हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ “हमारी जेब हमारा चेहरा…” ☆ श्री सुधीर मोता ☆

श्री सुधीर मोता

?  आलेख – हमारी जेब हमारा चेहरा… ? श्री सुधीर मोता

उस जेबकतरे ने मेरे चेहरे और हाव भाव से अनुमान लगा लिया होगा कि इसकी जेब में माल है , तभी ना उसने मेरी जेब में हाथ डालने की कोशिश की । यह उस की कला है जो उसके रोजगार में काम आती है । कह नहीं सकता कि अगर वह सफल हो जाता तो अपने को उतना ही समृद्ध अनुभव करता जितना मैं वह सौ के इकलौते नोट की संपदा जेब में ले कर घूमने में कर रहा था या मेरे उसकी उम्मीद से घटिया निकलने पर मन ही मन मुझे गालियां दे रहा होता। जो भी हो उस घटना ने जो कि आगे बढ़ते बढ़ते रूक गई मुझे सचेत कर दिया। मुझे वह कला सीखना होगी जिससे मेरा चेहरा और हाव भाव देख कर अनुमान ही न लगाया जा सके कि यह अनमना सा लगता इंसान किस हद तक मालदार या कड़का है। मैं सौ रूपये जेब में ले कर इतना फूला न समाया घूम रहा था कि मेरे बेहद मालदार होने जैसे हाव भाव चेहरे पर थे। अब मुझे अपने बारे में कुछ करना होगा । मैं गूगल गुरू की शरण में जा ही रहा था कि मेरी नजर एक समाचार पर ठिठक गई । किसी के घर एक दुर्घटना हुई या हुवाई गई और उसके एक कमरे में करोड़ों के अधजले नोट पाये गये । मैंने खबर विस्तार से पढ़ी उस व्यक्ति की फोटो भी देखीं, उसके कामकाज के बारे में जाना। फिर इतने ज्ञान के साथ गूगल गुरू की शरण में चला गया। 

वहां ऐसी घटनायें भरी पड़ीं थीं । किसी की कार में करोड़ों का सोना। किसी के घर में करोड़ों के नोट। ये व्यक्ति मेरे गुरू बन सकते हैं जिनसे सीख कर मैं किसी भी जेबकतरे को चकमा दे सकता हूं। इन लोगों के चेहरे से तो कोई अनुमान नहीं लगा पाया कि वे कितनी दौलत के ढेर पर बैठे हैं। ये अपनी नौकरी, अपना कामकाज यूं कर रहे थे जैसे कोई भी और करता है । एक साबुन के विज्ञापन में एक महिला की त्वचा से उम्र का पता ही नहीं चलता वाली बात कही गई वैसे ही इन लोगों की चमड़ी चाल ढाल से किसी को पता तक ना चला कि वे इतनी अकूत दौलत के स्वामी हैं । मैं इन लोगों की फोटो को बड़ा कर कर के देखता हूं शायद कहीं से पता चले । बिल्ली जब मलाई या दूध की तपेली चाट चूट कर उतने ही दबे पांव निकलती है तो गृह स्वामिनी पल में समझ जाती है कि उसके चेहरे पर के भाव क्या कह रहे हैं । पर ये भाई साब होन ? घर में इतना मालपानी भरा पड़ा और आपकी शक्ल यूं जैसे पहली तारीख को तनख्याह ना मिले तो आप भूखे ही मर जायें । कहां से लाते हो भाई इतनी सादगी ?

मुझे लगता है अगर आप चेहरे पर सदा भूख के भाव रखें तो दुनिया को भरम में रख सकते हैं । जैसे अगर आप ने एक करोड़ का धन आनन फानन में अर्जित कर लिया जो कि जाहिर है किसी ऐसे स्रोत से आया होगा जो मान्य नहीं है पर प्रचलित भरपूर है तो आप दूसरे एक या अधिक करोड़ की जुगाड़ में जुट जाईये। जैसे कोई मछली पकड़ने वाला या बगुला मग्न होकर नदी सरोवर समुद्र किनारे ताक में बैठा रहता है वैसे ही। मजाल है कोई आप को चीन्ह सके कि आप के तो घर में अपार धन रूपी मत्स्य संपदा भरी पड़ी है। आप यूं बैठे रहिये कि इस प्रयास के सफल होने पर ही आपके घर का चूल्हा जल सकेगा। आपके बच्चों की स्कूल की फीस भरी जा सकेगी । दोस्तों के साथ आप चाय पीने जायेंगे तो शायद इस बार आप का हाथ जेब में जाये तो कुछ पैसे ले कर बाहर निकले। मैं बता देना चाहता हूं कि ये सब कुछ मुझे गूगल गुरू ने नहीं बताया । मैंने खुद उन लोगों का प्रोफाईल देख कर ये लाभप्रद सीखें अपने लिये अर्जित कर लीं । पर उस से क्या ? हम भी रहे ढोर के ढोर ही । आदतें इतनी आसानी से नहीं जातीं । शऊर भी यूं एकाएक नहीं आ सकता । जिनके घर में करोड़ो के नोट बमुश्किल अपने भीतर के ताप को दबाये रहे और अंततः कोई चिंगारी भड़की जिसने रहस्य लगभग खोल ही दिया , उसके तप को और ताप दबाये रखने की क्षमता की आप तनिक भी प्रशंसा नहीं करेंगे ? और इसके बाद भी तो देखिये कितना ही बड़ा मनोवैज्ञानिक होगा उन महानुभाव के चेहरे को पढ़़ सके इतनी प्रतिभा उसमें नहीं होगी।

तो अब किया क्या जाये ? एक जेबकतरे ने हमें झकझोर कर रख दिया और इस उम्र में हमें पता है कि हम कहते ज़रूर हैं कि दुनिया न बदल पायें अपने को ज़रूर बदलेंगे पर होता यह है कि हम तनिक-सा बदलते हैं दुनिया अपने को पट से भारी बदल लेती है । लोगों के घरों से, मोटर गाड़ियों से करोड़ों की दौलत संयोग से धरी पकड़ाई जाती है पर जिनकी नहीं पकड़ी जाती उनकी संख्या हज़ारो लक्खों गुनी है। हम अपनी जेब की दौलत को किस तरह उजागर न होने दें वह कला हमें कौन सिखायेगा ? उतने तक तो ठीक , हमारी जेब में सौ के नोट की जगह एकाध लाख की दौलत से भरा बटुआ है ये कैसे लग जाता है दुनिया वालों को। ये मुस्काते रहने वाली मुद्रा और सदा संतोषी दिखते रहने का छदम कैसे लाद लिया हमने अपने पे के हमें पता ही ना चला और हमारी ऐसी नुकसानदेह इमेज बन गई ? अब इसका हर कोई अलग मीनिंग निकाल लेता है मौके बे मौके। जेब कतरे तो दृश्य में कभी कभार ही आते हैं , बकिया वक्त में कितनी तपती निगाहें हमें घूरती रहती हैं हम ही जानते हैं। 

