(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ठंड और रजाई…“।)
अभी अभी # ८७७ ⇒ आलेख – ठंड और रजाई श्री प्रदीप शर्मा
जब मौसम करवट लेता है, और ठंड दस्तक देती है, तो सबसे पहले रजाई बाहर आती है। अचानक चादर छोटी पड़ने लग जाती है, और इंसान सोचता है, चादर अचानक इतनी ठंडी क्यों हो गई है।
वैसे चादर दो होती है, एक ओढ़ने की और एक बिछाने की। लेकिन जहां गरीबी में आटा गीला हो, वहां इंसान क्या तो ओढ़े और क्या बिछाए। कई बार तो अचानक ठंड पड़ने पर, हमने बिछाई हुई चादर भी ऊपर से ओढ़ी है।।
वैसे कबीर ने सारा ज्ञान चादर पर ही बांटा है, रजाई पर कभी उसका ध्यान नहीं गया। जाता भी कैसे, जुलाहा होते हुए भी हमेशा बाबा बनकर ही तो घूमते रहते थे ;
दास कबीर जतन से ओढ़ी
ज्यों की त्यों
धर दीनी रे चदरिया।।
ठंड में हम भी कबीर बन जाते हैं। चादर को ज्यों की त्यों रख देते हैं और रजाई में घुस जाते हैं। ठंड में रजाई का विकल्प सिर्फ कंबल है। पहले खादी भंडार वाले कम्बल आते थे, जो शरीर को चुभते थे। उधर ठंड चुभ रही और इधर ठंड से बचने जाओ तो कम्बल चुभे। साथ में एक चादर भी ओढ़ना ही पड़ती थी।
समय के साथ गुदगुदे इंपोर्टेड कंबल भी आ गए और मोटी मोटी रजाई की जगह जयपुरी रजाई ने ले ली। जब हमारे घरों में पलंग नहीं थे तो हम सभी भाई बहन जमीन पर ही लाइन से सोते थे। जमीन पर गद्दे बिछते थे और चादर, कंबल, रजाई, जो जिसके हाथ आई। अधिक ठंड होने पर कौन किसकी रजाई खींच रहा है, कौन किसके कंबल में घुस रहा है, कुछ पता नहीं चलता था।।
आजकल कौन जमीन पर सोता है। गद्दे भी कैसे कैसे आ गए हैं, kurl on और sleep well. वैसे तो well का अर्थ कुंआ भी होता है, लेकिन कुंए में ठंड में कौन सोता है।
हमारा तो आज भी बीस किलो रूई वाला गद्दा है और भरी पूरी गदराई हुई रजाई। हम ना तो लग्ज़री सोफे के आदी हैं और ना ही स्लीप वैल वाले गद्दों के। जब कभी घर से बाहर, मजबूरी में, होटलों में ठहरते हैं, तो घर के गद्दे रजाई बहुत याद आते हैं। एक वह भी जमाना था, जब बाहर घूमने जाते थे, तो बिस्तरबंद यानी
होलडॉल साथ ले जाते थे।
आज तो सुविधा ही सुविधा है।।
पूरी ठंड हमारी रजाई से यारी रहेगी। लेकिन यह हरजाई भी घुसने से पहले बहुत ठंडी रहती है। यकीन मानिए, रजाई को भी गर्म हम ही करते हैं, हमारे बिना कैसी ठिठुरती रहती है।
रजाई में घुसते ही पहले हम उसे गर्म करते हैं, फिर वह हमें रात भर गर्म रखती है। सुबह उसे छोड़ने का मन नहीं करता। लेकिन वह भी जानती है इंसान की फितरत, इधर सर्दी हवा हुई, उधर हमने दल बदला। रजाई को अलविदा कहा और चादर ओढ़कर सो गए। किसी ने कहा भी तो है ;
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “छोटा मुंह बड़ी बात…“।)
अभी अभी # ८७६ ⇒ आलेख – छोटा मुंह बड़ी बात श्री प्रदीप शर्मा
न जाने क्यों, हमारी कहावतें पत्थर की लकीर होती है। कहीं भी, कभी भी, उनका उपयोग , सदुपयोग, अथवा दुरुपयोग किया जा सकता है। अब छोटा मुंह , बड़ी बात को ही ले लीजिए ! क्या किसी का मुंह छोटा बड़ा होता है !
कोई ओहदे में छोटा आदमी अगर बड़ी बात कह दे, तो उसका इसी तरह मज़ाक उड़ाया जाता है। पहले हम उसे छोटा साबित करते हैं, बाद में उसकी तारीफ करते हैं। छोटा मुंह, बड़ी बात !हम ऐसे ही हैं।।
इस कहावत का एक पहलू और भी है ! एक नन्हा सा बच्चा जब कोई बड़ी बात कह देता है, तब उसकी तारीफ में भी हम यही बात कहते हैं। वाह ! छोटा मुंह बड़ी बात। एक मासूम से चेहरे से इतनी बड़ी बात सुनकर आश्चर्य सा होता है। यहां यह मुहावरा नकारात्मक नहीं है, किसी की खिल्ली नहीं उड़ा रहा, उसकी प्रशंसा ही कर रहा है।
आज इस छोटे मुंह से कुछ, मुंह की बातें करेंगे। अभी दो भूतपूर्व और वर्तमान मुख्यमंत्रियों में मुंह को लेकर छींटाकशी हुई। एक वर्तमान ने , एक भूतपूर्व पर ताना कसा, आपने अपने कार्यकाल में सिर्फ मुंह चलाया। भूतपूर्व ने तुरंत अपना मुंह चलाया, मुंह तो आप चला रहे हो, हमने तो सरकार चलाई।।
जब हम मुंह चलाते हैं, तब यह कहां जाता है, कहां तक जाता है ? जब मुंह, वहीं अपने स्थान पर रहता है, केवल ज़बान चलती है , फिर समझ में नहीं आता, मुंह कैसे चलता है। ज़बान भी अगर चलती है, तो एक कुएं के मेंढक जैसी मुंह में ही घूमा करती है। जब कभी, अगर बाहर भी आती है, तो किसी को चिढ़ाने के लिए जीभ बन जाती है। बच्चों को किसी को चिढ़ाने में बड़ा मज़ा आता है। वे कभी मुंह बनाते हैं, तो कभी जीभ चिढ़ाते हैं।
