हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ६४ ☆ व्यंग्य – “मृत्यु का प्रमाणपत्र और नागरिकता का संकट…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  मृत्यु का प्रमाणपत्र और नागरिकता का संकट…” ।)

☆ शेष कुशल # ६४ ☆

☆ व्यंग्य – “मृत्यु का प्रमाणपत्र और नागरिकता का संकट – शांतिलाल जैन  

मेरी एक विनम्र सलाह है श्रीमान. अपने परिजनों से कह कर रखें कि आपका अंतिम समय जब भी आए तो आपका मृत्यु प्रमाणपत्र आपके सिरहाने रख दिया जाए. साथ में ले जाने में सुभीता रहे. ट्रेवल डॉक्यूमेंट है श्रीमान्, इहलोक से परलोक तक की यात्रा का वैध दस्तावेज. हालाँकि यह आपके आर्यावर्त के नागरिक होने का प्रमाण नहीं है, तब भी यात्रा के दौरान लगता है. क्या!! पासपोर्ट के बाबत नहीं सुना आपने? पासपोर्ट आपके नागरिक होने का प्रमाण नहीं है – ट्रेवल डॉक्यूमेंट है. मृत्यु प्रमाणपत्र में इतना तो लिखा है कि आप मरे हैं मगर यह नहीं लिखा कि आप आर्यावर्त के नागरिक के तौर पर मरे हैं.

क्या कहा आपने? मरने से पहले मरने का प्रमाणपत्र कैसे बनेगा? तो या तो आप बहुत भोले हैं या बेवकूफ़. रिश्वत के बाबत नहीं सुना आपने? इसे दिए जाने के बाद आप हर उस सज्जन का डेथ सर्टिफिकेट बनवा सकते हैं जो कभी जन्मा ही नहीं. प्रॉविजिनल डेथ सर्टिफिकेट भी बनवाकर रख सकते हैं – सब्जेक्ट टू बी इफेक्टिव फ्रॉम दी एक्चुअल टाईम ऑफ़ डेथ. मेरी बात को सिंसियरली लीजिए श्रीमान्, इस बार आप झूमरीतलैया तक नहीं जा रहे, बैकुंठधाम व्हाया अंतरिक्ष जा रहे हैं. वैतरणी पड़ेगी रास्ते में. हो सकता है डेथ सर्टिफिकेट के अभाव में कामधेनु पूँछ पकड़वाने से मना कर दे. कागज़ दिखाए बगैर वैतरणी पार नहीं कर पाएँगे आप.

अब आप पूछेंगे कि मुझे कैसे पता परलोक यात्रा के बारे में? तो मैं बताना चाहता हूँ कि मैं अभी अभी जाकर वापस आया हूँ. वापस क्या आया हूँ वापस भेज दिया गया हूँ.  वो तो अच्छा है मैंने अपना डेथ सर्टिफिकेट पहले से बनवाकर रखा था, रास्ते में दिक्कत नहीं आई. लेकिन पहुँचने पर मुझे बैकुंठधाम के दरवाजे से ही बैक-टू-पेवेलियन कर दिया गया. हालाँकि मेरे पास आधार कार्ड भी था. बोले – आधार केवल आपकी पहचान और पते का दस्तावेज़ है, नागरिकता का नहीं. बैकुंठ में प्रवेश की अनुमति आर्यावर्त के नागरिक शांतिलाल जैन वल्द मोतीलाल जैन, उम्र 66 वर्ष, हाल मुकाम उज्जैन के नाम की है. आपकी पहचान तो साबित हो रही है नागरिकता साबित नहीं होती. उसके बिना आप अंदर नहीं जा सकते.

‘हे देव, मैं आया नहीं हूँ, आपके प्रतिनिधि ही मुझे लाए हैं. क्या वे सिर्फ पहचान का प्रमाणपत्र देखकर लाते हैं?’

उन्होंने कहा – “नागरिकता साबित करने की जिम्मेदारी आपकी स्वयं की है.”

“हे देव, मेरे पास मतदाता पहचान पत्र भी है.”

