचे पुतळे असतो. क्रोध हा आपला एक प्रमुख शत्रू असतो. क्रोध म्हणजे राग किंवा संताप. त्यामध्ये अनेक चांगल्या गोष्टी, नातेसंबंध भस्म करण्याची शक्ती असते. त्यासाठी रामनामाचा आश्रय घेणे हाच सर्वश्रेष्ठ उपाय आहे. रामनामामुळे मन शांत होऊ लागते, क्रोध कमी होऊ लागतो. भगवंताचे नाम हे शांती आणि सौख्य प्रदान करणारे आहे. म्हणून तेच आदरपूर्वक घ्यावे. 

स्वसंवाद :: 

१. माझ्या मनात जेव्हा ‘क्रोधाचा’ (रागाचा) भडका उडतो, तेव्हा मी माझे विवेक आणि नातेसंबंधांचे ‘त्रिभुवन’ जाळून खाक करतो का? त्यावर नियंत्रण मिळवण्यासाठी मी काय करतो?

२. जर तिन्ही लोकांना कवेत घेणारे महादेव आणि अखिल विश्वाची माता असणारी पार्वती अत्यंत आदराने रामनाम जपतात, तर संसारी विवंचनेत अडकलेल्या माझ्या मनाला नामस्मरणाचा संकोच का वाटावा?

३. माझ्या आयुष्यातील वेगवेगळ्या चिंता आणि संतापाचा दाह शांत करण्यासाठी, मी कधी शांत चित्ताने रामनामरूपी शीतलता अनुभवली आहे का?

४. “म्हणोनि म्हणा तेचि हे नाम आता” हा समर्थांचा आग्रहाचा शब्द ऐकून, मी उद्याची वाट न बघता ‘आता’ या क्षणापासून नामस्मरण करायला तयार आहे का? 

– क्रमशः श्लोक ९३ आणि ९४

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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