हिंदी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – बेटा तो है ना ! ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ लघुकथा ☆ बेटा तो है ना ! ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

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शलभ– यार मृतका मिसेज माला का बेटा तो है ना !

प्रतीक– हां है तो —

शलभ–फिर उन्हें सबसे छोटी बेटी ने ही मुखाग्नि दी और कपाल क्रिया भी उसी ने की !

प्रतीक–शायद तुम कुछ भी नहीं जानते ।

शलभ– बरसों पहले ये लोग हमारे पड़ोसी हुआ करते थे। काफी अच्छे रिश्ते थे परिवार से। फिर बरसों बीत गये। मेरा ट्रान्सफर होता रहा — अब लौटकर इसी शहर में आ गया हूं। मुझे स्टाफ के एक सदस्य ने बताया जो उनका रिश्तेदार है। मालाजी के निधन का ऐसे पता चला।

प्रतीक– अब मुझसे सुनो— मालाजी तीसरे एक्सीडेंट के बाद जिन्दा लाश में तब्दील हो चुकी थीं। बेटे बहू ने  पाँच वर्ष तक खूब सेवा की। बेटा मलय पांच वर्ष तक बोलता था। फिर किसी बीमारी के बाद उसकी आवाज़ और सुनने की क्षमता भी चली गयी। उसने स्वयं गूँगा होने के कारण गूँगी लड़की से  ही शादी की।

शलभ—फिर

प्रतीक— फिर क्या! बहू भी पोस्ट ऑफिस में सर्विस करती थी। देखा नहीं  मालाजी की अंतिम यात्रा की तैयारी के समय बहू की मूक बधिर सहेलियां ही लगभग सारा काम संभाल रही थीं।

शलभ–सचमुच अत्यन्त करुण कथा है।

प्रतीक– आगे भी है शलभ। बेटे बहू ने  क्रिश्चियन धर्म स्वीकार कर लिया इस तकलीफ के साथ कि बरसों तक पूजा पाठ पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ करने के बाद भी  इस भगवान ने हमें क्या दिया–केवल जानलेवा दर्द।

शलभ की आँखों में अब किसी सवाल के लिए कोई जगह नहीं बची थी।

☆

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

नागपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ३१ ☆ लघुकथा – अफसोस… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “अफसोस… “।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ३१ ☆

✍ लघुकथा – अफसोस… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

राज कमल किसी काम से अहमदाबाद गए तो काम पूरा होने के बाद अपनी बेटी के यहां चले गए। उनकी बेटी श्वेता का विवाह अहमदाबाद में एक सुशील कुमार के साथ हुई थी। सुशील एक होनहार इंजीनियर थे और सूरत में तैनात थे। अहमदाबाद में उनका अपना घर था। घर में माता पिता के साथ उनकी पत्नी श्वेता व पुत्री रहती थी। श्वेता पढ़ी लिखी थी और विवाह से पहले शिक्षिका थी। पर विवाह होने के बाद उसने नौकरी नहीं की। सास ससुर की सेवा और अपनी तीन वर्षीय बेटी के लालन पालन को अधिक महत्व दिया। उसकी सास उसके सेवा कार्य से बहुत खुश थीं और खुशी खुशी श्वेता की दिनचर्या बता दी कि वह सुबह अपनी बेटी को स्कूल पहुंचा कर दूध लेती आती है। आकर चाय बनाती है और सास ससुर के लिए नहाने के पानी गरम करती है। खुद नहा धोकर नाश्ता बनाती है। सास ससुर को नाश्ता कराकर बेटी को स्कूल से लेने जाती है और लौटते हुए सब्जी वगैरह भी लेती आती है। फिर घर आकर खाना बनाती है और सास ससुर को खाना खिला कर बेटी का होमवर्क पूरा कराती है।

बेटी का होमवर्क पूरा कराते और उसे खिलाते पिलाते शाम के चार बज जाते हैं जो चाय का समय होता है। चाय पिलाकर बेटी को पार्क में खेलने के लिए ले जाती है। बेटी खेलते खेलते थक जाती है तो उसे घर लेकर आती है और उसके सोने से पहले खाना खिला देती है। फिर घर का भोजन बनाती है और समय पर सास ससुर को भोजन कराकर दवा वगैरह खिला देती है। फिर स्वयं भोजन करती है। भोजन के बाद सवेरे की तैयारी करके सोने का समय मिल पाता है। रसोई झाड़ू पोंछा बर्तन साफ करने के बाद दिन में समय मिलता है तो मशीन में कपड़े डालती है और रात में सोने से पहले सुखाने डाल देती है। उसके नाश्ते भोजन और आराम का कोई समय नहीं है। बहुत मेहनत करती है।

