(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “वाइन और अजवाइन…“।)
अभी अभी # ९१२ ⇒ आलेख – वाइन और अजवाइन श्री प्रदीप शर्मा
आप चाहें इसे स्वदेशी और विदेशी इलाज कहें, औषधि और शराब कहें, अथवा दवा दारू कहें, एक ही बात है। बीमार होने पर दवा दारू तो सभी को लेनी पड़ती है। यह अलग बात है, कुछ लोग दवा से ठीक हो जाते हैं तो कुछ लोग दारू पीकर बीमार। वाइन किसी के लिए दवा है और किसी के लिए दारू। एलोपैथी में सभी बीमारियों का हल, कम अल्कोहल।
आपने छोटे बच्चों को देखा होगा। उन्हें तो चम्मच से दवा भी पिलाना मुश्किल हो जाता है। वे दवा के नाम से ही इतने डरे हुए होते हैं, मानो कोई उनके मुंह में जबर्दस्ती शराब की कुछ बूंदें डाल उन्हें बिगाड़ रहा है। उनकी नाक बंद कर, रोते हुए उनके मुंह में दवा का घूंट पहुंचाया जाता है। भले ही बड़ा होकर वह पूरी बोतल डकार जाए।।
अगर आप वाइन को शराब कहेंगे तो हम अजवाइन को औषधि कहेंगे। आपके दर्द की दवा अगर वाइन है तो हमारे पेट दर्द की दवा अजवाइन है। यह अगर सच है कि हमारी सरकार आपके लिए देशी और विदशी शराब की दुकानें खुलवाती हैं, तो इससे बड़ा सच यह है कि हमारी अजवाइन नमक की तरह, हर किराने की दुकान पर आसानी से उपलब्ध है।
यह दवा ही नहीं, हमारे रसोई घर की मसालदानी का श्रृंगार भी है।
एक फिल्म अमर प्रेम आई थी, जिसमें कॉमेडियन ओमप्रकाश पानी पूरी में पानी की जगह पताशे में शराब भरकर पीते थे। हम लोग बेसन के पकौड़ों में अजवाइन का प्रयोग करते हैं। वाइन का कोई पौधा नहीं होता, अजवाइन का होता है। कौन सुबह सुबह मुंह कड़वा करे, हम तो अजवाइन से मुखशुद्धि करते हैं। मुंह भी साफ और पेट भी साफ।।
दवा के रूप में अजवाइन उपलब्ध है मगर फिर भी इंसान वाइन के पीछे भागता है। एक ओर वाइन के विज्ञापन पर विदेशी और देशी कंपनियां इतना खर्च करती है, सरकार शराब के ठेकों से रेवेन्यू कमाती है और दूसरी ओर हमारी अजवाइन पूरी तरह स्वदेशी और आत्म निर्भर है। हमारी अजवाइन की सरकार सिर्फ दादी मां के अचूक नुस्खों पर ही चल रही है।
वाइन कड़वी होती है, लेकिन अजवाइन इतनी कड़वी भी नहीं होती। सुनते हैं, वाइन में नशा होता है। याद आते हैं वे दिन, जब मां के हाथ के मोटे मोटे गद्दे और गड्ढों वाले अजवाइन के घी वाले गर्मागर्म पराठों के साथ कभी घर का निकाला मक्खन तो कभी दही और सर्दियों में जब चाय का प्याला साथ आता था, तो वह नशा अजवाइन का था, या मां के हाथ का, कुछ पता ही नहीं चलता था।
आज मां की जगह हाथ किसी का भी हो, अजवाइन का स्वाद और नशा वही है।
जहां अजवाइन के साथ मां की याद भी जुड़ी हो, वहां सेहत ही सेहत है, स्वाद ही स्वाद है, नशा ही नशा है। मेरी हमेशा की हमसफर, डिवाइन अजवाइन।
बड़ा अच्छा लगता है, जब वाइन एंड डाइन फूड रेस्तरां से निकलते वक्त काउंटर पर, ट्रे में रखी सिकी सौंफ, दालचीनी, तिल्ली और अजवाइन पर, ग्राहकों को संतुष्टि से, हाथ मारते देखता हूं। वाइन है जहां, अजवाइन भी है वहां।।
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३२३ ☆ दरवाज़े…
एक समय था जब लोगों के घरों के दरवाज़े दिन भर खुले रहते थे। समय के साथ विचार बदले, स्थितियाँ बदलीं और अब अधिकांश घरों के दरवाज़े बंद रहने लगे हैं।
सुरक्षा की दृष्टि से दरवाज़ा बंद रखना समकालीन आवश्यकता हो सकता है। तथापि स्थूल का प्रभाव, सूक्ष्म पर भी होता है।
एक प्रसंग सुनाता हूँ। एक धनी व्यक्ति एक महात्मा के पास आया। धनी का महल आलीशान था। उसके मन में इच्छा हुई कि अपना महल महात्मा को दिखाए। बहुत ना-नुकर के बाद महात्मा उसका महल देखने के लिए राजी हो गए। धनी ने जब अपना महल महात्मा को दिखाया तो वे हँस पड़े। धनी आश्चर्यचकित हुआ। फिर तनिक नाराज़गी के साथ बोला, ” महात्मन! यह दुनिया का सबसे सुरक्षित महल है।” महात्मा ने पूछा, “कैसे?” धनी बोला,” मैंने इसके सारे दरवाज़े चुनवा दिये हैं। इसमें केवल एक ही दरवाज़ा रखा है जिसके चलते शत्रु का भीतर प्रवेश करना असंभव-सा हो चला है।” इस बार महात्मा ठहाका लगाकर हँसे। फिर बोले, ” यह एक दरवाज़ा भी क्यों छोड़ दिया? यदि इसे भी बंद कर दो तो शत्रु का तुम तक पहुँचना असंभव-सा नहीं अपितु असंभव ही होगा।” धनी ने महात्मा के ज्ञान के कई प्रसंग लोगों से सुने थे। उसे लगा, सारे प्रसंग झूठे हैं। महात्मा तो सामान्य बात भी समझ नहीं पाते। सो चिढ़कर बोला, “महात्मन, यदि यह एकमात्र दरवाज़ा भी बंद कर दिया तब तो मेरे प्राण जाना निश्चित है। ऐसी सूरत में यह महल, महल न रहकर कब्र में बदल जाएगा।” इस बार गंभीर स्वर में महात्मा बोले, ” जब तुझे बात का भान है कि एक दरवाज़ा बंद करने से तेरी मृत्यु हो जाएगी तो इतने सारे दरवाज़े बंद करके कितनी बार मर चुका है तू?”