वे बोले – “मतदाता पहचान पत्र सिर्फ मतदान करने का अनुमति पत्र है, नागरिकता का दस्तावेज़ नहीं है. आपने 2003 में वोट दिया था? यदि हाँ, तो विधान सभा क्रमांक, बूथ क्रमांक, वोटर सीरियल नंबर बताईए.”

“वो तो याद नहीं है.”

“तब तो कुछ नहीं हो सकता. “

“हे देव, मैंने अपना जन्म प्रमाणपत्र संभालकर रखा है. कुछ देर के लिए भैंसा दिलवा दें तो जाकर ले आता हूँ.”

“अकेले आपके जन्म प्रमाणपत्र से नहीं होगा. आपके माता-पिता का, उनके माता-पिता का, उनके भी माता-पिता का बर्थ सर्टिफिकेट लगेगा.”

“वो तो नहीं है हमारे पास.”

“तब तो आप आर्यावर्त के नागरिक नहीं हैं. जल्दी वापस निकल जाईए.”

“हे देव, मैं उस दुखियारी दुनिया में वापस जाना नहीं चाहता जहाँ मुझे बार-बार अपनी नागरिकता साबित करनी पड़े.”

देखिए बैकुंठधाम केवल आर्यावर्त के नागरिकों के लिए आरक्षित है. विवश होकर  हमें आपको डिटेंशन सेंटर में रखना पड़ेगा जो पहले ही भरा पड़ा है, पाँव रखने की भी जगह नहीं है. आप तुरंत लौट जाएँ – यही बेहतर होगा आपके लिए.

मरता क्या न करता!  बल्कि मरा हुआ क्या ही करता!! परिजनों को भनक लगे उससे पहले वापस आकर शरीर में दाख़िल हो गया हूँ और अब आपसे मुख़ातिब हूँ. नागरिकता किस डॉक्यूमेंट से साबित होती – यदि आपको पता तो मुझे अवश्य बताएँ – आभारी रहूँगा आपका.

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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # ११५ – आधुनिक डाइट और उपवास – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – आधुनिक डाइट और उपवास)  

☆  चुभते तीर # ११५ – व्यंग्य  – आधुनिक डाइट और उपवास ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

आजकल लोग वजन घटाने के लिए ‘इंटरमिटेंट फास्टिंग’ करते हैं, जिसे हमारे पूर्वज साधारण शब्दों में ‘भूखा रहना’ कहते थे। पुराने ज़माने में उपवास में भगवान याद आते थे, आज के उपवास में केवल कैलोरी काउंटिंग ऐप याद आता है। इंसान चौबीस घंटे में से सोलह घंटे घड़ी देखता है कि कब खाने का समय होगा। जैसे ही खाने की खिड़की खुलती है, वह इस तरह टूट पड़ता है मानो अकाल पीड़ित हो। सलाद के नाम पर घास-फूस को इस तरह खाया जाता है जैसे वह कोई दिव्य जड़ी-बूटी हो। एवोकाडो और चिया सीड्स जैसी विदेशी चीज़ों ने हमारी रसोई पर सर्जिकल स्ट्राइक कर दी है। जो इंसान कल तक दो पराठे घी लगाकर खाता था, वह आज ग्रीन-टी पीकर खुद को संन्यासी घोषित कर रहा है। विडंबना देखिए, इस पूरी प्रक्रिया में वजन भले ही न घटे, लेकिन इंसान का मानसिक संतुलन और जेब का वजन ज़रूर घट जाता है।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३३ – हास्य-व्यंग्य – “सदा दौड़ता रहता है नेता” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  सदा दौड़ता रहता है नेता

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३३ 

☆ व्यंग्य ☆ “सदा दौड़ता रहता है नेता” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

