हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २९६ – प्रायमरी का मास्टर…१ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – प्रायमरी का मास्टर।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २९६ ☆

☆ – प्रायमरी का मास्टर…१  ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

(रचनाकाल : दीपावली 1970)

 कहीं पढ़ा था

गुरू बहुत बड़े होते हैं,

कहीं सुना था कि

वे प्रभु की बराबरी से खड़े होते हैं।

 

कबीर की कड़ी के लोग

चाहे जितना गाएँ-

गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काके लागू पाँय

लेकिन आज

गरियाये जाते हैं गुरूजी

बिलानागा।

 

कोई नहीं कहता

बंदऊँ गुरु पद पदुम परागा

कैसे प्रकट करूँ मैं

अपने मन के पाप को,

 

कि काम भी बन जाय

और

बुरा भी न लगे आपको।

जी, तबियत उचट रही है

अपने व्यवसाय से,

और भी संगाती है

पूछ लीजिये न समूचे समुदाय से-

कि पूरा पड़ जाता है

तुम्हारा तुम्हारी आय से ?

उत्तर में निकलती है

सिर्फ एक हाय

क्रमशः…२

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २९३ – “फिर भी रही तिरस्कृत…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “फिर भी रही तिरस्कृत ...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २९३ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “फिर भी रही तिरस्कृत...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

रही अनिश्चिता

जो उसको तोड़ रही थी।

वही अभागिन बस

अपना घर छोड़ रही थी ॥

 

पीछे उस की बुनियादी

जरूरतों वाली ।

थी शापित परम्परा

या गम की दीवाली ।

 

पुत्र नहीं दे सकी महज

उसकी गलती थी –

यह रूढी समाज की

उसे निचोड़ रही थी ॥

 

जब कि उसी के हाथों में

इस  घर का कौशल ।

उसके हृदय नहीं था

चिन्तित करता छल बल ।

 

और पुराने लोगों की

बस कहन -समझ में –

सज्जनता -सच्चाई का

गठजोड़ रही थी ॥

 

सारे गुण थे उसमें

फिर भी रही तिरस्कृत ।

नये उलहने और झिडकियाँ

सहती नितनित ।

 

सहनशक्ति ,कर्तव्यपालना

के रहते वह –

अच्छाई की ओर बुराई

मोड रही थी।

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

01-08-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “झोपड़ी निर्जीव न थी” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – झोपड़ी निर्जीव न थी… ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

 

उस झोपड़ी में

सिर्फ़ घास फूस तिनके ही न थे

उसमें बसती थी

ज़िंदगी की जद्दोजहद

वह सिर्फ़ धूप से राहत नहीं

और बारिश से बचाती ही नहीं थी

एक सुरक्षित आसरा और पनाहगाह थी

टूटती सांसों को थामने के लिये

चूल्हे की आंच में तपते संघर्ष की

वह मूक साक्षी थी

टूटी चारपाई में वहां

कोई गुदड़ी का लाल पलता था

रात को टिमटिमाते दिये के उजाले से

कोई उम्मादें, आशाएं पलती थीं वहाँ

वो हारी नहीं, संसार के वैभव के आगे

हठ कर बैठी वह कुटिया

हारूंगी नहीं कभी

किसी आंधी, तूफ़ान के आगे

मेरे अंदर अभी

जीजीविषा की आधारशिला

बहुत मज़बूती से जड़वत् है

और रहेगी, तब तक

जब तक ” जीवन ” मेरे भरोसे

बसा रहेगा यहाँ…!!!!????

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्कबिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७५ ☆ # “नई रोशनी आई है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “नई रोशनी आई है…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७५

☆ # “नई रोशनी आई है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

उदास आंखों में नई रोशनी आई है

नई सुबह ने एक उम्मीद जगाई है

अंधेरे के बादल

धीरे-धीरे छट रहे हैं

दुख भरे दिन

धीरे-धीरे कट रहे हैं

राह में तूफान

धीरे-धीरे घट रहे हैं

हर किरण ने मन में आस बधाई है

नई सुबह ने उम्मीद जगाई है

 

आसमान भी अब झुकने लगा है

तारों से उनका हाल पूछने लगा है

धरती का उन्माद देखकर छुपने लगा है

शायद उसे अपनी भूल समझ आई है

नई सुबह ने एक उम्मीद जगाई है

 

