हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # 28 ☆ लघुकथा – मामा जी… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “मामा जी“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # 28 ☆

✍ लघुकथा – मामा जी… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

अपने पिता को न देख पाने का दुख मामा जी को देखकर दूर हो जाता था । मयूर के लिए मामा जी ही सब कुछ थे। उसकी पढ़ाई लिखाई और जरूरतों की पूर्ति मामा जी ही करते थे। एक लिहाज से मां और मामा जी मयूर के जीवन के आधार थे। मयूर पढ़ने में होशियार था इसलिए मामा जी उसे अपने बेटे से भी ज्यादा चाहते थे। कभी कभी मामीजी इसे पसंद नहीं करती परंतु अपनी विधवा ननद की मजबूरियों तथा मयूर की होशियारी और अच्छे व्यवहार की वजह से कुछ बोलती नहीं थी। मयूर का घर का नाम बंटी था और मामा जी हमेशा बंटी ही कह कर पुकारते थे। शायद ही कभी मयूर कहकर पुकारा हो।

मयूर जवान हो गया और अपने ही शहर की एक कंपनी में एकाउंटेंट बन गया। मामा जी से सहायता लेने में कमी आती गई और धीरे धीरे बंद हो गई। मामा जी का पुत्र अचानक छोटी सी बीमारी के कारण चल बसा था और मामा जी शरीर से ही नहीं मन से भी कमजोर हो गए। उनकी याददाश्त कम हो गई। आमदनी भी कम हो गई। कपड़े लत्तों का भी ध्यान नहीं रहता। फिर भी मयूर से कोई सहायता स्वीकार नहीं करते थे।

एक दिन चलते चलते वे उस कंपनी के अहाते में चले गए जहां मयूर काम करता था। पता नहीं कैसे उन्हें याद आ गया कि बंटी इसी कंपनी में काम करता है। उनमें कुछ उत्साह का संचार हुआ। पर बंटी का नाम मयूर है यह उन्हें याद नहीं आया। और जो मिलता उससे पूछते कि बंटी कहां है, मुझे उससे मिलना है। मयूर का ऑफिस दूर नहीं था और बाहर होने वाली बातचीत सुनाई देती थी । मयूर ने बंटी शब्द सुना तो चौंक गया। बड़बड़ाया “मामा जी”, उठकर खिड़की से झांक कर देखा। उसके मामा जी ही थे, परंतु वे इतने मैले कुचले कपड़े पहने हुए थे कि बाहर निकल कर उनसे मिलने की उसे हिम्मत नहीं हुई। हृदय में हलचल मची हुई थी कि उसके पालनहार मामा जी उसके सामने हैं और वह मिलने से कतरा रहा है। मामा जी धीरे धीरे अहाते से बाहर निकले और फिर कभी भी मयूर के सामने नहीं आए।

आज भी मयूर बंटी सुनने को तरस रहा है और अपने आप पर पछता रहा है। जब कोई मैले कपड़े पहने कोई वृद्ध उसे दिखाई देता है तो मामा जी समझ मन ही मन प्रणाम करता रहता है।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # 78 – सब का हिस्सा… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – सब का हिस्सा।)

☆ लघुकथा # 78 – सब का हिस्सा श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

रानी अपने बच्चों के साथ खाना खा रही थी साथी पतिदेव भी बैठे थे।

रानी के पति अरुणेश ने कहा – “आज बच्चों तुम्हारी मां ने कितनी अच्छी सब्जी बनाई है। क्या भाग्यवान मुझे थोड़ी सी मिल सकती है।“

– “हां सब्जी तो बहुत अच्छी है” – बच्चों ने भी कहा।

तभी रानी ने अपनी कटोरी में से सब्जी अपने पति की थाली में डालना चाहा।

“क्या बात है क्या अंदर कढ़ाई में नहीं है?”  अरुणेश ने पूछा।

“नहीं मैंने थोड़ी ही बनाई थी यह सोचकर कि आप सभी को अच्छी लगे ना लगे।“

“कोई बात नहीं हम सभी कम ही खाएंगे। आज से एक बात याद कर लो अपने हिस्से की चीज कभी किसी को मत दिया करो। तुम इस घर की मालकिन हो, ऐसे अपना हिस्सा सबको देने लग जाओगी तो कैसे काम चलेगा? जब बच्चे बड़े हो जाएंगे, कहीं बाहर चले जाएंगे तो आखिर हम तुम अकेले रहेंगे। तुम्हें अपने स्वास्थ्य का ध्यान देना बहुत जरूरी है और आज से एक बात और याद रखो। जब भी कोई सामान खरीदना सबके लिए तो साथ में अपने लिए जरूर खरीदना तुम अपने को क्यों भूलती हो?”