राज कमल से बेटी की  सास बोली, “समधी जी, आपने श्वेता को बहुत अच्छे संस्कार दिए हैं। हमारा बेटा बाहर नौकरी करता है पर श्वेता के कारण हमें उसकी कमी महसूस नहीं होती।” राज कमल मुस्कुरा कर रह गए। दूसरे दिन उन्होंने श्वेता की दिनचर्या देखी तो परेशान हो गए। क्योंकि दिनचर्या वैसी ही थी जैसा सास ने बताया। बेटी को बिल्कुल आराम न मिल पाने पर उन्हें बहुत दुख हुआ। वे सोचने लगे कि सुशील को अच्छा वेतन मिलता होगा। कम से कम झाड़ू पोंछा और बर्तन मांजने के लिए कामवाली रख सकते हैं। अपनी बेटी को नौकरानी जैसी स्थिति में देख कर दुखी होते रहे।  ऊपर से उसकी सास के बोल, “अरे श्वेता बेटी थोड़ा आराम कर लो और अपने पिताजी के पास थोड़ा बैठ लो” उनके घाव पर नमक छिड़कने लगे, क्योंकि श्वेता तो मशीन की तरह लगी रहती, उसके आराम की बात तो किसी के मन में आती ही नहीं। वे बेटी को दिए संस्कारों पर मन ही मन अफसोस करने लगे। राज कमल बेटी के यहां एक दिन और रुक गए। शाम को बाहर से आए तो उनके साथ एक औरत थी।  उसकी ओर इशारा करते हुए श्वेता से बोले, “बेटी कल से ये तुम्हारे यहां झाड़ू पोंछा और बर्तन साफ किया करेंगी। कुछ और भी मदद ले सकती हो। इनका वेतन मैं दिया करूंगा।” श्वेता “पापा” कह कर उनसे लिपट गई और सास ससुर मूक दर्शक बने खड़े थे। राज कमल का अफसोस धीरे धीरे पिघलने लगा।

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© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ८१– समझदारी… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – समझदारी।)

☆ लघुकथा # ८१ – समझदारी ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

मेरे पड़ोस में शिवानी आंटी रहती है। किसी के घर का कोई भी सामान देखती हैं और उन्हें अच्छा लगता है तो वह अपने घर जरूर खरीद कर ले आती। मेरी मां सविता जो कि दिखावेपन से बिल्कुल बहुत दूर रहती हैं और उनका सारा वक्त उनके बालकनी में लगे हुए फूलों के पौधों में ही जाता है। उन्हें फूल लगाने का बहुत शौक है। भगवान को भी चढ़ाने के लिए मिल जाता है और बालकनी में पूरे समय महक बनी रहती है। मोगरा, चमेली, गुलाब, गुड़हल आदि उन्होंने फूलों को गमले में ही लगा कर रखे थे। बालकनी भी बहुत सुंदर लगती थी।

