हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०२३ ⇒ हुस्न और इश्क ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हुस्न और इश्क…“।)

?अभी अभी # १०२३ ⇒ आलेख – हुस्न और इश्क ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ऐ हुस्न ज़रा जाग, तुझे इश्क जगाए ! और अगर हुस्न नहीं जागे, तो इश्क क्या करे। बस, ठंडी आहें भरे। हुस्न जब सोता है, बड़ा मासूम होता है। जागता है, सीधा आईने के पास जाता है। आइना नहीं, हुस्न नहीं। आईने की कोई सूरत नहीं होती, हुस्न को अपनी ही सूरत पर गुमान होता है, गुरूर होता है। हुस्न को यकीन है, आइना झूठ नहीं बोलता।

अगर हुस्न जाग जाए, और इश्क सो जाए, तो इश्क को कौन जगाए। हुस्न एक आग है, जिसमें वह खुद नहीं जलता। सुबह का सूरज उसी हुस्न की एक आग है। वह एक ऐसा आफताब है, जिसे देख कुदरत अंगड़ाई लेती है। इश्क जाग उठता है। इश्क सुबह के सूरज की इबादत करता है। फूल खिलते हैं, कलियां मुस्कुराती हैं, भंवरे गुनगुनाते हैं। हुस्न का जलवा ही सूर्योदय है।।

जैसे जैसे सूरज आसमान पर चढ़ता है, उसका हुस्न परवान चढ़ता है। वह तपकर आग का गोला हो जाता है। हमने जलवा दिखाया तो जल जाओगे। आप उस जलवे से आंख नहीं मिला सकते। हुस्न की आग से नज़रें मिलाई नहीं जाती, नजर झुकाकर भी इश्क किया जाता है।

हुस्ने जाना इधर आ, आइना हूं मैं तेरा। इश्क हुस्न को परदे में रखना चाहता है, उसे पूजना चाहता है। उसके हुस्न को किसी की नजर ना लगे, उसे ताले में बंद करना चाहता है। घूंघट के पट खोल रे, तुझे पिया मिलेंगे। जो हुस्न आग है, आफताब है, पाक साफ है, क्या उससे नज़रें मिलाना इतना आसान है।।

बाल कृष्ण ने मिट्टी क्या खाई, माता यशोदा ने गुस्से में जो नंदलाला का मुंह खोला, तो होश खो बैठी। वहां कृष्ण की लीला थी या जलवा था। माया अपना काम कर गई। यशोदा जान तो गई, लेकिन किसी को बताने की स्थिति में भी नहीं रही।

अर्जुन ने भी देखा था सारथी नटवर श्रीकृष्ण के हुस्न का जलवा कुरुक्षेत्र में, जब वह शस्त्र छोड़, शरणागत हो गया था।

कृष्ण का विराट स्वरूप जब सामने आया तो होश उड़ गए।।

हुस्न से चांद भी शरमाया है।

सूरज अगर आग है तो चंद्रमा

शीतलता का प्रतीक ! चंद्रमा की अपनी कोई रोशनी नहीं। सूरज की ही परछाई है वह। ये जमीं चांद से बेहतर नजर आती है हमें। चांद से बेहतर ही है यह जमीं, क्योंकि यहां सूरज की रोशनी है, जीवन है, प्राण है, प्रेम है, शांति है। जहां भी तेज है, ओज है, रोशनी है, प्रकाश है, सब सूरज का ही जलवा है। हुस्न के कई रूप हैं, कई रंग हैं। कोई सच्चा आशिक ही उसको पहचान पाता है।

सुंदरता में प्रेम है, भक्ति है, समर्पण है। सब में रब तो बाद में होगा, क्यों न सब रब में ही समा जाए। पहले किसी से दिल तो लगे, फिर शुरू हो दिल्लगी। हुस्न का जलवा हो, तो हम भी कर लें बंदगी ;

आशिक हूं तेरे दर का

ठुकरा मुझे ना देना।

आया हूं बन भिखारी

झोली तो भर ही देना।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २९० ☆ पुरुषोत्तम मास : आत्मशुद्धि, प्रकृति-साधना और पुण्य का पावन काल… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “पुरुषोत्तम मास : आत्मशुद्धि, प्रकृति-साधना और पुण्य का पावन काल…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९० ☆

☆ पुरुषोत्तम मास : आत्मशुद्धि, प्रकृति-साधना और पुण्य का पावन काल… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

भारतीय संस्कृति में पुरुषोत्तम मास, जिसे अधिक मास भी कहा जाता है, आध्यात्मिक साधना, आत्ममंथन और पुण्य संचय का विशेष अवसर माना गया है। यह अतिरिक्त मास चंद्र और सौर गणना के संतुलन के लिए जोड़ा जाता है तथा भगवान विष्णु को समर्पित होने के कारण “पुरुषोत्तम मास” कहलाता है। धर्मग्रंथों में इस माह को जप, तप, दान, सत्संग और सेवा के लिए अत्यंत शुभ बताया गया है।

भारतीय परंपरा में धर्म केवल मंदिरों और पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रकृति की रक्षा को भी पुण्यकर्म माना गया है। पंचतत्व—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—से निर्मित इस सृष्टि के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना भी आध्यात्मिक साधना का ही एक रूप है। इसलिए पुरुषोत्तम मास आत्मशुद्धि के साथ-साथ प्रकृति-संरक्षण का भी संदेश देता है।

इस पावन अवधि में वृक्षारोपण, पौधों की सेवा, पक्षियों के लिए जल-पात्र रखना, जलस्रोतों की स्वच्छता, नदी-तालाबों के संरक्षण का संकल्प लेना तथा पर्यावरण के प्रति जागरूकता फैलाना भी श्रेष्ठ सेवा मानी जा सकती है। जब हम एक पौधे को रोपते हैं या किसी जलस्रोत को स्वच्छ रखने का प्रयास करते हैं, तब वह केवल पर्यावरणीय कार्य नहीं होता, बल्कि सृष्टि के प्रति हमारी श्रद्धा का भी परिचायक बनता है।

