हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # ९० – नवगीत – जीवन को वसंत करो… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – जीवन को वसंत करो

? रचना संसार # ९० – गीत – जीवन को वसंत करो…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

पतझड़ से इस जीवन को तुम,

आकर कंत वसंत करो।

नीरस ,नीरव संप्रेषण को,

गुप्त ,निराला ,पंत करो।।

*

शब्द -शब्द  माणिक कर  दो तुम,

भरो प्रेम की गागर तुम।

गुंजित सारा जग हो जाए,

वंशी तुम नटनागर तुम।।

भाव  सुपावन गंगाजल कर,

लेखन को जीवंत करो।

*

श्वेता की वीणा बजती हो,

सात सुरों की सरगम हो।

अलंकार रस छंद  निराले,

नवल सृजन का उद्गम हो,

नव रस की रसधारा में तुम,

पीडाओं का अंत करो।

*

निष्ठाओं की डोर पकड़कर ,

तन -मन अर्पण करना है।

दिनकर -सा उजियारा करने ,

सार्थक चिंतन  करना है।।

जग -कल्याण भावना रखकर,

मन को सज्जन संत करो ।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #३०० ☆ गीत – बड़ो नटखट कृष्ण कन्हैया… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका एक गीत – बड़ो नटखट कृष्ण कन्हैया आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३०० ☆

गीत – बड़ो नटखट कृष्ण कन्हैया☆ श्री संतोष नेमा ☆

इत पकड़त वो उत झट धावें, हाथ बढ़ावें मैया

दधि-माखन की मटकी फोड़ें, खाबें खूब मलैया

*

प्रेम -जाल सखियों पै फेंके, बाँके बंशी बजैया

बालापन बहु असुर संहारे, हर्षित यशुमति मैया

*

भू मंडल मुँह खोल दिखाया, चकित भई तब मैया

बाल रूप “संतोष” सुहावे, चाहे प्रभु की छैयां

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # २० – कविता – अभी बाकी है… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशिसुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता अभी बाकी है।)

☆ शशि साहित्य # २० ☆

? कविता – अभी बाकी है…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

🫟🫟🫟🫟🫟

बहुत लुटाया है…

उससे ज्यादा बाकी है..

 

थाम कर हाथ चल दूं, खुद का,

राह अभी वह बाकी है..

 

आईने में देख खुद को,

मुस्कुरा सकूं,

सम्मान अभी वह बाकी है..

 

आसमान दामन में भर लूं,

अरमान अभी वह बाकी है..

 

जरा तौल लूं पंखों को,

उड़ान अभी तो बाकी है..

 

आवाज सुनकर थम जाऊं..

पुकार में अब क्या बाकी है????

 

भोर का सूरज चमक उठा,

ना अब अंधियारा बाकी है..

 

मन उम्मीदों से भरा हुआ है,

“उसको”  गुहार  सुनना पड़ेगी,

प्रार्थना दिल से जारी है..

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ इशारा ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी कविता  इशारा।)

? कविता – इशारा ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

(महाश्रृंगार छंद)

?

जिंदगी बदले रंग हजार,

तभी तो पाना मुश्किल पार l

इशारा देती है हर बार,

भटकते रहते हैं लाचार ll

नजर को पढना मुश्किल यार,

सत्य ही है सबका आधार l

झूठ तो कर्ता है लाचार,

सोच लो क्या होगा उपचार ll

*

इशारा करना अब तो छोड़,

सामने आकर मन से बोल l

हृदय की धड़कन कहती देख, प

कड़ कर मुझको आँखें खोल ll

प्रेम के देखो लाखों रंग,

तभी तो होती रहती जंग l

इसे जो समझे जाता हार,

निराले होते उसके ढंग ll

*

इशारा कर्ता है जब ईश,

नहीं देता है मानव ध्यान l

बाद में रोता प्रभु को कोस,

मिले जब कर्मो से अपमान ll

करो तुम सरल शील व्यवहार,

तभी होती है जस जयकार l

बने हम प्रकृति का आधार,

दिए हो यह अनुपम उपहार ll

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – दहलीज़ ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – दहलीज़ ? ?

वह होती है

दहलीज़ के भीतर

उसकी चर्चा होती है

दहलीज़ के बाहर,

भीतर-बाहर को निरखती है

वह खुद अपनी दहलीज़ बनती है!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक  संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २९४ ☆ गीत – अपना देश गुलाम न होता… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २९४ ☆ 

☆ गीत – अपना देश गुलाम न होता ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

अपना देश गुलाम न होता,

पाथर पूजा अगर न होती।

ईश प्रकट तब भी हो जाते,

मूरत खंडित हो क्यों रोती।

अगर देवता सक्षम होते,

लूट-पाट फिर क्योंकर होती?

