हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११२ – रिश्ते जिंदा है क्या?… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – रिश्ते जिंदा है क्या?।)

☆ लघुकथा # ११२ – रिश्ते जिंदा है क्या? श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

अरे! देवर जी तुम कब आ गए आश्चर्य पूर्वक कमल जी ने कहा।

“अपनी भाभी भाई के घर में आने के लिए क्या मुझे कोई इजाजत लेनी पड़ेगी या कार्ड छपवाना पड़ेगा” नवीन बोला।

कमल जी ने कहा – “नहीं नहीं भैया मैं ऐसा नहीं बोल रही इतने दिनों तक आपने दर्शन नहीं दिया आज अचानक आप आए इसलिए मैंने ऐसा कहा।“

“भाभी भैया कहाँ है?” नवीन बोला।

“तुम्हारे भैया 13वीं का इंतजाम करने के लिए बाजार गए हैं” कमल जी ने कहा।

नवीन बोला- “तुम लोगों ने घर और खेत ले लिया है मेरे पास सिर्फ मेरा हिस्सा और दुकान है सब चीजों का बंटवारा तो हो जाना चाहिए।”

कमल जी ने कहा- “ठीक है देवर जी मैं भी यही चाहती हूँ लेकिन दुकान और घर का एक बहुत बड़ा हिस्सा तो आपके ही कब्जे में है जहाँ आप हमें जाने भी नहीं देते अभी पिताजी को गुजरे दो ही दिन हुए हैं। हम पर पहाड़ टूट पड़ा है और आप हमें आकर इस तरह बोल रहे हैं कम से कम 13 दिन तो रुक जाना था।”

नवीन बोला “भाभी रोने धोने का नाटक तो तुम बहुत अच्छा कर लेती हो गरीब बनाकर सबसे हमदर्दी लेकर पूरे समाज में हमारी बदनामी कर रही हो कि हमने सबसे ज्यादा हिस्सा ले लिया।”

रोते हुए कमला ने कहा – “अब हमारा तुम्हारा कैसा नाता चले जाओ अभी मैं तुमसे बात करने के मूड में नहीं हूँ, कुछ दिन बाद हम आराम शांति से बैठेंगे दीदी लोग को  बुला लेंगे।  दो बहने भी है तुम्हारी और फिर तय करेंगे कि किसी क्या मिलना चाहिए सारी पिताजी की विरासत में तुम्हारा ही हक  है।”

नवीन ने कहा- “ठीक है देखता हूँ, कैसे तुम सब हिस्सा लेते हो? नवीन गुस्से से बड़बड़ाता हुआ गया।”

कमल जी कहती है कि “हे भगवान इस दुनिया में क्या रिश्ते नाते जिंदा है? जाना सबको है छोड़कर लेकिन फिर भी लोग कैसे लड़ते हैं।”

 

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# १०४ – कसौटी… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– कसौटी…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # १०४ — कसौटी — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

ईश्वरीय कसौटी की एक अद्भुत कहानी है। सम्राट अनादिकाल से जन्म लेता आया है और उसी अनुपात से उसकी मृत्यु होती रही है। उसके जन्म और मृत्यु के इस परिवेश में देखा तो यही जाता है आधा संसार ही उसकी जीत में आता है और आधा उसकी जीत से मुक्त रह जाता है। शेष आधे की जीत उसके वश में हो भी नहीं सकती। यह ईश्वरीय है। ईश्वर उसे आधा ही ताज पहनाता है और आधा पहनाये बिना उसे बुला लेता है।

 © श्री रामदेव धुरंधर

27 – 04 — 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – लघुकथा – ☆ अपना काम करती रहो… ☆ सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ☆

सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा

(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 2 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह,मराठी में अनुवादित लघुकथा संग्रह, मराठी में अनुवादित  कहानी संग्रह, कुल 12 पुस्तकें प्रकाशित।  पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कालेलकर पुरस्कार 2013 । लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 45 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभारती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा अपना काम करती रहो

? लघुकथा – अपना काम करती रहो ? सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ?