किसका यहां हमेशा

के लिए ठिकाना है

जो आया है

उसे एक दिन जाना है

क्या खोना और क्या पाना है

कुदरत ने अपनी बिसात बिछाई है

नई सुबह ने एक उम्मीद जगाई है

 

नए जोश ने

कई तख्त बदल डाले हैं

नसीहत है उनको

जो मुगालता पाले हैं

हर तानाशाह ने

आखिर में हथियार डालें है

याद रहते हैं वह जिन्होंने दिलों में

प्रीत की ज्योत जलाई है

नई सुबह ने एक उम्मीद जगाई है

उदास आंखों में नई रोशनी आई है/

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -११९ – पानी तेरी अजब कहानी… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘पानी तेरी अजब कहानी।)

☆ अभिव्यक्ति # ११९ ☆

☆ पानी तेरी अजब कहानी☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

पानी, तेरी अजब कहानी,

जैसा बर्तन, वैसा पानी,

पानी तेरी अजब कहानी।

*

बदली गगरी लेकर जाती,

सागर से भर लाती पानी,

धरती की वो प्यास बुझाने,

बनकर बूंद बरसता पानी,

पानी तेरी अजब कहानी।

*

सागर का खारा है पानी,

दरिया का मीठा है पानी,

संग्रह करता खारा होता,

जो दे उसका मीठा पानी,

पानी तेरी अजब कहानी।

*

मूरत पर भी, चढ़ता पानी,

अंत समय में लगता पानी,

संकल्प करो तो लगता पानी,

श्राप दिया तो लगता पानी,

पानी तेरी अजब कहानी।

*

बचपन में आँगन में पानी,

छमछम करती बिटिया रानी,

बिटिया की बिदाई ले आती,

माता पिता की आंख में पानी,

पानी तेरी अजब कहानी।

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ कोई गणितज्ञ नहीं…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – कोई गणितज्ञ नहीं…!

☆ ॥ कविता॥ कोई गणितज्ञ नहीं…!  ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

किसी बौद्धिक, वणिक्

या राजनीतिज्ञ के घर में

पैदा होने मात्र से

कोई परम विज्ञ,

सफल सौदागर या

लोकप्रिय नेता नहीं हो जाता है।

 

जब होने को होता है

तब किसी वनवासी के घर में

कविवर बाल्मिकी

बेनामी घर में धीरूभाई अंबानी

बेदखली के घर में

सम्राट चंद्रगुप्त पैदा हो जाता है।

 

कुदरत की इस

शाश्वत उलझी हुई गुत्थी को

आज तक कोई

गणितज्ञ नहीं सुलझा पाया है।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २८८ – ग़ज़लिका – लोकतंत्र ने जिनको पोसा ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – ग़ज़लिका – लोकतंत्र ने जिनको पोसा)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८८ ☆

☆ ग़ज़लिका – लोकतंत्र ने जिनको पोसा ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

इसने ताका, उसने ताका

कौन न जिसने जी भर ताका

.

मौका देख न चूका कोई

दोस्त यार फूफा या काका

.

चीख न अबला की सुनता जग

सबला की झट सुनता आका

.

जिन पर जिम्मा संरक्षण का

वे ही डाल रहे हैं डाका

.

मन की बातें हैं मनमानी

कमीशनों का निश्चित खाका

.

हुए पड़ोसी सभी विरोधी

आँख दिखा गुर्राए ढाका

.

फेंक रहे हैं लाखों हँसकर

पोस्टिंग हो पा जाएँ नाका

.

खाते जाते जो डकार ले

उनके कारण होता फाका

.

लोकतंत्र ने जिनको पोसा

उनके कारण करता साका

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१६.७.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – कविता – हँसी ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

मुंशी प्रेमचंद

? संजय दृष्टि – हँसी ? ?

(३१ जुलाई को  मुंशी प्रेमचंद जी की जयंती थी। उन्हें नमन। बचपन में मुंशी जी की कहानी ‘घासवाली ‘ पढ़ी थी। उसकी नायिका के धुँधले-से अक्स  और कहानी की पृष्ठभूमि ने बीस वर्ष बाद लिखी कविता को भी प्रभावित किया।  मुंशी जी को समर्पित कविता साझा कर रहा हूँ। – कविता संग्रह- “चेहरे’ – प्रकाशन वर्ष- 2014)

  

भीड़ को चीरती-सी एक हँसी

मेरे कानों पर आकर ठहर गई थी,

कैसी विद्रूप, कैसी व्यावसायिक

कैसी जानी-बूझी लंपट-सी हँसी थी,

मैं टूटा था, दरक-सा गया था

क्या यह वही थी, क्या वह उसकी हँसी थी…..?