मुंह चलाया ही नहीं जाता, मुंह बनाया भी जाता है। अब मुंह कोई घर तो नहीं, कि ईंट सीमेंट से बनाया जाए। भगवान ने रेडीमेड भिजवाया है, फिर भी हम मुंह को बिगाड़ कर मुंह बनाते हैं। इंसान कुछ बिगाड़कर बना तो नहीं सकता, चलो मुंह ही बनाकर बिगाड़ें।।
कई बार हम मुंह की खाते हैं।
मुंह से तो हम रोज़ खाते हैं। कभी ऐसा हुआ है, कि आप कहीं गए हों, और अपना मुंह साथ नहीं लेकर गए हों। फिर भी लोग सुना ही देते हैं, लो मुंह उठाकर चले आए। मानो हम उनसे हमारे ही मुंह उठाने का किराया मांग लेंगे।
कितना बुरा लगता है, जब कोई आपके बारे में कह देता है , अरे उसके मुंह मत लगो, वह तो ऐसा ही है। आपके मुंह में ऐसा क्या है ? क्या आपके मुंह से बदबू आ रही है। आप भी गुस्से में कह ही देते हो। हां वह तो तुम्हारा ही मुंह लगा है, इधर क्यूं मुंह मारेगा।।
मुझे जो कहना था, मैंने कह दिया। आप यही कहोगे न, ये मुंह और मसूर की दाल ? अपने मुंह मियां मिट्ठू बनना मुझे पसंद नहीं, फिर भी जो बात मुंह से नहीं कह सकते, लिखकर तो बता ही सकते हैं न।
अब आप चाहें मुंह बनाएं, या बिगाड़ें, हमने तो छोटा मुंह, बड़ी बात कह ही दी। मुंह चलाना कोई हमसे सीखे।
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख ग़ुमशुदा रिश्ते। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३०४ ☆
☆ ग़ुमशुदा रिश्ते… ☆
‘हक़ीक़त में गुमनाम सपने ढूंढ रही हूं/ अपनों की भीड़ में/ आजकल ग़ुमशुदा ढूंढ रही हूं।’ ग़ुमशुदा… ग़ुमशुदा…ग़़ुमशुदा। जी हां! यह है आज की ज़िंदगी की हक़ीक़त…हर इंसान को तलाश है सुक़ून की, जो अपनों के सान्निध्य व संसर्ग से प्राप्त होता है और सबसे कठिन है … अपनों की भीड़ में से अपनों की तलाश करना। वे तथाकथित अपने; जो अपना होने का स्वांग रचते हैं और स्वार्थ-साधने के हित आपके आसपास मंडराते रहते हैं। ऐसे लोग तब तक आपके अपने बनकर रहते हैं, जब तक आप किसी पद पर काबिज़ हैं और पद-प्रतिष्ठा के न रहने पर वे आपको पहचानते भी नहीं। यदि आपको उनकी ज़रूरत होती है, तो वे पास से कन्नी काट जाते हैं। यही कटु यथार्थ है ज़िंदगी का– जहां सब रिश्ते-नाते स्वार्थ से जुड़े हैं। सो! रिश्तों की अहमियत रही नहीं और अपने ही अपने बन, अपनों को छलते हैं। चारों ओर अविश्वास का वातावरण व्याप्त है; संदेह, शक़ व आशंका मानव के हृदय में इस प्रकार रचे-बसे हैं कि पति-पत्नी के रिश्ते भी दरक़ रहे हैं। पहले सात फेरों के बंधन को सात जन्मों का पावन बंधन स्वीकार, उसका निबाह हर कीमत पर किया जाता था; परंतु अब स्थिति पूर्णत: विपरीत है। एक छत के नीचे रहते हुए, एक- दूसरे के सुख-दु:ख से बेखबर पति-पत्नी अपना जीवन अजनबी-सम ढोते हैं। उनमें स्नेह, संबंध व सरोकार समाप्त हो चुके हैं। सब अपने-अपने अहम् में डूबे, एक-दूसरे को नीचा दिखाने हेतू भावनाओं पर कुठाराघात कर सुक़ून पाते हैं और बच्चे एकांत की त्रासदी झेलते हुए ग़लत राहों पर अग्रसर हो जाते हैं; जहां से लौट पाना मात्र स्वप्न बन कर रह जाता है।
हर इंसान गुमनाम सपनों के पीछे बेतहाशा दौड़ता चला जा रहा है। कम से कम समय में अधिकाधिक धन कमाने की होड़ के निमित्त वह झोंक देता है अपना जीवन और होम कर देता है अपने स्वप्न… जिसका उदाहरण कॉरपोरेट जगत् के रूप में हम सब के समक्ष है। इस क्षेत्र में काम करने वाले युवा अक्सर विवाह के बंधन को नकारने लगे हैं। यदि वे इस बंधन को पावन समझ स्वीकार भी लेते हैं; तो उनमें चंद दिनों बाद अलगाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, क्योंकि उनकी नज़रों में घर-परिवार की अहमियत होती ही नहीं। उनके बीच पारस्परिक संवाद भी नहीं होता, क्योंकि उनके पास न एक-दूसरे के लिए समय होता है, न ही होती है– एक-दूसरे की दरक़ार। वे दोषारोपण करने का एक भी अवसर नहीं चूकते और एक दिन ज़िंदगी उन्हें उस मुक़ाम पर लाकर खड़ा कर देती है, जहां वे एक-दूसरे की भावनाओं को नकार स्वतंत्रता से जीवन जीना चाहते हैं… जिसका सबसे अधिक खामियाज़ा मासूम बच्चों को भुगतना पड़ता है तथा उन अभागोंं को माता-पिता दोनों का स्नेह व संरक्षण मिल ही नहीं पाता। सो! इन विषम परिस्थितियों में उनका सर्वांगीण विकास कैसे संभव हो सकता है?