हाल ही में एक मंत्री जी को मुख्यमंत्री के हेलीकॉप्टर पर सवार होने के लिए पूरी ताकत से दौड़ लगाना पड़ी। मंत्री जी को दौड़ता देख कर उनके साथ उनके सुरक्षाकर्मी भी दौड़े। मंत्री जी की दौड़ काम आई और वे हेलीकॉप्टर उड़ने के पहले उसमें सवार होने में सफल हो गए। मंत्री जी को दौड़ता हुआ देखकर लोग हंसते हुए उनका मजाक उड़ाने लगे। अरे मौका आने पर सभी अपनी छूटती गाड़ी पकड़ने के लिए दौड़ते हैं। इसमें हंसने वाली क्या बात है? और नेता की दौड़ तो कभी खतम नहीं होती।

नेता के लिए आराम हराम है, इक मंजिल मिलते ही दूसरी दौड़ शुरू हो जाती है।

 नेता बनने के लिए क्या – क्या नहीं करना पड़ता। दिन का चैन और रात की नींद हराम करना पड़ती है, पहले बड़े नेताओं के पीछे उनसे अपनी पहचान बनाने दौड़ो फिर उनका खास चमचा बनने दौड़ो, अपने फोटो और समाचार छपवाने पत्रकारों के पीछे दौड़ो। पार्टी से टिकट लेने के लिए फिर चुनाव प्रचार के लिए दौड़ो। आजकल वोटर समझदार हो गए हैं, शाद उदयपुरी कहते हैं –

किसको दूं मैं वोट यहां पर,

सबके भीतर खोट यहां पर।

जीत गए तो मंत्री बनने के लिए दौड़, मंत्री बन गए तो मंत्री बने रहने के लिए फिर मलाईदार विभाग के मंत्री पद को हथियाने के लिए और पुनः – पुनः चुनाव जीतने के लिए। आगे मुख्यमंत्री, राज्यसभा या लोकसभा में पहुंचने और केंद्रीय मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री बनने तक की आकांक्षा को लेकर नेताओं की अथक दौड़ जारी रहती है। बिना दौड़े नेतागिरी में सफलता संभव नहीं। … और दौड़ भी अपने समकक्ष नेताओं को धकियाते – गिराते हुए उनसे तेज। आप ध्यान से देखेंगे तो आपको हर छोटा – बड़ा नेता दौड़ता, अपने प्रतियोगी नेताओं को टांग मारता हुआ नजर आएगा।

नेतागिरी में सब जायज़ है,

कुछ भी कर, अपना रास्ता साफ कर।

जो दौड़ में थका – हारा उसका नेतागिरी का कैरियर खत्म। समाज सेवा का झंडा थामे राजनीति के पथ पर दौड़कर सफल होने वाले सभी नेताओं को बहुत बहुत बधाई। नेता बनने के इच्छुक बेरोजगारों को मेरी समझाइश है कि सेवा के नाम पर नेतागिरी को जीवन यापन का साधन बनाने की कोशिश तभी करें जब आजीवन दौड़ते रहने तैयार हों वरना कोई और काम देखलें।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४१ ☆ व्यंग्य – वीआईपी और भगवान ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय व्यंग्य – ‘वीआईपी और भगवान ‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३४१ ☆

☆ व्यंग्य ☆ वीआईपी और भगवान ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

मंदिर में गहमागहमी थी। वीआईपी के आने की सूचना आ चुकी थी। सभी पुजारी उत्तेजना की स्थिति में थे। भारी चढ़ावे की उम्मीद थी। वीआईपी गेट पर विशिष्ट अतिथि का इंतज़ार हो रहा था। कुछ दूरी पर ‘जनता लाइन’ लगी थी, जिसमें सैकड़ों लोग कई घंटे से भगवान के दर्शन के लिए लाइन में लगे थे।

जल्दी ही वीआईपी का काफ़िला मंदिर में दाखिल हुआ। चार गाड़ियां मंदिर के प्रांगण में आ लगीं। आगे वाली में वीआईपी विराजमान थे, दूसरी गाड़ी में चमचे और भक्त, तीसरी में अंगरक्षक, और चौथी में कुछ फालतू सामान के साथ दो तीन सेवक और कैमरामैन।

प्रमुख पुजारी और अन्य पुजारियों ने तिलक लगाकर विशिष्ट जी और उनके काफ़िले का स्वागत किया। गद्गद् स्वर में बोले ‘आइए, पधारिए।’

