हिन्दी साहित्य – कविता ☆ गीत  – इंसान और इंसानियत ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ गीत  – इंसान और इंसानियत ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

☆

गिर रही है रोज़ ही,क़ीमत यहाँ इंसान की

बढ़ रही है रोज़ ही,आफ़त यहाँ इंसान की

* 

न सत्य है,न नीति है,

बस झूठ का बाज़ार है

न रीति है,न प्रीति है,

बस मौत का व्यापार है

श्मशान में भी लूट है,दुर्गति यहाँ इंसान की।

गिर रही है रोज़ ही,क़ीमत यहाँ इंसान की।।

 *

बिक रहीं नकली दवाएँ,

ऑक्सीजन रो रही

इंसानियत कलपे यहाँ,

करुणा मनुज की सो रही

ज़िन्दगी दुख-दर्द में,शामत यहाँ इंसान की।

गिर रही है रोज़ ही,क़ीमत यहाँ इंसान की।।

 *

 लाश के ठेके यहाँ हैं,

मँहगा है अब तो कफ़न

चार काँधे भी नहीं हैं,

रिश्ते-नाते हैं दफ़न

साँस है व्यापार में पीड़ित यहाँ इंसान की।

गिर रही है रोज़ ही,क़ीमत यहाँ इंसान की।।

 *

एक इंसाँ दूसरे का,

 चूसता अब ख़ून है

भावनाएँ बिक रही हैं,

हर तरफ तो सून है

बच सकेगी कैसे अब,इज्जत यहाँ इंसान की।

गिर रही है रोज़ ही क़ीमत यहाँ इंसान की।।

☆

© प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय जगन्नाथ मुन्नालाल चौधरी महिला महाविद्यालय,मंडला,म प्र – 481661

(मो.9425484382)

ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ३४ – कविता – हमारे बाबूजी ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ३४ ☆

☆ कविता ☆ ~ हमारे बाबूजी ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

☆

बाबूजी आपकी यादों का, एक सुन्दर सा महल  बनाता हूँ l

कविता, लिखता, कविता पढ़ता , कविता में इसे सजाता हूँll

*

माना माँ का स्थान बड़ा,               माँ जन्माती, दुलराती है l

गा गा कर लोरी सुना सुना,          थपकी दे हमें सुलाती है ll

*

एक बात ह्रदय से कहता हुँ, तेरा बेटा हूँ, यह कह इतराता हूँl

बाबूजी आपकी यादों का, एक सुन्दर सा महल  बनाता हूँ ll

*

आँखों में प्यार उमड़ता है,          ममता हॅसती इतराती है l

मेरी हर हरकत सह करके,     माँ मुझ पर प्यार लुटाती है ll

*

गोदी माँ की फूलों सी है,       पर अंगुली पिता की धरता हूँ l

बाबूजी आपकी यादों का, एक सुन्दर सा महल  बनाता हूँ ll

*

इस तारे को सूर्य बनाने में,     जीवन को खपा दिया तुमने l

हे पिता पसीना बहा बहा,      एक सागर बना दिया तुमने ll

*

तेरे  इस बड़े समुन्दर में,       जीवन जलयान चलाता हूँ l

बाबूजी आपकी यादों का, एक सुन्दर सा महल  बनाता हूँ ll

*

है याद मुझे वह सुन्दर पल,   उस भाप के  इंजन की गाडी l

हर प्रश्नों का उत्तर पूछूँ, तुझको सहलाकर, खुजलाकर दाढ़ी ll

*

मेरे हर प्रश्नों के उत्तर थे,        इसके संग धाक जमाता हूँ l

बाबूजी आपकी यादों का, एक सुन्दर सा महल  बनाता हूँ ll

*

मेरे भविष्य की चिंता को,           तेरा ललाट बतलाता था l

हर ख़ुशी और गम का खांका,    तेरे माथे खींच जाता था ll

*

अपनी इस सुघर हवेली का,      तुमको आधार बताता हूँ l

बाबूजी आपकी यादों का, एक सुन्दर सा महल  बनाता हूँ ll

*

तुम देव लोक को चले गए, एक भव्य लोक को बना दिया l

 क्यारी में जल दे दे करके,    फूल अनोखा खिला दिया ll

*

सच पिता बड़ी छतरी होता,    जिसके नीचे छिप जाता हूँ l

बाबूजी आपकी यादों का, एक सुन्दर सा महल  बनाता हूँ ll

*

सम्मान पिता का करता जो,  सम्मान जगत में पाता है l

आदर्श पुत्र कहलाता है,    वह सबके दिल को भाता  है ll

*

अपनी इस छोटी रचना का,    इसे सार तत्व बतलाता हूँ l

बाबूजी आपकी यादों का, एक सुन्दर सा महल बनाता हूँ ll

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – जिजीविषा ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – जिजीविषा ? ?

