हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ पुरस्कृत लघुकथा – कोख में आत्महत्या… ☆ सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ☆

सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा

(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह तथा 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह। कुल 9 पुस्तकें प्रकाशित।  पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कलेलकर पुरुसकर 2013 लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 35 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभरती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा कोख में आत्महत्या

? लघुकथा – कोख में आत्महत्या ? सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ?

(आचार्य जगदीशचंद्र शर्मा स्मृति अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता 2025 में पुरस्कृत)

“ प्यारी मां , मैं जानता हूं आज तुम बेहद खुश हो , तनाव मुक्त हो, बल्कि यूं महसूस कर रही हो मानो जीवन में कोई बड़ी जंग जीत ली हो. आज तुमने सोनोग्राफी की आड़ में लिंग परीक्षण कराया. जब डॉक्टर ने कहा आपकी कोख में लड़का है तो तुम्हारे मुख से खुशी से हल्की सी चीख निकल गई थी. आखिर दो लड़कियों की कोख में हत्या के बाद तुम्हें वह खुशखबरी सुनने को मिली थी जिसका तुम मुद्दत से इंतजार कर रही थी.

डॉक्टर को अनेक बार धन्यवाद देकर तुम घर लौटी .पापा भी बहुत खुश हैं और दोनों बेटियों को जब बताया कि उनका भाई आने वाला है तो वे भी खुशी से चहकने लगीं .उन्हें भी खेलने के लिए छोटा सा खिलौना मिल जाएगा. राखी बांधने भाई के लिए कितना तरसती थीं अब वह इच्छा भी पूरी हो जाएगी.

 मेरी मां, विज्ञान ने कितनी भी तरक्की कर ली हो लेकिन इस बार डॉक्टर भी गच्चा खा गए. तुम्हारी कोख में लड़का नहीं बल्कि मैं हूं, न लड़का ना लड़की. जिसे आम  इंसान अधूरा कहते हैं. मैं चिंतित हूं यह सोच कर कि मेरे जन्म से तुम सबको कितना बड़ा सदमा लगेगा. मेरे जन्म पर तुमने बैंड बाजे बजवाने की योजना बना रखी है. उसके स्थान पर ताली बजाने वाले आ जाएंगे  क्या हाल होगा तुम्हारा ? बहनों का राखी बांधने का अरमान कहां पूरा होगा? समाज से तिरस्कार,  व्यंग्य बाण, खिल्ली, सहानुभूति के सिवाय कुछ भी तो नहीं मिलेगा.  कैसे जी पाओगे इतने तनाव, परेशानियों के बीच ? इन सब से बचने का एक ही तरीका है मेरे जन्म को रोकना.  इसी में सब की भलाई है. इसलिए मैं अपनी सांसों की गति को विराम देने जा रहा हूं. कोख में कन्या भ्रूण हत्या का सिलसिला तो वर्षों से जारी है , लेकिन कोख में आत्महत्या कदाचित पहली बार होगी वह भी एक ऐसे शिशु द्वारा जिसके आगमन का पूरा परिवार बड़ी शिद्दत से इंतजार कर रहा है.इंद्रधनुषी सपने देखे जा रहे हैं.खुशियां मनाने की बड़ी योजनाएं बनाई जा रही हैं.

हमारी जमात हमेशा सबकी खुशियों में शामिल होकर , नाच गाकर आशीर्वाद और दुआएं देती है.उसी का अनुसरण करते हुए मैं भी आपकी खुशियों और दुआओं की कामना करते हुए हमेशा के लिए बिदाई ले रहा हूं…”

 तुम्हारा अजन्मा शिशु

© नरेन्द्र कौर छाबड़ा

संपर्क –  सी-१२०३, वाटर्स एज, विशालनगर, पिंपले निलख, पुणे- ४११०२७ (महाराष्ट्र) मो.  9325261079 

Email-  narender.chhabda@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ सेवकराम की लघुकथाएं – सम्मानपत्र, स्मृतिचिन्ह और पुस्तकें ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆  लघुकथा ☆ सेवकराम की लघुकथाएं ☆

☆ सम्मानपत्र, स्मृतिचिन्ह और पुस्तकें ☆

(मेरी लघुकथाओं के पात्र ‘सेवकराम’ के इर्दगिर्द रची गई कुछ लघुकथाओं को आपसे साझा करने का प्रयास।)

सेवकराम जी को अपने प्रिय साहित्यकार मित्र डॉ रंजीत की काफी याद आ रही थी. उनका देहावसान बीस दिन पूर्व ही हुआ था. उनके जाने के एक माह पूर्व ही उनकी पत्नी रंजना भाभी का देहावसान हो गया था.