हमें तो लगता है हमारे पसीने की गंध ही इतनी भन्नाट है कि लाख छुपाओ ये दौलत प्रकट हो ही जाती है और जित्ती है उससे अधिक ही समझ आती दुनिया को। कम पसीने से धन कमा सकें ऐसी कोई तरकीब किस उस्ताद या गुरू से मिलेगी ? या ऐसा कुछ हो सके कि कमाई हो और पसीना ही न निकले। एक पूरी रात मंथन करने के बाद हमें अपने में जो खोट है वह समझ आ ही गई। जब तक हम अपने को ये समझा कर तैयार नहीं कर लेंगे कि जितना हमारी जेब में है या जितना हमने कमाया हम उससे अधिक के लायक हैं तब तक हमारा कुछ नहीं होने का । जेबकतरे हम पर घात करते रहेंगे और निराश होते रहेंगे, हम ऐसी खबरें पढ़ पढ़ कर सीखने की नाकाम कोशिश करते रहेंगे। खुद अपने को अपनी औकात कुछ बढ़ा चढ़ा कर बताने की कोशिश कर देखते हैं हैं एकाध बार। शायद कुछ हो सके। ये तो साबित हो ही चुका है कि खोट हम में ही है । देखिये न अभी अभी अपना हाथ अपनी फूली हुई जेब पर चला गया। जुकाम के कारण गीला, मुचा हुआ रूमाल और कुछ बिल ठुंसे थे जेब में। जेबकतरों और दुनिया के इस-उस टाइप के लोगों के और स्वयं अपने हित में हमें अपने आप को बदलना ही होगा, वरना जेबकतरे तक हमें ब्लेकलिस्ट कर देंगे। शायद अपने को हिंदी लेखक के रूप में प्रसिद्ध करवाने से कुछ बात बने , पर वह भी तो नहीं आता हमें। लगता है बिना जेब वाला वह अंतिम वस्त्र धारण करने तक हमारा कुछ नहीं होने का।

© श्री सुधीर मोता

संपर्क – राजविला 2 बी सिविल लाइन्स भोपाल 462 002. फोन 9303138889

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १००२ ⇒ फकीर की लकीर ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “फकीर की लकीर।)

?अभी अभी # १००२ ⇒ आलेख – फकीर की लकीर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

लकीर तो लकीर होती है, क्या फकीर की और क्या साहूकार की। लकीर के फकीर तो हम लोगों ने बहुत देखे हैं लेकिन कभी किसी फकीर को लकीर पर चलते नहीं देखा। संत और सीकरी का जो रिश्ता होता है, वही रिश्ता एक फकीर का लकीर से होता है। फकीर न तो किसी लकीर पर चलते हैं और न ही अपने बाद कोई लकीर छोड़ जाते हैं।

लेकिन इन भक्तों को कौन समझाए। वे उसी लीक, उसी लकीर पर चलने की कोशिश करते हैं, जिस पर कभी फकीर चला था। फकीर तो फकीर था, जिस रास्ते पर चला, उसके कदमों के निशान ही लकीर बन गए। वह तो मंजिल तक पहुंच गया, भक्त फकीर की लकीर को ही पत्थर की लकीर समझ बैठे और वक्त की लकीर को ही पीटते रहे। यही लकीर आगे चलकर पंथ बन जाती है।।

कहीं लकीर है, कहीं रेखा है तो कहीं दीवार है। हमने अपनी सुविधा और स्वार्थ की खातिर कई लकीरें खींची हैं, कितनी ही लक्ष्मण रेखाओं का उल्लंघन किया है। हमने कभी कोशिश नहीं की कि अमीरी और गरीबी की लकीर को मिटाया जाए।

हमें हमेशा यही सिखाया गया है कि अगर किसी लकीर को छोटा करना हो तो उसके पास एक बड़ी लकीर और खींच दो। गरीबी मिटाने का सबसे आसान तरीका है, आप अमीर बन जाओ। सुविधा और स्वार्थ की खातिर पाला बदलना, इस लकीर को लांघ उधर निकल जाना ही सफलता की कुंजी है। लकीर फकीरों के लिए नहीं बनी। हम जैसे समझदारों के लिए बनी है।

मैं कोई फकीर नहीं। लेकिन मुझे लकीर पर चलने का शौक है। पक्की सड़क के किनारे पर जहां भी मुझे कोई लंबी मोटी चूने की लकीर नजर आती है, मैं उस पर चलना शुरू कर देता हूं। मेरे लिए यह एक अभ्यास है, शारीरिक और मानसिक संतुलन का एक ऐसा तरीका है, जिसका किसी पंथ और विचार से कोई लेना देना नहीं। मैं जानता हूं, यह लकीर मेरी मंजिल नहीं, अपना प्रयोजन सिद्ध होते ही मुझे इस लकीर से किनारा करना है। कोई जरूरी नहीं कि लकीर पर चलने की इस कला का, किसी नट की तरह, दो बांसों के बीच, किसी रस्सी पर चलकर प्रदर्शन किया जाए।

जो बीच सड़क पर सीना तानते हुए, यातायात में बाधा पहुंचाते हुए, स्वयं एक पत्थर की लकीर बनाते हुए चलते हैं, अगर वे थोड़े अनुशासित हों, फुटपाथ पर एक जिम्मेदार नागरिक की तरह चलें तो कितना अच्छा हो।।

हमने अक्षर ज्ञान बाद में सीखा, पहले एक सीधी लकीर खींचना सीखा। पुराने समय में जब लाइन वाले कागज, कॉपियां नहीं आती थी, लिखने के पहले कागज़ पर एक लंबी लकीर खींची जाती थी।

मारवाड़ी हिसाब की पुरानी खाता बहियों और दस्तावेजों में एक लंबी लकीर पर ही सब कुछ लिखा जाता था। कहां अर्ध विराम है और कहां पूर्ण विराम। कुछ समझ में नहीं आता था।

कुछ लोग आज भी हिंदी में लिखते वक्त शब्दों का माथा नहीं बांधते। मुक्त विचार हैं, मस्तिष्क से बाहर आ गए। अब क्यों इनके माथे पर कोई लकीर लगाई जाए। मुक्त छंद, मुक्त गीत, मुक्त गद्य। जीवन में संयम हो, मर्यादा हो, अनुशासन हो, अगर हो तो बस लक्ष्मण रेखा हो।

बाकी सब लकीर ऐसी हों, जो सिर्फ हवा और पानी में ही नजर आएं, और ओझल हो जाएं। इंसान हवा पानी की तरह एक हो जाए। हमारी अक्ल में इतने पत्थर भी ना हों, जो हम पत्थर की लकीरें बनाते फिरें।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १००१ ⇒ फूटी कौड़ी और अभागा रुपया ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “फूटी कौड़ी और अभागा रुपया।)

?अभी अभी # १००१ ⇒ आलेख – फूटी कौड़ी और अभागा रुपया ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

क्या आप जानते हैं, कभी फूटी कौड़ी भी मुद्रा का ही एक छोटा सा भाग था और आज फल फूल रहा रुपया इतना अभागा है कि इसके भाग ही नहीं किए जा सकते। एक समय था, जब रूपये के भी भाग इतने बलवान थे कि उसके भाग किए जा सकते थे। कभी एक रुपए में सोलह आने होते थे और हर आने में चार पैसे के हिसाब से पूरे रुपए में चौंसठ पैसे हुआ करते थे रुपया, आना, पैसा! रुपया मतलब, आना पैसा।

रुपए से किसे प्यार नहीं!

