हिन्दी साहित्य ☆ व्यंग्य / कविता ☆ एक मिनट की देरी से / एक सर्द रात की रेल यात्रा ☆ डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’

डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’ 

(डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’ पूर्व प्रोफेसर (हिन्दी) क्वाङ्ग्तोंग वैदेशिक अध्ययन विश्वविद्यालय, चीन ।  वर्तमान में संरक्षक ‘दजेयोर्ग अंतर्राष्ट्रीय भाषा सं स्थान’, सूरत. अपने मस्तमौला  स्वभाव एवं बेबाक अभिव्यक्ति के लिए प्रसिद्ध।  आज प्रस्तुत है  एक सार्थक एवं सटीक व्यंग्य  / कविता  ” एक मिनट की देरी से  / कविता “. इस रचना के माध्यम से   डॉ गंगाप्रसाद शर्मा  ‘गुणशेखर ‘ जी  ने  रेलानुभव व्यंग्य एवं कविता के साथ अपनी मौलिक शैली में बड़ी बेबाकी से  किया है। ) 

 ☆ व्यंग्य / कविता – एक मिनट की देरी से / एक सर्द रात की रेल यात्रा ☆

अभी-अभी वर्तमान में बहुमूल्य शिक्षा की काशी कहे जाने वाले (केवल शिक्षा के कारोबारियों/ माफियाओं द्वारा) कोटा जंक्शन के प्रतीक्षालय में बैठा हुआ सुखद आश्चर्य से भर उठा हूँ। एक उद्घोषणा हुई है कि एक ट्रेन( इन्दौर जोधपुर एक्सप्रेस )पूरे एक मिनट की देरी से चल रही है और उसके लिए उद्घोषिका को खेद भी है।अभी कान चौकन्ने हैं कि कहीं घंटे को मिनट तो नहीं बोला गया है या फिर मैंने ही गलत तो नहीं सुन लिया है।

जिस दिन की प्रतीक्षा थी आखिर वह दिन आ ही गया कि जब रेलवे ने भी समय की कीमत पहचानी।यह लिखते-लिखते वही स्वर पुन:कानों तक आंशिक परिवर्तन के साथ पहुँच रहा है कि वही ट्रेन पूरे सात मिनट लेट हो चुकी है।दूसरी उद्घोषणा से मिनट और घंटे में भ्रम की गुंजाइश भी खत्म हो चुकी है।

अब आश्वस्त हूँ कि विद्याबालन वाली यह बात कि ‘जहाँ सोच वहाँ शौचालय’ के बाद से आए सोच में परिवर्तन के कारण जैसे हर ग्रामीण के घर में शौचालय हो गया है और वे घर में ही उत्पादन और निष्पादन सब कुछ कर पाने में सक्षम हुए हैं।बस जुत्ताई-बुआई केलिए  ही बाहर जाना पड़ता है।अब सोच बदला है वह भी किसी खूबसूरत अदाकारा के  कहने से  तो क्या नहीं  संभव  है!कल को रोबोट और रिमोट से फसल बो भी   जाएगी और कट के घर भी  आ जाएगी।वैसे ही बिना ड्राइवर के हर ट्रेन समय पर चलेगी।

इस संदर्भ में की गई हिंदी व अंग्रेजी की उद्घोषणा को मिला लें तो कुल छह उद् घोषणाएँ हो चुकी हैं और सभी में हमें हुई असुविधा के लिए खेद व्यक्त किया गया है।

लगे हाथ एक और सुखद सूचना कि हमारी देहरादून से कोटा वाली ट्रेन बिफोर टाइम (पूरा आधा घन्टा पहले) ही कोटा जंक्शन पर लग गई थी।मैंने एहतियातन दो टिकट कर रखे थे(भारतीय रेल संबंधी अपनीभ्रांत धारणा वश)एक एसी और एक स्लीपर(बस कुछ समय कमी और कुछ  आलस बस  सामान्य टिकट लेना ही शेष था।) और दोनों कन्फर्म होकर हमारे संदेश पिटक से झाँक-झाँक कर हमें मुँह चिढ़ा रहे हैं।मैं उनके अंतर्निहित अर्थ भी समझ रहा हूँ कि,’और न कर भरोसा भारतीय रेल पर।अगर यही पाप करता रहा तो आगे भी भोगेगा।’