उन्होंने अपना सारा जीवन अध्यापन और साहित्य सेवा में निकाल दिया. उनके सुशील और सेवाभावी पुत्र सुजीत और विनम्र पत्नी सुनीता ने रंजीत जी और रंजना भाभी की अंत तक सेवा की. ऐसे भाग्यशाली बहुत कम ही देखने को मिलते हैं. डॉ रंजीत ने अपने बेटे को बमुश्किल शहर के एक प्राइवेट कॉलेज में नौकरी भी दिला दी थी.

आज सेवाराम जी को डॉ रंजीत की याद उनके घर तक ले गई थी. सुजीत उन्हें डॉ रंजीत जी के कमरे में ले गया.  वे टेबल के पास कुर्सी पर बैठ गए जैसा हमेशा बैठते थे. कमरा अब भी वैसा ही था.

औपचारिकतावश सुजीत से उन्होंने पूछा – “बेटे मेरे लायक कुछ हो तो निसंकोच बताना.”

सुजीत ने झिझकते हुए अपनी समस्या साझा करना चाहा- “चाचा जी, आप यह सब जो इस कमरे में चारों ओर देख रहे हैं न, पिताजी के सम्मानपत्र, स्मृतिचिन्ह और पुस्तकों से भरी बुकशेल्फ! इतनी ही पुस्तकें इस दो कमरे के घर में भरी पड़ी हैं। मैं इनका क्या करूँ? कोई इन्हें लेने के लिए भी तैयार नहीं है. शहर में एक भी पुस्तकालय नहीं बचे जहाँ ये पुस्तकें दी जा सकें. उनके कोई मित्र भी लेने को तैयार नहीं हैं.”

अब सेवकराम जी का मस्तिष्क शून्य हो गया. उन्हें कुछ सूझ ही नहीं रहा था. बड़े मुश्किल से वह यही कह सके – “बेटा सुजीत, मुझे सोचने के लिए थोडा वक्त दो.”

और वे चुपचाप घर की ओर निकल पड़े.

©  हेमन्त बावनकर  

पुणे 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 234 – मै किसान हूँ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “मै किसान हूँ ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 234 ☆

🌻लघु कथा🌻 👨‍🎓मै किसान हूँ 🌻

शहर में कई प्राईवेट दंत चिकित्सालय, और सभी अस्पताल में मारामारी। पहले हम, पहले हम, और नेता, पैसे वालों की पुर पहुँच। पूछताछ  कक्ष पर बैठी सिस्टर बार-बार कह रही थी – – – सभी लाइन में आए, सभी लाइन में आए!! अपनी-अपनी पारी से आए नहीं तो डॉक्टर साहब बाहर निकाल देंगे।

फिर ना कहना हमें बताया नहीं। सभी के नाम परिचय के साथ लिख रही थी।लगभग चौबीस वर्ष का युवक पिता के साथ बैठा था। जब उससे पूछा गया – –

आपका नाम– बहुत ही शालीनता के साथ उसने बोला- अभिषेक

किसको दिखाना है?

अपने पिताजी लेकर आया हूँ।

क्या करता है – – – खेती करता हूँ।

सर से पाँव तक  न जाने क्यों सभी  लोग देखने लगे। साधारण पहनावा पर कद काठी गठीला दमकता शरीर।

अपने पिताजी के दांत दर्द से वह परेशान हो रहा था। बातों ही बातों में पास बैठी एक सज्जन महिला ने पूछ लिया— नौकरी नहीं? मिली या पढ़ाई नहीं किया?

