हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७० ☆ # “यह बरसात का मौसम…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “यह बरसात का मौसम…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७० ☆

☆ # “यह बरसात का मौसम…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

यह बरसात का मौसम

यह ठंडी हवाएं

यह तपती हुई धरती

घटाओं को बुलाएं 

 

तपता हुआ कण-कण है

व्याकुल तन मन है

दीवानें मेंघों को

धरती बुला रही है हर क्षण है

दीवानेपन की तड़प किसको बताएं

 

कागज की कश्ती में

खोया हुआ बचपन है

फुवारों की मस्ती में

डूबा हुआ यौवन है

अंतिम प्रहर में

यह यादें कितना रुलाएं 

 

यह पानी की बूंदे

सब है आंखें मूंदे

भीगती तरुणाई

अपने प्रीतम को ढूंढें

प्रीतम की दूरी

अब उसको कितना सताएं

 

यह मेघों की आंख  मिचोली

धरती से ठिठौली

कहीं भीषण गर्मी

तो कहीं वर्षा की होली

वर्षा है जीवन

अब कैसे समझाएं

 

यहां तो मर गया है

लोगों के आंखों का पानी

हर तरफ देखो

बस यही है कहानी

हर शख्स दूसरे को

कदम कदम पर आजमाएं

 

यह बरसात का मौसम

यह ठंडी हवाएं

यह तपती हुई धरती

घटाओं को बुलाएं/

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुनाव ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुनाव  ? ?

कुछ नहीं देती भावुकता,

कुछ नहीं देती कविता,

जीने का सामान करना सीखो,

जीवन में सही चुनाव करना सीखो,

एक पलड़े पर दुनियादारी रखी,

दूसरे पर कविता धर दी,

सही चुनने की सलाह सुन ली

और मैंने अपने लिए

कविता चुन ली..!

?

© संजय भारद्वाज   

(प्रात: 9:24 बजे, 23 जून 2021)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️

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अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३६ – कविता – पिता… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “पिता“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३६ ?

? कविता – पिता… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

= 1 =

संतान के स्वप्नों का

संवाहक पिता।

परिवार की ख़ुशियों का

गुण-ग्राहक पिता।।

= 2 =

घर के विधि-विधान का

विधायक पिता।

कुटुम्ब की समृद्धि का

प्रस्तावक पिता।।

= 3 =

औलाद बे-उसूल तो

आक्रामक पिता।

धन-संसाधन जुटाए

सुख-दायक पिता।।

= 4 =

तात जनक बाप पापा

नायक पिता।

पालक वालिद परम

अभिभावक पिता।।

= 5 =

सिखाये आचरण-नियम

नियामक पिता।

आशीर्वाद-स्नेह का

परिचायक पिता।।

= 6 =

शुभकामनाएँ लाये सदा

लायक पिता।

करे जीवन लय-तालबद्ध

गायक पिता।।

= 7 =

सुखद स्वर्णिम बचपन

स्मारक पिता।

हर ज़ख़्म घाव दर्द का

निवारक पिता।।

= 8 =

कभी शीतल हिम तो कभी

पावक पिता।

हमारे यश-गौरव का

प्रचारक पिता।।

= 9 =

संतति के प्रारब्ध का

उन्नायक पिता।

पुत्र-पुत्री के भविष्य का,

उद्धारक पिता।।

= 10 =

संस्कार-कर्म प्रति सजग

विचारक पिता।

‘ राजेश ‘ प्रथम पूज्य है

विनायक पिता।।

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ८ – !!वक्त!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता !!वक्त!!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ८ ☆

☆ !! वक्त !! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सृष्टि आरंभ से जो चला आ रहा, वो चला जा रहा नित्य ही साथ में।

 बिन रुके बिन झुके बिन थके वो चले, बैठता भी नहीं वो कहीं पाथ में।

 आदि में अंत में हर्ष में दर्द में, वो अकेला रहे सर्वदा साथ में।

वक्त होता सभी के सदा संग में, एक साथी नहीं वक्त के हाथ में।।

*

नित्य संसार को वो निहारा करे, रोकता भी नहीं टोकता भी नहीं।

प्रेम को दर्द को राग को द्वेष को, जानता है मगर बोलता भी नहीं।

लोग बोले भला या बुरा बोल दे, ले तराजू कभी तोलता भी नहीं।

भोर में रात में धूप में छांँव में, कर्म को टाल दे सोचता भी नहीं।।

*

बांधता वक्त सारे युगों को सदा, वक्त को बांध दे डोर ऐसी कहाँ।

 राम भी कृष्ण भी वक्त को मान दें, जन्म ले वक्त से देख छोड़ें जहाँ।

 वो बिना भेद के नित्य ही बाँटता, ज्ञान भी एक जैसा सभी को यहाँ।

 कर्म को धर्म मानो चलो धर्म से, दंड भी मोक्ष भी ईश देते वहाँ।।

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २०९ ☆ गीत – ।। कोई हम में रहता तो कोई अहम में रहता है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # २०९ ☆

☆ गीत ।। कोई हम में रहता तो कोई अहम में रहता है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

कोई हम में रहता है तो कोई अहम में रहता है।

कोई मैं ही मैं में रहता कोई बस वहम में रहता है।।

***

अपनेपन का  अहसास ही ताकत की दवा देता है।

मत रहो सदा ही क्रोध में यह घृणा को हवा देता है।।

भटक जाता आदमी जब द्वेष ही कहन में रहता है।

कोई हम में रहता है तो कोई अहम में रहता है।।

***

खाक हो जाता बदन पर रंजिश खत्म नहीं होती है।

शत्रुता में कोई भी नीति  सफल  यत्न नहीं होती है।।

आगे बढ़ता नहीं जो अभिमान बोझ जहन में रहता है।

कोई हम में रहता है तो कोई अहम में रहता है।।

****

जो संबंध जोड़ता और निभाता वही सफल होता है।

जो स्पर्धा नहीं ईर्ष्या करता वह सफलता भी खोता है।।

दिल में घृणा आग तो मन मस्तिष्क भी दहन में रहता है।

कोई हम में रहता है तो कोई अहम में रहता है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२७२ ☆ कविता – सरदार वल्लभ भाई पटेल… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – सरदार वल्लभ भाई पटेल…। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २७२

☆ सरदार वल्लभ भाई पटेल…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

हे देशभक्त, कर्तव्यनिष्ठ, दृढ़व्रती अनूठे सेनानी

वल्लभ भाई पटेल तुम थे एक सच्चे नेता पर दानी।

*

तब दूरदृष्टि शासन क्षमता हम सब में गर्व जगाती है

हर अग्नि परीक्षा के अवसर हमें पावन याद दिलाती है।।

*

तुमने थी निभाई प्रमुख भूमिका देश को एक बनाने में

बिखरे छोटे रजवाड़ों को भारत के साथ मिलाने में।।

*

नक्शे में भरने नया रंग एक अनुपम काम तुम्हारा है

इस कठिन काम हित सच मन से आभारी भारत सारा है।।

*

तुम आजादी के बाद शीघ्र ही छोड़ हमें जो चले गए

कितने ही नए जंजालों में फंस हम औरों से छले गए।।

*

जो काम रह गया, तब तुमसे वह काम आज भी बाकी है

पाने को किनारा तैर रहे पर हार रही तैराकी है।।

*

दो अपनी सी दृढ़ता हमको हर उलझन को सुलझाने को

नई नई समस्याओं से लड़कर उन्हें सहज निपटाने को।।

*

तुम अडिग रहे, डरा न सका न कोई जीवन संग्राम तुम्हें

करते हैं हे सरदार सभी हम बारम्बार प्रणाम तुम्हें।।

© स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – सर्वप्रथम ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – सर्वप्रथम ? ?

मेरा मौन

निर्निमेष मुझे निहारता है,

मेरे सामने आकर

प्राय: ठहर जाता है,

एक अनकहा सागर

भीतर थपेड़े मारता है,

सारा अनभिव्यक्त

कहन को मचल जाता है,

जानता हूँ,

तुम्हारा अनकहा भी

छटपटाने लगता है,

उसे रोक पाने में

तट लड़खड़ाने लगता है,

चलो अपने-अपने अनकहे को

उँड़ेलें एक गागर में,

अपने- अपने अनकहे को

निहारें इस साझा सागर में,

नदियों का संगम तो

पारंपरिक लक्षण है,

सागरीय लहरों का घुलना-मिलना

अपवाद विलक्षण है,

विश्वास करना, हमारी गागर

किसी महासागर से भी

अधिक विशाल होगी,

खारे पानी से आकंठ तृप्त होने की

जगत की यह घटना प्रथम होगी..!

?