हां! यदि बुज़ुर्ग माता-पिता भी उनके साथ रहते हैं, तो वे देर रात तक उनकी राह निहारते रहते हैं। दोनों थके-मांदे, काम का बोझ सिर पर लादे अलग-अलग समय पर घर लौटते हैं और दिन-भर की खीझ एक-दूसरे पर निकाल संतोष पाते हैं। अक्सर बच्चे उनकी बाट जोहते-जोहते सो जाते हैं और वे संडे मम्मी-पापा बन कर रह जाते हैं। यदि बच्चे किसी दिन मान-मनुहार करते हैं, तो उन्हें उनके कोप का भाजन बनना पड़ता है। सो! वे आया व नैनी के प्रति अपने माता- पिता से अधिक स्नेह व आत्मीयता का भाव रखते हैं। जब वे दूसरे बच्चों को अपने माता- पिता के साथ मौज-मस्ती व अठखेलियां करते देखते हैं, तो उनके हृदय का आक्रोश ज्वालामुखी पर्वत के लावे के समान सहसा फूट निकलता है और वे डरे-सहमे से अवसाद की स्थिति में पहुंच जाते हैं और दिन-रात मोबाइल व टी• वी• में खोए रहते हैं…आत्मीय संबंध- सरोकारों से दूर आत्मकेंद्रित होकर रह जाते हैं तथा बच्चों व युवाओं की अपराधिक प्रवृत्तियों में लिप्तता, माता-पिता द्वारा प्रदत्त एकाकीपन के उपहार के रूप में परिलक्षित होती है।
वैसे तो आजकल हर इंसान ग़ुमशुदा है। अतिव्यस्तता के कारण सबके पास समयाभाव रहता है। दोस्तो! आजकल तो इंसान की ख़ुद से भी मुलाक़ात नहीं होती। इक्कीसवीं सदी में मानव मशीन बनकर और संयुक्त परिवार, एकल परिवार के दायरे में सिमट कर रह गए हैं। पति-पत्नी व बच्चे एकल परिवार की इकाई स्वीकारे जाते हैं। हां! इस युग में कामवाली बाईयों का भाग्योदय अवश्य हुआ है। उन्हें मालकिन का दर्जा प्राप्त हुआ है और वे सुख- सुविधाओं का बखूबी आनंद ले रही हैं। उन्हें किसी का तनिक भी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं। यह है, इस सदी की विशेष उपलब्धि…उनका जीवन-स्तर अवश्य काफी ऊंचा हो गया है, क्योंकि उनके बिना तो आजकल गुज़र-बसर की कल्पना करना भी बेमानी है। वैसे भी उनके तो भाव भी आजकल बहुत बढ़ गए हैं। उनसे सबको डर कर रहना पड़ता है। उनकी इच्छा के बिना तो घर में पत्ता भी नहीं हिलता। वे बच्चों से लेकर बड़ों तक को अपने इशारों पर नचाती हैं। इतना ही नहीं, सगे-संबंधी भी उस घर में दस्तक देते हुए क़तराने लगे हैं।
दुनिया का दस्तूर है साहब! जब तक पैसा है, तब तक सब पूछते हैं…’हाउ आर यू?’ और पैसा खत्म होते ही ‘हू आर यू?’ यह जीवन का कटु यथार्थ है कि ‘हाउ से हू ‘ की यात्रा पलक झपकते कैसे सम्पन्न हो जाती है; इंसान समझ ही नहीं पाता और यह स्वार्थ का पहिया निरंतर समय के साथ ही नहीं, पद-प्रतिष्ठा के साथ घूमता रहता है। दौलत में वह चुंबकीय शक्ति है…जो ग़ैरों को भी अपना बना लेती है। सत्य ही तो है, ‘जब दौलत आती है, इंसान खुद को भूल जाता है और जब जाती है, तो ज़माना उसे भूल जाता है।’ धन-संपदा पाकर व्यक्ति अहंनिष्ठ हो जाता है तथा स्वयं को सर्वश्रेष्ठ स्वीकारने लगता है। दूसरों को अपने सम्मुख निकृष्ट समझ, उनकी भावनाओं का निरादर करने लगता है और सबको एक लाठी से हांकने लगता है। उस स्थिति में वह भूल जाता है कि लक्ष्मी चंचला है… एक स्थान पर टिक कर कभी नहीं रहती और जब वह चली जाती है, तो ज़माने के लोग भी अक्सर उससे मुख मोड़ लेते हैं… उसे लेशमात्र भी अहमियत नहीं देते। वास्तव में दोनों स्थितियों में वह एकांत की त्रासदी झेलता है। प्रथम में वह स्वेच्छा से सबसे दूरियां बनाए रखता है और दौलत के न रहने पर तो कोई भी उससे बात करना भी पसंद नहीं करता। यह है नियति उस इंसान की… जिसके लिए दोनों स्थितियां ही भयावह हैं। बिहारी का यह दोहा, ‘कनक-कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय/ इहि पाये बौराय जग, उहि पाये बौराय।’ इंसान बावरा है…धन-संपदा प्राप्त होने पर बौरा जाता है और धतूरा खाने के पश्चात् उसकी सोचने- समझने की शक्ति नष्ट हो जाती है… उसका व्यवहार सामान्य नहीं रह पाता। शायद! इसलिए कहा जाता है कि जिसे ‘मैं’ की हवा लगती है, उसे न दुआ लगती है, न दवा लगती है’ तथा अहंनिष्ठ व्यक्ति दौलत व सुरा-सुंदरी के नशे में आठों पहर धुत रहता है। सोने को पाकर और धतूरे को खाकर लोग आत्म-नियंत्रण खो बैठते हैं, यह कथन सर्वथा सत्य है।
वैसे तो आजकल ‘लिव-इन’ का ज़माना है तथा उसे कोर्ट-कचहरी द्वारा मान्यता प्राप्त है। सो! घर-परिवार तेज़ी से टूट रहे हैं, जिसमें ‘मी टू’ का भी अहम् योगदान है। वर्षों पूर्व के संबंधों को उजागर करने की स्वतंत्रता के कारण हंसते- खेलते परिवार अग्नि की भेंट चढ़ रहे हैं। इतना ही नहीं, आजकल तो परस्त्री गमन की भी आज़ादी है, जिसके परिणाम-स्वरूप घर-परिवार में पारस्परिक संबंध व स्नेह-सौहार्द समाप्त हो रहा है। संदेह व अविश्वास के कारण रिश्ते दरक़ रहे हैं। इस विघटन के लिए दोनों दोषी हैं और उनकी समान प्रतिभागिता है। महिलाएं भी कहां कम हैं…वे भी पुरुषों की भांति जीन्स-कल्चर अपना कर, क्लबों व महफ़िलों की शोभा बनने में फ़ख्र महसूस करने लगी हैं। वे अक्सर सड़क व आफिस में शराब के नशे में धुत्त, मदमस्त हो सिगरेट के क़श लगाती व जुआ खेलती नज़र आती हैं, जिसे देखकर मस्तक शर्म से झुक जाता है। शायद! यह सदियों पुरानी दासता व अंकुश का परिणाम व जुनून है, जो सिर चढ़ कर बोल रहा है।