आज जब प्रकृति अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है, तब पुरुषोत्तम मास हमें यह स्मरण कराता है कि ईश्वर की आराधना और प्रकृति की सेवा एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। सच्ची भक्ति वही है जो मानव, जीव-जंतु और प्रकृति—सभी के कल्याण का भाव अपने भीतर समेटे। यही भारतीय संस्कृति का मूल संदेश है और यही पुरुषोत्तम मास की वास्तविक सार्थकता भी।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०२२ ⇒ कुएं में भांग..!! ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कुएं में भांग..!!“।)

?अभी अभी # १०२२ ⇒ आलेख – कुएं में भांग..!! ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

याद आया, कॉफी हाउस के उन दिनों, सभी समाचार पत्र चाटने, कई प्याले कॉफी उदरस्थ करने, और घंटों बहस के बाद भी जब कोई निष्कर्ष नहीं निकलता था तो अंत में सभी पराजित वक्ता इस बात पर आम सहमति व्यक्त करते थे, कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता, पूरे कुएं में ही भांग पड़ी है।

अपनी इस उपलब्धि पर मानो एक दूसरे को बधाई देते हुए, कल फिर मिलने के वादे के साथ, कॉफी हाउस की सुबह की सभा विसर्जित होती थी।

तब लोगों के पास आज की तरह एंड्रॉयड फोन नहीं था और ना ही घर में बुद्धू बक्सा। बस अखबार, रेडियो, लाइब्रेरी और चंद दोस्तों का ही सहारा था, जो बिना मुहूर्त के कभी भी साइकिल पर मुंह उठाए चले आते थे।

कटिंग कराने निकला था, अण्णा के यहां बहुत भीड़ थी, सोचा भाभी के हाथ की गर्मागर्म चाय पी ली जाए।।

हमने कुएं का पानी भी पाया है और भांग भी खाई है। गांव के कुएं का पानी सिर्फ मीठा ही नहीं होता था, पाचक भी होता था। लगता था वाकई उसमें भांग मिली है। दिन भर मस्ती ही मस्ती रहती थी। जो खाओ सब हजम। तब कहीं महंगाई और भ्रष्टाचार नजर नहीं आता था। नीम, आम और पीपल की छांव में कहां का तनाव। ठंडी हवा में घोड़े बेचकर सोते थे।

कब हम गांव से शहर और कुएं से ट्यूब वेल के पानी पर आ गए, पता ही नहीं चला। इंसान की बात छोड़िए, पीने के पानी पर भी भरोसा नहीं रहा। घर घर और दफ्तर में हेमा जी का KENT ब्रांड एक्वागार्ड हमारी प्यास बुझाने लगा।

सार्वजनिक प्याऊ का स्थान बिसलेरी ने ले लिया। मुल्क इतना आगे निकल गया है कि कुएं में भांग ढूंढते रह जाओगे।।

आजकल अधिकतर बहस टीवी पर, और सोशल मीडिया पर होती है जिसमें व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी, फेसबुक और ट्विटर का अधिक योगदान है। पहले की बौद्धिक बहस आज सिर्फ राजनीतिक बहस बनकर रह गई है। बिना एक दूसरे को अच्छी तरह जाने पहचाने, फेसबुक पहले तो उन्हें आपस में जोड़ देती है और फिर बाद में उन्हें अकेला छोड़ देती है। कभी घर से बाहर नहीं निकलने वाले इंसान के हवा में हजारों फेसबुक फ्रेंड बन जाते हैं। और फिर दौर शुरू होता है विचारों के आदान प्रदान का। कहीं अपेक्षा तो कहीं उपेक्षा, कहीं व्यर्थ की बहस तो कहीं अनफ्रेंड और ब्लॉक की नौबत।

आज की परिस्थिति के लिए हम किसी कुएं अथवा भांग को दोष नहीं दे सकते। जब हवा और पानी दोनों में ही प्रदूषण हो, खाद्य पदार्थों में मिलावट के साथ साथ ही, केमिकल फर्टिलाइजर का जहर हो, और सामाजिक और राजनीतिक जीवन में धर्म और राजनीति का नशा हो, तो आप किस कुएं को दोष दोगे और बेचारी भांग क्या करेगी।।

कुआं और भांग हमारे जीवन का कभी सात्विक नशा था। वह छोड़कर आज हम वैचारिक रूप से भी इतने प्रदूषित हो गए हैं कि जिस डगर पर कभी प्रेम गगरी छलका करती थी आजकल उस राह पर नफरत के जहर भरे घड़े, सजाकर रखे हुए हैं।

और लोग बेचारे मजबूरन उन्हीं घड़ों से अपनी प्यास और बढ़ा रहे हैं। लोहे को लोहे से काटा जा रहा है। जहर का इलाज भी जहर से ही किया जा रहा है। इसे कहते हैं, कांटे से कांटा निकालना।

ऐसे में कहीं से अगर आवाज आए, कोई पीयो रे पियाला राम रस का, तो किसे फुर्सत जो निंदा रस छोड़ प्रेम रस का पान करे। धर्म और राजनीति के नशे के अलावा यह सरकार सभी नशों के खिलाफ है। जिन कुओं में कभी भांग थी उन्हें बुलडोजर के हवाले किया जा रहा है। सरकारी ठेके की दुकानें हैं नशा करने के लिए देसी और विदेशी दोनों।।

भांग का नशा इंसान को निकम्मा कर देता है। कुएं में भांग थी इन सत्तर सालों में, इसीलिए हम कुछ कर नहीं पाए। नशा रहित शुद्ध जल जल्द ही घर घर पहुंच रहा है। अब किसी कुएं में भांग नहीं है। शुद्ध पेय जल समय की मांग है। होश में आएं। व्यर्थ समय ना गंवाएं..!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०२१ ⇒ फ़जी़हत ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “फ़जी़हत…“।)

?अभी अभी # १०२१ ⇒ आलेख – फ़जी़हत ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

फजीहत अरबी शब्द है !