मां की पड़ोस की कुछ सहेलियां उस दिन मिलने के लिए आई। उन्होंने कहा कि सविता हम तुम्हारी बालकनी में ही बैठ कर चाय पिएंगे। ऐसा लगता है कि किसी बगीचे में बैठे हैं और हम कुछ सेल्फी भी खींच लेंगे यहां पर फोटो बहुत अच्छी आएगी। उन्होंने शिवानी आंटी को आवाज दिया – शिवानी क्या कर रही हो? हम सब यहाँ मिलकर सेल्फी भी खींच रहे हैं तुम भी आओ देखो सविता की बालकनी कितनी सुंदर है यह सुनते हुए उनको बहुत बुरा लगा। उन्होंने कहा- मुझे बहुत काम है अभी मुझे बाहर जाना है। ऐसा कह कर वह अंदर चली गई और कुछ देर बाद वे कहीं जाने के लिए तैयार हो गई फिर वे कहीं चली गई। मेरी मां की सहेलियां भी चली गई। शिवानी आंटी ने बालकनी में बहुत सारे प्लास्टिक के फूलों को लगा लिया। बालकनी सजा कर मेरी मां को सविता ओ सविता आओ दोपहर में तुम अपनी बालकनी मुझे दिखा रही थी सुंदर फूल यहां देखो तुम्हारी फूलों से भी सुंदर मेरे पास फूल है और इन्हें पानी देने की भी जरूरत नहीं है और यह फूल कभी मुरझाएंगे नहीं। हमेशा यह फूल हरे भरे रहेंगे और किसी बात का कोई टेंशन ही नहीं रहेगी। मेरी बालकनी हमेशा फूलो से भरी रहेगी तुम्हारी बालकनी में तो कभी कभी फूल खिलते भी नहीं है। फालतू के काम करने पड़ते हैं मेरी मां ने कहा शिवानी सचमुच तुम्हारी बालकनी बहुत सुंदर लग रही है मेरी बालकनी से बहुत अच्छी है, और यह फूल अच्छे हैं कभी नहीं मर जाएंगे। पर क्या वह आनंद भी दे पाएंगे जो जीवित फूल मुझे देते हैं? शिवानी आंटी निरुत्तर होकर मेरी मां को एकटक देखती रह गई।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २३८ – अनंत शुभकामनाएं ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “अनंत शुभकामनाएं”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २३८ ☆

🌻लघु कथा🌻 अनंत शुभकामनाएं 🌻

सोशल मीडिया पर वायरल बधाईयाँ, फूल- पत्ती, भगवान के चित्र, फिल्मी गाने के बोल – – – क्यों कि बधाईयाँ और शुभ मंगल भाव, ह्रदय से नहीं केवल डिलीट और फारवर्ड पर टिका है।

चरण स्पर्श कर दीर्घायु हों, स्वस्थ जीवन का आशीर्वाद अब सपना हो गया। किसी को मिला भी तो डिलीट और फारवर्ड 🙏

अब सिर्फ किस्से कहानियों पर ही सिमट चला। सारी बधाईयाँ और मंगल भाव।

Congratulations for both of you. God bless you. बस यही देखते रह गये।

सोहन मेसेज लिख रहा था – – पत्नी ने खूब सारा प्यार और दुलार के साथ आशीर्वाद लिखवा रही थी बेटा बहु को।

क्या? मैने जैसा कहा – आपने वो सब लिख दिया। सोहन इसके पहले कुछ बोलता बेटे का मेसेज आया – – – Happy Ganesh!!

चुपचाप लिखे मेसेज को डिलीट कर सोहन लिख दिए – – – Same to you

ऐ जी खूब सारा आशीर्वाद लिखे कि नहीं? जैसा तुम चाहती थी मैने वो सब लिख दिया।

आप कितने अच्छे हैं, चरण छूते भगवती ने पति से कहा-पति देव गले लगाते, अश्रु छुपाते बोले–तुम्हारी सारी इच्छाएं पूर्ण हो।

☆

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका#७४ – महाजनी… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– महाजनी…” ।) 

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ७४ — महाजनी — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

महाजन ने जहाँ – जहाँ पैसा दिया था बीमारी और बुढ़ापे से त्रस्त होने पर मूल और सूद यथाशीघ्र समेटा। एक दिन शायद उसने सपने में पत्नी से कहा, “मुझसे पैसा लेती हो। अरी पगली, मूल न लौटाओ, लेकिन सूद तो देना।” एकदम अशक्त हो जाने पर महाजन दिनों पलंगजीवी बना रहा कि पत्नी ने अचानक ही कहा, “लो जी मैं सूद देती हूँ।” आश्चर्य, महाजन को बहुत सुकून पहुँचा। शायद उसका प्राणांत होने में अब आसानी होती।

© श्री रामदेव धुरंधर

20 – 08 – 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – आत्म-बोध ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम विचारणीय लघुकथा आत्म-बोध।

☆ लघुकथा – आत्म-बोध ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त और ऐश्वर्यवान प्रसन्ना के जीवन में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था कि एक दिन अचानक उसके जीवन से शांति ग़ायब हो गई। उसकी अच्छी-ख़ासी ज़िंदगी में उथल-पुथल मच गई। वह समझ नहीं पा रहा था कि आखिर शांति उसे बिना बताए कहाँ छोड़कर चली गई है। आज के माहौल को देखते हुए बार-बार उसके मन में यह संदेह पैदा हो रहा था कि कहीं किसी दुष्ट-दुर्जन ने उसका अपहरण तो नहीं कर लिया है।