“नहीं तो जीवन में तुम अकेली रह जाओगी। सब का हिस्सा है तो क्या तुम्हारा नहीं है?”

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका#71 – अंधा कानून… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– अंधा कानून …” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # 71 — अंधा कानून — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

मृतप्राय शेर ने मरियल दहाड़ से कहा उसकी मांद को सूंघ कर अपवित्र किया गया है। बलवान जानवरों ने उसकी खुशामद में पड़ कर उसके अपराधी को ढूँढ लिया। वह एक खरगोश था जिसे मार दिया गया। इसके बाद मंगलाचरण से शेर की मांद को पवित्र किया गया। अब शेर अपनी मांद में प्रवेश करे। यहीं बात खुली मांद तो शेर की नाप की थी ही नहीं। अब सब ने जाना यह तो उसी खरगोश की छत्र छाया थी।

 © श्री रामदेव धुरंधर

01 – 08 – 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “महिला लेखन” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “महिला लेखन” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

युवा लेखिका की पहली पहली किताब के विमोचन पर जाना हुआ। सबने न केवल लेखिका बल्कि उनके परिवार और खासतौर पर पति की जमकर तारीफ की। एक सफल कवयित्री के पीछे पति का जिक्र बार बार होता रहा। सभागार तालियों से गूंजता रहा।

समारोह के बाद घर पहुंचते ही पतिदेव ने कहा- देखो। बहुत हो गया यह साहित्य वाहित्य। बस। तुम्हारा शौक पूरा करवा दिया। अब बच्चों को देखो। पढ़ाओ लिखाओ इन्हें और एक औरत की तरह घर संभालो। समझी?

नयी नवेली किताब एक तरफ पड़ी मानो मुंह चिढ़ा रही थी।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – रिश्तों की आस ☆ सुश्री श्रद्धा जलज घाटे ☆

सुश्री श्रद्धा जलज घाटे

(साहित्यकार सुश्री श्रद्धा जलज घाटे जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. अल्प परिचय स्वरुप – आपने भारतीय स्टेट बैंक में 34 वर्ष सेवाएं देने के पश्चात स्वैच्छिक सेवानिवृति ली। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। साहित्य साधना सतत जारी। आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम लघुकथा रिश्तों की आस।)

☆ लघुकथा – रिश्तों की आस ☆ सुश्री श्रद्धा जलज घाटे ☆

“मम्मी! नानी हाउस कब चलेंगे? अब तो राखी भी आने वाली है।”

“बेटा! नाना-नानी तो  रहे नहीं। आप उसे अब मामा हाउस कहा करिए।” 

इतना कहते ही मैं चार माह पहले की स्मृति में खो गई। माँ को दुनिया छोड़े अभी दो माह ही हुए थे, कि पिताजी भी हमें छोड़कर चले गए। भरा घर एकदम से सूना हो गया।

चलते समय भाभी ने बहुत अपनत्व से कहा कि “दीदी! ये माँ  के सभी आभूषण हैं। जो मन करे लेते जाइएगा।”

“भाभी! मुझे तो बस ताउम्र पीहर की शीतल बयार चाहिए।’’ रुंधे गले से यह कहकर मैं माँ और पिताजी की एक सुंदर सी तस्वीर ले आई।

आज सुबह भाई का फोन आया। “प्रिया! ये मेरा और तुम्हारी भाभी का राखी पर बुलावा है। तुम्हारे आने की मैंने टिकिट्स करवा दी हैं।’’