ध्यान देनेवाली बात है कि दरवाज़े सर्वदा बंद रखने के लिए होते तो बनाये ही क्यों जाते? उनके स्थान पर भी दीवारें ही खड़ी की जातीं।
दरवाज़े बार-बार खुलते रहने चाहिएँ, ताज़ा हवा का झोंका भीतर आते रहना चाहिए। खुले दरवाज़ों से नयापन और ताज़गी भीतर आते रहते हैं, प्रफुल्लता बनी रहती है।
…अंतिम बात, घर के हों या मन के, यह सूत्र दोनों प्रकार के दरवाज़ों पर लागू होता है।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
सरस्वती साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बुद्धिजीवी और विलासिता…“।)
अभी अभी # ९११ ⇒ आलेख – बुद्धिजीवी और विलासिता श्री प्रदीप शर्मा
यहाँ हम बुद्धि-विलास की बात नहीं कर रहे। बुद्धि और विलासिता की बात कर रहे हैं। किसी के पास अगर बुद्धि है, और पैसा नहीं है, तो वह कहाँ का बुद्धिजीवी। क्या बुद्धिजीवी झुग्गी -झोपड़ी अथवा पंचम की फेल में रहता है।
खुदा जब हुस्न देता है, तो नज़ाकत आ ही जाती है। बहुत से पैसे वालों को यह कहते सुना है, पैसा कमाने में अकल लगती है ! पैसे झाड़ पर नहीं उगते। हमारा पैसा है, हम उड़ा रहे हैं, तुम्हारे पेट में क्यूँ दर्द हो रहा है।।
वैसे अक्लमंद को बुद्धिजीवी नहीं कहते। एक बुद्धिमान व्यक्ति और बुद्धिजीवी में अंतर करना इतना आसान भी नहीं होता। जो अंतर चाय और कॉफ़ी में होता है, वही अंतर एक अक्लमंद और बुद्धिजीवी में होता है। चाय सड़क किनारे किसी भी ठेले पर पी जा सकती है, कॉफ़ी के लिए कॉफ़ी हाउस है न !
कॉफ़ी हाउस में केवल कॉफी नहीं पी जाती, बहुत कुछ होता है। राजनीति पर, मार्क्स, लेनिन पर, गर्मागर्म बहस होती है। प्याले में तूफान उठता है, कॉफ़ी के खत्म होते ही थम जाता है।
अगर कॉफ़ी खत्म नहीं होती, तो अब तक कई क्रांतियाँ हो चुकी होती।।
बुद्धि और ज्ञान का भी पूरब और पश्चिम का संग है। बुद्धि हमें पश्चिम की ओर ले जाती है और ज्ञान पश्चिम को पूरब की ओर वापस खींचता है। योग से भोग की राह पश्चिम है, और भोग से योग की राह पूरब। बुद्धि का स्वामी विद्वान भी कहलाता है, और संस्कृत का जानकार प्रकांड विद्वान। विद्यालंकार जैसे नाम अपने आप में अलंकार होते हैं।
बुद्धि को आप रस और विलास से जुदा नहीं कर सकते। विद्वान रसिक होते हैं, और बुद्धिजीवी विलासी। हो सकता हो, विद्वान और बुद्धिजीवी में हिंदी अंग्रेज़ी का भेद हो। बुद्धिजीवी को अंग्रेज़ी आती है और ग़ज़ब की आती है।।
जहाँ बुद्धिजीवी है, वहाँ हेमिंग्वे के शब्दों में wining, dining, concubining है। एक प्रेरणा होती है, जिसे प्रेमिका कहा जाता है, बुद्धिजीवी रखैल जैसे घटिया शब्द पसंद नहीं करते। मी टू में सब कुछ बयां हो जाता है।
न जाने क्यूँ, बुद्धि को सृजन से जोड़ दिया गया है और सिगरेट और शराब को सृजन से। जहाँ धुआं है, वहाँ आग है, सीने में जलन है। यही आग, यही जलन सृजन है। एक बुद्धिजीवी का आदर्श काफ़्का, सार्त्र, नीत्शे और मार्क्सहै। कुंठा, संत्रास और शून्यता का अहसास ही बुद्धिजीविता है। यहाँ सूरज की रोशनी में नहीं, अंधेरे बंद कमरों में सृजन होता है, यहाँ के सूरजमुखी अंधेरों में खिलते हैं। एक चिथड़ा सुख ही उसकी नियति है। यहाँ सभी अपने अपने अजनबी हैं, बंद गली का आखरी मकान ही बुद्धिजीवी का असली मुकाम है।।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “शिलान्यास, उद्घाटन और लोकार्पण…“।)
अभी अभी # ९१० ⇒ आलेख – शिलान्यास, उद्घाटन और लोकार्पण श्री प्रदीप शर्मा
शिलान्यास उसे कहते हैं, जब किसी भी निर्माण के पहले एक शिला पर किसी गणमान्य व्यक्ति का नाम अंकित होता है, तिथि और तारीख के साथ। इससे एक संकेत ज़रूर हो जाता है, कि यहाँ निर्माण अवश्य होगा। शिलान्यास कोई साधारण व्यक्ति का, आम भूमि-पूजन नहीं होता, एक असाधारण घटना होती है, जिसकी खबर अखबारों तक में स्थान पा जाती है। शिलान्यास, विकास का प्रथम सोपान है।
शिलान्यास और निर्माण के बीच कई प्रशासनिक बदलाव आ जाते हैं, मंत्री, अफसर, यहाँ तक कि ठेकेदार भी बदल जाते हैं। फिर भी कभी द्रुत गति से तो कभी कछुए की चाल से, निर्माण कार्य का शुभारंभ हो ही जाता है। सरकारी बजट और ठेकेदार के बजट के सहारे विकास की इमारत बुलंद हो, उद्घाटन के लिए तैयार हो ही जाती है।।
बड़े काम के लिए बड़े व्यक्तियों को ही याद किया जाता है। मज़दूर का पसीना बह चुका, जितना पैसा बहना था, बह चुका, अब जनता की चीज़ जनता को समर्पित होना है, जो किसी प्रमुख सेवक का फर्ज बनता है कि वह फीता काटकर, उद्घाटन की औपचारिकता पूरी करे।
उद्घाटन और लोकार्पण में वही अंतर है जो हार फूल से स्वागत, और माल्यार्पण में है। इसे लोकतंत्र की भाषा में तेरा तुझको अर्पण कहते हैं। लोकहित में जो भी विकास अथवा महत निर्माण कार्य होता है, उसका लोकार्पण भी कोई विकास पुरुष ही करता है।।
ये सभी कार्य एक आम आदमी, मज़दूर अथवा समाज के किसी गणमान्य व्यक्ति से भी करवाए जा सकते हैं, लेकिन राज्यपाल, मुख्यमंत्री, राष्ट्रपति अथवा प्रधानमंत्री के रहते यह कार्य किसी और से कैसे करवाया जा सकता है। कुछ परम्पराएं हैं, मान्यताएँ हैं, भाषण देने की, सरकार की नीतियों की व्याख्या करने की, जो न तो एक आदमी समझ सकता है, न अपने शब्दों में व्यक्त कर सकता है। राजनैतिक सूझबूझ का तकाजा है कि सामान्य व्यक्ति पर यह भारी भरकम ज़िम्मेदारी न सौंपी जाए।