पंडे-पंडित और पुजारी,

उनकी हत्या क्योंकर होती?

 *

ईश्वर तो कण-कण में है जब,

फिर अस्तित्व धरा क्यों खोती?

 **

मंदिर-मंदिर जाकर फिर क्यों,

हम सब अपना शीश झुकाते?

जीवित मात-पिता अपनों को,

घर में क्यों पीड़ा पहुँचाते?

 *

ईश्वर स्वयं चले आते, यदि

मात-पिता की पूजा होती!

 **

तुम हो संतानें ऋषियों की,

सब मिल सोचो तनिक विचारो।

वेद, उपनिषद, गीता को पढ़,

अपने मन का प्रेम उभारो।

 *

ईश्वर रहता  है अंतस में,

जैसे रहे सीप में मोती।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १४२ ☆ सम्मान खरीदो ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “सम्मान खरीदो” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १४२ ☆ 

☆ सम्मान खरीदो ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

पग-पग पर सम्मान खरीदो

मिलते हैं दीवान खरीदो।

 *

हर दस-बीस कदम पर जा कर

मिल जाए भगवान खरीदो।

 *

हर चौराहे पर बिकने को

खड़ा हुआ इंसान खरीदो ।

 *

सुख दुख के पलड़े में तोलो

फिर कोई वरदान खरीदो ।

 *

भले न लिखना आए कविता

करें सभी गुणगान खरीदो ।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – सृष्टि ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – सृष्टि  ? ?

वह जानती है

उससे कुछ ही

बेहतर जियेगी

उसकी बेटी,

फिर भी

बेटी जनती है वह,

सृष्टि को

टिकाये रखने की

ज़िम्मेदारी

नहीं भूलती वह!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक  संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १४७ ☆ आँखों से मेरी वो कभी मंज़र नहीं गया… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “आँखों से मेरी वो कभी मंज़र नहीं गया“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १४७ ☆

✍ आँखों से मेरी वो कभी मंज़र नहीं गया… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

तन्हाइयों से मेरी वो मिलकर नहीं गया

उसके बगैर मैं भी कोई मर नहीं गया

 *

बैठा था बादशाह नया तख़्त पे कोई

बस कोरनिश बजाने कलंदर नहीं गया

 *

बँटबारे में वतन के मैं बेघर  हुआ था जब

आँखों से मेरी वो कभी मंज़र नहीं गया

 *

दीवार छत किबाड़ हैं केवल नहीं यकीं

इसको ही घर कहें तो कभी घर नहीं गया

 *

तक़रीर कर रहा वही  दुनिया जहान पर

घर से निकल के जो कभी बाहर  नहीं गया

 *

उजले लिवास में है अभी सिर्फ वो बशर

सत्ता की कोठरी के जो अंदर नहीं गया

 *

बे-लौस है बशर वो उसे कैसे हम कहें

अपने का गैर का अभी अंतर नहीं गया

 *

वो घुड़सवारी में न महारत को पा सके

गिरने का उसके दिल से अगर डर नहीं गया

 *

पगड़ी गिरा के जान बचाकर तू आया क्यों

लानत अरुण है तुझको तेरा सर नहीं गया

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ५२ – पेड- पौधे कभी सेल्फी नही लेते… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – पेड- पौधे कभी सेल्फी नही लेते।)

☆ हेमंत साहित्य # ५२ ☆

✍ पेड- पौधे कभी सेल्फी नही लेते… ☆ श्री हेमंत तारे  

पेड- पोधे कभी सेल्फी नही लेते

रहते हैं सहज,

अपने में मगन

बसंत हो या पतझड

कभी हरे- भरे

कभी नंग-धडंग

होते हैं जैसे,

दिखते हैं वैसे

और,

जी लेते हैं यूं ही बरसों- बरस

न सेल्फी, न दिखावा.

वो, जीते-जागते, सांसे भरते

रहते हैं यहीं

हमारे आस-पास

हमारे संग हमारे साथ

वो भी जीवित,  हम भी जीवित.

 

जरूरी नही, सेल्फी ली जाए,

जो है नही वो दिखाया जाए,

 

तेजी से भागते कालचक्र में

हर किसी को मिले हैं

अपने हिस्से के दबाव,

अपने हिस्से के तनाव

तो फिर,

सेल्फी लेकर क्यों बढाया जाए तनाव

और गिना जाए

कितने मिले हैं थम्स-अप

किसने दिया,

किसने न दिया.

 

जरूरी नही, सेल्फी ली जाए

पेड- पौधे कभी सेल्फी नही लेते.

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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