हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १७२ – देश-परदेश – एक अच्छी आदत ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १७२ ☆ देश-परदेश – एक अच्छी आदत ☆ श्री राकेश कुमार ☆

आज उपरोक्त ख़बर दैनिक समाचार पत्र में पढ़ी तो बड़ा सुकून मिला। जबसे होश संभाला है, जीवन में जब भी कोई मिला, हर व्यक्ति ये ही कहता रहा, “तुम कुछ भी नहीं करते हो”।

आज इस खबर से बड़ी राहत मिली। बचपन में पाठशाला के शिक्षक, परिजन आदि सभी ये ही कहते थे, कब तुम कुछ करोगे? अब बड़े हो रहे हो, कब कुछ करोगे ?

महाविद्यालय के गुरुजन भी ये ही तोहमत दिया करते थे। जीवन में क्या करोगे? आदि आदि। विवाहोपरांत भी पत्नी ये ही कहती आ रही हैं, तुम तो निठल्ले हो, दुनिया कहां से कहां पहुंच गई है।

कार्यालय के साथी भी वरिष्ठ अधिकारी से कह देते थे, हमारे पास तो कोई काम है, ही नहीं, इसी चक्कर में सभी सीटों का पेंडिंग कार्य हमें ही करना पड़ता था। ठप्पा जो लगा हुआ था, कि हमारे सीट पर कुछ भी काम नहीं है।

बच्चे, अब बड़े हो गए हैं, वो भी मीठे शब्दों में ऐसा ही कुछ कह देते हैं। जो करना है, जल्दी करना आरंभ कर देवें। जीवन में एक्टिव रहना चाहिए।

मित्र मंडली भी खुले आम, भरी महफिलों में हमारी फुरसतिया आदत का मखौल उड़ाते रहते हैं।

अब सब का मुंह बंद हो जायेगा, जब उनको मालूम चलेगा हम वर्षों से कुछ नहीं कर, दिमाग को ब्रेक दिए हुए हैं। अब जब भी ब्रेक समाप्त होगा, हम बहुत कुछ कर सकने लायक बन जाएंगे। बस दिल साथ नहीं दे रहा, वो कमबख्त तो ये चाहता है, हम कभी भी कुछ ना करें।

हद, तो तब हो जाती है, दिल के निकट वाले दोस्त इस लेख को पढ़ कर ये कह देते हैं, उसके पास कोई काम नहीं है, बस मोबाइल में कुछ भी लिख कर सांझा कर देता है।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९५८ ⇒ विचारों का लॉक डाउन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “विचारों का लॉक डाउन।)

?अभी अभी # ९५८ ⇒ आलेख – विचारों का लॉक डाउन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

चित्त, मन और बुद्धि के साम्राज्य में विचार कहां से उठते हैं, कहां चले जाते हैं, कहना बड़ा मुश्किल होता है। विचार आपके कहने से नहीं आता। जब किसी एक विषय पर आप अपना मन केंद्रित करते हैं, तब विचारों को एक दिशा अवश्य मिल जाती है।

एकांत हो, और लेखन का मूड हो, तो विचार मानो नोट बंदी की कतार में खड़े मिलते हैं। मेरा नंबर कब आयेगा! कुछ विचार ऐसे भी होते हैं जो कतार तोड़कर आगे निकल जाते हैं। अगर इनकी तकदीर अच्छी हुई तो उनको लेखक के पन्नों में जगह मिल जाती है। कभी कभी तो विचारों का आगमन तय होता है और इतने में ही पत्नी चाय का प्याला लेकर चली आती है, और आया हुआ विचार चाय की भाप के साथ हवा हो जाता है।।

विचारों को जितनी जल्दी कलम में कैद कर लिया जाए उतना अच्छा क्योंकि विचारों की फितरत आवारा किस्म की होती है। आज ऐसा ही कुछ अहसास हुआ, जब कुछ लिखने के लिए कलम उठाई। विषय तक तय था लेकिन अचानक विचारों पर ऐसा ब्रेक लगा, मानो लॉक डाउन घोषित हो गया हो। बहुत दिमाग पर ज़ोर डाला, लेकिन न तो वह शीर्षक स्मृति में वापस आया, न ही कोई विचार।

मैं आंखें बंद करके लेट गया।

आसपास की आवाज़ें साफ सुनाई दे रही थी, लेकिन विचारों का आवागमन पूरी तरह बंद था। सृजन की अवस्था से अचानक एक बंजर जमीन जैसी अवस्था किसी को भी असहज कर सकती है, लेकिन मैं इस अवस्था में भी आनंद तलाश कर रहा था। बिना प्रयत्न किए, विचार शून्य होना, सहजावस्था के संकेत हैं। जो चित्त हमेशा समुद्र की लहरों की तरह अशांत रहता है, अचानक गहरे पानी पैठ गया है। वहां कोई हलचल नहीं, कोई सात्विक, राजसी अथवा तामसी विचार नहीं।।

उस विचारशून्य अवस्था से जब पुनः विचारों के प्रवाह ने मुझे झंझोड़ा, तब मुझे आभास हुआ मैं विचारों के शून्य से गुजर चुका हूं। विचारों का लॉक डाउन समाप्त हो गया है, अब विचार किसी के बाप से नहीं रुकने वाले।

शून्य में ऐसा क्या है, जो किसी अंक में नहीं। क्या विचारों के अभाव का चित्त पर इतना प्रभाव पड़ता है कि वह संकल्प विकल्प करना भूल जाता है। यह वह अवस्था नहीं जिसे किंकर्तव्यविमूढ़ कहा जाता है। विचारों का अभाव ही ध्यान है, समाधि है, जहां प्रज्ञा पूर्ण रूपेण जाग्रत रहती है। विचारशून्यता एक ऐसा आकाश है, जहां जागृति होते हुए भी जड़ता नजर आती है। हमारा अस्तित्व उसी शून्य से है, वही संभवतः चिदाकाश है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९५७ ⇒ संगीत चिकित्सा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “संगीत चिकित्सा।)

?अभी अभी # ९५७ ⇒ आलेख – संगीत चिकित्सा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

लिपटन माने अच्छी चाय!