अभिषेक ने धीरे से गहरी मुस्कान के साथ बताया बी. ई. की पूरी पढ़ाई करने और सर्विस को छोड़ने के बाद मैं खेती करने आ गया।

पापा का हाथ बटाना चाहता हूँ।

और यह कहते हुए पेंट की जेब से नोटों की गड्डी को निकाला और फीस जमा करने लगा।

उसके दृढ विश्वास को देख महिला ने ताली बजाकर कहा – – गर्व से कहो मै किसान हूँ।

प्यार दुलार से उसके सिर पर हाथ फेरा और बोली अब कोई पूछे तो खेती करता हूँ नहीं गर्व से सीना तानकर कहना – – – मैं एक किसान हूँ।

अभिषेक के चेहरे पर मासूम भरी मुस्कान और किसान की पहचान।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “जो भूला नहीं” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “जो भूला नहीं” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

– बेटा केशी! जल्द घर आ जाओ।

मां बुरी तरह सुबकती हुई फोन पर कह रही थी।

– क्यों? क्या हुआ?

– तुम्हारे छोटे भाई ने मुझे बैठक में अलग कर दिया है और अपनी रोटी पानी भी मैं ही बना कर खाती हूं। क्या करूं? बुढ़ापा पेंशन में कहीं गुजारा होता है! तुम आ जाओ बस।

– मैं कैसे आ सकता हूं मां?

– क्यों? तूने भी आंखें फेर लीं मां से?

– नहीं। पर मैं इतनी दूर जो हूं। छुट्टी लेनी पड़ेगी। मिले न मिले। बच्चों के पेपर हैं।

– जाओ फिर भूल जाओ मां को!

– ऐसे न कहो मां! मेरी मजबूरी को समझो। मैं जल्द आकर तुम्हें ले आऊंगा। फिर तो खुश?

– हाँ। जल्द आ जाना।

सुबकती सुबकती मां फोन रख गयी।

फिर जरूरत ही न रही लाने की।

कुछ दिन बाद माँ दम तोड़ गयी थी। भाई ने बुलाया और सब काम धाम छोड़कर भागा!

काश! पहले…!

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # 152 ☆ लघुकथा – ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘पर्दा। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 152 ☆

☆ लघुकथा – सच से दो- दो हाथ ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

‘महेश! उठ कब तक सोता रहेगा?‘ – माँ ने आवाज लगाई। ‘ ‘कॉलोनी के सब लड़के क्रिकेट खेल रहे हैं, तू क्यों नहीं खेलता उनके साथ ? कितनी बार कहा है लड़कों के साथ खेलाकर। घर में घुसकर बैठा रहता है लड़कियों की तरह। ‘

‘मुझे अच्छा नहीं लगता क्रिकेट खेलना‘–उसने गुस्से से कहा।

सूरज की किरणें उसके कमरे की खिड़की से छनकर भीतर आ रही हैं। उसने लेटे- लेटे ही गहरी साँस ली-‘ सवेरा हो गया फिर एक नया दिन, पर मन इजाजत ही नहीं दे रहा बिस्तर से उठने की। करे भी क्या उठकर? उसके जीवन में कुछ बदलने वाला थोड़े-ही है? वही बातें, उसके शरीर को स्कैन करती निगाहें, मन में काई-सी जमी घुटन, जो न चुप रहने देती है, न चीखने। उसके शरीर का सच और घरवालों की आँखों पर पड़ा पर्दा? दो पाटों के बीच वह घुन-सा पिस रहा है, ओफ् ! – – – -’

तब तो अपना सच उसकी समझ से भी परे था, स्कूल-रेस में भाग लिया था। उसने दौड़ना शुरू किया ही था कि सुनाई दिया – ‘अरे! महेश को देखो, कैसे लड़की की तरह दौड़ रहा है। ‘ गति पकड़े कदमों में जैसे अचानक ब्रेक लग गया हो। वह वहीं खड़ा हो गया, बड़ी मुश्किल से सिर झुकाकर धीरे -धीरे चलता हुआ सबके बीच वापस आ खड़ा हुआ। क्लास में आने के बाद भी बच्चे उसे बहुत देर तक ‘लड़की -लड़की’ कहकर चिढ़ाते रहे। तब से वह कभी दौड़ ही नहीं सका, चलता तो भी कहीं से कानों में आवाज गूँजती- ‘लड़की है, लड़की‘, वह ठिठक जाता।