समाज में बढ़ रही अराजकता व विश्रंखलता का मुख्य कारण यह है कि हम परिस्थितियों को बदलने का प्रयास करते हैं; स्वयं को नहीं। इसलिए जीवन में विषम परिस्थितियां व विसंगतियां उत्पन्न होती हैं और जीवन हमें दुआ नहीं, सज़ा-सा लगता है। अहं के कारण पति- पत्नी में स्नेह-सौहार्द रहा नहीं, न ही शेष बचे हैं..आत्मीयता व सामाजिक सरोकार। संवेदनाएं मर चुकी हैं और वे दोनों अकारण एक-दूसरे को नीचा दिखाने हेतु विभिन्न हथकंडे अपनाते हैं, जिसके परिणाम-स्वरूप आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला थमने का नाम नहीं लेता। वे प्रतिपक्ष के परिजनों पर आक्षेप लगा, कटघरे में खड़ा करने में तनिक भी संकोच नहीं करते। इस गतिविधि में महिलाएं अग्रणी हैं। वे पति व उसके परिवारजनों पर दहेज व घरेलू हिंसा का आरोप लगा किसी भी पल जेल भिजवाने से लेशमात्र भी ग़ुरेज़ नहीं करती हैं।
कैसा ज़माना आ गया है…’आजकल तो ख़ुद से ही ख़ुद की मुलाकात नहीं होती’ सर्वथा सत्य है। सो! अक्सर यह संदेश दिया जाता है कि ‘इंसान को कुछ समय अपने साथ अवश्य व्यतीत करना चाहिए।’ वास्तव में आत्मावलोकन व अपने अंतर्मन में झांकना सर्वश्रेष्ठ व सर्वोत्तम योग है, आत्म-साक्षात्कार है। एकांत में किया गया चिंतन आत्मा को परमात्मा से मिलाता है तथा उस स्थिति में पहुंच कर सभी कामनाओं व वासनाओं का अंत हो जाता है…आत्मा का परमात्मा से तादात्म्य हो जाता है। जो व्यक्ति प्रतिदिन अपने द्वारा किए गए कर्मों का आकलन करता है, तो उसे ज्ञात हो जाता है कि आज तक उसने कैसे कर्म किए हैं? सो! वह सत्कर्मों की ओर प्रवृत्त होता है तथा राग-द्वेष के बंधनों से मुक्ति प्राप्त कर लेता है…अपने मन का मालिक बन जाता है। वह अलौकिक आनंद अथवा अनहद-नाद की स्थिति में रहता है। उसे किसी की संगति की अपेक्षा नहीं रहती। उस स्थिति में वह यही कामना करता है …नैना अंतर आव तू, नैन झांप तोहे लेहुं/ ना हौं देखूं ओर को, ना तुझ देखन देहुं।’ इस स्थिति में आत्मा का परमात्मा से साक्षात्कार हो जाता है और वह हर पल सृष्टि-नियंता के दर्शन पाकर अलौकिक आनंद की मस्ती में रहती है।
‘सो! खुली आंख से स्वप्न देखिए, ताकि वे गुमनामी के अंधकार में न खो जाएं और जब तक वे साकार न हो जाएं, आप विश्राम न करें…उनके पूर्ण होने पर ही सुख की सांस लें।’ सपनों को साकार करना भी अपनों की भीड़ में ग़ुमशुदा अर्थात् अपनों की तलाश करने जैसा है। वास्तव में अपने वे होते हैं, जो सदैव आपकी ढाल बनकर आपके साथ खड़े रहते हैं। इतना ही नहीं आपकी अनुपस्थिति में भी वे आपके पक्षधर रहते हैं। सो! स्वार्थ व मतलब के बगैर के संबंधों के का फल मीठा होता है।’ इसलिए मानव को नि:स्वार्थ भाव से निष्काम कर्म करने का संदेश दिया गया है। दुनिया की सबसे अच्छी किताब आप स्वयं हैं। ख़ुद को समझ लीजिए, समस्याओं का स्वत: अंत हो जाएगा। सो! अपनी सोच बड़ी व सकारात्मक रखिए। छोटी सोच शंका और बड़ी सोच समाधान को जन्म देती है। इसलिए सुनना सीख लो, सहना व रहना स्वत:आ जाएगा। जिसे सहना आ गया, उसे जीना आ गया। संवाद संबंधों की जीवन-रेखा है। जब आप संवाद करना बंद कर देते हैं; अमूल्य संबंध नष्ट होने लगते हैं, क्योंकि संबंध कभी भी जीतकर नहीं निभाए जा सकते… उनके लिए झुकना व पराजय स्वीकार करना लाज़िमी होता है।
अन्ततः ग़ुमनाम सपनों को तलाशना जितना कठिन है, उससे भी अधिक कठिन है… अपनों की भीड़ में ग़ुमशुदा अर्थात् अपनों को ढूंढना। वैसे तो आजकल हर इंसान ख़ुद से बेखबर है। वह कहां जानता है… वह कौन है, कौन से आया है और इस संसार में उसके जीवन का प्रयोजन क्या है? अज्ञानतावश वह आजीवन उलझा रहता है–माया-मोह के बंधनों में और शाश्वत् संबंधों से बेख़बर, वह लख चौरासी के बंधनों में उलझा रहता है। आइए! अपनों की भीड़ में से पहले स्वयं को ढूंढ कर, ख़ुद से मुलाकात करें। उसके पश्चात् उन अपनों को ढूंढें, जो मुखौटा धारण किए रहते हैं… गिरगिट की भांति हर पल रंग बदलते हैं। सो! आजकल किसी पर भी विश्वास करना अत्यंत कठिन व दुष्कर है। ‘कौन अपना कब दग़ा दे जाए’… कोई नहीं जानता। सो! अपने ही घर में दस्तक देते हुए भ्रमित मानव को अजनबीपन का अहसास होने लगा है…मानो वह ग़ुमशुदा है।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “धरती कहे पुकार के…“।)
अभी अभी # ८७५ ⇒ आलेख – धरती कहे पुकार के श्री प्रदीप शर्मा
यह धरती हमारी मां है, इसकी गोद सदा हरी भरी रहती है । इसके आंचल में सिर्फ दूध और पानी ही नहीं, मणि रत्न, हीरे मोती , खनिज सभी है। इसी धरती पर अगर नेकी का दरिया है तो आग का दरिया भी । उसकी आंख में करुणा ममता है, दो तिहाई जल से यह सभी प्राणियों की प्यास बुझाती है। यह जब आंसू बहाती है, तो नदी नाले पूर हो जाते हैं, उनमें बाढ़ आ जाती है । अपने आंसुओं से सींचती है यह अपने कई करोड़ पुत्र रत्नों को ।
यह हमेशा धैर्य धारण करती है, इसीलिए तो इसका नाम धरती है । सभी जलचर, नभचर और थलचर इसकी ही गोद में पलते हैं, सबके दाना पानी की यह व्यवस्था करती है । चींटी से हाथी तक की उसे चिंता रहती है ।।
ऊपर से शांत और समृद्ध दिखाई देने वाली इस धरती के गर्भ में क्या है और क्या नहीं । कहीं जड़ और कहीं चेतन, कहीं सागर तो कहीं मरुस्थल, कहीं दिन तो कहीं रात, कहीं सूखा तो कहीं बरसात ।