दायित्व की

साँकलों में बाँधकर,

स्थितियों के कुंदों और

बटों से वे मारते रहे,

विवशता के

दरवाज़े की ओट में,

असहमति के

जूतों से कुचलते रहे,

जाने क्या है

बार-बार उठ खड़ी हुई,

मेरी जिजीविषा

हर बार स्त्री सिद्ध हुई!

?

© संजय भारद्वाज  

सोमवार दि. 30 .05 .2016, संध्या  7:15  बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ निःशेष…! ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆  कविता ☆ निःशेष…! ☆

(स्मृतिशेष पिताश्री के देहावसान पर उनको समर्पित)

हे! ईश्वर!

इतनी बड़ी सजा?

मेरे परिजनों का प्रयास तो था कि –

सांस चलती रहे।

मौत की घड़ी टलती रहे।

 

कुछ समझ पाता

या कि

कुछ संभल पाता

इसके पूर्व

मेरी समस्त इन्द्रियां

जकड़ दी गईं।

समस्त नसें भेद दी गईं।

श्वसन तंत्र भी

और तो और

मेरी आवाज भी।

 

हे प्रभु!

कम से कम

आवाज तो छोड़ देते।

मैं

पड़ा रहा

कितना असहाय।

 

देख सकता हूँ

अश्रुपूर्ण नेत्र

परिजनों के

अपने चारों ओर।

साथ ही

अपनी ओर आते

मौत के कदम

चुपचाप।

 

सारी उम्र

कभी चुप न रहने वाले

मुख को जड़वत कर दिया।

श्वसन तंत्र को

मशीनी सांसों से (वेन्टिलेटर)

भर दिया।

 

लगता है कि अब

कुछ भी नहीं है मेरा

मशीनों-दवाओं का

कब्जा है मुझपर।

 

ये साँसे भी मेरी नहीं हैं।

किन्तु,

मेरे विचार

सिर्फ मेरे हैं

जीवन-मृत्यु की लडाई

से भी परे हैं।

मैं

देख सकता हूँ

अपना अतीत

किन्तु,

मेरी घड़ी की सुई

नहीं बढ पा रही है

वर्तमान से आगे।

एक

पूर्णविराम की तरह।

 

यह शाश्वत सत्य ही है

किसी को समझने के लिये

पूरा जीवन लग जाता है

और

स्वयं को समझने के लिये

कई जीवन भी कम हैं।

 

चेष्टा करता हूँ ।

अतीत में झाँकने की

एक अबोध बालक

कन्धों पर बस्ता लिये

चल पड़ता है

नंगे पांव

गांव-गांव

शहर-शहर

और

पहुंचा देता है

अपने अंश विदेशों  तक।

 

इस दौड़ का

कोई नहीं है अन्त

सब कुछ है अनन्त।

 

शायद!

इस वट वृक्ष की

जड़ें गहरी हैं

टहनियाँ-पत्तियाँ

भी हरी-भरी हैं।

 

शायद!

गाहे-बगाहे

जाने-अनजाने

कभी कुछ कम

कभी कुछ ज्यादा

बोल दिया हो।

कभी कुछ भला

कभी कुछ बुरा

बोल दिया हो।

तो

जीवन का हिसाब समझ

भूल-चूक

लेनी-देनी समझ

माफ कर देना

मन-मस्तिष्क से सब कुछ

साफ कर देना।

 

क्योंकि,

मैं नहीं जानता कि

क्या है?