अभी-अभी उसी ट्रेन 12465 इन्दौर-जोधपुर एक्सप्रेस की उद् घोषणा हुई है कि वह अब भी सात मिनट की ही देरी से चल रही है और इस विश्वास के साथ हुई है कि कुछ कसर रहेगी तो शर्म के मारे शेष दूरी हांफ – हूँफ कर   दौड़ के कवर कर लेगी।

अब वह यानी12465 संयान(ट्रेन)ठीक12:39 पर )अपने स्थानक(प्लेटफॉर्म)क्रमांक1पर लग चुकी है।अब तो पूरा भरोसा हो चला है कि जैसे-जैसे स्टेशनों की पटरियों के अंतराल से मल दूर हो रहा है वैसे-वैसे हमारा रेल की स्वच्छता के प्रति विश्वास भी बढ़ रहा है।यही समय के लिए भी लागू होगा।लेकिन मुझे चिंता इस बात की है कि यदि कहीं भारतीय रेल जनरल बोगियों के प्रति भी जाग गई तो मेरी उस कविता का क्या होगा जो किसी सर्द रात के जनरल डिब्बे की यात्रा- सहचरी रही है।

अब मैं इस रेल कथा काअपनी उसी रेलानुभव वाली कविता के साथ यह कहते हुए उद्यापन करना चाहूँगा कि जैसे रेल के ‘दिन बहुरे’ सब विभागों के बहुरें।अब बिना किसी देरी और खेद व्यक्त किए वह कविता (इस घोषणा के बाद जिसकी कोई उपयोगिता नहीं रह गई है) बेज़रूरत आप पर लाद रहा हूँ-

 ☆  एक सर्द रात की रेल यात्रा   

एक सर्द रात की रेलयात्रा

करते हुए

भीड़ का सुख भोगा

परस्पर सटे तन

सुख दे रहे थे

मेरी तरह और भी दस-पांच

(बैठने की जगह

पाए लोग)

स्वर्ग में थे

बाकी टेढ़ी-मेढ़ी मुंडियों के साथ

लार की कर्मनाशा बहाते

स्वर्ग-नर्क के बीच

झूला झूल रहे थे

अचानक लगा कि

लोग अपने स्वभाव के प्रतिकूल

जागरूक हो गए हैं

और

मारकाट में फँसकर

जैसे भाग रहे हों बदहवास

नींद ऐसे टूटी कि जैसे

अभी-अभी हमारी नींद पर से ही

गुज़री हो

मालगाड़ी धड़धड़ाते हुए

हम सुपरफास्ट में बैठे-बैठे

उबासी ले रहे हैं

आखिरकार

झाँक ही लेते हैं मुण्डी लटकाकर

उत्सुकतावश

लोग बताते हैं

‘मालगाड़ी के गुज़रने से

पूरे एक घंटे पहले से

खड़ी है

जस की तस,ठस की ठस

निकम्मी मनहूस

हाँ,

बीच-बीच में गैस छोड़ कर

अपने ज़िंदा रहने का सबूत

ज़रूर दे देती है

कुर्सियों पर लदी

चौराहों पर अलाव तापती

मुर्दहिया पुलिस की तरह

तन-मन से जर्जर

बूढ़ों की तरह

ठंडी आह भी भर लेती है

यदा-कदा

ऐसे में,

ठहरी हुई ज़िंदगी से भी

सर्द लगती है

अपनी यह सवारी गाड़ी

सड़ही सुपरफास्ट?

या तो माल बहुत मँहगा हो गया है

या फिर,

इंसान इतना सस्ता

कि

चाहे जहाँ मर खप जाए

कोई नहीं लेता खबर

उसके सड़ने से पहले

ज़िंदा हो तब भी

जब चाहो,जहाँ चाहो

उसे रोक लो,उतार दो, धकिया दो,

मौका लगे थपड़िया दो

कभी-कभी बिना बेल्ट,

बिल्ले और डंडे के भी

बंदूक तो बहुत बड़ी चीज़ होती है

आम आदमी तो सींक से

और,

कभी-कभी तो छींक से भी

काँप उठता है

शायद सब व्यवस्थापक

यह भाँप गये हैं कि-

इनमें से कोई उठापटक करेगा भी तो

अपनी ही बर्थ या सीट

या ठसाठस भरे जनरल कोच की

गैलरी से लेकर-

शौचालय तक,

अपना ही साथ छोड़ रही

दाईं या बाईं टाँग पर

काँख-कूँख के खड़ा रहेगा

या लद्द से बैठ जाएगा

या फिर,

अपनी ही टाँगों की

अदला-बदली कर लेगा

या यह भी हो सकता है कि

गंदे रूमाल से नाक साँद

साँस लेने के बहाने

उतर कर बैठ जाए

बगल वाली पटरी पर,

मूँगफली के साथ समय को फोड़े

बीड़ी सुलगाए, पुड़िया फ़ाड़

मसाला फ़ाँके, तंबाकू पीटे,

सिग्नल झाँके

(नज़र की कमजोरी के कारण)