बड़ा कष्ट होता है जब हमारे प्रधान सेवक इन महत्वपूर्ण कार्यों के सम्पादन के लिए कश्मीर से कन्याकुमारी तक चंद घंटों में पहुँच कर अपने कर्त्तव्य का निर्वहन करते हैं। खून-पसीना एक होता है, तब जाकर एक लोकार्पण सम्पन्न होता है। यह कोई बच्चों का खेल नहीं कि एक फीता काटा, और खेल खतम।।
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख स्वार्थ-नि:स्वार्थ। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३०८ ☆
☆ स्वार्थ-नि:स्वार्थ… ☆
‘बिना स्वार्थ आप किसी का भला करके देखिए; आपकी तमाम उलझनें ऊपर वाला सुलझा देगा।’ इस संसार में जो भी आप करते हैं; लौटकर आपके पास आता है। इसलिए सदैव अच्छे कर्म करने की सलाह दी जाती है। परन्तु आजकल हर इंसान स्वार्थी हो गया है। वह अपने व अपने परिवार से इतर सोचता ही नहीं तथा परिवार पति-पत्नी व बच्चों तक ही सीमित नहीं रहे; पति-पत्नी तक सिमट कर रह गये हैं। उनके अहम् परस्पर टकराते हैं, जिसका परिणाम अलगाव व तलाक़ की बढ़ती संख्या को देखकर लगाया जा सकता है। वे एक-दूसरे को नीचा दिखाने व प्रतिशोध लेने हेतु कटघरे में खड़ा करने का भरसक प्रयास करते हैं। विवाह नामक संस्था चरमरा रही है और युवा पीढ़ी ‘तू नहीं, और सही’ में विश्वास करने लगी हैं, जिसका मूल कारण है अत्यधिक व्यस्तता। वैसे तो लड़के आजकल विवाह के नाम से भी कतराने लगे हैं, क्योंकि लड़कियों की बढ़ती लालसा व आकांक्षाओं के कारण वे दहेज के घिनौने इल्ज़ाम लगा पूरे परिवार को जेल की सीखचों के पीछे पहुंचाने में तनिक भी संकोच नहीं करतीं। कई बार तो वे अपने माता-पिता की पैसे की बढ़ती हवस के कारण वह सब करने को विवश होती हैं।
स्वार्थ रक्तबीज की भांति समाज में सुरसा के मुख की भांति बढ़ता चला जा रहा है और समाज की जड़ों को खोखला कर रहा है। इसका मूल कारण है हमारी बढ़ती हुई आकांक्षाएं, जिन की पूर्ति हेतु मानव उचित-अनुचित के भेद को नकार देता है। सिसरो के मतानुसार ‘इच्छा की प्यास कभी नहीं बझती, ना पूर्ण रूप से संतुष्ट होती है और उसका पेट भी आज तक कोई नहीं भर पाया।’ हमारी इच्छाएं ही समस्याओं के रूप में मुंह बाये खड़ी रहती हैं। एक के पश्चात् दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है तथा समस्याओं का यह सिलसिला जीवन के समानांतर सतत् रूप से चलता रहता है और मानव आजीवन इनके अंत होने की प्रतीक्षा करता रहता है; उनसे लड़ता रहता है। परंतु जब वह समस्या का सामना करने पर स्वयं को पराजित व असमर्थ अनुभव करता है, तो नैराश्य भाव का जन्म होता है। ऐसी स्थिति में विवेक को जाग्रत करने की आवश्यकता होती है तथा समस्याओं को जीवन का अपरिहार्य अंग मानकर चलना ही वास्तव में जीवन है।
समस्याएं जीवन की दशा व दिशा को तय करती हैं और वे तो जीवन भर बनी रहती है। सो! उनके बावजूद जीवन का आनंद लेना सीखना कारग़र है। वास्तव में कुछ समस्याएं समय के अनुसार स्वयं समाप्त हो जाती हैं; कुछ को मानव अपने प्रयास से हल कर लेता है और कुछ समस्याएं कोशिश करने के बाद भी हल नहीं हो पातीं। ऐसी समस्याओं को समय पर छोड़ देना ही बेहतर है। उचित समय पर वे स्वत: समाप्त हो जाती हैं। इसलिए उनके बारे में सोचो मत और जीवन का आनंद लो। चैन की नींद सो जाओ; यथासमय उनका समाधान अवश्य निकल आएगा। इस संदर्भ में मैं आपका ध्यान इस ओर दिलाना चाहती हूं कि जब तक हृदय में स्वार्थ भाव विद्यमान रहेगा; आप निश्चिंत जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते और कामना रूपी भंवर से कभी बाहर नहीं आ सकते। स्वार्थ व आत्मकेंद्रिता दोनों पर्यायवाची हैं। जो व्यक्ति केवल अपने सुखों के बारे में सोचता है, कभी दूसरे का हित नहीं कर सकता और उस व्यूह से मुक्त नहीं हो पाता। परंतु जो सुख देने में है, वह पाने में नहीं। इसलिए कहा जाता है कि जब आपका एक हाथ दान देने को उठे, तो दूसरे हाथ को उसकी खबर नहीं होनी चाहिए। ‘नेकी कर और कुएं में डाल’ यह सार्थक संदेश है, जिसका अनुसरण प्रत्येक व्यक्ति को करना चाहिए। यह प्रकृति का नियम है कि आप जितने बीज धरती में रोपते हैं; वे कई गुना होकर फसल के रूप में आपके पास आते हैं। इस प्रकार नि:स्वार्थ भाव से किए गये कर्म असंख्य दुआओं के रूप में आपकी झोली में आ जाते हैं। सो! परमात्मा स्वयं सभी समस्याओं व उलझनों को सुलझा देता है। इसलिए हमें समीक्षा नहीं, प्रतीक्षा करनी चाहिए, क्योंकि वह हमारे हित के बारे में हम से बेहतर जानता है तथा वही करता है; जो हमारे लिए बेहतर होता है।
‘अच्छे विचारों को यदि आचरण में न लाया जाए, तो वे सपनों से अधिक कुछ नहीं हैं’ एमर्सन की यह उक्ति अत्यंत सार्थक है। स्वीकारोक्ति अथवा प्रायश्चित सर्वोत्तम गुण है। हमें अपने दुष्कर्मों को मात्र स्वीकारना ही नहीं चाहिए; प्रायश्चित करते हुए जीवन में दोबारा ना करने का मन बनाना चाहिए। वाल्मीकि जी के मतानुसार संत दूसरों को दु:ख से बचाने के लिए कष्ट सहते हैं और दुष्ट लोग दूसरों को दु:ख में डालने के लिए।’ सो! जिस व्यक्ति का आचरण अच्छा होता है, उसका तन व मन दोनों सुंदर होते हैं और वे संसार में अपने नाम की अमिट छाप छोड़ जाते हैं।