 

पुष्पा गॉंव की एक घसियारिन थी,

सलीके से उसके  हाथ

आधा माथा ढके जब घास काटते थे

तो उसके रूप की कल्पना मात्र से

कई कलेजे कट जाते थे…..

 

थी फूल अनछुई-सी,

जंगली घास में जूही-सी,

काली भरी-भरी सी देह,

बोलती बड़ी-बड़ी-सी सलोनी आँखें,

मुझे शायद आँखों से अधिक सुंदर

उसमें तैरते उसके भाव लगते थे,

भाव जिनकी मल्लिका को

शब्दों की जरूरत ही नहीं,

यों ही नि:शब्द रचना रच जाती थी…..

 

पुष्पा थी तो मधवा की घरवाली

पर कुँआरी लड़कियाँ भी

उसके रूप से जल जाती थीं

गांव के मरदों के अंदर के जानवर को,

कल्पनाओं में भी

उसका ब्याहता रूप नहीं भाता था,

लोक-लाज-रिवाजों के कपड़ों के भीतर भी

उनका प्राकृत रूप नज़र आ ही जाता था…..

 

पुष्पा न केवल एक घसियारिन थी,

पुष्पा न केवल एक ब्याहता थी,

पुष्पा एक चर्चा थी, पुष्पा एक  अपेक्षा थी…..

 

गॉंव के छोटे ठाकुर …… बस ठाकुर थे

नतीजतन रसिया तो होने ही थे,

जिस किसी पर उनकी नज़र पड़ जाती,

वो चुपचाप उनके हुक्म के आगे झुक जाती,

मुझे लगता था गाँव की औरतों में भी

कोई अपेक्षा पुरुष बसा है,

अपनी तंग-फटेहाल ज़िन्दगी में

कुछ क्षण ठाकुर के,

किसी रुमानी कल्पना से कम नहीं लगते थे,

काँटों की शय्या को सोने के पलंग

सपने सलोने से कम नहीं लगते थे…..

 

खेतों के बीच की पतली-सी पगडंडी,

डूबते क्षितिज को चूमता सूरज,

पक्षियों का कलरव,

घर लौटते चौपायों का समूह,

दूर जंगल में शेर की गर्जना,

अपने डग घर की ओर बढ़ाती

आतांकित बकरियों की छलांग,

इन सब के बीच-

सारी चहचहाट को चीरते

गूँज रही थी पुष्पा की हँसी …..

 

सर पर घास का बोझ, हाथ में हँसिया,

घर लौटकर, पसीना सुखाकर,

कुएँ का एक गिलास पानी पीने की तमन्ना,

मधवा से होने वाली जोरा-जोरी की कल्पना…..

 

स्वप्नों में खोई परीकुमारी-सी,

ढलती शाम को चढ़ते यौवन-सा

प्रदीप्त करती अक्षत कुमारी-सी,

चली जा रही थी पुष्पा …..

 

एकाएक,

शेर की गर्जना ऊँची हुई,

मेमनों में हलचल मची,

एक विद्रूप चौपाया

मासूम बकरी को घेरे खड़ा था,

ठाकुर का एक हाथ मूँछों पर था

दूसरा पुष्पा की कलाई पकड़े खड़ा था …..

 

हँसी यकायक चुप हो गई,

झटके से पल्लूू वक्ष पर आ गया,

सर पर रखा घास का झौआ

बगैर सहारे के तन गया था,

हाथ की हँसुली

अब हथियार बन गया था…..

 

रणचंडी का वह रूप

ठाकुर देखता ही रह गया,

शर्म से ऑँखें झुक गईं,

आत्मग्लानि ने खींचकर थप्पड़ मारा,

निःशब्द शब्दों की जननी

सारे भाव ताड़ गई-

ठाकुर, पुष्पा को क्या ऐसी-वैसी समझा है?

तू तो गाँव का मुखिया है,

हर बहू-बेटी को होना तुझे रक्षक है,

फिर क्यों तू ऐसा है,

क्यों तेरी प्रवृत्ति ऐसी भक्षक है …..?

 

ए भाई !