आज उसे आईसीयू से निकाल कर प्राइवेट रूम में शिफ्ट कर दिया गया था. पति के साथ ही दोनों बच्चे भी वहां उसका इंतजार कर रहे थे . कमरे में अपने परिवार को देख उसके मन में गहरे संतोष के भाव उभर आए . कुछ देर बाद बच्चे घर चले गए तो वह पति से धीरे से बोली – “ कल मैंने एक कविता लिखी…..”

 पति हैरानी से बोले- “ आईसीयू में तुमने कविता कैसे लिख ली…?”

“ आपने ही तो मुझसे कहा था बीमारी को अपना काम करने दो तुम अपना काम करती रहो . बहुत चिंतन मनन चल रहा था. मैंने नर्स से कहा तो उसने अपने मोबाइल में मेरी कविता रिकॉर्ड कर ली. फिर मेरे मोबाइल में भेज दी . देखिए मेरे मोबाइल में होगी ….”

पति ने बड़ी उत्सुकता से जेब में से पत्नी का मोबाइल निकाला. कविता का ऑडियो साफ नजर आ रहा था .

“ चलो ,सुनते हैं…..” कह कर उसने ऑडियो ऑन किया. बहुत संवेदनशील कविता थी. अंत में पति के प्रति कृतज्ञता भी जाहिर की गई थी . पति ने उसके हाथ पकड़ कर चूम लिये .

“मुझे तुम पर गर्व है ….तुम्हारी हिम्मत पर…. तुम्हारी योग्यता पर… कला पर….”

“ और मुझे आपके सहयोग , प्रेरणा पर..” पत्नी भी हौले से मुस्कुरा दी. बेशक चेहरे पर दर्द भी साफ नजर आ रहा था.

“ चलो अब तुम बिल्कुल ठीक हो गई हो. केवल चार  कीमो लेनी होंगी …” पति के कहते ही वह फौरन कह उठी – “ अब मुझे किसी बीमारी का डर नहीं. जिसे आना है आए…. मैं तो अपना काम करती रहूंगी . आपने कहा था ना ….” फिर दोनों ही मुस्कुरा दिए . पत्नी की आंखों में गजब का आत्मविश्वास, दृढ़ता नजर आने लगी थी.

© नरेन्द्र कौर छाबड़ा

संपर्क –  सी-१२०३, वाटर्स एज, विशालनगर, पिंपले निलख, पुणे- ४११०२७ (महाराष्ट्र) मो.  9325261079 

Email-  narender.chhabda@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – मन की गाँठ… ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी, बी एड, प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । ‘यादों की धरोहर’ हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह – ‘एक संवाददाता की डायरी’ को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह- महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ कथा कहानी ☆ लघुकथा – मन की गाँठ… ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

-बाबू! बुरा तो नहीं मानोगे?

-नहीं! कहो, क्या बात है?

-अब आपकी चप्पल की लाइफ पूरी हो चुकी ! इस बार तो गांठ देता हूँ। ‌आगे मुश्किल है ! फिर नयी ले लेना! मैं  गांठ नहीं पाऊंगा!

-अरे! चप्पल को क्या हुआ? थोड़ी सी तो ठीक करनी है!

-वही तो कहा, बाबू जी! थोड़ी थोड़ी करते भी टांके लगाऊं तो आंखें जैसे इसी में टंक जाती हैं। आपको क्या है, नयी ले लेना, बाबू जी! अब तो बहुत ऑपरेशन कर लिये इसके ! अब इसकी लाइफ नहीं बची!

-ठीक है, मैं तो तुम्हारे बारे में सोच रहा था! अब काम ही कितना बचा है तुम्हारे पास!

-हां बाबू जी! काम तो पहले रेडिमेड जूतों, चप्पलों ने ले लिया ! अब रिपेयर भी कम ही आती है! लोग बाग घर पर ही जूते पालिश कर लेते हैं, पर आता हूँ  तो बाज़ार में आप जैसे लोगों से दिल बहल जाता है! और तो क्या! काम ही कहां बचा है?

-फिर गुजारा कैसे?