जो सहन करता है, धैर्य धारण करता है, उसके अंदर सिर्फ ममता ही नहीं, आग भी होती है । कब तक आंसू बहाती रहेगी यह धरती । कभी तो उसकी सहनशक्ति की भी अति होती है । उसका दर्द जब आंसुओं से बयां नहीं होता
तो ज्वालामुखी बन फूट पड़ता है । जहां कभी कलकल सरिता बहती थी, वहां आग का दरिया बह निकलता है । सृष्टि का यही रूप तो तांडव का रूप है ।।
मां स्वरूपा यह धरती भी जब अपनी ही संतानों की काली करतूतों से त्रस्त हो जाती है, तो वह अपना संतुलन खो बैठती है । भूकंप और जलजला यूं ही नहीं आता । शिव जी का तीसरा नेत्र यूं ही नहीं खुलता ।सूखा, बीमारी, हैजा तपेदिक और कोरोना वायरस सब हमारे ही पापों की सजा है ।
विधि का विधान अपनी जगह है और मनुष्य का ज्ञान अपनी जगह । वह अपनी प्यास बुझाने के लिए कभी कुएं खोदता था, बावड़ियों का निर्माण करता था । फिर उसने नदियों पर बांध बनाना शुरू कर दिया, क्योंकि उसे बिजली चाहिए थी। उसने जंगल काटने शुरू कर दिए क्योंकि उसे बस्ती बसानी थी । इतना ही नहीं, पहाड़ों पर भी उसकी लालच भरी निगाह पड़ गई । उसके लालच ने पर्यावरण तक को लील लिया ।।
यही धरती हमारी रणभूमि है और यही कर्मभूमि ! अगर कहीं एक महल बनता है तो साथ में कई झोपड़ियां भी बस जाती हैं । माटी का यह पुतला सभ्य क्या हुआ, उसने धरती को ही बांटना शुरू कर दिया ।
साहिर बड़े तल्ख शब्दों में कहता है ;
कुदरत ने हमें बख्शी थी
एक ही धरती
हमने कभी भारत कहीं
ईरान बनाया ।
हमने पहले विश्व को कुटुंब माना, फिर अपनी इस धरती के ही कई टुकड़े कर दिए । अब इसके एक एक टुकड़े के लिए हम अपनी जान की बाजी लगाते हैं ।
एक मां के दिल पर क्या गुजरती है, जब उसका कोई लाल शहीद होता है ।
साम्राज्य और सम्राट ही तो हमारा इतिहास रहा है । दो योद्धा रणभूमि में खड़े हैं, एक अर्जुन कृष्ण की शरण में जाता है, शस्त्र उठा लेता है । ये है गीता का ज्ञान ! एक सम्राट अशोक कलिंग युद्ध के खून खराबे के पश्चात् शस्त्र त्याग कर बुद्ध की शरण में चला जाता है । और एक हुआ विश्व विजय का सपना संजोए सिकंदर, जिसकी जब एक फकीर से भेंट होती है, तो बड़े गर्व से कहता है, मांगो जो मांगना है, मैं सिकंदर महान हूं । और वह फकीर निडर हो जवाब देता है, भाई मेरे, तुम मुझे क्या दोगे ? तुमने मेरी धूप रोक रखी है, बस वही मुझे वापस कर दो ।
ये धरती गवाह है हमारे सब कर्मों की । हम इसके आंगन में खेल तो रहे हैं लेकिन इसके दुख दर्द से ही परिचित नहीं हैं । कैसे पुत्र हैं हम । ये माटी सभी की कहानी कहेगी ।।
एक जनवरी की प्रातः किरणों को उम्मीद के हस्ताक्षर सौंपने की प्रथा पुरानी है। हर वर्ष आशा का अनुप्रास। मनुष्य का मन है ही ऐसा। सूर्य हमेशा की तरह उजास, उर्जा और हौसलों के हस्तांतरण का काम बखूबी करता है।
इसी आधार पर ज्योतिष एवं अंकज्योतिष के अनुसार नूतन वर्ष को “सूर्य का वर्ष” कहा गया है। चीनी ज्योतिष के अनुसार यह “year of the fire horse”घोषित किया गया है। जिसका इशारा दीप्ति, तेज, गति और समता की ओर है। इसे नवाशा, नवाचार, ऐश्वर्य, और जगमगाते हुये भविष्य को आमंत्रण भी कह सकते हैं।
भारत में अलग अलग प्रदेशों ने अपने परिवेश के मुताबिक थीम चुनी है। यथा म प्र ने “समृद्ध किसान समृद्ध प्रदेश”—-!
हमेशा की तरह नव वर्ष के लिए कोई रेजोल्यूशन पास करना यानी अपने ही मन को कुछ अच्छा करने के लिए संकल्पित करना है। बेशक कोई प्रस्ताव महीने दो महीने से अधिक न चल पाये। गायब हो जाए जैसे गधे के सिर से सींग।
सूर्योदय से ज्यादा ताल्लुक न रखनेवाली जेन जी और अल्फा, रात्रि में न्यू ईयर बैश का इन्तजाम करती है। मादक द्रव्य और उत्तेजक धुनों पर थिरकती हुई बेखयाली का मौसम रचती है, और अपने आधुनिकताबोध पर गर्वित होती है। कुदरती अंधेरे और कृत्रिम उजालों के बीच होता है जश्न। दरअसल एक जनवरी का जश्न खान पान, नृत्य गीत, और रोशनी के सम्मोहन के बीच खुद को दिया जाने वाला आश्वासन है कि हम कुछ अच्छा ही करेंगे।
युवाओं के करियर को लेकर, वयस्कों के लिये भावी की रूपरेखा और महिलाओं का अपने संघर्ष और वजूद को आकार देने के विचार से जोड़ना अहम है, पर जमीनी सच के साथ।
कितने ही लोगों का नया साल मोबाइल की आभासी जमीन पर उतरता है।
क्या ही अच्छा हो कि हम फोन पर छः सात घंटे डेरा डालने की बजाय “डिजिटल डिटाॅक्स “को संकल्पित हों। “जाॅम्बी स्क्राॅल” अवसादग्रस्त, बिखरे हुये मन का पता देता है।
A.I का सही इस्तेमाल भी 2026 को बहुत कुछ दे सकता है।
कोई अंतरिक्ष यात्री बनने का ख्वाब भी तो पाले। ताकि शुभांशु शुक्ला की तरह स्पेस में हर दिन 16 सूर्योदय और 16 सूर्यास्त देख सके। चाहत का एक मंज़र ये भी है।
विकास के नाम पर लाखों पेड़ों की बलि चढ़ रही है। चिपको आन्दोलन का इतिहास दोहराना कितने पसंद करेंगे। A.Cकी जगह पेड़ लगाने और साइकिल चलाने का इरादा करेंगे।
पर्यावरण के छद्म रक्षक खुश हैं कि जमाना पेपरलेस हो रहा है पर कितने जानते हैं कि डिजिटल इंडिया के पीछे ध्वंस भी है। चैट जी पी टी से एक सवाल पूछने में गूगल सर्च से 10 गुना बिजली खर्च होती है। पानी, बिजली आदि की अमाप खपत।
