हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – साधन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – साधन ? ?

असंख्य आदमियों की तरह

आज एक और

आदमी मर गया,

अपने पीछे वे ही

अमर प्रश्न छोड़ गया,

समकालीन प्रश्न-

अब यह आदमी नहीं रहा,

ऐसे में हमारा क्या होगा?

सार्वकालिक प्रश्न-

जन्म से पहले

आदमी कहाँ था,

मृत्यु के बाद

आदमी कहाँ जाएगा?

लगता है जैसे

कई तरह के प्रयोगों का

रसायन भर है आदमी,

जीवन की थीसिस के लिए

शोध और अनुसंधान का

साधन भर है आदमी। 

(कवितासंग्रह ‘मैं नहीं लिखता कविता‘)

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ मार्गशीर्ष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी। 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४५ ☆ # “पराधीन लोकतंत्र…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “पराधीन लोकतंत्र…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४५ ☆

☆ # “पराधीन लोकतंत्र…” # ☆

☆

हम सीधे-साधे भोले भाले हैं

इस मतलबी दुनिया से बहुत निराले हैं

 

सभी है मित्र यहां

कोई नहीं अमित्र यहां

हम मित्रता को

दिल से निभाने वाले हैं

 

जिनके सफेद वस्त्र है

उनके स्याह चरित्र है

उजले उजले है चेहरे

पर दिल के काले काले है

 

हमने जीवन भर संघर्ष किया

अपने मूल्यों पर उत्कर्ष किया

माथे पर कोई शिकन नहीं

पर पैरों में अभी भी छालें है

 

हमने ताने सुने तिरस्कार सहा

हमने गालियां सुनी कुछ ना कहा

भेदभाव भरी दुनिया में

सीने में चुभते हुए भाले हैं

 

एक जून की रोटी है

किस्मत ही खोटी है

गरीबी विकराल है

भूख है पर दूर निवाले है

 

विधाता क्या लिख गया

जो कुछ था सब बिक गया

ना घर रहा ना छत रही

फुटपाथों के पाले है

 

यह बेबंद अर्थतंत्र है

पराधीन लोकतंत्र है

तानाशाही चरम पर है

शायद गुलामी के दिन आने वाले /

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # ८८- दिल में ही समाओ… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘दिल में ही समाओ…‘।)

☆ अभिव्यक्ति # ८८ ☆ दिल में ही समाओ… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

☆

दिल कह रहा है, दिल से कहीं न जाओ,

दिल में ही तुम रहना, दिल में ही समाओ,

 

दिल की बाते, दिल ही जाने,

क्या कहता है,  मैं क्या जानूं,

ये भी तुम बतलाओ,

दिल में ही समाओ,

 

दिल दीवाना, दिल पागल है,

दिल न समझे, दिल तो दिल है,

दिल की भाषा, दिल ही जाने,

दिल को भी समझाओ,

दिल में ही समाओ,

 

दिल रोता है, दिल हंसता है,

दिल चुप रहता, दिल कहता है,

दिल जिद्दी है,

दिल दीवाना, दिल की मान जाओ,

दिल में ही समाओ,

 

दिल न समझे, तुम समझाओ,

दिल न माने, इसे मनाओ,

मौन है दिल, इसे बताओ,

दिल से बातें, तुम कहलाओ,

दिल में ही समाओ.

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ एको अरथ…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – एको अरथ…!

☆ ॥ कविता॥ एको अरथ…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

☆ 

यह   कैसा  शोर – शराबा रे,

यह  क्यूँकर ख़ून-खराबा रे।

एको   अरथ   राम  -रहीमा,

एको अरथ काशी-काबा रे।

 *

सबके  खून  को   एको  रंग,

केवल  जुदा  जीने  को ढंग।

सबका  अपनो  दीनो-धरम,

फिर क्यूँकर मारा मारी जंग।

अपने   दुश्मन  आप   बने हैं,

कोई  तो  समझाए  बाबा रे।

 *

धरम-जात से ऊपर उठकर,

दिखलाएँ   जीवन    जीकर।

दिलों  बीच दूरियाँ मिटाकर,

दिखलाएँ  हम इंसां बनकर।

साँझी- संस्कृति  के बुनकर,

ज्यों  सुई में पिरोया धागा रे।

 *

यह  देश   जितना तुम्हारा है,

यह  देश उतना ही हमारा है।

यहाँ  कौन  है  किसका बैरी,

किस  बात  का यलगारा है।

सभी  रहें आपस में मिलकर,

घृणा- द्वेष  से  करें  तौबा रे।

☆

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २६० – दोस्त ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय रचना  – दोस्त)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २६० ☆

☆ सामयिक गीत – दोस्त ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

☆

दोस्त है तो दोस्ती दिल से निभा

दोस्त को दिल में हमेशा तू बसा

.