जौहरि की गति जौहरी जाने, की जिन जौहर होय, की तरह जब तक किसी की फजीहत नहीं होती, वह इसका दर्द नहीं जान सकता। आप चाहें तो इसे शारीरिक संत्रास कह सकते हैं, और चाहें तो मानसिक भी। कहीं भी किसी भी परिस्थिति में, बिना किसी पूर्व सूचना के, किसी भी पल, कोई भी

इस अवस्था का शिकार हो सकता है।

जहां सभी सुविधा, सावधानी और सूझ बूझ काम नहीं आती तब अचानक ऐसी परिस्थिति निर्मित हो जाती है, जिसे आप फजीहत कह सकते हैं। इस अवस्था में कोई भी सर्व गुण संपन्न व्यक्ति लाचार और असहाय, परेशान सा, केवल उसे झेलता रहता है, लेकिन परिस्थिति सामान्य होने पर अपनी उस स्थिति का बखान करना नहीं भूलता, क्योंकि फजीहत में हमारा नुकसान कम, झल्लाहट अधिक होती है।।

किसी जरूरी काम के लिए घर से बाहर निकलना, द्वि – चक्र वाहन को पंक्चर देखना, चार पहिया वाहन की चाबी नहीं मिलना, साइकिल तक में हवा नहीं होना, और किसी तरह ऑटो करके उस काम को सम्पन्न करने की कोशिश करना, लेकिन उसमें भी, अगर किसी अप्रत्याशित घटना के कारण, सफलता हाथ ना लगे, और खाली हाथ वापस घर आना पड़े, तो इसे क्या कहेंगे। चलो, कोई बात नहीं, अगली बार देखेंगे !

जब हमारा मूड अच्छा होता है, तो विपरीत परिस्थितियां भी रास आती हैं, लेकिन अगर हम किसी कारण पहले से ही परेशान हैं, और उसमें अगर ऐसी स्थिति निर्मित होती है, तो हम असहज होकर भड़क उठते हैं। सिस्टम, समय, परिस्थिति और मानसिक संतुलन, सब गड़बड़ा जाता है।।

जब हालात बुरे होते हैं तो समय भी खराब चल रहा होता है। पिछले दस बारह सालों से हमारा समय अच्छा चल रहा है। क्या दिन थे वो भी। गर्मी की उमस भरी रातों में, किसी फॉल्ट के कारण, रात रात भर के लिए बिजली चली जाती थी। इन्वर्टर, इमरजेंसी लाइट, चार्जर और मोबाइल भी कब तक कम करते। परेशान हो, बिजली विभाग को कोसते हुए लोग सड़कों पर निशाचर की तरह, हवा खाने निकल पड़ते। आप क्या जानो डिजिटल इंडिया वालों, फजीहत क्या होती है।

गर्मी के मौसम में देसी खट्टे मीठे आमों से एक स्वादिष्ट मसालेदार व्यंजन बनता है, जिसे फजीता कहते हैं। इसमें आम तो आम, गुठलियों के दाम भी वसूल हो जाते है। इतना शानदार फजीता, कि समझ में ही नहीं आता, पहले गुठलियां चूसें अथवा पहले उंगलियां चाटें। अब गुठली तो आप चम्मच से नहीं चूस सकते ना। हेल्थ, हाइजीन वाले फजीते से बचें, वर्ना उनका फजीता भी बन सकता है।।

फजीहत और फजीते के परिवार में एक सदस्य और है जिसे फालूदा कहते हैं। खाने में यह स्वादिष्ट लगता है। मीठी रसभरी सिवैंया का जब ठंडी, रबड़ी – मलाईदार कुल्फी से मेल होता है, तब फालूदा का जन्म होता है।

नीमा जी की फालूदा कुल्फी खाएं, खुद जान जाएं।

लेकिन परेशानी तब होती है जब किसी की इज्जत का फालूदा निकल जाता है। किसी की फजीहत हो, चलेगी, फजीता बन जाए वहां तक भी ठीक है, लेकिन इज्जत का फालूदा ? ना बाबा ना ! Never, पक्का नको। आई शप्पथ।।

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०२० ⇒ वक्त की रफ़्तार ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “वक्त की रफ़्तार…“।)

?अभी अभी # १०२० ⇒ आलेख – वक्त की रफ़्तार ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मेरी भाषा एक है, लेकिन परिभाषा अनेक ! मैं कभी बी.आर.चोपड़ा का वक्त हूं तो कभी महाभारत का समय। मैं ही काल हूं, मैं ही महाकाल, और मैं ही कोविड – 19 नाम से डिफेम और बदनाम कोरोना काल। जब आपकी कलाई में घड़ी बनकर शोभायमान होता हूं, तो रोजाना हर पल आपको टाइम बताता हूं। पल पल आपके पास, मैं रहता हूं। वक्त कितना आपके पास, मैं कहता हूं।

मेरी शान में साहिर साहब ने कई कसीदे गढ़े हैं। मैने आपको जितना नहीं डराया, उससे अधिक तो साहिर आपको डरा गए। आदमी को चाहिए, वक्त से डरकर रहे, कौन जाने किस घड़ी, वक्त का बदले मिजाज। इंसान कभी अपने मिजाज को नहीं देखता, वह कितना खराब है, कभी अंदर झांककर नहीं देखता। खुद बड़ा दूध का धुला हुआ है, जो कह उठता है, अभी वक्त बुरा चल रहा है।।

वैज्ञानिक हवा, प्रकाश, और ध्वनि तो ठीक, विद्युत की तरंगों तक की गति नाप लेते हैं, लेकिन कभी मेरी रफ्तार नहीं नाप पाए। विद्वानों ने समय की गणना तो कर ली, मेरे पल पल का हिसाब भी रख लिया, उधर आपने पलक झपकी, इधर मेरा एक पल पूरा हुआ। आप किसी को अपलक निहारते रहे, मानो समय ठहर गया हो, लेकिन मैं नहीं ठहरा। मेरी गति कोई नहीं जान पाया। मेरे आगे भी समय है, और पीछे भी समय। जब खुशी के पल होते हैं, तो मेरे पंख लग जाते हैं। बच्चों की गर्मी की छुट्टियां बहुत जल्द खत्म हो जाती है। पत्नी मायके कुछ रोज के लिए जाती है। वक्त कैसे गुजर गया, पता ही नहीं चलता। मजबूरी में बाबुल का घर छोड़ना ही पड़ता है। गोरी ससुराल चली।