फिर आया दशमलव का जमाना और भारत के एक रुपए की कीमत सौ नए पैसे हो गई। एक चमचमाता नया पैसा, जिस पर भारत के साथ ही लिखा होता, रुपए का सौंवा भाग। महाभारत के सौ कौरव की तरह भारत के इस रुपए के सौ नए पैसे मुद्रा बाजार में खनखनाते फिरते थे। एक नया पैसा, दो नया पैसा, तीन नया पैसा, पांच नया पैसा, दस नया पैसा, बीस नया पैसा, और हां पच्चीस पैसे की चवन्नी और पचास पैसे की अठन्नी और इन सबसे बड़ा रुपया। क्या ठाठ थे उन दिनों रूपयों पैसों के।।

आज के डिजिटल युग में आप चाहें तो रूपयों से नहा लें, डिजिटल ट्रांसफर और paytm से कुबेर का खजाना खरीद लें, लेकिन माफ करें, आज आपकी जेब में एक फूटी कौड़ी भी नहीं। क्योंकि आज की अधिकांश पीढ़ी ने तो कौड़ी का नाम भी नहीं सुना होगा। हां, अगर कभी मैगी और पिज्जा बर्गर से मन भर गया हो, तो बाजार में पकौड़ी जरूर खाई होगी।

आज बेशक, हमारे सर पर डिजिटल करेंसी का ताज है, लेकिन हम पाई पाई को मोहताज हैं। अब यह पाई कौन सी बीमारी है भाई। ज्यादा दूर ना जाएं। बस इस कहावत पर गौर फरमाएं। चमड़ी जाए, पर दमड़ी ना जाए। बस यह दमड़ी ही पाई की नानी है। इनकी भी बड़ी विचित्र कहानी है ;

फूटी कौड़ी से कौड़ी, कौड़ी से दमड़ी, दमड़ी से धेला, धेला से पाई, पाई से पैसा, पैसा से आना और आना से रुपया।

जो कभी सबसे बड़ा रुपया था, आज वह सबसे छोटा होकर रह गया है। जिस रुपए के भाग ही नहीं हो सकते, वह अभागा नहीं हुआ तो फिर क्या हुआ।

आज लोगों के पास दिखाने के लिए रुपया जरूर है, लेकिन उनके पास पैसा नहीं है। हम कैसे पैसे वाले, एक पैसा नहीं, हमारे जेब के हवाले। आज कबीर होते तो वे भी शायद यही कहते ;

यह कैशलैस मानुस कैसा ?

जेब में फूटी कौड़ी नहीं

रूपये को कहे पैसा!

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© श्री प्रदीप शर्मा

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १७८ – देश-परदेश – विश्व संग्रहालय दिवस : 18 मई ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १७८ ☆ देश-परदेश – विश्व संग्रहालय दिवस : 18 मई ☆ श्री राकेश कुमार ☆

कल पूरे विश्व में संग्रहालय दिवस मनाया गया था।हमें इसकी जानकारी थी, कि इस दिन सभी संग्रहालयों में प्रवेश निशुल्क रहता हैं।

मौक़े पर चौक्का लगाते हुए हम चार साथी प्रातः ही जयपुर के संग्रहालय देखने के लिए एक मित्र की कार से रवाना हो गए।संग्रहालय में कुछ इक्का दुक्का हमारे जैसे मुफ्त के मज़े लेने वाले लोग अवश्य मिले।

अधिकतर संग्रहालयों में पार्किंग बहुत दूर रहती हैं।सुबह दस बजे ही मौसम के तेवर तेज़ हो रहे थे।चारों तरफ जेठ की तपती गर्मी ने बेहाल कर दिया था।एक मित्र ने तो हथियार डाल दिए।हम सब भी खाली हाथ लौट आए।साथी बोले ये विश्व संग्रहालय दिवस मई में ही क्यों मनाया जाता हैं ?ताकि, लोग मुफ्त में आनंद ना ले पाए।

व्यथित मन से घर आकर, अपने सब से अज़ीज़ मोबाइल में घुस गए।मन में विचार आया ये मोबाइल भी तो हमारा संग्रहालय हैं।

दुनिया भर की फोटो, बीमारियों के फर्जी नुस्खे, राजनतिज्ञों के झूठे वीडियो, अनजान लोगों के फालतू वाले ज्ञान और वो सैंकड़ों मैसेज जिन पर ये लिखा होता है, “इसको अवश्य सेव कर  लेवें” हमारे मोबाइल को संग्रहालय होने की मान्यता देते हैं।उसी संग्रहालय को देखते देखते पूरा दिन व्यतीत हो गया।

शाम के समय एक 15 वर्षीय बालक से हमने लिफ्ट में पूछा कि आज विश्व संग्रहालय दिवस है, आप इसके बारे में क्या जानते हैं ?

बालक बहुत ही नटखट निकला और बोला अंकल, हमें तो आप भी किसी संग्रहालय से कम नहीं लगते, ये पुरातन बातें और अपने बचपन के किस्से सुना सुना कर पका डालते हो, मोहल्ले के सभी बच्चे इसी लिए आप से दूर रहते है।

बालक ने अपनी भड़ास निकालते हुए कहा, आप लोग आज की बात क्यों नहीं करते हो ? जैसे आई पी एल का चैंपियन कौन बनेगा, चिप्स का कौन सा नया ब्रांड आया हैं, कौन से पिज्जा के साथ कोल्ड ड्रिंक फ्री है, पॉप सिंगर शकीरा ने कोर्ट कैसे जीत लिया है, आदि। गंतव्य पहुंचते ही बालक मिल्खा सिंह की स्पीड से दौड़ गया।

घर वापस आकर दैनिक भास्कर में अपना भविष्य पढ़ा,उसमें लिखा था, आज का दिन अच्छा नहीं है, यात्रा ना करें।दूसरों से बुराई मिलेगी।कितना सत्य बताते है, हमारे ये भविष्य वक्ता।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २६ – आलेख – “चिकित्सा जगत के गौरव डॉ. आर.एस. मिश्रा” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक प्रेरणास्पद आलेख चिकित्सा जगत के गौरव डॉ. आर.एस. मिश्रा।) 

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २६

☆ आलेख ☆ चिकित्सा जगत के गौरव डॉ. आर.एस. मिश्रा ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