-बेटा पढ़ लिख गया, नौकरी लग गयी! बस, उसका सहारा ! आप बाबू जी! कैसे दिन बिताते हैं?

-बस, तुम्हारी तरह ! कुछ इधर बैठ लिया, कुछ उधर! निकल जाता है, दिन!

-कैसे?

-दिनों की मरम्मत करके, गांठें लगाते, कभी दुख की, कभी सुख की !

-लो, बाबू, आपकी चप्पल तैयार!

-ठीक है। पैसे कितने?

-अंतिम संस्कार के कैसे पैसे?

बाबू की आंखें भीग गयीं अपनी चप्पल को आखिरी बार देखकर !

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ लोक कथा – लोक देवता ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी  लोक कथा – लोक देवता।)

 

? लोक कथा – लोक देवता ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

राजस्थान के पोकरण में तंवर वंशीय राजपूत राजा अजमल थेl राजा श्री कृष्ण जी के परम भक्त थेl इनका विवाह भाटी राजवंश की मीनल देवी से हुआl विवाह के कई वर्षो तक इन्हें संतान सुख प्राप्त नहीं हुआl भक्त की भक्ति देख कृष्ण जी प्रसन्न हुए और वर मांगने को कहाl राजा ने कृष्ण को अपने पुत्र के रूप में प्राप्त करने की इच्छा रखीl ईश कृपा से राजा को दो पुत्र प्राप्त हुएl वीरमदेव और रामदेव l रामदेव जी का जन्म भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की दूज को हुआl इनकी शादी सोढा राजपुतानी नेतलदे से हुआl

रामदेव जी ने समाज से जाती पाती, छुआछूत, सामाजिक कुरुतियों को जहाँ समाज से निष्कासित किया वहीं गरीबों एवं दलितों का उत्थान करने की प्रमुख भूमिका निभाईl यही कारण है कि देश के भिन्न प्रांतों के लोग देवता के रूप में उनकी पूजा करने लगेl मेघवाल समुदाय जो कि राजस्थान और गुजरात में खेती, पशुपालन, कांच के काम की कढ़ाई बुनाई के लिये विशेष रूप से जाने जाते हैं एक अनुसूचित जनजाति है, रामदेव जी ने उनके उद्धार हेतु कई काम कियेl

बाबा रामदेव ने जितना हिन्दु उत्थान हेतु काम किया उतना ही मुस्लिम समाज के उत्थान हेतु भी बहुत काम किये इसलिए इन्हें दोनों ही समुदाय के लोग मानते हैंl भादवा मेला जो कि बाबाजी के जन्मदिन दिवस पर लगता है उसमें दोनों ही समुदाय सम्मिलित होते हैंl ये हिन्दुओं के भगवान और मुस्लिम समुदाय के पीर हैंl

रामसा पीर ने समाज को शान्ति और चैन से जीने की सलाह दीl जहाँ भी आपको पंच रंग का ध्वज दिखे वहाँ आपको रामसा जी का मंदिर देखने को मिलेगाl इनके ध्वज में सफ़ेद रंग – पवित्रता, सादगी और शान्ति लिये, लाल रंग शक्ति, ऊर्जा, साहस और क्रांति लिये, पीला रंग -त्याग सात्विकता, मंगल और आध्यात्मिक शक्ति लिये, नीला रंग- एकता और निष्ठा लिये और हरा रंग -शान्ति, भाईचारा और समृद्धि लिये होता हैl अर्थात ऊंच नीच का अंत और सभी में एक का ही वास हैl

रामसा जी को घोड़े पर बैठा दिखाते हैं क्यूंकि घोड़ा इनकी शक्ति और गति से लोगों तक पहुंचने का प्रतीक हैl

ऐसा कहा जाता है कि रूणिचा में राम सरोवर किनारे भाद्र पक्ष की शुक्ल पक्ष की ग्यारस को इन्होने जीवित समाधि लीl

रणुजा ना राजा, अजमलजी   ना बेटा, वीरामदे ना वीरा,

राणी हेतलना भरथार, म्हारो हेलो सांभड़ो जी

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४७ – लघुकथा- एक और फोन कॉल – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है  आपकी एक हृदयस्पर्शी कथा “एक और फोन कॉल।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४७ 