स्नेह की पहली शीतल बयार से मन में बड़ा सुकून मिला।

तभी भाई आगे बोले- “इस बार दो-चार दिन रुककर जाना। कुछ पेपर्स, सर्टिफिकेट वग़ैरह हैं जिन पर तुम्हारे साइन होना हैं।’’

” ठीक है भाई।”

पर साइन की बात सुनकर मेरे हृदय को ज़ोर का धक्का लगा।  मन कई प्रकार की आशंकाओं से घिर गया।

भाई आगे बोले- ‘’प्रिया! दरअसल माँ-पिताजी की स्मृति में मेधावी छात्रों के इनाम  और कुछ प्रतियोगिताएं रखी हैं। सर्टिफिकेट माँ -पिताजी के नाम से ही रहेंगे, पर संस्था चाहती है कि “सौजन्य से”  में मेरा भी नाम हो, पर मैं चाहता हूँ कि मेरे साथ तुम्हारा भी नाम हो।’’

“प्रिया! आखिर हम एक ही वृक्ष की दो टहनियां हैं। वे जितने मेरे थे उतने ही तुम्हारे भी थे।’’

” बस! अब जरा जल्दी से आ जाना। बच्चों को भी बुआ  का इंतजार है।” कहते हुए भाई भावुक हो गए। उनकी बातें सुनकर मेरी आँखें भी भर आईं।

© सुश्री श्रद्धा जलज घाटे

संपर्क – द्वारा डॉक्टर पदम घाटे, अरिहंत पैथोलॉजी लैब, वेदव्यास कॉलोनी रतलाम-457001 (म. प्र.)

मोबाईल – 9425103802

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # १५४ ☆ लघुकथा – ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा अम्माँ को पागल बनाया किसने ?। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # १५४ ☆

☆ लघुकथा – अम्माँ को पागल बनाया किसने ?  ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

“भाई! आज बहुत दिन बाद फोन पर बात कर रही हूँ तुमसे। क्या करती बात करके? तुम्हारे पास बातचीत का सिर्फ एक ही विषय है कि ‘अम्माँ पागल हो गई हैं’। उस दिन तो मैं दंग रह गई जब तुमने कहा – अम्माँ बनी-बनाई पागल हैं। भूलने की कोई बीमारी नहीं है उन्हें।”

“मतलब” – मैंने पूछा 

“जब चाहती हैं सब भूल जाती हैं, वैसे फ्रिज की चाभी ढूँढकर सारी मिठाई खा जाती हैं। तब पागलपन नहीं दिखाई देता? अरे! वो बुढ़ापे में नहीं पगलाई, पहले से ही पागल हैं।”

“भाई! तुम सही कह रहे हो – वह पागल थी, पागल हैं और जब तक जिंदा रहेगीं पागल ही रहेंगी।अरे! आँखें फाड़े मेरा चेहरा क्या देख रहे हो? तुम्हारी बात का ही समर्थन कर रही हूँ।” ये कहते हुए अम्माँ के पागलपन के अनेक पन्ने मेरी खुली आँखों के सामने फड़फड़ाने लगे।

“भाई! अम्माँ का पागलपन तुम्हें तब समझ में आया जब वह तुम्हारे किसी काम की नहीं रह गई, बोझ बन गई तुम पर। पागल ना होती तो मोह के बंधन काटकर तुम पति-पत्नी को घर से बाहर का रास्ता दिखा दिया होता। तुम्हारी मुफ्त की नौकर बनकर ना रहतीं अपने ही घर में। सबके समझाने पर भी अम्माँ ने बड़ी मेहनत से बनाया घर तुम्हारे नाम कर दिया। कुछ ही समय में उन्हें अपनी गलती का एहसास हो गया था।  इसके बाद भी ‘मेरा राजा बेटा’ कहते उनकी जबान नहीं थकती, पागल ही थीं ना बेटे-बहू के मोह में? जब जीना दूभर हो गया तुम्हारे घर में तब मुझसे एक दिन बोली – ‘बेटी! बच्चों के मोह में कभी अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी ना मार बैठना, मेरी तरह। मैं तो गल्ती कर बैठी, तुम ध्यान रखना।”

“भाई! फोन रखती हूँ। कभी समय मिले तो सोच लेना अम्माँ को पागल बनाया किसने??”