वीआईपी ने कार से बाहर निकल कर ‘जनता लाइन’ पर हिकारत की नज़र डाली, फिर वे वीआईपी द्वार के सामने रखी पत्थर की बेंच पर पसर गये। बुदबुदाये— ‘बहुत थक गया। बहुत खराब रास्ता है।’

फिर वे प्रमुख पुजारी को संबोधित करके बोले, ‘हम भगवान के दर्शन करने के लिये आये हैं। आप जाकर भगवान को हमारे आने की इत्तिला दें और हमारी तरफ से उनसे प्रार्थना करें कि यहां दरवाजे तक आकर हमें दर्शन दें।’

सुनकर प्रमुख पुजारी सन्न रह गये। हकला कर बोले, ‘क्या कह रहे हैं? भगवान यहां आकर आपको दर्शन देंगे? कैसी बातें करते हैं?’

वीआईपी भवें चढ़ाकर बोले, ‘ठीक ही तो कह रहा हूं। भगवान हमेशा भक्त की पुकार पर आते रहे हैं। पचीसों उदाहरण हैं। तो फिर मेरी पुकार पर क्यों नहीं आएंगे? आप भीतर जाकर उन्हें इत्तिला तो कीजिए।’

प्रमुख पुजारी जी हैरत की स्थिति में भीतर प्रभु के सामने पहुंचे, हाथ जोड़कर बोले, ‘प्रभु, धृष्टता के लिए क्षमा करें। वह मंत्री प्रीतम लाल आया है। कहता है भगवान दुआरे तक जाकर उसे दर्शन दें।’

सुनकर प्रभु की त्योरियां चढ़ गयीं। बोले, ‘कैसा अशिष्ट है यह! यहां रोज हजारों भक्त आकर मेरे दर्शन करते हैं, और यह आदमी मुझे दर्शन देने के लिए बाहर बुला रहा है? ऐसा प्रस्ताव मुझ तक लाने का तुम्हें साहस कैसे हुआ?’

पुजारी जी हाथ जोड़कर दीन भाव से बोले, ‘क्षमा करें, प्रभु। यह आदमी बड़ा दुष्ट है। आप नहीं जाएंगे तो यह मेरी नौकरी खा जाएगा। फिर मैं आपकी सेवा के योग्य नहीं रहूंगा। कृपा करके दुआरे तक चले चलिए।’

भगवान ने थोड़ी देर तक सोचा, फिर वे अपने सिंहासन से उठकर धीरे-धीरे वीआईपी द्वार तक पहुंचे। वीआईपी महोदय ने उन्हें देखकर ‘प्रभु की जय हो’ का नारा लगाया और फिर उनके चरणों में लोट गये । लेटे-लेटे कनखियों से कैमरा वालों की तरफ देख रहे थे।

प्रभु को प्रणाम करने के बाद वीआईपी जी उठ कर हाथ जोड़कर बोले, ‘मेरा जनम सफल हुआ, प्रभु। मैं एक सोने के मुकुट की तुच्छ भेंट आपके लिए लाया हूं। उसे स्वीकार करने की कृपा कीजिएगा।’

प्रभु उनकी बात का कोई जवाब न देकर खिन्न भाव से मुड़कर भीतर चले गये। वीआईपी महोदय ‘जनता’ की ओर मुड़कर ऊंचे स्वर में बोले, ‘देखा? प्रभु हमें इतना चाहते हैं कि हमारी पुकार पर दौड़े चले आये। ऐसी कृपा भला कितने लोगों को मिलती है?’