दोस्त दिलवर दिलरुबा चाहे न हो

दोस्त को देना नहीं यारां दगा

.

दोस्ती ही दोस्त को उपहार है

दोस्त से बढ़कर न कोई भी सगा

.

दोस्त हों श्रीकृष्ण-अर्जुन की तरह

दोस्त दुर्योधन न दे मरवा खुदा

.

दोस्त पर कर जान भी कुर्बान तू

दोस्त की भाती ‘सलिल’ को हर अदा।

☆

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१९.११.२०२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ एक था बचपन … ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम् ☆

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आई आई एम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। आप सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत थे साथ ही आप विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में भी शामिल थे।)

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी ने अपने प्रवीन  ‘आफ़ताब’ उपनाम से  अप्रतिम साहित्य की रचना की है। आज प्रस्तुत है आपकी अप्रतिम रचना “एक था बचपन …”।

? एक था बचपन … ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम् ☆ ?

☆

एक था बचपन  प्यारा सा बचपन

क्या मस्ती भरे दिन थे, लिए ढेरों अपनापन

 

दिल की गलियों में आज भी

चुपके से यादों के पखेरू उड़ते हैं

भीगी मिट्टी की सोंधी खुशबू

मन के आँगन को महकाती रहती है

 

ना कोई फ़िकर थी ना कोई परवाह

बस हँसी के अपने साथी होते थे

नर्म धूप भी उँगली पकड़े

रोज़ नए सपने बुन, इतराया करती थी…

 

एक था बचपन, प्यारा सा बचपन

क्या मस्ती भरे दिन थे, लिए ढेरों अपनापन…

 

कागज़ की अपनी छोटी सी नाव,

बरसाती नालों में शान से बहती थी,

आँखों में रहती थी एक खुशनुमा दुनिया,

लिए रंग-बिरंगे सपने तमाम…

 

वो चिलचिलाती दोपहरें, वो भीगी रातें

अब भी दिल को छू जाती हैं

रूहानी यादों के साये आज भी,

वो दिलकश गीत गाया करते हैं

 

एक था बचपन प्यारा सा बचपन

क्या मस्ती भरे दिन थे, लिए ढेरों अपनापन…

 

वो भी क्या दिन थे, मासूम यादगार पल

आज भी इक मुस्कान ले आते हैं

दिल के इस वीरान गुलशन में

यादों के ताज़े फूल खिल जाते हैं

 

एक था बचपन, प्यारा सा बचपन

क्या मस्ती भरे दिन थे लिए कितना अपनापन

☆

~ प्रवीन रघुवंशी ‘आफताब’

© कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

पुणे

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – माप ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – माप ? ?

सिमट कर राख

रह गई है मुट्ठी भर,

यह वही आदमी है,

माप की परिधि से

बड़ा समझता रहा,

जो ख़ुद को जीवन भर..!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ मार्गशीर्ष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी। 🕉️💥

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≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ३६ – कविता – हमारे राम ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ३६ ☆

