हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #२९३ ☆ प्रकृति शिक्षिका के रूप में… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख भीड़ में हम अकेले। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # २९३ ☆

☆ प्रकृति शिक्षिका के रूप में… ☆

मानव व प्रकृति का संबंध अनादि व अखंड है। प्रकृति का सामान्य अर्थ है–समस्त चराचर में स्थित सभी वनस्पति,जीव व पदार्थ, जिनके निर्माण में मानव का हाथ नहीं लगा; अपने स्वाभाविक रूप में विद्यमान हैं। इसके अंतर्गत मनुष्य भी आ जाता है, जो प्रकृति का अंग है और शेष सृष्टि उसकी रंगभूमि है। सो! उसकी अन्त:प्रकृति उससे अलग कैसे रह सकती है? मनुष्य प्रकृति को देखता व अपनी गतिविधि से उसे प्रभावित करता है और स्वयं भी उससे प्रभावित हो बदलता-संवरता है; तत्संबंधी अनुभूति को अभिव्यक्त करता है। उसी के माध्यम से वह जीवन को परिभाषित करता है। मानव प्रकृति के अस्तित्व को हृदयंगम कर उसके सौंदर्य से अभिभूत होता है और उसे चिरसंगिनी के रूप में पाकर अपने भाग्य को सराहता है और उसे मां के रूप में पाकर अपने भाग्य को सराहता है।

मानव प्रकृति के पंचतत्वों पृथ्वी,जल,वायु,अग्नि, आकाश व सत्,रज,तम तीन गुणों से निर्मित है…फिर वह प्रकृति से अलग कैसे हो सकता है? जिन पांच तत्वों से प्रकृति का रूपात्मक व बोधगम्य रूप निर्मित हुआ है,वे सब इंद्रियों के विषय हैं। इन पांच तत्वों के गुण शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध ही असंख्य रूपों में मानव चेतना के कोश को कर्म, चिन्तन, कल्पना, भावना, भावुकता, संकल्प, जिज्ञासा, समाधान आदि से कितना समृद्ध किया है–इसका अनुमान मानव की उपलब्धियों से लगाया जा सकता है। प्रकृति का वैभव अपरिमित एवं अपार है। उसकी पूर्णता को न दृष्टि छू सकती है, न ही उसकी सीमाओं तक कान ही पहुंच सकते हैं और न ही क्षणों की गति को मापा जा सकता है। प्रकाश व शब्द की गति के साथ कौन दौड़ लगा सकता है? प्रकृति के अद्भुत् सामर्थ्य व निरंतर गतिशीलता के कारण उसमें देवत्व की स्थापना हो गयी तथा उसकी अतिन्द्रियता, अद्भुतता, उच्चता, गहनता आदि के कारण उसे विराट की संज्ञा प्रदान की गयी है। विराट में मानव,मानवेतर प्राणी व अचेतन जगत् का समावेश है। अचेतन जगत् ही प्रकृति है और जगत् का उपादान अथवा मूल तत्व है। वह स्वयंकृत, चिरंतन व सत्य है। उसका निर्माण व विनाश कोई नहीं कर सकता। प्रकृति के अद्भुत् क्रियाकलाप व अनुशासनबद्धता को देख कर मानव में भय, विस्मय, औत्सुक्य व प्रेम आदि भावनाओं का विकास हुआ, जिनसे क्रमश: दर्शन, विज्ञान व काव्य का विकास हुआ। सो! मानव मन में आस्था, विश्वास व आदर्शवाद जीवन-मूल्यों के रूप में सुरक्षित हैं और विश्व में हमारी अलग पहचान है। सम्पूर्ण विश्व के लोग भारतीय दर्शन से प्रभावित हैं। रामायण व महाभारत अद्वितीय ग्रंथ हैं और गीता को मैनेजमेंट गुरू स्वीकारा जाता है। उसे विश्व के विभिन्न देशों में पढ़ाया जाता है। यह एक जीवन-पद्यति है; जिसे धारण कर मानव अपना जीवन सफलतापूर्वक बसर कर सकता है।

प्रकृति हमारी गुरू है, शिक्षिका है, जो जीने की सर्वोत्तम राह दर्शाती है। प्रकृति हमारी जन्मदात्री मां के समान है और हमारी प्रथम गुरू कहलाती है और जो संस्कार व शिक्षा हमें मां से प्राप्त होती हैं, वह पाठ संसार का कोई गुरू नहीं पढ़ा सकता। प्रकृति हमें सुक़ून देती है; अनगिनत आपदाएं सहन करती है और हम पर लेशमात्र भी आँच नहीं आने देती। वह हमारी सहचरी है; सुख-दु:ख की संगिनी है। दु:ख की वेला में यह ओस की बूंदों के रूप में आंसू बहाती भासती है, जो सुख में मोतियों-सम प्रतीत होते हैं। इतना ही नहीं, दु:ख में प्रकृति मां के समान धैर्य बंधाती है।

प्रकृति हमें कर्मशीलता का संदेश देती है और उसके विभिन्न उपादान निरंतर सक्रिय रहते हैं।क्षरात्रि के पश्चात् स्वर्णिम भोर, अमावस के बाद पूनम व विभिन्न मौसमों का यथासमय आगमन समय की महत्ता व गतिशीलता को दर्शाता है। नदियाँ निरंतर परहिताय प्रवाहशील रहती हैं। इसलिए वे जीवन-दायिनी कहलाती हैं। वृक्ष भी कभी अपने फलों का रसास्वादन नहीं करते तथा पथिक को शीतल छाया प्रदान करते हैं। वे हमें आपदा के लिए संचय करने को प्रेरित करती है। जैसे जल के अभाव में वह बंद बोतलों में बिकने लगा है। बूंद-बूंद से सागर भर जाता है और जल को बचा कर हम अपने भविष्य को सुरक्षित कर सकते हैं। वायु भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। परंतु मानव की बढ़ती लालसाओं ने जंगलों के स्थान पर कंक्रीट के महल बनाकर पर्यावरण-प्रदूषण में बहुत वृद्धि की है, जिसका विकराल रूप हमने कोरोना काल में आक्सीजन की कमी के रूप में देखा है; जिसके लिए लोग लाखों रुपये देने को तत्पर थे। परंतु उसकी अनुपलब्धता के कारण लाखों लोगों को अपने प्राण गंवाने पड़े। काश! हम प्रकृति के असाध्य भंडारण व असाध्यता का अनुमान लगा पाते कि वह हमें कितना देती है? हम करोड़ों-अरबों की वायु का उपयोग करते हैं; अपरिमित जल का प्रयोग करते हैं; वृक्षों का भी हम पर कितना उपकार है, जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। वे कार्बन-डॉयोक्साईड लेकर हमें आक्सीजन देते हैं। इतना ही नहीं, वे हमें अन्न व फल-फूल देते हैं, जिससे हमें जीवन मिलता है।

मानव व प्रकृति का संबंध अटूट, चिरंतन व शाश्वत् है। प्रकृति विभिन्न रूपों में हमारे सम्मुख बिखरी पड़ी है। प्रकृति के कोमल व कमनीय सौंदर्य से प्रभावित होकर कवि उसे कल्पना व अनुभूति का विषय बनाता है, जो विभिन्न काव्य- रूपों में प्रकट होती है। यदि हम हिन्दी साहित्य पर दृष्टिपात करें, तो प्रकृति हर युग में मानव की प्रेरणा-शक्ति ही नहीं रही, उसकी चिर-संगिनी भी रही है। वैदिक-कालीन सभ्यता का उद्भव व विकास प्रकृति के उन्मुक्त प्रांगण में हुआ। मंत्रदृष्टा ऋषियों ने प्रकृति के प्रति जहां अनुराग व्यक्त किया, वहीं उसके उग्र,रम्य व मानवीकरण आदि रूपों को अपनाया। ऋग्वेद मानव सभ्यता का प्राचीनतम ग्रंथ है। प्रकृति के दिव्य सौंदर्य से अभिभूत होकर जहां मानव उसके उन्मुक्त सौंदर्य का बखान करता है; वहीं विराट के प्रति भय, विस्मय श्रद्धा आदि की अनुभूतियों में अनंत सौंदर्य का अनुभव करता है। वाल्मीकि का प्रकृति-जगत् के कौंच-वध की हृदय-विदारक घटना से उद्वेलित आक्रोश व करुणा से समन्वित शोक का प्रथम श्लोक रूप में प्रस्फुरण इस तथ्य की पुष्टि करता है कि भावातिरेक या अनुभूति की तीव्रता ही कविता की मूल संजीवनी शक्ति है। महाभारत में प्रकृति केवल पर्वत, वन, नदी आदि का सामान्य ज्ञान कराती है। नल दमयंती प्रसंग में वह प्रकृति से संवेदनात्मक संबंध स्थापित न कर, स्वयं को अकेला व नि:सहाय अनुभव करती है।