86 वर्ष की उम्र में भी कर रहे रोगियों की सेवा

ऊंचा कद, गौर वर्ण, इकहरे बदन वाले आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी डॉ. रविशंकर मिश्रा याने डॉ. आर. एस. मिश्रा के जीवन का लक्ष्य ही पीड़ितों का उपचार कर उन्हें रोगमुक्त जीवन प्रदान करना है। मित एवं मधुर भाषी डॉ. मिश्रा गंभीर और शांत प्रकृति के व्यक्ति हैं। वे परिचतों, अपरिचितों अथवा इलाज कराने आये रोगियों की पूरी बात ध्यान से सुनते हैं और हल्की मुस्कुराहट के साथ ऐसा उत्तर देते हैं कि लोग प्रसन्न और तनाव मुक्त हो जाते हैं। रोगी का आधा इलाज तो उनकी विनम्रता और मीठी वाणी ही कर देती है। वे कहते हैं कि चिकित्सक की वाणी और व्यवहार भी रोगी की प्रतिरोधक क्षमता घटाने – बढ़ने वाला एक महत्वपूर्ण कारक है।

25 सितम्बर 1941 को देवरी, सागर में जन्में डॉ. मिश्रा 86 वर्ष की उम्र में भी अपने माता – पिता को दिया पीड़ितों की सेवा का वचन निभा रहे हैं। प्रारम्भिक शिक्षा देवरी से पूर्ण करने के उपरांत मिश्रा जी ने एम जी एम मेडिकल कॉलेज इंदौर से एम बी बी एस किया और 14 अप्रैल 1968 को शासकीय चिकित्सक के रूप में छतरपुर से सेवा प्रारंभ की। इसके उपरांत रीवा से उनकी सेवाएं आर्मी को स्थानांतरित कर दी गईं। उन्होंने 1971 में बांग्लादेश के आजादी के युद्ध में सीमा पर भारतीय सेना के घायल जवानों का मनोयोग से उपचार किया। आपने पश्चिमी पाकिस्तान की सीमा पर भी लंबे समय तक सैनिकों का उपचार किया तदोपरांत पुनः जबलपुर स्थानांतरित हुए फिर दमोह, जबलपुर कोतवाली डिस्पेंसरी, मेडिकल कॉलेज अस्पताल एवं पनागर में सेवाएं देते हुए 2003 में सेवानिवृत्त हुए।

चिकित्सक के रूप में वे जहां – जहां पदस्थ रहे उनके संपर्क में आए लोग आज भी उन्हें स्नेह और श्रद्धा से याद करते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद भी सेवाभावी डॉ. मिश्रा ने घर में आराम करने के बजाए अंतिम सांस तक पीड़ितों की सेवा का संकल्प लिया और जबलपुर स्थित महाकौशल के सुप्रसिद्ध चिकित्सालय नेशनल हॉस्पिटल में सेवाएं देना प्रारंभ किया जो आज तक जारी है।

जब उनसे प्रश्न किया गया कि – “आर्मी में सैनिकों की चिकित्सा के दौरान आपने क्या विशेष अनुभव प्राप्त किया?” तब इस प्रश्न के प्रत्युत्तर में  डॉ. मिश्रा ने कुछ क्षण शून्य में निहारने के उपरांत कहा – “मुझे युद्धों से घृणा हो गई है, मैंने घायल सैनिकों के अत्यंत मार्मिक दृश्य देखे हैं। किंतु हां, नियमित जीवन शैली और लक्ष्य प्राप्ति के लिए अंतिम सांस तक संघर्ष करने की प्रेरणा मुझे सेना से ही मिली। संभवतः इसी कारण मैं सेवा के अपने लक्ष्य को जीवन के इस पड़ाव में भी निभा पा रहा हूं।”

उन्होंने नेशनल हॉस्पिटल में सेवाएं जारी रहने के प्रति संचालक डॉ. आनंद तिवारी को साधुवाद दिया।

डॉ. आर. एस. मिश्रा जी अपने 58 वर्षीय चिकित्सा सेवा काल में लगभग 25 लाख राेगियों की चिकित्सा का कीर्तिमान रच चुके हैं। अपने बाल्यकाल और किशोरावस्था में वे हाकी, बास्केटबाल और कबड्डी के खिलाड़ी रहे हैं। अब फुर्सत में गीत – संगीत सुनना पसंद करते हैं। डॉ. मिश्रा के सुपुत्र आनंद एयर फोर्स में वाइस एयर मार्शल के रूप में देश सेवा – सुरक्षा में रत हैं। डॉ. मिश्रा को स्वस्थ सुदीर्घ जीवन के लिए मंगलकामनाएं।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १००० ⇒ विचार और अभिव्यक्ति (Thought & expression) ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “विचार और अभिव्यक्ति (Thought & expression)”।)

?अभी अभी # १००० ?

? आलेख – विचार और अभिव्यक्ति (Thought & expression) ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

क्या आपने thought of ocean (थॉट ऑफ़ ओशन) यानी विचारों के समुद्र के बारे में सुना है?

विचार हम उसे मानते हैं, जो प्रकट हो। यानी हम व्यक्त को ही विचार मानते हैं। फिर उस विचार का क्या, जो हमारे मन में पैदा तो होता है, लेकिन वह व्यक्त नहीं हो पाता। हमारी अभिव्यक्ति की विधा आज भी बोलने, लिखने और रिकॉर्ड करने तक ही सीमित है। वैसे दिव्यांग मूक बधिरों तक के लिए बिना बोले भी सांकेतिक भाषा विकसित हो चुकी है, दृष्टिबाधित के लिए ब्रेल और द्रुत गति से लिखने के लिए पिटमैन की शॉर्ट हैंड लिपि भी मौजूद है। आप लिखें और आप ही बांचे।

मन और बुद्धि जब मिल बैठते हैं, तो विचारों का जन्म होता है। श्रुति, स्मृति और संचित संस्कार हमारे अंदर एक थिंक टैंक का निर्माण करते हैं। लेकिन असल में शून्य के महासागर में कई विचार मछली की तरह तैरते रहते हैं। करिए, कितना शिकार करना है विचारों का।।

मन का काम संकल्प विकल्प करना है। जो भी दृश्य आंखों के सामने आता है, वह मन में विचारों को जन्म देता है। विचार, विचार होते हैं, अच्छे बुरे नहीं होते। अगर बुरा विचार आपने मन में रख लिया, तो कोई हर्ज नहीं।

अच्छे विचार ही तो आपको एक अच्छा इंसान बनाते हैं। कौन आपके मन में झांकने बैठा है।

दुनिया में पूरा खेल व्यक्त विचारों का ही तो है। अगर बुरे विचार तो बुरा आदमी, और अच्छे विचार तो अच्छा आदमी। इसीलिए दास कबीर भी कह गए हैं ;

ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोए,

औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए.