शून्य के आगे

और

शून्य के पीछे।

 

क्षमता भी नहीं रही

कुछ जानने की।

क्षीण होता शरीर

क्षीण होती साँसे

बस

एक ही गम है

साँस आस से कम है

और

मेरे ही बोल

मेरे लिये अनमोल है।

6 दिसम्बर 2010

©  हेमन्त बावनकर  

पुणे

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # १८६ ☆ ग़ज़ल ।। शख्स नहीं कि शख्सियत बन कर जिए आदमी ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # १८६ ☆

☆ ग़ज़ल ।। शख्स नहीं कि शख्सियत बन कर जिए आदमी ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

।। काफिया – दार ।। रदीफ – होना चाहिए।।

=1=

आदमी को    साहिबे   किरदार होना चाहिए।

जिंदगी में आदमी को जिम्मेदार होना चाहिए।।

=2=

जिंदगी कुछ ऐसा बन कर ही  जिए आदमी।

हर मुकाम जिंदगी का यादगार होना चाहिए।।

=3=

बात जब भी   किसी    निशाने   की आए तो।

निशाना तो बस अचूक कारगार ही होना चाहिए।।

=4=

शख्स नहीं कि शख्सियत बन कर जिए आदमी।

कुछ और न हो बस आदमी खुद्दार होना चाहिए।।

=5=

ऊपरवाले का एक नायाब तोहफा है यह जिंदगी।

इसलिए जिंदगी से बस   वफादार होना चाहिए।।

=6=

हजारों सुख-दुःख के रंग मिलते हैं एक उमर में।

हर बात का हीआदमी को कद्रदार होना चाहिए।।

=7=

स्याह सफेद हर रंग जरूरी है जिंदगी के लिए।

बस आदमी को जरूर जवाबदार होना चाहिए।।

=8=

कदम कदम पर मिल रहा है दुनिया में धोखा।

हर आदमी को आज बस खबरदार होना चाहिए।।

=9=

हंस जरूरी हो गया है   आज इस जमाने में।

हर हालात में आदमी नहीं दागदार होना चाहिए।।

☆

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२५० ☆ कविता – मनुज-मन भावों का एक अनुपम खजाना है… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – मनुज-मन भावों का एक अनुपम खजाना है…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २५० ☆

☆ मनुज-मन भावों का एक अनुपम खजाना है…  ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

☆

मनुज भावों कर एक अनुपम खजाना है.

दुर्विचारों से सदा जिसको बचाना है

 *

सुख-दुखों का स्रोत मन के भाव ही तो हैं-

जिसे सद्‌भावों से हर दिन खुद सजाना है।

 *

मन अगर है शांत, संतोषी तो नित सुख है

अगर मैला है तो मैला हर ठिकाना है।

 *

झलक मन ही उसके सब व्यवहार देते हैं

कठिन होता मनोभावों को छुपाना है।

 *

प्रेम-पागे भाव सबको सदा भाते हैं।

भले भावों का प्रशंसक यह जमाना है।

 *

प्रिय कल्पना शुभ भावना ही नित सहेली हैं

दोनों का रिश्ता सतत सदियों पुराना है। ४॥

☆

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – लबादा ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – लबादा ? ?

(कविता-संग्रह ‘यों ही’ से)

लबादे ओढ़े हुए

लोगों का झुण्ड,

लबादों पर दर्पण चिपकाए,

मेरे शहर तक आ पहुँचा है,

मैं ज़मीन पर उतर आया हूँ,

शामिल हो गया हूँ

उस झुण्ड में,

दर्पण वाला लबादा ओढ़कर।

 

झुण्ड, अब

कंदराओं की ओर बढ़ चला है।

  

कंदरा में छिपा बौना आदमी

भाग रहा है दर्पण की चमक से,

पीछा छुड़ा रहा है चमक से जनते अक्स से,

……बेतहाशा भाग रहा है।

 

झुण्ड का कोलाहल बढ़ रहा है,

बौना आदमी हाँफने लगा है,

थक गया है,

ख़ुद ही लौट रहा है

दर्पण वाले लबादों की ओर।

 

झुण्ड,

अब वापसी की यात्रा पर है,

दर्पण की यहाँ-वहाँ

चमकती किरणों से

चौंधिया रही है कंदरा ।

 

मैं,

अचकचा कर जाग उठता हूँ,

पर्दे से छनकर आती

रोशनी देखता हूँऔर सोचता हूँ-

मुझे कंदरा से

यहाँ तक कौन लाया?

?