प्रसन्ना ने थाने में जाकर शांति के ग़ायब हो जाने की रपट लिखवाई। पर जैसाकि आमतौर पर होता है पुलिस ने  उसको ढाढ़स बँधाते हुए आश्वस्त किया कि हम अपनी ओर से शांति को खोजने का भरसक प्रयास करेंगे और जैसे ही कहीं से कोई सूचना मिलेगी श्रीमान को सूचित कर दिया जाएगा। दूसरी ओर प्रसन्ना ने अपनी ओर से जान-पहचान वालों और नाते रिश्तेदारों को फ़ोन कर शांति के बारे में पूछताछ की, अख़बारों में शांति के ग़ायब हो जाने के इश्तहार छपवाए, पर शांति का कहीं कोई सुराग नहीं मिला। उधर साल भर बीत जाने के बाद भी पुलिस की ओर से कोई सूचना नहीं मिली।

आखिर एक दिन थक-हारकर प्रसन्ना ने ईश्वर के समक्ष अपनी ओर से शांति की खोज के तमाम हथियार डाल दिए। उसी रात प्रसन्ना के सपने में शांति प्रकट हुई और उससे बोली- ‘मेरे प्रिय प्रसन्ना ! मेरा ना तो किसी ने अपहरण किया था और न ही मैं तुम्हें कहीं छोड़कर गई थी। पर जब मैंने देखा कि तुम मुझे और अपने बच्चों को छोड़कर अपने नाम, व्यवसाय, प्रसिद्धि और धन-दौलत को प्यार करने लगे, बात-बात पर मुझे अपमानित और उपेक्षित करने लगे, तो दरअसल तुम्हारे भीतर आत्मबोध जाग्रत हो इसलिए कुछ समय के लिए तुमको अकेला छोड़कर अंतर्ध्यान हो गई थी ताकि तुम्हें इस बात का अहसास हो सके कि जीवन में धन-दौलत अहम है अथवा अपने आत्मीय और सुख-शांति…!

प्रसन्ना मैं चाहती हूँ कि तुम सदैव प्रसन्न रहो। तुम कल भी मेरे आत्मीय थे, आज भी हो और आगे भी रहोगे। मैं अनादि काल से तुम्हारे ह्रदय में मौजूद हूँ। वो तो एक तुम ही थे, जो मुझे विस्मृत कर बैठे थे।

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© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # 153 ☆ लघुकथा – थाप ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘थाप‘। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 154 ☆

☆ लघुकथा – थाप ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

दिन-भर मशीन की मानिंद वह एक के बाद एक, घर के काम निबटाती जा रही थी। उसका चेहरा भावहीन दिख रहा था। बातचीत भले ही कर रही थी लेकिन स्वभाव में कुछ उदासी थी। मन ही मन वह झुँझला भी रही थी। छोटे भाई की शादी थी। घर में हँसी मजाक का माहौल था। किन्तु उसमें वह शामिल नहीं हो रही थी। वह शायद वहाँ पर रहना भी नहीं चाह रही थी।

“कुमुद ऐसी तो नहीं थी, क्या हो गया इसे?” उसकी उम्र ढ़ली अविवाहित बड़ी बहन से मैंने पूछा।

“अरे कोई बात नहीं, थोड़ी मूडी है।” कहकर उसने भी बात टाल दी।

मुझे खटक रहा था कि शादी लायक दो बड़ी बहनों के रहते, छोटे भाई की शादी की जा रही है? लड़कियाँ खुद ही शादी करना ना चाहें, सो अलग बात है लेकिन जानते-बूझते उनकी उपेक्षा करना सही नहीं है।

“खैर छोड़ो, दूसरे के फटे में पैर क्यों अड़ाना !”