यानी बात मन, वचन और कर्म पर आ गई। अब अगर हमारे अंदर काम, क्रोध, लोभ और मोह के संस्कार हैं तो हम क्या करें, अपने मुंह पर ताला लगा लें। बस छान छानकर अच्छे विचारों को बाहर निकालो और बुरे विचारों को डस्टबिन में डाल दो।

आजकल तो कचरा भी री – साइकल हो रहा है, घूरे से सोना बनाया जा रहा है, लेकिन बेचारे बुरे विचार यहां से वहां तक रोते फिर रहे हैं, कोई घास नहीं डाल रहा। सबको अच्छे विचारों की तलाश है। ट्रक के ट्रक भरकर अच्छे विचार लाए जा रहे हैं और उनसे मोटिवेशनल स्पीच तैयार हो रही है। कितनी डिमांड है आजकल अच्छे विचारों की।।

एक गंदी मछली की तरह ही एक बुरा विचार पूरे समाज में गंदगी फैलाता है। अच्छे विचारों की खेती के लिए ही तो हम कीचड़ में कमल खिलाते हैं। जब बुद्धि, ज्ञान और विवेक काम नहीं करते, तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का सहारा लेते हैं। स्वच्छ भारत का संकल्प जितना आसान है उतना ही मुश्किल है, अच्छे विचारों के भारत का संकल्प।

काश हमारे मन में ऐसा कोई प्युरिफायर होता जो हमारे विचारों को फिल्टर कर देता, अच्छे विचार थिंक टैंक में, बुरे विचार नाली में। हो सकता है, संतों के पास कोई ऐसी फिटकरी हो, जिसके डालते ही, विचारों की गंदगी नीचे बैठ जाती हो, और चित्त पूरा साफ हो जाता है। जहां मन में मैल नहीं, वहां तो बस पूरा तालमेल ही है। हमारे आपके विचार आपस में कितने मिलते हैं।।

है न ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

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संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३३६ – दशपुत्रसमो द्रुम: ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३३६ दशपुत्रसमो द्रुम:… ?

हमारा फ्लैट हाउसिंग सोसायटी की ऊपरी मंज़िल पर है। सोसायटी के सामने सड़क है। सड़क के दूसरी ओर शिरीष का विशालकाय वृक्ष है। इस पेड़ की फुनगियाँ गुलाबी रंग के फूलों से लकदक हैं।

यह वृक्ष लगभग 70 फीट ऊँचा और अपनी डालियों के माध्यम से लगभग इतना ही चौड़ा हो चुका है। तेज़ हवा, बरसात के साथ इसके फूल उड़ते हैं, यहाँ-वहाँ बिखरते हैं। उसमें से कुछ हमारी बालकनी में रखे पौधों के गमलों में भी गिरते हैं।

पिछले दिनों एक गमले में इसी शिरीष की एक संतान ने जन्म लिया। धरती पर खड़ा 70 फीट का विशाल पेड़  और उसके सामने गमले में जन्मा और बढ़ा लगभग 1 फुट का यह पौधा। देखता हूँ कि पेड़ की फुनगियाँ निरंतर हमारे बालकनी के निकट आ रही हैं। दूरी लगभग 10 फीट की रह गई है।

सोचता हूँ, सड़क के उस पार लगा 70 फीट का यह पेड़ भी कभी अंकुरित हुआ होगा, ऐसे ही पौधा बना होगा। धीरे-धीरे बड़ा हुआ होगा। आंधी, तूफान, भीषण गर्मी सब सहन किए होंगे। पशुओं का भक्ष्य होने से बच गया होगा। इसकी आयु कितने वर्ष है, यह तो पता नहीं पर इसे विकसित होने के समुचित अवसर मिले, फलत: यह 70 फीट का हो चला है।

सही शारीरिक-मानसिक-बौद्धिक पोषण और उचित परिवेश मिले तो मनुष्य भी इसी तरह विकास कर सकता है। प्रकृति में हरेक अनुपम है। अतः अपने बच्चों पर अपने अधूरे सपने थोपने के बजाय उन्हें विकास के लिए समुचित वातावरण उपलब्ध कराना चाहिए। आगे वे अपने स्वभाव और अपनी मूल प्रकृति के अनुसार स्वयं विस्तार करेंगे।

नन्हा शिरीष थोड़ा बड़ा हो जाए तो किसी सुरक्षित स्थान पर इसे रोप आऊँगा। ऐसे स्थान पर जहाँ इसे विकसित होने के पर्याप्त अवसर मिल सकें।

इन दिनों गर्मी चरम पर है। सामान्यत: हमारी वृत्ति वृक्षों को काटकर बढ़ते तापमान पर सेमिनार आयोजित करने की रही है। यदि 25 से 50 वर्ष के आयुसमूह का हर भारतीय नागरिक दो पौधे भी रोपे, उनका ध्यान रखे, तो 45 डिग्री का औसत तापमान कम करने में समय नहीं लगेगा। पंछी लौटेंगे, अपने घोंसले बुनेंगे, कीटक पेड़ की खोह में घर बसाएँगे, जड़ों में सरीसृप भी बिल बनाएँगे। जैव विविधता का खंडित चक्र फिर अखंड होने की राह पर चल पड़ेगा।

कहा गया है,

दशकूपसमा वापी दशवापीसमो ह्रदः।

दशह्रदसमः पुत्रो दशपुत्रसमो द्रुमः॥

दस कुओं के समतुल्य एक बावड़ी, दस बावड़ियों के समतुल्य एक सरोवर, दस सरोवरों के समतुल्य एक सुयोग्य पुत्र और दस पुत्रों के समतुल्य एक वृक्ष कल्याणकारी होता है।

पर्यावरण के संरक्षण के लिए अथवा पुण्य के लिए अथवा अकारण, पौधारोपण अवश्य करें। इन पौधों से विकसित होनेवाले वृक्ष, देश को हरा-भरा रख सकते हैं। अनुभव बताता है कि मनुष्य जीवन को भी पल्लवित, पुष्पित एवं सुरभित रखने में हरियाली महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

प्रयास करें कि प्रकृति हरी रहे, परिसर हरा रहे, मन हरा रहे।

© संजय भारद्वाज 

(14:09 बजे, 23 मई 2026)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९९९ ⇒ सुख की उत्पत्ति ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सुख की उत्पत्ति।)

?अभी अभी # ९९९ ⇒ आलेख – सुख की उत्पत्ति ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जिन्हें सिर्फ आम ही खाना पेड़ नहीं गिनना, उनके लिए तो यही बेहतर है कि वे सुख के उद्गम अथवा उत्पत्ति के बारे में अधिक मगजपच्ची ना करें, उनके लिए सुख की अनुभूति ही सब कुछ है। आम से हमको मतलब, गुठली से क्या लेना। रबड़ी कैसे बनती है, यह जानकर हमें क्या करना। कुछ लेना न देना, सिर्फ ऑन लाइन जोमेटो पर ऑर्डर प्लेस करना। कोई दूध खरीदे, महंगी गैस पर उसे गर्म करे, ओटाये, सुख की आस में पसीना बहाए। आजकल इंस्टेंट अर्थात् त्वरित सुख का जमाना है, सुख की खोज के लिए ज्ञानवर्धक किताबों में आजकल सर नहीं गड़ाया जाता, हमने सभी सुखों को अपने रिमोट में कंट्रोल कर लिया है फिर चाहे वह टीवी, पंखा, कूलर अथवा एयर कंडीशनर ही क्यों ना हो। हवा आने दो।

