हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “चुभती स्मृतियों का रोमांच” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – चुभती स्मृतियों का रोमांच… ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

किताब में “उसकी” तस्वीर

यक़ीनन कोई बुक मार्कर नहीं थी

महफूज़ थी गर्द ओ ग़ुबार से

यादों में पैवस्ता एक दस्तावेज की तरह

उसे देखने की लालसा में

वह किताब जिसमें तस्वीर रखी थी

कभी बुक शेल्फ के पुस्तक संग्रह में

नहीं सजती थी

अक्सर रीडिंग टेबल पर या

बिछौने के सिरहाने रखी रहती थी

जानबूझकर, न चाहते हुए भी

मैं उस किताब को पढ़ने का उपक्रम करता था

और अतीत के घावों को खुद कुरेद कर

हरे और ताज़े कर लेता था

कई बार मन में आया कि,फाड़कर फेंक दूं

लेकिन सचमुच लगा कि

यह आसां तो नहीं था और सहेजा था ऐसा कुछ

तो यह उतना व्यर्थ का प्रयोजन नहीं था

सुना था कि…

चुभती चीज़ें भी, जिस्म ओ जां को राहत देकर

ज़िंदगी में बहुत से मर्ज़ ठीक करने की विधा हैं

सो वह यादगार आज भी वैसी ही रखी है…!!!!!

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्कबिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ गुरुवर का शुक्रिया ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ गुरुवर का शुक्रिया ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

तुमने दिया विवेक तो, हुआ सत्य  का भान।

करूँ शुक्रिया आपका, गुरुवर ऐ भगवान।।

खिलता है जीवन तभी, जब गुरुवर हैं संग। 

करूँ शुक्रिया ज़िन्दगी, गुरु से जो नवरंग।।

 *

 यदि गुरुवर हैं संग तो, मैं नित ही बलवान।

करूँ शुक्रिया तात हे!, है जीना आसान।।

 *

नहीं ज्ञान बिन चेतना, जीवन जाता हार।

प्रभुवर करता शुक्रिया, पाया मैं उजियार।।

 *

गुरु देते संस्कार नित, कर देते निर्माण।

सदा शुक्रिया ज्ञान का, जिससे रक्षित प्राण।।

 *

हर दुर्गुण को दूर कर, गुरुवर लाते शान।

करूँ शुक्रिया सूर्य का, मिलती जिससे आन।।

 *

गुरुवर का नित शुक्रिया, जिनका पावन काम।

जिनको समझो शिष्य तुम, पूरे चारों धाम।।

 *

गुरुजी की महिमा बहुत, करो शुक्रिया खूब।

जो देते हैं ज्ञान को, गहराई में डूब।।

 

© प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # ३०३ ☆ शिशु कविता – चूहे राजा चले बाजार… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३०३ ☆ 

☆ शिशु कविता – चूहे राजा चले बाजार ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

चूहे राजा चले बाजार।

साइकिल पर वह हुए सवार।

थैला लिया साथ में अपना।

बाएँ ओर सड़क के चलना।

थैले में सामान को लाएँ।

पॉलीथिन को नहीं अपनाएँ।

कभी प्रदूषण नहीं बढ़ाएं।

 धरती माँ को स्वर्ग बनाएँ।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १५२ ☆ सुलगती रात ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “सुलगती रात” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १५२ ☆

सुलगती रात ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

धुआँ उठा है

कहीं रात सुलगी होगी।

 

तस्वीरों में

ओढ़े बैठे

कुछ नक़ली असली चेहरे

अभिव्यक्ति की

आजादी पर

बिठा रहे हैं बस पहरे

कौन सगा है

किस पर मूठ दगी होगी।

 

धार नदी के

सँग-सँग बहना

क्या बस नियति हुई ऐसी

घबराहट में

मौन सुलगते

स्थितियाँ मूक बधिर जैसी

कहाँ उगा है

सूरज,रात ठगी होगी।

 

ठोकर खाना

खाकर गिरना

गिर-गिर कर चलना दस्तूर

लिए विरासत

काँधे लादे

पग-पग उम्र हुई मजबूर

कहीं दगा है

कहीं रार उमगी होगी।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (३०) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (३०)  ? ?

-कुछ कहो,

तुम्हारी चुप्पी

बरदाश्त नहीं होती,

मैंने कोरा काग़ज़

मोड़कर थमा दिया,

-पढ़ लो, सारा कुछ

इस पर लिख दिया है,

…ज़िंदगी भी

एक करवट ले चुकी,

उसका बाँचना

बदस्तूर जारी है,

सोचता हूँ

इतना ज़्यादा तो

नहीं लिखा था मैंने!

 

?

© संजय भारद्वाज   

(2.9.2018, 12:25 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️

💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७१ ☆ मेरे पापा मिले क्या? ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – “मेरे पापा मिले क्या?“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७१ ☆

✍ कविता – मेरे पापा मिले क्या? ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

मेरे पापा मिले क्या?

एक बेटी के ये शब्द

सबको आहत करते रहे ,

और आहत मन से ही

बचाव कार्य में जुटे

पुलिस कर्मी

एनडीआरएफ जवान

नम आंखों से

बचाव कार्य में लगे रहे।

मेरा भाई मिला

मेरे पति मिले

प्रश्नों के अंबार लगे

उत्तर किसी के न मिले।

परिजनों की भीगी आंखें

गिरे हुए कचरे के पहाड़ को

ताकती हैं

निरखती परखती हैं।

 

पूरे शहर के निवासी

कितना कचरा उत्पन्न करते हैं

कि उसका पहाड़ बन जाए,

और जब गिरे तो

तीन मंजिला भवन को ढहा जाए।

कचरे के ढेर में दबे लोगों के

प्राण कैसे, कितने तड़पे होंगे

शरीर से कैसे निकले होंगे

क्या कचरे से बाहर आये होंगे

या कचरे में विचरण करते होंगे।

 

कौन जाने ?