© डॉ. ऋचा शर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # 78 – आपका ही घर है…… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – आपका ही घर है…।)

☆ लघुकथा # 78 – आपका ही घर है… श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

अवनीश जी ने चिल्लाकर गुस्से में कहा – क्या हुआ भाग्यवान अभी तक तुमने चाय नहीं बनाई?

क्या करूं घर के काम ही नहीं खत्म होते बना रही हूं, कमल जी ने धीमे में कहा।

चाय पी लो आज नाश्ता नहीं बनेगा सीधे मैं खाना ही बना रही हूं क्योंकि आपने अपनी बहन को बुला लिया है और उनके साथ बुआ जी भी आ रही हैं। अभी-अभी तो हमने बेटी श्रुति की शादी की है, अब बेटी दामाद को कब बुलाऊ कुछ समझ नहीं आ रहा है।

बेटी दामाद को भी बुला लो क्या मेरी बहन उनका खाना या कुछ छीन लेंगे या तुमसे कुछ लेती हैं।

कमल जी ने कहा- मुझसे तो कोई कुछ नहीं लेता, आप तो दुकान चले जाते हो सारा दिन सबके आराम का ख्याल तो मुझे ही रखना पड़ता है, राखी आ रही है, इस त्यौहार में मैं अपने भाई के यहां मायके तो नहीं जा पाती। ऊपर से दिनभर सब बैठकर ताने सुनाती रहेंगी।

अवनीश जी ने कहा -तुम बोलो तो उन्हें फोन करके मना कर दूं।

कमल जी ने कहा- नहीं नहीं, सभी को बुला लो और कोई बचा हो तो।

तुम चिंता मत करो झाड़ू पोछा बर्तन के साथ खाना बनाने के लिए भी बाई को रख लेंगे।या तुम कहो तो दिन भर एक काम वाले लड़के को दुकान से भेज देता हूं। बुआ जी तो बुजुर्ग है दीदी भी तुम्हारे काम में मदद कर देगी। मैंने दामाद जी और परख बिटिया को भी बुला लिया है।

इतने में दोनों दरवाजे पर देखते हैं तो बुआ और उसकी बहन रागिनी दोनों खड़े हुए सारी बातें सुनते हैं।

आप लोग बिटिया और दामाद को बुला लो और हमारी चिंता मत करो अब से हम राखी के दिन ही आकर राखी बांधकर चले जाया करेंगे क्या करें। इसी बहाने हम सभी को मायके आने का मौका मिलता है नहीं तो कोई आने नहीं देता कुछ दिन आराम से रहकर बचपन के दिन जीते हैं।

कमल जी की आंखें नम हो जाती है और आंसू निकलने लगते हैं, वे कहती है- आप लोग मुझे माफ कर दीजिए, आइये बैठिए आपका ही घर है दीदी।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 235 – भोले का अभिषेक ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “भोले का अभिषेक ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 235 ☆

🌻लघु कथा🌻 🛕भोले का अभिषेक 🚩

भारत में सनातनी धर्म, शिव शंकर को ध्याने वाले, अटूट श्रद्धा और विश्वास सानंद देखने को मिलाता है।

भोर होते भोले दरबार में काँवड यात्रा की भीड़, श्रद्धा और यात्रा में लगी होड़। शहर में पुन्य सलिला माँ नर्मदा का नीर भरकर लगभग 35 कि मी की पैदल यात्रा।

बीच-बीच में कहीं-कहीं कहीं पानी का पाऊच, बिस्किट, मेंगो फ्रुटी, चाय, फलहारी, केला बाँटे जा रहे थे।

महेश उम्र में तो कम, परन्तु जिम्मेदारी और गरीबी से लग रहा था कि सयाना हो चला था। एक झोले में सभी सामान भरते जा रहा था। उसका मन उल्लास, उमंग से भरा था बच्चों को दो दिनों तक थोड़ा-थोड़ा खाने का सामान दे देगें।