दूसरी ओर दुष्ट लोग दूसरों को कष्ट में डालकर सुक़ून पाते हैं। परंतु हमें उनके सम्मुख झुकना अथवा पराजय स्वीकार नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वीर पुरुष युद्ध के मैदान को पीठ दिखा कर नहीं भागते, बल्कि सीने पर गोली खाकर अपनी वीरता का प्रमाण देते हैं। सो! मानव को हर विषम परिस्थिति का सामना साहस-पूर्वक करना चाहिए। ‘चलना ही ज़िंदगी है और निष्काम कर्म का फल सदैव मीठा होता है। ‘सहज पके, सो मीठा होय’ और ‘ऋतु आय फल होय’ पंक्तियां उक्त भाव की पोषक हैं। वैसे ‘हमारी वर्तमान प्रवृत्तियां हमारे पिछले विचार- पूर्वक किए गए कर्मों का परिणाम होती हैं।’ स्वामी विवेकानंद जन्म-जन्मांतर के सिद्धांत में विश्वास रखते थे। सो! झूठ आत्मा के खेत में जंगली घास की तरह है। अगर उसे वक्त रहते उखाड़ न फेंका जाए, तो वह सारे खेत में फैल जाएगी और अच्छे बीज उगने की जगह भी ना रहेगी। इसलिए कहा जाता है कि बुराई को प्रारंभ में ही दबा दें। यदि आपने तनिक भी ढील छोड़ी, तो वह खरपतवार की भांति बढ़ती रहेगी और आपको उस मुक़ाम पर लाकर खड़ा कर देगी; जहां से लौटने का कोई मार्ग शेष नहीं दिखाई पड़ेगा।
प्यार व सम्मान दो ऐसे तोहफ़े हैं, अगर देने लग जाओ तो बेज़ुबान भी झुक जाते हैं। सो! लफ़्ज़ों को सदैव चख कर व शब्द संभाल कर बोलिए। ‘शब्द के हाथ ना पांव/ एक शब्द करे औषधि/ एक शब्द करे घाव।’ कबीर जी की यह उक्ति अत्यंत सार्थक है। शब्द यदि सार्थक हैं, तो प्राणवायु की तरह आपके हृदय को ऊर्जस्वित कर सकते हैं। यदि आप अपशब्दों का प्रयोग करते हैं, तो दूसरों के हृदय को आहत करते हैं। इसलिए सदैव मधुर वाणी बोलिए। यह आप्त मन में आशा का संचरण करती है। निगाहें भी व्यक्ति को घायल करने का सामर्थ्य रखती हैं। दूसरी ओर जब कोई अनदेखा कर देता है, तो बहुत चोट लगती है। अक्सर रिश्ते इसलिए नहीं सुलझ पाते, क्योंकि लोग ग़ैरों की बातों में आकर अपनों से उलझ जाते हैं और जब कोई अपना दूर चला जाता है, तो बहुत तकलीफ़ होती है। परंतु जब कोई अपना पास रहकर भी दूरियां बना लेता है, तो उससे भी अधिक तकलीफ़ होती है। इसलिए जो जैसा है; उसी रूप में स्वीकारें; संबंध लंबे समय तक बने रहेंगे। अपने दिल में जो है; उसे कहने का साहस और दूसरे के दिल में जो है; उसे समझने की कला यदि आप में है, तो रिश्ते टूटेंगे नहीं। हां इसके लिए आवश्यकता है कि आप वॉकिंग डिस्टेंस भले रखें, टॉकिंग डिस्टेंस कभी मत रखें, क्योंकि ‘ज़िंदगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं जो मुक़ाम/ वे फिर नहीं आते।’ इसलिए किसी से अपेक्षा मत करें, बल्कि यह भाव मन में रहे कि हमने किसी के लिए किया क्या है? ‘सो! जीवन में देना सीखें; केवल तेरा ही तेरा का जाप करें– जीवन में आपको कभी कोई अभाव नहीं खलेगा।’
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पढ़े-लिखे लोग…“।)
अभी अभी # ९०९ ⇒ आलेख – पढ़े-लिखे लोग श्री प्रदीप शर्मा
हमारे समाज में तीन तरह के लोग रहते है ! काला अक्षर, साक्षर और पढ़ा-लिखा। काला अक्षर को आप निरक्षर भी कह सकते हैं। आरंभ में सभी काला अक्षर होते हैं। अक्षर ज्ञान होते ही वे साक्षर हो जाते हैं। जब वे पढ़ना और लिखना सीख जाते हैं, तो पढ़े-लिखे कहलाते हैं।
यह पढ़ना और लिखना इतना आसान भी नहीं ! बिना पढ़े लिखना नहीं आता। अ के साथ अनार और अं के साथ अंगूर देखकर अक्षर ज्ञान होता है। जो पढ़ा है, वह लिखकर भी बताना पड़ता है। जो पढ़ा है, उसकी परीक्षा लिखकर देनी होती है। उत्तीर्ण होने पर पढ़ाई जारी रहती है। अनुत्तीर्ण होने पर पढ़ाई रुक जाती है। आदमी पढ़ा-लिखा कहलाने से वंचित हो जाता है।।
जो पढ़-लिख कर आगे बढ़ जाते हैं, वे पढ़े-लिखे इंसान कहलाते हैं। जो पढ़-लिखकर भी आगे नहीं बढ़ पाते, लोग उन्हें पढ़ा-लिखा मानने से इंकार कर देते हैं। इतनी पढ़ाई-लिखाई किस काम की, इससे तो घास ही छीलते, तो अच्छा था। वैसे राग दरबारी में घास छीलने को पीएचडी करना कहा गया है, लेकिन आजकल पीएचडी करना, घास छीलना जितना आसान भी नहीं।
एक पढ़े-लिखे इंसान से लोग दुनिया भर की उम्मीदें लगाए बैठे होते हैं, यह ये कर लेगा, यह वो कर लेगा। इसको देखो, उसको देखो। कोशिश करने वाले की कभी हार नहीं होती। जब तक वह कुछ कमाता-धमाता नहीं, लोग उसे पढ़ा-लिखा मानने से इंकार कर देते हैं, लानत है ! पढ़े-लिखे हो, कुछ करते क्यों नहीं !और जैसे ही उसकी एक अच्छी नौकरी लगी, वह एक अच्छा पढ़ा- लिखा, काबिल इंसान बन जाता है।।
जो ज़्यादा पढ़-लिख नहीं पाते, लेकिन किसी पुश्तैनी धंधे में महारत हासिल कर लेते हैं, अच्छा पैसा कमा लेते हैं, वे पढ़े-लिखे लोगों के लिए आदर्श साबित होते हैं। तुमने पढ़-लिखकर, इतने साल की नौकरी में क्या तीर मार लिया। महेश को देखो, एक कपड़े की दुकान से आज छः दुकानें खड़ी कर ली।
पढ़ाई के साथ इंसान में दिमाग भी होना चाहिए। आर्थिक रूप से सम्पन्न होना एक पढ़े-लिखे इंसान की पहली शर्त है। लोग डॉक्टर, इंजीनियर और चार्टर्ड अकाउंटेंट को अधिक पढ़ा-लिखा मानते हैं। प्रोफेसर, पत्रकार और लेखक भी पढ़े-लिखों की जमात में ही आते हैं।
राजनीति और समाज सेवा एक आदर्श प्लेटफार्म है, जिस पर बिना भेदभाव और ऊंच-नीच के कोई भी व्यक्ति, साधारण शिक्षा के बल पर भी, अपना स्थान बना सकता है। मोदीजी, बाबा आमटे, अन्ना हजारे, बाबा रामदेव और कैलाश सत्यार्थी जैसे कई ज्वलंत उदाहरण हमारे सामने हैं, जिन्होंने जन-जागरण और सामाजिक उत्थान में अपना अमूल्य योगदान दिया है।।