माँ के बार-बार कहने पर वह साईकिल लेकर निकल पड़ा और पैडल पर गुस्सा उतारता रहा। सारा दिन शहर में बेवजह घूमता रहा। साईकिल के पैडल के साथ ही विचार भी बेकाबू थे- ‘ बचपन से लेकर आज तक लोगों के ताने ही तो सुनता आया हूँ, आखिर कब तक चलेगा यह लुकाछिपी का खेल?‘

घर पहुँचकर उसने कमरे में जाकर अपना मनपसंद रंगीन शॉल निकाला और उसे दुप्पटे की तरह ओढ़कर मुस्कुराते हुए सबके बीच जाकर बैठ गया।

© डॉ. ऋचा शर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # 76 – हिसाब किताब… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – हिसाब किताब।)

☆ लघुकथा # 76 – हिसाब किताब श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

झुमरी आजकल तू बहुत छुट्टियां लेने लग गई है अब तेरे पैसे काटने पड़ेंगे तब छुट्टियां कब होंगी। गुस्से में सुनीता जी ने झुमरी से कहा- इस महीने तूने 10 छुट्टियां कर ली  है।

मैडम जी हम भी इंसान हैं और घूमने फिरने ना जाया करें क्या? इतवार को  मुझे बड़े बंगले में काम रहता है,  खाना बनाने का। मुझे अच्छी तनख्वाह मिलती है।

मेरा तो यही फंडा है कि मैं आप लोगों के यहाँ छुट्टियां करके उस घर में काम करती रहूं आपको पसंद हो तो मुझे काम पर रखो, नहीं तो मेरे पास काम की कोई कमी नहीं है और पैसे काटने की मुझे धमकी तो मत देना।

मैं काम करती हूं तब आप मुझे पैसे देती हैं कोई एहसान नहीं… करती।

सुनीता जी ने धीमे स्वर में कहा- जबसे बंगले में काम करने लग गई है तब से तेरे ज्यादा ही पर निकल आए और हिसाब किताब भी बहुत सिखाने लगी है…।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ सेवकराम की लघुकथाएं – दूध रोटी ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆  लघुकथा ☆ सेवकराम की लघुकथाएं ☆

☆ दूध रोटी ☆

(मेरी लघुकथाओं के पात्र ‘सेवकराम’ के इर्दगिर्द रची गई कुछ लघुकथाओं को आपसे साझा करने का प्रयास।)

काफी दिनों के बाद सेवकराम जी सपत्नीक छोटे भाई और बहू से मिलने गए थे। दोपहर का समय था। सभी लोग लंच ले चुके थे और ड्राइंग रूम में आराम से बैठ कर गपशप कर रहे थे। तभी पीछे के कमरे से माँ अपनी लाठी टेकते-टेकते पहुंची।

डाइनिंग टेबल के पास पहुँच कर बोली – सेवकराम, तुम लोगों ने खाना खा लिया क्या?”

“हाँ माँ।“

“मुझे भूख लगी है, मैंने अभी तक खाना नहीं खाया।”

सेवकराम जी ने सहजता से पूछा – “माँ, क्या खाओगी?”

माँ बोली – “दूध में रोटी भिगो कर दे दो। खा लूँगी।”

सेवकराम जी बहू से बोले – “राधा, माँ को दूध रोटी दे दो।”

राधा बहू किचन में गई और दूध रोटी लाकर डाइनिंग टेबल पर रख कर सोफ़े पर बैठ गई और सभी लोगों ने अपनी गपशप चालू रखी।

थोड़ी देर में माँ दूध रोटी खाकर उठी और बोली – “सेवकराम, मुझे नींद आ रही है, मैं ऊपर जा कर सो जाती हूँ।”

सेवक राम जी बोले – “ठीक है माँ।”

और माँ चुपचाप लकड़ी टेकते-टेकते सामने के दरवाजे से ऊपर के कमरे की ओर चली गई।

अचानक सेवकराम जी को कुछ असहज सा लगा।

उनके मुंह से अनायास ही निकाला – “राधा, माँ ने हम लोगों के साथ खाना क्यों नहीं खाया? अरे! और वे ऊपर के कमरे पर सीढ़ियों से कैसे चली गईं? उन्हें तो सीधी चढ़ना ही नहीं आता?”

