हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ८५ – जाने कब बदला जमाना? ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – जाने कब बदला जमाना?)

☆ लघुकथा # ८५ – जाने कब बदला जमाना? श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

“हमारे जमाने में कितना अच्छा था, सबको एक दूसरे के लिए फुर्सत थी। सब अपने आरुषि पड़ोसी तो छोड़ो पूरे मोहल्ले का हाल-चाल बता देते थे एक दूसरे के दुख- सुख में खड़े भी रहते थे।

चूल्हे में खाना बनाते थे और हर त्यौहार को एक साथ   मिलजुल कर मानते थे।

क्या हो गया माँजी आज फिर अपने जमाने की यादें ताजा हो गई क्या?

नहीं बहू बस यूं ही याद आ गई थी पता नहीं तुम्हारी बाई कब आएगी? खाना बनाएगी कि नहीं? तो तुम लोग मोबाइल से आर्डर कर देते हो।

माँ जी आपके जमाने में इतनी सुविधा कहां थी?

मां-बाप लड़कियों को पढ़ाते कहां थे. अब हम तो लड़कों से आगे निकल गए हैं। आप थोड़ा बाहर निकलो दुनिया कितनी आगे बढ़ गई है मां. बहुत खूबसूरत यह दुनिया है और अगर जमाना ना बदला होता तो आपको हम लोग यहाँ इसी मोबाइल में बाबा जी के घर बैठे प्रवचन जो आप सुनते हो यह सब कैसे सुनाते? पुराने जमाने में तो आपको भी काम करना पड़ता और मुझे भी अब हम दोनों आराम से है ना।

हां बहु तुम ठीक कह रही हो. यह जमाना ज्यादा अच्छा है हम तो तुम्हारे बाबूजी के सामने कुछ कह भी नहीं पाते थे. बदलाव हमेशा अच्छा होता है जाने कब जमाना बदल गया और जमाने के साथ हम भी बदल गये।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ७७ – ऋचाएँ… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– ऋचाएँ…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ७७ — ऋचाएँ — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

किसी शब्द — स्रष्टा ने पेड़ों की छालों में सहस्रों ऋचाएँ लिखी थीं। एक ऋषि ने उन सारी ऋचाओं का अर्थ समझ लिया। वह जानता था भविष्य में मनुष्य के हाथों पेड़ कटेंगे। पेड़ कटने से ऋचाएँ नष्ट हो जातीं। ऋषि इन ऋचाओं को नष्ट होने नहीं देता। उसने इन्हें कंठाग्र करना शुरु किया। वह साधना से वर्षों जी कर लोगों को यह अभ्यास करवाता। ये ऋचाएँ जन – जन के कंठ में पहुँच कर अनंत हो जातीं।

 © श्री रामदेव धुरंधर
20 – 09 – 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “डर” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “डर” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

वह साहब सुबह उठा। नहा धोकर , नाश्ता कर ऑफिस के लिए तैयार होने लगा कि अचानक एक जूते का तस्मा कसते कसते टूट गया। इतना समय नहीं बचा था कि बाज़ार जाकर नये तस्मे खरीद लाता। गाड़ी आकर गेट पर लग गयी थी। ड्राइवर हार्न बजाए जा रहा था। जैसे तैसे जूतों के पुराने तस्मे कसे और यह सोचकर रवाना हुआ कि शाम को लौटते वक्त नये तस्मे खरीद लेगा।

दिन भर ऑफिस में बैठे बैठे उसका ध्यान बार बार अपने एक टूटे तस्मे पर जाता रहा। वह मेज़ के पीछे जूतों को ज्यादा से ज्यादा छिपाने में लगा रहा। दूसरे कर्मचारी देखेंगे तो क्या सोचेंगे? फिर वह अपने पर मुस्कुराया भी कि हम ज़िंदगी भर यही सोचते रहते हैं कि दूसरे हमारे बारे में क्या सोचेंगे? दूसरे हमारी कोई कमी या कमज़ोरी देख लेंगे तो कैसा लगेगा? इस बात पर गौर किया उसने।

ऑफिस से छुट्टी हुई। साहब गाड़ी में सवार सीधे एक बढ़िया मार्केट में पहुंचे। बड़े बड़े शो रूम। चमचमातीं , दूधिया लाइट्स। बाहर मज़ेदार पकवान की रेहड़ियां। खूब भीड़। साहब एक शो रूम में घुसा। सेल्समैन भागा आया -कहिए साहब? कौन से ब्रांड के नये डिजायन के जूते दिखाऊं?