सुख भी आजकल स्विच ऑन और स्विच ऑफ होने लगा है। हमसे किसी का अधिक सुख भी नहीं देखा जाता। अधिक सुख की तो छोड़िए, जिसे निर्मल वर्मा एक टुकड़ा सुख कहते थे, उस पर भी आजकल वक्त की नज़र लग चुकी है। आज के एक आम आदमी के टुकड़े टुकड़े सुख वास्तव में क्या हैं, जिन पर नियति अपनी बुरी नज़र लगा रही है। आइए देखते हैं।।

सुख आसमान से नहीं टपकता। सुख की उत्पत्ति का मूल ही कष्ट है, पीड़ा है, संघर्ष है, एक तड़प है। प्यास के बिना पानी नहीं, भूख बिना भोजन नहीं। विरह बिन मिलन नहीं।

नदी का उद्गम पहाड़ है।

कितनी चट्टानों से टकराकर वह अपनी राह निकालती है। चंचल प्रवाह, और संघर्ष के बीच, अच्छे बुरे मौसम का सामना कर सबके सुख के लिए निरंतर बहते रहना, सबकी प्यास बुझाना ही तो नदी का स्वभाव है। सुख वही शाश्वत है, जिसका अंत अनंत सुखसागर में हो।

एक बीज से वृक्ष की उत्पत्ति होती है, प्रकृति से लड़ना, जूझना, संघर्ष करना, बड़े होकर पंछी को छाया और फल देना, इसी में उसे सुख की अनुभूति होती है। कोई पेड़ पर फल तोड़ने के लिए पत्थर मारता है, वृक्ष फिर भी बदले में फल ही वापस करता है। हमारे और उसके मज़ा चखाने के अंदाज़ में बहुत अंतर है।।

नदियां ना पीएं कभी अपना जल।

वृक्ष ना खाएं कभी अपने फल।।

सुख है ही एक ऐसी वस्तु, जिसे लेने में भी सुख की अनुभूति होती है और देने में भी। लेकिन सुख का कोई पेड़ नहीं होता। थोड़ा कष्ट उठाया जाए, परिश्रम किया जाए, तब ही वास्तविक सुख का अहसास होता है। सुख और दुख विपरीत परिस्थितियों में एक दूसरे का साथ देते हैं। सर्दी में धूप से प्यार और गर्मी में ठंडी बयार। भूख में ही भोजन अमृत होता है।

आंखों में नींद हो, तब ही तो सोने का मज़ा है। रात भर करवटें बदलते रहने में काहे का सुख।

सुख एक मिट्टी के कच्चे घड़े की तरह है, इसे पकाना बहुत जरूरी है। अगर सुख के उद्गम में तप है, ताप है, तो मिट्टी होते हुए भी एक घड़ा कितने प्यासों की प्यास बुझा सकता है। इतनी तपन सहन करने के बाद ही उसमें शीतल जल समाता है। लकड़ी, लोहा, ईंट, सीमेंट, मिट मिटकर ही एक इमारत खड़ी करते हैं। सुख की नींव को बड़े जतन से सींचना, सहेजना पड़ता है।।

हमारी सुख की नींव में भी अगर त्याग है, तपस्या है, परिश्रम और संघर्ष है, तो हम उस वास्तविक सुख का अनुभव भी कर सकते हैं, जो सिर्फ लेने में ही नहीं, देने में भी है। सुख का मार्ग कभी एकांगी नहीं होता। सुख दुख हमेशा साथ चलते हैं।

सुख और दुख के छोटे छोटे बादल ही तो हैं हमारी आशाओं के आसमान में !

इसमें कहीं संतान सुख छुपा है तो कहीं सब्सिडी सुख। घटती बढ़ती पेंशन की तरह हम सुखी दुखी होते रहते हैं। बस एक जिजीविषा है जो हमारे सुख का भी उद्गम है और दुख का कारण भी। कौन नहीं बहना चाहता सुखसागर में, इसकी परवाह किए बगैर कि अनंत सुख क्या है। जो हाथ लग गया, वही वास्तविक सुख। फिर सुख के पीछे इतनी मगजमारी क्यों।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९९८ ⇒ खून पसीना ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “खून पसीना।)

?अभी अभी # ९९८ ⇒ आलेख – खून पसीना ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हमारे शरीर में खून भी है, और पानी भी। जो रगों में दौड़ता रहता है, वह खून कहलाता है। जरा सी चोट लगी, बहने लगता है। थोड़ी मेहनत की, पसीना बहने लगता है। जिनकी आंखें समंदर हैं, वहां समंदर जितने आंसू भी हैं। जितना पानी इस पृथ्वी पर है, उसी के अनुपात से, यानी हमारे इस शरीर में सत्तर प्रतिशत पानी है। हमारी इस पृथ्वी पर भी सत्तर प्रतिशत जल ही तो है।

स्वस्थ और तंदुरुस्त इंसान का खून बढ़ता है। जो हमेशा क्रोध करता है, जलता रहता है, क्या उसका खून नहीं जलता। खून पसीना बहाकर ही इंसान अपनी गृहस्थी चलाता है। खून की कमी और पानी की कमी से इंसान कमजोर हो जाता है। उधर होमोग्लोबिन घटा, इधर खून की बॉटल चढ़ी। शरीर के पानी की मात्रा घटने पर भी तो, सलाइन ही चढ़ाई जाती है।।

इन आंखों में कभी गुस्से में खून उतर आता है तो कभी जब दिल पसीजता है, तो पानी उतर आता है। समंदर ही खारा नहीं होता, हमारा पसीना भी खारा होता है।

कभी जब आपकी उंगली कटती है, तो हम उसे मुंह में ले लेते हैं, हमें हमारे खून का स्वाद भी पता चलता है, आंसू भी गर्म और नमकीन और हमारी रगों में दौड़ता खून भी गर्म और नमकीन। खून की गर्मी ही तो जोश है, जिंदगी है।

उधर जवान सरहद पर खून बहाता है और इधर किसान खेत में पसीना बहाता है। खून और पसीने का कर्ज उतारना हम देशवासियोंके लिए इतना आसान भी नहीं होता।।

जैसा मौसम, वैसी हमारी तासीर। बारिश के मौसम में इधर चाय पी, उधर तुरंत लघु शंका। पानी पीते ही टॉयलेट। ठंड में पसीना नहीं आता, शरीर को गर्मी और धूप चाहिए। भूख भी

गजब की लगती है। ठंड में हमारा स्वास्थ्य अच्छा रहता है।।

अभी तो गर्मी का मौसम अपने शबाब पर है। जून की शायरी मई में ही गुल खिला रही है ;

आजा मेरी जान,

ये है जून का महीना।

गर्मी ही गर्मी,

पसीना ही पसीना।।

जितना पसीना हम बहाते हैं, उतनी ही अधिक हमें प्यास लगती है। जो मेहनत अधिक करते हैं, उन्हें भूख भी अच्छी ही लगती है। भोजन से ही हमारा शरीर पुष्ट होता है, खून बढ़ता है, हमारी कार्य शक्ति प्रबल होती है।

खून पसीने से बना हमारा यह शरीर ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट कृति है। जिस तरह कुदरत खाद, पानी और हवा से पेड़, पौधों को सींचती, पल्लवित करती, चंदन वन में परिवर्तित करती है, उसी तरह केवल खून पसीने से हमारा यह शरीर कुंदन सा महकता है। आरोग्य के मंत्र से बड़ा कोई महामृत्युंजय मंत्र नहीं, सोना चांदी च्यवनप्राश नहीं। सच्चा सुख, निरोगी काया। हमने व्यर्थ ही नहीं, खून पसीना बहाया।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३२२ ☆ वर्तमान : सुंदरतम उपहार… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख वर्तमान : सुंदरतम उपहार। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – सन्नाटा जब मन में पसरने लगे / स्वर- डॉ. निशा आग्रवाल, सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३२२ ☆

☆ वर्तमान : सुंदरतम उपहार… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘अतीत लैसन है, वर्तमान गिफ़्ट और भविष्य मोटिवेशन’…इस वाक्य में ज़िंदगी का यथार्थ अथवा प्रयोजन निहित है। अतीत हमें शिक्षा देता है; पाठ पढ़ाता है; अच्छे-बुरे की पहचान कराता है। सो! अतीत से लगाव मत रखिए … उसकी स्मृतियों को अपने ज़हन से निकाल बाहर फेंकिए, क्योंकि वे आपके विकास में बाधक-अवरोधक  होती हैं… आपको पथ-विचलित करती हैं। हां! अतीत में झांकिए, परंतु उसमें लिप्त मत रहिए… जो अच्छा है, उसे ग्रहण कीजिए; संजोकर रखिए और जो बुरा है, उसे सदैव के लिए त्याग दीजिए। अतीत अर्थात् जो गुज़र गया, कभी लौटकर नहीं आता…फिर उसके लिए शोक क्यों?

आज गिफ़्ट है, उपहार है…उसकी महत्ता समझिए, उसका सम्मान कीजिए और उसे प्राप्त कर खुशी का इज़हार कीजिए…जो भी आपको वर्तमान में मिला है, उसे प्रभु-कृपा समझ अभिवादन-अभिनंदन कीजिए… उसके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कीजिए और मासूम बच्चे की भांति निरीह-निश्छल भाव से प्रसन्नता प्रकट कीजिए। वास्तव में वर्तमान ही सत्य है, क्योंकि अतीत कभी लौटता नहीं और भविष्य अर्थात् कल कभी आता नहीं। ‘जो भी है, बस! यही एक पल है। आगे भी जाने ना तू पीछे भी जाने न तू’ इस भाव को सार्थक करती हैं यह पंक्तियां… आज की अथवा वर्तमान की उपादेयता पर  प्रकाश डालती हैं। बुद्धिमान लोग आज में अर्थात् वर्तमान में जीते हैं; समय की महत्ता को स्वीकारते हैं और एक भी पल व्यर्थ नहीं जाने देते। चारवॉक दर्शन भी ‘खाओ, पीओ, मौज उड़ाओ’ सिद्धांत का पक्षधर है, संदेश-वाहक है और प्रयोगवाद व नयी कविता का क्षणवादिता का दृष्टिकोण भी हर पल को खुशी से जीने व भोग लेने की सीख देता है, क्योंकि वे नहीं जानते कि अगला पल आएगा या नहीं…यह शाश्वत सत्य है; अनास्था की पराकाष्ठा है। हमारे ऋषि- मुनियों ने वर्तमान की सार्थकता दर्शाते हुए, हर पल को अंतिम स्वीकार, कर्मनिष्ठता का संदेश दिया है। संसार में जो जन्मा है, उसकी मृत्यु निश्चित है। सो! वर्तमान में जीना सीखिए, यही ज़िंदगी का सार है।

भविष्य प्रेरणा है; अनिश्चित है, परंतु वह हमारा प्रेरक है…जिससे तात्पर्य है कि मानव को जीवन में अपना लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए और यह जानने की चेष्टा करनी चाहिए कि ‘वह कौन है और उसका संसार में आने का क्या प्रयोजन है? उसका लक्ष्य क्या है? लक्ष्य निर्धारण के पश्चात् ही आप उस लीक पर चल सकते हैं अर्थात् लक्ष्य-प्राप्ति में स्वयं को जी-जान से जुटा सकते हैं। इसके लिए हमारे पूजनीय माता-पिता, गुरु-जन व धार्मिक ग्रंथ ही हमारा मार्ग-दर्शन कर सकते हैं। सो! इनके प्रति श्रद्धा भाव रखना अपेक्षित है। परंतु आजकल तो यह ‘दूर के ढोल सुहावने’ वाली बातें मात्र जुमले बन कर रह गयी हैं। पहले वे हमारे आदर्श होते थे और हम उनके व्यक्तित्व को देख स्वयं को उसी रूप में ढालने में प्रयासरत रहते थे।

परंतु आजकल तो जीवन-मूल्य दरक़ रहे हैं…उनका निरंतर पतन हो रहा है। सो! ‘यथा राजा तथा प्रजा’ अर्थात् चारों ओर अराजकता का वातावरण छाया हुआ है। सो! किसी से आस्था व विश्वास की अपेक्षा करना व्यर्थ है, निष्फल है, निष्प्रयोजन है। हिंसा, लूटपाट व अनाचार, अनास्था व भ्रष्टाचार के वातावरण में, जहां इंसान किसी भी कीमत पर अधिकाधिक धन कमाना चाहता है; वहीं उसके हृदय से स्नेह, प्रेम व सौहार्द के भाव नदारद होते जा रहे हैं। वह रिश्तों की अहमियत को नकार, परिवार की खुशियों को अपने हाथों बेदर्दी से रौंद डालता है और दूर… बहुत दूर निकल जाता है, जहां उसे अपने सभी बेग़ाने नज़र आते हैं। इस मन:स्थिति में वह केवल धन की महत्ता को सर्वोपरि मानता है और अपने परिवारजनों और परिजनों की अहमियत व अपेक्षा-आवश्यकता नहीं महसूसता।

धन-संपदा हमेशा साथ नहीं देती। लक्ष्मी स्वभाव से चंचल है… ‘आज यहां, कल वहां।’ सो! एक लंबे अंतराल के पश्चात् उसे अपने आत्मजों की याद आती है, जिन्हें समय की आंधी बहा कर बहुत दूर ले जा चुकी होती है। अब वे उसे लेशमात्र अहमियत भी नहीं देते और वह एकांत की त्रासदी झेलने को विवश हो जाता है। समय नदी की भांति सदैव बहता रहता है, कभी रुकता नहीं। इसलिए मानव को समय के महत्व व अस्तित्व को स्वीकार करना चाहिए। बुद्धिमान व्यक्ति दूसरों के अनुभवों से शिक्षा प्राप्त करता व सचेत रहता है तथा उस ग़लती को नहीं दोहराता… ग़लत राह का अनुसरण भी नहीं करता। भविष्य हमें प्रेरणा देता है। सो! लक्ष्य निर्धारित कर उसे प्राप्त करने के मार्ग पर अग्रसर होना श्रेयस्कर है… जिसके लिए दरक़ार है… आत्मविश्वास व दृढ़ निश्चय की। हां! रास्ते में आने वाली बाधाओं के सिर पर पांव रख कर आगे बढ़ना ही … हमारे धैर्य की  परीक्षा है।