शादी के घर में रिश्तेदारों का जमावड़ा था। महिला संगीत चल रहा था। साथ में स्त्रियों की शोख अदाएँ और फुसफुसाहट भी जारी थी। किसी एक ने कहा–“बिनब्याही जवान दो बहनें घर बैठी हैं और कई साल छोटे भाई की शादी की जा रही है?” दूसरी बोली–“बड़ी तो अधेड़ दिखने लगी है। कुमुद के लिए भी नहीं सोचा जा रहा।” ढ़ोलक की थाप पर नाच-गाना तो चल ही रहा था, निंदारस भी खुलकर बरस रहा था।

“अरे कुमुद ! अबकी तू उठ, बहुत दिनों से तेरा नाच नहीं देखा। ससुराल जाने के लिए थोड़ी प्रैक्टिस कर ले।” बुआ ने हँसी में व्यंग्य बाण छोड़ दिया–“अब कुमुद के लिए भी लड़का देख लो, नहीं तो यह भी कोमल की तरह बुढ़ा जाएगी। फिर कोई दूल्हा इसे नहीं मिलेगा।” ढ़ोलक की थाप थम गई। बात हिय में चटाख से लगी।

नाचने के लिए उठे कुमुद के कदम, वहीं थम गए। लेकिन चेहरा खिल गया–“किसी ने तो दिल की बात कही। फिर वह उठी और दिल खोलकर नाचने लगी।

कुमुद की माँ ननद रानी से उलझ गई–“बहन जी ! आपको रायता फैलाने की क्या जरूरत है। सबके सामने ये बातें छेड़कर। इत्ता दान-दहेज कहाँ से लाएँ? दो-दो लड़कियों के हाथ पीले करना, कोई आसान है? ऐरे-गैरों के घर जाकर किसी दूसरे की जी-हुजूरी करने से तो अच्छा है, अपने छोटे भाई का परिवार ही पालें। छोटे को सहारा भी रहेगा? उसकी नौकरी भी पक्की नहीं है। कोमल तो समझ गई लेकिन कुमुद के दिमाग से शादी का फितूर उतर नहीं रहा। खैर…जाने दो !”

ढ़ोलक की थाप, सुर में गाती औरतों की आवाजें और तालियों के बीच, इन बातों से अनजान कुमुद मगन-मन नाच रही थी।

© डॉ. ऋचा शर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – सर्व धर्म प्रार्थना ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – सर्व धर्म प्रार्थना ? ?

सर्व धर्म प्रार्थना का एक अनूठा आयोजन एक दुर्गम ग्लेशियर के निकट रखा गया था। विभिन्न‌ धर्मों के देश-विदेश में बसे  चुनिंदा अनुयायियों को इसमें सम्मिलित किया गया था। इन यात्रियों का दल दुर्गम हिमनद की ओर बढ़ रहा था। एकाएक हिम की सतह दरक गई और खाईनुमा गहरा गढ्ढा बन गया। दल गढ्ढे में गिर पड़ा।

हाहाकार मच गया। फिर कुछ समय के लिए यात्रियों के गढ्ढे में गिरने पर चर्चा चली। तत्पश्चात पर्वतारोहियों में हिंदू, मुसलमान, ईसाई, सिख, पारसी, यहूदी, बौद्ध, जैन, ताओ, शिंटो, कन्फ्यूशियिस्ट गिने जाने  लगे।

फिर भी मन ना भरा तो विभिन्न धर्मों के यात्रियों के संप्रदाय, जातिगत वर्ग गिने जाने लगे। कुछ ने सवर्ण, दलित, अगड़ा, पिछड़ा, आदिवासी की माइक्रो काउंटिंग शुरू की तो कुछ ने मूल निवासी, आक्रमणकारी, आर्य-अनार्य की गणना भी कर डाली।

अपनी-अपनी जगह बैठे लोग मनुष्य और मनुष्य के बीच की खाई को चौड़ा करते रहे। उधर खाई में पड़े पर्वतारोहियों ने मानव शृंखला बनाई, एक दूसरे का हाथ पकड़ा और बाहर निकल आए।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  गोविन्द साधना शुक्रवार 15 अगस्त से गुरुवार 21 अगस्त तक चलेगी। 🕉️

💥 इस साधना मेंॐ गोविंदाय नमः का मालाजप होगा साथ ही वल्लभाचार्य जी द्वारा रचित मधुराष्टकम् का पाठ भी करेंगे। 💥 

💥 संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ८०– उपहार… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – उपहार।)

☆ लघुकथा # ८० – उपहार ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

“आज पार्टी में जाना है। मैं तो तैयार हूं, तुम भी तैयार हो जाओ। बाहर से लाने को कहा था क्या कुछ लाये हो?”