सवाल उठता है कितने संकल्प खुद के लिये और कितने देश की खातिर !लोकतंत्र भारत का स्वभाव है। हम में ऐसा ही जज़्बा पैदा हो। न हम हैली गुब्बी ज्वालामुखी की तरह फूटें न मोम की तरह दबते रहें। एक मानवीय दृष्टिकोण के विकास की पहल होनी चाहिए।
बड़े सपने देखना गुनाह नहीं पर बेपर की उड़ानों में रोमांच न ढूँढा जाए।
सिविक सेंस का अकाल और पाखण्डी बाबाओं का रूख चिन्तनीय है। क्या हम नव वर्ष में इनसे निजात पाने की सोच को सहारा देंगे।
ताजा दौर में सबसे भयानक है फोमो (fear of missing out) मुख्य धारा से खुद के अलग थलग पड़ जाने का एहसास। यही सारे अतरंगी कारनामे करवाता है।
कठपुतलियों और तोतों से कुछ न सीखने की प्रतिज्ञा कर पाएंगे। राष्ट्रनिर्माण में यही प्रमुख घटक होगा। रूजवेल्ट ने कहा था-“जो राष्ट्र अपनी मिट्टी को नष्ट करता है वह खुद को नष्ट कर देता है। “यहां मिट्टी से आशय अपने गौरव विरासत खूबियां और देश प्रेम से है। आइए हम अपनी मिट्टी की गंध को पहचानें। ।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक आलेख – “नया साल, नई सोच” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३९३ ☆
न्यूयार्क से ~ नया साल, नई सोच श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
हर बारह महीने बाद हमारे सामने एक ताज़ा कैलेंडर बिलकुल कोरा कैनवास तथा इंद्रधनुष के रंग लेकर आता है। एक जनवरी यह कोई साधारण दिवसांक परिवर्तन नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक प्रस्थान बिंदु है, जो हमें रुककर सोचने, ठहरकर पीछे मुड़कर देखने और फिर से नए संकल्प के साथ शुरू करने का साहस देता है। यह वह अवसर है जब हम अपने पिछले अनुभवों को एक संदर्भ के रूप में संजोते हुए भी, उनके बोझ से अपने मन को मुक्त कर सकते हैं। हर नए साल की पहली सुबह हवा में एक अलग सी ताज़गी, आशा की एक नई लय और संभावनाओं का एक अनूठा संगीत लेकर आती है। इसी लिए इस दिन को दुनियां भर में उत्सव की तरह उत्साह से मनाया जाता है। लेकिन क्या यह सब परिवर्तन अपने आप हो जाता है? नहीं, यह तभी सार्थक बनता है जब हम खुद अपनी सोच की दिशा और दशा बदलने का निश्चय करते हैं।
हमारी सोच अक्सर आदतों के पिंजरे में कैद होती है। हम वही रास्ते चुनते हैं, वही प्रतिक्रियाएं देते हैं और वही डर साथ लेकर चलते हैं। यह पुरानी सोच एक ऐसा आरामदायक कोना बना देती है जहां से बाहर झांकना भी मुश्किल लगता है। नकारात्मकता, हार मान लेने की मानसिकता और असफलताओं का बोझ , ढर्रे पर जिंदगी, ये सब हमारी रफ्तार के रोकते हैं। पर नया साल हमें याद दिलाता है कि समय बदल रहा है, और बदलना ही प्रगति के लिए जीवन का सार है। तो क्यों न हम भी अपनी सोच को नई दिशा दें? नई सोच का अर्थ यह नहीं कि पुरानी हर बात को नकार दिया जाए। बल्कि यह एक विवेकपूर्ण संतुलन है। इसमें अतीत के सबक को साथ लेकर, वर्तमान में जीते हुए, भविष्य के लिए एक लचीली, सकारात्मक और समाधान-उन्मुख मानसिकता का विकास करना होता है। यह सबसे पहले हमारे नजरिए में बदलाव लाती है। एक ही स्थिति को हम समस्या के रूप में देखें या चुनौती के रूप में, यह हमारी सोच तय करती है। नई सोच “क्यों नहीं हो सकता” के स्थान पर “कैसे हो सकता है” पर केंद्रित होनी चाहिए , जो आशा की किरण को जिंदा रखती है। साथ ही, यह हमें जिज्ञासु बनाए रखती है, नई चीजें सीखने के लिए हमें प्रेरित करती है और हमें यह एहसास दिलाती है कि गलतियां असफलताएं नहीं, बल्कि सीखने के सोपान हैं। जीवन अनिश्चितताओं से भरा है, और पुरानी, कठोर सोच मुसीबत में टूट जाती है, जबकि नई और लचीली सोच झुकती जरूर है, लेकिन टूटती नहीं। यह अनुकूलन की क्षमता विकसित करती है। इसमें अतीत की कमियां गिनाने के बजाय, जो मिला है उसके प्रति कृतज्ञ होना और दूसरों के प्रति उदार दृष्टिकोण रखना भी शामिल है।
लेकिन यह बदलाव रातों-रात नहीं आता। नए साल की शुरुआत इसे आरंभ करने का एक शुभ अवसर जरूर है। बड़े-बड़े संकल्पों के बोझ तले दबने की बजाय, एक छोटी, सकारात्मक आदत से शुरुआत करें। जैसे, रोजाना पांच मिनट शांत बैठकर अपने खुद के साथ रहना, एक अच्छी किताब के कुछ पन्ने पढ़ना, या दिन की शुरुआत तीन अच्छी बातें गिनकर करना। जब भी मन कहे “यह मेरे बस की बात नहीं”, तो एक बार खुद से पूछें, “क्या इसे करने का कोई एक छोटा तरीका हो सकता है?” सोशल मीडिया की नकारात्मकता और तुलना की दुनिया से अवकाश लेकर, उस समय को अपने शौक, परिवार या स्वयं के साथ बिताएं। अपने से अलग विचार रखने वालों की बात बिना कटुता के सुनने का प्रयास करें, इससे हमारा दृष्टिकोण व्यापक होता है। और सबसे महत्वपूर्ण, अपनी कमियों के प्रति आलोचनात्मक होने के बजाय, स्वयं से वैसी ही प्रोत्साहन की भाषा बोलें जैसी किसी प्रिय मित्र से बोलते हैं।
जब एक व्यक्ति की सोच बदलती है, तो उसका पूरा जीवन बदलने लगता है। रिश्तों में एक नई मिठास आती है, कार्यक्षेत्र में रचनात्मकता बढ़ती है, और मानसिक स्वास्थ्य भी बेहतर होता है। और जब ऐसे अनेक व्यक्ति मिलकर एक समाज बनाते हैं, तो वह समाज प्रगति, शांति और सहयोग का केंद्र बन जाता है। नई सोच समस्याओं को सामूहिक चुनौती के रूप में देखना सिखाती है, जिसका समाधान मिलकर खोजा जा सकता है।
