हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९६८ ⇒ मच्छर, छिपकली और मनुष्य ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मच्छर, छिपकली और मनुष्य।)

?अभी अभी # ९६८ ⇒ आलेख – मच्छर, छिपकली और मनुष्य ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जीवः जीवस्य भोजनम् ! मनुष्य को मच्छर खाता है, तो मच्छर को छिपकली। अपनी आबादी को बचाने के लिए और सुरक्षित रखने के लिए, मच्छरों और छिपकली पर नियंत्रण जरूरी है इसलिए मनुष्य युद्ध स्तर पर घरों में पेस्ट कंट्रोल करवाता है और मच्छरों, कॉकरोच और छिपकलियों से एकमुश्त छुटकारा पाता है।

एक मच्छर मनुष्य को पूरा नहीं खा सकता। कहां मच्छर और कहां मनुष्य ! लेकिन जिस तरह पुष्टि के लिए मनुष्य रोज रात को एक ग्लास दूध का सेवन करता है, एक अंडे के लिए जिस प्रकार मुर्गी को नहीं मारा जाता, कुछ बूंद खून की ही मच्छरों की पुष्टि वर्धनम् के लिए पर्याप्त होती हैं।

मच्छर भी समझदार है, वह सोने की मुर्गी को हलाल नहीं करता। रोज रात को उसे दुहा करता है, यानी उसका आसान किस्तों में लहू पिया करता है।।

रात को मेरा कमरा, धर्मक्षेत्र, कुरुक्षेत्र हो जाता है। जिस प्रकार सात तालों में भी मौत प्रवेश कर जाती है और यमदूत जिसके प्राण लेना होते हैं, लेकर निकल ही जाते हैं, एक मच्छर सभी सुरक्षा प्रयासों के बावजूद और cctv कैमरे की नजरों के सामने रात्रि-दहाड़े कमरे में प्रवेश कर ही जाता है। एक मच्छर के लिए वैसे क्या दिन और क्या रात। क्या अंधेरा और क्या उजाला। उसने तो गंदगी और अंधेरे में ही अपने परिवार को पैदा किया, और पाला।

मच्छर प्रकाश में नृत्य करते हैं, मनुष्य का इंतजार करते हैं। मनुष्य के पास कई सुरक्षा कवच हैं मच्छरों के हमले से बचने के लिए। मच्छरदानी, ओडोमॉस, ऑल आउट और हिट। फिर भी मच्छर रणछोड़ नहीं। डेंगू, चिकनगुनिया और मलेरिया इसके प्रमाण हैं।।

रात के बारह बजे हैं। कुछ मच्छर प्रकाशोत्सव में नृत्य का आनंद ले रहे हैं। कमरे में एक शिवजी की बड़ी तस्वीर लगी है जिनके भाल में चंद्र और जटाओं में गंगा को अभय मिला हुआ है।

सर्प भी सुरक्षित है नागेश्वर के गले में। बस इसी त्रिपुरारी की तस्वीर की आड़ में एक छिपकली ने भी शरण ले रखी है। जब भी कोई मच्छर उसके दायरे में आ जाता है, उसका भोजन बन जाता है।

मछली की आंख की तरह छिपकली और मच्छर के बीच कोई नहीं आ सकता। पूरे कमरे में वह बेखौफ मच्छरों का शिकार करा करती है। मच्छर मेरा शत्रु भी है। इस प्रकार वह मेरी भी शुभचिंतक ही हुई। मेरी कोप दृष्टि से बचने के लिए वह शिवजी की शरण में चली जाती है। छिपकली वहां छिपकर उतनी ही सुरक्षित है जितनी फूलों के बीच एक कली।।

स्वास्थ्य और सुरक्षा मनुष्य की पहली आवश्यकता है। बढ़ती जनसंख्या भी एक चेतावनी है। जनसंख्या नियंत्रण भी मनुष्य के लिए उतना ही जरूरी है। लेकिन उसके भी पहले बीमारियों की रोकथाम के मच्छर, छिपकली और कॉकरोच का इलाज भी जरूरी है। कंट्रोल कंट्रोल ! बर्थ कंट्रोल के पहले पेस्ट कंट्रोल..!!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४१० ☆ आलेख – लघुकथा का ‘एक ही समय काल’ नियम: अभिव्यक्ति की बेड़ियाँ या आवश्यक संक्षिप्तता?☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१० ☆

?  आलेख – लघुकथा का ‘एक ही समय काल’ नियम: अभिव्यक्ति की बेड़ियाँ या आवश्यक संक्षिप्तता? ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

लघुकथा हिंदी साहित्य की एक संक्षिप्त विधा है, जो क्षणिक घटना पर आधारित प्रभावशाली कथन प्रस्तुत करती है। इसके मूल नियमों में ‘एक ही समय काल की घटना’ प्रमुख है, यानी कथा पूर्णतः एक ही क्षण या संकीर्ण समयावधि में समाहित हो। यह नियम प्रेमचंद काल के बाद के लघुकथाकारों शिवप्रसाद सिंह आदि के द्वारा प्रतिपादित हुआ, जो लघुकथा को उपकथा या लघु कहानी से अलग करने का प्रयास था।

लेकिन क्या यह नियम लघुकथा की अभिव्यक्ति क्षमता को अनावश्यक रूप से सीमित नहीं करता? यह प्रश्न आज प्रासंगिक है, क्योंकि यह विधा की गतिशीलता को बाँध देता है।

नियम की जड़ें और औचित्य ..