एक पढ़े-लिखे इंसान से यह उम्मीद भी होती है कि वह समझदार और ईमानदार भी हो। समझदारी और ईमानदारी की कोई डिग्री नहीं होती, कोई यूनिवर्सिटी नहीं होती। समाज में विसंगतियों के लिए जितना एक कम पढ़ा-लिखा जिम्मेदार है, उतना ही एक अधिक पढ़ा-लिखा भी। आज समाज को जितना खतरा चोर-डाकुओं से नहीं, उससे अधिक खतरा भ्रष्ट और बेईमानों से है।
एक पढ़ा-लिखा आदमी अगर रिश्वत लेता और देता है, एक व्यापारी अगर मिलावट और बेईमानी से पैसा कमाता है, तो
दोनों ही देश के दुश्मन हैं। ईमानदारी ही देशभक्ति है, राष्ट्रीयता है। अगर आप ईमानदार हैं तो पढ़े लिखे, समझदार हैं, अन्यथा जाहिल गँवार और देशद्रोही हैं।।
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “जहाँ गिरते पत्ते रचते हैं: नया बसंत…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २७६ ☆जहाँ गिरते पत्ते रचते हैं: नया बसंत… ☆
वह घर किसी बंद गली में नहीं था। लोग आते-जाते रहते थे, आवाज़ें भी थीं, हलचल भी। फिर भी वह घर अपने आप में बहुत पुराना और ठहरा हुआ-सा था—जैसे समय ने उसे धीरे-धीरे संभालकर रखा हो। उसके आँगन में एक विशाल नीम का पेड़ खड़ा था। कोई ठीक से नहीं जानता था कि वह कितना पुराना है—बस इतना तय था कि घर बनने से बहुत पहले भी वह वहीं था, और हम सबकी कई पीढ़ियों से पहले के लोग भी उसे वैसे ही देखते आए थे।
वह पेड़ सिर्फ़ पेड़ नहीं था—वह परिवार का ही एक सदस्य था। उसकी छाँव में बैठना, उसके नीचे लेटना, उसके पत्तों को गिरते देखना—सब कुछ जीवन का हिस्सा था। जब वह बहुत घना हो जाता, तो उसे थोड़ा कटवा दिया जाता। कटी हुई टहनियाँ दो-तीन दिन आँगन में पड़ी रहतीं, और उन्हीं के बीच हम बच्चे छोटे-छोटे घर बनाकर खेलते। आज भी वह दृश्य कहीं भीतर ज्यों का त्यों रखा है।
हर साल ऋतुएँ आती-जाती रहीं। तब हमें बस इतना पता था कि कभी नीम के पत्ते झरते हैं, और कुछ समय बाद वह फिर से हरा-भरा हो जाता है। बसंत आता, तो उसकी डालियाँ नई कोपलों से भर जातीं। और जब पत्ते गिरते, तो आँगन जैसे धीरे-धीरे एक सुनहरी चादर ओढ़ लेता—जैसे पेड़ अपनी थकान उतार रहा हो।
उस घर में एक स्त्री रहती थी, जिसने जीवन में बहुत कुछ खोया था—कुछ सपने, कुछ भरोसे, और कुछ अपने लोग भी। जब-जब पत्ते झरते, उसे लगता जैसे उसका अपना ही जीवन कहीं झर रहा हो। वह रोज़ आँगन बुहारती, गिरे पत्तों को हटाती—मानो अपने दुःख के निशान मिटा रही हो।
एक दिन उसने ध्यान दिया—जहाँ पत्ते सबसे ज़्यादा गिरे थे, वहीं की मिट्टी कुछ अलग ही नरम और ज़िंदा-सी लग रही थी। कुछ हफ्तों बाद, उसी जगह छोटी-छोटी हरी कोंपलें फूट आईं। वह ठिठक गई। जिन पत्तों को वह अब तक बोझ समझकर हटाती रही थी, वही तो इस नई हरियाली की खाद बन गए थे।
उस दिन उसे समझ आया—कुछ चीज़ें जीवन से गिरती नहीं हैं, वे हमें आगे के लिए तैयार करती हैं।
जो टूटता है, वही भीतर कहीं कुछ नया रचता है।
जो छूटता है, वही आने वाले समय के लिए जगह बनाता है।
अगले बसंत में वह नीम का पेड़ पहले से ज़्यादा हरा था। और वह स्त्री? वह भी। उसके भीतर कोई चमत्कार नहीं हुआ था—बस एक गहरी शांति जन्म ले चुकी थी। यह जानकर कि हर पतझड़ हार नहीं होता, और हर गिरता पत्ता किसी नए बसंत की भूमिका लिख रहा होता है।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “अमेरिका : पार्किंग का चक्रव्यूह ” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३९९ ☆
न्यूयॉर्क से ~ आलेख – अमेरिका : पार्किंग का चक्रव्यूह श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
अमेरिका को ‘पहियों पर चलने वाला देश’ कहा जाता है, यहां दो स्थानों की दूरी मील में कम कार से ट्रेवल के गूगल मैप टाइम से ज्यादा बतलाई जाने का प्रचलन है। लेकिन कारों की बढ़ती संख्या के चलते आज यही पहिये पार्किंग के लिए जगह तलाशते-तलाशते थक रहे हैं। न्यूयॉर्क और न्यू जर्सी जैसे महानगरों में पार्किंग अब केवल सुविधा नहीं, बल्कि एक रणनीतिक चुनौती बन गई है। यहां भारत की तरह ड्राइवर कम ही कार चलाते हैं, बड़ी मंहगी गाड़ियों में भी सेल्फ ड्राइव ही अधिक देखने में आती है।
हाल ही में न्यूयॉर्क में एक डॉक्टर के अपॉइंटमेंट के दौरान जब मुझे समय पर पार्किंग नहीं मिली, तो मजबूरी में कार ‘ट्रक पार्किंग’ ज़ोन में खड़ी करनी पड़ी। महज़ 10 मिनट के भीतर वापस आने पर $115 (करीब 9,500 रुपये) का फाइन टिकट वाइपर पर चिपका मिला। यह घटना दर्शाती है कि यहाँ का प्रशासन और पुलिस व्यवस्था कितनी चाक-चौबंद है।
तकनीक और नियमों का सख्त पहरा चौबीस घंटे बना रहता है। रात के वीराने में भी खाली सड़क होते हुए भी लाल सिग्नल पर कार खड़ी रहती हैं।
पैदल चलने वाले को सड़क पर पहला अधिकार दिया जाता है। रोड क्रासिंग पर कार रोक कर पैदल व्यक्ति को सड़क क्रास करने की प्राथमिकता मुस्करा कर देना शिष्टाचार है।
लिबर्टी स्टेट पार्क टहलने के लिए रोज ही जाता हूं, पाथ ट्रेन (लोकल) लेवल क्रासिंग पड़ती है, पर कोई बैरियर नहीं है, न ही कोई वॉचमैन , केवल स्वचालित लाइट के इशारे समझ कर कार, पैदल , साइकिलिंग करने वाले सभी रुक जाते हैं । मेरे साथ तो एक बार अद्भुत घटना हुई, जब मैं पत्नी के संग रुका हुआ था कि ट्रेन गुजर जाए तब ट्रैक क्रास करूं, पर ट्रेन ड्राइवर ने इशारा किया कि मैं निकल जाऊं, और उसने पल भर के लिए रोकी गई ट्रेन और कुछ क्षण रोके रखी ।
कुल मिलाकर यहाँ सड़क पर कोई कभी भी हड़बड़ी में कार नहीं चलाता ।
यहां अत्याधुनिक तकनीक और कड़े नियमों का एक बड़ा नेटवर्क परिवहन व्यवस्था बनाए हुए है।