संगीत चिकित्सा माने

म्यूज़िक थेरेपी।

जहाँ चाह, वहाँ राह! चिकित्सा विज्ञान के अंतर्गत चिकित्सा की कई प्रणालियों का समावेश होता है। जिनमें देसी, विदेशी और यूनानी पद्धति प्रमुख हैं। हमारे देश में प्रमुखतः एलोपैथी, होमियोपैथी और नेचुरोपैथी का प्रचलन अधिक है। महर्षि धन्वन्तरी की आयुर्वेदिक चिकित्सा आज भी अपना महत्व रखती है।

मर्ज़ बढ़ता गया, ज्यूं ज्यूं दवा की! जब रोग असाध्य हो जाता है, तो इंसान सभी पेथियों को लात मार थेरैपी पर उतर आता है। चिकित्सा भी स्थूल से सूक्ष्म पर उतर आती है। कहीं यौगिक क्रिया, कहीं रेकी तो कहीं एक्यूप्रेशर और एक्यूपंक्चर का सहारा लिया जाता है। जोड़ों और नसों के दर्द के लिए अगर फिजियोथेरेपी है तो पेट की समस्याओं के लिए हायड्रोथेरैपी।।

जो योग आत्मा से परमात्मा को जोड़ता था, वह इंसान को रोगमुक्त करने के काम आने लग गया। सही भी है! पहले रोग-मुक्त तो हो जाएं, मुक्ति और मिलन बाद की बात है। कुंडलिनी को जब जागना होगी, जाग लेगी! पहले रात को चैन की नींद और सुबह खुलकर शौच तो हो ले। कहा भी है, पहला सुख निरोगी काया।

स्वच्छता और स्वास्थ्य ही हमारी मूलभूत आवश्यकता है। देश से बीमारी और गंदगी दूर करने का बीड़ा केवल राजयोगी और योगी मिलकर ही उठा सकते हैं। बाबा रामदेव और मोदी हैं, तो यह मुमकिन है। दोनों की अपनी अपनी आलीशान दुकान है।।

संगीत और आध्यात्म तन की नहीं, मन की साधना है। कौन जानता था कि जो कभी सङ्गीत महाविद्यालय था, वह आगे चलकर संगीत चिकित्सालय का रूप धारण कर लेगा। जिस तरह आसन और प्राणायाम का उपयोग बीमारियां ठीक करने के लिए किया जाने लगा है, संगीत से भी आजकल रोगोपचार किया जा रहा है।

मुझे रात को नींद नहीं आती आचार्य जी! ऐसा कीजिए, आप रोज रात को आधा घंटा, राग यमन सुना कीजिये, आपको तुरंत नींद आ जाएगी। शास्त्रीय संगीत की सभा में इसका मुझे कई बार अनुभव हुआ है। म्यूजिकथेरेपी का दावा है कि इसका असर कोमा के मरीज पर भी संभव है। मन की सूक्ष्म तरंगें अवचेतन में संगीत की स्वर-लहरियों से आंदोलित होने लगती हैं। स्वर की साधना परमेश्वर की साधना तो है ही, असाध्य रोगों पर भी इसका सकारात्मक प्रभाव देखा गया है।

इसमें कोई शक नहीं कि संगीत संजीवनी का काम करता है। जिन्हें शास्त्रीय संगीत से एलर्जी है, उनके लिए शास्त्रीय रागों पर आधारित फिल्मी गाने हैं न।

डर लगे तो गाना गा।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३२९ – युद्ध के विरुद्ध ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३२९ युद्ध के विरुद्ध… ?

मनुष्य कंदराओं में रहता था। सभ्यता के विकास के साथ उसने सामुदायिक उन्नति को आधार बनाया। परिणामस्वरूप नगर बसे, मनुष्य में अनेकानेक कलाओं का विकास हुआ। सारी विकास-यात्रा में  तथापि भीतर का आदिम न्यूनाधिक बना रहा।

इसी आदिम का एक पर्यायवाची है युद्ध। वस्तुत: युद्ध मनुष्य को ज्ञात और मनुष्य द्वारा विकसित एक ऐसी विद्रूप कला है जो मनुष्यता को ही विनाश के मुहाने पर ले आई। केवल विगत सौ वर्ष का इतिहास उठाकर देखें तो पाएँगे कि प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में तीन दशक से भी कम का अंतराल रहा। उसके बाद भी दुनिया निरंतर छोटे-बड़े युद्धों से जूझती रही है।

युद्ध की विभीषिका का दुष्परिणाम मनुष्य और मनुष्यता पर किस तरह से और कितना हुआ, इसका  आँखें खोलने वाला एक प्रमाण 31 मार्च 2015 को एक फोटो के रूप में सामने आया था।

यह फोटो युद्धग्रस्त सीरिया के शरणार्थी शिविर में रहने वाली 4 वर्षीय बच्ची हुडिया का था। फोटो जर्नलिस्ट ने जब फोटो खींचने के लिए अपना कैमरा इस बच्ची की ओर घुमाया तो युद्धग्रस्त क्षेत्र की बिटिया ने कैमरे को बंदूक समझा और क्षण भर भी समय लगाए बिना भय से आत्मसमर्पण की मुद्रा में अपने दोनों हाथ ऊपर उठा दिए। ‘सरेंडर्ड’ शीर्षक का यह मर्मस्पर्शी चित्र शेष बची मनुष्यता के हृदय पटल पर गहराई से अंकित हो गया।

साथ ही यह चित्र अनेक प्रश्नों को विस्तृत कैनवास पर खड़ा कर गया। मनुष्य शनै:-शनै: युद्ध का आदी होता जा रहा है। युद्ध का आदी होने का अर्थ है कि मृत्यु और विनाश, बर्बरता और विद्रूपता अब हमारी संवेदना पर तुलनात्मक रूप से काफ़ी कम प्रभाव डालते हैं। यह प्रक्रिया आगे चलकर मनुष्य को पूरी तरह से संवेदनहीन कर देती है।

इससे भी अधिक घातक और दुखदाई है कि मानुष से अमानुष होने की इस यात्रा पर कोई चिंतित नहीं दिखाई देता। पिछले कुछ वर्षों से विश्व अनेक बड़े युद्ध देख रहा है। प्रकृति का निरंतर विनाश हो रहा है। मनुष्य के उन्माद ने अंतरिक्ष को प्रक्षेपास्रों का अड्डा बना दिया है तो सागर की गहराइयों में संहारक क्षमता वाली पनडुब्बियाँ उतार दी हैं। धरती, सागर, आकाश सब बारूद के ढेर पर बैठे हैं।  शांति के लिए युद्ध को अनिवार्य बता कर  नोबल प्राप्त कर सकने का हास्यास्पद अभियान भी देखने को मिला। सचमुच यह मनुष्य के मानसिक स्वास्थ्य पर विचार करने का समय है।