तभी छोटा भाई राधेश्याम चौंकते हुए बोला – “भैया, माँ को गए तो नौ महीने के ऊपर हो गए! “

सेवकराम धम्म से सोफ़े पर बैठ गए। उन्हे तो जैसे काटो तो खून नहीं। – “तो, माँ क्या भूखी ही चली गईं थी।“

वे पसीने पसीने हो गए। उन्हे होश भी नहीं रहा कि वे क्या बड़बड़ाते रहे। तभी उनकी पत्नी अनुराधा ने उन्हें नींद से उठाया।

“क्या हो गया? आप इतने परेशान क्यों हैं? कौन सा भयानक सपना देख लिया?”

सेवकराम चुपचाप बिस्तर पर बैठ कर पसीना पोंछते हुए बोले – “कुछ नहीं अनुराधा। एक गिलास पानी दे दो।“    

वो दिन है और आज का दिन, दूध में भीगी रोटी कभी उनके गले से ही नहीं उतरी।

©  हेमन्त बावनकर  

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 233 – लघुकथा – प्रेम हमेशा हृदय की सुनता है ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा प्रेम हमेशा हृदय की सुनता है”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 233 ☆

🌻लघु कथा🌻 ❤️ प्रेम हमेशा हृदय की सुनता है❤️

झमाझम बारिश हो रही है। टीवी पर न्यूज़ देखते-देखते सूरज उठा और घर के एक कोने में जाकर शुभी को फोन लगाया। शुभी गाँव में ही रहती है। घर से दूर पर ऐसा नहीं कि बारिश में ना आ सके।

सूरज ने कहा– शुभी बारिश बहुत तेज हो रही है। घर में माँ की तबीयत खराब है। खाना भी नहीं बना है, शायद बन भी ना पाए क्या करूं?

शुभी और सूरज दोनों एक दूसरे को पसंद करते थे। चर्चा पूरे गाँव में थी। देवउठनी के बाद विवाह होने वाला है। शुभी ने कहा – – आप चिंता न करें मैं अभी आ रही हूँ।

घर में अम्मा – बाबूजी को बता अपनी स्कूटी ले रेनकोट पहन कर वह मूसलाधार बारिश में सूरज के घर पहुंच गई। वहाँ देखा सूरज की माँ चौके में गरम-गरम रोटियां सेक रही थी।

शुभी तो अवाक रह गई। सूरज ने बताया – माँ शुभी आई है। माँ ने दिल खोलकर शुभी का स्वागत किया।

कैसे आ गई बेटा इतनी बारिश में घर में सब ठीक तो है?

शुभी ने माँ के आँचल से अपना सिर पोछती बोली– माँ यहाँ से निकल रही थी बारिश की वजह से रुक गई।

अब आ गई हो तो खाना खाकर जाना।

– जी। शुभी ने कहा!! सब ने मिलकर खाना खाया। जाते समय शुभी ने एक कागज सूरज के हाथ में दिया “प्रेम हमेशा हृदय की सुनता है समाचार की नहीं और समाचार को लेकर कभी मेरी परीक्षा लेने की कोशिश नहीं करना। करोगे, तो मैं हमेशा जीत में ही रहूंगी।“

सूरज समझ गया। उसकी पसंद औरों से बहुत अलग है।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “आज के संजय” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “आज के संजय” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ रहा है। महाभारत के युद्ध की दोनों सेनायें अपने अपने शिविरों में लौट रही हैं। रथों के घोड़े हिनहिना रहे है। कौन आज युद्ध में वीरगति पा गये और कौन कल तक बचे हुए हैं। संजय यह आंखों देखा हाल धृतराष्ट्र को सुना रहे हैं। महाराज व्यथित होकर दिन भर का हाल सुन रहे हैं। गांधारी भी पास ही बैठी हैं।

वह एक युग था। तब संजय जन्मांध धृतराष्ट्र को युद्ध का हाल बताने के लिए मिली दिव्य शक्ति से सब वर्णन करते थे। कहा जा सकता है कि उस युग के पत्रकार थे संजय।