आज जो तूने मेरा हाथ थामा

तो ये हाथ रक्षा के लिये थामा,

ये मैंनेे माना है,

एक दूब से पुष्पा ने रक्षाबंधन कर डाला था,

ठाकुर के पाप की गठरी को

उसके नैनों से बही गंगा ने धो डाला था,

ठाकुर का जीवन बदल चुका था

छोटे ठाकुर, अब सचमुच के ठाकुर थे…..

 

पुष्पा की हँसी का मैं कायल हो गया था,

निष्पाप, निर्दोष छवि का मैं भक्त हो चला था,

फिर शहर में घास बेचती,

ग्राहकों को लुभाकर बातें करती,

ये विद्रूप हँसी, ये लंपट स्वरूप,

पुष्पा तेरा कौन-सा है सही रूप?

 

उसे मुझे देख लिया था

पर उसकी तल्लीनता में

कोई अंतर नहीं आया था,

उलटे कनखियों से

उसे देखने की फिराक में

मैं ही उसकी आँखों से जा टकराया था,

वह फिर भी हँसती रही…..

 

गॉंव के खेतों के बीच से जाती

उस संकरी पगडंडी पर,

उस शाम पुष्पा फिर मिली थी

वह फिर हँसी थी…..

 

बोली-

बाबूजी! जानती हूँ,

शहर की मेरी हँसी

तुमने गलत नहीं मानी है,

पुष्पा वैसी ही है

जैसी तुमने शुरू से जानी है,

हँसती चली गई, हँसती चली गई

हँसती-हँसती चली गई दूर तक…..

 

अपने चिथड़ा-चिथड़ा हुए

अस्तित्व को लिए

निस्तब्ध, लज्जित-सा मैं,

क्षितिज को देखता रहा,

जाती पुष्पा के पदचिह्नों को घूरता रहा,

खुद ने खुद से प्रश्न किया

ठाकुर और तेरे जैसों की

सफेदपोशी क्या सही थी,

उत्तर में गूँजी फिर वही हँसी थी..!

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २१४ ☆ मुक्तक – ।। कलम के सिपाही।।मुंशी प्रेमचंद ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

☆ “श्री हंस” साहित्य # २१४ ☆

☆ ।। मुक्तक ।। कलम के सिपाही।।मुंशी प्रेमचंद ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

।।1।।

हर    कहानी     उपन्यास   में, सरल  सुगम  भाषा।

हिंदी  उर्दू मिलन   को  मिली, थी  एक  नई  आशा।।

सजीव    चित्रण    ने   बनाया, उन्हें कहानी सम्राट।

प्रत्येक पंक्ति  में    डाले  प्राण, हो ख़ुशी या निराशा।।

।।2।।

प्रत्येक  पात्र  हो  जैसे   कँही, जमीन से जुड़ा हुआ।

भावनायों और  वास्तविकता से, मानों हो जड़ा हुआ।।

स्त्री  मन  के   रहस्य  या  हों, लड़कपन के   खेल।

हर रिश्ता  कागज़  पर  उतारा, बच्चा या बड़ा हुआ।।

।।3।।

आज़ादी आंदोलन  और रूढ़ियां, या मन के   अंतर्द्वंद।

गांव वालों की फाकाकशी या हों, लाट साहब के दँद-फंद।।

हर पन्ना किताब का जिन्दगी की, कहानी सुनाता हुआ।

ऐसे थे   वह  कलम के सिपाही कहलाते मुंशी प्रेमचंद।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १३ – जरा इतिहास को पढ़ लो!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता जरा इतिहास को पढ़ लो !!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १३ ☆

☆ जरा इतिहास को पढ़ लो !! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

चुकाई है बड़ी कीमत, हुए आजाद तब जानो ।

करो रक्षा वतन की सब, सुनो अब बात यह मानो ।

 बहा है खून वीरों का, किसी ने लाल खोया है ।

 लुटा कर दौलतें सारी, विजय का हार पोया है ।।

*

 चरण में शीश देकर भी, बचाई मातु की गरिमा ।

 जवानी भेंट कर दी थी, बढ़ाने देश की महिमा ।

 सजा ये थाल जो पाया,रखो अब मान भी प्यारे ।

 सजग जो आज हो जाओ, मिटेंगे कष्ट फिर सारे ।।

*

भुला संस्कार को अपने, विदेशी गीत गाते हो ।

मिटाकर देश की समता, महज  ही बड़बड़ाते हो ।।

किया क्या देश के खातिर, स्वयं से प्रश्न यह कर लो।

नहीं काटो जड़े अपनी,जरा इतिहास को पढ़ लो ।।

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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