इस प्रकार प्रभु के दर्शन पाकर और लाइन में लगी जनता को दर्शन देकर वीआईपी महोदय अपने लाव-लश्कर के साथ प्रस्थान कर गये।

 

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # ११४ – सरकारी फ़ाइल की अमरता – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – सरकारी फ़ाइल की अमरता)  

☆  चुभते तीर # ११४ – व्यंग्य  – सरकारी फ़ाइल की अमरता ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

सरकारी दफ़्तर में फ़ाइलें कभी मरती नहीं हैं, वे बस मोक्ष प्राप्त कर लेती हैं। एक बार जब कोई कागज़ ‘फ़ाइल’ का रूप धारण कर लेता है, तो वह इंसानी उम्र से परे हो जाता है। उसे एक मेज से दूसरी मेज तक की यात्रा करने में उतने ही साल लगते हैं, जितने एक आम इंसान को मोक्ष पाने में लगते हैं। क्लर्क उस फ़ाइल को इस तरह सहलाता है मानो वह उसकी पैतृक संपत्ति हो। जब आप पूछेंगे कि काम कब होगा, तो जवाब मिलेगा, “फ़ाइल अभी विचाराधीन है।” ‘विचाराधीन’ वह आध्यात्मिक अवस्था है जहाँ कागज़ पर धूल की परतें जमती हैं और वह चाय के दागों से सुशोभित होता है। चूहे उस फ़ाइल के कुछ हिस्सों को खाकर अपनी साक्षरता बढ़ाते हैं, लेकिन मजाल है कि कोई अफ़सर उस पर दस्तखत कर दे। दस्तखत हो जाना तो फाइल की मृत्यु के समान है, और कोई भी संवेदनशील अफ़सर किसी फाइल की हत्या का पाप अपने सिर नहीं लेना चाहता। इसलिए, डिजिटल इंडिया के इस दौर में भी फाइलें अलमारियों में बंद होकर अमरता का आनंद ले रही हैं।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ चुभते तीर # ११३ – चुनावी मेंढक – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – चुनावी मेंढक।)  

☆  चुभते तीर # ११३ – व्यंग्य  – चुनावी मेंढक ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

मानसून की पहली फुहार अभी धरती को स्पर्श भी नहीं कर पाई थी कि मोहल्ले की राजनीति के गंदे नालों में हलचल तेज हो गई, और ‘लोकतंत्र के रक्षक’ कहे जाने वाले सफेदपोश जीव अपनी बिलों से बाहर निकलकर टर्राने लगे। हमारे मोहल्ले के स्वयंभू नेता, जिनके कुर्ता-पायजामा की सफेदी दूध को भी लज्जित कर दे, अचानक घर-घर जाकर इस तरह दंडवत होने लगे जैसे हर दहलीज पर साक्षात ईश्वर का वास हो। उनकी मुस्कुराहट में वह बनावटीपन था जो केवल एक्सपायरी डेट वाली मिठाई के डिब्बों पर पाया जाता है, और उनकी बातों में विकास का ऐसा शहद टपक रहा था जिसे चाटने के चक्कर में भोली जनता अपनी पुरानी कड़वाहटें भूलने को तैयार बैठी थी। गलियों में बिछी हुई धूल अब किसी चुनावी रणनीति का हिस्सा बन चुकी थी, जहाँ हर उड़ता हुआ कण किसी न किसी वायदे की गवाही दे रहा था। चमचों की टोली हाथ में झंडे थामे इस तरह अनुशासित दिख रही थी मानो वे कल ही ओलंपिक से स्वर्ण पदक जीतकर लौटे हों, जबकि असलियत में उनकी दौड़ केवल मुफ्त की शराब और बिरयानी के पैकेटों तक ही सीमित थी।

इस तमाशे के दूसरे अंक में, जब प्रचार का शोर अपने चरम पर पहुँचा, तो मोहल्ले की टूटी हुई सड़कें रातों-रात कागजों पर मखमली कालीन की तरह बिछ गईं और बंद पड़े नलों से गंगाजल बहने के दावे किए जाने लगे। नेताजी ने एक ऐसी जनसभा को संबोधित किया जहाँ उन्होंने अपनी छाती ठोककर घोषणा की कि यदि वे जीत गए, तो मोहल्ले का हर बच्चा सीधे अंतरिक्ष की सैर करेगा और बुजुर्गों के लिए ‘अमरत्व योजना’ लागू की जाएगी। श्रोताओं में बैठे कुछ बुद्धिजीवी अपनी अक्ल पर पत्थर पड़े होने का प्रमाण देते हुए तालियाँ बजा रहे थे, जबकि मोहल्ले का वह कुत्ता, जो पिछले पांच चुनावों से इसी तरह के भाषण सुन रहा था, अपनी पूँछ दबाकर एक कोने में चुपचाप बैठा व्यवस्था के पतन पर विचार कर रहा था। फाइलों में दर्ज आँकड़े इस कदर नाच रहे थे कि सांख्यिकी विभाग के विशेषज्ञ भी अपना सिर पीट लेते, पर यहाँ तो भावनाओं का व्यापार चल रहा था जहाँ तर्क की कोई गुंजाइश नहीं थी। हर दीवार पर चिपके हुए पोस्टर नेताजी के चेहरे को इतना मासूम दिखा रहे थे कि स्वयं यमराज भी उन्हें देखकर एक बार तो चकमा खा जाते और अपना रास्ता बदल लेते।