अब युग बदल गया। इन दिनों चुनाव की महाभारत है। महाभारत अठारह दिन चली थी लेकिन यह चुनाव प्रचार की महाभारत पूरे इक्कीस दिन चलती है। यहां किसी एक संजय को दिव्य शक्ति नहीं दी जाती। यहां तो सैंकड़ों संजय हैं जो ‘वीडियो’ नाम की दिव्य शक्ति लेकर आये हैं और कुछ भी वायरल कर देने की शक्ति रखते हैं! मनचाहा वीडियो बना कर सारा आंखों देखा हाल सुनाने में जुटे हैं। संजय तो एक राष्ट्रीय पत्रकार था और राष्ट्र की सेवा में जुटा था। निष्पक्ष! निरपेक्ष! ये आज के युग के संजय तो निष्पक्ष और निरपेक्ष नहीं। इन्हें तो रोटी कमानी है, अपनी गृहस्थी चलानी है। मनभावन शौक पूरे करने हैं। खाना पीना है और वह दिखाना है जो सामने वाला चाहता है लेकिन इसकी एक निश्चित कीमत है! जो चुकाये वह मनचाहा पा ले! नहीं चुकाये तो हश्र भुगते!

ये कैसे संजय हैं?

ये कलियुग के महाभारत के संजय हैं! जो अंधे लोगों को युद्ध का हाल नहीं सुनाते बल्कि ऐसा हाल सुनाते हैं कि आंखों वालों को ही अंधा बना रहे हैं! आप इन्हें पहचानते हैं?

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – मालिक… ☆ श्री हरभगवान चावला ☆

श्री हरभगवान चावला

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री हरभगवान चावला जी की अब तक पांच कविता संग्रह प्रकाशित। कई स्तरीय पत्र पत्रिकाओं  में रचनाएँ प्रकाशित। कथादेश द्वारा  लघुकथा एवं कहानी के लिए पुरस्कृत । हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा श्रेष्ठ कृति सम्मान। प्राचार्य पद से सेवानिवृत्ति के पश्चात स्वतंत्र लेखन।) 

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा मालिक)

☆ लघुकथा – मालिक… ☆ श्री हरभगवान चावला ☆

उसे पहला वेतन मिला। उसने एक दुकान से कुछ खिलौने ख़रीदे। उन खिलौनों में एक मख़मल सा मुलायम टैडी बियर था; एक उड़न तश्तरी थी, जो चलते हुए कुछ देर हवा में उड़ती थी; एक बैट्री-चालित कार थी; एक गेंद थी, जो टप्पा खाकर इतनी उछलती थी कि जैसे आसमान छू लेगी। उसने सब खिलौनों पर बहुत नज़ाकत और मुहब्बत से हाथ फिराया। मुझे मालूम था कि अभी उसकी शादी नहीं हुई है। ज़ाहिर था कि उसने ये खिलौने अपने परिवार के किसी बच्चे के लिए ख़रीदे हैं, लेकिन एक साथ इतने महँगे चार खिलौने! ज़रूर वह उस बच्चे से बहुत प्यार करता होगा। मैं अपनी उत्सुकता को दबा नहीं पाया और पूछ लिया, “क्या मैं यह जान सकता हूँ कि वह ख़ुशक़िस्मत बच्चा कौन है जिसके लिए तुमने इतने सारे खिलौने खरीदे हैं?”

वह मुस्कुराया और कहा, “मैं।”

“क्या?” मैं चौंक गया।

“हाँ मैं, तुम शायद नहीं जानते कि मैं कभी नए खिलौनों से नहीं खेला। अमीर बच्चे जिन खिलौनों से ऊबकर उन्हें फ़ालतू क़रार दे देते थे, वे खिलौने कृपापूर्वक मेरे पिता को दे दिए जाते थे। मेरे पिता कुछ कोठियों में माली का काम करते थे। मैं कभी नई किताबों से भी नहीं पढ़ा, न कभी नए कपड़े पहने। मेरे खिलौने और बच्चों द्वारा फेंक दिया गया कबाड़ थे, कपड़े किसी की उतरन थे, किताबें किसी के द्वारा इस्तेमाल की जा चुकी रद्दी थीं। आज मैं इन खिलौनों का मालिक हूँ।” उसने खिलौनों का पैकेट उठाया और कहा, “चलो यार, अभी तो मुझे नए कपड़ों और नई किताबों की ख़ुशबू और स्पर्श को महसूस करना है!”

©  हरभगवान चावला

सम्पर्क – 406, सेक्टर-20, हुडा,  सिरसा- 125055 (हरियाणा) फोन : 9354545440

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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