☆ लघुकथा – एक और फोन कॉल ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

फोन की घंटी बजती तो पूरे परिवार में सन्नाटा छा जाता। किसी की हिम्मत ही नहीं होती फोन उठाने की। पता नहीं कब, कहाँ से बुरी खबर आ जाए। ऐसे ही एक फोन कॉल ने तन्मय के ना होने की खबर दी थी।  तन्मय कोविड पॉजिटिव होने पर खुद ही गाडी चलाकर गया था अस्पताल में एडमिट होने के लिए। डॉक्टर्स बोल रहे थे कि चिंता की कोई बात नहीं, सब ठीक है। उसके बाद उसे क्या हुआ कुछ समझ में ही नहीं आया।अचानक एक दिन अस्पताल से फोन आया कि तन्मय नहीं रहा।  एक पल में  सब कुछ शून्य में बदल गया। ठहर गई जिंदगी। बच्चों के मासूम चेहरों पर उदासी मानों थम गई।  वह बहुत दिन तक समझ ही नहीं सकी कि जिंदगी  कहाँ से शुरू करे। हर तरह से उस पर ही तो निर्भर थी अब जैसे कटी पतंग। एकदम अकेली महसूस कर रही थी अपने आप को। कभी लगता क्या करना है जीकर ? अपने हाथ में कुछ है ही नहीं तो क्या फायदा इस जीवन का ? तन्मय का यूँ अचानक चले जाना भीतर तक खोखला कर गया उसे।

ऐसी ही एक उदास शाम को फोन की घंटी बज उठी, बेटी ने फोन उठाया।  अनजान आवाज में कोई कह रहा था – ‘बहुत अफसोस हुआ जानकर कि कोविड के कारण आपके मम्मी –पापा दोनों नहीं रहे।  बेटी ! कोई जरूरत हो तो बताना, मैं आपके सामनेवाले फ्लैट में ही रहता हूँ।’

बेटी फोन पर रोती हुई, काँपती आवाज में जोर–जोर से कह रही थी – ‘मेरी मम्मी जिंदा हैं, जिंदा हैं मम्मा। पापा को कोविड हुआ था, मम्मी को कुछ नहीं हुआ है। हमें आपकी कोई जरूरत नहीं है। मैंने कहा ना  मम्मी —‘

और तब से वह जिंदा है।

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १११ – बोझिल रिश्ता… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – बोझिल रिश्ता।)

☆ लघुकथा # १११ – बोझिल रिश्ता श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

रोमा और अरुण दोनों एक बड़ी नेशनल कंपनी में नौकरी करते थे। अनिल की मां का देहांत बचपन में ही हो गया था, मौसी ने ही पालपोस के बड़ा किया। पिताजी मर्चेंट नेवी में थे इसलिए अक्सर उन्हें बाहर ही रहना पड़ता था। मौसी ने ही मां पिताजी का प्यार दिया। मौसी बहुत ही धार्मिक एवं कम पढ़ी-लिखी महिला थी। अरुण ने अपनी मरजी से शादी की थी। रोमा भी उसके साथ काम करती थी और दोनों ने साथ में पढ़ाई भी की थी। मौसी के कारण ही दोनों की शादी हुई।वैसे तो मौसी शादी के सख्त खिलाफ थी।

शीशे के सामने बैठकर रोमा इसी विचार में खोई थी कि आज मौसी आ रही है, जाने अब क्या कहेगी?

उसके साथ तो 1 घंटे रहना भी मुश्किल है मैं कैसे रहूंगी?

तभी अचानक घंटी बजती है वह उठकर दरवाजा खोलती है-  “मौसी जी प्रणाम।”

“खुश रहो तुम। रोमा कुछ खाना भी बना कर रखा है पहले एक कप चाय पिला दो।”

“आप खाना खुद बना लेती हो” कमला मौसी ने कहा।

“अनिल को तो मैंने खाना बनाना सिखाया है। अनिल बनाता है या नौकर। तुम तो कुछ नहीं करती होगी?”