लघुकथा को ‘क्षण-कथा’ कहा जाता है, जहाँ उद्देश्य पाठक पर तत्काल प्रभाव छोड़ना है। एक ही समय काल का नियम अनावश्यक विस्तार रोकता है, पात्रों की संख्या सीमित रखता है और अंत को तीक्ष्ण बनाता है।

संक्षिप्तता ही लघुकथा को शक्तिशाली बनाती है। तात्कालिकता के नियम का औचित्य यही है, लघुकथा लंबी कहानी का संक्षिप्त संस्करण न हो, बल्कि स्वतंत्र विधा बने।

अभिव्यक्ति क्षमता पर समय सीमाबद्धता का नियम लघुकथा की अभिव्यक्ति को कृत्रिम रूप से बाँधता है। वास्तविक जीवन में कोई घटना शून्य काल में नहीं घटती । कारण-परिणाम की श्रृंखला घटना के समय को  फैलाती है। एक ही समय काल थोपने से जटिल सामाजिक मनोवैज्ञानिक मुद्दे इस विधा में व्यक्त नहीं हो पाते। अंतिम रूप से व्यंग्य, जो लघुकथा का मूल ट्विस्ट है, अक्सर ऐतिहासिक या सांस्कृतिक संदर्भ माँगता है, जो एक क्षण में समेटना संभव नहीं होता है।

एक काल्पनिक लघुकथा  की चर्चा करें।

मान लीजिए, एक आल्हा गायक गांव में आता है। यदि नियम पालन करें, तो “गायक ने तार छेड़ा। श्रोता चुप। एक सांड, भीड़ में घुस आया, अचानक भगदड़ मच गई। गायक भागा।”

लेकिन यदि हल्का समय विस्तार अनुमत हो, गायक का आगमन, गायन और सांड वाली घटना का संदर्भ, थोड़ी चर्चा परिदृश्य पर, तो प्रभाव गहरा हो सकता है।

एक और उदाहरण लें,

समकालीन मुद्दा, जैसे भोपाल गैस त्रासदी पर लिखें  तो, एक ही समय में ‘पीड़ित का दर्द’ दिखाना संभव नहीं, वह लंबी श्रृंखला रही है।

है से थी का सफर ।

कुछ आधुनिक लघुकथाकार इस समय सीमा का उल्लंघन करते हुए लघुकथा लिख भी  रहे हैं।

यह नियम तोड़ने से विधा ‘फ्लैश फिक्शन’ की वैश्विक धारा से जुड़ सकती है, जहाँ समय काल का लचीलापन स्वीकार्य है।

संतुलन की आवश्यकता..

निश्चित ही यह नियम लघुकथा को ‘चुटकुला’ बनने से बचाता है, लेकिन मेरी समझ में यह रचनात्मकता को कुंठित करता है। आलोचक विष्णु प्रभाकर ने कहा था कि लघुकथा ‘संक्षिप्तता’ है, न कि ‘काल-सीमा’। यदि नियम कठोर रहे, तो विधा अप्रासंगिक हो जाएगी, जैसे ताजा समाचारों पर आधारित कथाएँ जो शीघ्र पुरानी पड़ जाती हैं।

समाधान यह है कि ‘प्रमुख घटना एक काल में’ का लचीलापन स्वीकार किया जाए । इससे अभिव्यक्ति विस्तृत होगी, व्यंग्य गहरा होगा, और यह बिना कथा विस्तार के जाल में फँसे, संभव है।

लघुकथा को मुक्त करने का समय आ चुका है, आखिर यह कोई अंतिम कानूनी नियम नहीं, केवल साहित्यिक मान्यता ही है। लघुकथाकारो का दायित्व है कि विधा को व्यापक बनाया जाए ताकि यह साहित्य को समृद्ध और जीवंत करे। अन्यथा, यह नियम बाध्यता लघुकथा को हमारी ही बनाई बेड़ियों में सीमित बना कर व्यर्थ ही बांध रहा है।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९६७ ⇒ चिंतन शिविर ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चिंतन शिविर।)

?अभी अभी # ९६७ ⇒ आलेख – चिंतन शिविर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

शिविर के वैसे तो कई अर्थ होते हैं, अस्थायी कैंप, डेरा, पड़ाव टैंट, छावनी, और अड्डा। कालांतर में छावनी, डेरा और अड्डा स्थायी हो जाते हैं। दिल्ली में डेरा काले खां भी स्थायी है और सराय रोहिल्ला भी। हमारे शहर में भी बहुत पुराना जूनी इंदौर गाड़ी अड्डा है। और छावनी की तो बस पूछिए ही मत ! अंग्रेज़ चले गए, छावनी छोड़ गए।

जिस स्थान पर चिंतन किया जा सके, उसे चिंतन शिविर कहा जा सकता है। चिंतन हमारे नियमित जीवन का प्रमुख अंग है। सुबह उठते ही सबसे पहले जो कर्म होता है, उसे नित्य कर्म कहते हैं। जो मुक्त चिंतन के आदी होते हैं, वे सदियों से खुले में शौच करते आ रहे हैं। युग बदलेगा, सोच बदलेगा।

युग भी बदला, शौच का तरीका भी बदला। शांतता, घर घर चिंतन शिविर, नई सोच, खुलकर शौच। बद्ध मल से कोई बुद्ध नहीं बनता।।

जो संबंध चिंतन का चिंतन शिविर से है, वही संबंध सोच का शौच से है। जिनका संकीर्ण सोच होता है, उन्हें कब्जियत होती है। उनके लिए दुनिया गोल नहीं, ईसबगोल है। जिन्हें अधिक फिक्र होती है, वे पहले फिक्र को धुएं में उड़ाते हैं, लेकिन फिर भी बात नहीं बनती। गुटका, चाय और डाबर का लाल मंजन, सब बेकार, महज मनोरंजन।

शौच, सोच का नहीं, कर्म का विषय है। सकारात्मक सोच का परिणाम भी सकारात्मक ही निकलता है। एक अच्छी शुरुआत से आधा काम हो जाता है।

A good start is half done. शेक्सपियर ने भी तो यही कहा है ; All is well that ends well.