कालिदास को बाह्य-जगत् का सर्वश्रेष्ठ कवि स्वीकारा जाता है। उनका प्रकृति-चित्रण संस्कृत साहित्य में ही नहीं, विश्व साहित्य में दुर्लभ है। वे प्रकृति को मूक, चेतनहीन व निष्प्राण नहीं मानते, बल्कि वे उसमें मानव की भांति सुख- दु:ख व संवेदनशीलता अनुभव करते हैं। इस प्रकार अश्वघोष, भवभूति, भास, माघ, भारवि, बाणभट्ट आदि में प्रकृति का व्यापक रूप में वर्णन हुआ है।

हिन्दी साहित्य के आदिकाल अथवा पूर्व मध्य-कालीन काव्य में प्रकृति का उपयोग पृष्ठभूमि, उद्दीपन व उपमानों के रूप में हुआ। विद्यापति के काव्य में प्रकृति कहीं-कहीं उपदेश देती भासती है और आत्मा परमात्मा में इस क़दर लीन हो जाती है, जैसे समुद्र में लहर और भौंरों का गुंजन नायिका को मान त्यागने का संदेश देता भासता है। वियोग में उनका बारहमासा वर्णन द्रष्टव्य है।

पूर्व मध्यकालीन काव्य में प्रकृति उन्हें माया सम भासती है तथा उन्होंने भावाभिव्यक्ति के लिए प्रकृति के विभिन्न रूपों को अपनाया है। कबीरदास जी ‘माली आवत देखि के, कलियन करि पुकार/ फूलि-फलि चुनि लहि, कालहि हमारी बारि’ के माध्यम से मानव को नश्वरता का संदेश देते हैं। दूसरी ओर ‘तेरा सांई तुझ में, ज्यों पुहुपन में वास/ कस्तूरी का मृग ज्यों फिरि-फिरि ढूंढे घास’ के माध्यम से वे मानव को संदेश देते हैं कि ब्रह्म पुष्पों की सुगंध की भाति घट-घट में व्याप्त है, परंतु अज्ञान के कारण बावरा मानव उसे अनुभव नहीं कर पाता और मृग की भांति वन-वन में ढूंढता रहता है। प्रेममार्गी शाखा के प्रवर्त्तक जायसी के काव्य में प्रकृति के उपमान, उद्दीपन व रहस्यात्मक रूपों का चित्रण हुआ है। वे चराचर प्रकृति में ब्रह्म के दर्शन करते हैं। समस्त जड़-चेतन प्रकृति में प्रेमास्पद के प्रतिबिंब को निहारते व अनुभव करते हैं। ‘बूंद समुद्र जैसे होइ मेरा/ मा हिराइ जस मिले न हेरा।’ जिस प्रकार बूंद समुद्र में मिलकर नष्ट हो जाती है,उसी प्रकार आत्मा भी ब्रह्ममय हो जाती है।

रामभक्ति शाखा के कवि तुलसीदास की वृत्ति प्रकृति-चित्रण में अधिक नहीं रमी, तथापि उनका प्रकृति-चित्रण स्वाभाविक बन पड़ा है। प्रकृति उनके काव्य में उपमान व उद्दीपन रूप में नहीं आयी, बल्कि उपदेशिका के रूप में आयी है। संयोग में वर्षा व बादलों की गर्जना होने पर पशु-पक्षी व समस्त प्रकृति जगत् उल्लसित भासता है और वियोग में मन की अव्यवस्थित दशा में मेघ-गर्जन भय संचरित करते हैं। मानवीकरण में मनुष्य का शेष सृष्टि के साथ रागात्मक संबंध स्थापित हो जाता है और मानव उसमें अपनी मन:स्थिति के अनुसार उल्लास, उत्साह, आनंद व शोक की भावनाएं- क्रियाएं आरोपित करता है। राम वन के पशु-पक्षियों से सीता का पता पूछते हैं। तुलसी सदैव लोक- कल्याण की भावना में रमे रहे और प्रकृति से उपदेश-ग्रहण की भावना में उन पर श्रीमद्भागवत् का प्रभाव द्रष्टव्य है–’आन छोड़ो साथ जब, ता दिन हितु न होइ/ तुलसी अंबुज अंबु बिनु तरनि, तासु रिपु होइ।’ जब कुटुम्बी साथ छोड़ देते हैं, तो संसार में कोई भी हितकारी नहीं रह पाता। कमल का जनक जल जब सूख जाता है, तो उसका मित्र सूर्य भी उसे दु:ख पहुंचाता है।

कृष्ण भक्ति शाखा के अतर्गत सूर, नंददास, रसखान आदि को कृष्ण के कारण प्रकृति अति प्रिय थी। प्रकृति का आलंबन, उद्दीपन व आलंकारिक रूप में चित्रण हुआ है। वियोग में प्रकृति गोपियों को दु:ख पहुंचाती है और वे मधुवन को हरा-भरा देख झुंझला उठती हैं– ‘मधुबन! तुम कत रहत हरे/ विरह-वियोग स्याम सुंदर के ठाढ़ै,क्यों न जरे।’ कहीं-कहीं वे प्रकृति में उपदेशात्मकता का आभास पाते हैं और संसार के मोहजाल को भ्रमात्मक बताते हुए कहते हैं–’यह जग प्रीति सुआ, सेमर ज्यों चाखत ही उड़ि जाय।’ तोते को सेमर के फूल में रूई प्राप्त होती है और वह उड़ जाता है। सूर ने प्रकृति के व्यापारों का मानवीय व्यापारों से अतु्लनीय समन्वय किया है।

उत्तर मध्यकालीन को प्राकृतिक सौंदर्य आकर्षित नहीं कर पाता। बिहारी को गंवई गांव में गुलाब के इत्र का कोई प्रशंसक नहीं मिलता। केशव को प्राकृतिक दृश्यों के अंकन का अवसर मिला,परंतु वे अलंकारों में उलझे रहे। बिहारी सतसई में जहां मानवीकरण व आलंबनगत रूप चित्रण हुआ, वहीं पर नैतिक शिक्षा के रूप में अन्योक्तियों का आश्रय लिया गया है। इनके प्रकृति-चित्रण में हृदय-स्पर्शिता का अभाव है। सो! प्रकृति उद्दीपन व उपमान रूप में हमारे समक्ष है। ‘ नहीं पराग,नहीं मधुर मधु,नहीं विकास इहिं काल/ अलि कली ही सौं बंध्यौ,आगे कौन हवाल’ के माध्यम से राजा जयसिंह को सचेत किया गया है। ‘जिन-जिन देखे वे सुमन, गयी सो बीति बहार/ अब अलि रही गुलाब की, अपत कंटीली डार।’ यह उक्ति सम्पत्ति-विहीन व्यक्ति के लिए कही गयी है तथा भ्रमर को माध्यम बनाकर प्राचीन वैभव व वर्तमान की दरिद्रावस्था का बखूबी चित्रण किया गया है।

भारतेन्दु युग आधुनिक युग का प्रवेश-द्वार है और इसमें नवीन व प्राचीन काव्य-प्रवृत्तियों का समन्वय हुआ है। प्रकृति मानवीय भावनाओं के अनुरूप हर्ष-विषाद को अतिशयता प्रदान करती, वियोगियों को रुलाती तथा संयोगियों को उल्लसित करती है। इनका बारहमासा वर्णन विरहिणी की पीड़ा को और बढ़ा देता है तथा कहीं-कहीं प्रकृति उपदेश देती भासती है। ‘ताहि सो जहाज को पंछी सब गयो,अहो मन होई’ (भारतेन्दु ग्रंथावली)। अत:जीव जहाज़ के पक्षी की भांति पुन: ब्रह्म में मिलने का प्रयास करता है। बालमुकुंद जी के हृदय में प्रकृति के प्रति सच्चा अनुराग है, जो आलंबन, उद्दीपन व उपमान रूप में उपलब्ध है।

द्विवेदी युगीन कवियों ने प्रकृति को काव्य का वर्ण्य-विषय बनाया है तथा प्रकृति का स्वतंत्र चित्रण किया है। श्रीधर पाठक, रूपनारायण पाण्डेय, रामनरेश त्रिपाठी आदि ने आलंबनगत चित्र प्रस्तुत किए हैं तथा स्वतंत्रतावादी कवियों ने रूढ़ रूपों को नहीं अपनाया, बल्कि जीवन के विस्तृत क्षेत्र में उसके साधारण चित्रमय, सजीव व मार्मिक रूप प्रदान किए हैं। पाठक ने कश्मीर सुषमा, देहरादून आदि कविताओं में प्रकृति के मनोरम चित्र उपलब्ध हैं। शुक्ल जी ने प्रकृति के आलंबन व त्रिपाठी ने पथिक व स्वप्न खंड काव्यों में प्रकृति का मार्मिक चित्रण किया  है। हरिऔध ने जहां ऐंद्रिय सुख की अनुभूति की, वहीं प्रकृति से उपादान ग्रहण कर नायिका के सौंदर्य का वर्णन किया है। मैथिलीशरण गुप्त जी के साकेत, पंचवटी, यशोधरा आदि काव्यों में मनोरम प्राकृतिक चित्रण उपलब्ध है। पंचवटी में प्रकृति की अपूर्व झांकी दिखाई देती है और प्रकृति मानव के साथ क्रिया-प्रतिक्रिया रूप में संबंध स्थापित करती है। साकेत में प्रकृति का मानव व मानवेतर जगत् से तादात्म्य स्थापित हो जाता है। वे प्रकृति को सद्गुणों से परिपूर्ण मानते हैं– ‘सर्वश्रद्धा, क्षमा व सेवा की, ममता की वह धर्म में भी प्रतिमा/ खुली गोद में जो उसकी, समता की वह प्रतिमा।’ प्रकृति ममतामयी मां है, जो समभाव से सब पर अपना प्रेम व ममत्व लुटाती है।उपदेशिका की भांति मानव में उच्च विचार व सदाशयता के भाव संचरित करती है। वे भारतीयों में राष्ट्रीय-चेतना के भाव जाग्रत करते हुए ओजपूर्ण शब्दों में कहते हैं—‘पृथ्वी, पवन, नभ, जल, अनल सब लग रहे काम में/ फिर क्यों तुम्ही खोते हो, व्यर्थ के विश्राम में।’ कवि ने सर्वभूतों को सर्वदा व्यस्त दिखाते हुए देशवासियों को आलस्य त्यागने व जाग्रत रहने का संदेश दिया है। रामनरेश त्रिपाठी के काव्य में प्रकृति के सुंदर, मधुर, मंजुल रूप प्रकट होते हैं, उग्र नहीं। वे प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करते हुए मानव-व्यापारों व मानव- संवेदना का आभास पाते हैं।

छायावाद में प्रकृति को स्वछंद रूप प्राप्त हुआ है और उसका उपयोग आध्यात्मिक भावों के प्रकाशन के लिए हुआ है। प्रकृति कवि की चेतना, प्रेरणा व स्पंदन है। इसलिए छायावाद को प्रकृति काव्य के नाम से अभिहित किया गया है।यदि प्रकृति को छायावाद से निकाल दिया जाए, तो वह पंगु हो जाएगा। प्रसाद ने प्रकृति में चेतना का अनुभव किया और वह मधुर, कोमल व सुकुमार भावनाओं की अभिव्यक्ति का साधन बन गयी, परंतु कवि ने कामायनी में प्रकृति के भयावह, विकराल व विराट आदि रूपों का दर्शन किया है। वे प्रकृति को सचेतन व सजीव मानकर उसमें अलौकिक सत्ता का दर्शन करते हैं तथा समस्त सृष्टि के कार्य-व्यापारों को सर्वोत्तम शक्ति द्वारा अनुप्राणित स्वीकारते हैं। प्रसाद ने संसार को रंगभूमि मानते हुए कहा है कि मानव यहां अपनी शक्ति के अनुसार संसार रूपी घोंसले में अपनी शक्ति के अनुसार ठहर सकता है, ‘शक्तिशाली विजयी भव’ का संदेश देता है। पंत प्रकृति के उपासक ही नहीं, अनन्य मित्र थे। उनके काव्य में मानव और प्रकृति का एकात्म्य हो जाता है। मधुकरि का मधुर राग उन्हें मुग्ध करता है और वे ‘सिखा दो न हे मधुप कुमारि/ मुझे भी अपने मीठे गान'(पल्लविनी)। वे प्रकृति के सहचरी, देवी, सखी, जननी आदि रूपों को काव्य में चित्रित करके उनमें अलौकिक सत्ता का आभास पाते हैं और प्रकृति उन्हें प्रेरणा प्रदान करती है।

निराला के काव्य में प्रकृति के चित्र दिव्य, समृद्ध व रहस्यात्मक रूप में आए हैं। उनके काव्य में दो तत्वों की प्रधानता है-रहस्यवाद व मानवीकरण। उनके काव्य विराटता व उदात्तता की दृष्टि से सराहनीय हैं। प्रकृति उसे सजीव प्राणी की भांति अपना रूप दिखाती, हाव-भावों से मुग्ध करती, संवेदना प्रकट करती उत्साहित करती है। इस प्रकार प्रकृति व मनुष्य का तादात्म्य हो जाता है। बादल प्रकृति को हरा-भरा कर देते हैं, जिससे प्रेरित होकर प्रकृति कर्त्तव्य- पथ पर अग्रसर होने का संदेश देती है।

महादेवी वर्मा सृष्टि में सर्वत्र दु:ख देखती हैं। प्रकृति उनके लिए सप्राण है तथा वे मानव व प्रकृति के लिए एक प्रकार की अनुभूति, सजीवता, विश्रंखलता, आत्मीयता व व्यापकता  का अनुभव करती हैं। वे संसार में प्रियतम को ढूंढती हैं । वे कभी प्रेम भाव में बिछ जाती हैं और जब प्रियतम अंतर्ध्यान हो जाते हैं, वे निराश होकर दु:ख-दैन्य भाव को इस प्रकार व्यक्त करती हैं—‘मैं फूलों में रोती, वे बालारुण में मुस्काते/ मैं पथ में बिछ जाती,वे सौरभ सम उड़ जाते।’ वे प्रकृति के चतुर्दिक प्रियतम के संदेश का आभास पाती हैं और प्रश्न कर उठती हैं — ‘मुस्काता प्रेम भरा नभ,अलि! क्या प्रिय आने वाले हैं?’ वे जीवन को संध्या से उपमित करती हैं ‘प्रिय सांध्य गगन मेरा जीवन’ ‘मैं नीर भरी दु:ख की बदली’ के माध्यम से वे प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करती हैं। वेएक ओर प्रकृति में विराट की छाया देखती हैं और दूसरी ओर अपना प्रतिबिंब पाती हैं। वै छायावाद का आधार स्तंभ-मात्र नहीं हैं, रहस्य व अरूप की साधिका रही हैं।

प्रगतिवाद भौतिकवादी दर्शन है, जिस पर मार्क्सवाद का प्रभाव था। समस्त सृष्टि का विकास दो वस्तुओं के संघर्ष से होता है, जो द्वंद्व का परिणाम है। यह वैज्ञानिक दर्शन है, जिसमें भावुकता के स्थान पर बुद्धि को स्वीकारा गया है।यह यथार्थवाद पर आधारित है। इन कवियों को जीवन से अनुरक्ति है और प्रकृति से प्रेम है।उन्होंने प्रकृति के उपेक्षित तत्वों व पात्रों को महत्व दिया है और प्रकृति उनके लिए शक्ति- प्रणेता है। वे दिन-रात व ऋतु-परिवर्तन को देख जीवन के विकास के लिए परिवर्तन-शीलता को अनिवार्य मानते हैं। इनके गीतों पर लोकगीतों कि प्रभाव द्रष्टव्य है।

