हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४५ – कविता – तिरंगा… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “तो जानें…“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४५ ?

? कविता – तिरंगा… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

घर-घर तिरंगा

हर घर तिरंगा

गंगा जमुना तहज़ीब ,

 देश भक्ति की तरक़ीब

हिमाक़त न करे लेने कोई इण्डिया से पंगा ll

घर-घर…

 

सबका प्रयास हो,सबका विकास हो,

सबका विश्वास हो,न कोई निराश हो

अनुगूँज वन्दे मातरम बनाये भला-चंगा ll

घर-घर…

 

जन-गण मालामाल हो

जय भारत ख़ुशहाल हो

देश प्रेम ताल हो,हर कोई निहाल हो

ज्यों लहर निर्मल पावन हर गंगा ll

घर-घर…

 

मज़दूर या किसान हो, भारत का स्वाभिमान हो

तिरंगा निशान हो तुम आन बान शान हो

हरा श्वेत केसरिया से मन सबका रंगा

हर घर…

☆

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २१९ ☆ मुक्तक – ।। हमारी मातृ भाषा हिन्दी ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

☆ “श्री हंस” साहित्य # २१९ ☆

☆ मुक्तक ।। हमारी मातृ भाषा हिन्दी ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

☆

।। 1।।

हिन्दी में भरा  रस माधुर्य

कवित्व और   मल्हार है।

हिन्दी में  भाव और संवेदना

अभिव्यक्ति  भी  अपार है।।

हिन्दी में ज्ञान  और विज्ञान

दर्शन का अद्धभुत समावेश।

हिन्दी भारत का  विश्व को

कोई अनमोल  उपहार है।।

।। 2।।

बस एक हिन्दी दिवस नहीं

हर दिन हो हिन्दी का दिन।

विज्ञान की भाषा भी हिन्दी

ज्ञान तो है नहीं हिन्दी  बिन।।

मातृ भाषा , राज भाषा हिन्दी

है उच्च सम्मान की अधिकारी।

तभी राष्ट्र करेगा सच्ची उन्नति

कार्यभाषा हिंदी हो हर पलछिन।।

।। 3।।

मातृ भाषा का दमन नहीं

हमें करना  होगा  नमन।

पुरातन मूल्य  संस्कारों की

ओर करना  होगा  गमन।।

बनेगी तभी भारत  वाटिका

अनुपम अतुल्य  अद्धभुत।

जब देश में हर ओर बिखरा

होगा  हिन्दी  का चमन।।

।। 4।।

हिन्दी का सम्मान  ही तो

देश का गौरव गान  बनेगा।

मातृ भाषा के उच्च पद से

ही राष्ट्र का  मान बढेगा।।

हिन्दी तभी  बन  पायेगी

भारत मस्तक  की बिन्दी।

जब राष्ट्र भाषा का ये रंग

हर किसी मन पर  चढ़ेगा।।

☆

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # १११ – गीत – छलनी सूप… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – छलनी सूप…।

? रचना संसार # १११ ?

☆ गीत – छलनी सूप…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ☆

☆

नित्य नए

कानून बनाते

नए-नए ये भूप।

 

रोज दिखावा

जग में करते,

चलते नंगे पाँव।

मन में पाले

लौकिक छलना,

रहते भ्रामक ठाँव।।

शिक्षा अब उद्योग बनी है,

बदल गया है रूप।

 

मासूमों को

निगल रहा है,

राक्षस बनकर नीट।

नहीं योग्यता

को है मिलती,

वर्तमान की सीट।।

 

सफल नहीं है श्रम बच्चों का,

छलनी होता सूप।

 

मध्य परीक्षा हों घोटाले,

पैसों का सब खेल।

बिकता सुन्दर कल भारत का,

डाले कौन नकेल।।

छिन्न-भिन्न सपनों को लेकर,

मानव गिरते कूप।

 

लालच की इस

प्रभुताई में,

आकुल व्याकुल सूर।

लोग विकल  हैं

गिरिधर गोपी,

लक्ष्य बहुत है दूर।।

 

टूटी निष्ठाओं

की डोरी ,

मुखमंडल पर धूप।

☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – शब्दातीत… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – शब्दातीत… ? श्री संजय भारद्वाज ?