मतदान की पूर्व संध्या पर नेताजी ने एक गुप्त अनुष्ठान का आयोजन किया ताकि जीत सुनिश्चित हो सके, और जैसे ही उन्होंने अंतिम आहुति दी, पूरा मोहल्ला एक अजीब सी रोशनी से भर गया। सुबह जब मतदाता पोलिंग बूथ पर पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि ईवीएम मशीन के पास कोई अधिकारी नहीं, बल्कि वही नेताजी एक विशालकाय मेंढक के रूप में बैठे हैं जिनकी आँखें किसी सीसीटीवी कैमरे की तरह घूम रही थीं। लोग जैसे ही बटन दबाते, मशीन से ‘बीप’ की जगह ‘टर्र-टर्र’ की आवाज आती और वोटर की उंगली पर स्याही की जगह एक चिपचिपा हरा पदार्थ लग जाता जो गायब होने का नाम ही नहीं ले रहा था। अचानक वह विशालकाय मेंढक अपनी लंबी जीभ बाहर निकालता और मतदान करने आए व्यक्ति की जेब से उसकी सारी मेहनत की कमाई एक झटके में खींचकर निगल जाता। दहशत तब और बढ़ गई जब वह मेंढक अचानक इंसानी आवाज में ठहाका लगाकर बोला कि ‘वोट तुम्हारा है, पर नोट और पेट मेरा है’ और देखते ही देखते वह पूरी पोलिंग स्टेशन की इमारत को ही निगल गया। अंत में वहाँ केवल एक खाली मैदान बचा था जहाँ हवा में नेताजी के सफेद कुर्ते के चिथड़े उड़ रहे थे और जनता अपनी उंगलियों पर लगे उस कभी न छूटने वाले हरे दाग को देखकर हतप्रभ खड़ी थी।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४२२ ☆ व्यंग्य – आम और खास के बीच वाली खस की चिक ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२२ ☆

? व्यंग्य – आम और खास के बीच वाली खस की चिक ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

शहर के चौराहे पर लगा नेताजी का स्टैचू आज भी वैसा ही है। उनका हाथ हवा में ऐसे ठहरा है, मानो किसी अदृश्य भीड़ को बरसों से समझा रहे हों, ” मैंने तुम्हें विकास का जो लॉलीपॉप दिया है, उसे चूसना क्यों छोड़ रहे हो?, लॉली पाप चूसते रहो, और मुंह बंद रखो”

उसी मूर्ति के चौराहे के कोने में मोची रामसहाय बैठा करता है । उसे बहुतों की टूटी चप्पलें मौके पर सिलनी होती हैं और इंटरव्यू देने जाते बेरोजगार लोगों के जूते चमकाने होते हैं।

आज उसके पास सिर उठाने की फुर्सत नहीं है। उसे उन ‘खास’ जूतों की पॉलिश करनी है, जो कल स्वतंत्रता दिवस की परेड में ‘आम’ सड़कों पर शान से धूल उड़ाते हुए चलेंगे।