विचार करने पर खुली आँखों से दिखता तथ्य है कि महा शक्तियों के लिए युद्ध व्यापार हो चला है। हर कोई अपने तरीके से युद्ध बेच रहा है। जो युद्ध की परिधि में हैं, वे तिल-तिल कर जी रहे हैं, उनका मरना भी तिल- तिल कर ही है। जो प्रत्यक्ष युद्ध की परिधि से बाहर हैं उनके लिए युद्ध मनोरंजन भर है। बमों के धमाकों की, मिसाइल की, युद्ध के अंतरराष्ट्रीय समीकरणों की चर्चा  करते समय प्राय: मारे जा रहे लोग, पीड़ित स्त्रियाँ, आतंकित बच्चे मनुष्य की आंखों में नहीं तैरते। कुछ देर युद्ध की ख़बरें देखना लोगों के लिए असंख्य चैनलों में एक और विकल्प भर रह गया है।

अपनी कविता ‘युद्ध के विरुद्ध’ स्मरण हो आई है-

कल्पना कीजिए,

आपकी निवासी इमारत

के सामने वाले मैदान में,

आसमान से एकाएक

टूटा और फिर फूटा हो

बम का कोई गोला,

भीषण आवाज़ से

फटने की हद तक

दहल गये हों

कान के परदे,

मैदान में खड़ा

बरगद का

विशाल पेड़

अकस्मात

लुप्त हो गया हो

डालियों पर बसे

घरौंदों के साथ,

नथुनों में हवा की जगह

घुस रही हो बारूदी गंध,

काली पड़ चुकी

मटियाली धरती

भय से समा रही हो

अपनी ही कोख में,

एकाध काले ठूँठ

दिख रहे हों अब भी

किसी योद्धा की

ख़ाक हो चुकी लाश की तरह,

अफरा-तफरी का माहौल हो,

घर, संपत्ति, ज़मीन के

सारे झगड़े भूलकर

बेतहाशा भाग रहा हो आदमी

अपने परिवार के साथ

किसी सुरक्षित

शरणस्थली की तलाश में,

आदमी की

फैल चुकी आँखों में

उतर आई हो

अपनी जान और

अपने घर की औरतों की

देह बचाने की चिंता,

बच्चे-बूढ़े, स्त्री-पुरुष

सबके नाम की

एक-एक गोली लिए

अट्टहास करता विनाश

सामने खड़ा हो,

भविष्य मर चुका हो,

वर्तमान बचाने का

संघर्ष चल रहा हो,

ऐसे समय में

चैनलों पर युद्ध के

विद्रूप दृश्य

देखना बंद कीजिए,

खुद को झिंझोड़िए,

संघर्ष के रक्तहीन

विकल्पों पर

अनुसंधान कीजिए,

स्वयं को पात्र बनाकर

युद्ध की विभीषिका को

समझने-समझाने  का यह

मनोवैज्ञानिक अभ्यास है,

मनुष्यता को बचाए

रखने का यह यथासंभव प्रयास है!

अलबत्ता यह भी सच है की कभी-कभी युद्ध अपरिहार्य होता है। ‘शठे शाठ्यं समाचरेत्’ के सूत्र से सहमत होते हुए भी यथासंभव युद्ध रोकने के सारे प्रयास किए जाने चाहिएँ। अठारह अक्षौहिणी सेना को निगल जाने वाले महाभारत युद्ध को रुकवाने के लिए योगेश्वर भी दुर्योधन के पास गए थे। युद्ध तब भी अंतिम विकल्प था, अब भी अंतिम विकल्प ही होना चाहिए।

नौनिहालों का आत्मसमर्पण, मनुष्यता के आत्मसमर्पण की घंटी है। यदि हम सच्चे मनुष्य हैं तो बचपन के चेहरे से आत्मसमर्पण के भाव को हटवा कर  फोटो खिंचवाने की प्रसन्नता में बदलने की मुहिम में जुटना होगा।  मानवता कराह रही है, मानवता बुला रही है। क्या हम सुन पा रहे हैं इस स्वर को?

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ आपदां अपहर्तारं साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️ 💥 

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९५६ ⇒ देश की मिट्टी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “देश की मिट्टी।)

?अभी अभी # ९५६ ⇒ आलेख – देश की मिट्टी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हम जिसे देश, वतन, राष्ट्र, भारत माता अथवा धरती माता कहते हैं, वह वास्तव में हमारे देश की मिट्टी ही तो होती है, कहीं काली, कहीं रेतीली, तो कहीं पथरीली।

मिट्टी से ही बना यह शरीर, पंच तत्वों में विलीन हो, इसी मिट्टी में तो समा जाता है।

हम छोटे थे, तो मिट्टी में बहुत खेलते थे। मां हमें दूध पिलाती थी, खिलाती पिलाती थी, फिर भी हम मिट्टी खाते थे। कई बार मां ने मुंह में उंगली डाल मिट्टी बाहर निकाली होगी, हमें मारा भी होगा, लेकिन अपने देश की मिट्टी का स्वाद किस मां के लाल ने नहीं चखा।।

हमें क्यों अपना ननिहाल बार बार याद आता है, क्योंकि वहां मिट्टी में खेलने से कोई नहीं रोकता था। मिट्टी के मकान होते थे मिट्टी के ही आंगन और ओटले होते थे, जिन्हें गोबर से लीपा जाता था। रोज नया चूल्हा जलता था, बढ़िया लिपा पुता हुआ। वहां दूध डेयरी से नहीं आता था, गाय खुद दूध देती थी। तब दूध के दो ही तो नाम होते थे, मां का दूध और गाय का दूध। हां, लेकिन मक्खन तो नानी ही निकालती थी।

हमारा देश और कहीं नहीं है, आज भी हमारे आसपास ही है। एक किसान अगर खेती कर रहा है, अपने खेत की रखवाली कर रहा है, अनाज पैदा कर रहा है, तो वह देश की सेवा ही तो कर रहा है। यही उसकी राष्ट्रीयता है, उसकी देशभक्ति है। अपने देश की मिट्टी से जुड़े रहना ही सच्ची राष्ट्रीयता है।।