अनगिनत विचारसूत्र,

हर समय भीतर थपेड़े मारते हैं,

असंख्य भाव

हर क्षण तट से टकराते हैं,

एकाध को काग़ज़ पर उतार पाता हूँ,

साहित्यकार बनकर इतराता हूँ,

सोचता हूँ, कैसा अद्भुत,

अनन्य साहित्यकार होगा वह,

जो हर क्षण, हर समय

अनगिनत विचार सूत्र,

असंख्य मन-मस्तिष्कों में बोता है,

भावों के महासागर को पिरोता है,

उसकी अपरिमेयता का स्मरण होता है,

सारी अहंमन्यता का विसर्जन होता है,

इस विसर्जन के बाद,

शब्दों में जो विचार,

जो भाव अवतरित होता है,

प्राय: शब्दातीत होता है..!

(इस रचना के  साथ ही नींद खुली।)

?

© संजय भारद्वाज   

प्रात: 5:30 बजे, 16 सितम्बर 2025

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रीगणेश साधना, गणेश चतुर्थी तदनुसार सोमवार 14 सितंबर को आरम्भ होकर अनंत चतुर्दशी तदनुसार शुक्रवार 25 सितम्बर तक चलेगी। 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा – ॐ गं गणपतये नमः।💥

💥 साधक को इस मंत्र की कम से कम एक माला (108 जप) का संकल्प लेना होगा। इस मंत्र के मालाजप के साथ ही कम से कम एक पाठ अथर्वशीर्ष का भी करना है। जिन्हें अथर्वशीर्ष बहुत कठिन लगे, वे इसे सुनें अवश्य।🕉️

💥 हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३३८ ☆ कविता – हिन्दी बोली ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैंआपकी कविता – हिन्दी बोली ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३३८ – साहित्य निकुंज ☆

☆ हिन्दी बोली ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

 घर की चौखट पर हिंदी वह माँ की बोली

देख रहे हैं आज सभी

हिंदी जा पहुंची

दुनिया की हर टोली

 

मोबाइल हो या लैपटॉप

की स्क्रीन

शब्द वहां मुस्काते हैं

देश हो या विदेश लोग

आज हिंदी में गुनगुनाते हैं।

 

अंग्रेजी के शब्दों के बीच

कहीं नहीं खोई हिंदी

रूप भले ही बदल रहे हैं

 हिंदी जड़े  खोई नहींं

 

शब्द शब्द में भाव बसे

है यही मन का भाव

संस्कृति इसमें रची बसी

यही हमारी छाँव

 

हिंदी आगे बढ़े

और

 नित-नित नए आयाम रचे

हिंदी से हमारी है पहचान

करोड़ों के दिलों में धड़क रहा है हिंदुस्तान।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३१९ ☆ एक पूर्णिका – रोशनी  की खातिर… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक पूर्णिका – रोशनी  की खातिर… । आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३१९ ☆

☆ एक पूर्णिका – रोशनी  की खातिर… ☆ श्री संतोष नेमा ☆

☆

मुश्किल  राहों  पर  चलना आ गया

वक्त  के  सांचे  में  ढलना  आ गया

*

रोशनी  की खातिर   जलते रहे हम

मोम सा  हमको  पिघलना आ गया

*

सबक   दुश्वारियों  से  सीखा  हमने

आज  हालातों   से लड़ना आ गया

*

जिनको  सदा  समझते  रहे  अपना

क्या हुआ  उनको बदलना आ गया

*

राह के  पत्थरों  से न  रखो  दुश्मनी

वजह से  उनकी  संभलना आ गया

*

बे- सहूर हवा का सहारा क्या मिला

धूल  को  माथे  पर चढ़ना आ गया

*

कामयाबी “संतोष” को  क्या मिली

दिल में लोगों के खटकना आ गया

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ३९ – कविता – देर क्या… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘देर क्या…‘।)

☆ शशि साहित्य # ३९ ☆

? कविता – देर क्या…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

☆

रात ने जब मन बना लिया जाने का…

फिर भोर होने में अब देर क्या l

*

कली ने खिलकर गुलाब होना तय किया…

तो कांटों को जगह देने में देर क्या l

*

सुघड़ हाथ है, माटी भी है तैयार…

रूप सजीला ढ़लने में, अब फिर देर क्या l

*

पुष्पित हो गए वह फूल, जो कली बने थे कल,

एक डोर गूंथकर, जयमाल बनने में देर क्या l

*

देख हौसला जलते दिए का, जो लड़ने मरने हो तैयार…

फिर भला तूफान को लौट जाने में देर क्या l

*

सपना है ना तू मेरा, ना कोई मेरा अपना…

फिर पलकों पर सजाने के बजाय ढलका देने में देर क्या l

*

शब्द शब्द में प्रीत है, शब्द ही बन गए बाण,

दग्ध करे जो खंजर जैसे, उनको मिटा देने में देर क्या l

*

आशा है और विश्वास है परमेश्वर का है ध्यान…

ठान लिया जब लक्ष्य है पाना, कदम बढ़ाने में फिर देर क्या l

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – विभाजन… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – विभाजन… ? श्री संजय भारद्वाज ?