© संजय भारद्वाज   

(2.9.2018, प्रातः 9:45 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

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संजयउवाच@डाटामेल.भारत

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # १०० – गीत – युद्ध के विरुद्ध … ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – युद्ध के विरुद्ध 

? रचना संसार # १०० – गीत – युद्ध के विरुद्ध …  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

बात पर, आज क्यों, बंधु देखो अड़े।

दुश्मनी, है बढ़ी, प्राण लेने खड़े।।

*

 है चकित, यह धरा, शांत आकाश है।

 रो रहे, खग सभी, हो रहा नाश है।।

 वीर जो, थे बहुत, पार्थ साथी थके।

 मित्र के, सारथी, क्रुद्ध होके रुके।।

 स्वार्थ में, क्रूर हो, वीर योद्धा लड़े।

*

नित्य बम, फेंकते, दुष्ट शैतान हैं।

ताकतें, चीख कर, ले रहीं जान हैं।।

लक्ष्य है जीत का, बंध सब टूटते।

उर चुभे, शूल हैं, बंधु हैं छूटते।।

आज तो, शर्म से, वीर सारे गड़े।

*

है नियति, यह निठुर, पार्थ भी जानते।

भाग्य में, जो लिखा, वो हुआ मानते।।

धर्म ही, कर्म है, युद्ध पर काल है।

कौरवों, पाँडवों, का बुरा हाल है।।

मर रहे, युद्ध में, आज छोटे बड़े।

*

शक्ति पर, गर्व है, युद्ध थोपा नया।

नाश है, त्रास दें, मूढ़ भूले दया।।

रोक दो, युद्ध को, श्याम आधार हो।

हो विजय, सत्य की, झूठ की हार हो।।

गिर गये, हैं मुकुट, भ्रात मोती जड़े।

*

युद्ध की, त्रासदी, भोगते लोग सब।

धैर्य सब, खो दिया, मौत का योग अब।।

संधि की, दूर सब, देख संभावना।

चैन की, लोग बस, कर रहे याचना।।

ये कदम, क्यों भला, युद्ध के हैं पड़े।

*

यह धरा, तो बनी, देख श्मशान है।

धूल में, है मिला, राष्ट् का मान है।।

युद्ध है, हल नहीं, शांति की बात हो‌।

विश्व को, शांति की, कृष्ण सौगात हो।।

रो रही, है प्रजा, प्रण लिए क्यों कड़े।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३२७ ☆ भावना के दोहे – प्रिय ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – प्रिय)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३२७ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – प्रिय ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

रहा भटकता रात दिन, खोकर सारे होश।

ख्वाब तुम्हारे देखता, मिलने का है जोश।।

मिले सहारा आपका, बस इतनी-सी आस।

तुम्हें खोजने में लगे, यही-कहीं हो पास।।

 *

कहना तुमसे बहुत कुछ, देना स्वयं जबाव।

प्यार किया है आपसे, करना यही हिसाब।।

 *

रात घनेरी हो रही, मिल जाओ तुम आज।

अंतर्मन में प्रिय बहुत, सजा रखे हैं साज।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३०९ ☆ कविता – बढ़ती  गर्मी  अरु  महंगाई.! ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक  विचारणीय कविता  – बढ़ती  गर्मी  अरु  महंगाई.! आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३०९ ☆

कविता – बढ़ती  गर्मी  अरु  महंगाई.! ☆ श्री संतोष नेमा ☆

बढ़ती  गर्मी   अरु   महंगाई |

तेल   भी  ले  रहा  अंगड़ाई ||

नहीं  नियंत्रण  राज तंत्र का |

कौन   लगाम  लगाए  भाई ||

*

यू एस ए   ईरान  न   झुकते |

कहाँ  युद्ध  से   दोनों  रुकते |

सबकी ऊंची नाक  यहाँ  पर |

यहाँ आम जन ही सब भुगते ||

हार्मोज  पर  नजर  सभी की |

समझो  सब  इनकी  चतुराई |

बढ़ती    गर्मी    अरु  महंगाई ||

*

महंगाई   की   मार  बहुत  है |

आंसुओं  में   धार   बहुत   है ||

गर्मी   में   जब  बहे   पसीना |

लगता  है  तब  खार  बहुत है ||

बैठे   नेता   सब   ए   सी   में |

मेहनतकश  की क्या सुनवाई ||

बढ़ती    गर्मी    अरु  महंगाई ||

*

आम   आदमी    की   लाचारी |

महंगाई   जिस   पर   है  भारी ||

कैसे   चलता   घर  गरीब  का |

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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