देश की इसी मिट्टी के लिए कई रणबांकुरों ने अपने जीवन का बलिदान दिया है। ये माटी सभी की कहानी कहेगी। आप कभी हल्दी घाटी जाइए। महाराणा प्रताप का प्रताप देखिए, हम तो अपने घाव पर हल्दी लगाते हैं, योद्धाओं के लिए प्रकृति हल्दी घाटी बिछा देती है।

हम आज महानगरों के कांक्रीट जंगलों में आकर बस गए, मिट्टी के खिलौने भूल गए। जमीन बीघा एकड़ से सिमटकर स्क्वेयर फीट और इंच में आ गई। सर पर छत नहीं, पांवों के नीचे जमीं नहीं, 1, 2 और 3bhk में हमारी जिंदगी सिमटकर रह गई। इंसान कहां पहचाने मिट्टी और कहां खुला आसमान।।

ऐसे में, अचानक ही, मेरे अपने ही फ्लैट में हमारी बिटिया नर्सरी से दो नन्हे पौधे ले आई, मिट्टी में सने, पॉलीथीन से लिपटे। मुझे उनके लिए गमलों में मिट्टी तैयार करनी थी, और उन्हें सिर्फ गमलों में उतारना था।

जिन्हें बागवानी का और घर के पौधों की देखरेख का शौक है, वे वाकई देश की मिट्टी से ही जुड़े हैं। पौधों की सेवा भी किसी समाज सेवा अथवा ईश्वरीय सेवा से कम नहीं। नन्हीं खिलती कलियां और रंग बिरंगे फूलों की क्यारियां बच्चों की मुस्कान और किलकारियों से कम नहीं होती।।

गमले की मिट्टी में भी मुझे अपने देश की ही मिट्टी नजर आती है। इसी बहाने मैं रोज अपने देश की मिट्टी से तो जुड़ा हुआ हूं। देश की मिट्टी की गंध मुझे अपने गमलों में आती है, वही मेरा तिरंगा है, वही मेरा वंदे मातरम् है। देश की मिट्टी की गंध के आगे सभी सौगंध फीकी है, क्योंकि हमने अपने देश की मिट्टी का स्वाद चखा है …!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३१५ ☆ महाभारत नहीं रामायण… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख महाभारत नहीं रामायण। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३१५ ☆

☆ महाभारत नहीं रामायण… ☆

‘जब तक सहने की चरम सीमा रहेगी, रामायण लिखी जाएगी। मांगा हक़, जो अपने हित में महाभारत हो जाएगी।’ जी हाँ! यही सत्य है जीवन का, जो सदियों से धरोहर के रूप में सुरक्षित है। इसलिए नारी को सहन करने की शिक्षा दी जाती है, क्योंकि मौन सर्वश्रेष्ठ व सर्वोत्तम निधि है। वैसे तो यह सबके लिए वरदान है। बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों ने मौन रहकर व चित्त को एकाग्र कर अपने अभीष्ठ को प्राप्त किया है और जीव-जगत् व आत्मा-परमात्मा के रहस्य को जाना है। जब तक आप में सहन करने की शक्ति व त्याग करने का सामर्थ्य है; परिवारजन व संसार के लोग आपको सहन करते हैं, अन्यथा जीवन से बेदखल करने में पल-भर भी नहीं लगाते। विशेष रूप से नारी को तो बचपन से यह शिक्षा दी जाती है, ‘तुम्हें सहना है, कहना नहीं’ और वह धीरे-धीरे उसे जीने का मूलमंत्र बना लेती है तथा पिता, पति व पुत्र के आश्रय में सदैव मौन रहकर अपना जीवन बसर करती है।

वास्तव में नारी धरा की भांति क्षमाशील व सहनशील है; गंगा की भांति निर्मल व निरंतर गतिशील है; पापियों के पाप धोती है; पर्वत की भांति अटल है, परंतु कभी उफ़् नहीं करती। इसी प्रकार नारी भी ता-उम्र सबके व्यंग्य-बाणों के असंख्य भीषण प्रहार व ज़ुल्म हंसते-हंसते सहन करती है… यहां तक कि वह कभी भी अपना पक्ष रखने का साहस  नहीं जुटा पाती। वैसे तो पुरुष वर्ग द्वारा यह अधिकार नारी-प्रदत्त हैं ही नहीं। सो! वह दोयम दर्जे की प्राणी समझी जाती है– एक हाड़-मांस की जीवित प्रतिमा, जिसे दु:ख-दर्द होता ही नहीं, क्योंकि उसका मान-सम्मान नहीं होता। इसलिए आजीवन कठपुतली की भांति दूसरों के इशारों पर नाचना उसकी नियति बन जाती है। वह आजीवन समस्त दायित्व-वहन करती है; उसी आबोहवा में स्वयं को ढाल लेती है; दिन-भर घर को सजाती-संवारती व व्यवस्थित करती है और वह उस अहाते में स्वयं को सुरक्षित अनुभव करती है। बच्चों को जन्म देकर ब्रह्मा व उनकी परवरिश कर विष्णु का दायित्व निभाती है और उसके एवज़ में उसे उस घर में रहने का अधिकार प्राप्त होता है; जिसे वह कभी अपना कह ही नहीं सकती। यदि वह संतान को जन्म देने में असमर्थ रहती है, तो बाँझ कहलाती है और उससे उस घर में रहने का अधिकार भी छीन लिया जाता है, क्योंकि वह वंश-वृद्धि नहीं कर पाती। परिणाम-स्वरूप पति के पुनः विवाह की तैयारियां प्रारंभ की जाती हैं। इस स्थिति में साक्षर-निरक्षर का भेद नहीं किया जाता है… भले ही वह अपने पति से अधिक धन कमा रही हो; अपने सभी दायित्वों को सहर्ष वहन कर रही हो। मुझे स्मरण हो रही है ऐसी ही एक घटना…जहां एक शिक्षित नौकरीशुदा महिला को केवल बाँझ कह कर ही तिरस्कृत नहीं किया गया; उसे पति के विवाह में जाने को भी विवश कर लिया गया, ताकि उसकी मांग में सिंदूर व गले में मंगलसूत्र धारण करने का अधिकार कायम रह सके और उसे विवाहिता के रूप में उस छत के नीचे रहने का अधिकार प्राप्त हो सके। परंतु एक अंतराल के पश्चात् घर में बच्चों की किलकारियां गूंजने के पश्चात् घर- आँगन महक उठा और वह खुशी से अपना पूरा वेतन घर में खर्च करती रही। धीरे-धीरे उसकी उपस्थिति नव-ब्याहता को अखरने लगी और वह उस घर छोड़ने को विवश हो गयी। परंतु फिर भी वह मांग में सिंदूर धारण कर पतिव्रता नारी होने का स्वांग रचती रही। है न यह उसके प्रति अन्याय…. परंतु उस पीड़िता को सब मूर्ख समझते हैं, जिसने घर फूंक कर तमाशा देखा है। इसलिए उसके पक्ष में कोई भी आवाज़ नहीं उठाता।