-मुझे जूते नहीं , सिर्फ तस्मे चाहिएं। अभी सोफे पर बैठते बैठते कहा साहब ने।

सेल्समैन ने चौंक कर देखा -साहब। यहां सिर्फ नये जूते बिकते हैं। साॅरी। आप अगले शो रूम में पता कीजिए।

दूसरे शो रूम वाले सेल्समैन ने सोफे पर बैठने का अवसर भी नहीं दिया।

तुरंत कहा -आप भी कमाल करते हो? जाइए। यहां कोई तस्मे एक्स्ट्रा नहीं बेचे जाते। आप चाहो तो नये जूते खरीदने के लिए बैठ सकते हो। नहीं तो समय खराब मत कीजिए।

शो रूम और भी थे। चमचमाते पर बिना पुराने जूतों के। वहां पुराने का कोई काम नहीं। एक शो रूम के सेल्समैन ने सबसे ज्यादा होशियारी दिखाई -क्या रखा है इन पुराने डिजाइन के जूतों में जिसके तस्मे ढूंढते फिर रहे हो? नये दिखाता हूं। खरीदिए और सारी प्राॅब्ल्म साल्व। न रहेंगे पुराने जूते न ढूंढेंगे तस्मे।

बाहर आया। देखा कि रेहड़ियों पर लोग पेपर ग्लास या पेपर प्लेट्स में मज़े में खा पी कर डस्टबिन में फेंक पैसे चुकता कर जा रहे हैं। अचानक तस्मों ने जैसे मुंह चिढ़ा कर कहा -बाबू मोशाॅय , समझे नहीं क्या? यह है नया कल्चर। यानी -यूज एंड थ्रो। ओल्ड से नो मोह। समझे क्या?

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # २४ – कथा-कहानी – राघव और विश्वास ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # २४ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ राघव और विश्वास ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

सुबह से रात तक सड़क पर अपनी गाड़ी दौड़ाते दौड़ाते राघव बुरी तरह से थक जाता था। अपने ऑटो को चार्जिंग में लगाकर खाना पीना खाकर जब वह बिस्तर पर लेटता तो उसे यह पता भी नहीं चलता कि वह जिंदा भी है। प्रत्येक दिन की भांति आज भी वह घर पहुंचा, लेकिन आज उसके लेटने का दिन नहीं था।

मुनमुनिया बुखार से तप रही थी, साथ ही साथ उसे उल्टी भी हो रही थी। अपनी मुनमुनिया को लेकर राघव और रज्जो दोनों अस्पताल की ओर भागे। पूरे दिन की कमाई के अलावा यही कोई तीन-चार सो रुपए और भी घर में थे। कुल मिलाकर लगभग 1000 ₹1200 से अधिक नहीं था।

जैसे-जैसे राघव का ऑटो आलमबाग की तरफ पढ़ रहा था, सुंदर सी मुनमुनिया की साँसे लम्बी -लंबी चलने लगी।