जिस कचरे में रह नहीं सकते

उसमें दबने पर क्या

तकलीफ़ हुई होगी

कौन जाने?

मोशी पिंपरी चिंचवड़ पुणे

इसके साक्षी हैं।

और परिजनों की नम  आँखें

व सिसकियाँ

साक्षी हैं।

पर बेटी का प्रश्न गूंजता रहेगा

मेरे पापा मिले क्या?

 

प्रश्न तो अंतस् में यह भी उठता है

कि इतना कचरा

क्यों और कहाँ से आता है

पहले भी लोग रहते थे

पर इतना कचरा नहीं होता था।

घर से कचरा बहुत कम निकले

यह सोचना होगा

बेटी के प्रश्न का उत्तर

देना होगा

और सबको मिलकर

देना होगा।

नहीं तो हर कान में गूँजता रहेगा

मेरे पापा मिले क्या?

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १५९ ☆ सारा कमाल इश्क़ का… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “सारा कमाल इश्क़ का“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५९ ☆

✍ सारा कमाल इश्क़ का… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

मौला करम किया वही क़ीमत बनी रहे

अज़दाद जो बनाये वो इज़्ज़त बनी रही

 *

सारा कमाल इश्क़ का तेरे किया हुआ

दरिया को मोड़ने की जो हिम्मत बनी रही

 *

रख्खी हर एक याद हिफाज़त से ज़ह्न में

अपने तमाम दोस्त से निस्बत बनी रही

 *

ये माँ की परवरिश का करिश्मा है देखिए

झूठों के बीच रहके सदाक़त बनी रही

 *

ग़ुरबत में हाथ में न जो फैलाया था कभी

मेरे ख़ुदा की मुझपे इनायत बनी रही

 *

अल्लाह ने दी नेक वो औलाद है मुझे

दस्तार मेरे सर की सलामत बनी रही

 *

इंसान बन मशीन गया दौरे- हाल में

घर को न वक़्त दे ये शिकायत बनी रही

 *

बचपन में जिसके साथ में खेले छुपा छुपी

ताउम्र उससे मिलने की चाहत बनी रही

 *

अहसास का न धागा कभी टूटने दिया

रिश्तों में वो हमारे थी लज्ज़त बनी रही

 *

मैंने अरुण हराम समझ घूस ली नहीं

इस दौर में भी घर मेरे बरक़त बनी रही

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ लोग छुपे रुस्तम हैं…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – लोग छुपे रुस्तम हैं…!

☆ ॥ कविता॥ लोग छुपे रुस्तम हैं…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

तिनके जिद को ठाने हैं,

खुद  को  खुदा  माने हैं।

*

शमाँ की लौ पर मंडराते,

मरने पर तुले परवाने हैं।

*

दुनिया में जितने इंसां हैं,

सबके  अपने फ़साने हैं।

*

बात-बात पर शत्रुन की,

विष  उगलती ज़ुबानें हैं।

*

शौक शहंशाहों के पाले,

खाने  को  नहीं  दाने हैं।

*

जिसको  हम घर समझे,

दर-अस्ल सरायखाने हैं।

*

लोग  बड़े छुपे रुस्तम हैं,

मन  के कई तहखाने हैं।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ६३ – बहेलिया… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – बहेलिया।)

☆ हेमंत साहित्य # ६३ ☆

✍ बहेलिया… ☆ श्री हेमंत तारे  

अभी, अभी

बांस के इसी झुरमुट में,

सुनी थी सरसराहट,

और

देखी थी कुछ गौरैया,

आपस में कर रही थी,

चुहलबाजी,अठखेलियाँ,

फुर्र हो गयी पलक झपकते,

शायद समझ बैठी मुझे

बहेलिया |

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २९३ – पद्मा का क्रंदन…२ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता –  पद्मा का क्रंदन।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २९३ ☆

☆ – पद्मा का क्रंदन ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

कब्रगाहों में सुरक्षित रखा जा रहा है

एक जिन्दा और भरा-पूरा देश ।

शीऽऽशी, आहिस्ता बोलो,

शोर करोगे तो

कब्रिस्तान में मंडरा रहे गिद्ध

पहिन लेंगे बगुलों के वस्त्र

और देने लगेंगे

अजान…

हे भगवान !

शबनमी इलाके में

शोले चहलकदमी कर रहे हैं।

भेड़ियों की पदचापों से

गुलाबों के खेत-दर-खेत

उजड़ रहे हैं।

बारूद की गद्दीनशीनी पर

कर दिया गया है

अगरुगंध को निष्कासित,

और आँसुओं में डूबे दिल

हो रहे हैं

जड़ यंत्र द्वारा शासित ।

आखिर क्या है

इस मुश्किल का हल,

क्या कोई भी उपाय

नहीं हो सकता सफल ?

तो आओ,

हम सहयोगी बनें

और करें इस साजिश को विफल,

मगर, यह तब होगा

जबकि हिमालय

हिमालय रहे

न हो पाये विन्ध्याचल

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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