सो! जब तक सहनशक्ति है, आपकी प्रशंसा होगी और रामायण लिखी जाएगी। परंतु जब आपने अपने हित में हक़ मांग लिया, तो महाभारत होना निश्चित है। वैसे भी अधिकारों की मांग करना–संघर्ष का आह्वान करना है और संघर्ष से महाभारत हो जाता है और जीवन का कोई भी पक्ष इससे अछूता नहीं रहता। राजनीति हो या धर्म; घर-परिवार हो या समाज; हर जगह इसका दबदबा कायम है। राजनीति तो सबसे बड़ा अखाड़ा है, परंतु आजकल तो सबसे अधिक झगड़े धर्म के नाम पर होते हैं। 

घर-परिवार में भी अब इसका पूर्ण हस्तक्षेप है। पिता-पुत्र, भाई-भाई व पति-पत्नी के जीवन से स्नेह-सौहार्द इस प्रकार नदारद है, जैसे चील के घोंसले से माँस। जहां तक पति-पत्नी का संबंध है, उनमें समन्वय व सामंजस्य है ही नहीं… वे दोनों एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी के रूप में अपना क़िरदार निभाते हैं, जिसका मूल कारण है अहं; जो मानव का सबसे बड़ा शत्रु है। इसी कारण वे आजकल एक-दूसरे के अस्तित्व को भी नहीं स्वीकारते; जिसका परिणाम अलगाव व तलाक़ के रूप में हमारे समक्ष है। वैसे भी आजकल संयुक्त परिवार-व्यवस्था का स्थान एकल परिवार- व्यवस्था ने ले लिया है, परंतु फिर भी पति-पत्नी आपस में प्रसन्नता से अपना जीवन बसर नहीं कर पाते और एक-दूसरे से निज़ात पाने में लेशमात्र भी संकोच नहीं करते। वैसे भी आजकल ‘तू नहीं, और सही’ का बोलबाला है। लोग संबंधों को वस्त्रों की भांति बदलने लगे हैं, जिसका मूल कारण ‘लिव-इन व प्रेम विवाह’ है। अक्सर बच्चे भावावेश में संबंध तो स्थापित कर लेते हैं और चंद दिन साथ रहने के पश्चात् एक-दूसरे की कमियाँ-ख़ामियाँ उजागर होने लगती हैं; जिन्हें वे स्वीकार नहीं पाते और परिणाम होता है तलाक़–जिसका सबसे अधिक खामियाज़ा बच्चों को भुगतना पड़ता है। वैसे आजकल सिंगल पेरेंट का प्रचलन भी बहुत बढ़ गया है। सो! इन विषम परिस्थितियों में बच्चों का सर्वांगीण विकास कैसे संभव है? एकांत की त्रासदी झेलते बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो जाता है। वे असामान्य हो जाते हैं; सहज नहीं रह पाते और वह सब दोहराते हुए अपना जीवन नरक-तुल्य बना लेते हैं। 

ग़लत लोगों से अच्छी बातों की अपेक्षा कर हम आधे ग़मों को प्राप्त करते हैं और आधी मुसीबतें हम अच्छे लोगों में दोष ढूंढ कर प्राप्त करते हैं। ग़लत साथी का चुनाव करके हम अपने जीवन के सुख-चैन को दाँव पर लगा देते हैं और दोष-दर्शन हमारा स्वभाव बन जाता है, जिसके परिणाम- स्वरूप हमारा जीवन जहन्नुम बन जाता है। आजकल लोग भाग्य व नियति पर कहाँ विश्वास करते हैं? वे तो स्वयं को भाग्य-विधाता समझते हैं और यही सोचते हैं कि उनसे अधिक बुद्धिमान संसार में कोई दूसरा है ही नहीं। इस प्रकार वे अहंनिष्ठ प्राणी पूरे परिवार की जीवन भर की खुशियों को लील जाते हैं। संदेह व अविश्वास इसके मूल कारक होते हैं। सो! समाज में शांति कैसे व्याप्त रह सकती है? इसलिए बीते हुए कल को याद करके उससे प्राप्त सबक़ को स्मरण रखना श्रेयस्कर है। मानव को अतीत का स्मरण कर अपने वर्तमान को दु:खमय नहीं बनाना चाहिए, बल्कि उससे सीख लेकर अपने भविष्य को उज्ज्वल बनाना चाहिए। जीवन में सफलता पाने का मूलमंत्र यह है कि ‘उस लम्हे को बुरा मत कहो, जो आपको ठोकर पहुँचाता है; बल्कि उस लम्हे की कद्र करो, क्योंकि वह आपको जीने का अंदाज़ सिखाता है। दूसरे शब्दों में अपनी हर ग़लती से सीख गहण करें, क्योंकि आपदाएं आपके धैर्य की परीक्षा लेती हैं और मज़बूत बनाती हैं। सो! ग़लती को दोहराओ मत। जो मिला है, उन परिस्थितियों को उत्तम बनाने की चेष्टा करो; न कि भाग्य को कोसने की। हर रात के पश्चात् सूर्योदय अवश्य होता है और अमावस के पश्चात् पूनम का आगमन भी निश्चित है। जीवन में आशा का दामन कभी मत छोड़ें, क्योंकि गया वक्त लौटकर कभी नहीं आता। हर पल को सुंदर बनाने का प्रयास करें। जीवन में सहन करना व त्याग करना सीखें, क्योंकि अगली सांस लेने के लिए मानव को पहली सांस का त्याग करना पड़ता है। संचय की प्रवृत्ति का त्याग करें। इंसान खाली हाथ आया है और उसे खाली हाथ ही इस संसार से लौट जाना है। सो! सदाशयता को अपनाएं और दूसरों के प्रति कर्तव्यनिष्ठता का भाव रखें, क्योंकि कर्त्तव्य व अधिकार अन्योन्याश्रित हैं। अधिकार-स्थापत्य अशांति- प्रदाता है, जो हृदय का सुक़ून छीन लेता है। इसलिए उसे अपने जीवन से बाहर का रास्ता दिखा दें, ताकि हर घर में रामायण की रचना हो सके। पारस्परिक ईर्ष्या-द्वेष व संघर्ष को जीवन में पदार्पण मत करने दें, क्योंकि ये महाभारत के जनक हैं, प्रणेता हैं। सो! अलौकिक आनंद से अपना जीवन बसर कर लें।                   