अंत भला सो सब भला।।

कुछ लोगों के लिए यह चिंतन शिविर युद्ध शिविर से कम नहीं होता। हम तो जब भी शिविर में जाते थे, यही कहकर जाते थे, पाकिस्तान जा रहे हैं।

इधर सर्जिकल स्ट्राइक, उधर हमारी फतह। बड़ी कोफ़्त होती थी, जिस दिन युद्ध विराम की घोषणा हो जाती थी। सब करे कराए पर पानी फिर जाता था।

वाचनालय तो खैर वह पहले से ही था, जब अखबार घर में कहीं नज़र नहीं आता था, तो घर के सदस्य समझ जाते थे, जब तक कोई हल नहीं निकलेगा, अखबार बाहर नहीं आएगा। हमारा चिंतन शिविर तो एक तरह का अध्ययन कक्ष ही बन गया था। घर पोच वाचनालय की तरह, जासूसी उपन्यास वहां आसानी से उपलब्ध हो जाते थे। बस सस्पेंस के बाद क्लाइमैक्स का इंतजार रहता था।।

आजकल चिंतन शिविर अत्यधिक आधुनिक हो गए हैं। सृजन और विसर्जन दोनों का कार्य यहां बड़ी कुशलतापूर्वक संपन्न होता है। लेकिन जितना शौच को सुलभ बनाने की कोशिश की जा रही है, उतनी ही लोगों की सोच बिगड़ती जा रही है।

चिंतन शिविर का मुख्य उद्देश्य निरोगी काया और निर्मल मन ही तो है। केवल शौचालय ही नहीं, अपनी सोच भी बदलें। आपके विचारों से आपके चिंतन शिविर की बू नहीं, खुशबू आना चाहिए।

चिंतक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९६६ ⇒ डबल सवारी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “डबल सवारी।)

?अभी अभी # ९६६ ⇒ आलेख – डबल सवारी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

यह तब की बात है, जब हर घर में एक साइकिल होती थी। साइकिल, जिसे बाइसिकल भी कहते हैं, एक ऐसा दुपहिया वाहन है, जिस पर मोटर व्हीकल एक्ट लागू नहीं होता, साइकिल का कोई रजिस्ट्रेशन नहीं होता और इसका कोई थर्ड पार्टी इंश्योरेंस भी नहीं होता।

हमने बचपन में एक पहिये की गाड़ी भी चलाई है और तीन पहिये की लकड़ी की हाथ गाड़ी भी। एक पहिये की छड़ीनुमा गाड़ी में एक हैंडल होता था, जिसके पहिये से एक घंटी भी जुड़ी रहती थी। इस साइकिल में बैठने का नहीं, साइकिल चलाने का सुख नसीब होता था। लकड़ी की, तीन पहिए की हाथ गाड़ी से तो हमने चलना सीखा था, साइकिल चलाना नहीं।।

हमें याद है, तीन पहिये की साइकिल, जिसमें एक सीट आगे होती थी और एक सीट पीछे, जिस पर छोटा भाई अथवा बहन भी आसानी से बैठ सकते थे।

वह सिंगल चाइल्ड का जमाना नहीं था।

दो पहिये की साइकिल सीखने के लिए कोई लर्निंग स्कूल नहीं था।

स्कूल के मैदान में, अथवा मोहल्ले की सड़कों पर ही यह ट्रेनिंग गिरते पड़ते संपन्न हो जाती थी। कैंची से शुरू होकर सीट पर बैठकर साइकिल चला लेना आपको एक कुशल साइकिल सवार सिद्ध कर ही देता था।।

साइकिल लेडीज भी होती थी और जेंट्स भी। हालां कि इसमें एक ही सीट होती थी, लेकिन पीछे साइकिल कैरियर भी होता था, जिसका अधिकतर उपयोग डबल सवारी के लिए किया जाता था।

भले ही तब साइकिल एक राष्ट्रीय सवारी हो, यह कहां सबके नसीब में होती थी।

बच्चों के लिए अगर साइकिल चलाना शौक था, तो बड़ों के लिए जरूरत। इन सबकी सुविधा के लिए कुछ ऐसे साइकिल की दुकानें थीं, जहां साइकिल रिपेयर भी होती थीं और प्रति घंटे की दर से किराए से भी मिल जाती थी।।

क्या साइकिल का भी चालान बनता था ? जी हां, हम भुक्तभोगी हैं। बड़ी दर्दनाक दास्तान है। तब शहर में न तो कहीं वन वे था और न ही ट्रैफिक सिग्नल ! बस चौराहों पर कुछ सिपाही मुस्तैदी से यातायात नियंत्रित करते रहते थे। अचानक एक दिन हम और हमारा दोस्त कृष्णपुरा पुल के थाने के पास डबल सवारी धर लिए गए।