“मौसी जी आप मेरे हाथ की चाय पीजिए” रोमा ने कहा।

“चाय पीकर तुम दोनों तैयार हो जाओ आज तुम्हें एक शादी के कार्यक्रम में लेकर चलती हूं देखो हमारे यहां शादियां कैसी होती हैं?”

“मौसी जी जब आपको खाना नहीं खाना था तो हमसे क्यों खाना बनवा कर रखा” रोमा ने कहा।

“तो क्या हो गया” कमला मौसी ने कहा।

“यहां पर मैं अपनी सहेली के पोते की शादी में आई हूं तुम दोनों भी वहां चलो।”

रोमा ने कहा “मौसी मैं तो चलूंगी लेकिन क्या करूंगी वहां जाकर?”

कमला मौसी ने कहा “तू ठीक कह रही है अनिल मेरे साथ चलेगा तेरे बच्चे नहीं है इसलिए जाना अच्छा नहीं लगेगा।”

“मौसी यह कैसी बात कर रही हो” अनिल ने कहा।

“मैं कौन सा गलत बात कह रही हूं” कमला ने कहा “7 साल हो गए हैं कोई बच्चे नहीं है तुम्हारे।”

“तू ही यह रिश्ता ढो रहा है यदि मेरी सगी बहन होती तो उसकी बात तो मानता ना।”

रोमा की आंखों से आंसू निकलने लग गए और वह अंदर चली गई।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६२ – अक्षय मिलन ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “अक्षय मिलन”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६२ ☆

🌻लघु कथा🌻अक्षय मिलन🛕

मोहनी मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते चली जा रही थी। हाथों में पूजन की थाली, जिसमें गुड़ चना, सत्तू, मेवा, मौसमी फल पूजन का सामान।

मन में वही दृढ विश्वास मेरा अक्षय मिलन अटूट अमर है। सुंदर सादगी से भरा परिधान परन्तु चेहरे पर अब मासूमियत की जगह बेबसी ने ले लिया है। आँखे आज निहार रही है—सुना था अक्षय तृतीया को जो दान पुण्य किया जाता है वह अमर हो जाता है। मोहनी ने तो अपने अक्षय का ही दान कर दिया था।

जानती थी वह अक्षय के बिना नही रह पायेगी। परन्तु अक्षय किसी और का है ये वह कैसे निभा कर जी सकती थी।

नमः पार्वती पतये हर – हर महादेव के उच्चारण से निर्मल जल की धार अर्पण कर रही थी।

लाल चुनरी उसके सिर पर पीछे से सिर ढकते गिरा – – –

अक्षय सुहाग वर शुभ वर पीछे पलट कर देखी कोई और नही अक्षय ही तो थे। जल का लोटा पति चरणों पर अर्पित कर अक्षय मिलन का आनंद लेने लगी।

किसी ने ऊपर लगे घंटे को लगातार बजा कर अक्षय तृतीया की बधाइयाँ दी।

विवाह वर्षगांठ की हार्दिक बधाई से मंदिर परिसर गूँज उठा।।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# १०३ – मौत की फकीरी… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– मौत की फकीरी…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # १०३ — मौत की फकीरी — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

गरीब और धनवान धरती पर जीवन से बने रहे। धनवान ने खूब पाया और गरीब ने खूब खोया। गरीब कपड़े के लिए तरसता था और धनवान कपड़ों में बादशाह था। पर दोनों दो गज के कफन में लिपट कर भगवान के घर जाते। जाने में गरीब अपने दायरे से होताऔर धनवान इस तरह से होता दो गज से अधिक कफन में जाने की व्यवस्था हो तो वह जाने का रास्ता भूल जाता।

 © श्री रामदेव धुरंधर

14 — 04 — 2024

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – लघुकथा ☆ आभासी… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ लघुकथा ☆ आभासी… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