लहरों को जन्म देता है प्रवाह

सृजन का आनंद मनाता है,

उछाल के विस्तार पर झूमता है

काल का पहिया घूमता है,

विकसित लहरें बाँट लेती हैं

अपने-अपने हिस्से का प्रवाह,

शिथिल तन और

खंडित मन लिए प्रवाह

अपनी ही लहरों को

विभक्त नहीं कर पाता है,

सुनो मनुज!

मर्त्यलोक में माता-पिता

और संतानों का

कुछ ऐसा ही नाता है!

 

?

© संजय भारद्वाज   

8.35 बजे, 18 मई 2019

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

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💥 इस साधना का मंत्र होगा – ॐ गं गणपतये नमः।💥

💥 साधक को इस मंत्र की कम से कम एक माला (108 जप) का संकल्प लेना होगा। इस मंत्र के मालाजप के साथ ही कम से कम एक पाठ अथर्वशीर्ष का भी करना है। जिन्हें अथर्वशीर्ष बहुत कठिन लगे, वे इसे सुनें अवश्य।🕉️

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “मुफ़लिस, मज़हब और भूख” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – मुफ़लिस, मज़हब और भूख… ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मुफ़लिस (निर्धन, दरिद्र) की का कोई,

मज़हब नहीं होता।

उसे मज़हब से कोई गुरेज,

कोई परहेज़ नहीं होता।

लंगर, “सुलेमान” का हो या “घनश्याम” का,

“गुरबचन” का हो या “अब्राहम” का।

हर जुलूस के पीछे चल देता है वह,

हर रंग का झंडा थाम लेता है वह

उसे मिले दोने में..

एक ही मजहब होता है,

“इंसानियत” का,

जो उसके पेट की भूख मिटा दे।

उसकी तृप्त आत्मा, वहीं शीश झुका देती हैं।

क्षुधा की शांति, मोक्ष प्राप्ति से

कम नहीं लगती उसे।

जो उसका पेट भर दे,

उसी मज़हब को मान लेता है वह…!!

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्क – बिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # ३१० ☆ कविता – धर्मध्वजा को नमन करे ये राष्ट्र हमारा ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३१० ☆ 

☆ गीत – धर्मध्वजा को नमन करे ये राष्ट्र हमारा…  ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

☆

धर्मध्वजा को नमन करे ये,

राष्ट्र हमारा।

भारत जागा सत्य-सनातन,

चहुँ-दिशि सारा।।

 

बलिदानों की थाती ने,

बाबर का नाम मिटाया है।

क्रूर, कलंकित अभिशापों का,

होता यहाँ सफाया है।

 

जग भी जाओ सोने वालो,

एक यही हो नारा।

धर्मध्वजा को नमन करे ये,

राष्ट्र हमारा।।

 

सूर्य वंश का सूर्य उदय,

हरदम ऊर्जा से  भरता।

रामकृष्ण उदघोष शक्ति का,

संचय जन-जन में  करता।

 

मार्क्स, मुगल, मैकाले की

सोचों को मारा।

धर्मध्वजा को नमन करे ये,

राष्ट्र हमारा।।

 

अरे! किशोर, युवा जग जाओ,

तुम से ही  राष्ट्र बचेगा।

लो अँगड़ाई राष्ट्र भक्ति की,

संस्कृति से प्रेम बढ़ेगा।

 

टेढ़ी आँख करें जो घाती,

उनका हो निबटारा।

धर्मध्वजा को नमन करे ये,

राष्ट्र हमारा।।

 

छोड़ दिखावा जग भी जाओ,

हिंदू कहलाने वालो।

जाति-पाँति में मत बँट जाओ,

वीर शिवाजी के लालो।

 

शस्त्र, शास्त्र संकल्प हमारा सबसे प्यारा।

धर्मध्वजा को नमन करे ये,

राष्ट्र हमारा।।

 ☆

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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