“हाँ रागिनी में लेकर आया हूं यह पांच सुंदर फूलों के पौधे हैं, इनमें से जो चाहे तुम घर में रख लो और एक दो पौधे उपहार में दे देते हैं।”

“सुंदर पौधे लाये हो ना ..?  या जैसे सब्जी वाले से दया खाकर सब्जियां ले लेते हो, या कुछ भी?” गुस्सा होते हुए जोर से रागिनी ने कहा।

“उपहार में तो फूलों का गुलदस्ता  ही अच्छा लगता है।”

“कोई बात नहीं मेरे पास एक सुंदर सा पर्स रखा है उसको पैक करके और  गुलाब, मोगरा, गेंदा गुड़हल और रजनीगंधा फूलों के पौधे  दे  देती हूँ, इन्हें कौन रखेगा फालतू की झंझट अपनी अलग डालो?”

“क्यों .. ऐसे क्यों कह रही हो ?”

“पूजा के लिए फूल तो तुम्हें मिलेंगे साथ ही साथ बाल में भी लगा सकती हो” अरुण ने मुस्कुराते हुए कहा।

“गुलदस्ते तो सूख जाते हैं तो हम इधर-उधर फेंक देते हैं फूल तो हमारे सच्चे साथी हैं। फूलों की खुशबू के साथ बालकनी में बैठकर चाय पियेंगे और  भीनी- भीनी महक पूरे घर में रहेगी।”

“अरे लेकिन तुम्हारी बहन तो मुझे चार बातें सबके सामने सुना कर बेज्जती करेगी।”

“ठीक है मैं तैयार होने जाता हूँ तुम्हारी जो समझ में आए वह करो।”

“जब दोनों उपहार लेकर गए तो फूल देखकर उनकी बहन बहुत खुश हुई। बोली – “बहुत ही सुंदर उपहार लाई हो भाभी।”

सारे लोग देखकर खुश हो गए और जोर से ताली भी बजाने लगे।  आपस में सभी ने यही प्रण किया, कि हम एक दूसरे को माला और गुलदस्ते के बजाय एक पौधा गिफ्ट किया करेंगे।

रागिनी ने कहा- “हां मैंने इसीलिए तुम्हारे भैया से  मंगवाई यह उपहार हम आपके लिए लाये हैं।”

अरुण मुस्कुराते हुए अपनी बहन को देखा और बोला चलो केक काटते हैं।

पौधों का उपहार देना हमारे जीवन के लिए बहुत अच्छा है मन भी खुश रहता है और घर की भी सौंदर्यता बढ़ती है।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २३७ – बड़बोली ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित लघुकथा “बड़बोली”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २३७ ☆

🌻लघुकथा 🌻बड़बोली🌻

 सभी जगह फोटो खिंचवाना, इंस्टाग्राम, फेसबुक पर अपलोड करना ही उसका काम था। जहाँ मुफ्त की मिले वहाँ आँख नचाते पहुंच जाना।

मै तो ऐसे ही हूँ – – उसकी गंदी सोच को जानते हुए भी कई लोग उसकी संस्था में जुड़े ।

कुछ हो चाहे न हो, कुछ करें या न करें, मौके का फायदा उठाना, किसी के सरल सहज व्यक्तित्व को तीखी बातें चुभाते उसकी मानवीय सोच बनते जा रही थीं।

बड़बोली बनते आज वह अपने ही जाल में फँसते चली। बात किसी से नहीं छुपी। दुनिया गोल है, छोटी सी जिन्दगी और जरा सा समय, हवा में फैलते देर न लगी इसने तो मानवता को शर्मसार किया है। जिसका खाया उसी पर छेद किया।

आपस में बाकी सभी बात करते दिखे।बड़बोली कहते रही मै तो ऐसी ही हूँ।

बड़बोली को कौन मुँह लगे। सभी ने आजकल जैसा रिवाज है अपना अपना फोन नं रिमूव करते उसे ब्लाक किया।

बाल झटकती, आँख मटकाते बड़बोली किसी दूसरे शिकार पर निकल चली।

☆

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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