अभी ना जाओ छोड़कर, कि दिल अभी भरा नहीं ! काश वक्त ठहर जाता। कुछ लोग बचपन याद करते हैं तो कुछ अतीत के स्वर्णिम पलों को याद करते हैं। ५० साल पुराना, शादी का एलबम सामने खुला हुआ है, और आईने में आज की खुद की तस्वीर नजर आ रही है। रेडियो पर गीता दत्त का गीत बज रहा है। वक्त ने किया, क्या हसीं सितम, तुम रहे ना तुम, हम रहे ना हम। वक्त ने बूढ़ा कर दिया, वर्ना गालिब, हम भी कभी जवान थे।।

इसके विपरीत, दुख के पलों में समय ठहर सा जाता है। दुख के, अब दिन बीतत नाहिं ! क्या दिन भी पहाड़ जैसे हो सकते हैं, क्या गम की रातें इतनी लम्बी भी हो सकती हैं, कि कभी उनकी सहर ही ना हो। वक्त के रहते यह मुमकिन नहीं। दुख की रात भले ही लंबी हो, फिर भी सुबह तो होगी ही। वक्त कितना भी खराब चल रहा हो, अच्छे दिन तो आएंगे ही। आपने देखा नहीं, कितना वक्त गुजर गया, अभी भी लोगों को भरोसा है, मेरे करन अर्जुन आएंगे, जरूर आएंगे।

जो समय के साथ चलना जानते हैं, वे कभी समय से नहीं पिछड़ते। जो समय के पाबंद होते हैं, वक्त भी उनकी कद्र करता है। कभी समय को भी अपना साथी बना लें। समय अच्छा कटेगा। सुख दुख में अगर समभाव बना रहे तो समय भी दोस्त बन जाता है ;

चले थे साथ मिलकर

चलेंगे साथ मिलकर

तुम्हें रुकना पड़ेगा

मेरी आवाज सुनकर

जब छोटे थे, तो आपस में स्टेच्यू स्टेच्यू खेलते थे। इधर स्टेच्यू बोला, और उधर उसी स्थिति में सामने वाले को तब तक रहना पड़ता था, जब तक ओवर नहीं बोल दिया जाता। हमारी स्टॉप वॉच घड़ी के समय को रोक सकती है, लेकिन समय की घड़ी को नहीं। आइए, समय की घड़ी से दोस्ती करें। वही अनमोल घड़ी है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १८१ – देश-परदेश – गधे पंजीरी खाए ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १८१ ☆ देश-परदेश – गधे पंजीरी खाए ☆ श्री राकेश कुमार ☆

वर्षों से ये कहावत सुनते आ रहे थे। आज घर के पास वाले उद्यान में नगर निगम द्वारा कुत्तों पर जल से छिड़काव करते हुए देखा, तो गधे पंजीरी खाए वाली कहावत याद आ गई।

इतनी भीषण गर्मी में यदि कुत्तों पर पानी से वर्षा की गई है, तो उसमें कुछ बुराई भी नहीं है। हमारे उद्यान के फुरसतिया साथियों ने तो नगर निगम के बुराईयों के पिटारे खोल दिए। घरों में पानी की सप्लाई बहुत कम है, और यहां कुत्ते पानी में अठखेलियां कर रहे हैं।

एक साथी ने तो झुग्गी झोपड़ी वालों के लिए वकालत कर दी। जितने मुंह उतनी बातें, कोई कहने लगा ये सब उच्चतम न्यायालय के कारण हो रहा है, उन्होंने कुत्तों को कुछ अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। इंसानों को छोड़ जानवरों पर न्यायायलय दया दिखा रहा है।

एक बैंकर मित्र बोले हमारा पेंशन का मामला वर्षों से न्यायालय के विचाराधीन है, उस पर उच्चतम न्यायालय ने आंखें मूंद रखी है, और यहां कुत्तों, कबूतरों पर नित नए निर्णय आ रहे हैं।

हम उद्यान के सभी साथियों ने नगर निगम के जल वाहन चालक को घेर लिया, और उसको पूछा इन कुत्तों पर क्यों पानी व्यर्थ कर रहे हो उसने स्पष्ट किया वो तो उद्यान की घास पर जल छिड़काव कर रहा हैं, कुत्ते तो बिन बुलाए बाराती हैं, और बारात में नृत्य कर आनंद ले रहे हैं। आप बुजर्ग लोग क्यों परेशान हो रहे हो, उद्यान का आनंद लो, ओर प्रभु का नाम भजो।

बात, तो उस वाहन चालक की एकदम सही है। हम बुजर्ग हमेशा खामखां ही परेशान रहते हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३४० – सबसे बड़ा रुपैया ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३४० ☆ सबसे बड़ा रुपैया… ?

समाचारपत्र में संबंध विच्छेद के एक मुकदमे का निर्णय छपा है। उच्च शिक्षित युगल में विवाह के लगभग दो वर्षों के भीतर ही संबंध विच्छेद हो गया। समाज में निरंतर बदलते मूल्य और अपने तक सीमित रहने की वृत्ति के चलते आजकल दो वर्ष भी दांपत्य के लिए उल्लेखनीय अवधि मानी जा सकती है। तथापि इस मामले में चौंकाने वाला तथ्य संबंध-विच्छेद का कारण था। समाचार में बताया गया कि कि पति हर व्यय में पत्नी से पचास प्रतिशत की अपेक्षा रखता था। यह अपेक्षा सुबह के नाश्ते से लेकर रात के भोजन तक हर छोटे-बड़े व्यवहार में थी। समाचार कह रहा था कि विवाह से पूर्व उसके द्वारा दिये गए उपहारों की आधी कीमत भी उसे चाहिए थी। उधर दूसरे पक्ष का कहना था कि पत्नी की आमदनी, पति की तुलना में कम है, अतः यह विभाजन तर्कसंगत नहीं है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के समय में मनुष्य की संवेदनाओं के आर्टिफिशियल होने की पराकाष्ठा है यह। भौतिक जगत में भौतिकता का चरम बिंदु है यह। समाचारपत्र में छपे कुछ पंक्तियों के समाचार के आधार पर इस घटना में किसी को दोषी या निर्दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता। इस तरह की विवेचना इस लघु आलेख का उद्देश्य भी नहीं है। माननीय न्यायालय ने भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत तथ्यों के आधार पर गुण-दोष के धरातल पर निर्णय दिया होगा। दोषी जो भी रहा हो, यहाँ संबंधों में बढ़ती असुरक्षा और संदेह विचारणीय हैं।

नीतिसूत्र कहता है कि शक्ति का केंद्रीकरण निरंकुशता को जन्म देता है। निरंकुशता अविवेक को जनती है। अविवेक बहुधा आत्ममोह का कारण बनता है। आत्ममोह अपने अलावा दूसरा कुछ नहीं देख पाता। इस स्वानुभूत दृष्टिहीनता की परिधि में संबंध, संवेदना, सामाजिकता, सामंजस्य, साहचर्य सभी आ जाते हैं।

मनुष्यजीवन के सारे व्यवहार के केंद्र में पैसे का आ जाना मनुष्यता का अवमूल्यन है या अधिमूल्यन, इस पर भिन्न-भिन्न मत हो सकते हैं। कुछ लोग इसका नामकरण ‘नई मनुष्यता’ भी कर सकते हैं। सारे बौद्धिक विलास के परे ‘ना बीवी ना बच्चा, ना बाप बड़ा ना मैया, द होल थिंग इज़ दैट कि भैया सबसे बड़ा रुपैया’ का यूँ साकार होना हर विचारवान के मन में गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

प्रकृति में अंतिम कुछ भी नहीं है। पैसे को सर्वोच्च समझने की वृत्ति भी अंतिम नहीं रहेगी। मनुष्य को मिले बौद्धिकता के वरदान के चलते उससे वांछित है कि वह जीवन में मूल्यों के बीच भी सामंजस्य और संतुलन रखना सीखे। यह घटना इस बात का ज्वलंत उदाहरण है कि यंत्रमानव बनाने वाले मानव में धीरे-धीरे यंत्र अपने को स्थापित करता जा रहा है। क्या निकट भविष्य में माता- पिता, सगे-संबंधी, मित्र- आत्मीय, पति-पत्नी सभी आर्थिक आधार पर आँके जाने लगेंगे? ऐसी स्थिति में शब्दकोश से इन शब्दों के विलुप्त होने में समय नहीं लगेगा।

कुछ लोगों को यह विचार अतिरेक लग सकता है। कुछ लोग इस घटना को अपवाद के रूप में देख सकते हैं। तथापि अपवाद जब निरंतर घटने लगे तो मान लीजिए कि वह परंपरा होने के मार्ग पर अग्रसर है। ऐसे समय में परंपरा, अपवाद कहलाने लगती है।

उपरोक्त घटना के अपवाद को परंपरा बनने से रोकना है तो विचार को व्यवहार में उतारना होगा। घर, परिवार, समाज हर स्थान पर संबंधों की अनुभूति, महत्व और अनिवार्यता को रेखांकित करना होगा, अपने-अपने स्तर पर संबंधों को सच्चाई से जीना होगा। अन्यथा की स्थिति में संभव है कि भविष्य में व्यय में पचास प्रतिशत की भागीदारी ना कर सकने वालों को अमनुष्य करार दिया जाने लगे।

अनुरोध है कि हर मनुष्य विचार करे।

 

© संजय भारद्वाज 

(15:51 बजे, 13 जून 2026)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभिव्यक्ति # -१११ – पांडव और पांच गाँव … ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘पांडव और पांच गाँव…‘।)

☆ अभिव्यक्ति # १११ ☆

☆  आलेख – पांडव और पांच गाँव… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

युद्ध का शंखनाद हो चुका था, दोनों पक्ष, युद्ध की तैयारियां कर रहे थे, तभी भगवान कृष्ण ने, पांडवों से कहा, कि मैं एक बार शांति के लिए, अंतिम प्रयास करना चाहता हूं, ताकि युद्ध ना हो, और उनकी सहमति से वे कौरव राजसभा में पहुंचे. वहां पर सम्राट धृतराष्ट्र द्रोणाचार्य, भीष्म पितामह, सभी लोग उपस्थित थे. भगवान कृष्ण ने सभा में महाराज धृतराष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा, कि पांडवों ने 12 वर्ष का वनवास काट लिया है, और एक वर्ष का अज्ञातवास भी व्यतीत कर लिया है, अब उन्हें उनका राज्य लौटा दिया जाए, युवराज दुर्योधन ने तत्काल खड़े होकर कहा, मैं पांडवों को राज्य नहीं दूंगा, भगवान कृष्ण ने कहा, अगर आधा राज्य ना सही, तो उन्हें केवल पांच गांव ही दे दिए जाएं, वह उन पांच ग्रामों में ही अपना गुजारा कर लेंगे, भगवान कृष्ण ने जो पांच गांव मांगे थे वह पांच गांव हैं,

1, गजप्रस्थ – गाजी खान ने उसका नाम बदलकर गाजियाबाद रख दिया था.

2, तिलप्रस्थ – जिसका नाम मुगलों ने फरीदाबाद रख दिया था.

3, इंद्रप्रस्थ – जिसका नाम दिल्ली किया गया.

4, सोनप्रस्थ – जिसका नाम सोनीपत हो गया था.

4, पानप्रस्थ – जिसे बाद में बदलकर पानीपत कर दिया गया था.

परंतु दुर्योधन ने कहा, मैं सुई की नोक के बराबर भी भूमि पांडवों को नहीं दूंगा, अहंकार बहुत कष्टदायक होता है, सब कुछ नष्ट कर देता है, और यहीं से महाभारत युद्ध की नींव रखी गई, और युद्ध में दुर्योधन दुशासन, सभी कौरव, मारे गए, भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य इन सभी का देहावसान हुआ.

 युद्ध विनाशकारी होता है, दोनों पक्षों की हानि होती है.

 शांति बनाए रखनी चाहिए.

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०१९ ⇒ भरे पेट का ज्ञान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “भरे पेट का ज्ञान …“।)

?अभी अभी # १०१९ ⇒ आलेख – भरे पेट का ज्ञान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ज्ञान बांटने, और ग्रहण करने के लिए, पेट का भरा होना अत्यावश्यक है। जब भूखे पेट भजन नहीं हो सकता, तो ज्ञानार्जन अथवा ज्ञान का विसर्जन कैसे संभव है।

भक्ति और ज्ञान की भूख किसे नहीं होती। होते हैं कुछ दानवीर, जो खुद भूखे रहकर भी औरों की भूख मिटाते हैं। ज्ञान का भी ऐसा ही है। सुना है, ज्ञान बांटने से बढ़ता है। इसलिए आपके पास ज्ञान हो या न हो, बांटने में ही इतना ज्ञान प्राप्त हो जाता है कि मस्तिष्क में ज्ञान का भंडार जमा हो जाता है। ।

मंदिरों में आरती, प्रसाद, भंडारे का भी कारण यही है कि प्रसाद की आस में हमें कई आरतियां, प्राथनाएं याद हो गई ! आंख बंद करके जब आरती गाते थे, तब आंखों के सामने प्रसाद तैर जाता था। कभी पंडित जी प्रसन्न हुए तो पूरा लड्डू, कभी सिर्फ थोड़ा सा चूरा। तब से ही संतोष की आदत सी पड़ गई है। जिस दिन पंजेरी और ककड़ी का प्रसाद होता था, हथेली इतनी छोटी पड़ जाती थी, कि प्रसाद लेकर बाहर ग्रहण करते ही, कमीज़ से हथेली पोंछकर पुनः प्रसाद की लाइन में लग जाया जाता था।

ज्ञान की भूख इंसान को कहां कहां ले जाती है। कभी लाइब्रेरी तो कभी सरस्वती पुस्तक सदन और कभी काफी हाउस। कॉफी में ऐसा क्या है जो ज्ञान की भूख बढ़ाता है। कॉफी हाउस की कुछ कुर्सियां तो साक्षात व्यास पीठ नजर आती हैं। पूरा कॉफी हाउस किसी कथा के पांडाल की तरह, उनकी प्रतीक्षा किया करता है। उनकी सीट भी आरक्षित होती है। सभी जानते हैं, वे बहुत बड़े लेखक हैं। उनका आज का ज्ञान कल किसी पुस्तक का ज्ञान बनने वाला है, जिसे साहित्यिक पुरस्कार मिलना तय है। उनकी ओछी हरकतों और अश्लील इशारों को सम्मान की नजर से देखा जाता है। ।

उम्र के साथ साथ पेट की जठराग्नि कम होती चली जाती है और बात बात पर खाने को उतारू आदमी, कम और गम खाने लगता है। आसाराम से जला आदमी, हर संत की ओर फूंक फूंक कर कदम रखता है। लेकिन ज्ञान मार्ग की ओर एक बार उठे कदम, कभी वापस नहीं लिए जाते।

जब तक इंसान का पेट भरा रहेगा, संसार में ज्ञान का आगार कायम रहेगा। जब भी किसी को ज्ञान पेलें, यह ध्यान रखें, कहीं वह भूखा न हो, वर्ना खाने को दौड़ पड़ेगा। इसीलिए कवि गोष्ठियों में आजकल चाय नाश्ते का प्रबंध भी रखा जाने लगा है। नेताओं को तो भाषण के बीच सड़े टमाटर और अंडे खाने की आदत पड़ चुकी है। लेकिन आजकल वे भी समझदार हो गए हैं। टीवी और सोशल मीडिया पर ही ज्ञान बांटते हैं। अब आप टीवी का स्क्रीन फोड़ने से तो रहे। ।

डिजिटल जगत में दुनिया का सारा ज्ञान सिमटकर फेसबुक पर आ गया है। सभी तरह के बौद्घिक विमर्श और कविता पाठ फेसबुक पर लाइव चल रहे हैं। जब तक आपका मुंह चलता रहे, पेट पूजा होती रहे, अपनी रुचि एवं स्वादानुसार इसे ग्रहण करते रहिए। उम्मीद है इसमें सब सार सार ही है, थोथा बिल्कुल नहीं। क्या भरोसा कभी आपको भी इस प्रकार का ज्ञान बांटने का अवसर मिल जाए …!!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ दस्तावेज़ – मारिशस से ~ कृतज्ञता ज्ञापन तथा मेरी अपनी कुछ बातें ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी के चुनिन्दा साहित्य को हम अपने प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करते रहते हैं। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं।) 

(ई-अभिव्यक्ति में “दस्तावेज़” श्रृंखला के माध्यम से अमूल्य और ऐतिहासिक तथ्यों को सहेजने का प्रयास है। दस्तावेज़ में ऐसे ऐतिहासिक दस्तावेजों को स्थान देने में आप सभी का सहयोग अपेक्षित है। इस शृंखला की अगली कड़ी में प्रस्तुत है मारिशस से आदरणीय श्री रामदेव धुरंधर जी द्वारा  उनके ८० वें जन्मदिवस के अगले दिन अपने प्रिय  मित्रो और सहृदय पाठकों को धन्यवाद ज्ञापन स्वरुप सन्देश और हमारे लिए भविष्य का एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ “कृतज्ञता ज्ञापन तथा मेरी अपनी कुछ बातें“। उनके जन्मदिवस के अवसर पर ) 

यह विशेष प्रसन्नता का विषय है कि इस शुभ अवसर पर सर्व भाषा ट्रस्ट की ओर से उनकी बहुमूल्य साहित्य-साधना को समेटती ‘रामदेव धुरंधर रचनावली’ (12 खंडों में) पाठकों के लिए उपलब्ध कराई जा रही है। हमें विश्वास है कि यह रचनावली हिंदी साहित्य-जगत के लिए एक महत्त्वपूर्ण धरोहर सिद्ध होगी। इसका संपादन डॉ दीपक पाण्डेय एवं डॉ नूतन पाण्डेय जी ने किया है।

ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से मॉरिशस के लोकप्रिय एवं वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय रामदेव धुरंधर जी को उनके 80वें जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएँ एवं अभिनंदन 💐🙏

☆ दस्तावेज़ # ३१  – मारिशस से ~ कृतज्ञता ज्ञापन तथा मेरी अपनी कुछ बातें☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆ 

मेरी जन्म तिथि 11 जून 2026 के अवसर पर बहुत से मित्रों ने मेरे प्रति मंगलकामना के शब्द प्रेषित किये हैं। मैंने हर नाम को ध्यान से पढ़ने के साथ संलग्न शब्दों को भी पढ़ा और आत्मसात तो निश्चित ही किया। मेरे हिन्दी लेखन के प्रति मित्रों का यह आत्मीय अवदान है। आज यह आलेख लिखते वक्त मुझे थोड़ा विस्मय हो रहा है मैंने कल अस्सी पार कर दी। मैं अब बार — बार लिखता हूँ मेरे लिए यह उम्र बहुत है। यह अनुभव करने से ही मैं ऐसा लिखता हूँ।

फेसबुक ने एक सुविधा की नींव स्थापित कर दी है और मैं भारतेतर हिन्दी लेखक इससे कुछ — कुछ लाभ अर्जित कर लेता हूँ। अन्यथा पहले तो मैं पत्रों से काम लेता था। पत्र के आने — जाने में तो महीने लग जाते थे। पर आज समय परिवर्तित हुआ है। इन दिनों मैं फेसबुक में नित्य एक रचना डाल देता हूँ और उसकी लिखित प्रतिक्रिया मुझे प्राप्त हो जाती है। हाथ से लिखे जाने और पांडुलिपि डाक से भेजने के दिनों भी मैंने बहुत ही लिखा। पर इधर के दिनों में एक तो लेखन में रफ्तार आई और फेसबुक के आधार पर हजारों मित्रों से तारतम्य बनाने का संयोग हाथ लगा है। मैं मानता हूँ इस सुविधा ने मुझे लेखन में कुछ कदम आगे तो बढ़ाया ही है। तमाम — तमाम लेखक हैं जिनकी ओर मैंने हाथ बढ़ाया और उन्होंने स्वीकृति की मुहर से मेरे जेहन में अपने लिए स्थान बना लिया। उन्होंने भी अपनी ओर से मित्रता की पहल की।

मैं धर्मयुग और सारिका के जमाने से लिखा करता था बल्कि हिन्दी जगत में स्थापित होने के लिए यही मेरा आधार हुआ। मैं सरकारी स्कूल में हिन्दी का अध्यापक था। [1970 – 1976 ] मेरी पहली नियुक्ति रोमन कैथोलिक एडड् स्कूल में हुई थी। वहाँ मुझे हिन्दी का उद्धाटन करना था। रोमन कैथोलिक एडड् स्कूल होने से वहाँ अंग्रेजी फ्रेंच के अध्यापक सब के सब क्रिश्चियन थे। मैं अपने को बहुत अजनबी अनुभव करता था, बल्कि वे स्वयं मुझे अजनबी के कगार पर खड़ा देखना पसंद करते थे। यह लगभग क्रिओल इलाका था। भारतीय खून के बहुत से लोग स्वयं आ कर कह जाते थे उनके बच्चे हिन्दी पढ़ना पसंद नहीं करते। यह सुनने पर स्कूल के क्रिश्चियन टीचरों के बीच तो नाच का समा बंध जाता था। आज मॉरिशस के हिन्दी अध्यापक पता नहीं मेरी इन बातों को किस अर्थ में लें। तब के जिन हिन्दी अध्यापकों से आज मुलाकात हो जाती है हम वे अतीती बातें कर लेते हैं। हमारे साथ निश्चित ही यह बात साकार है हमने अपना जंगल काट कर स्वयं अपनी पगडंडी बनायी है।

अपने हिन्दी लेखन को भी मैं इसी वाक्य से जोड़ता हूँ। जंगल हो और मुझे धुन चढ़ गई हो मैं अपनी पगडंडी का निर्माण तो कर ही लूँ।

एक स्कूल से दूसरे स्कूल के लिए मेरा तबादला होता रहता और अवकाश वाली साठ की उम्र मेरे शरीर में दस्तक देने आ जाती। इस वक्त मैं अपनी जीवनी तो न लिख रहा हूँ, लेकिन जरूर अपने जीवन में हिन्दी का अनंत अनुराग समाहित होने की एक तस्वीर की रचना कर रहा हूँ। मैंने जिस स्कूल की पूर्व पँक्तियों में चर्चा की उन्हीं दिनों मुझे नागपुर में [ 1975 ] आयोजित विश्व हिन्दी सम्मेलन में भाग लेने का अवसर मिल गया था। इसका श्रेय मेरे कहानी लेखन को जाता। मैं धर्मयुग और सारिका के माध्यम से कुछ प्रसिद्धि हासिल कर चुका था। उन दिनों तो फोन तक का खास बोलबाला नहीं था। शिक्षा मंत्रालय से अधिकारी यह सूचना मुझे देने मोटर में स्कूल आए थे। उन्हें स्कूल की बही में लिखना था मुझे कितने दिनों की छुट्टी चाहिए। स्कूल की हेड क्रिश्चियन महिला होने से उसने तो इस तरह से जताया था भारत तो उसके लिए एक अपरिचित देश है। उन्हीं दिनों एक क्रिश्चियन महिला टीचर ऑस्ट्रेलिया जा रही थी। उसका पति ऑस्ट्रेलिया में रहता था। उस स्कूल से विदेश जाने वाला तो मैं उस महिला के समकक्ष था, लेकिन स्कूल में मात्र उसके नाम पर पार्टी रखी गई थी। मैंने महिला हेड टीचर को बाध्य किया था भारत से जोड़ कर मेरा नाम लिया जाए।