पुलिस की मौजूदगी हर जगह भौतिक रूप से भले न दिखे, लेकिन तकनीक की नज़र हर वाहन पर है। ‘रडार आधारित स्पीड लिमिट’ के कारण आपकी गति सीमा का उल्लंघन तुरंत दर्ज हो जाता है।
EZ Pass और स्मार्ट टोल: टोल प्लाजा पर लंबी कतारों के बजाय ‘EZ Pass’ जैसी RFID प्रणाली का उपयोग होता है, जिससे वाहन बिना रुके पूरी लगभग सौ की स्पीड से टोल पार कर लेते हैं।
HOV लेन (High Occupancy Vehicle): पर्यावरण और ट्रैफिक को ध्यान में रखते हुए, तीन या उससे अधिक यात्रियों वाली कारों के लिए अलग लेन आरक्षित होती है।
पार्किंग का डिजिटल समाधान.. भारत के लिए नया व्यवसाय हो सकता है।
जहाँ जगह कम है, वहाँ पार्किंग समाधान ‘स्मार्ट’ हैं। अब न्यूयॉर्क और जर्सी में ParkMobile जैसे ‘मैन-लेस’ (Man-less) ऐप्स का बोलबाला है। आपको किसी पार्किंग अटेंडेंट की ज़रूरत नहीं, बस ऐप पर अपना ज़ोन नंबर डालें और भुगतान करें। यदि समय बढ़ता है, तो आप अपने फोन से ही समय सीमा बढ़ा सकते हैं। इसके अलावा, शहरों में मल्टी-लेवल और रोबोटिक पार्किंग का जाल है, जो सीमित स्थान का अधिकतम उपयोग करते हैं। माल आदि में भी स्वयं ही पार्किंग पेमेंट और स्लिप स्कैन करनी होती है।
भारत और अमेरिका में लोगों की ड्राइविंग आदतों में एक बड़ा मौलिक अंतर अनुशासन का है। अमेरिका में अरबपति हो या सामान्य कर्मचारी, अधिकांश लोग स्वयं कार चलाते हैं। इसके विपरीत, भारत में अभी भी एक बड़ा वर्ग ड्राइवरों पर निर्भर है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि भारत में स्व अनुशासन की भारी कमी दिखती है। अनेक बार जिसे जहाँ मन आता है, लोग वहीं कार खड़ी कर देते हैं। ‘नो पार्किंग’ के बोर्ड के नीचे ही गाड़ियाँ खड़ी करना हमारे यहाँ आम बात है, जिससे यातायात व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाती है। चालान बनाते पुलिस वाले से अपने किसी परिचित नेता या अधिकारी से फोन पर बात करवाना जैसा कुछ यहां नहीं होता । अमेरिका में पार्किंग साइन बोर्ड्स (जैसा कि चित्र में दिख रहा है) पर सड़क की सफाई के दिन, आपातकालीन निषेध और समय सीमा का स्पष्ट उल्लेख होता है, और वहाँ कोई भी “दो मिनट में आता हूँ” कहकर अवैध पार्किंग करने का जोखिम नहीं लेता, क्योंकि वहाँ का जुर्माना और टोइंग व्यवस्था बहुत कठोर है। सड़क किनारे फायर ब्रिगेड के हाइड्रेंट्स लगे हुए हैं, उनके सम्मुख पार्किंग करना मतलब आ बैल मुझे मार जैसा है।
भारत के बढ़ते महानगरीय क्षेत्रों के लिए अमेरिका का यह सेल्फ पेमेंट एप पार्किंग मॉडल एक रोडमैप , रोजगार की संभावना हो सकता है। यदि हम ‘फास्टैग’ (FASTag) को ही पार्किंग के साथ एकीकृत (Integrate) कर दें, तो मॉल और अस्पतालों में पार्किंग कैशलेस हो सकती है। कई महानगरों के कुछ मॉल में यह प्रयोग प्रारंभ भी हो चुका है। खाली प्लॉट या पार्किंग स्पेस को किराए पर देने वाले ऐप्स भारत के तंग इलाकों के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकते हैं, तथा यहाँ की तरह अतिरिक्त आय के साधन और पार्किंग सुविधा बन सकते हैं। तकनीक के साथ-साथ यदि हम भारतीयों में भी यह बोध आ जाए कि सड़क का उपयोग ‘अधिकार’ नहीं बल्कि ‘साझा जिम्मेदारी’ है, तो हमारे यातायात की सूरत बदल सकती है।
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मानवतावादी व सबसे कम उम्र के कुलपति डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी” की समीक्षा।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३८ ☆
☆ आलेख – मानवतावादी व सबसे कम उम्र के कुलपति डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
भारतीय इतिहास में सबसे कम उम्र में कुलपति बनने का गौरव प्राप्त करने वाले डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे। आपका जन्म 6 जुलाई 1901 को कोलकाता में कोलकाता विश्वविद्यालय के संस्थापक उप कुलपति आशुतोष मुखर्जी के घर पर हुआ था। आप का बचपन से ही मेघावी, बहुमुखी प्रतिभा के धनी, विचारक, गहन चिंतन और शिक्षा के प्रति विशेष लगाव रहा है।
आप की शिक्षा-
यही कारण है कि आप ने 1917 में मैट्रिक, 1921 में बीए, 1923 में वकालत की उपाधि बहुत ही बेहतरीन अंको से प्राप्त की थी। आप ने हरेक परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थीं। आपको गणित के अध्ययन में विशेष रूचि थीं । इस कारण आप 22 वर्ष की उम्र में एमए करने के बाद विदेश चले गए। आप की प्रतिभा से प्रभावित हो कर लंदन की मैथमेटिक्स सोसाइटी ने आपको मानद सदस्यता सम्मानित किया गया था। यह किसी भारतीय व्यक्ति के लिए बहुत ही गौरव की बात थीं।
वैवाहिक जीवन-
लंदन से आप से 1926 में वकील बनकर भारत आ गए। इसी वर्ष आपका विवाह सुधा देवी से हो गया। मगर आपका वैवाहिक जीवन ज्यादा लंबा नहीं चला। कुछ ही वर्षों में आपकी पत्नी का देहांत हो गया। इसके बाद आपने आजीवन शादी न करते हुए मानवता की सेवा को अपना लक्ष्य बना लिया। शिक्षा जगत में ख्याति-
जब आपकी उम्र 23 वर्ष की थी तभी आप पिता का देहांत हो गया था। उसी समय आपको कोलकाता विवि विद्यालय की प्रबंध समिति में ले लिया गया। यही से आपके कार्यों की वजह से बहुमुखी प्रतिभा सभी के सामने प्रकट होने लगी। आपके प्रखर विचार, शिक्षा के प्रति प्रतिबद्धता व विद्वत्ता को देखते हुए आप को 33 वर्ष की अल्पायु में कोलकाता विश्वविद्यालय का कुलपति बना दिया गया।