हमें थाने ले जाया गया। डबल सवारी का चालान कटा, साइकिल जप्त हुई। इधर जेब में फूटी कौड़ी नहीं। पता चला, चालान कोर्ट में पेश होगा। कोर्ट में हमारी पेशी होगी, जज साहब जुर्माना वसूलेंगे, तब ही हम छूट पाएंगे। नाम, पिता का नाम, पता, सब तो नोट कर लिया गया। अगर पिताजी को पता चला तो एक तरफ कुआं और एक तरफ खाई।।

एकाएक नईदुनिया के एक

सिटी रिपोर्टर की हम पर नज़र पड़ी। वे पिताजी को जानते थे। लेकिन पुलिस बड़ी ईमानदार निकली। पत्रकार महोदय के कहने पर हमें साइकिल वापस मिल गई और हमें छोड़ भी दिया गया लेकिन अदालत का मुंह तो हमें फिर भी देखना ही था।

हमें समझा दिया गया था। जज साहब से ज्यादा बहस मत करना। चुपचाप अपना अपराध कबूल कर लेना। दो रुपए का जुर्माना भरना पड़ेगा। अगर सफाई पेश की तो जुर्माना डबल हो जाएगा।।

धर्मसंकट और आर्थिक संकट एक साथ। पिताजी तक बात भी नहीं जाए, और आर्थिक मदद भी कहीं से मिल जाए। ऐसे वक्त हमारे दाऊ यानी बड़े भाई साहब बहुत काम आते थे। उन्होंने सब संभाल लिया। कोर्ट में हमारी पेशी भी हो गई और आर्थिक दंड भरने के पश्चात हम लौटकर बुद्धू वापस घर भी आ गए।

आज वन वे में साइकिल क्या हाथी भी निकल जाए, तो कोई अपराध नहीं बनता। पूरी की पूरी बारात एकांगी मार्ग से गुजर जाती है, प्रशासन तमाशा देखता है, उधर डबल सवारी में हमारा तमाशा बन गया। आज हम कितने सुखी हैं

जो यह गीत गा रहे हैं ;

चक्के पे चक्का

चक्के पे गाड़ी।

गाड़ी पे निकली

अपनी डबल सवारी।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४०९ ☆ साहित्यिक पत्रकारिता की चुनौतियां ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०९ ☆

?  आलेख – साहित्यिक पत्रकारिता की चुनौतियां ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

साहित्यिक पत्रिकाओं का संपादन और प्रकाशन वर्तमान समय में किसी दुर्गम हिमालयी चढ़ाई से कम नहीं है क्योंकि यह केवल मुद्रण का व्यवसाय नहीं बल्कि एक वैचारिक प्रतिबद्धता का अनुष्ठान है। आज के इस तीव्र गति वाले डिजिटल युग में जहाँ सूचनाएं पलक झपकते ही स्मृति से ओझल हो जाती हैं वहाँ एक गंभीर साहित्यिक पत्रिका का नियमित प्रकाशन करना अपनी संस्कृति और भाषा के प्रति अगाध प्रेम का ही परिणाम हो सकता है।

कितनी ही साहित्यिक पत्रिकाएं बड़े उत्साह से प्रारंभ की जाती हैं, किन्तु पाठकीय समर्थन ना मिलने से या आर्थिक समस्याओं के चलते, विज्ञापन नहीं मिल पाने से अनेक उतनी ही जल्दी बंद भी हो जाती हैं। साहित्यिक पत्रकारिता के समक्ष सबसे पहली और बुनियादी चुनौती आर्थिक आत्मनिर्भरता की ही है क्योंकि व्यावसायिक पत्रिकाओं की तरह इनके पास विज्ञापनों का बड़ा आधार नहीं होता और यह पूरी तरह से व्यक्तिगत अर्थ प्रबंधन या सुधि पाठकों के सहयोग पर टिकी होती है। जबलपुर से विश्व वाणी हिंदी संस्थान के बैनर तले दिव्य नर्मदा और मंडला से महिष्मति जैसी पत्रिकाओं के प्रकाशन के दौरान मैंने इन धरातलीय संघर्षों को करीब से जिया है जहाँ बढ़ती मुद्रण लागत और डाक व्यय की चुनौतियों के चलते कई बार उत्कृष्ट प्रयासों को भी विराम देना पड़ता है।

कागज की बढ़ती कीमतों और वितरण की जटिलताओं ने लघु पत्रिकाओं के अस्तित्व पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है, हम देख रहे हैं कि इसी कारण कई ऐतिहासिक प्रिंट पत्रिकाएं दम तोड़ रही हैं। हालांकि संकट के इसी दौर ने तकनीक के माध्यम से एक नया मार्ग भी प्रशस्त किया है जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण हमारा ई-अभिव्यक्ति पोर्टल है। वेब पत्रकारिता के नए प्रतिमान स्थापित करते हुए इस मंच ने सात लाख अड़सठ हजार से अधिक हिट्स प्राप्त कर यह सिद्ध कर दिया है कि यदि सामग्री स्तरीय हो, नियमित प्रकाशन किया जाए तो पाठक भौगोलिक सीमाओं को लांघकर जुड़ता है।

 त्वरित संपादन और वैश्विक पहुंच के कारण यह पोर्टल पारंपरिक साहित्यिक पत्रकारिता और आधुनिक तकनीक का एक प्रभावी संगम बनकर उभरा है जहाँ पंद्रह अक्टूबर दो हजार अठारह से हमारी टीम निरंतर साहित्यिक अलख जगा रही है।