☆ कविता ☆ ~ हमारे राम ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

☆

हें राम ! आपके जीवन ने,

जीने का अर्थ बताया है़।

जीवन कैसे जिया जाता,

ऐसे जी कर दिखलाया है़ ॥

*

वैराग, त्याग औऱ नित्य नियम

जीवन गाथा का पन्ना है़।

न जाने, हमने क्या पहना,

सच मे सच्चा यह गहना है़ ॥

*

वाणी की मृदुल, मधुरता का

सच अर्थ आप ने बतलाया।

वन गमन सहज स्वीकार किया,

ऐसा साहस कर दिखलाया ॥

*

कुलगुरु को पिता तुल्य जाना,

सेवक को भी सम्मान दिया।

केवट से चरण धुलाए जब,

दिल मे अपने स्थान दिया ॥

*

ऊँच नीच का भेद नही है़,

 राम आप की नजरों मे।

मतंग शिष्य सब दंग हुऐ,

जब पहुचे शबरी के आश्रम मे ॥

*

हनुमान राम के नेह मिलन ने

नई कहानी लिख डाली।

जन औऱ वन जीवन निकट हुऐ

मित्रता अनोखी रच डाली ॥

*

सागर की लहरें शान्त हुईं,

जब राघव का सानिध्य मिला।

मद, अहंकार सब लोप हुऐ,

ज्ञान अनोखा दिव्य मिला ॥

*

मद औऱ नम्रता खूब लड़े,

सच औऱ झूठ जब टकराये।

चकराया माथा, कपिदल का

जब रावण के निकट राम आये ॥

*

संघार पूर्व सम्मान दिया,

क्योकि वह राजा ज्ञानी था।

वध किया राम ने पापों का,

क्योकि वह अति अभिमानी था ॥

*

राघव- रावन का युद्ध नही,

अधर्म, धर्म से हारा था।

इस महा युद्ध का सच जानो,

सत ने असत्य को मारा था ॥

*

लंका से चलने के पहले,

अपनी सच्चाई दिखलाई थी।

विभीषण को जब लंका सौपा, तॊ

यह सबसे बड़ी विदाई दी ॥

*

राम अयोध्या मे आये

तब रामराज अवध आया।

राजधर्म का गूढ़ अर्थ,

मर्यादा पुरुषोत्तम ने बतलाया ॥

♥♥♥♥

#कैसे_हैं_मेरे_राम

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # १८८ ☆ गीत – ।। मधुर वाणी जीवन में एक वरदान होती है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # १८८ ☆

☆ गीत ।। मधुर वाणी जीवन में एक वरदान होती है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

☆

मधुर वाणी जीवन में एक वरदान होती है।

बोली में मिठास वालों की अलग पहचान होती है।।

****

लोग याद रखते हैं किसी को स्वभाव के कारण।

मनुष्य की पहचान बनती मन के भाव अवधारण।।

शारीरिक भाषा भी छोड़ती अपनी छाप अलग से।

मधुर वाणी जीवन में एक वरदान होती है।।

****

शब्दों का भी अपना एक अलग ही स्वाद होता है।

कटु वचनों का परिणाम  तो करना बर्बाद होता है।।

बोलो अच्छा ही आप कि शब्दों में भी जान होती है।

मधुर वाणी जीवन में एक वरदान होती है।।

***

हमारे श्वास लेने से ही  हमारा शरीर पलता है।

और हमारे विश्वास से हमारा हर संबंध चलता है।।

मधुर वाणी से ही विश्वास की डोर चलायमान होती है।

मधुर वाणी जीवन में एक वरदान होती है।।

☆

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # १५ – कविता – माँ… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “तो जानें…“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # १५ ?

? कविता – माँ… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=१=

जग का असल हसीं

अफ़साना माँ ही है,

दुनिया का अनमोल

ख़जाना माँ ही है।

सुर लय ताल तरन्नुम

सरगम साज़ है माँ,

जग का सबसे मधुर

तराना माँ ही है।।

=२=

ख़ुशी फ़तह कर ग़म को

हराना माँ ही है,

लफ़्ज़ जिसपे ज़हाँ

दीवाना माँ ही है।

जिसकी दुआ से

क़ामयाबी क़दम चूमे,

कर ज़िंदगी जो

शायराना माँ ही है।।

=३=

मक़सद जिसका सदा

हँसाना माँ ही है,

जिसके दम जीवन है

सुहाना माँ ही है।

जिसके आँचल तले

बिताये दिन स्वर्णिम,

गोदी में बचपन –

-बचकाना माँ ही है।।

=४=

परम पुनीत पाक़

आशियाना माँ ही है,

देव भी जिसको चाहे

पाना माँ ही है।

गंगा-सी पावन दुआएँ

हैं सिर पर

बौना जिससे हर

नज़राना माँ ही है।।

=५=

जग का सबसे मधुरिम

गाना माँ ही है,

जग-दुनिया-संसार

ज़माना माँ ही है।

शुभ-चिंतक हमदर्द

नहीं माँ सा कोई,

‘ राजेश ‘ निश्छल

☆

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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