© संजय भारद्वाज  

सोमवार दि. 30 .05 .2016, संध्या  7:15  बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

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अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #७३ – नवगीत – गूँज रहीं बूँदों की सरगम… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – गूँज रहीं बूँदों की सरगम…।

? रचना संसार # ७३ – गीत – गूँज रहीं बूँदों की सरगम…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

☆

गूँज रहीं बूँदों की सरगम,

पावन हिय गलियारों में।

चलो सखी झूला झूलें हम,

शीतल सी बौछारों में।।

*

छोड़ घोंसलें भीगे-भीगे,

पंछी आए आँगन में।

नहीं मिला दाना चुगने को,

अब के देखो सावन में।।

चल झरनों से बात करें हम,

झम-झम करें फुहारों में।

गूँज रहीं बूँदों की सरगम,

पावन हिय गलियारों में।।

*

धरती मिलने चली गगन से,

नयनों में काजल डाले।

आलिंगन को व्याकुल सरिता,

प्रीति समंदर-सी पाले।।

सुधि-बुधि खो कलिकाएँ बैठी,

भ्रमरों की गुंजारों में।

गूँज रहीं बूँदों की सरगम,

पावन हिय गलियारों में।।

*

मादक अधर मिलन को व्याकुल,

मोहे पुरवाई प्यारी।

सुलगे देह प्रीति में साजन,

काम -बाण से मैं हारी।।

यौवन प्रेम मगन हो नाचे,

चाहत की झंकारों में।

गूँज रहीं बूँदों की सरगम,

पावन हिय गलियारों में।।

☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३०२ ☆ भावना के दोहे – मौसम ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – मौसम।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३०२ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – मौसम ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

मौसम बदला आज कुछ, धुंध हुई कुछ साफ।

ठंडी -ठंडी चली हवा, हमने ओढ़ लिहाफ।।

 *

सूरज डूबा देख लो, मोहक होती शाम।

रजनी का आमंत्रण है, सपनों में मुलाकात।।

 *

चादर तम की भीतरी, चाँद झाँकता आज।

कितनी सुंदर चाँदनी, बज उठे हैं साज।।

 *

सूरज कंबल ओढ़ता, उसे लगी है ठंड।

चादर कुहरे की बढ़ी, मिला सभी को दंड।।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२८३ ☆ संतोष के दोहे – (तुलसी माँ की कथा) ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपके – संतोष के दोहे… । आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २८३ ☆

☆ संतोष के दोहे… ☆ श्री संतोष नेमा ☆

(तुलसी माँ की कथा) 

☆

तुलसी माँ पिछले जनम, थीं वृंदा का रूप |

ईश विष्णु की भक्ति में, खूब गईं थीं डूब |

जालंधर से जब हुआ, वृंदा का सुविवाह  |

वृंदा पत्नी धर्म का, पूर्ण किया निर्वाह ||

देव-असुर  में जब हुआ, बहुत बड़ा संग्राम |

जालंधर भारी पड़ा, मचा खूब कुहराम ||

वृंदा ने तब ही किया, पूजन वंदन ध्यान |

वृंदा पुण्य प्रताप से, हारे देव महान ||

जगदीश्वर से देवता, करने लगे गुहार |

हमें सुरक्षित कीजिये, जालंधर संहार ||

वृंदा जैसी भक्त से, छल पर करें विचार|

कहें विष्णु इस युद्ध में, विजय मिले या हार ||

देव सभी करने लगे, विनती बारम्बार |

विष्णु जी ने तब लिया, जालन्धर आकार ||

पहुँचे वृंदा महल में, धर जालंधर रूप |

पूजा से वृंदा उठीं, इच्छा हुई विरूप  ||

जब वृंदा ने पग छुए, रूठे सब सत्कर्म |

जालन्धर की मृत्यु का, वृंदा समझीं मर्म ||

वृंदा ने जब क्रोध में, दिया विष्णु को श्राप |

बन जाओ पाषाण तुम, हुईं सती चुपचाप ||

उद्भव पावन स्थान पर, तुलसी पादप आप |

बोल उठे यह देख कर, क्षमा करें सब पाप ||

वृंदा के सुसतीत्व को, दिया बहुत सम्मान |

पूजन मेरे संग हो, सदा मिलेगा मान ||

सतवंती की शक्ति से, चकित स्वयं भगवान |

नारी की महिमा बड़ी, उसका हो सम्मान ||

तुलसी शालिग्राम का, करिए साथ विवाह |

एकादश तिथि में मिले, देवाशीष अथाह ||

आँगन तुलसी राखिये, बिन तुलसी घर सून |

रहता मन “संतोष” तब, खुशियाँ होतीं दून ||

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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