प्रिंट मीडिया के अपने गौरव और डिजिटल की अपनी गति के बीच समन्वय साधना ही आज की सबसे बड़ी जरूरत है।

एक बड़ी चुनौती नई प्रतिभाओं के चयन और परिष्कार की भी है क्योंकि आज रचनाओं की बाढ़ तो है लेकिन गुणवत्ता का अकाल पड़ता जा रहा है। ऐसे में संपादक का दायित्व और भी बढ़ जाता है कि वह आत्ममुग्धता के इस दौर में श्रेष्ठ और कालजयी साहित्य को पहचानकर उसे स्थान दे। वैचारिक और संवैधानिक चुनौतियों के बीच निष्पक्षता बनाए रखना भी किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मर्यादा के बीच एक महीन संतुलन साधना पड़ता है।

ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से फ्लिप बुक बनाना, जैसे नवाचारों ने यह दिखाया है कि कैसे दीपावली विशेषांकों की परंपरा को आधुनिक बदलते प्रकाशन चोले में जीवित रखा जा सकता है, और बढ़ते डाक व्यय से निपटकर एक क्लिक में उसे दुनिया में कही भी पहुंचाया जा सकता है।

आब ओ हवा पोर्टल पर मैं नियमित स्तंभ लिख रहा हूं, मेरा अनुभव यही है कि अब युवाओं में प्रकाशित साहित्य की जगह, पॉडकास्ट, ई बुक, किंडल बुक्स आदि अधिक लोकप्रिय है।

अंततः साहित्यिक प्रकाशन केवल पन्नों का संकलन नहीं बल्कि एक जीवंत संवाद है जो अतीत की विरासत को भविष्य के सपनों से जोड़ता है। यदि समाज और सरकारें इन वैचारिक केंद्रों को संरक्षण नहीं प्रदान करेंगी तो आने वाले समय में हमारी बौद्धिक चेतना का धरातल संकुचित हो जाएगा। चुनौतियों के इस महासागर के बीच जो पत्रिकाएं और वेब पोर्टल निरंतर सक्रिय हैं वे वास्तव में शब्द की मशाल लेकर अंधेरों से लड़ने वाले प्रहरियों की तरह हैं जिनकी तपस्या ही साहित्य को सजीव बनाए रखे हुए है। प्रिंट के संघर्षों से लेकर वेब पत्रकारिता के इस नए आकाश तक की यात्रा यही सिखाती है कि माध्यम चाहे जो भी हो निष्ठा और गुणवत्ता ही अंततः पाठक के हृदय में स्थान बनाती है। दिव्य तूलिका इसी संघर्ष की आग में तप कर, मुरैना जैसे एक छोटे शहर से, अवस्थी जी के व्यक्तिगत प्रयासों से निखर रही है। मेरी अशेष मंगल कामनाएं सदैव पत्रिका के साथ हैं।  

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १७३ – देश-परदेश – एल पी जी गैस: नई मुसीबत – भाग-१ ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १७३ ☆ देश-परदेश – एल पी जी गैस: नई मुसीबत – भाग-१ ☆ श्री राकेश कुमार ☆

घर का चूल्हा ना जले, तो कितना बड़ा पहाड़ टूट पड़ता हैं। आप लोग अभी ये अनुभव नहीं करें होंगे। पुरानी कहावत है, जिस तन लगे वो ही तन जाने”, जिनको समझ ना आया हो तो ” it is bearer who knows where shoe pinches”

कल एक पुराने साथी का फोन आया, उसने बताया कि दस वर्ष पूर्व वो जयपुर में अपना गैस का कनेक्शन जमा करवा कर अपने गृह नगर आ गया था। अब उसको गैस बुक नहीं करने दी जा रही है। जयपुर के कनेक्शन के समय उसका आधार कार्ड लिंक किया गया था। उसको एजेंसी ने डिएक्टिवेट नहीं किया है।

मित्र ने ये भी कह दिया, यदि मेरा काम नहीं हुआ तो, वो अपने गृह नगर से हमारे यहां आ जायेगा। उसकी इस धमकी से हम भी डर गए, और तुरंत गैस एजेंसी चल पड़े।

गैस एजेंसी की दुकान से पांच सो गज़ पूर्व वाहन प्रतिबंधित थे। जिस तरफ भीड़ जा रही थी, हम भी उसका हिस्सा बन गए, अधिकतर लोग खाली सिलेंडर साथ लिए हुए थे।

हमें भी कुंभ मेले की याद आ गई, वहां जैसा मोहाल था। ऐसा लग रहा था आगे त्रिवेणी संगम हैं। सब हमसे आगे जाते हुए प्रतीत हो रहे थे। हम तो भरपेट भोजन किए हुए थे, इसलिए धीरे चल पा रहे थे। भीड़ वाले चेहरे परेशान से नज़र आ रहे थे। मानो कई दिनों से बिना भोजन किए जल्दी में थे। कुछ लोग वापिस भी आ रहे थे। खाली पेट “करो या मरो” जैसी स्थिति होती हैं। हमारे यहां भी कहा गया है, “भूखे भजन ना होई गोपाला”

अब हमें भी भूख लग रही है, आगे की जानकारी के लिए भाग 2 का इंतजार करें।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९६५ ⇒ खिलाड़ी भावना ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “खिलाड़ी भावना।)

?अभी अभी # ९६५ ⇒ आलेख – खिलाड़ी भावना ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अगर किसी खेल में हार-जीत न हो, तो खेल का मज़ा ही क्या ! हर खेल जीतने के उद्देश्य से ही खेला जाता है। जो जीता वही सिकंदर कहलाता है। हारे को हरि नाम।