प्रयोगवादी कविता में प्रकृति के भावात्मक स्वरूप का ग्रहण हुआ अबोध बालक की तरह ईश्वर, प्रकृति, जीवन-सौंदर्य के विभिन्न स्तरों पर प्रश्न करता है। इन कवियों ने जहां प्रकृति के उपेक्षित व वैज्ञानिक स्वरूपों को ग्रहण किया है,

वहीं प्रकृति में दैवीय सत्ता का आभास न पाकर , भौतिकता के संदर्भ में एक शक्ति के रूप में स्वीकारा गया है। इनका दृष्टिकोण भावात्मक न होकर, बौद्धिक है और प्रकृति के उपेक्षित स्वरूप(कुत्ता, गधा,चाय की प्याली, चूड़ी का टुकड़ा, प्लेटफार्म, धूल, साइरन) को काव्य का विषय बनाया।इन्होंने असुंदर, भौंडे, भदेस आदि में सौंदर्य के दर्शन किए तथि युगबोध के अनुकूल प्रकृति का चित्रण किया। इन्होंने जहां प्रकृति को अपनी मानसिक कुंठाओं की अभिव्यक्ति का साधन बनाया, वहां नवीन उपमानों, बिम्बों को अपने काव्य में प्रतिष्ठित किया तथा मानवीकरण कर मनोरम चित्रण किया है।

नयी कविता प्रयोगवाद का विकसित चरण है तथा इसमें उपलब्ध प्रकृति चित्रण की विशेषता है–ग्राम्य चित्रपटी की अवधारणा। नयी कविता वाद मुक्त है तथा वे जो भी मन में आता है, कहते हैं। वे क्षणवादी हैं और हर पल को जी लेना चाहते हैं,क्योंकि वे भविष्य के प्रति आश्वस्त नहीं हैं। उनमें एक दर्शन का अभाव है। कई बार उन्हें प्रकृति के विभिन्न रूप स्पंदनहीन भासते हैं और उन्हें अपने अस्तित्व के बारे में शंका होने लगती है। नये कवियों की विषय-व्यापकता, नया भाव-बोध तथा नवीन दृष्टिकोण सराहनीय है। सो! प्रकृति व मानव का संबंध अनादि काल से शाश्वत् व अटूट रहा है। वह हर रूप में आराध्या रही है। परंतु जब-जब मानव ने प्रकृति का अतिक्रमण किया है, उसने अपना प्रकोप व विकराल रूप दिखाया है, जो प्राकृतिक प्रदूषण व कोरोना के रूप में हमारे समक्ष है। इन असामान्य परिस्थितियों में मानव नियति के सम्मुख विवश व असहाय भासता है।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७८७ ⇒ काका हाथरसी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ काका हाथरसी ।)

?अभी अभी # ७८७ ⇒ आलेख – काका हाथरसी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जिस दिन पैदा हुए, उसी दिन इस संसार से विदा भी ले ली ! (18 सितंबर 1906 – 1995) हाथरस में पैदा हुए इसलिए प्रभुलाल गर्ग, काका हाथरसी हो गए । इनके हाथ में हास्य रस की रेखाएं अवश्य होंगी,इसीलिए सदा सबको हंसाते रहे ।

इनकी आस थी कि इनके निधन पर कोई आंसू ना बहाए। शोक सभा की जगह एक हास्य कवि सम्मेलन रखा जाए। चूंकि जन्म और मरण का एक ही दिन है, इसलिए प्रस्तुत है उनकी एक हास्य कविता ।

☆ सुरा समर्थन ☆ काका हाथरसी ☆

*

भारतीय इतिहास का, कीजे अनुसंधान

देव-दनुज-किन्नर सभी, किया सोमरस पान

किया सोमरस पान, पियें कवि, लेखक, शायर

जो इससे बच जाये, उसे कहते हैं कायर

कहँ काका‘, कवि बच्चनने पीकर दो प्याला

दो घंटे में लिख डाली, पूरी मधुशाला

*

भेदभाव से मुक्त यह, क्या ऊँचा क्या नीच

अहिरावण पीता इसे, पीता था मारीच

पीता था मारीच, स्वर्ण- मृग रूप बनाया

पीकर के रावण सीता जी को हर लाया

कहँ काकाकविराय, सुरा की करो न निंदा

मधु पीकर के मेघनाद पहुँचा किष्किंधा

*

ठेला हो या जीप हो, अथवा मोटरकार

ठर्रा पीकर छोड़ दो, अस्सी की रफ़्तार

अस्सी की रफ़्तार, नशे में पुण्य कमाओ

जो आगे आ जाये, स्वर्ग उसको पहुँचाओ

पकड़ें यदि सार्जेंट, सिपाही ड्यूटी वाले

लुढ़का दो उनके भी मुँह में, दो चार पियाले

*

पूरी बोतल गटकिये, होय ब्रह्म का ज्ञान

नाली की बू, इत्र की खुशबू एक समान

खुशबू एक समान, लड़्खड़ाती जब जिह्वा

डिब्बाकहना चाहें, निकले मुँह से दिब्बा

कहँ काकाकविराय, अर्ध-उन्मीलित अँखियाँ

मुँह से बहती लार, भिनभिनाती हैं मखियाँ

*

प्रेम-वासना रोग में, सुरा रहे अनुकूल

सैंडिल-चप्पल-जूतियां, लगतीं जैसे फूल

लगतीं जैसे फूल, धूल झड़ जाये सिर की

बुद्धि शुद्ध हो जाये, खुले अक्कल की खिड़की

प्रजातंत्र में बिता रहे क्यों जीवन फ़ीका

बनो पियक्कड़चंद‘, स्वाद लो आज़ादी का

*

एक बार मद्रास में देखा जोश-ख़रोश

बीस पियक्कड़ मर गये, तीस हुये बेहोश

तीस हुये बेहोश, दवा दी जाने कैसी

वे भी सब मर गये, दवाई हो तो ऐसी

चीफ़ सिविल सर्जन ने केस कर दिया डिसमिस

पोस्ट मार्टम हुआ, पेट में निकली वार्निश

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – बचपना ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – बचपना ? ?

बच्चों को उठाने के लिए माँ-बाप अलार्म लगाकर सोते हैं। जल्दी उठकर बच्चों को उठाते हैं। किसीको स्कूल जाना है, किसीको कॉलेज, किसीको नौकरी पर। किसी दिन दो-चार मिनट पहले उठा दिया तो बच्चे चिड़चिड़ाते हैं। माँ-बाप मुस्कराते हैं, बचपना है, धीरे-धीरे समझेंगे।…धीरे-धीरे बच्चे ऊँचे उठते जाते हैं और खुद को ‘सेल्फमेड’ घोषित कर देते हैं।

सोचता हूँ कि माँ-बाप और परमात्मा में कितना साम्य है! जीवन में हर चुनौती से दो-दो हाथ करने के लिए जाग्रत और प्रवृत्त करता है ईश्वर। माँ-बाप की तरह हर बार जगाता, चाय पिलाता, नाश्ता कराता, टिफिन देता, चुनौती फ़तह कर लौटने की राह देखता है। हम फ़तह करते हैं चुनौतियाँ और खुद को ‘सेल्फमेड’ घोषित कर देते हैं।

कब समझेंगे हम? अनादिकाल से चला आ रहा बचपना आख़िर कब समाप्त होगा?

?