भारतीय शिक्षा इतिहास में आपको सबसे कम उम्र के कुलपति बनने का श्रेय आप को प्राप्त हुआ है।
आप का जीवन लक्ष्य-
आपने छात्र जीवन से अपने मूल लक्ष्य तय कर लिए थे। आप आध्यात्मिक तथा विज्ञान से युक्त शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। अध्यात्मवाद, सहनशीलता, मानवता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा सांस्कृतिक विचारों की एकता के विचारों पर आजीवन दृढ़ता से चलते रहें। यही वजह है कि अपनी पत्नी के निधन के बाद आपने अपना पूरा जीवन मानवता, उसके विकास और वैज्ञानिक गतिशीलता के लिए समर्पित कर दिया था।
परिवार का जीवन पर प्रभाव–
आपके जीवन पर अपने परिवार के सांस्कृतिक, सामाजिक, आध्यात्मिक, वैज्ञानिक, राजनीति जीवन का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा है। आप का लालन-पालन जिस परिवार में हुआ था वहां आशुतोष मुखर्जी जैसे सुलझे विचारों के धनी पिता, शिक्षामित्र, विद्वान तथा ओजस्वी वक्ता की छत्रछाया आप को प्राप्त हुई थीं। साथ ही घर में होने वाले विभिन्न आयोजनों, गोष्ठियां, विचार-विमर्श, चिन्तन-मनन, सामाजिक, धार्मिक, वैज्ञानिकों वातावरण का आप के जीवन पर सकारात्मक व दृढ़ प्रभाव पड़ा। यही वजह है कि आपके मन में भारत की पुरातन संस्कृति के प्रति विशेष प्रेम, विज्ञान के प्रति लगाव, मानवता के प्रति विशेष अनुराग पैदा हुआ।
आपकी अनुकरणीय प्रतिभा–
आप की प्रतिभा को इसी बात से समझा जा सकता है कि आपने जितनी भी परीक्षाएं उत्तीर्ण की थीं उन सभी में आप प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए थे। कलकत्ता विश्वविद्यालय में 8 अगस्त 1934 से 7 अगस्त 1938 रहते हुए अनेक विश्वविद्यालय के सम्मेलनों का नेतृत्व किया। शिक्षा के क्षेत्र में सुधार और नए विचार दिए। इस कारण आपकी गिनती उस समय के भारत के शीर्षस्थ शिक्षाविदों में होने लगी थी।
आपके उल्लेखनीय कार्य–
तत्कालीन समय में भारतीय जनता की स्थिति बहुत दयनीय थीं। भारतवासी सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक दृष्टि से बेहतर स्थिति में नहीं थे। अंग्रेज कूटनीति द्वारा भारत का विभाजन की चाल चल रहे थे। इस कारण आप ने भारत की जनता के उत्थान और उसके सामाजिक कल्याण के लिए कार्य करने के लिए सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। ताकि आप अपनी संपूर्ण ऊर्जा से मानवता की सेवा कर सके।
सन 1939 में राजनीति में प्रवेश करने के साथ आपने अपनी कार्यशैली में आमूल-चूल परिवर्तन कर लिया। इस कारण आपने गांधीजी की अहिंसा वादी नीति का घोर विरोध किया। आप कहते थे कि गांधीजी की अहिंसावादी नीति भारत के लिए उपयुक्त नहीं है। इसी वैचारिक मतभेद के कारण आप कांग्रेस और गांधीजी की नीतियों के और विरोधी हो गए थे।
अकाल में आप की मानवतावादी सेवा–
इसी दौरान 1943 में भारत के बंगाल प्रांत में भयंकर अकाल पड़ गया। चूंकि आप मानवता के प्रखर और प्रबल समर्थक थे, इस कारण आपने बंगाल में आए इस संकट के लिए बड़े पैमाने पर सहायता व राहत कार्य किया। इसके लिए राजनेताओं, व्यापारियों, समाजसेवियों, धर्मगुरुओं आदि की सहायता से जरूरतमंदों और पीड़ितों की भरपूर सहायता पहुंचाने के लिए बंगाल राहत समिति का गठन किया। जिसे बाद में हिंदू महासभा राहत समिति नाम दिया गया था।
लोगों ने इसमें बड़ी-बड़ी और छोटी-छोटी नगद राशियों से अकाल पीड़ित जनता की भरपूर सहायता कीं। इससे लाखों लोगों को मौत के मुंह में जाने से बचाया जा सका। आप के इस मानवतावादी कार्य से राष्ट्रीय एकता, सामाजिक प्रतिबद्धता, सांस्कृतिक व धार्मिक एकता का परिचय के साथ-साथ वहां की जनता को राष्ट्रीय एकता व एकजुट्ता की प्रेरणा प्राप्त हुईं।
आप के प्रभावाकारी विचार–
आप सांस्कृतिक एकता के प्रबल समर्थक थे। आपका मानना था कि सभी व्यक्ति सांस्कृतिक रूप में एक ही है। इनका धार्मिक रूप से विभाजन करना गलत है। आप इस नीति के घोर विरोधी थे। आप कहते थे कि हम सब में एक ही रक्त, एक ही भाषा, एक ही संस्कृति रची बसी है, इसलिए आपको प्रति सभी धर्मों के लोगों की आप पर संपूर्ण आस्था थीं। आपको हरेक धर्म, संस्कृति व सम्प्रदाय के लोगों का संपूर्ण समर्थन प्राप्त था।
आप का राजनीतिक जीवन और उल्लेखनीय कार्य-
आपके विचारों की वजह से आपको बंगाल प्रांत का वित्त मंत्री बनाया गया था। जहां आप ने तत्कालीन प्रधानमंत्री एमके फजलूल हक के समय 12 दिसंबर 1941 से 20 नवंबर 1942 तक वित्त मंत्री के रूप में कार्य किया। इसके पूर्व भी आप बंगाल विधान परिषद में सांसद की हैसियत से 1927 से 1947 तक काम करते रहे हैं। आप 15 अगस्त 1947 को भारत सरकार के वाणिज्य और उद्योग मंत्री बने। 6 अप्रैल 1950 तक आप इसी पद पर बने रहे। 1947 को आप को स्वतंत्र भारत के वित्त मंत्रालय का कार्यभार दिया गया था।
यह मंत्रालय सरदार वल्लभ भाई पटेल के कहने से दिया गया। क्योंकि वे उस समय गांधीजी व कांग्रेसियों की नीति के विरोधी थे। इस दौरान आप ने चितरंजन में रेलवे इंजन का कारखाना, विशाखापट्टनम में जहाज बनाने का कारखाना और बिहार में खाद बनाने के कारखाना खोला। ताकि यहां की जनता की दयनीय व करुणाजनक स्थिति में सुधार हो सके।
आप का प्रबल विरोध–