तड़ाक से उठे

फिर सट्ट से बैठ जाए

यों ही हज़ारों हज़ार कान

तरसतें रहें हार्न को

पर,

गुरुत्त्वाकर्षण से चिपकी रहे पहिया

पटरी से

गर्द-गुबार भरे

दो-चार कानों पर

नही रेंगे जूँ तो नही ही रेंगे

पहले भी

इसी तरह चलती रही है

हमारी व्यवस्था की रेलगाड़ी

अपने चमचमाते पहियों की

कर्णकटु खिर्र-खिर्र के साथ.

लेकिन,

फिर भी नहीं पालते झंझट

लोग,

नहीं उलझते अपने शुकून से

यहाँ तक कि

व्यवस्था भी नहीं चाहती छेड़ना

किसी के शुकून को।

 

डॉ. गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’

सूरत, गुजरात

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – पुनर्वास ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

आज के ही अंक में प्रस्तुत है इस कविता का कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी का अंग्रेजी भावानुवाद “Rehabilitation”.  कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी हिंदी, संस्कृत, उर्दू  एवं अंग्रेजी भाषा के ज्ञाता हैं। कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी को इस अतिसुन्दर भावानुवाद के लिए साधुवाद।  

☆ संजय दृष्टि  – पुनर्वास  ☆

‘लेखक पुनर्वास मंडल’,

तख्ती देख

मैं ठठाकर हँस पड़ा,

जो पहले कभी बस सका हो

तब तो पुनर्वास पर चर्चा हो!

©  संजय भारद्वाज, पुणे

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सामाजिक चेतना – #40 ☆ विभाजन की व्यथा ☆ सुश्री निशा नंदिनी भारतीय

सुश्री निशा नंदिनी भारतीय 

(सुदूर उत्तर -पूर्व  भारत की प्रख्यात  लेखिका/कवियित्री सुश्री निशा नंदिनी जी  के साप्ताहिक स्तम्भ – सामाजिक चेतना की अगली कड़ी में  प्रस्तुत है  हमारी और अगली  पीढ़ी को देश के विभाजन की व्यथा से  रूबरू कराती एक अत्यंत मार्मिक कविता  “ विभाजन की व्यथा ”। आप प्रत्येक सोमवार सुश्री  निशा नंदिनी  जी के साहित्य से रूबरू हो सकते हैं।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सामाजिक चेतना  #40 ☆

☆ विभाजन की व्यथा     ☆

माँ कहती थी हम भाग थे

आधे अधूरे से

लेकर दो बच्चों को साथ

सारे गहने पहन लिए थे।

एक पेटी में बांधा था सामान

बड़ी बहन डेढ़ साल की

और

बड़े भाई चार महीने के थे।

पिता की गाढ़ी कमाई से बसाया

घर-द्वार छूट रहा था।

आँगन में अपने हाथों से रोपे

तुलसी के पौधे को देख

माँ का चेहरा मुरझा गया था।

अपनी प्यारी गाय गौरी को देखकर

उसे प्यार कर वो फूट-फूट कर रोई थी।

बार-बार अपने साथ ले जाने की

जिद्द कर रही थी,

मूर्छित हो गिर रही थी।

तुम समझती क्यों नहीं

हम गौरी को नहीं ले सकते हैं,

पिता के समझाने पर भी

वो नहीं समझ रही थी।

गौरी भी निरीह आँखों से

माँ को रोता देख रही थी,

सालों का बसाया घर

एक पेटी में समाया था।

चार माह के पुत्र का पासपोर्ट नहीं था,

पिता बहुत घबराए हुए थे

सीमा पार करते ही

पुत्र को छीन लिया गया था

माँ ने चीख पुकार लगा रखी थी

बहुत मुश्किल से कुछ ले देकर

मामला निपटा था।

माँ, भाई को गोद में ले

खुशी से चूम रही थी।

बच्चे भूख से बिलख रहे थे

दूध की कौन कहे

पानी भी मुहैया नहीं हो रहा था।

माँ,भाई को छाती से लगाए हुई थी,

पिता एक हाथ से पेटी

और

दूसरे हाथ से बड़ी बहन को गोदी में कसकर पकड़े हुए थे।

ट्रेन में सफर करते हुए माँ पिताजी दोनों ही बहुत डरे हुए थे,

रास्ते भर मारकाट मची थी

लाशों के अंबार लगे थे।

किसी के बूढ़े माँ-बाप नहीं मिल रहे थे,

तो किसी के अन्य परिजन।

सब आपाधापी में आधे-अधूरे से भाग कर

अपने देश की सीमा तक पहुंचना चाहते थे।

उस मंजर को याद कर

माँ-पिताजी का  कलेजा हिल जाता था।

हम बच्चों को जितनी बार वो व्यथा सुनाते थे,

उतनी बार आँखों में आँसू छलक आते थे।

नई जगह आकर फिर से घर बसाना आसान न था,

पर देश की आजादी के साथ इस दर्द को भी निभाना था।

दोनों देश लाशों पर राज कर रहे थे।

आजादी का भरपूर जश्न मना रहे थे।

विस्थापित व्यथा से उबरने की कोशिश में तिल-तिल कर जल  रहे थे।

 

© निशा नंदिनी भारतीय 

तिनसुकिया, असम

9435533394

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हिन्दी साहित्य- कविता / दोहे ☆ आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के दोहे #20 ☆ प्रस्तुति – श्री जगत सिंह बिष्ट

आचार्य सत्य नारायण गोयनका

(हम इस आलेख के लिए श्री जगत सिंह बिष्ट जी, योगाचार्य एवं प्रेरक वक्ता योग साधना / LifeSkills  इंदौर के ह्रदय से आभारी हैं, जिन्होंने हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए ध्यान विधि विपश्यना के महान साधक – आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के महान कार्यों से अवगत करने में  सहायता की है। आप  आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के कार्यों के बारे में निम्न लिंक पर सविस्तार पढ़ सकते हैं।)

आलेख का  लिंक  ->>>>>>  ध्यान विधि विपश्यना के महान साधक – आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी 

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

☆  कविता / दोहे ☆ आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के दोहे # 20☆ प्रस्तुति – श्री जगत सिंह बिष्ट ☆ 

(हम  प्रतिदिन आचार्य सत्य नारायण गोयनका  जी के एक दोहे को अपने प्रबुद्ध पाठकों के साथ साझा करने का प्रयास करेंगे, ताकि आप उस दोहे के गूढ़ अर्थ को गंभीरता पूर्वक आत्मसात कर सकें। )

आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के दोहे बुद्ध वाणी को सरल, सुबोध भाषा में प्रस्तुत करते है. प्रत्येक दोहा एक अनमोल रत्न की भांति है जो धर्म के किसी गूढ़ तथ्य को प्रकाशित करता है. विपश्यना शिविर के दौरान, साधक इन दोहों को सुनते हैं. विश्वास है, हिंदी भाषा में धर्म की अनमोल वाणी केवल साधकों को ही नहीं, सभी पाठकों को समानरूप से रुचिकर एवं प्रेरणास्पद प्रतीत होगी. आप गोयनका जी के इन दोहों को आत्मसात कर सकते हैं :

 

आओ मानव मानवी, चलें धरम के पंथ । 

इस पथ चलते सत्पुरुष, इस पथ चलते संत ।। 

– आचार्य सत्यनारायण गोयनका

#विपश्यना

साभार प्रस्तुति – श्री जगत सिंह बिष्ट

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Jagat Singh Bisht : Founder: LifeSkills

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Past: Corporate Trainer with a Fortune 500 company & Laughter Professor at the Laughter Yoga University.
Areas of specialization: Behavioural Science, Positive Psychology, Meditation, Five Tibetans, Yoga Nidra, Spirituality, and Laughter Yoga.