© संजय भारद्वाज  

प्रातः 6:52 बजे,28.8.19

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रीगणेश साधनासंपन्न हुई. अगली साधना की सूचना आपको शीघ्र दी जावेगी । 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २५८ ☆ भाव भक्ति के साथ: पूजन… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना भाव भक्ति के साथ: पूजन। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २५८ ☆ भाव भक्ति के साथ: पूजन

*

मातु सरस्वती पूजन कीन्हा ।

विद्या ज्ञान आप वर दीन्हा ।।

श्वेत वस्त्र पुस्तक वर धारी ।

कमल आसनी आन पधारी।।

*

मंगलकाज हुए सब जाते ।

मूढ़ मती के भाग्य जगाते।।

वीणा वादिन हंस वाहिनी ।

सप्त सुरों की आप दायिनी।।

*

कई बार अनजाने ही बहुत से ऐसे कार्य हो जाते हैं, जिनको कोई करना नहीं चाहता , सब कुछ पूर्व निर्धारित तरीके से नहीं हो सकता ।  केवल प्रयास आपके द्वारा हो ऐसा करते रहें परन्तु परिणाम क्या होगा इसकी  चिन्ता न करें । आप कर्म के अधिकारी हैं  कर्ता नहीं ।

सारे दुःख का कारण यही होता है कि हम स्वयं को कर्ता समझने की भूल कर बैठते हैं और अनजाने ही उन गलतियों के जिम्मेदार बन जाते हैं जो  की ही नहीं गयी ।

इसे इस दृष्टि से  देखें, जो होगा अच्छा होगा  इसमें ही सबका कल्याण है । हर पल को भगवान का उपहार समझते हुए आनन्द के साथ जियें और जीने दें।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३७२ ☆ ललित निबंध – “हीरे की तलाश” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३७२ ☆

?  ललित निबंध – हीरे की तलाश ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

नर्मदा का हर कंकड़ शंकर कहा गया है तो पन्ना जिले की मिट्टी में हीरे की भौतिक तलाश की जाती है, जहां प्रकृति ने अपने अद्वितीय उपहार को छिपा रखा है। पर जीवन भौतिकता से बढ़कर जीवंत चेतना है, जो हमें एक गहन और व्यापक दृष्टिकोण देती है। यह दृष्टिकोण हमें हीरक व्यक्तित्व की तलाश करने को प्रेरित करता है , स्वयं को हीरे जैसा मूल्यवान और आभामय बनाने को प्रेरित करता है।  व्यक्ति की आंतरिक चमक, उसकी चेतना, और उसके मानवीय गुण एक अद्वितीय हीरे की तरह भीड़ में भी अलग चमकते हैं।

रत्नों में हीरे अपनी दुर्लभता और सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध हैं,  मानव जीवन में भी व्यक्ति का व्यक्तित्व, उसकी आत्मा, और उसकी चेतना ऐसी ही हीरक होती है। व्यक्ति की ईमानदारी , हजार मनकों की माला में उसे अलग चमकता हीरे जैसा मनका बना कर प्रस्तुत करती है। जैसे  मिट्टी को खोदकर हीरा निकाला जाता है, वैसे ही जीवन के अनुभवों और संघर्षों के माध्यम से व्यक्ति अपने भीतर के हीरक गुणों को निखारता है। यह सतत प्रक्रिया है । जहां व्यक्ति अपने आंतरिक संसाधनों को पहचानता है और उन्हें निरन्तर बेहतर बनाते हुए विकसित करता है। व्यक्ति के गुरु , परिवार, समाज किसी जौहरी की भांति व्यक्ति को निरंतर जीवन पर्यंत गढ़ते रहते हैं।

हीरक व्यक्तित्व की यह तलाश हमें भीड़ के कंकडो में हीरे की खोज का  व्यापक दृष्टिकोण देती है ।  व्यक्ति को उसके समग्र स्वरूप में आकलित किया जाता हैं, न कि केवल उसके बाहरी आवरण या उपलब्धियों से। जैसे एक हीरा अपनी आंतरिक संरचना और सतरंगी चमक से मूल्यवान होता है, वह किस आभूषण के कैसे डब्बे में रखा गया है वह उतना महत्व नहीं रखता जितना हीरे की मौलिकता । पारखी पल भर में कृत्रिम हीरे और वास्तविक प्राकृतिक हीरे में अंतर समझ लेता है। प्रकृति कोयले को करोड़ों वर्षों के उच्च तापमान में गलाकर , भारी दबाव में दबाकर उसे हीरा बनाती है। उस कच्चे हीरे को चमकदार  रूप में तराशे जाने के लिए  जौहरी उसे काटते  छांटते हैं। वैसे ही एक व्यक्ति अपने आंतरिक गुणों सहानुभूति, करुणा, साहस, और ज्ञान को तराशने  से महान बनता है। यह दृष्टिकोण हमें जीवन को  गहन और अर्थपूर्ण यात्रा के रूप में देखने को प्रेरित करता है। व्यक्ति को  हीरा बनाने में उसका परिवेश , उसके शिक्षक, उसकी परिस्थितियां अहम भूमिका निभाते हैं।

हर व्यक्ति में एक अद्वितीय हीरा छिपा होता है, जिसे पहचानने और तराशने की जरूरत होती है। जैसे  हीरा तराशने से उसकी चमक और सौंदर्य बढ़ता है, वैसे ही व्यक्ति के गुणों को विकसित करने से उसका व्यक्तित्व निखरता है। व्यक्ति अपने अनुभवों, सीखने की प्रक्रिया, और आत्म-विश्लेषण के माध्यम से अपने भीतर के आभामय हीरे को प्रकट कर सकता  है।

इस तलाश में हम पाते हैं कि जीवन एक सतत विकास और परिवर्तन की प्रक्रिया है। जैसे एक हीरा अपनी आंतरिक संरचना से चमकता है, वैसे ही व्यक्ति अपने आंतरिक गुणों और चेतना से महान बनता है। यह प्रक्रिया एक गहन आत्म अनुसंधान है।  हीरक व्यक्तित्व की तलाश एक गहन और व्यापक यात्रा है, जो हमें जीवन के हर पहलू में एक अद्वितीय सौंदर्य और अर्थ खोजने को प्रेरित करती है। यह यात्रा हमें अपने भीतर की संभावनाओं को पहचानने, उन्हें विकसित करने, और जीवन को एक गहन और अर्थपूर्ण अनुभव बनाने के लिए प्रोत्साहित करती है। जीवन को भीड़ में कंकड़ सा खो देना है या हीरा बनाकर अमर कर दें, यह स्वयं हमारे ही हाथों तथा सोच से संभव है।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७८६ ⇒ बाप कमाई ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बाप कमाई ।)

?अभी अभी # ७८६ ⇒ आलेख – बाप कमाई ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

सुनने में भले ही आपको यह अच्छा ना लगे, बाप तक क्यों चले गए, आप भाषा को थोड़ा झाड़ पोंछ लें, इसे अपने पिताजी की खून पसीने की, मेहनत की कमाई कह लें, लेकिन इससे सच नहीं बदलने वाला, कहलाएगी वह बाप कमाई ही।

सोचिए, आप जब पैदा हुए थे, तो क्या साथ लाए थे, मां ने आपको जन्म दिया, उसका दूध पीकर तो आप पले बढ़े, कैसे उतारेंगे दूध का कर्ज़, कभी सोचा है। माता पिता के कर्ज़ से उऋण होना इतना आसान भी नहीं।।

भले ही उस जमाने में आपके पिताजी दो पैसे कमाते थे फिर भी पूरे परिवार का पेट पालते थे।

आज जितनी जनसंख्या और महंगाई तब भले ही ना हो, फिर भी परिवार आज की तुलना में अधिक बड़ा और भरा पूरा होता था। नहीं पढ़ाया आपको किसी महंगे पब्लिक स्कूल में, फिर भी संस्कार तो दिए। बड़ों का आदर सम्मान करना, उन्हें प्रणाम करना।

जो भी चीज घर में आती थी, सबको बराबरी से बांटना, आपके त्योहारों पर कपड़े लत्तों का खयाल रखना, बीमार होने पर दवा दारू की व्यवस्था करना, कमाने वाला एक, और खाने वाले दस,

फिर भी अपने से अधिक आपका ध्यान रखा, तब जाकर आप आज इस स्थिति में आ गए कि आपको यह शब्द भी चुभने लगा।।

