हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३०५ ☆ कविता – सर चढ़कर अब गर्मी बोले … ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक  विचारणीय कविता  – सर चढ़कर अब गर्मी बोले  आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३०५ ☆

कविता – सर चढ़कर अब गर्मी बोले ☆ श्री संतोष नेमा ☆

सर चढ़कर अब गर्मी बोले |

सबकी सहनशीलता तोले ||

आँख तरेर दिवाकर कहता |

अब झेलिए आग के गोले ||

*

युद्ध छिड़ा खाड़ी में भीषण|

संकट में है जन साधारण||

जिसकी लम्बी नाक यहाँ पर |

बढ़ चढ़कर कर रहा आक्रमण ||

बढ़ती खूब युद्ध की गर्मी |

बरस  रहे  बारूदी शोले |

सर चढ़कर अब गर्मी बोले ||

*

व्याकुल सब इंसान यहाँ हैं |

पशु पक्षी हैरान जहाँ हैं ||

किसे खबर है यहाँ जीव की |

शांति दूत अब बुद्ध कहाँ है |

कोई करता बात शांति की |

कोई बातों से विष घोले||

सर चढ़कर अब गर्मी बोले ||

*

लगते सभी खून के प्यासे |

सर्वनाश के  घिरे  कुहासे ||

धधक रही बदले की ज्वाला |

नेता  देते  झूठ  दिलासे ||

रंग  बदलते जैसे गिरगिट |

चंचल मन  जैसे है डोले ||

सर चढ़कर अब गर्मी बोले ||

*

आँखों में अब नीर कहाँ है |

सबके मन अब धीर कहाँ है ||

टूट रहा विश्वास सभी का |

अब पहले से वीर कहाँ हैं ||

लादी  जैसे  अब  बेशर्मी |

कहता समय बनो मत भोले ||

सर चढ़कर अब गर्मी बोले ||

*

युद्ध तेल को ताप रहा है |

असंतोष अब व्याप रहा है ||

मानव घातक शस्त्र बन रहा |

विकट तबाही  नाप रहा है ||

युद्धों  में  संतोष  खोजता |

दृश्य देख लगता है रो ले ||

सर चढ़कर अब गर्मी बोले ||

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # ११ ☆ मंजिरी की कुण्डलियाँ – सन्देश ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है  मंजिरी की कुण्डलियाँ ।)

 

☆ मंजिरी साहित्य # ११ ☆

? कविता – मंजिरी की कुण्डलियाँ – सन्देश ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

-1-

द्वारे मेरे प्रभु चलो,  क्यों करते अवलम्ब l

राह आपकी मैं तकूँ,  कर में लिये प्रलम्ब ll

कर में लिये प्रलम्ब,  भरत आये अब मिलने l

राज पाट सब छोड़,  मना कर लाऊं धर में ll

ले कर ये सन्देश, कहें चल संग हमारे l

सभी तके हैं राह,  चलो प्रभु अब तो द्वारे ll

-2-

गाते गाथा वह चला,  माधव का संदेश l

आया जब उद्धव लिये,  बृज में किया प्रवेश ll

बृज में किया प्रवेश,  देख ही झपटे सारे l

क्या कहता है कृष्ण,  बात करते हैं न्यारे ll

समझा उद्धव आज,  प्रेम की सारी बातें l

नमन हुआ हैं माथ,  चला वह गाथा गाते ll

-3-

आता जन को तब समझ,  करता पल जब चूर l

तूफानों में सब बड़े,  हो जाते हैं दूर ll

हो जाते हैं दूर,  सभी ने हैं यह माना l

समय दिया संदेश,  भूल मत मुझको जाना ll

बोले पैसा आज,  दम्भ सर पर चढ़ जाता l

हो जाता कंगाल,  समझ तब जन को आता ll

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # २४ – कविता – एक सफर बीज का… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता एक सफर बीज का…।)