हर खेल में एक ही भावना होती है, प्रतिद्वंद्विता की भावना ! खेल की एक ही नीति होती है, रणनीति ! अगर भाई भाई भी कोई खेल खेलते हैं, तो एक हारता है, और एक जीतता है। महाभारत में युधिष्ठिर ने जुआ खेला था। पासे उल्टे पड़ते गए, वे सब कुछ हारते चले गए। राजसभा देखती रही, विदुर, भीष्म, कृष्ण कुछ न कर पाए और युधिष्ठिर द्रौपदी को भी हार बैठे। जहाँ शकुनि सामने होता है, हमेशा पासे उल्टे ही पड़ते हैं।।

आजकल सभी खेल पेशेवर हो गए हैं ! जीतने वाले को अगर बड़ी राशि और बड़ा पदक दिया जाता है, तो हारने वाले भी करोड़पति होने लग गए हैं। winner न सही, runner ही सही।

राजनीति भी एक खेल ही है ! यह सेवा का खेल है ! जो जीतेगा, सरकार बनाएगा, वही सेवा करेगा, जो हारेगा, वह न तो खेल छोड़ेगा और न ही सेवा करेगा। उसका खेला तो अब शुरू होता है। जो जीता है, उसे नहीं खेलने देना। वह एक ऐसी कबड्डी का खेल खेलता है, जिसमें सिर्फ टांग खींची जाती है। अगर सामने वाला गिर गया तो बच्चों की तरह ताली बजाई जाती है।।

खेल हो या राजनीति, जीतने के लिए हर तरह के खेल खेले जाते हैं। शक्ति प्रदर्शन, सूझबूझ और साम, दाम, दंड भेद सबका सहारा लिया जाता है। एक खेल मिलीभगत का भी होता है। जहाँ आर्थिक लाभ के लालच में शक्तिशाली हार जाता है और कमज़ोर विजयी हो जाता है। आईपीएल की भाषा में इसे सट्टा कहा जाता है। यह खेल भावना के विपरीत है।

राजनीति में चुनाव जीतने के लिए सभी तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं। ये कंडे गोबर के होते हैं और हाथ से बनाये जाते हैं। जब कभी ये हथकंडे भी काम नहीं आते, तो यही कहा जाता है, सारा गुड़ गोबर हो गया। पैसा, शराब और चुनावी वादे भी हथकंडों की श्रेणी में ही आते हैं।।

हमारे देश में दो ही तो राष्ट्रीय खेल हैं, राजनीति और क्रिकेट। राजनीति में खिलाड़ी भावना वैसे तो कम देखने को मिलती है। लेकिन सौजन्यवश, अगर जीता हुआ प्रत्याशी, हारे हुए प्रत्याशी को उसके घर जाकर बधाई दे दे, तो इसे खेल भावना का परिचय कहा जा सकता है।

चूँकि खिलाड़ी भावना, जिसे अधिक प्रभावी ढंग से व्यक्त करने के लिए अंग्रेज़ी में स्पोर्ट्समैन स्पिरिट कहते हैं, जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है, खेल से जुड़ी होती है, इसलिए आज भी खेल की हार-जीत केवल खेल के मैदान तक ही सीमित होती है। बाद में सभी हारे हुए, और जीते हुए खिलाड़ी पुरस्कार समारोह में एक दूसरे से हाथ मिलाते हैं, बधाई देते हैं। और खेल समाप्ति के बाद साथ साथ शॉपिंग करते हैं, प्रशंसकों को ऑटोग्राफ देते हैं।।

कितना विचित्र संयोग है ! इस बार चुनाव और आईपीएल टी-20 टूर्नामेंट, तकरीबन, साथ साथ ही चल रहे हैं। एक ओर अगर विश्व के सभी क्रिकेट के धुरंधर अपनी राष्ट्रीयता भूल एक बैनर के तले, पेशेवर तरीके से ही सही, अपनी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे हैं, कोई जीत रहा है, कोई हार रहा है, लेकिन प्रशंसक हर बॉल पर, और हर शॉट पर तालियाँ बजा रहे हैं और स्टेडियम में बैठे दर्शक ही नहीं, घरों में टीवी के सामने बैठे शौकीन और जानकार इस जेंटलमैन’स् गेम अर्थात सभ्य पुरुषों के खेल का आनंद ले रहे हैं, तो दूसरी ओर चुनावी माहौल में केवल एक दूसरे पर कीचड़ उछाला जा रहा है। लोकतंत्र के पवित्र उत्सव का मज़ाक उड़ाया जा रहा है।

चलिए मान लिया, everything is fair in love and war ! लेकिन क्या हम चुनावी हार जीत को क्रिकेट की हार जीत की तरह नहीं ले सकते ? नहीं कदापि नहीं ! ये चुनाव देश का भविष्य निर्धारित करेंगे, देश का भाग्य बदलेंगे। और हम मतदाता भाग्य-विधाता हैं। हमारे लिए यह चुनाव जीवन मरण का प्रश्न है। आईपीएल कोई भी जीते, हमें कोई मतलब नहीं। हमारा ध्यान तो इस ओर है कि इस बार किसकी सरकार बनती है। कोई खिलाड़ी भावना नहीं। खुला खेल फरूखाबादी।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९६४ ⇒ फटे कपड़े ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “फटे कपड़े।)

?अभी अभी # ९६४ ⇒ आलेख – फटे कपड़े ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कुछ कपड़े फट जाते हैं, तो कुछ कपड़े फाड़ दिए जाते हैं। हमारा जमाना कपड़े पहनकर फाड़ने का था। बाजार से पहले कपड़ा आता था, फिर खुशी खुशी दर्जी को नाप दिया जाता था। शादी, जन्मदिन अथवा पास होने की खुशी में ही नए कपड़े नसीब होते थे। तब दीवाली भी मिठाई और नए कपड़ों से ही मनाई जाती थी।

बड़े भाई के कपड़े आगे चलकर छोटे भाई के काम आते थे और बड़ी बहन के, छोटी बहन को। तब कहां टेरीकॉट और टेरिलिन के कपड़ों का चलन था। सूती कपड़ों को घर में वाशिंग मशीन में नहीं, मोगरी से कूटा जाता था। बरसात में कई दिनों तक कपड़े नहीं सूखते थे।।

मुझे अच्छी तरह याद है, मेरी सूती पैंट साइकिल अधिक चलाने के कारण अक्सर पीछे से ही फटती थी। बाकी सब जगह तो रफू हो जाता था, लेकिन तशरीफ के साथ मजाक नहीं चलता था। अगर पैंट पीछे से फटी, तो किसी काम की नहीं। कालांतर में फटी शब्द का अर्थ ही बदल गया।

कुछ फटे पुराने कपड़ों की मां मजबूत थैली बना लेती थी। तब कहां कैरी बैग चलते थे। घर घर में सिलाई मशीन थी। पुराने कपड़ों का कायाकल्प घर में ही हो जाता था।।

बच्चों की फ्रॉक, झबले और महिला सदस्यों के ब्लाउज घर पर ही सिलते थे। एक मशीन आती थी जिससे बटन के लिए कमीज में सूराख किए जाते थे, जिसे काज कहा करते थे। काज बटन संस्कार किसी नए परिधान के तैयार होने का अंतिम चरण था। कपड़ों में मशीन से काज बटन लगवाने का काम मेरा था।

तब हम लोग इतनी चैरिटी अफोर्ड नहीं कर सकते थे कि पुराने कपड़े किसी गरीब को दे दें। मोहल्ले में कुछ औरतें पुराने कपड़ों के बदले बर्तन दे जाती थी। मधुर तान में जब वह आवाज लगाती थी, तो लगता था, संगीत की कोई नई धुन सुन रहे हैं। कपड़ों की पूरी जांच परख होती थी। फटे कपड़े और होली के रंगे कपड़े, हिकारत से निकाल दिए जाते थे। केवल साबुत कपड़े ही एक्सचेंज ऑफर में स्वीकार्य थे। किचन के कई पुराने बर्तन आज भी हमारे पुराने कपड़ों के त्याग का ही प्रतिफल है।।

वैसे अंदर की बात कौन बताता है। लेकिन जब सबकी फटी फिर रही है तो हम भी क्यों पीछे रहें।

हम लक्स अंडरवियर, डोरा बनियान और बंबइया चड्डी की बात कर रहे हैं। इन्हें होजियरी कहते हैं। अगर बनियान में एक छेद हो गया तो वह बहुत जल्द एक गड्ढे में परिवर्तित हो जाता है। रबर की तरह समय के साथ बनियान लंबा होता चला जाता है। कभी कभी तो शर्ट छोटी और बनियान लंबी हो जाती है। आधी बांह का बनियान, आधी बांह की शर्ट से बाहर ऐसा नजर आता है जैसे जनता चौक पर दूर से ही राजवाड़ा।

मर्दों में भी आजकल लंबी चड्डी पहनने का फैशन चल गया है। ना वह हॉफ पैंट है, ना फुल पैंट। फैशन आती रहती है जाती रहती है। टीवी सीरियल के महिला पात्रों की पीठ, ढंकी रहने के बावजूद इतनी उघाड़ी रहती है कि ब्लैक बोर्ड की तरह उस पर गणित के कुछ प्रश्न भी आसानी से हल हो जाएं। इस्स ! हमें तो शर्म आती है भाई। कपड़े तो ठीक, हमें तो दूध भी फटा हुआ अच्छा नहीं लगता। काश फटी जीन्स का भी फटे दूध की तरह पनीर बन जाता।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३३० – सोंध ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३३० ☆ सोंध… ?

असमय बरसात हुई है। कुछ बच्चे घर से मनाही के बाद भी भीगने के आनंद से स्वयं को वंचित होने से रोक नहीं पा रहे हैं। बच्चों के भीगने को लेकर परिजनों की अपनी चिंताएँ हैं। अलग-अलग घर से अपने-अपने बच्चे का नाम लेकर पुकार लग रही है। ऐसे में अपना आनंद अधूरा छोड़कर घर लौटे लड़के को डाँटती उसकी माँ का स्वर कानों में पड़ा, “आई टोल्ड यू मैनी टाइम्स बट यू डोंट लिसन। मिट्टी इज़ डर्टी थिंग.., मिट्टी को हाथ भी नहीं लगाना। यू अंडरस्टैंड?”…इस आभिजात्य(!)  माँ की चिंता कानों में पिघले सीसे की तरह उतरी।

मिट्ट इज़ डर्टी थिंग..!!  सृष्टि के 84 लाख जीवों में से एक मनुष्य को छोड़कर शेष सबका प्रकृति के साथ तादात्म्य है। बुद्धि का वरदान प्राप्त विकास की राह पर चलते मनुष्य से यह तादात्म्य अधिक अपेक्षित है। तथापि अनेक प्राकृतिक आपदाएँ झेलते मनुष्य की भस्मासुरी प्रवृत्ति आश्चर्यचकित करती है। अपनी लघुकथा ‘सोंध’ स्मरण हो आई। कथा कुछ इस प्रकार है-…..

‘इन्सेन्स- परफ्यूमर्स ग्लोबल एक्जीबिशन’.., इत्र बनानेवालों की यह यह दुनिया की सबसे बड़ी प्रदर्शनी थी। लाखों स्क्वेयर फीट के मैदान में हज़ारों दुकानें। हर दुकान में इत्र की सैकड़ों बोतलें। हर बोतल की अलग चमक, हर इत्र की अलग महक। हर तरफ इत्र ही इत्र।

अपेक्षा के अनुसार प्रदर्शनी में भीड़ टूट पड़ी थी। मदहोश थे लोग। निर्णय करना कठिन था कि कौनसे इत्र की महक सबसे अच्छी है।

तभी एकाएक न जाने कहाँ से बादलों का रेला आसमान में आ धमका। गड़गड़ाहट के साथ मोटी-मोटी बूँदें धरती पर गिरने लगीं। धरती और आसमान के मिलन से वातावरण महकने लगा।

..दुनिया के सारे इत्रों की महक अब अपना असर खोने लगी थीं।  माटी से उठी सोंध सारी सृष्टि पर छा चुकी थी।…..

इस लघुकथा का संदर्भ इसलिए कि अपनी क्षणभंगुर कृत्रिमता को अविनाशी प्राकृतिक के सामने खड़ा करता मनुष्य दयनीय लगने लगा है। मिट्टी से बना आदमी अपनी मिट्टी खुद पलीद कर रहा है।

मिट्टी में मिलने के सत्य को जानते हुए भी मिट्टी से एलर्जी रखने वाली मनुष्य की यह मानसिकता सचमुच भय उत्पन्न करती है।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९६३ ⇒ सच का सपना ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सच का सपना।)

?अभी अभी # ९६३ ⇒ आलेख – सच का सपना ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कल सपने में मैंने सच को देखा ! या यह कहूं मैंने सच के दीदार किये, दर्शन किये। मैंने कभी खुली आंखों से सच का साक्षात्कार नहीं किया, जब भी आंख बंद की, कभी सच नजर नहीं आया और अचानक आज सपने में सच को सामने देखकर मुझे भरोसा नहीं हुआ कि मैं सच का सामना कर रहा हूं, दर्शन कर रहा हूं। हां, इतना अहसास ज़रूर था, कि मैं सपना देख रहा हूं।

आप भी सोचेंगे, जब सपना सिर्फ सपना ही होता है, कभी सच नहीं होता, तो सच सपने में क्यों और कैसे आ सकता है। लेकिन सत्य तो ईश्वर है, वह जब कहीं भी आ जा सकता है, तो मेरे सपने में भी सच बनकर आ सकता है। भले ही मैं उसे पहचान न पाऊं।।

आप सपने में आंख खोलकर नहीं देख सकते। सपने बंद आंखों से ही देखे जाते हैं। हां, सपनों को सच करने के लिए आंखें ज़रूर खोलनी पड़ती है, जागना पड़ता है, विवेकानंद बनना पड़ता है ;

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।

मेरे सामने सपने में सच था। मैने उसे देखने की कोशिश की। वह न तो नंगा था, न उसने फटी जींस पहन रखी थी, और ना ही वह अन्य किसी लिबास में था। स्वप्न में आप बड़े असहाय होते हैं। अवचेतन में बुद्धि और विवेक ताक में धरा रह जाता है, ठीक वैसे ही, जैसे बड़े बड़े मंदिरों में, प्रवेश के पूर्व, पर्स, कैमरा और मोबाइल तक लॉकर में रख लिया जाता है।।

जब बहुत देर तक सामने कुछ नज़र नहीं आया, तो मुझे सच पर शंका होने लगी। कहीं ऐसा तो नहीं कि सच वच कुछ नहीं, एक धोखा है, फरेब है, दिखावा है। काहे का शिव और सुंदर। क्या सपने में भी बोध होता है ! शायद सच मुझसे मुखातिब था, लेकिन सामने नहीं आ रहा था। लेकिन हां मैं उसे सुन रहा था। वह कह रहा था सच एक अहसास है जो हमेशा अपनी आत्मा के आसपास है। अंतरात्मा का सच से संबंध है।

हम जब भी खुद से दूर होते हैं, सच से दूर होते चले जाते हैं। अपने करीब रहना ही सच के करीब रहना है। अपने आप से दूर जाना सच से पीछा छुड़ाना है, झूठ के पीछे भागना है। सत्य में प्रकाश है, झूठ अंधकार है। सांच को आंच नहीं। मतलब क्या आत्मा की तरह सच को भी किसी अस्त्र अथवा शस्त्र से पराजित नहीं किया जा सकता।।

मैने देखा, अचानक सच कहीं गायब हो गया था और सपने में मैं सच से नहीं, अपने आप से ही बातें कर रहा था। मेरा अब भी यही मानना है, सपना कभी सच नहीं होता। सच कभी सपना नहीं होता। सच हकीक़त होता है, मीठा, कड़वा आपके अनुभव के आधार पर होता है। इतने लोग दुनिया में एक दूसरे को मज़ा चखाते हैं, कभी सच को भी चख लें, लोगों को भी सच का स्वाद चखाएं। वाकई, मज़ा आ जाएगा ..!!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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