भारत से लौटने पर मेरे जीवन में ऐसा वक्त आया मेरे लिए फिर से मंत्रालय की ओर से अधिकारी मोटर में स्कूल आए और मुझे ऑफिस में बुला कर सूचित किया गया महात्मा गांधी संस्थान के लिए मेरा तबादला हो रहा है। मैं मंत्री खेर जगतसिंह का तब भी आभारी था और आज भी उनका कर्ज अपने सिर पर मानता हूँ। वे भी नागपुर विश्व हिन्दी सम्मेलन में गए थे। अभिमन्यु अनत तो निश्चित ही वहाँ थे। खेर जगतसिंह ने वहाँ अनत की अद्भुत चर्चा सुनने पर वहीं घोषित कर दिया था महात्मा गांधी संस्थान में वे हिन्दी की गरिमा के लिए अपनी सेवा प्रदान करने जाएँ। अनत प्राइमेरी सरकारी स्कूल में हिन्दी टीचर थे। उनका तबादला क्रीड़ा मंत्रालय के हिन्दी नाट्य विभाग में हो गया था। खेर जगतसिंह का नाम मैं इस वक्त भारतीय भावना के एक महान शख्स के रूप में ले रहा हूँ। उन दिनों वे योजना मंत्री थे। उन्हीं की योजना के तहत महात्मा गांधी संस्थान का निर्माण हुआ था। संस्थान का उद्घाटन भारत की प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के कर कमलों से हुआ था।

मैं जिस चुनाव इलाके से था खेर जगतसिंह यहीं निर्वाचित हुए थे। मैंने पहले भी लिखा इस वक्त दोहरा रहा हूँ नागपुर में हमारी आपसी पहचान हुई थी। उन्होंने वहाँ मेरा नाम सुना और अनत की तरह मेरा भी इस रूप में एक भविष्य निर्धारित कर दिया महात्मा गांधी संस्थान में हिन्दी के लिए कुछ विशेष रचनात्मक सेवा प्रदान करूँ। अनत वहाँ ‘वसंत’ पत्रिका शुरु कर चुके थे। हमारे प्यारे कवि पूजानन्द नेमा उनके साथ कार्यरत थे। मैं वहाँ जुड़ा तो बच्चों की एक पत्रिका की योजना बनी। हम नाम सोच रहे थे। नाम न मिलने से तो हमने हिडिंबा तक उच्चार दिया था। मेरे मुँह से निकला था रिमझिम। यही नाम मान्य हो गया। अभिमन्यु अनत ने संपादकीय में लिखा था रिमझिम नाम रामदेव धुरंधर की ओर से पारित हुआ है। यह अनत की उदारता थी।

मेरी बात इस तरह से है महात्मा गांधी संस्थान में जाने के बाद मेरे लिए वह मेरा एक नया हिन्दी जगत हुआ। कमलेश्वर, धर्मवीर भारती, राजेन्द्र यादव, मनोहर श्याम जाशी, नामवरसिंह, गंगाप्रसाद विमल, चित्रा मुद्गल, उनके पति अवध नारायण, डा. विनय तथा और भी अनेक लेखकों को हमने हिन्दी लेखन कार्यशाला संचालित करने के लिए बुलाया। सचमुच यहाँ लेखक तैयार होते थे। इन भारतीय हिन्दी मनीषियों ने यहाँ के लोगों की जुबानी इनकी कहानी कविता सुनी। इन्होंने सराहा भी और निर्देश भी दिया लेखन को कैसा होना चाहिए। यह मैं सन् 2000 से पहले की बात कर रहा हूँ। उन दिनों के हम सभी तो अवकाश ग्रही हो गए। मुझे पता नहीं इधर के दिनों में महात्मा गांधी संस्थान की ओर से उस तरह की कार्यशाला संचालित करने के लिए भारतीय विद्वानों को बुलाया गया हो।

स्वनामधन्य धर्मवीर भारती के सौजन्य से मैं भारत में कहानीकार के रूप में जाना गया। इसी के समानांतर मेरी निजी बात इस तरह से है मैंने महात्मा गांधी संस्थान में तीस साल तक नौकरी निभाने की प्रक्रिया में वहीं लेखन के कुछ गहरे मर्म का संयोग हासिल किया। अनत और नेमा हम तीनों साहित्य की बात तो करते रहते थे।

महात्मा गांधी संस्थान में हिन्दी की बहुतायत पुस्तकें थीं। इस संस्थान ने मुझे पुस्तकों के रेले – मेले में एक मेक कर दिया और मैं था कि जहाँ तक हो सका खूब पुस्तकें पढ़ना शुरु कर दिया। माटी मटाल, ययाति, मैला आंचल, परती परिकथा, ओशो की तमाम पुस्तकें, प्रेमचंद का साहित्यिक खजाना, मोहन राकेश के नाटक, अज्ञेय, निराला, बाणभट्ट की आत्मकथा, शरतचंद के हिन्दी रूपांतरण उपन्यास तथा मेरे मन के लायक और भी तमाम तमाम कृतियाँ मुझे नसीब होती गईं। मैं पुस्तकों से माला माल जैसी स्थिति में पढ़ने के साथ लेखन का रहस्य सीखने का मानो अपना मंत्र साधता रहा।

इस संदर्भ को मैं फेसबुक आगे भी जारी रखूँगा।

अभी के लिए यह बात कर लूँ बहुत से मित्रों ने मेरे जन्म दिन के अवसर पर लिखा, लेकिन मैं एक — एक को उत्तर कर पाना असंभव सा पा रहा हूँ। अतः बिना शाब्दिक वापसी के वह मेरे पास ही रह जाए। आप लोगों के लिए बस धन्यवाद ही।

कल ऐसा भी हुआ था मित्र राजेश सिंह ने मेरा जन्म दिन मनाने के लिए एक खास व्यवस्था की थी। बहुत से लोग जुड़े थे। राजेश ने मुझे बताया लोगों ने मुझ पर आधारित रचना का पाठ किया। राजेश ने कुछ मिनट के लिए मोबाईल से मुझे कार्यक्रम से जोड़ दिया था। आभार राजेश जी।

कल 11 जून को सर्वभाषा प्रकाशन के श्री केशव मोहन पाण्डेय जी ने ‘रामदेव धुरंधर रचनावली’ के कवर पेज से हिन्दी जगत को अवगत करवा दिया। उन्होंने बहुत सुन्दर बनाया है। मेरे अस्सीवें जन्म दिन के अवसर पर प्रकाशक की ओर से यह अनमोल उपहार रहा। स्वाभाविक है लेखक के साथ प्रकाशन की उसकी अपनी तृषा जुड़ी होती है। लेखक के नाते मैं भी तो इस धारा का एक बेबाक तैराक हुआ करता हूँ।

***

© श्री रामदेव धुरंधर

दिनांक  – 12 – 06 — 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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