☆ शशि साहित्य # २४ ☆

? कविता – एक सफर बीज का… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

हर बीज का नसीब नहीं होता वृक्ष हो जाना,

जाने कितनी अग्नि परीक्षा से गुजर कर अंकुरित हो पाना…

कहीं नर्म मुलायम मिट्टी की गोद नहीं मिलती,

कहीं जल भरे मेघों की बूंदे नहीं गिरती…

कभी जलाती तपन, बन जाती है कफन,

कभी बाढ़ में ठहरने को जमीं नहीं मिलती…

जीवन शुरू होने से पहले, सपने हो जाते हैं दफन,

बड़े वृक्षों से पनपने की इज़ाजत नहीं मिलती,

पैरों तले कुचल जाते हैं, कुछ नन्हे अंकुरण,

बेपरवाह परिस्थिति से, चंद सांसे नहीं मिलती…

फिर भी !!!! जो दम रखते हैं, हर मुश्किल का करने सामना…

वो खिल उठते हैं चीरकर, पत्थरों का भी सीना…

अथाह समर्पण और शक्ति का है यह मामला,

आसान नहीं है विपरीत परिस्थितियों को सहयोगी बना लेना…

ईश्वर की कृपा से ही पर्वत पर हरियाने की किस्मत है मिलती,

ना हो यह तो हरियाली में भी एक पत्ती नहीं खिलती…

तय करना पड़ती है तमाम मुश्किलें राहों की,

वरना हर बीज को, पुनः बीज बनाने की क्षमता नहीं मिलती…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १४५ ☆ कितना शेष है चलना ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “कितना शेष है चलना” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १४५ ☆

☆  कितना शेष है चलना ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

फिर समय ने हाँक दी

गाड़ी उमर की

और कितना शेष है चलना।

 

बोझ दिन का उठाए

हम रात भर जागे

स्वप्न आँखों में लिए

बुनते रहे धागे

भोर ने फिर खोल दी

खिड़की ख़बर की

साँझ तक बस स्वयं को छलना।

 

यादें सब ठहर गईं

आइनों के दर पर

प्रतिबिंबित होता है

चेहरों वाला घर

छतों के झरोखे से

झाँकते शहर की

खुली हुई हर किताब पढ़ना।

 

रोशनी के पृष्ठ पर

अंधकार व्याप्त

सुलगते हैं हाशिए

संभावना समाप्त

बाँच रही हैं रातें

इबारत सफर की

सूरज का भी तय है ढलना।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (७) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (७) ? ?

कोलाहल

निपट पहली

संख्या हो

या असंख्येय

हो चुका हो,

कोलाहल

संख्यारेखा के

बाएँ हो या दायें हो,

हर बार

हर समय

कोलाहल की

परिणति

चुप्पी ही होती है,

चुप्पी शाश्वत है

शेष सब नश्वर!

?

© संजय भारद्वाज  

(2.9.2018,  प्रातः 6:59 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १५२ ☆ सभी हसीन गलत है वफ़ा नहीं करते… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “सभी हसीन गलत है वफ़ा नहीं करते “)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५२ ☆

✍ सभी हसीन गलत है वफ़ा नहीं करते… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

ज़ुबाँ से अपनी जो भी तुम कहा नहीं  करते

तुम्हारे चश्म बयाँ सब वो क्या नहीं करते

 *

कभी वो अपनी न मंज़िल को पा सके यारो

जो अपने पैरों पै इंसाँ चला नहीं करते

 *

नज़र से सिर्फ हिक़ारत की देखते हो सभी

वहाँ बुलावा हो लेकिन  रुका नहीं करते

 *

है जिनका अज़्म मुक़म्मल पहुँचते मंज़िल पर

सफ़र तबील हो फिर भी थका नहीं करते

 *

अना में उसकी व मेरी रहेगा क्या अंतर

भले किया वो दगा पर दगा नहीं करते

 *

यक़ीन आप परख देख कर किया कीजे

घुने जो बीज है बो लो उगा नहीं करते

 *

है बेवफा वो तो तुहमत न आम कर दीजे

सभी हसीन गलत है वफ़ा नहीं करते

 *

बुझाने आग को तकलीफ जो उठा  न सको

अरुण है काफी जो उस पर हवा नहीं करते

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “फिर एक बार उसके शहर में” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – फिर एक बार उसके शहर में… ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

बहुत दिन बाद आया हूँ

उसके शहर में

उन्हीं गलियों और झरोखों को

धुंधली नज़रों से ताकता

किसी बुज़ुर्गाना चेहरे में

ढूढ़ता हूँ शक्ल तेरी

हां, शायद यही घर तो था

स्मृतियों पर ज़ोर डालते

गुज़र रहा था वहां से

तभी एक पुकार- सी पीछे से सुनाई दी

ठिठक गया, सुनिश्चित करने लगा कि

यह वहम था या हक़ीक़त

फिर अनमना-सा चल पड़ा

और चलता गया बहुत दूर

शहर के बाहर तक

वहाँ तक, जहाँ हर कोई बिछड़ा मिल ही जाता है

लेकिन सब़्ज़ घास के नर्म बिस्तर में सोता हुआ

चिरकालीन मौन धारण किये हुए …!!!!!

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्कबिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
3

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ५६ – इन दिनों.… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – इन दिनों.।)

☆ हेमंत साहित्य # ५६ ☆

✍ इन दिनों.… ☆ श्री हेमंत तारे  

बड़ी तपिश है यार

इन दिनों.

साफ़ आसमाँ,

चिलके मारती धूप

और मानो,

क़फ़स में कैद हो हवा,

इन दिनों.

आज,

वो, सूखे कण्ठ लगा रही थी गुहार,

मांग रही थी पानी

क्योंकि

रिता रह गया था,

गलियारे में रखा सकोरा

जो भर देता था लबालब

मैं, हर रोज

इन दिनों.

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६५ ☆श्री कृष्ण भजन … ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम  – “श्री कृष्ण भजन “।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६५ ☆

✍ श्री कृष्ण भजन .. ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

राधे राधे बोल, मनवा राधे राधे बोल,

कृष्ण नाम की महिमा सबसे है अनमोल।

*

श्याम तेरी बंसी की मीठी ये तान है,

सुनके इसे झूमे सारा जहान है।

राधा के मनमोहन, मुरलीधर घनश्याम,

तेरे चरणों में ही मेरा सम्मान है॥

*

राधे-राधे बोल, मनवा राधे-राधे बोल,

कृष्ण नाम की महिमा सबसे है अनमोल॥

**

यमुना किनारे तूने रास रचाया,

गोपियों के संग प्रेम दीप जलाया।

माखन चुराकर हर लिया सबका मन,

भक्तों के जीवन को दिया खुशियों से भर ।।

*

राधे-राधे बोल, मनवा राधे-राधे बोल,

कृष्ण नाम की महिमा सबसे है अनमोल॥

**

गीता का ज्ञान दिया अर्जुन को रण में,

सत्य की राह दिखाई जीवन के क्षण में।

दीनों के सहारे, दुखियों के रखवाले,

तेरे बिना सूने सब मंदिर और शिवाले॥

*

राधे-राधे बोल, मनवा राधे-राधे बोल,

कृष्ण नाम की महिमा सबसे है अनमोल॥

**

मेरे भी जीवन में आओ नंदलाला,

भक्ति से भर दो ये मन की मधुशाला।

तेरी कृपा से ही हर काम बनेगा,

नाम तेरा लेते ही जीवन सँवरेगा॥

*

जय-जय श्री राधे, जय-जय श्री श्याम,

भक्तों के हृदय में बसते आठों याम॥

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १४९ – बुन्देली कविता – ”जैसी करनी, जौन करत है” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – जैसी करनी, जौन करत है।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १४९ ☆

☆  बुन्देली कविता – जैसी करनी, जौन करत है ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

जैसी करनी, जौन करत है

बैसइ भरनी बोइ भरत है

कब सें कइ ती दुरबा तक ले

अब लौ बैठो इतइ मरत है

 *

बच्चों खें दो जून खबाउत

जब दिन भर जाँगर पेरत है

 *

अंड-गंड नइयाँ खाबे कौ

इतनो भर लव, अब उछरत है

 *

मरो जात डुकरा ब्यारी खें

दिन को खाओ नोइ पचत है

 *

कौनउँ पहुना आ जाउत जब

बरा – भात उर दार बनत है

 *

केरा खें कितनउ सींचो तुम

भगवतकाटो तबइ फरत है

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares