हिन्दी साहित्य – कविता ☆ याद… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘याद…‘।)

☆ कविता – याद… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

☆

कभी तन्हा जो होता हूं,

तुम्हारी याद आती है,

यादों की,वो यादें भी,

हमें कितना सताती हैं,

 ये मन बेचैन रहता है,

नहीं अब चैन रहता है,

तुम्हारी प्यार की बाते,

रह रह याद आती हैं,

कभी सावन के झूलों में,

कभी बागों के फूलों में,

सूनी सूनी राहों में,

तुम्हारी याद आती है,

जब ये मन भटकता है,

वक्त नहीं जब कटता है,

आंखों से आंसू गिरते हैं,

तुम्हारी याद आती है,

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २५५ – हिंदी आरती ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी  – हिंदी आरती।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २५५ ☆

☆ हिंदी आरती ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

☆

भारती भाषा प्यारी की।

आरती हिन्दी न्यारी की… 

०

‘लोक‘ की भाषा है हिंदी,

‘तंत्र‘ की आशा है हिंदी।

करोड़ों जिव्हाओं-आसीन

न कोई सकता इसको छीन।

ब्रम्ह की, विष्णु-पुरारी की

आरती हिन्दी न्यारी की।।

०

वाक् हिंदी का ध्वनि आधार,

पाँच वर्गों बाँटे उच्चार।

बोलते जो वह लिखते आप-

वर्तनी स्वर-व्यंजन अनुसार।

नागरी लिपि सुविचारी की…  

० 

एकता पर हिंदी बलिहार, 

लिंग दो वचन क्रिया व्यापार।

संधियाँ काल शक्ति हैं तीन-

विशेषण हैं हिंदी में चार।

पाँच अव्यय व्यवहारी की

आरती हिंदी न्यारी की।।

०

वर्ण हिंदी के अति सोहें,

शब्द मानव मन को मोहें।

काव्य रचना सुडौल सुन्दर

वाक्य लेते सबका मन हर।

छंद-सुमनों की क्यारी की

आरती हिंदी न्यारी की।।

०

समेटे ज्ञान-नीति-विज्ञान,

सीख-पढ़-लिख हों हम विद्वान।

विषय जो कठिन जटिल नीरस-

बना देती हिंदी रसवान। 

विश्ववाणी गुणकारी की

आरती हिंदी न्यारी की।।

☆

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – महाभारत ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – महाभारत ? ?

अपने तब भी सामने खड़े थे,

अपने अब भी सामने खड़े हैं,

समय कितने फेरे लगा आया है,

एक बड़ा अंतर अवश्य आया है,

अस्त्र-शस्त्र का तब खुला प्रदर्शन था,

शस्त्र छिपाकर घात लगाना, अब चलन है,

समय के अंतराल के अपने आयाम हैं,

तब हो या अब, महाभारत अविराम है।

?

© संजय भारद्वाज  

12: 57 बजे, 06.11.2025

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # ९ – कविता – क्यों ?… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “क्यों ?…“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # ९  ?

? कविता – क्यों ?… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

तुम जो इतने पास रहे हो,

मैं धड़कन तुम साँस रहे हो।

 *

जीवन यह अँधियारा मेरा,

क्यों आलोक तलाश रहे हो।

 *

तुम जीवन की पुष्प-वाटिका,

गेंदा और पलाश रहे हो।

 *

मैं तो इक उजड़ा गुलशन हूँ,

क्यों माली बन फाँस रहे हो।

 *

मैं तो पत्रहीन तरु जैसा,

पाल घरौंदा आस रहे हो।

 *

मेरे दुख, मेरी पीड़ा का,

क्यों करते परिहास रहे हो।

 *

मेरे दरम्याँ पतझड़ हरदम

तुम बहार मधुमास रहे हो

 *

मैं निराश हूँ, मैं उदास हूँ,

फिर भी मन में वास रहे हो।

 *

तुम हो आशावादी इतने,

तम में दीप्ति तलाश रहे हो।

 *

ली न कभी ख़बर, न पूछा

क्यों ‘राजेश’ उदास रहे हो ?

☆

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # १८२ ☆ गीत – ।। जान लो एक दिन विश्वनायक मेरा हिंदुस्तान बनेगा ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # १८२ ☆

☆ गीत ।। जान लो एक दिन विश्वनायक मेरा हिंदुस्तान बनेगा ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

☆

जान लो एक दिन विश्व नायक मेरा हिंदुस्तान बनेगा।

विश्व शान्ति का एक परिचायक मेरा हिंदुस्तान बनेगा।।

**

भारत महान कहलाता संस्कार संस्कृति सहयोग कारण।

शांति से रहता भारत  कभी नहीं करता युद्ध अकारण।।

अपनी नीति कारण जन-जन नायक मेरा हिंदुस्तान बनेगा।

जानलो एकदिन विश्व नायक मेरा हिंदुस्तान बनेगा।।

**

चाल चरित्र और चेहरा भारत का विश्व अनुकरण करेगा।

भारत की पहल पर विश्व आतंकवाद निराकरण जनेगा।।

तीसरी बड़ीअर्थव्यवस्था सुखदायक मेरा हिंदुस्तान बनेगा।

जानलो एकदिन विश्व नायक मेरा हिंदुस्तान बनेगा।।

**

परमाणु ऊर्जा को विनाश नहीं बल्कि उत्पादन मेंआएगा।

यदि जरूरत नभजलथल में सौ ऑपरेशन सिंदूर लाएगा।।

संपूर्ण मानवता के लिए फलदायक मेरा हिंदुस्तान बनेगा।

जानलो एकदिन विश्व नायक मेरा हिंदुस्तान बनेगा।।

**

सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत विश्व में मिसाल बेमिसाल है।

वेद पुराण गीता रामायण की भी अनूठी संस्कारी ढाल है।।

सोने की चिड़िया सा नायक कमाल मेरा हिंदुस्तान बनेगा।

जान लो एक दिन विश्व नायक मेरा हिंदुस्तान बनेगा।।

☆

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ नशा… ☆ डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’ ☆

डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

(डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’ जी  बेंगलुरु से साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में मन्नू भंडारी के कथा साहित्य में मनोवैज्ञानिकता, दो कविता संग्रह, पाँच कहानी संग्रह,  दो  उपन्यास “फिर एक नयी सुबह” और  “औरत तेरी यही कहानी” प्रकाशित। इसके अतिरिक्त आपकी एक लम्बी कविता को इंडियन बुक ऑफ़ रिकार्ड्स 2020 में स्थान दिया गया है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। हाल ही में आशीर्वाद सम्मान से अलंकृत । आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता नशा… ।)  

☆ कविता ☆ नशा… ☆ डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’ ☆

लोग कहते हैं ’मत कर नशा’

क्या करें नशा है तेरी आंखों में

मानो बिन पिए ही शराब पी ली

ऐसी लत छूटे नहीं छूटती

नशा है तेरी वाणी में

सुनते ही रहे जिंदगी भर

यह भी नहीं अच्छा नशा

फिर भी बुरा नहीं है

नहीं चाहिए गुटका

नहीं चाहिए शिगार

बस देखते रहे तुम्हें

तुम गाती हो तो लगता है

फूल झर रहे हैं….

तुम्हारा नृत्य देखने लायक है

नशा तेरी हर चाल में है

नशा तुम्हारी हंसी में है

नशा मत कर मानव

नशा तेरे साथ ही चल रहा

नशा बना देता दानव

यह एक जहरीला सांप है

फैल जाता जीवन में

करता प्रभावित समाज को

फिर भी करने को करता मन

तेरी सूरत में सूरज सा प्रकाश

तेरी आंखों में खुशी

फैलाती हो खूश्बू संसार में

चलती हो तो फैलती चांदनी

लत लग चुकी है तेरी

भूलाये नहीं भूलती हो

बर्बाद हो चुका हू मैं

अभी लगता है मुझे

सच है जो लोग कहते है

फिर भी कर बैठा ‘जिंदगी का नशा’

☆

© डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

सम्प्रति : लेखिका व कवयित्री, सहायक प्राध्यापिका, रामैया इंस्टीट्यूट ऑफ बिज़नेस स्टडीज़, गोकुला, बेंगलुरू।

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२४६ ☆ गजल – जब होता सदभाव प्रेम है मिलता है आनंद तभी… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “गजल – जब होता सदभाव प्रेम है मिलता है आनंद तभी…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २४६ ☆

☆ गजल – जब होता सदभाव प्रेम है मिलता है आनंद तभी…  ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