तो आइए, इस नए साल पर हम केवल नए कपड़े, नए साजो-सामान, चमक धमक ही नहीं, बल्कि एक नया दृष्टिकोण भी स्थाई रूप से धारण करें। उस सोच को अपनाएं जो बदलाव से नहीं डरती, जो सीखने के लिए हमेशा तैयार रहती है और जो हर स्थिति में एक संभावना की तलाश करती है। क्योंकि सच तो यह है कि नया साल कोई जादू की छड़ी नहीं है, बल्कि एक नई शुरुआत के लिए हमारे अपने मन का बनाया हुआ एक सुंदर बहाना है। यह बहाना, अगर हम चाहें, तो हमारे जीवन की सबसे सुंदर कहानी का पहला वाक्य बन सकता है। आपकी सोच नई हो, आपका नजरिया उज्ज्वल हो, और यह नया साल आपके जीवन में अनगिनत नई खुशियां, नई सफलताएं और नई संभावनाएं लेकर आए। शुभ नववर्ष ।
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “हरी भरी धरती- नववर्ष का खास संदेश…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कविता # २७१ ☆हरी भरी धरती- नववर्ष का खास संदेश… ☆
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नव वर्ष आया द्वार पे
आशा की चादर ओढ़कर।
बीते दुखों छोड़कर
बंधन कटीले तोड़कर।।
*
हर दिन जगे विश्वास ऐसा,
भोर होवे प्रेममय ।
जीवन पथिक बनते हुए
होगी सदा जय की विजय ।।
*
उम्मीद की डोरी पकड़
हाथों में थामें फूल को।
पहला कदम रखते ही जागे
भूलिए मत मूल को ।।
*
तय किया जब लक्ष्य पाना
वर्ष नव उत्कर्ष हो ।
गूँजती मंगल ध्वनि तो
क्यों न सबको हर्ष हो।।
***
नया वर्ष केवल कैलेंडर न बदले हमारी आदतें भी हरी हो जाएँ। पौधे लगाना,पेड़ बचाना यही सच्चा संकल्प बन जाए।जब धरती मुस्कुराएगी,तभी मन को सुकून आएगा।प्रकृति की रक्षा करेंगे हम,तो भविष्य सुरक्षित होगा।आइए इस वर्षहर श्वास में हरियाली,हर कर्म में प्रकृति,और हर दिन ग्रीन मोटिवेशन अपनाएँ।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “किताबी कीड़ा…“।)
अभी अभी # ८७४ ⇒ आलेख – किताबी कीड़ा श्री प्रदीप शर्मा
जो कीड़ा क़िताब चाट जाए, उसे किताबी कीड़ा कहते हैं। इंसानों में यह काम अगर एक बुद्धिजीवी नामक प्राणी करता है तो कीड़ों मकोड़ों में यह दायित्व एक दीमक निभाती है। अगर हमें विरासत में मिले अथाह ज्ञान रूपी सागर को सुरक्षित रखना है तो हमें उसे इन दोनों से बचाकर सुरक्षित रखना होगा।
ज्ञान के हमारे तीन आगार
हैं, श्रुति, स्मृति और पुराण।
सृजन एक सतत प्रक्रिया है, जिसे जब सहेजा जाए तो यह ग्रंथ का आकार ले लेती है। हमारे यहां पुस्तकों में सरस्वती का वास होता है, इसलिए इन्हें विद्या भी कहते हैं। पुस्तकों की ही तरह विद्यालय भी ज्ञान के आगार होते हैं और जो हमें ज्ञान प्रदान करते हैं उन्हें हम शिक्षक, अध्यापक अथवा गुरु।।
करत करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान। कुछ लोग बुद्धि का उपयोग ज्ञान प्राप्त करने में लगा देते हैं, बाकायदा किसी नालंदा अथवा तक्षशिला विश्वविद्यालय से विधिवत ज्ञानार्जन प्राप्त कर, संचित ज्ञान का सदुपयोग करते हैं, पठन, पाठन करते हैं तथा साहित्य सेवा करते हैं तो कुछ केवल बुद्धि के स्तर पर गोष्ठी, वाद विवाद और बहस में अपने ज्ञान की बौद्धिक उल्टी करा करते हैं। उनका साहित्य वादी प्रतिवादी हो जाता है। कहीं पूरब पश्चिम, तो कहीं वाम, दक्षिण हो जाता है।
ऐसे लोग पहले किताबों को चाटते हैं और बाद में कॉफी हाउस की बहस और गोष्ठियों में श्रोताओं का दिमाग चाटते हैं। इस प्रजाति में ऐसे कवि, लेखक और साहित्यकार प्रचुर मात्रा में होते हैं, जो अपने आपको बुद्धिजीवी कहलाना पसंद करते हैं। एक समय था, जब इनका एक गणवेश भी होता था। आँखों पर मोटा चश्मा, खिचड़ीनुमा दाढ़ी, ढीला ढाला कुर्ता पायजामा, जो कालांतर में फटी जीन्स में परिवर्तित हो गया। जहां कभी एक झोला और डायरी पेन था, वहां आजकल एक अदद एंड्रॉयड हो गया। कल का बुद्धिजीवी भी आजकल डिजिटल हो गया।।
किताबों से दीमक का भी वही रिश्ता है, जो एक बुद्धिजीवी का ! वह भी जब किताबें चाटती हैं, तो कोई कसर नहीं छोड़ती, पूरी ही चाट जाती है। लेकिन किसी बुद्धिजीवी की तरह हमारा दिमाग नहीं चाटती। दीमक से किताबों को भले ही खतरा हो, किसी इंसान को नहीं।
हमारे यहां पुस्तकों और ग्रंथों की पूजा होती है। भागवत, पुराण, गीता, रामायण और गुरुग्रंथ साहब हमारे धार्मिक ग्रंथ हैं, जिन्हें हमने ईश्वर का ही दर्जा दिया हुआ है। व्यासपीठ और धार्मिक स्थलों पर इनका पारायण एक उत्सव का स्वरूप ले लेता है जिसे ज्ञान यज्ञ की संज्ञा दी गई और जहां सतत ज्ञान की गंगा प्रवाहित होती रहती है।।
हमारे सत्साहित्य को हमें दीमक और बुद्धिजीवी इन दोनों से बचाकर रखना है। दीमक अगर किताबों को खोखला करती है तो एक बुद्धिजीवी लोगों के दिमागों को खोखला करता है। हवा हो गए वो दिन, जब लोग बुद्धिजीवी को इज्जत की निगाह से देखते थे। क्या दिन थे वे भी, जब कॉफी की भाप और सिगरेट का धुआं एक साथ समां बांधता था। अब बेचारा इंसान फिक्र को धुएं में उड़ा भी नहीं सकता। कितनी कुंठा, कितना संत्रास, और बेचारे नित्शे, काफ्का और कामू ! आखिर गम तो गलत करना ही पड़ेगा। ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है ..!!