जरा पीछे मुड़कर देखो तो मुनमुनिया के पापा! देखो न हमारी मुनमुनिया कैसे कर रही है? इसकी सासे उल्टी चल रही है मुनमुनिया के पापा!.. राघव ने पीछे मुड़ देखा तो उसके होश उड़ गए। उससे अब ऑटो चलाए बन नहीं रहा था। किसी तरह से वह नहरिया चौराहे के पास एक बड़े नर्सिंग होम के पास पहुंचा। अस्पताल के रिसेप्शन पर बात की तो मरीज के रजिस्ट्रेशन करने की बात कही गयी। पूरे ₹500 तो रजिस्ट्रेशन में ही खर्च हो गए। अभी शेष इलाज बाकी था। राघव के पसीने छूट रहे थे आखिर वह करें तो क्या करें। इधर पैसे की तंगी उधर मुनमुनिया के लिए एक-एक पल भारी हो रहा था। राघव ने अपने कई ऑटो वाले साथियों को फोन मिलाया लेकिन लगभग सभी ने उटपटांग बातों के सिवाय कुछ भी मदद नहीं की। कई तो नशे में बुरी तरह से धुत होकर गालियां भी दे रहे थे।

राघव को अब कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। मुनमुनिया की हालत बिगड़ती चली जा रही थी। उसे वेंटिलेटर पर रखने के सिवाय कोई उपाय शेष नहीं बचा था। बड़े डॉक्टर का इंतजार था।

सर…इनके पास तो पैसे रुपए बिल्कुल नहीं है। कैसे उका इलाज किया जाए। वैसे जरुरी इंजेक्शन वगैरह तो दे दिया गया है लेकिन बच्चे की हालत ठीक नहीं है। बच्चे को अटेंड क़र रहे नर्स और अटेंडेंट ने डॉ विश्वास से यह बातें कहीं।

इस बच्चे को तत्काल वेंटिलेटर पर ले चलो। इसके अकाउंट में अभी ये ₹5000 डिपॉजिट करो, ऐसा कहते हुए डॉ. विश्वास ने नोटों की एक गड्डी नर्स के हाथ में पकड़ा दी। नर्स, अटेंडेंट और रज्जो तीनों हक्के – बक्के थे। रज्जो को विश्वास नहीं हो रहा था उसे लगा कि शायद डॉक्टर के रूप में भगवान ही आ गये। अस्पताल की ओ पी डी की बेंच पर सिसकी भरते हुए उस ऑटो ड्राइवर को डॉक्टर विश्वास ने देखक़र पहचान लिया था, जिसने एक दिन मुश्किल हालत में डॉक्टर साहब और उनके बेटे को एयरपोर्ट पहुंचाया था।

तेलीबाग और उतरेटिया के बीच जाम की स्थिति अत्यंत ही खराब थी। लगभग एक घंटे से कोई भी गाड़ी टस से मस नहीं हो रही थी। डॉ विश्वास को अपने बेटे को छोड़ने एयरपोर्ट जाना था। उनकी फ्लाइट के टेक आफ करने का समय धीरे-धीरे, नजदीक आ रहा था, लेकिन जाम खुलने का नाम नहीं ले रहा था।

हर हाल में हमें फ्लाइट पकड़ना ही होगा नहीं तो मेरा कैरियर बर्बाद हो जाएगा एक बीस बाइस वर्ष के बच्चे को ऐसा कहते हुए राघव ने सुना तो उसके कान खड़े हो गए।

क्यों साहब, बाबू ऐसा क्यों कह रहे हैं। कार की बगल में से गुजर रहे राघव ने डॉ विश्वास से पूछ लिया था।

डॉ विश्वास ने जब सारी बातें राघव से बताई तो राघव ने हाथ जोड़क़र कहा.. साहब आप अपनी कार को थोड़ा सासाइड में दबा कर इधर ही खड़ी कर दीजिए। जाम कब खुलेगा कुछ पता नहीं। मेरे साथ आईये न साहब…मैं कुछ करता हूं। राघव ने हाथ में साहब की अटैची उठाई और गली-गली होते हुए तीनों राघव के घर पहुंच गए।

