☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – ४ ☆ डॉ. शोभना आगाशे ☆
श्री रविंद्रनाथ टागोर
गुरूदेव रविंद्रनाथ टागोरांनी जवळजवळ सर्व साहित्य प्रकार हाताळले. त्यांनी कथा लिहिल्या, ज्यातील कांही जगप्रसिद्ध झाल्या. त्यांची अनेक भाषांतून भाषांतरे झाली. दूरदर्शनवर त्या कथा मालिकेच्या स्वरूपात आल्या. त्यांनी अनेक कादंबऱ्या लिहिल्या. त्यातल्या काही चित्रपटाचा साज लेऊन आल्या. त्यांचं बाल साहित्यातील योगदान देखील लक्षणीय आहे. त्यांनी निबंध, आठवणी, टीका, प्रवास वर्णनं, नाटकं व नृत्य नाटिका पण लिहिल्या. अनेक नाटकं, नृत्य नाटिकांचं रंगमंचीय सादरीकरण पण झालं. विशेष म्हणजे या नाटकांचे ते लेखक, कवी, संगीतकार इतकच नाही तर अभिनेता देखील असायचे. पण त्यांच हृदय मात्र कवीचच होतं. त्यांनी कांही दीर्घ काव्यं, खंडकाव्यं (छ. शिवाजी महाराजांवर) पण रचली.
वयाच्या पन्नाशीनंतर त्यांनी चित्रं काढायला सुरुवात केली. मात्र या कलेतील आपलं कौशल्य त्यांनी लवकरच सिद्ध केलं. त्यांच्या चित्रांचं पहिलं प्रदर्शन ‘रविंद्रनाथ – कवी व चित्रकार’ या शीर्षकासह, सन १९३० मधे पॅरिसच्या गॅलरी पिगले (Gallery Pigalle) येथे भरविण्यात आले. यामुळे त्यांच्या कलेला जागतिक ओळख मिळाली. त्यांचं काव्य व चित्रं यांतील नातं इथे सुस्पष्ट होत होतं. नंतर युरोपमध्ये त्यांची अनेक यशस्वी प्रदर्शने भरवली गेली. त्यांची चित्रे साधेपणा, सुस्पष्ट रूपे व लयबद्धता यासाठी ओळखली जात. कालांतराने त्यांच्या १५० व्या जन्मदिवसाच्या औचित्य साधून लंडनमधील ‘व्हिक्टोरिया आणि अल्बर्ट’ संग्रहालयाने टागोरांची ५० चित्रे प्रदर्शित केली होती.
टागोरांच्या साहित्याचा अभ्यास, जगातील व भारतातील अनेक विद्यापीठात आज १०० वर्षांनंतरही केला जात आहे. याबाबतीत त्यांची तुलना कालीदास, शेक्सपिअर यांच्याशी केली जाऊ शकते.
गीतांजलीतील अध्यात्म, जगन्नियंत्याची संकल्पना ही उपनिषदांवरून प्रेरित असावी. त्यामुळेच ती कालातीत आहे व देशाच्या, धर्माच्या सीमा ओलांडून ती वाचकांच्या हृदयाला भिडते. आणि त्यामुळेच हे साहित्य अजरामर असं वैश्विक साहित्य झालं आहे. ब्रिटिश युनिटेरियन ‘हिमन्स फॉर लिव्हिंग’ मधील “नाऊ आय रिकॉल माय चाइल्ड” हे स्तोत्र गीतांजलीतील गीत क्र. ९७ वर बेतलेले आहे. यावरून या साहित्याची वैश्विकता सिध्द होत नाही काय?
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☆ गीत:- १९ ☆
If thou speakest not I will fill my heart with thy silence and endure it. I will keep still and wait like the night with starry vigil and it’s head bent low with patience.
The morning will surely come, the darkness will vanish, and thy voice pour down in golden streams breaking through the sky.
Then thy words will take wing in songs from everyone of my birds’ nests, and thy melodies will break forth in flowers in all my forest groves.
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३२० ☆ सोना और सोना…
‘समय बलवान, समय का करो सम्मान’, बचपन में इस तरह की अनेक कहावतें सुनते थे। बाल मन कच्ची मिट्टी होता है, जल्दी ग्रहण करता है। जो ग्रहण करता है, वही अंकुरित होता है। जीवनमूल्यों के बीज, जीवनमूल्यों के वृक्ष खड़े करते हैं।
अब अनेक बार किशोरों और युवाओं को मोबाइल पर बात करते सुनते हैं,- क्या चल रहा है?… कुछ खास नहीं, बस टीपी।.. टीपी अर्थात टाइमपास। आश्चर्य तो तब होता है जब अनेक पत्र-पत्रिकाओं के नाम भी टाइमपास, फुल टाइमपास, ऑनली टाइमपास, हँड्रेड परसेंट टाइमपास देखते-सुनते हैं। वैचारिक दिशा और दशा के संदर्भ में ये शीर्षक बहुत कुछ कह देते हैं।
वस्तुतः व्यक्ति अपनी दिशा और दशा का निर्धारक स्वयं ही होता है। गोस्वामी जी ने लिखा है- “बड़े भाग मानुष तन पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा।।” मनुष्य तन पाना सौभाग्य की बात है। देवताओं के लिए भी यह मनुष्य योनि पाना दुर्लभ है। वस्तुत: ईश्वर से साक्षात्कार की सारी संभावनाएँ इसी योनि में हैं। ध्यान देने योग्य बात है कि यह योनि नश्वर है।
योनि नश्वर है, अर्थात कुछ समय के लिए ही मिली है। यह समय भी अनिश्चित है। किसका समय कब पूरा होगा, यह केवल समय ही जानता है। ऐसे में क्षण-क्षण का अपितु क्षणांश का भी जीवन में बहुत महत्व है। जिसने समय का मान किया, उसने जीवन का सदुपयोग किया। जिसने समय का भान नहीं रखा, उसे जीवन ने कहीं का नहीं रखा। अपनी कविता ‘क्षण-क्षण’ का स्मरण हो आता है। कविता कहती है, “मेरे इर्द-गिर्द / बिखरे पड़े हज़ारों क्षण / हर क्षण खिलते/ हर क्षण बुढ़ाते क्षण/ मैं उठा/ हर क्षण को तह कर / करीने से समेटने लगा / कई जोड़ी आँखों में / प्रश्न भी उतरने लगा / क्षण समेटने का / दुस्साहस कर रहा हूँ /मैं यह क्या कर रहा हूँ?..अजेय भाव से मुस्कराता / मैं निशब्द / कुछ कह न सका/ समय साक्षी है / परास्त वही हुआ जो/ अपने समय को सहेज न सका।”
एक प्रसंग के माध्यम से इसे बेहतर समझने का प्रयास करते हैं। साधु महाराज के गुरुकुल में एक अत्यंत आलसी विद्यार्थी था। हमेशा टीपी में लगा रहता। गुरुजी ने उसका आलस्य दूर करने के अनेक प्रयास किए पर सब व्यर्थ। एक दिन गुरुजी ने एक पत्थर उसके हाथ में देकर कहा,” वत्स मैं तुझ से बहुत प्रसन्न हूँ। यह पारस पत्थर है। इसके द्वारा लोहे से सोना बनाया जा सकता है। मैं दो दिन के लिए आश्रम से बाहर जा रहा हूँ। दो दिन में चाहे उतना सोना बना लेना। कल सूर्यास्त के समय लौट कर पारस वापस ले लूँगा।” गुरु जी चले गए। आलसी चेले ने सोचा, दो दिन का समय है। गुरु जी नहीं हैं, सो आज का दिन तो सो लेते हैं, कल बाजार से लोहा ले आएँगे और उसके बाद चाहिए उतना सोना बना कर लेंगे। पहले दिन तो सोने पर उसका उसका सोना भारी पड़ा। अगले दिन सुबह नाश्ते, दोपहर का भोजन, बाजार जाने का लक्ष्य इस सबके नाम पर टीपी करते सूर्यास्त हो गया। हाथ में आया सोना, सोने के चलते खोना पड़ा।
स्मरण रहे, यह पारस कुछ समय के लिए हरेक को मिलता है। उस समय सोना और सोना में से अपना विकल्प भी हरेक को चुनना पड़ता है। इति।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
सरस्वती साधना बुधवार 14 जनवरी से शुक्रवार 23 जनवरी तक चलेगी
इसका साधना मंत्र होगा – ॐ ऐं सरस्वत्यै ऐं नम:
मालाजप, सूर्य नमस्कार आवर्तन, आत्मपरिष्कार मूल्यांकन एवं मौन साधना के साथ सरस्वती वंदना जारी रखें
सरस्वती वंदना
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