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ वरिष्ठ पुरुषों में प्रोस्टेट स्वास्थ्य – एक सरल मार्गदर्शिका ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🌼 वरिष्ठ पुरुषों में प्रोस्टेट स्वास्थ्य – एक सरल मार्गदर्शिका 🌼

प्रिय मित्रों, जैसे-जैसे हमारी आयु बढ़ती है, शरीर की देखभाल और भी आवश्यक हो जाती है। 50 वर्ष के बाद पुरुषों में एक सामान्य समस्या प्रोस्टेट ग्रंथि से जुड़ी होती है। आइए इसे शान्त और सरल भाषा में समझें।

🔍 प्रोस्टेट क्या है?

प्रोस्टेट पुरुषों में पाई जाने वाली एक छोटी ग्रंथि है, जो मूत्राशय (ब्लैडर) के नीचे स्थित होती है। यह प्रजनन प्रणाली का हिस्सा है। उम्र बढ़ने के साथ यह अक्सर बड़ी हो जाती है।

⚠️ प्रोस्टेट की समस्या क्यों होती है?

सबसे बड़ा कारण है बढ़ती उम्र। उम्र के साथ:

* हार्मोन में परिवर्तन होते हैं

* प्रोस्टेट धीरे-धीरे बढ़ने लगता है (इसे साधारण वृद्धि या BPH कहते हैं)

अन्य कारण:

* पारिवारिक इतिहास

* शारीरिक सक्रियता की कमी

* मोटापा

* असंतुलित आहार

👉 महत्वपूर्ण: सभी बुज़ुर्ग पुरुषों को यह समस्या नहीं होती। कई लोग पूरी ज़िंदगी बिना किसी विशेष परेशानी के रहते हैं।

📊 यह कितनी सामान्य है?

* 60 वर्ष के बाद लगभग 50% पुरुषों में प्रोस्टेट बढ़ने की समस्या होती है

* 80 वर्ष तक यह 80–90% पुरुषों में देखी जा सकती है

* लेकिन प्रोस्टेट कैंसर बहुत कम होता है

* जीवन में लगभग 10–15% पुरुषों को ही कैंसर हो सकता है

* और इनमें से भी कई मामलों में यह धीरे-धीरे बढ़ने वाला और कम खतरनाक होता है

 

🚫 मिथक या सत्य: क्या यौन सक्रियता से प्रोस्टेट की समस्या नहीं होती?

👉 सच्चाई (स्पष्ट रूप से):

कुछ शोध बताते हैं कि नियमित स्खलन (ejaculation) से प्रोस्टेट कैंसर का खतरा थोड़ा कम हो सकता है।

👉 लेकिन वास्तविकता यह है:

❌ यह पूरी तरह सुरक्षा नहीं देता

❌ यह कोई उपचार या निश्चित बचाव का उपाय नहीं है

❌ सामान्य यौन जीवन वाले लोगों में भी प्रोस्टेट की समस्या हो सकती है

✔️ इसलिए इस धारणा को अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर नहीं मानना चाहिए।

⚕️ प्रोस्टेट कैंसर क्यों होता है?

कुछ पुरुषों में कोशिकाएँ असामान्य रूप से बढ़ने लगती हैं, इसके कारण:

* उम्र के साथ जीन में परिवर्तन

* हार्मोन (विशेषकर टेस्टोस्टेरोन) का प्रभाव

* पारिवारिक इतिहास

👉 अधिकांश मामलों में यह कैंसर धीरे-धीरे बढ़ता है, इसलिए समय पर जाँच और निगरानी बहुत लाभदायक होती है।

🛡️ बचाव और देखभाल – आप क्या कर सकते हैं?

🌿 स्वस्थ जीवनशैली

* रोज़ टहलना 🚶‍♂️ (30–40 मिनट)

* वजन संतुलित रखना

* अधिक फल और सब्ज़ियाँ खाना 🥦🍎

* लाल मांस और तले भोजन कम करना

* पर्याप्त पानी पीना 💧

* धूम्रपान और अधिक शराब से बचना

🧘‍♂️ सरल आदतें

* पेशाब को ज़्यादा देर तक न रोकें

* मूत्राशय को पूरी तरह खाली करें

* हल्का योग और प्राणायाम करें

💊 चिकित्सकीय देखभाल

* 50 वर्ष के बाद नियमित जाँच कराएँ (यदि परिवार में इतिहास हो तो पहले)

* डॉक्टर की सलाह से PSA जाँच

* दवाओं से वृद्धि को नियंत्रित किया जा सकता है

* कुछ मामलों में ही सर्जरी की आवश्यकता होती है

👉 समय पर जाँच = बेहतर स्वास्थ्य

😊 इन लक्षणों पर ध्यान दें (घबराएँ नहीं)

* बार-बार पेशाब आना, खासकर रात में

* पेशाब का धीमा प्रवाह

* शुरू करने में कठिनाई

* पूरा खाली न होने का अहसास

👉 ये लक्षण अक्सर साधारण वृद्धि (BPH) के होते हैं, कैंसर के नहीं।

🌸 संदेश

अधिकांश प्रोस्टेट समस्याएँ धीमी, नियंत्रित और उपचार योग्य होती हैं। सही जीवनशैली और समय पर डॉक्टर की सलाह से हम स्वस्थ और सुखद जीवन जी सकते हैं।

📢 यह जानकारी चिकित्सा विज्ञान पर आधारित है। कृपया इसे अपने मित्रों और परिजनों के साथ अवश्य साझा करें, ताकि सभी को सही जानकारी का लाभ मिल सके।