इसी दौरान आपने विभिन्न प्रांतों की यात्राएं कीं। आप भारतीय जनता की शोचनीय दशा से चिंतित थे। कश्मीर में अलग वजीर-ए-आलम यानी प्रधानमंत्री, अलग झंडा और उस को विशेष दर्जा दे रखा था। आप आरंभ से ही एक भारत, एक झंडे और एक प्रधानमंत्री के प्रबल समर्थक थे। इस पर आपके और सरकार के बीच मतभेद हो गए। आप 370 धारा खत्म करने की प्रबल समर्थक थे। जबकि सरकार इसे बनाए रखना चाहती थी।
इस मतभेद के कारण आपको मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देना पड़ा। कारण, आप कश्मीर का भारत में पूर्ण विलय चाहते थें। इसलिए आपने प्रजातंत्र पार्टी बनाकर कश्मीर में प्रवेश किया। उस समय अटल बिहारी वाजपेई (तत्कालीन विदेश मंत्री), वैद्य गुरुदत्त बर्मन, टेकचंद आदि के साथ में 6 मई 1953 को जम्मू के के लिए कूच किया। चूंकि बिना अनुज्ञा के आपने कश्मीर में प्रवेश किया था इस कारण आपको जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया।
मानवता के इस पुजारी की 40 दिनों तक जेल में बंद रहने के बाद 23 जून 1953 को जेल में रहस्यमय मृत्यु हो गई। भारतीय जनसंघ पार्टी के संस्थापक व्यक्तित्व का इस तरह चला जाना भारत की जनता के लिए अपूरणीय क्षति थीं। मगर आप अपने पीछे अपने कार्यों से ऐतिहासिक यादगार छोड़कर चले गए जो हमें सदैव आपका स्मरण कराती रहेगी।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “महालक्ष्मी रेसकोर्स…“।)
अभी अभी # ९०८ ⇒ आलेख – महालक्ष्मी रेसकोर्स श्री प्रदीप शर्मा
यूं तो जो भाग्यशाली होते हैं, उन पर लक्ष्मी जी की कृपा होती ही है, लेकिन जो अति भाग्यशाली होते हैं, उन पर महालक्ष्मी सदा प्रसन्न रहती है।
कृपा का भी एक कोर्स होता है और जो इस कोर्स की दौड़ में आगे निकल जाते हैं उसे रेसकोर्स कहते हैं। जैसे शतरंज के मोहरों में घोड़ा भी एक मोहरा होता है, कभी कभी जिंदगी की दौड़ में इंसान खुद की जगह एक घोड़े को ही दांव पर लगा देता है। कोई शकुनि तो कोई धर्मराज, कहीं द्रौपदी दांव पर, तो कभी अश्व महाराज। सबका अपना अपना भाग।।
आज भी आपको देश में हर जगह पोलोग्राउंड और रेसकोर्स रोड मिलेंगे। एक महाराणा प्रताप का चेतक था, जिसने अपने स्वामी के लिए अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी थी और एक अंग्रेज थे, जो न केवल घोड़ों पर बैठकर पोलो खेलते थे, वे घुड़दौड़ में घोड़ों पर भी दांव लगाते थे, कौन सा घोड़ा हॉर्स रेस में बाजी मारेगा। हमारी आज की राजनीति भी हॉर्स ट्रेडिंग पर ही टिकी है, जहां घोड़े गधे सभी इस दौड़ में शामिल हैं।
आइए मुंबई चलें ! मुंबई में महालक्ष्मी रोड है और महालक्ष्मी मंदिर भी है, जहां लता मंगेशकर और सचिन तेंदुलकर से लगाकर सभी सेलिब्रिटीज हर शुभ कार्य के पहले धन और वैभव की लक्ष्मी का आशीर्वाद लेने यहां अवश्य शीश नवाते हैं।
यूं तो मुंबई की चकाचौंध देखते ही बनती है लेकिन यहीं घोड़ों की दौड़ के लिए 225 एकड़ में फैला महालक्ष्मी रेसकोर्स भी है जहां घोड़े के साथ किसी का भाग्य बनता बिगड़ता रहता है। सन् 1883 में निर्मित इस घुड़दौड़ के मैदान में एक ग्रैंडस्टैंड है जिसमें 1500 से 2000 दर्शकों के बैठने की व्यवस्था है। आप चाहें तो इसे किस्मत का खेल कहें अथवा सट्टा, लेकिन कइयों की तकदीर अगर यहां बनी भी है तो कई इस खेल में बर्बाद भी हुए हैं।।
अपने भाग्य को आजमाने आदमी कहां कहां जाता है। एक समय था जब अधिकांश राज्य सरकारें लॉटरी का खेल खेला करती थी। वर्ली मटका और रतन खत्री को कौन नहीं जानता। शेयर मार्केट के हल्के से उछाल से अगर कइयों का भाग्य बल्लियों उछल जाता है तो शेयर के भाव गिरने के साथ ही उनका भी दिल बैठने लगता है। अमीरों को हार्ट अटैक यूं ही नहीं आता।
एक समय था, जब हर हिंदी फिल्म में एक लालाजी हुआ करते थे, जिनकी आलीशान कोठी के साथ कम से कम एक खूबसूरत लड़की भी हुआ करती थी। अच्छी भली चलती फिल्म में अचानक लालाजी के पास एक फोन आता था, लालाजी आपका घोड़ा हार गया, सब बर्बाद हो गया। लालाजी को सदमा तो लगना ही था। परिवार पर पहाड़ तो टूटना ही था।
इस स्थिति में भी अगर एक संजीदा गीत नहीं हुआ तो समझिए दर्शकों के साथ इंसाफ नहीं हुआ ;
कल चमन था
आज एक सेहरा हुआ।
देखते ही देखते ये क्या हुआ।।
लेकिन यकीन मानिए यह केवल फिल्मी मनोरंजन नहीं, एक कड़वी हकीकत है। कई नामी गिरामी लोग इस महालक्ष्मी में अपना भाग्य आजमा चुके हैं, कई ने मुंह की भी खाई है, और कई बर्बाद भी हुए हैं।
घोड़ों को पालना भी एक महंगा शौक है। ये घोड़े तैयार ही घुड़दौड़ के लिए किए जाते हैं। हास्य अभिनेता महमूद का सितारा जब बुलंदी पर था, तब वे सितारों की नगरी मुंबई छोड़कर बैंगलोर जा बसे थे, जहां उनका भी एक घोड़ों का फार्म था जिसे अंग्रेजी में stud farm कहा जाता है। हिंदी में हम इसे अश्वशाला, अस्तबल अथवा घुड़साल भी कह सकते हैं।।
रईसों के कई महंगे शौक होते हैं। जितना पैसा उतना महंगा शौक। आज एक समझदार व्यक्ति केवल शेयर मार्केट की ही रिस्क उठा सकता है। सेंसेक्स और निफ्टी में वह अपना भाग्य फिफ्टी फिफ्टी आजमाता है।
हम पहले सिक्का उछालकर टॉस किया करते थे आजकल एक नया सिक्का मार्केट में आ गया है, बिट कॉइन। जिसकी जेब में पैसा है, वही इसे उछाल सकता है।।
लेकिन जिन्हें खतरों से खेलना का शौक होता है, वे ही किसी घोड़े पर अपना दांव लगाते हैं। कब किसका दांव आखरी हो, कहा नहीं जा सकता। जगजीत सिंह जैसे महान कलाकार भी इस महंगे शौक से बच नहीं पाए। इतिहास गवाह है आज भी शतरंज के खिलाड़ी किसी भी कीमत पर अपना घोड़ा पीछे नहीं लेते। सल्तनत भले ही जाए तो जाए ..!!