Radhika Bisht ; Founder : LifeSkills  
Yoga Teacher; Laughter Yoga Master Trainer

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विशाखा की नज़र से # 26 – नमकीन नदी – स्त्रियां ☆ श्रीमति विशाखा मुलमुले

श्रीमति विशाखा मुलमुले 

(श्रीमती  विशाखा मुलमुले जी  हिंदी साहित्य  की कविता, गीत एवं लघुकथा विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी रचनाएँ कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं/ई-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती  रहती हैं.  आपकी कविताओं का पंजाबी एवं मराठी में भी अनुवाद हो चुका है। आज प्रस्तुत है  एक अतिसुन्दर भावप्रवण  एवं सार्थक रचना ‘नमकीन नदी – स्त्रियाँ। आप प्रत्येक रविवार को श्रीमती विशाखा मुलमुले जी की रचनाएँ  “साप्ताहिक स्तम्भ – विशाखा की नज़र से” में  पढ़  सकते हैं । )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 26 – विशाखा की नज़र से

☆ नमकीन नदी – स्त्रियाँ ☆

स्त्रियाँ जानती हैं कीमियागिरी

वे धागे को मन्नत में

काजल को नज़र के टीके में

नमक को ड्योढ़ी में रख

इंतज़ार काटना जानती हैं

 

वे मिर्ची और झाडू से उतारतीं हैं बुरी बला

अपनी रसोई में खोज लेतीं हैं संजीवनी

कई बीमारियों का देतीं हैं रामबाण इलाज

अपनी दिनचर्या के वृत्त में भी

साध लेतीं हैं ईश्वर की परिक्रमा

माँग लेतीं हैं परिवार का सुख

कभी – कभी वे ओढ़तीं हैं कठोरता

दंड भी देतीं हैं अपने इष्ट को

रहते हैं वे कई प्रहर जल में मग्न

 

सारे संसार को झाड़ बुहार

आहत होतीं हैं अपनों के कटाक्षों से

तब , तरल हो रो लेतीं हैं कुछ क्षण

दिखावे के लिए काटतीं हैं ‘प्याज’*

है ना ! प्रिय स्वरांगी*

प्याज के अम्ल से तानों के क्षार की क्रिया कर

वे जल और नमक बनातीं हैं,

जिसमें तिरोहित करतीं हैं अपने दुःख

बनती जातीं हैं नमकीन

तुम पुरुष, जिसे लावण्य समझते हो !

* स्वरांगी साने की चर्चित कविता प्याज

© विशाखा मुलमुले  

पुणे, महाराष्ट्र

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हिन्दी साहित्य- कविता / दोहे ☆ आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के दोहे #19 ☆ प्रस्तुति – श्री जगत सिंह बिष्ट

आचार्य सत्य नारायण गोयनका

(हम इस आलेख के लिए श्री जगत सिंह बिष्ट जी, योगाचार्य एवं प्रेरक वक्ता योग साधना / LifeSkills  इंदौर के ह्रदय से आभारी हैं, जिन्होंने हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए ध्यान विधि विपश्यना के महान साधक – आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के महान कार्यों से अवगत करने में  सहायता की है। आप  आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के कार्यों के बारे में निम्न लिंक पर सविस्तार पढ़ सकते हैं।)

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Shri Jagat Singh Bisht

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☆  कविता / दोहे ☆ आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के दोहे #19 ☆ प्रस्तुति – श्री जगत सिंह बिष्ट ☆ 

(हम  प्रतिदिन आचार्य सत्य नारायण गोयनका  जी के एक दोहे को अपने प्रबुद्ध पाठकों के साथ साझा करने का प्रयास करेंगे, ताकि आप उस दोहे के गूढ़ अर्थ को गंभीरता पूर्वक आत्मसात कर सकें। )

आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के दोहे बुद्ध वाणी को सरल, सुबोध भाषा में प्रस्तुत करते है. प्रत्येक दोहा एक अनमोल रत्न की भांति है जो धर्म के किसी गूढ़ तथ्य को प्रकाशित करता है. विपश्यना शिविर के दौरान, साधक इन दोहों को सुनते हैं. विश्वास है, हिंदी भाषा में धर्म की अनमोल वाणी केवल साधकों को ही नहीं, सभी पाठकों को समानरूप से रुचिकर एवं प्रेरणास्पद प्रतीत होगी. आप गोयनका जी के इन दोहों को आत्मसात कर सकते हैं :

 

धारे तो धर्म है, वरना कोरी बात ।

सूरज उगे प्रभात है, वरना काली रात ।।

– आचार्य सत्यनारायण गोयनका

#विपश्यना

साभार प्रस्तुति – श्री जगत सिंह बिष्ट

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – त्यौहार ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