© श्री जगत सिंह बिष्ट

साधक

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email lifeskills.happiness@gmail.com if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९५५ ⇒ परीक्षा और अग्नि परीक्षा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “परीक्षा और अग्नि परीक्षा।)

?अभी अभी # ९५५ ⇒ आलेख – परीक्षा और अग्नि परीक्षा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

परीक्षा तो हम बचपन से देते आ रहे हैं। परीक्षा फल या तो पास होता है अथवा फेल। हर व्यक्ति पास नहीं होता और हर व्यक्ति फेल भी नहीं होता। सफलता और असफलता जीवन के दो आयाम हैं, जो सफल होता है, वह आगे बढ़ जाता है, और जो असफल होता है, वह थोड़ा पीछे रह जाता है। लेकिन संसार में अस्तित्व दोनों प्रकार के लोगों का हमेशा कायम रहता है, कोई जीवन में सफल है, तो कोई असफल। कोई अगर आगे बढ़ रहा है तो कोई पीछे भी छूट रहा है।

जीवन की परीक्षा में सफल होना अपने आपमें एक पुरस्कार है और असफल होना एक सबक। जो आज फेल हुआ हैं, वह कल पास भी हो सकता है।

गारंटीड सक्सेस गाइड से भी लोग जीवन में आगे बढ़े हैं और कोचिंग क्लासेस से भी। कुछ लोग परीक्षाएं पास  करके भी जीवन में सफल नहीं हो पाए और कुछ बिना पढ़े ही बाजी मार ले गए। संभावनाओं और विसंगतियों, सफलता और असफलता का नाम ही तो जिंदगी है।।

कभी कभी हमें जीवन में अग्नि परीक्षा भी देनी पड़ती है। सीता ने भी अग्नि परीक्षा दी थी। भक्त प्रह्लाद की भी एक तरह से अग्नि परीक्षा ही तो थी। अग्नि परीक्षा में सब उत्तीर्ण नहीं होते। सुकरात और मीरा दोनों ने जहर का प्याला पीया। इतिहास में दोनों अमर हैं।

जब जब भी हम अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते हैं, वह हमारी अग्नि परीक्षा ही तो होती है। युद्ध में एक सिपाही की अग्नि परीक्षा ही तो होती है, युद्ध में जीत अगर अग्नि परीक्षा है तो युद्ध में शहीद होना भी अग्नि परीक्षा ही है। अग्नि परीक्षा में परिणाम नहीं देखा जाता, त्याग और समर्पण देखा जाता है।।

जो सच्चाई, ईमानदारी और धर्म के मार्ग पर चलते हैं, संसार उनकी अग्नि परीक्षा लेता ही रहता है।

सत्यवादी हरिश्चंद्र एक ही पैदा हुआ है, क्योंकि वह अग्नि परीक्षा में सफल हुआ। आज के युग में सत्य के मार्ग पर चलना कांटों से खेलना है। अगर आप सच के मार्ग पर निःसंकोच निडर होकर चल रहे हैं, तो मान लीजिए आप अग्नि परीक्षा ही दे रहे हैं।

झूठ फरेब, अन्याय, अत्याचार और शोषण की इस दुनिया में एक आम आदमी पल पल में अग्नि परीक्षा दे रहा है, फिर भी वह जिंदा है, क्या यह ईश्वर का चमत्कार नहीं!

आज दुनिया किताबी ज्ञान, आधुनिक विज्ञान और एक नई बीमारी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बलबूते पर ही चल रही है। आप परीक्षाएं देते रहिए, गला काट स्पर्धा में आगे बढ़ते रहिए, सफलता के परचम गाड़ते रहिए। निश्चिंत रहिए, आपको जीवन में कोई अग्नि परीक्षा नहीं देनी। वैसे भी होती क्या है अग्नि परीक्षा, गूगल सर्च तो इसे महज एसिड टेस्ट बता रहा है। यह कलयुग है, यहां परीक्षा और अग्नि परीक्षा नहीं, डिजिटल शिक्षा होती है। वैसे डिजिटल क्राइम से बचना भी किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – रामनवमी विशेष – राम, राम-सा..! ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – रामनवमी विशेष – राम, राम-सा..! ? ?

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे,

सहस्त्रनामतत्तुल्यं राम नाम वरानने।

राम मर्यादापुरुषोत्तम हैं, लोकहितकारी हैं। राम एकमेवाद्वितीय हैं। राम राम-सा ही हैं, अन्य कोई उपमा उन्हें परिभाषित नहीं कर सकती।

विशेष बात यह कि अनन्य होकर भी राम सहज हैं, अतुल्य होकर भी राम सरल हैं, अद्वितीय होकर भी राम हरेक को उपलब्ध हैं। डाकू रत्नाकर ने मरा-मरा जपना शुरू किया और राम-राम तक आ पहुँचा। व्यक्ति जब सत्य भाव और करुण स्वर से मरा-मरा जपने लगे तो उसके भीतर करुणासागर राम आलोकित होने लगते हैं।

राम का शाब्दिक अर्थ हृदय में रमण करने वाला है। रत्नाकर का अपने हृदय के राम से साक्षात्कार हुआ और जगत के पटल पर महर्षि वाल्मीकि का अवतरण हुआ। राम का विस्तार शब्दातीत है। यह विस्तार लोक के कण-कण तक पहुँचता है और राम अलौकिक हो उठते हैं। कहा गया है, ‘रमते कणे कणे, इति राम:’.. जो कण-कण में रमता है, वह राम है।

राम ने मनुष्य की देह धारण की। मनुष्य जीवन के सारे किंतु, परंतु, यद्यपि, तथापि, अरे, पर, अथवा उन पर भी लागू थे। फिर भी वे पुराण पुरुष सिद्ध हुए।

वस्तुतः इस सिद्ध यात्रा को समझने के लिए उस सर्वसमावेशकता को समझना होगा जो राम के व्यक्तित्व में थी। राम अपने पिता के जेष्ठ पुत्र थे। सिंहासन के लिए अपने भाइयों, पिता और निकट-सम्बंधियों की हत्या की घटनाओं से संसार का इतिहास रक्तरंजित है। इस इतिहास में राम ऐसे अमृतपुत्र के रूप में उभरते हैं जो पिता द्वारा दिये वचन का पालन करने के लिए राज्याभिषेक से ठीक पहले राजपाट छोड़कर चौदह वर्ष के लिए वनवास स्वीकार कर लेता है। यह अनन्य है, अतुल्य है, यही राम हैं।

भाई के रूप में भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न के लिए राघव अद्वितीय सिद्ध हुए। उनके भ्रातृप्रेम का अनूठा प्रसंग हनुमन्नाष्टक में वर्णित है। मेघनाद की शक्ति से मूर्च्छित हुए लक्ष्मण की चेतना लौटने पर हनुमान जी ने पूछा, ‘हे लक्ष्मण, शक्ति के प्रहार से बहुत वेदना हुई होगी..!’ लक्ष्मण बोले, “नहीं महावीर, मुझे तो केवल घाव हुआ, वेदना तो भाई राम को हुई होगी..!’