राजेशजी मन ही मन बुदबुदा रहे थे–कयामत की धूप है पर जाना तो पड़ेगा। श्रद्धांजलि अर्पित करनी होगी। मन, हां कहे या ना कहे, समाज के कायदे कानून निभाने ही पड़ते हैं। उन्होंने  अल्मारी खोली और एक सफेद पुराना सा कुर्ता पाजामा निकाला। अवसर के अनुकूल परिधान पहनने ही पड़ते हैं। पड़ोसी चन्द्रप्रकाश को फोन किया साथ चलने के लिये। रमन इन दोनों का अच्छा मित्र है। लेखक होने के साथ समाज सेवक भी है।

वे रास्ते में बात करते हुये जा रहे थे। यार राजेश — रमन के पिता की उम्र 90 वर्ष थी ना। पकी उम्र में गये।

–मुझे एक बात समझ में नहीं आती लोग सबसे पहले मरनेवाले की उम्र क्यों पूछते हैं। नब्बे से ऊपर सुनते ही ऐसी मुद्रा बनाते हैं मानों मृतक बेचारा धरती पर रहकर गुनाह कर रहा था। अच्छा हुआ चला गया। ज्यादा जीकर भी क्या करता।

—-राजेश ऐसे सवालों के गणित में उत्तर नहीं दिये जा सकते। मरनेवाला कोई बेहद अपना हो तब भी क्या उनका यही जवाब होगा।

बातों बातों में उन्होंने चार किलोमीटर की दूरी कब तै कर ली पता भी नहीं चला। देखा तो श्मशान घाट सामने था।

रमन के पिता का शव रखा था फूल-मालाओं से सजा हुआ।

कुछ रिश्तेदार और आठ दस पत्रकार /समाज सेवक/ राजनीतिक कार्यकर्ता /लेखक प्रजाति के लोग।

शोक सभा में विलंब था। सब आपस में बतियाने लगे। किसी ने अपने सद्यः प्रकाशित नाटक संग्रह की खासियत बताई। दूसरा कुछ लोगों के कड़क इस्त्रीदार कपड़ों पर टिप्पणी कर रहा था। तीसरा जाति धर्म को लेकर अंत्यविधियों का अंतर बता रहा था। सारे कसमसा रहे थे कि कब कब श्रद्धांजलि सभा खत्म हो और पिंड छूटे।

इतने में नुक्कड़ वाले नेताजी भी आ गये जिनकी प्रतीक्षा हो रही थी।

फोटोग्राफर और माइक का इंतजाम हो चुका था। सभी को फिक्र थी कि कल के अखबार में वे प्रमुखता से नज़र आयें। वर्ना इतनी मशक्कत करके जानलेवा धूप में इतनी दूर आने का क्या फायदा।

वैसे भी दो मिनट खामोश रहकर शोक व्यक्त करना किसी हर्क्युलियन टास्क से कम नहीं लगता।

नेताजी ने बोलना शुरू किया। इतने में एक शव यात्रा श्मशान में प्रकट हुई। बैंड-बाजे के साथ। बैंड-बाजे शोख धुनें बजा रहे थे जैसे किसी शादी में बजाते हैं।

राजेश जी सकपका गये। वे समझ नहीं पाये आखिर माजरा क्या है !

चन्द्रप्रकाश का कहना था – यह मृतक की अंतिम इच्छा रही होगी। या फिर ओशो का अनुगामी रहा होगा।

उधर नेताजी परेशान निगलते बने न उगलते। बैंड बाजे की उग्र तेजतर धुनों के बीच लोगों तक उनकी आवाज नहीं पहुँच पा रही थी। एक तो शोकाकुल चेहरा बनाओ दूसरे सबसे महत्वपूर्ण उनके श्रीवचन अनसुने रह जाने की टीस।

खैर। राजेशजी, रमन से मिले और श्मशान के बाहर निकलते ही चन्द्रप्रकाश से बोले–एक बात का जवाब दोगे ?

–बोलो

— रमन ने पिताजी की मृत्यु की सूचना दी तो fb. पर 400 लोगों ने श्रद्धा सुमन अर्पित किये और श्मशान में केवल आठ ?

–बस इतना जान लो, अब रिश्ते भी आभासी हो गये हैं।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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