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “नरसिंह भगत…“।)
अभी अभी # ८७३ ⇒ आलेख – नरसिंह भगत श्री प्रदीप शर्मा
नाथ मैं थारो ही थारो ! अवतारों और चमत्कारों के इस देश में शायद ही कभी ऐसा वक्त आया हो, जब ईश्वर ने अपना कोई ना कोई अवतार संकट की घड़ी में ना भेजा हो। दुष्टों के लिए तो स्पेशल अवतार होते ही हैं, यहां तो भक्त भी भगवान का रूप धारण कर अवतरित हो जाते हैं। फिर उनके भी भक्त पैदा हो जाते हैं और इस तरह आस्था और संस्कार की यह चैनल, टीवी पर २४ घंटे चला करती है।
याद कीजिए भगवान विष्णु ने अपने भक्त प्रह्लाद को बचाने, और दुष्ट, अधर्मी राजा हिरणयकश्यप का वध करने के लिए खंभे में से प्रकट हो नरसिंह अवतार लिया था। भक्त कभी किसी का वध नहीं करता, प्रतिरोध नहीं करता। वह बस अपने आराध्य के प्रति शरणागति हो जाता है। नाथ मैं थारो ही थारो और खुद अकर्मा नरसिंह भगत होकर अपने ठाकुर जी को यहां से वहां भगाया करता है।।
उसने कहीं सुन रखा है, हरि है हजार हाथ वाला, इसलिए अपनी नानी बाई के मायरे के वक्त भी वह हाथ पांव नहीं मारता। बस सब कुछ सांवरिया सेठ के भरोसे छोड़ देता है। मरता क्या न करता। ठाकुर जी को भाई बनकर आना पड़ता है और अपने भक्त की लाज बचानी पड़ती है।
डाकोर जी के नरसिंह भगत हों अथवा बंगाल के चैतन्य महाप्रभु, आज से पांच सौ वर्ष पूर्व ना केवल गुजरात, अपितु महाराष्ट्र में भी इन संतों का बोलबाला था। संत ज्ञानेश्वर, तुकाराम, नामदेव, जना बाई और स्वामी समर्थ तो ठीक, शिरडी के साई बाबा के यहां तो आज भी भक्तों का दरबार लगा रहता है। चमत्कार को नमस्कार ही आगे चलकर आस्था को अंध विश्वास में बदल देता है और संतत्व ढोंग और पाखंड में तब्दील हो जाता है।
आशाराम, निर्मल बाबा से होता हुआ यह साहित्य के चेतन भगत और राजनीति के बगुला भगत तक जगह बना लेता है।।
जहां भक्त है, वहां भगवान है।
या जहां भगवान है, वहां भक्त है। कलयुग में पैसा ही भगवान है। भक्ति की सारी शक्ति कलयुग में सत्ता में समा जाती है। हम भारतीय अपने भक्ति के संस्कार नहीं छोड़ते। हमने अपने अपने इष्ट और भगवान बना रखे हैं। अगर वे प्रसन्न, तो हम प्रसन्न। भगत देख राजी हुई, जगत देख रोई। चेतन भगत हैं हम।
सच्चे संत और भक्त को संसार की चाह नहीं होती। संसार उसकी परीक्षा पर परीक्षा लिया करता है। मीरा को विष का प्याला भेजा जाता है, वह विष भी अमृत हो जाता है और एक आज के संत हैं जिन्हें फूड पॉइजनिंग हो जाता है। कोई राष्ट्र संत आत्म हत्या कर लेता है तो कोई आशाराम जेल चला जाता है। न नर, न सिंह, न भगत न भगवान, आज केवल एक इंसान ही मिल जाए किसी के अंदर, तो वहीं कृष्ण की राधा है, वहीं कृष्ण की मीरा है, वहीं चैतन्य महाप्रभु और वहीं नरसिंह भगत है।।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १५९ ☆ देश-परदेश – पशु बनाम परिवार प्रेम ☆ श्री राकेश कुमार ☆
पशु प्रेम और पालतू पशु प्रेम के मायने अलग है। समाज में कुछ लोग पशु प्रेमी होते हैं। दुसरी तरफ कुछ लोग पालतू पशु प्रेमी श्रेणी में आते हैं।
वर्तमान में जब मानव अपने परिवार, समाज और यहां तक की अपनी मातृ भूमि से भी अधिक प्यार अपने पालतू पशु को करने लग गया हैं।
पूर्व में लोग पालतू पशु शौकिया तौर से पाला करते थे। आज लोग पालतू पशु सोशल मीडिया के लिए भी पाल रहें हैं। परिवार और अपनों से दूरी बढ़ा कर पालतुओं से नजदीकियां बन रहीं हैं।
पालतू पालक बनना कोई गलत बात नहीं हैं, लेकिन परिवार और समाज की उपेक्षा करना भी किसी भी एंगल से अच्छा नहीं कहा जा सकता हैं। इससे बेहतर तो पशु प्रेमी लोग हैं।
मानव योनि में जन्म लेकर अपने ही समाज के उत्थान में योगदान ना कर, सिर्फ पालतू पशुओं का कल्याण करना, कभी भी उचित नहीं माना जाएगा।
आजकल लोग मां और बाप को बुढ़ापे में लावारिस छोड़ अपने पालतू पशुओं को अपना रहें हैं। कुछ युवा दंपती तो हद पार कर, अपना परिवार भी नहीं बना रहें हैं, जीवन का सब कुछ पालतू को समर्पित कर रहे हैं। इसी क्रम में कुछ युवा विवाह जैसी पवित्र संस्था के बंधन से मुक्त रह कर सृष्टि को ही समाप्त करने की मुहिम में योगदान कर रहें हैं।
समाज को भी सोचना होगा कि युवा पीढ़ी ऐसे कदम उठाने के लिए क्यों अग्रसर हो रही हैं।