अब्दुल कलाम जी इसलिए ‘खुली आंखों से  सपने देखने की बात कहते हैं,  बंद आंखों से नहीं।’ आप स्वयं को परिश्रम की भट्ठी में झोंक डालिए…अच्छे- बुरे का ध्यान रखते हुए, स्व-पर, राग-द्वेष व लाभ- हानि से ऊपर उठ जाइए…यही सफलता की कसौटी है। दूसरे शब्दों में संसार में आप व्यक्ति नहीं,व्यक्तित्व बन कर जिएं, क्योंकि व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, व्यक्तित्व की  नहीं…वह अपने आदर्शों के रूप में सदैव ज़िंदा रहता है। परंतु यह तभी संभव है, जब हमारा लक्ष्य सामान्य मानव की तरह जीने का न हो अर्थात् संसार के समस्त प्राणी-जगत् में खाना-पीना सोना व सृष्टि-संवर्द्धन में सहयोग देना–तो सामान्य क्रियाएं हैं; परंतु मानव को प्रदत्त सोचने-समझने की शक्ति उसे  श्रेष्ठता प्रदान करती है। मानव का मस्तिष्क अर्थात् बुद्धि उसे शेष प्राणी-जगत् से अलग स्वरूप प्रदान करती है,  जिसके बल पर वह सृष्टि पर आधिपत्य स्थापित कर, सबको अंगुलियों पर नचा सकता है। परंतु उसकी सकारात्मक सोच उसे ‘व्यक्ति से व्यक्तित्व’ बनाने का सामर्थ्य रखती है। व्यक्तित्व अर्थात्  जिस पर दुनिया नाज़ करती है… उसके गुणों की चर्चा समस्त विश्व में होती है…  सब उसके गुणों का अनुसरण करते हैं और वैसा ही बनने का प्रयास करते हैं… उसका सानिध्य पाकर वे स्वयं को धन्य अथवा सौभाग्यशाली समझते हैं। ऐसा व्यक्ति भले ही दुनिया से रुख्सत हो जाए, परंतु वह मानव-मात्र के हृदय में समाया रहता है, सबके दिलों पर राज्य करता है। इसलिए मानव को व्यक्ति नहीं, व्यक्तित्व बनकर जीने का संदेश दिया गया है।

सोना अग्नि में तप कर ही कुंदन बनता है तथा उसकी चमक कीचड़ में गिरने के पश्चात् भी कम नहीं होती। इसलिए मानव का चरित्र भी कुंदन की भांति होना चाहिए, जिस पर आलोचनाएं प्रभावी न हो पाएं। सो! उसे स्थितप्रज्ञ होना चाहिए, जिस पर सुख-दु:ख, हानि-लाभ, मान-अपमान व निंदा-स्तुति का लेशमात्र भी प्रभाव न हो। शायद! इसीलिए आलोचनाओं को साबुन स्वीकार कर, उनसे अपने अंतर्मन में निहित अहं को धोने अर्थात् त्यागने का संदेश दिया गया है, क्योंकि अहं मानव का सबसे बड़ा शत्रु है। इसलिए उससे अपने भीतर छुपी दुष्प्रवृत्तियों …काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि से मुक्ति पाने का आग्रह किया गया है। इसलिए हमें आलोचकों अर्थात् निंदकों को जीवन में श्रेष्ठ स्थान देना चाहिए तथा सबसे बड़ा हितैषी स्वीकारना चाहिए, क्योंकि वे ही तो अपना सारा समय आपको, आपके दोष-दर्शन कराने में नष्ट करते हैं। वे अपने समय को आपके हित व समुन्नत करने में उपयोग करते हैं। ‘निंदक नियरे राखिए, आंगन-कुटी छ्वाय’ अर्थात् निंदक को सदैव अपने निकट रखना चाहिए। इस तरह वे आप के विकास के निमित्त सदैव चिंतित रहते हैं और आपको व्यक्ति से व्यक्तित्व बनाने में इनका योगदान श्लाघनीय है, अविस्मरणीय है।

मानव को इन हितैषियों द्वारा सुझाए गए रास्तों का अनुसरण कर, अपने अंतर्मन को निर्मल करना चाहिए, क्योंकि ऐसे लोग बिना साबुन पानी के आप को, दोषों व अवगुणों से अवगत करा कर प्रसन्न होते हैं। वे आपके प्रति ईर्ष्या-भाव नहीं रखते, क्योंकि वे आपके हित-चिंतक होते हैं। वास्तव में मानव को ऐसे लोगों का शुक्रगुज़ार होना चाहिए, जो नि:स्वार्थ भाव से स्वयं को सर्वश्रेष्ठ, सर्वोत्तम व सर्वोत्कृष्ट बनाने में अपने जीवन का अनमोल समय रूपी धन निवेश करते हैं, जिसका लाभ आपको मिल सकता है। यदि आप सजग व सचेत होकर स्वयं में परिवर्तन व सुधार लाएंगे, तो आपकी गणना उत्तम श्रेणी के लोगों में होने लगेगी।

इसी संदर्भ में मुझे याद आ रही हैं, वे पंक्तियां ‘जो बाहर की सुनता है, उसका बिखरना निश्चित है और जो भीतर की सुनता है, उसका निखरना अर्थात् संवरना निश्चित है, अवश्यंभावी है’…उपरोक्त विचारों की पोषक हैं। सो! आप व्यर्थ की आलोचनाओं से हताश-निराश न हों, बल्कि इनसे प्रेरित होकर स्वयं में सुधार लाएं। हां! लोग तो आपको बातों में उलझा कर आपको पथ-भ्रष्ट करना चाहते हैं। परंतु वही मनुष्य वास्तव में महान् है, जो उनके कटाक्षों व निंदा से विचलित नहीं होकर बिखरता नहीं… बल्कि अपने अंतर्मन की पुकार सुन कर संवर जाता है, निखर जाता है। सो! माया रूपी सांसारिक आंकर्षणों के पीछे न भागें और न ही दूसरों की आलोचना, व्यंग्य- बाण व कटाक्षों से हैरान-परेशान हों, बल्कि उनकी उपेक्षा कर निरंतर आगे बढ़ते जाएं … यही मानव का लक्ष्य है। हमें अपने अतीत से सीख लेकर, भविष्य के प्रति आश्वस्त होना चाहिए और वर्तमान में जीना चाहिए, क्योंकि वर्तमान ही सत्य है…उसे सुंदर बनाना अत्यंत कारग़र है, क्योंकि जो सुंदर होगा, कल्याणकारी अवश्य होगा। वर्तमान वह उपहार है, जो प्रभु-प्रदत्त है और आप उसे अपनी इच्छानुसार रूप व आकार प्रदान करने में सक्षम हैं, समर्थ हैं।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

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