यह वह समय था जब समाज में बहु पत्नी का चलन था। विशेषकर राज परिवारों में तो राजाओं की अनेक पत्नियाँ होना सामान्य बात थी। ऐसे समय में अवध का राजकुमार, भावी सम्राट एक पत्नीव्रत का आजीवन पालन करे, यह विलक्ष्ण है।

शूर्पनखा का प्रकरण हो या पार्वती जी द्वारा सीता मैया का वेश धारण कर उनकी परीक्षा लेने का प्रसंग, श्रीराम की महनीय शुद्धता 24 टंच सोने से भी आगे रही। सीता जी के रूप में पार्वती जी को देखते ही श्रीराम ने हाथ जोड़े और पूछा, “माता आप अकेली वन में विचरण क्यों कर रही हैं और भोलेनाथ कहाँ हैं? “

इसी तरह हनुमान जी के साथ स्वामी भाव न रखते हुए भ्रातृ भाव रखना, राम के चरित्र को उत्तुंग करता है- ‘तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।’

समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलना राम के व्यक्तित्व से सीखा जा सकता है। उनकी सेना में वानर, रीछ, सभी सम्मिलित हैं। गिद्धराज जटायु हों, वनवासी माता शबरी हों, नाविक केवट हो, निषादराज गुह अथवा अपने शरीर से रेत झाड़कर सेतु बनाने में सहायता करनेवाली गिलहरी, सबको सम्यक दृष्टि से देखने वाला यह रामत्व केवल राम के पास ही हो सकता था। संदेश स्पष्ट है, जो तुम्हारे भीतर बसता है, वही सामने वाले के भीतर भी रमता है।…रमते कणे कणे…! कण कण में राम को राम ने देखा, राम ने जिया।

राजस्थान में अभिवादन के लिए ‘राम राम-सा’ कहा जाता है। लोक के इस संबोधन में एक संदेश छिपा है। राम-सा केवल राम ही हो सकते हैं। सात्विकता से सुवासित जब कोई ऐसा सर्वगुणसम्पन्न हो कि उसकी तुलना किसी से न की जा सके, अपने जैसा एकमेव आप हो तो राम से श्रीराम होने की यात्रा पूरी हो जाती है। यही राम नाम का महत्व है, राम नाम की गाथा है और रामनाम का अविराम भी है।

राम राम रघुनंदन राम राम,

राम-राम भरताग्रज राम राम।

राम-राम रणकर्कश राम राम,

राम राम शरणम् भव राम राम।।

श्रीरामनवमी की बधाई। त्योहार पारंपरिक पद्धति से मनाएँ, सपरिवार मनाएँ ताकि आनेवाली पीढ़ी सांस्कृतिक-आध्यात्मिक मूल्यों के रिक्थ से समृद्ध रहे।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ गुरुवार 12 मार्च से हमारी आपदां अपहर्तारं साधना आरंभ होगी। यह श्रीराम नवमी तदनुसार गुरुवार दि. 26 मार्च तक चलेगी। 🕉️ 

💥 इस साधना में श्रीरामरक्षा स्तोत्र एवं श्रीराम स्तुति का पाठ होगा‌। मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २८३ ☆ रामनवमी विशेष – शक्ति, सरलता और नई चेतना का पर्व… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना शक्ति, सरलता और नई चेतना का पर्व। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – कविता # २८३ ☆ शक्ति, सरलता और नई चेतना का पर्व

नवरात्रि की महाअष्टमी, माँ शक्ति की आराधना का वह पावन क्षण है, जब श्रद्धा केवल शब्द नहीं रहती, बल्कि जीवन का आधार बन जाती है। यह दिन हमें बाहरी पूजा के साथ-साथ अपने अंतर्मन में भी एक दीप जलाने की प्रेरणा देता है।

“शक्ति स्वरूपा माँ जगदम्बे” महागौरी इसी निष्कलुष भक्ति का सजीव चित्र प्रस्तुत करतीं हैं, जहाँ कोई जटिल विधि-विधान नहीं, केवल सच्चे हृदय की पुकार है—

“पूजन अर्चन कुछ नहिं जानू,

जानू तो बस प्यार…”

इन सरल शब्दों में छिपा भाव आज की पीढ़ी के लिए एक गहरा संदेश है। आधुनिक जीवन की भागदौड़ में जहाँ सब कुछ पाने की होड़ है, वहाँ यह भक्ति हमें ठहरना और अपने भीतर झाँकना सिखाती है। यह याद दिलाती है कि सच्ची शक्ति बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि मन की शांति, संतुलन और करुणा में निहित है।

महाअष्टमी केवल देवी पूजन का दिन नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का भी अवसर है। आज जब प्रकृति हमें संतुलन बनाए रखने का संकेत दे रही है, तब “ग्रीन सोच” को अपनाना भी हमारी जिम्मेदारी बन जाती है।

जैसे हम माँ के चरणों में पुष्प अर्पित करते हैं, वैसे ही धरती माँ के प्रति भी कृतज्ञता प्रकट करें—एक पौधा लगाकर, जल और पर्यावरण की रक्षा करके।

यह पर्व हमें सिखाता है कि भक्ति का वास्तविक स्वरूप केवल मंदिरों तक सीमित नहीं, बल्कि हमारे व्यवहार, हमारी सोच और हमारे कर्मों में झलकना चाहिए।

महाअष्टमी पर यही संकल्प हो—

हम अपने भीतर की शक्ति को पहचानें, उसे सकारात्मक दिशा दें, और एक ऐसे भविष्य का निर्माण करें जहाँ भक्ति, प्रकृति और मानवता साथ-साथ आगे बढ़ें।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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