मुझे यह स्वीकार करने में कोई शर्म नहीं कि मैं तो आज भी बाप कमाई ही खा रहा हूं। मेरे माता पिता को गुजरे कई वर्ष गुजर गए, लेकिन जो अपार धन संपत्ति मेरे नाम कर गए हैं, वह पीढ़ियों तक खत्म नहीं होने वाली। आपको शायद भरोसा ना हो, अतः संक्षेप में उसका विस्तृत वर्णन दे रहा हूं।

मेरी माता से मुझे विरासत में संतोष धन मिला, और वह भी इतना कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा। जीवन भर केवल दो साड़ियों में अपना गुजारा करने वाली मेरी मां का पेट तब तक नहीं भरता था, जब तक घर के सभी सदस्यों का भोजन ना हो जाए। सादगी ही उनका आभूषण था, लेकिन वह अपनी सभी बहू बेटियों को सजा धजा देखना चाहती थी। दूसरों की खुशी में खुश होना, और उनके दुख दर्द में उनका हाथ बंटाना उनका स्वभाव था।।

इसके बिल्कुल विपरीत मेरे पिताजी स्वभाव से ही रईस थे। संघर्षों के बीच, मेहनत पसीने के बल पर, ईमानदारी, व्यवहार कुशलता, समय की पाबंदी और दरियादिली से, हमें अभावों से उन्होंने कोसों दूर रखा। मोहल्ले का पहला रेडियो हमारे घर ही आया था, जिसकी लाइसेंस फीस पोस्ट ऑफिस में भरने वे खुद जाते थे।

घर में रिश्तेदारों और चिर परिचित लोगों का आना जाना लगातार बना रहता था। तब रिश्तेदार भी महीनों और हफ्तों रुका करते थे, घर में उत्सव सा माहौल सदा बना रहता था। लेकिन मजाल है कभी गरीबी में आटा गीला हुआ हो। आज जैसा नहीं, कि अतिथि तुम कब जाओगे।।

खुद्दारी, आत्म सम्मान और स्वाभिमान हम सबको उनसे ही विरासत में मिले हैं। माता पिता के आशीर्वाद से बड़ी कोई बाप कमाई नहीं होती। वे हमारे लिए जमीन जायदाद भले ही नहीं छोड़ गए हों लेकिन उनकी साख और पुण्याई ही हमारी कुल जमा पूंजी है, जो उनके आशीर्वाद से अक्षुण्ण और सुरक्षित है। उनकी नेकी, ईमानदारी, और समय की पाबंदी ही हमारी बाप कमाई है। आज भी इस दुनिया में हमारे जैसा कोई रईस और सुखी इंसान नहीं, क्योंकि आज भी हमारे ऊपर हमारे माता पिता का वरद हस्त है, उनका स्थान हमारे हृदय में है और उनका आचरण हमारे व्यवहार में।

माता पिता हमारे प्रथम गुरु होते हैं और पालक भी ! हमारी सभी सांसारिक, भौतिक और आध्यात्मिक उपलब्धियों में उनका आशीर्वाद सदा हमारे साथ रहता है। आप क्या सोचते हैं, उनको रूष्ट कर कभी आप ईश्वर को मना लेंगे।।

हम भी खाली हाथ आए थे, और खाली हाथ ही जाएंगे, लेकिन अपनी आशीर्वाद रूपी बाप कमाई साथ लेकर जाएंगे, क्योंकि ऐसे माता पिता कहां सबको नसीब से मिलते हैं। रफी साहब एक सीधे सादे नेकदिल इंसान थे, कितनी मासूमियत से वह इतनी बड़ी बात कह गए ;

ले लो, ले लो

दुआएं मां बाप की

सर से उतरेगी

गठरी पाप की ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 221 – लेख – एआई से हैक हो रहा है आपका पासवर्ड, ये हैं बचाव के उपाय– ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका लेख – एआई से हैक हो रहा है आपका पासवर्ड, ये हैं बचाव के उपायकी समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 221

☆ लेख – एआई से हैक हो रहा है आपका पासवर्ड, ये हैं बचाव के उपाय ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

आजकल हर कोई ऑनलाइन काम करता है. बैंकिंग, शॉपिंग, ईमेल, सोशल मीडिया आदि सभी काम ऑनलाइन किए जाते हैं. ऐसे में हमारी ऑनलाइन सुरक्षा बहुत ही महत्वपूर्ण है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपका पासवर्ड भी एआई से हैक हो सकता है?

जी हां, हाल ही में हुए एक शोध में यह बात सामने आई है कि एआई का इस्तेमाल करके हैकर्स आपके कीबोर्ड की आवाज सुनकर आपका पासवर्ड पता लगा सकते हैं. इस तरीके को अकाउस्टिक साइड चैनल अटैक कहा जाता है.

इस अटैक में हैकर्स आपके पासवर्ड डालते समय आपके कीबोर्ड की आवाज को रिकॉर्ड करते हैं. इसके बाद वे इस आवाज को एआई से प्रोसेस करते हैं और आपके पासवर्ड का अनुमान लगाते हैं.

शोध में पाया गया है कि एआई 95% सटीकता के साथ आपके पासवर्ड का अनुमान लगा सकता है. यह बात बहुत ही चिंताजनक है क्योंकि आजकल लोग बहुत ही कमजोर पासवर्ड का इस्तेमाल करते हैं.

अगर आप अपने पासवर्ड को सुरक्षित रखना चाहते हैं तो आपको कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए. सबसे पहले, आपको एक मजबूत पासवर्ड का इस्तेमाल करना चाहिए. आपका पासवर्ड कम से कम 8 अक्षरों का होना चाहिए और इसमें अक्षर, संख्या और विशेष वर्ण शामिल होने चाहिए.

दूसरा, आपको अपने पासवर्ड को एक ही वेबसाइट पर दोबारा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. हर वेबसाइट के लिए आपको एक अलग पासवर्ड का इस्तेमाल करना चाहिए.

तीसरा, आपको अपने पासवर्ड को किसी भी तरह से लिखकर नहीं रखना चाहिए. आप अपने पासवर्ड को एक पासवर्ड मैनेजर में रख सकते हैं.

अगर आप इन बातों का ध्यान रखेंगे तो आप अपने पासवर्ड को एआई से सुरक्षित रख सकते हैं.

एआई से हैकिंग से बचने के लिए कुछ उपाय

एक मजबूत पासवर्ड का इस्तेमाल करें. आपका पासवर्ड कम से कम 8 अक्षरों का होना चाहिए और इसमें अक्षर, संख्या और विशेष वर्ण शामिल होने चाहिए.

अपने पासवर्ड को एक ही वेबसाइट पर दोबारा इस्तेमाल न करें. हर वेबसाइट के लिए आपको एक अलग पासवर्ड का इस्तेमाल करना चाहिए.

अपने पासवर्ड को किसी भी तरह से लिखकर न रखें. आप अपने पासवर्ड को एक पासवर्ड मैनेजर में रख सकते हैं.

अपने सिस्टम को हमेशा अपडेट रखें. सॉफ्टवेयर अपडेट में अक्सर सुरक्षा से जुड़े सुधार होते हैं जो आपके सिस्टम को हैकिंग से बचाने में मदद करते हैं.

अनजान लिंक पर क्लिक न करें. अनजान लिंक पर क्लिक करने से आपके सिस्टम में मैलवेयर आ सकता है जो आपके पासवर्ड को चुरा सकता है.

सार्वजनिक Wi-Fi का इस्तेमाल सावधानी से करें. सार्वजनिक Wi-Fi का इस्तेमाल करने से आपके पासवर्ड को चुराने का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे में आपके पासवर्ड को एन्क्रिप्ट करना चाहिए या आपके पासवर्ड को किसी पासवर्ड मैनेजर में रखना चाहिए.

अगर आप इन बातों का ध्यान रखेंगे तो आप अपने पासवर्ड को एआई से सुरक्षित रख सकते हैं.

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

18-08-2023

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७८५ ⇒ सोचने की आज़ादी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सोचने की आज़ादी।)

?अभी अभी # ७८५ ⇒ आलेख – सोचने की आज़ादी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हमारी अभिव्यक्ति हमारे सोच का ही परिणाम होती है। जो हम बोलते हैं अथवा लिखते हैं, वे या तो हमारे विचार हो सकते हैं अथवा किसी और से प्रभावित विचार। इसमें हमारी शिक्षा, संस्कार, परिवेश और लोगों की संगति भी शामिल होती है।

जितना हम सोचते हैं, क्या हम उतना व्यक्त कर पाते हैं। अभिव्यक्ति पर सबसे पहला अंकुश हमारा स्वयं का होता है। हमें सोच समझकर अपने विचार प्रकट करने पड़ते हैं। जल्दबाजी में अथवा आवेश व आक्रोश में अक्सर ऐसा कुछ हमारे द्वारा कह दिया जाता है, जिसके लिए हमें बाद में पछतावा भी हो सकता है। इसीलिए तौल मोल कर बोलने की सलाह दी जाती है।।

अभिव्यक्ति वही होती है, जो प्रकट होती है। वे ही कालांतर में शब्द, विचार, दर्शन एवं कथा, प्रवचन, भाषण अथवा उपदेश बन जाते हैं। वैसे तो बिना सोचे विचारे कुछ भी कहा अथवा लिखा नहीं जा सकता, फिर भी अगर कुछ ऐसा प्रकट हो जाता है तो वह असंतुलित, अमर्यादित अथवा ऊटपटांग की श्रेणी में आता है। होश में कही बात ही अभिव्यक्ति कहलाती है।

कई बार अभिव्यक्ति पर अंकुश लगे हैं। कुछ आरोपों प्रत्यारोपों पर मानहानि तक बात पहुंची है। कई पुस्तकें, फिल्में प्रतिबंधित हुई हैं। हमारे देश में तो आपातकाल का काला अध्याय भी लिखा जा चुका है। समझदार उसमें भी बहुत कुछ व्यक्त कर जाते हैं। आपातकाल और प्रेस सेंसरशिप एक साथ प्रभावी हुई थी। विरोध न लिखकर किया जा सकता था न बोलकर। ऐसे में नईदुनिया के संपादक श्री राजेन्द्र माथुर ने संपादकीय का पन्ना खाली ही छोड़ दिया। केवल काली स्याही ही विरोध का प्रतीक बन गई। एक ऐतिहासिक अभिव्यक्ति जो जन जन तक, विरोध प्रकट करने का माध्यम बन गई।।

आज अभिव्यक्ति की आजादी अपने चरम पर है। सोशल मीडिया एवं डिजिटल इंडिया जितना मुखर आज है, इसके पहले कभी नहीं रहा। सामाजिक अन्याय, अपराध जगत और ड्रग माफिया के खिलाफ जंग और समाज में जागरूकता लाने का काम तो सनसनी, सी आई डी, सावधान इंडिया जैसे टीवी सीरियल अरसे से करते आ रहे हैं लेकिन अब तो टीवी न्यूज वाले चैनल भी 24 x 7 (कमर्शियल ब्रेक को छोड़कर) एक ही मुद्दा स्पेशल डिश की तरह परोस रहे हैं। कहीं इनका प्रभाव भी पड़ रहा है और कहीं दवाब भी। परिणाम अथवा दुष्परिणाम आपकी सोच पर आधारित है।

सोचने की आजादी अभिव्यक्ति की आज़ादी से बहुत बड़ी है, विस्तृत है, विशाल है। उस पर किसी तरह की बंदिश अथवा सेंसरशिप लगाना संभव नहीं। अगर आपका चिंतन मौलिक है तो सार्थक है और अगर केवल दूसरों के विचारों को ही अपने सोच का आधार बनाते हैं, तो मौलिक चिंतन की संभावनाएं क्षीण हो सकती हैं।।

चिंतन, मनन दो ऐसे शब्द हैं, जो गंभीर किस्म के सोच से जुड़े हुए हैं। इसमें, अभ्यास, अध्ययन और स्वाध्याय तीनों का समावेश होता है। जो परिश्रम एवं पीड़ा से प्रकट होता है, उसे सृजन कहते हैं। सृजन में पीड़ा भी है और सुख भी। ऐसा कहा जाता है, यह स्वाभाविक होता है। पुरुष मां नहीं बन सकता। लेकिन वह किसी पर प्यार लुटा सकता है, किसी पर कुर्बान तो हो सकता है।

यों तो हमारा मस्तिष्क एक वर्कशॉप की तरह रात दिन काम करता रहता है। काम भी चलता रहता है और सोच विचार भी। घर बैठे बैठे जिसके बारे में सोचा, वहीं पहुंच गए। जब कोई कहता है, कहां खो गए हैं आप, तब आप विचारों के आकाश से ज़मीन पर उतर आते हैं। जागते हुए चेतन मन, और सोते हुए अवचेतन मन को चैन कहां आराम कहां।।

हमारा सोच ही हमें इंसान बनाता है। क्या सोच भी घटिया हो सकता है ! जब हमारे विचारों पर राग, द्वेष, क्रोध, लालच, अहंकार और स्वार्थ हावी हो जाता है तो हमारी सोच भी वैसी ही हो जाती है। अतः सात्विक सोच ही हमारे विचारों पर नकेल है। कोई दूसरा आपको क्यों अनुशासित करे, क्या आप स्वयं सक्षम नहीं।

दुनिया में अच्छा बुरा सब मौजूद है। आपमें इतनी समझ आ गई कि आप गीला और सूखे कचरे में भेद करने लगे। लेकिन कभी कचरे को आपने सहेजा नहीं।

सुबह होते ही कचरा पेटी का रास्ता दिखा दिया। कुछ विचार भी कचरा हो सकते हैं उन्हें मन से बाहर निकालना होगा। सफाई मन से शुरू होती है तब मानवता तक उसकी पहुंच होती है।

अच्छी सोच, अच्छी अभिव्यक्ति। अच्छे विचार। प्रेम, मुस्कुराहट और थोड़ी करुणा का मिक्सड अचार, सुविचार। सुप्रभात !

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७८४ ⇒ हिंदी डे ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हिंदी डे।)

?अभी अभी # ७८४ ⇒ आलेख – हिंदी डे ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

पिंकी ने स्कूल से घर आते ही अपनी माँ से प्रश्न किया, माँम, ये हिंदी डे क्या होता है ! मेम् ने हिंदी डे पर हिंदी में ऐसे essay लिखने को कहा है !

बेटा, जैसे पैरेंट्स डे होता है, वैलेंटाइन्स डे होता है, वैसे ही हिंदी डे भी होता है। इस दिन हम सबको हैप्पी हिंदी डे विश करते हैं, एक दूसरे को बुके देते हैं, और हिंदी में गुड मॉर्निंग और गुड नाईट कहते हैं। ।

मॉम, यह निबंध क्या होता है ? पता नहीं बेटा ! सुना सुना सा वर्ड लगता है। उनका यह वार्तालाप मंगला, यानी उनकी काम वाली बाई सुन रही थी ! वह तुरंत बोली, निबंध को ही एस्से कहते हैं, मैंने आठवीं क्लास में हिंदी दिवस पर निबंध भी लिखा था।

पिंकी एकाएक चहक उठी !

मॉम ! हिंदी में essay तो मंगला ही लिख देगी। इसको हिंदी भी अच्छी आती है ! मंगला को तुरंत कार्यमुक्त कर दिया गया। मंगला आज तुम्हारी छुट्टी। पिंकी के लिए हिंदी में, क्या कहते हैं उसे, हाँ, हिंदी डे पर निबंध तुम ही लिख दो न ! तुम तो वैसे भी बड़ी फ़्लूएंट हिंदी बोलती हो, प्लीज। ।

मंगला ने अपना सारा ज्ञान, अनुभव और स्मरण-शक्ति बटोरकर हिंदी पर निबंध लिखना शुरू किया। उसे एक नई कॉपी और महँगी कलम भी उपलब्ध करा दी गई थी। मुसीबत और परिस्थिति की मारी मंगला को वैसे भी मज़बूरी में पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी। लेकिन पढ़ाई में उसकी रुचि कम नहीं हुई थी। वह खाली समय में अखबार के अलावा गृहशोभा और मेरी सहेली के भी पन्ने पलट लिया करती थी।

और ” हिंदी दिवस ” पर मंगला ने बड़े मनोयोग से निबंध तैयार कर ही लिया। पिंकी और उसकी मॉम बहुत खुश हुई। पिंकी ने उस निबंध की सुंदर अक्षरों में नकल कर उसे असल बना स्कूल में प्रस्तुत कर दिया।।

पिंकी के हिंदी डे के essay को स्कूल में प्रथम पुरस्कार मिला और मंगला को भी पुरस्कार-स्वरूप सौ रुपए का एक कड़क नोट और एक दिन का काम से ऑफ..!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ – महा-लेखनिक गजानन ☆ डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆

डाॅ. मीना श्रीवास्तव

☆ आलेख  – महा-लेखनिक गजानन ☆ डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆

“ॐ गं गणपतये नमो नमः”

नमस्कार पाठक गण!

विगत दिनों हमने गणपती के उत्सव का आनंद मेला मनाया| अच्छे खासे दसों दिनों तक बाल गणेश के आगमन का यह उत्सव हम बड़े ही लाड़ प्यार, अनुराग और धूम धाम से मनाते हैं| क्या रौनक, क्या भक्ति गीत, क्या मोदक और लड्डू खिलाए जाते हैं उन्हें सुबह-शाम! लक्ष्य बस एक ही है! बुद्धि के देवता गजानन को प्रसन्न करना! उनके समक्ष एक ही प्रार्थना होती है, सद्बुद्धि का सदुपयोग करते हुए जग में जो भी मंगल है, वह हमारे जीवन में प्रवेश कर उसे समृद्धि प्रदान करे!  हमें पूर्ण विश्वास है कि चौंसठ कलाओं के दाता गणेश जी यह वरदान देकर हमें अनुग्रहित करेंगे! हम जानते हैं कि हमारा परम प्रिय गजवदन प्रत्यक्ष बुद्धि का देव है| परन्तु एक वक्त उसे लेखनिक होना पड़ा, यानि इसका अर्थ यह हुआ कि इस बुद्धिजीवी को किसी अन्य व्यक्ति द्वारा निर्देशित स्क्रिप्ट को, प्राचीन पद्धति से, संभवतः ताड पत्र पर लिखना पड़ा था। समग्र देव देवताओं द्वारा अग्रमानांकित गणेश को यह करने के लिए बाध्य करने वाले कोई और नहीं, बल्कि महर्षि वेद व्यास ही थे। वैसे भी ऋषियों का अनुरोध देवताओं के लिए आदेश ही होता था।

हुआ यूँ कि महर्षि वेदव्यास अपने समग्र जीवन के मधुर-कटु अनुभवों को एक महाकाव्य के रूप में रचना चाहते थे। उन्होंने उसका नाम ‘जय संहिता’ रखा। (हालाँकि, इस ग्रंथ के पूर्ण होने के बाद इसका नाम बदलकर ‘महाभारत’ कर दिया गया।) जब वेदव्यास ने इतने अति विस्तृत महाकाव्य रचने का बीड़ा उठाया, तो उन्हें अपनी सीमित क्षमता का एहसास हुआ। वे सोचने लगे, “मैं सोचते-सोचते एक श्लोक लिखूँगा! फिर दूसरा श्लोक… हे भगवन! अगर मैंने अपनी सारी ऊर्जा लिखने में ही लगा दी, तो अगला श्लोक लिखने की शक्ति कहाँ से लाऊँगा?” ऐसी दुविधा में फंसे व्यास मुनि ब्रह्मा जी से प्रार्थना करने लगे, “हे सृष्टिकर्ता, क्या कोई ऐसा है जो मेरे श्लोकों का उच्चारण करने के तुरंत बाद उन्हें लिख सके? कृपया मेरे महाकाव्य को पूर्ण करने के लिए किसी कुशल लेखनिक की व्यवस्था करें।” अब ब्रह्मा, जिन्हें वेदव्यास की बुद्धिमत्ता का पूरा अंदाज़ा था, सोच में पड़ गए। उनके पास सभी देवताओं का बायोडाटा था ही। उन्होंने वेदव्यास को आदेश दिया, “मुझे विश्वास है कि कैलाश पर्वत पर बसे शिव और पार्वती के पुत्र गणेश आपका कार्य संपन्न करेंगे। आप उनसे अनुरोध करें।”  

ब्रह्मदेव की आज्ञा के अनुसार व्यास मुनी ने गजानन की आराधना प्रारम्भ की| उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए श्री गणेश ने प्रकट होकर उन्हें शुभाशीर्वाद दिए| तब महर्षि व्यास ने श्री गणेश से अपनी इच्छा व्यक्त की। व्यास की यह प्रार्थना सुनकर गणेश ने उनके समक्ष एक शर्त रखी। “जब मैं लिखने बैठूँ, तो मैं चाहता हूँ कि आप जो भी बताएं, वह बिना किसी रूकावट के बताएं, उसमें एकरूपता हो। मैं बीच में कोई विराम नहीं लेना चाहता। अन्यथा, मेरी एकाग्रता भंग हो जाएगी और फिर मैं चला वापस कैलाश को! ” बड़े प्रयासों से जिस उद्दिष्ट को साध्य किया था उस महा लेखनिक की शर्त को स्वीकार करने के अलावा व्यास जी के पास कोई विकल्प नहीं था| अब शर्त रखने की बारी वेद व्यास की थी। उन्होंने कहा, “हे गणेश जी! मेरी भी आपसे एक शर्त है कि आप श्लोक को पूरी तरह समझे बिना न लिखें, अर्थात श्लोक का अर्थ पूरी तरह समझ लेने के बाद ही लिखें।” (मित्रों, देखिये, आजकल के विद्यार्थियों को बिना दिमाग लगाए नोट्स लेने की आदत है। उनके लिए यह कितना प्राचीन उपाय है|) गणेश जी द्वारा रखी गई यह शर्त स्वीकार करने के बाद व्यास जी के श्लोकों का पाठ और गणेश जी का लेखन कार्य बड़ी तेजी से शुरू हो गया। व्यास जी को जल्द ही अनुभूति हो गई कि गणेश जी को सारे श्लोक समझने के लिए कुछ ही क्षण काफ़ी हैं। अब व्यास जी ने अपने श्लोकों को और जटिल बनाना शुरू कर दिया। बीच-बीच में वे गणेश जी के सामने पहेलियाँ भी रखते थे। गणेश जी को ये बातें समझने में थोड़ा ज़्यादा समय लगता था और उस दौरान व्यास जी अगले श्लोकों पर मनन करते थे। इस प्रकार एक लाख से भी अधिक श्लोकों वाले इस महाभारत नामक महाकाव्य की रचना हुई। इसीलिए कहा जाता है कि जो महाभारत में है, वहीं और सिर्फ वहीं इस संसार में भी है। क्यों भला? वेद व्यास के विराट ज्ञान भंडार, बुद्धिमत्ता, प्रज्ञा और अनुभवों के कथन को ज्ञान के दाता गणेश ने उनकी कलम के रूप में आशीर्वाद जो दिया था! 

मित्रों, आज भी भारत के उत्तराखंड राज्य में बद्रीनाथ शहर के पास माणा गाँव में गणेश गुफा और व्यास गुफा स्थित हैं। ऐसा माना जाता है कि व्यास गुफा वही गुफा है जहाँ महर्षि वेद व्यास ने महाभारत की रचना की थी। इस गुफा के पास ही गणेश गुफा है जहाँ, भगवान गणेश ने व्यास के कहने पर महाकाव्य महाभारत का लेखन किया था।

मैं विघ्नहर्ता श्री गजानन और महाकवि महर्षि वेद व्यास दोनों के चरणों में नम्रतापूर्वक नमन करती हूँ!

टिप्पणी  – गणेश जी को अर्पित इस भक्तिरस पूर्ण रचना का आनंद लीजिये| 

गणेश पंचरत्नम | वंदे गुरु परम्परा |    रचना- आदि शंकराचार्य

गायक सूर्यगायत्री और कुलदीप एम पै, संगीत- रचना- कुलदीप एम पै

© डॉ. मीना श्रीवास्तव

ठाणे 

मोबाईल क्रमांक ९९२०१६७२११, ई-मेल – drmeenashrivastava21@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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