यहां से गली-गली होते हुए राघव का ऑटो तेजी के साथ एयरपोर्ट की ओर भाग रहा था। सिक्योरिटी वालों ने एयरपोर्ट के पास पहुंचने ऑटो को रोका तो डॉक्टर साहब ने फ्लाइट छूटने का हवाला दिया तो उसे जाने का मौका मिला। डॉक्टर विश्वास का बेटा चेकिंग करने के बाद एयरपोर्ट के अंदर जा चुका था। उसके सपनों की उड़ान के पंख टूटने वाले थे कि राघव सचमुच राघव बन क़र आ गया था।

आज समय स्वयं को दुहरा रहा था। डॉक्टर विश्वास भगवान बन क़र आज मुनमुनिया का इलाज कर रहे थे। यह विश्वास तो राघव को भी नहीं हो रहा था।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य #२९४ – लघुकथा – ☆ प्रभाव… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा  प्रभाव…” ।)

☆ तन्मय साहित्य  #२९४

☆ प्रभाव… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

“सार्वजनिक मंचों पर तो औपचारिकता के नाते किसी की प्रशंसा करना बनता है पर ऐसी क्या विशेषता है उनके लेखन में जो हरदम, हर कहीं मुक्त कंठ से उनका गुणगान करते रहते हो तुम?”

शेखर दत्त ने कुछ उबाऊ अंदाज में प्रश्न किया अपने साथी विनय अनुरागी से।

“विशेषता उनके लेखन में तो है ही मित्रवर, पर इससे कहीं अधिक प्रभावित हूँ मैं उनके सहज सरल व सौम्य व्यक्तित्व से। उनके गंभीर, शांत व निर्मल निश्छल व्यक्तित्व का ही असर है कि उनकी सभी रचनाओं को मैं किसी तपोनिष्ठ ऋषि मुख से निःसृत मंत्र समझ कर पढ़ता हूँ, और मित्रों के बीच उनका गुणगान करते हुए उन्हें अपनी स्मृति में बनाये रखता हूँ।”

“अरे वाह, सचमुच में धन्य हो मित्र! जो तुम्हें आज के समय में ऐसे सतोगुणी सत्य निष्ठ साधक का सानिध्य मिला है।”

“और मुझे तुम्हारे जैसा आत्मीय अनुरागी सरलमना पारखी मित्र।”

व्यक्तित्व और कृतित्व की एकरूपता ही किसी के प्रति श्रद्धा भाव जगाती है।

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ३५ ☆ लघुकथा – कब्जा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय लघुकथा – “कब्जा“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ३५ ☆

✍ लघुकथा – कब्जा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

राम बिहारी त्रिपाठी जब से अधिकारी वर्ग में प्रमोट हुए तभी से वे और अधिक विनम्र हो गए।  उनमें लेशमात्र भी परिवर्तन नहीं आया। साथ के लोग कहते कि त्रिपाठी जी अब अधिकारी बन गए हो तो उसी हिसाब से रहा कीजिए। वे कहते,  रहने का कौन सा हिसाब किताब होता है। ईश्वर ने काम करने का अवसर प्रदान किया है तो पूरे मन से काम करना चाहिए, यही मेरा हिसाब किताब है और कुछ नहीं। वैसे सभी उनकी ईमानदारी, मेहनत और व्यवहार को पसंद करते थे। हर जगह और हर वर्ग में कुछ न कुछ संगठन के नाम पर भी कुछ होता रहता है। वहां भी एक अधिकारी एसोसिएशन था। एसोसिएशन के अध्यक्ष उपाध्यक्ष सचिव सहायक सचिव जैसे पदों पर अधिकारी लोग आसीन थे पर कोई काम नहीं करता था।  एक दिन लंच के समय कुछ अधिकारी बैठे हुए थे जिनमें त्रिपाठी जी भी थे।  एसोसिएशन के अध्यक्ष चौधरी साहब ने कहा, त्रिपाठी जी अब आप अधिकारी बन गए हैं तो एसोसिएशन में भी थोड़ी रुचि रखा कीजिए।  उन्होंने कहा कि जी कहिए क्या करना है। चौधरी साहब ने कहा कि आप एसोसिएशन के सचिव का काम संभाल लीजिए। बस हर महीने की आखरी तारीख को सभी अधिकारियों को फोन करके मीटिंग करना है।

त्रिपाठी जी एसोसिएशन के सचिव के रूप में काम देखने लगे। उच्च अधिकारियों के साथ बैठक में उपस्थित रहते और हैडक्वार्टर स्तर  पर भी बैठकों में रहते। समयानुसार अपनी राय देते।  वे सभी अधिकारियों के संपर्क में रहते और बैठकों के निर्णय सभी से साझा करते। सब ठीक चल रहा था। अध्यक्ष चौधरी साहब रिटायर होने वाले थे। कई अधिकारी अध्यक्ष बनना चाहते थे पर उनके पास एसोसिएशन के लिए समय नहीं था। एक अधिकारी त्रिपाठी जी के प्रति कुछ अधिक ही अच्छा व्यवहार करने लगे और उनके हर काम में सहयोग का वादा करने लगे। दोनों साथ साथ चाय पीते। त्रिपाठी जी उनसे बहुत प्रभावित हो गए और सोचने लगे कि अध्यक्ष के चुनाव में उनके नाम का प्रस्ताव रखेंगे तो ठीक रहेगा।

महीने के आखिरी दिन बैठक के साथ साथ एसोसिएशन का वार्षिक अधिवेशन भी हुआ जिसमें त्रिपाठी जी ने चौधरी साहब की जगह अध्यक्ष पद के लिए उक्त अधिकारी के नाम का प्रस्ताव रखा और सभी ने उनके प्रस्ताव का समर्थन किया और अध्यक्ष का मनोनयन हो गया।  महीने की आखरी तारीख को त्रिपाठी जी महाप्रबंधक के चैंबर के आगे से निकल रहे थे तो उन्होंने चैंबर से निकलते हुए नवनिर्वाचित अध्यक्ष को देखा तो वे बोले कि आज आखिरी तारीख है शाम को एसोसिएशन की बैठक के लिए सभी को फोन कर दिया है। नवनिर्वाचित अध्यक्ष थोडे मुस्कुराए और बोले, काहे की बैठक। मैं महाप्रबंधक के साथ बैठक करके ही आ रहा हूँ। सबको क्यों परेशान करते हैं। यह सुनकर त्रिपाठी जी स्तब्ध रह गए और एक संस्था पर एक व्यक्ति का कब्जा होते हुए देखते रहे।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – मैं कहाँ हूँ? ☆ सुश्री मनवीन कौर पाहवा ☆

सुश्री मनवीन कौर पाहवा

(ई-अभिव्यक्ति में सुश्री मनवीन कौर पाहवा जी का हार्दिक स्वागत। आप सेवानिवृत प्रधानाध्यापिका एवं अध्यक्ष तथा विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रिय मंचों की सदस्या, संचालिका व आतिथेय। प्रकाशन – काव्य संग्रह – ‘तरुवर’, ‘शाख़ के पत्ते’  व ‘रंगोली’। लघुकथा संकलन -‘कृति’। यात्रा संस्मरण – ‘यादों की पिटारी’, समीक्षा – देवी नागरानी जी के काव्य संग्रह ‘ माटी कहे कुम्हार से’। आलेख – शिक्षा व महिला सशक्तिकरण में प्रथम हस्ताक्षर । १११ संस्मरण पुस्तक में संस्मरण प्रकाशित। १००० कवियों का काव्य संग्रह  मेरा अक्स में कविता। लंदन से प्रकाशित पत्रिका पुरवाई में लघु कथा , कहानी व कविताओं का प्रकाशन। लोकमत, सत्य शोधक, पंजाब सौरभ,  हस्ताक्षर, साहित्य सागर, अन्य पत्र -पत्रिकाओं व साँझा संकलनों में कविता, लघु कथा, कहानी आदि का प्रकाशन। आल इंडिया रेडियो से कविताओं व साक्षात्कार का सीधा प्रसारण। लघुकथा व बाल गीत के लिए ‘उत्कृष्ट सृजन’ पुरस्कार व ‘श्री काव्य कनक साहित्य सम्मान‘। माँ भारती कविता महायज्ञ व वाणी माँ भारती  में संचालन और सहभागिता व ‘काव्य सारथी सम्मान। ।स्टोरी मिरर द्वारा बाल  कहानी लेखन प्रतियोगिता में सम्मान पत्र, अन्तराष्ट्रीय शब्द सृजन सम्मान, ‘आउट्स्टैंडिंग विनर‘ व अन्य पुरस्कार।)

☆ लघुकथा – मैं कहाँ हूँ? सुश्री मनवीन कौर पाहवा

नन्ही कन्नू सोच रही थी। कितना अच्छा लगता था ना जब मैं सारा दिन माँ का आँचल पकड़कर घर भर में घूमा करती थी। पानी में खेलती थी तो माँ मुझे झिड़कती थीं। बाहर धूप में भी नहीं जाने देती थी। रह रह कर मुझे गले लगाकर मेरी प्यारी कन्नू कहकर लाड़ जताती थी। ये जब से छोटा मुन्ना आया है। माँ उसी को गोदी में लेकर बैठी रहती हैं। ना मुझे बाहर जाने पर देखती हैं ना ही लोरी सुनाकर सुलाती हैं। ज़िद करती हूँ तो डाँटती हैं। पापा भी जब आए थे तो मुन्ना को ही प्यार कर रहे थे। मुझे कोई प्यार नहीं करता।

नानी भी कुछ नहीं कहतीं ना गोदी में उठाती हैं ना कुछ कहती है। बस खाना खाने के लिए बुलाती हैं। मैं तो अभी तीन साल की भी नहीं हुई। मुझे सब क्यों भूल गए।

आज मौसी आई हैं। वो भी मुन्ना को ही गोद में लेकर बैठी हैं। सब बातें करते रहते हैं। रात भी हो गई। मेरी तरफ़ किसी का ध्यान ही नहीं है। लो बत्ती चली गई। पहले अँधेरा होने पर माँ दौड़ कर मुझे ढूँढती थीं। अब दौड़ कर मुन्ना को उठा रही होंगीं। उसने घबरा कर जोर से कहा,” माँ, मैं कहाँ हूँ। ”

आवाज़ सुनते ही सब चौंक गए।

© सुश्री मनवीन कौर पाहवा

२५/८/२५

मुंबई, महाराष्ट्र (भारत)

 मो- 8600027018, Email- manveenkaurjp@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ८४ – जीवन का सबक… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – जीवन का सबक।)

☆ लघुकथा # ८४ – जीवन का सबक श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

आज मन बहुत उदास है, जाने क्यों पुरानी बातें आज बहुत याद आ रही हैं। मां बाबूजी की गाड़ी 4:00 बजे स्टेशन में आ जाएगी। पतिदेव लेकर उन्हें घर पर 5:00 बजे तक आ जाएंगे। हमने शादी अपने मन से की थी। हम दोनों नौकरी करते हैं वह गांव के हैं उन्हें हमारा इस तरह से रहना अच्छा नहीं लगता। वे शादी के सख्त खिलाफ थे आज 10 साल के बाद उन्हें हमारी याद आई है।

फिर अचानक वह सोचने लगती है कि- मेरी क्यों याद आई? वे अपने बेटे और पोते उज्जवल को देखने आए हैं।

भाई को भी हफ्ते भर की छुट्टी दे दी है ऑफिस का काम भी घर से करना है जाने कैसे सब होगा?

तभी अचानक गाड़ी रूकती है और वह साड़ी पहन कर सिर पर पल्लू रखकर दरवाजा खोलती है और अपने सास ससुर को चरण स्पर्श कर प्रणाम करती है।

और तुरंत रसोई में जाकर मिठाई, नमकीन और पानी रखती है और चाय बनाने के लिए रसोई में जाती है।

तभी अचानक उसकी सास कहती है- अरे तुम्हें इतना सब आता है यह तो हमें पता ही नहीं था चाय भी तुम बना लेती हो?

सारे घर का काम खुद करती हो हमें तो लगा नौकर चाकर होंगे?

तभी ससुर जी ने बड़े प्यार से सर पर हाथ फेरा और कहा बेटी हमारे लिए तुम्हें साड़ी पहनने की कोई आवश्यकता नहीं है जैसे कपड़े पहनती हो वैसे पहनो और आराम से रहो मैं तुम्हारी शादी के खिलाफ था पर अब  बदल गया हूं।

तुम्हारे देवर और नंद ने मुझे बहुत कुछ सिखा दिया उनकी शादी मैंने अपनी मर्जी से की पर आज तक उनसे मुझे कोई इज्जत नहीं मिली तुम्हारी मां को तुम्हारी घर गृहस्थी और फोटो को देखने का बहुत मन था आप जीवन के कितने दिन बचे हैं इसलिए हम लोग यहां पर कुछ दिनों के लिए आए पर तुम्हें मिलकर और यह तुम्हारा स्वभाव देखकर ऐसा लगा कि हमने इतने सालों तक ऐसी गलती क्योंकि?

किसी को भी देखे बिना उसके बारे में हमें राय नहीं बननी चाहिए थी। जीवन तो चलता ही रहता है बस खुश रहना चाहिए। जीवन का यह सबक बहुत देर से हमें मिला पर मिल ही गया चलो हम सब मिलकर आज बाहर खाना खाकर आते हैं।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४१ – तिलांजलि ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा तिलांजलि”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४१ ☆

🌻लघु कथा 🤲 तिलांजलि 🤲

पितृपक्ष का कड़ुवा माह। धर्म और आस्था को मानते – आज वह फिर जलाशय में जाकर कुश, तिल, जवा, चाँवल के दाने अंजलि भर तिलांजलि दे रहा था। मानो अपने पाप का प्रायश्चित कर रहा हो। निर्मल जल की धार में खड़े होकर मांग रहा था– हे प्रभु मेरे गुनाहों को माफ कर देना। मुझे अगले जन्म में फिर से अपनी माँ की कोख से जन्म ले सकूं। उसकी सेवा कर सकूं। इस जन्म में तो मैंने उन्हें बहुत कष्ट दिया है।

पंडित जी मंत्रोच्चार कर रहे थे– आपके इस पुण्य प्रताप से आपके माता जी को भगवान श्री हरि के धाम में जगह मिले।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “जो भूला नहीं” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “जो भूला नहीं” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

– बेटा केशी! जल्द घर आ जाओ।

मां बुरी तरह सुबकती हुई फोन पर कह रही थी।

– क्यों? क्या हुआ?

– तुम्हारे छोटे भाई ने मुझे बैठक में अलग कर दिया है और अपनी रोटी पानी भी मैं ही बना कर खाती हूं। क्या करूं? बुढ़ापा पेंशन में कहीं गुजारा होता है! तुम आ जाओ बस।

– मैं कैसे आ सकता हूं मां?

– क्यों? तूने भी आंखें फेर लीं मां से?

– नहीं। पर मैं इतनी दूर जो हूं। छुट्टी लेनी पड़ेगी। मिले न मिले। बच्चों के पेपर हैं।

– जाओ फिर भूल जाओ मां को!

– ऐसे न कहो मां! मेरी मजबूरी को समझो। मैं जल्द आकर तुम्हें ले आऊंगा। फिर तो खुश?

– हां। जल्द आ जाना।

सुबकती सुबकती मां फोन रख गयी।

फिर जरूरत ही न रही लाने की।

कुछ दिन बाद मां दम तोड़ गयी थी। भाई ने बुलाया और सब काम धाम छोड़कर भागा!

काश! पहले …!

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares