हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 15 ☆ गीत हूँ मैं ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी रचना गीत हूँ मैं. )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 15 ☆ 

☆ गीत हूँ मैं ☆ 

 

सावनी मनुहार हूँ मैं

फागुनी रसधार हूँ मैं

चकित चंचल चपल चितवन

पंचशर का वार हूँ मैं

विरह में हूँ, मिलन में हूँ

प्रीत हूँ मैं

 

तीर हूँ, तलवार हूँ मैं

ऊष्ण शोणित-धार हूँ मैं

हथेली पर जान लेकिन

शत्रु काँपे काल हूँ मैं

हार को दूँ हार, जय पर

जीत हूँ मैं

 

सत्य-शिव-सुंदर सृजन हूँ

परिश्रम कोशिश लगन हूँ

आन; कंकर करूँ शंकर

रहा अपराजित जतन हूँ

शुद्ध हूँ, अनिरुद्ध शाश्वत

नीत हूँ मैं

 

जनक हूँ मैं-जननि लोरी

भ्रात हूँ मैं, भगिनि भोरी

तनय-तनया लाड़ हूँ मैं

सनातन वात्सल्य डोरी

अंकुरित पल्लवित पुष्पित

रीत हूँ मैं

 

भक्त हूँ, भगवान हूँ मैं

भगवती-संतान हूँ मैं

शरण देता, शरण लेता

सगुण-निर्गुण गान हूँ मैं

कष्ट हर कल्याणकर्ता

क्रीत हूँ मैं

 

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

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English Literature – Poetry ☆ Anonymous litterateur of Social Media# 14 ☆ गुमनाम साहित्यकारों की कालजयी रचनाओं का भावानुवाद ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। वर्तमान में सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत हैं साथ ही विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में शामिल हैं।

स्मरणीय हो कि विगत 9-11 जनवरी  2020 को  आयोजित अंतरराष्ट्रीय  हिंदी सम्मलेन,नई दिल्ली  में  कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी  को  “भाषा और अनुवाद पर केंद्रित सत्र “की अध्यक्षता  का अवसर भी प्राप्त हुआ। यह सम्मलेन इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय, दक्षिण एशियाई भाषा कार्यक्रम तथा कोलंबिया विश्वविद्यालय, हिंदी उर्दू भाषा के कार्यक्रम के सहयोग से आयोजित  किया गया था। इस  सम्बन्ध में आप विस्तार से निम्न लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं :

हिंदी साहित्य – आलेख ☆ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

☆ Anonymous Litterateur of Social Media # 14/सोशल मीडिया के गुमनाम साहित्यकार # 14 ☆ 

आज सोशल मीडिया गुमनाम साहित्यकारों के अतिसुन्दर साहित्य से भरा हुआ है। प्रतिदिन हमें अपने व्हाट्सप्प / फेसबुक / ट्विटर / यूअर कोट्स / इंस्टाग्राम आदि पर हमारे मित्र न जाने कितने गुमनाम साहित्यकारों के साहित्य की विभिन्न विधाओं की ख़ूबसूरत रचनाएँ साझा करते हैं। कई  रचनाओं के साथ मूल साहित्यकार का नाम होता है और अक्सर अधिकतर रचनाओं के साथ में उनके मूल साहित्यकार का नाम ही नहीं होता। कुछ साहित्यकार ऐसी रचनाओं को अपने नाम से प्रकाशित करते हैं जो कि उन साहित्यकारों के श्रम एवं कार्य के साथ अन्याय है। हम ऐसे साहित्यकारों  के श्रम एवं कार्य का सम्मान करते हैं और उनके कार्य को उनका नाम देना चाहते हैं।

सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार तथा हिंदी, संस्कृत, उर्दू एवं अंग्रेजी भाषाओँ में प्रवीण  कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी ने  ऐसे अनाम साहित्यकारों की  असंख्य रचनाओं  का कठिन परिश्रम कर अंग्रेजी भावानुवाद  किया है। यह एक विशद शोध कार्य है  जिसमें उन्होंने अपनी पूरी ऊर्जा लगा दी है। 

इन्हें हम अपने पाठकों से साझा करने का प्रयास कर रहे हैं । उन्होंने पाठकों एवं उन अनाम साहित्यकारों से अनुरोध किया है कि कृपया सामने आएं और ऐसे अनाम रचनाकारों की रचनाओं को उनका अपना नाम दें। 

कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी ने भगीरथ परिश्रम किया है और इसके लिए उन्हें साधुवाद। वे इस अनुष्ठान का श्रेय  वे अपने फौजी मित्रों को दे रहे हैं।  जहाँ नौसेना मैडल से सम्मानित कैप्टन प्रवीण रघुवंशी सूत्रधार हैं, वहीं कर्नल हर्ष वर्धन शर्मा, कर्नल अखिल साह, कर्नल दिलीप शर्मा और कर्नल जयंत खड़लीकर के योगदान से यह अनुष्ठान अंकुरित व पल्लवित हो रहा है। ये सभी हमारे देश के तीनों सेनाध्यक्षों के कोर्स मेट हैं। जो ना सिर्फ देश के प्रति समर्पित हैं अपितु स्वयं में उच्च कोटि के लेखक व कवि भी हैं। वे स्वान्तः सुखाय लेखन तो करते ही हैं और साथ में रचनायें भी साझा करते हैं।

☆ गुमनाम साहित्यकार की कालजयी  रचनाओं का अंग्रेजी भावानुवाद ☆

(अनाम साहित्यकारों  के शेर / शायरियां / मुक्तकों का अंग्रेजी भावानुवाद)

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ 

उनके हाथों में मेहंदी लगाने

का यह फायदा हुआ

कि रात भर हम उनके

चेहरे से ज़ुल्फ हम हटाते रहे..

  

 The advantage of applying mehndi 

On her hands was that I kept on

Removing the tufts of hair from 

Her face throughout the night…

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ 

 अगर इश्क़ करो तो

अदब ए  वफ़ा भी सीखो

ये चंद दिनों की बेकरारी

मोहब्बत नहीं होती..

  

  If you love someone then

Learn to practise loyalty too

A few days of restlessness

Is not construed as love…!

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ 

 उनके हाथों में मेहंदी लगाने का

ये फायदा हुआ…

की रात भर उनके चेहरे से

ज़ुल्फ हम हटाते रहे…

  

 Reward of applying mehndi on her

Hands was that I was privileged 

To remove the bangs of hair from 

Her face throughout the night…!

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ 

 तेरी एक झलक ही काफ़ी 

है जीने के लिए पर दिल का 

मोह ही है सारी उम्र मिल 

जाये तो भी कम है

 

Your one glimpse alone is

Just enough to live for but it’s the 

Fascination of heart that finds

It less even if it get entire lifetime

 

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ बंधन ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ बंधन ☆

खुला आकाश,

रास्तों की आवाज़

बहता समीर

गाता कबीर,

सब कुछ मौजूद

चलने के लिए…,

पर ठिठके पैर

खुद से बैर

निढाल तन

ठहरा मन…,

हर बार सांकल,

पिंजरा या कै़द

ज़रूरी नहीं होते

बांधे रखने के लिए..

 

©  संजय भारद्वाज

प्रातः 11.57, 5.7.2019

# सजग रहें, स्वस्थ रहें।#घर में रहें। सुरक्षित रहें।

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆

मोबाइल– 9890122603

 

 

 

 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा # 2 ☆ शासक वर्ग जहाँ नैतिक आचरणवान नहीं होगा ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

( हम गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  के  हृदय से आभारी हैं जिन्होंने  ई- अभिव्यक्ति के लिए साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य धारा के लिए हमारे आग्रह को स्वीकारा।  अब हमारे प्रबुद्ध पाठक गण  प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे।  आज प्रस्तुत हैं  आपकी कालजयी रचना  शासक वर्ग जहाँ नैतिक आचरणवान नहीं होगा.  ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा # 2 ☆

☆ शासक वर्ग जहाँ नैतिक आचरणवान नहीं होगा ☆

 

शासक वर्ग जहाँ  नैतिक आचरणवान नहीं होगा

जनता से नैतिकता की आषा करना है धोखा।

 

देष गर्त में दुराचरण के नित गिरता जाता है,

आषा के आगे तम नित गहरा घिरता जाता है।

 

क्या भविष्य होगा भारत का है सब ओर उदासी,

जन अषांति बन क्रांति न कूदे उष्ण रक्त की प्यासी।

 

अभी समय है पथ पर आओं भूले भटके राही,

स्वार्थ सिद्धि हित नहीं देष हित बनो सबल सहभागी।

 

नहीं चाहिए रक्त धरा को, तुम दो इसे पसीना,

सुलभ हो सके हर जन को खुद और देष हित जीना।

 

मानव की सभ्यता बढ़ी है नहीं स्वार्थ के बल पर,

आदि काल से इस अणुयुग तक श्रमरथ पर ही चलकर।

 

स्वार्थ त्याग कर जो श्रम करते वें ही कुछ पाते है,

भूमिगर्भ से हीरे, सागर से मोती लाते है।

 

त्याग राष्ट्र का स्वास्थ्य शक्ति है, स्वार्थ बड़ी बीमारी,

सदा स्वार्थ से ही उठती है भारी अड़चन सारी।

 

अगर देष को अपने है उन्नत समर्थ बनाना,

स्वार्थ, त्याग, उत्तम, चरित्र सबको होगें अपनाना।

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 42 ☆ फिर उग आया हूँ ☆ सौ. सुजाता काळे

सौ. सुजाता काळे

(सौ. सुजाता काळे जी  मराठी एवं हिन्दी की काव्य एवं गद्य विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं। वे महाराष्ट्र के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कोहरे के आँचल – पंचगनी से ताल्लुक रखती हैं।  उनके साहित्य में मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रकृतिक सौन्दर्य की छवि स्पष्ट दिखाई देती है। आज प्रस्तुत है  सौ. सुजाता काळे जी  द्वारा  प्राकृतिक पृष्टभूमि में रचित एक अतिसुन्दर भावप्रवण  कविता  “फिर उग आया हूँ”। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 42 ☆

☆ फिर उग आया हूँ ☆

 

कट गया पर उग आया हूँ,

देख तेरे सहर में फिर आया हूँ ।

रात ही तो बीती थी कटने के बाद

मैं जिंदा हरा भरा दिल लाया हूँ ।

जड़ से उखाड़ दिया, धड़ से गिरा दिया

बाजू कटी है मेरी पर मैं खिल आया हूँ ।

देख तेरे सहर में फिर आया हूँ ।

 

© सुजाता काळे

7/7/20

पंचगनी, महाराष्ट्र, मोबाईल 9975577684

sujata.kale23@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ सूत्र ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ सूत्र ☆

समय निश्चय ही

कठिन है, मगर

पाठशाला में

गणित का पाठ

सरल कब होता है,

समझ आने भर की देर है,

गणित का सूत्र

फिर हर कसौटी पर

खरा होता है!

 

©  संजय भारद्वाज

20.7.2018

# सजग रहें, स्वस्थ रहें।#घर में रहें। सुरक्षित रहें।

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆

मोबाइल– 9890122603

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज # 54 ☆ भावना के दोहे ☆ डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं   “भावना  के दोहे ”। ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 54 – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना  के दोहे  ☆

चीन चले ही जा रहा,

कैसी कुचक्र  चाल।

जीवन में   लेगें नहीं,

कभी  चीन का माल।।

 

छल छंदों के रूप को,

देख लिया है खूब।

मंचों पर होने लगी,

उन्हें देखकर ऊब।।

 

छल छंदों ने रच लिया,

अब तो खूब प्रपंच।

उड़ा रहे खिल्ली सभी,

खेद नहीं है रंच।।

 

फूल अधर पर खिल उठे

बाकर मृदु मुस्कान।

तुझ बिन जीवन कुछ नहीं,

तू ही मेरी जान।।

 

तन मन उपवन हो रहा,

सौरभ है मन प्राण।

कली कली मन की खिली,

मिला पीर को त्राण।।

 

सूरज तेरी आस में,

देख रहे है राह।

अंधकार पसरा बहुत,

ओझल हुई पनाह।।

 

© डॉ.भावना शुक्ल

सहसंपादक…प्राची

प्रतीक लॉरेल , C 904, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब  9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # 45 ☆ संतोष के दोहे ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. 1982 से आप डाक विभाग में कार्यरत हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.    “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में प्रस्तुत है शब्द आधारित  “संतोष के दोहे”। आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार  आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 45 ☆

☆ “संतोष के दोहे ☆

 

नवगीत

उठते पुलकित ह्रदय से,जीवन में नवगीत

बजती मन में बाँसुरी,यही ह्रदय संगीत

 

पछुवा

लिए कुटिलता चल पड़ी,अधर कुटिल मुस्कान

पछुवा संग चलें सदा,ये आंधी तूफान

 

पनघट

ताल,तलैया बावड़ी,वो पनघट का प्यार

उजड़ गए अब वो सभी,उल्टी चले बयार

 

दिनमान 

अक्सर छोटे लोग ही,करते हैं अभिमान

जैसे जुगनू समझता,खुद को ही दिनमान

 

शिल्प

करे शिल्प हर छंद का,मन भावन शृंगार

रचनाएँ अनुपम लगें,शोभा बढ़े अपार

 

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

सर्वाधिकार सुरक्षित

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.)

मो 9300101799

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ तत्त्वमसि ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ तत्त्वमसि ☆

अनुभूति वयस्क तो हुई

पर कथन से लजाती रही,

आत्मसात तो किया

किंतु बाँचे जाने से

कागज़  मुकरता रहा,

मुझसे छूटते गये

पन्ने  कोरे के कोरे,

पढ़ने वालों की

आँख का जादू

मेरे नाम से

जाने क्या-क्या

पढ़ता रहा…!

 

©  संजय भारद्वाज

प्रात: 9:19बजे, 25.7.2018

# सजग रहें, स्वस्थ रहें।#घर में रहें। सुरक्षित रहें।

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆

मोबाइल– 9890122603

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 62 ☆ किसना / किसान ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का एक विचारणीय एवं भावप्रवण कविता  “किसना / किसान ”। श्री विवेक जी  ने इस कविता के माध्यम से सामान्य किसानों  की पीड़ा पर विमर्श ही नहीं किया अपितु  पीड़ितों को उचित मार्गदर्शन भी दिया है। इस अतिसुन्दर एवं सार्थक कविता  के लिए श्री विवेक जी  का हार्दिक आभार। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 62 ☆

☆ किसना / किसान ☆

किसना जो नामकरण संस्कार के अनुसार

मूल रूप से कृष्णा रहा होगा

किसान है,

पारंपरिक,पुश्तैनी किसान !

लाख रूपये एकड़ वाली धरती का मालिक

इस तरह किसना लखपति है !

मिट्टी सने हाथ,

फटी बंडी और पट्टे वाली चड्डी पहने हुये,

वह मुझे खेत पर मिला,

हरित क्रांति का सिपाही !

 

किसना ने मुझे बताया कि,

उसके पिता को,

इसी तरह खेत में काम करते हुये,

डंस लिया था एक साँप ने,

और वे बच नहीं पाये थे,

तब न सड़क थी और न ही मोटर साइकिल,

गाँव में !

 

इसी खेत में, पिता का दाह संस्कार किया था

मजबूर किसना ने, कम उम्र में,अपने काँपते हाथों से !

इसलिये खेत की मिट्टी से,

भावनात्मक रिश्ता है किसना का !

वह बाजू के खेत वाले गजोधर भैया की तरह,

अपनी ढ़ेर सी जमीन बेचकर,

शहर में छोटा सा फ्लैट खरीद कर,

कथित सुखमय जिंदगी नहीं जी सकता,

बिना इस मिट्टी की गंध के !

 

नियति को स्वीकार,वह

हल, बख्खर, से

चिलचिलाती धूप,कड़कड़ाती ठंडऔर भरी बरसात में

जिंदगी का हल निकालने में निरत है !

किसना के पूर्वजों को राजा के सैनिक लूटते थे,

छीन लेते थे फसल !

मालगुजार फैलाते थे आतंक,

हर गाँव आज तक बंटा है, माल और रैयत में !

 

समय के प्रवाह के साथ

शासन के नाम पर,

लगान वसूली जाने लगी थी किसान से

किसना के पिता के समय !

 

अब लोकतंत्र है,

किसना के वोट से चुन लिया गया है

नेता, बन गई है सरकार

नियम, उप नियम, उप नियमों की कँडिकायें

रच दी गई हैं !

 

अब  स्कूल है,

और बिजली भी,सड़क आ गई है गाँव में !

सड़क पर सरकारी जीप आती है

जीपों पर अफसर,अपने कारिंदों के साथ

बैंक वाले साहब को किसना की प्रगति के लिये

अपने लोन का टारगेट पूरा करना होता है!

 

फारेस्ट वाले साहेब,

किसना को उसके ही खेत में,उसके ही लगाये पेड़

काटने पर,नियमों,उपनियमों,कण्डिकाओं में घेर लेते हैं !

 

किसना को ये अफसर,

अजगर से कम नहीं लगते, जो लील लेना चाहते हैं, उसे

वैसे ही जैसे

डस लिया था साँप ने किसना के पिता को खेत में !

 

बिजली वालों का उड़नदस्ता भी आता है,

जीपों पर लाम बंद,

किसना अँगूठा लगाने को तैयार है, पंचनामें पर !

उड़नदस्ता खुश है कि एक और बिजली चोरी मिली !

 

किसना का बेटा आक्रोशित है,

वह कुछ पढ़ने लगा है

वह समझता है पंचनामें का मतलब है

दुगना बिल या जेल !

 

वह किंकर्तव्यविमूढ़ है, थोड़ा सा गुड़ बनाकर

उसे बेचकर ही तो जमा करना चाहता था वह

अस्थाई,बिजली कनेक्शन के रुपये !

पंप, गन्ना क्रशर, स्थाई, अस्थाई कनेक्शन के अलग अलग रेट,

स्थाई कनेक्शन वालों का ढ़ेर सा बिल माफ, यह कैसा इंसाफ !

किसना और उसका बेटा उलझा हुआ है !

उड़नदस्ता उसके आक्रोश के तेवर झेल रहा है,

संवेदना बौनी हो गई है

नियमों,उपनियमों,कण्डिकाओं में बँधा उड़नदस्ता

बना रहा है पंचनामें, बिल, परिवाद !

किसना किसान के बेटे

तुम हिम्मत मत हारना

तुम्हारे मुद्दों पर, राजनैतिक रोटियाँ सेंकी जायेंगी

पर तुम छोड़कर मत भागना खेत !

मत करना आत्महत्या,

आत्महत्या हल नहीं होता समस्या का !

तुम्हें सुशिक्षित होना ही होगा,

बनना पड़ेगा एक साथ ही

डाक्टर, इंजीनियर और वकील

अगर तुम्हें बचना है साँप से

और बचाना है भावना का रिश्ता अपने खेत से !

 

© विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

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