आज के ही अंक में प्रस्तुत है इस कविता का कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी का अंग्रेजी भावानुवाद “Festival”कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी हिंदी, संस्कृत, उर्दू  एवं अंग्रेजी भाषा के ज्ञाता हैं। कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी को इस अतिसुन्दर भावानुवाद के लिए साधुवाद।  

☆ संजय दृष्टि  – त्यौहार  ☆

सड़क घेरकर खड़ी

दंगा नियंत्रक दल की गाड़ी,
चहलकदमी करते
रैपिड एक्शन फोर्स के जवान,
गाड़ियों के कागज़ात
जाँचती पुलिस,
वातावरण में अभ्यस्त
पर अबूझ-सी गंध…,
फिर कोई त्योहार
आने वाला है क्या?

 

©  संजय भारद्वाज, पुणे

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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हिन्दी साहित्य- कविता / दोहे ☆ आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के दोहे #18 ☆ प्रस्तुति – श्री जगत सिंह बिष्ट

आचार्य सत्य नारायण गोयनका

(हम इस आलेख के लिए श्री जगत सिंह बिष्ट जी, योगाचार्य एवं प्रेरक वक्ता योग साधना / LifeSkills  इंदौर के ह्रदय से आभारी हैं, जिन्होंने हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए ध्यान विधि विपश्यना के महान साधक – आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के महान कार्यों से अवगत करने में  सहायता की है। आप  आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के कार्यों के बारे में निम्न लिंक पर सविस्तार पढ़ सकते हैं।)

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Shri Jagat Singh Bisht

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☆  कविता / दोहे ☆ आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के दोहे #18 ☆ प्रस्तुति – श्री जगत सिंह बिष्ट ☆ 

(हम  प्रतिदिन आचार्य सत्य नारायण गोयनका  जी के एक दोहे को अपने प्रबुद्ध पाठकों के साथ साझा करने का प्रयास करेंगे, ताकि आप उस दोहे के गूढ़ अर्थ को गंभीरता पूर्वक आत्मसात कर सकें। )

आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के दोहे बुद्ध वाणी को सरल, सुबोध भाषा में प्रस्तुत करते है. प्रत्येक दोहा एक अनमोल रत्न की भांति है जो धर्म के किसी गूढ़ तथ्य को प्रकाशित करता है. विपश्यना शिविर के दौरान, साधक इन दोहों को सुनते हैं. विश्वास है, हिंदी भाषा में धर्म की अनमोल वाणी केवल साधकों को ही नहीं, सभी पाठकों को समानरूप से रुचिकर एवं प्रेरणास्पद प्रतीत होगी. आप गोयनका जी के इन दोहों को आत्मसात कर सकते हैं :

बाहर भीतर एक रस, सरल स्वच्छ व्यवहार ।

कथनी-करनी एक सी, यही धर्म का सार ।।

– आचार्य सत्यनारायण गोयनका

#विपश्यना

साभार प्रस्तुति – श्री जगत सिंह बिष्ट

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज # 38 ☆ भावना के दोहे ☆ डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत है  समसामयिक  “ भावना के दोहे ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 38 – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे  

 

मुझको फागुन में सरस, आती प्रिय की गंध।

गाल गुलाबी देखकर ,कर लेती अनुबंध।

 

होली के हर रंग में, मिला प्यार का रंग।

रंग बिरंगी हो गई, लगी पिया के अंग।

 

पिचकारी में भर रहा, पल पल का ये प्यार।

निकलेगी हर रंग से,  खुशियों की बौछार।

 

साजन से खुशियाँ सभी, साजन से हर रंग

डूबे रंग गुलाल में, सजनी साजन संग

 

फगुआ गाये फाग जब, बजे नगाडे ढोल।

झूम झूम सब गा रहे, मीठे तीखे बोल।

 

फगुहारे  मस्ती करें, हमजोली के संग।

होली की अनुभूति से, फड़क रहे सब अंग।

 

© डॉ.भावना शुक्ल

सहसंपादक…प्राची

प्रतीक लॉरेल , C 904, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब  9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – अभिव्यक्ति ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  – अभिव्यक्ति ☆

 

ऐसी लबालब

क्यों भर दी

अभिव्यक्ति तूने..?

बोलता हूँ तो

चर्चा होती है,

चुप रहता हूँ तो

और अधिक चर्चा होती है..!

 

©  संजय भारद्वाज, पुणे

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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