☆

जियो और जीने दो सबको यह सिद्धांत सुहाना है

निश्चित हो जन हितकारी है औं जाना पहचाना है

*

इसके द्वारा ही जग मे सुख शांति हमेशा आती है

किंतु आज आतंकवाद का उभरा नया जमाना है

*

निर्दोषो का खून हो रहा गाॅव गली शैतानी है

कब किसके संग कैसे क्या हो कोई नही ठिकाना है

*

जब होता सदभाव प्रेम है मिलता है आनंद तभी

हर बुराई को तज के मन से सहज भाव अपनाना है

*

तरस रहे है तडप रहे है दीन दुखी अंधियारों मे

स्नेह दीप ले सबको मन से सही राह दिखलाना है

*

बिन समझे जो भटक रहे है स्वार्थो के गलियारो मे

जीवन औ ममता का मतलब उन्हें साफ समझाना है

*

द्वेष हमेशा दुखदायी है प्रेमभाव सुखदाता है

आपस का संबंध मधुर कर जग को स्वर्ग बनाना है

*

सबको साथ लिये बढने से ही हो समृद्धि सहज

बैर भव रखने वालों को यह ही मंत्र पढाना है

☆

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #७१ – गीत – बावरा मन चाहता… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – बावरा मन चाहता…।

? रचना संसार # ७१ – गीत – बावरा मन चाहता… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

☆

प्यारी कविता

प्यारी कविता सम सुख-सरिता,

तुम्हीं साधना हो मेरी।

हो अनुपम-अनुभूति हृदय की,

तुम्हीं भावना हो मेरी।।

*

कविता है दर्पण समाज की,

शत-शत है नमन  कामिनी।

चंदा सी हो श्यामल उज्ज्वल।

चिर कालिक दमक दामिनी।।

ओज दिव्य दिनकर जैसा है,

पूर्ण कामना हो मेरी।

*

सौम्य सुसंस्कृत भाषा कविता,

ज्ञान ज्योति पूजा थाली।

तोड़ रूढ़ियों को चलती है,

देवनागरी मतवाली।।

अनुशासन प्रिय प्रखर तूलिका,

तुम उपासना हो मेरी।

*

वाल्मीकि रसखान जायसी,

कवि भूषण पंत निराला।

रसमय मेघदूत वरदानी,

बच्चन-उर की  मधुशाला।।

सूर महादेवी मीरा की,

धवल कामना हो मेरी।

*

बहुरंगी सौन्दर्य प्रकृति का,

काव्यमयी  सुधा बिहारी।

कस्तूरी सौरभ उपवन की,

गीत छंद की फुलवारी।।

सदियों से भव भक्ति समाहित,

तुम्हीं याचना हो मेरी।

*

मुक्ति बोध के दीप जलाए,

हो इतिहास अमिट सारा।

वीरों की गाथा को गाती,

निर्मल गंगा की धारा।।

शुचिता की मानक परिभाषा,

तुम्हीं प्रार्थना हो मेरी।

☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३०० ☆ कविता – विश्वास ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – कविता  – विश्वास।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३००  – साहित्य निकुंज ☆

☆ कविता – विश्वास  ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

चलन हो चुका है लिखने का तो अब

अदब कम, हुनर कम, तमाशा बहुत है।।

*

इरादा  है मिलन का तुमसे लेकिन

समझो तो तुम ये इशारा बहुत है

*

लगाई है उम्मीद हमने जो अब तुमसे

लगता है इसमे अब हताशा बहुत है।

*

हम पर किया है अपनो ने ही भरोसा

लगाई है उनने हमसे आशा बहुत है ।

*

न जाने क्यों लूटती  बेटी की अस्मत

जहां मे दिखावे का तमाशा बहुत है ।

*

करें हम अब किस पर इतना भरोसा

करीब से रिश्तों को तराशा बहुत है ।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२८१ ☆ माँ पर दोहे… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है – माँ पर दोहे… । आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २८१ ☆

☆ माँ पर दोहे… ☆ श्री संतोष नेमा ☆

☆

जग की तपती धूप में, माँ शीतल सी छाँव|

माँ की थपकी प्रिय लगे, सबसे सुंदर ठाँव||

*

सेवा करती मौन हो, करती नहीं सवाल|

विमुख न होती कर्म से, रखती सदा खयाल||

*

तुझसे माँ साँसे मिलीं, तू जीवन संगीत|

तू रिश्तों की है धुरी, तू निश्छल सी प्रीत||

*

तेरे चरणों में बसें, गीता और  कुरान|

तू ही जीवन दायिनी, तू ही है भगवान||

*

पाठ मिला संस्कार का, तुझसे मिलता ज्ञान|

तुम से घर की रौनकें, तुम ही घर की शान||

*

माँ मूरत है नेह की, माँ ही भजन अजान|

माँ से बढ़कर जगत में, दूजा नहीं महान||

*

जन्म दायिनी कोख का, करें न हम  अपमान|

माँ ईश्वर इस जगत में, माँ का रखिए मान||

*

रहते घर में जो सदा, मात -पिता के पास|

उनकी सेवा से मिटे, जीवन के संत्रास||

*

माँ की सेवा से मिले, हमें शांति संतोष|

उनके ही आशीष से, बढ़ता सुख का कोष||

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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