मंदिर प्रांगण में पहुँचने से पहले सभी का सामान देखा जा रहा पर यह क्या?!!!  महेश देखता ही रह गया—-

उसका सारा सामान एक जाली नुमा टंकी पर फेंक दिया गया। जिसे वह काँवड़ से भी ज्यादा संभाल कर चल रहा था।

बदले में 1/2लि दूध का पैकेट दिया गया। कुछ लोग तो फाड़- फाड़ कर दूध अभिषेक की बाल्टी में डाल रहे थे, परन्तु महेश कमीज में छुपाकर निकल गया। साथ में दो तीन फटे पैकेट उठाकर चलता बना, जिसमें दुध बचा हुआ था।

अभिषेक का जल नाली नुमा धार से बहा दिया गया। महेश बाते करते जा रहा था– प्रभु मेरे बच्चों ने खीर खाने की इच्छा की है। आप बड़े दयालु अंतर्यामी है।

दूध के पैकेट मिलने से पाँव के छाले का दर्द फीका पड़ गया। सहलाता हुआ दरवाजे पर गिरा चढ़ा नारियल और चिरौंजी दाने उठाता गदगद हो हर-हर बम-बम की टेर लगाता उल्लास के साथ घर की ओर बढ़ चला।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “प्यार की धुन” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “प्यार की धुन” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

मैं चौक पर किसी सवारी की इंतज़ार में खड़ा था। कुछ फासले पर एक विकलांग भी शायद इसी उम्मीद में खड़ा हुआ था। मैले कुचैले, गंदे से कपड़े पहने बैसाखियों के सहारे। मैं सोचने लगा कि इसे कौन अपने ऑटो में बिठायेगा ?

तभी एक ऑटो रुका। मैं पिछली सीट पर बैठ गया। वह ऑटो चालक उतरा और उस विकलांग को बड़े प्यार से अपने साथ वाली सीट पर बैठने में उसकी मदद करने लगा। मेरा भी हृदय पिघल गया। मैंने फैसला किया कि इसका किराया मैं ही चुका दूंगा।

कुछ स्टाॅपेज के बाद उस विकलांग का स्टाॅपेज आ गया। इससे पहले कि मैं कहता कि किराया मैं दूंगा ऑटो चालक ने उसे उतने ही प्यार से सहारा देकर उतारा और बैसाखियों के सहारे खड़ा कर दिया। और जैसे ही उस विकलांग ने पैसे देने के लिए जेब में हाथ डाला, ऑटो चालक ने बिना कुछ कहे ऑटो आगे बढ़ा दिया।

मैं ऑटो चालक के इस पुनीत भाव को देखकर जैसे हैरान था और भौचक्का भी। इसे कहते हैं सहयोग। बिना किसी प्रकार की हमदर्दी दिखाये या शोर शराबा मचाये .. और जैसे कहीं कोई बांसुरी की मधुर धुन बजने लगी ….या कहीं दूर मंदिर की घंटियां सुनाई देने लगीं….

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – एकाकार ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – एकाकार ? ?

‘मैं मृत्यु हूँ। तुम मेरी प्रतीक्षा का अंतिम विराम हो। मैं तुम्हारी होना चाहती हूँ पर तुम्हें मरा हुआ नहीं देख सकती..,’ जीवन के प्रति मोहित मृत्यु ने कहा।

‘मैं जीवन हूँ। तुम ही मेरा अंतिम विश्राम हो।  तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा क्योंकि मैं तुम्हें हारा हुआ नहीं देख सकता..’, मृत्यु के प्रति आकर्षित जीवन ने उत्तर दिया।

समय ने देखा जीवन का मृत होना, समय ने देखा मृत्यु का जी उठना, समय ने देखा एकाकार का साकार होना।

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© संजय भारद्वाज  

12:56 बजे रात्रि, 13 जुलाई 2023

 अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रावण साधना रविवार ११ जुलाई 2025 से रक्षाबंधन तदनुसार शनिवार 9 अगस्त तक चलेगी। 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगासाथ ही गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ भी करेंगे। 💥 

💥 101 से अधिक मालाजप करने वाले महासाधक कहलाएंगे 💥

💥 संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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