राम सहाय को उसके बचपन की याद है। गर्मियों की दोपहरी में खास लोगों के बंगलो की  खिड़कियों और दरवाजों पर खस की खुशबूदार चिक लगाई जाती थी। वह खास लोगों को आम लोगों से अलग करने वाली एक अदृश्य, मगर ठंडी विभाजक रेखा थी । बाहर का ‘आम’ आदमी भरी दोपहरी में बाल्टी भर-भरकर पानी उस चिक पर छिड़कता था।भीतर ‘खास’ साहब मखमली कुर्सी पर पसरकर उस ठंडी बयार में कलमी आम को तक चूसकर आनंद लेते थे । बाहर सिंचाई करता ‘आम’ आदमी भी खस की महक को ही अपनी नियति मानकर तृप्त हो जाता था।

खस की महक की खुशी  ‘आम’ के पसीने और ‘खास’ के आराम के बीच का इकलौता साझा रिश्ता थी।

आज न खस की चिक बची, न वह सादगी। शीशे की वातानुकूलित दीवारों ने खस को रिप्लेस कर दिया है। इस कांच की दीवार ने संवेदनाओं को भी ‘फ्रीज’ कर दिया है। अब कोई किसी की खिड़की पर पानी नहीं छिड़कता, क्योंकि अब भीतर वालों को बाहर की गर्मी का एहसास ही नहीं होता।

पहले अंदर की खास लोगों की  बातें खस की चिक के उस पार आम व्यक्ति तक पहुंच जाती थी। अब कांच के पार आवाजें नहीं जाती ।

रामसहाय ने अब मेरी घिसी हुई टूटी चप्पल सिलना शुरू किया था ।

मैंने उस से पूछा, “रामू भाई, खस की चिक हट गई, अब क्या बचा?” उसने बिना नज़र उठाए जवाब दिया, “साहब, अब चिक नहीं, एल्गोरिदम की दीवार है। पहले हम पानी छिड़कते थे तो महक हमें भी नसीब होती थी। अब हम सिर्फ डेटा रिचार्ज करवाते हैं, ताकि ‘खास’ लोगों की डिजिटल चमक को लाइक कर सकें।”

कहने को सच है कि खास वह नहीं है जो बंगलों में बैठा है। खास तो वह है, जो यह तय करता है कि किस ‘आम’ को कितनी देर तक किस मुद्दे की हवा में भिगोकर खास बनाए रखना है। और रामसहाय इस तरह का ही खास आम है।वह निचोड़ा जाता है, बार बार नए तरीकों से नए लोगों द्वारा ।

चौराहे पर पकौड़े तलने वाले की कड़ाही में तेल तो एक ही खौल रहा है, पर ‘पकौड़े’ की गुणवत्ता पर राजनीति की मोहर लगी है। ‘खास’ काउंटर पर पकौड़े सजे-सजाए प्लेट में पहुंचते हैं। ‘आम’ काउंटर पर आदमी को अपनी थाली खुद ही ढोनी पड़ती है । यह ‘सेल्फ-सर्विस’ का दौर है।

‘आम’ आदमी का लाइन में खड़े होना लोकतंत्र की गरिमा है, और ‘खास’ का सीधे अंदर जाना वीआईपी शिष्टाचार है। अगर ‘आम’ आदमी  कुर्सी मांग ले, तो वह ‘अतिक्रमणकारी’ करार दिया जाता है, जबकि ‘खास’ का वहां बैठना ‘जन-संवाद’ की तस्वीर बन जाता है।

खस की चिक के साथ हमने वह सौंधी खुशबू खो दी है, जो वर्ग-भेद को कम से कम ‘महसूस’ तो करने देती थी। आज की एयर-कंडीशंड खामोशी में संवाद मर चुका है। ‘आम’ आदमी ‘खास’ बनने की ऐसी अंधी दौड़ में है कि वह यह भूल गया है कि वह खुद उस पेड़ का तना है, जिस पर ‘खास’ फल लटके हैं।

त्रासदी यह है कि ‘आम’ आदमी ने अब यह मान लिया है कि उसे कुल्हड़ ही नसीब होगा और ‘खास’ को चीनी मिट्टी का प्याला।

मिट्टी तो मिट्टी ही है, चाहे वह कप हो या कुल्हड़।

मेरी टूटी चप्पल सिल कर फिर एट माई सर्विस, ऑन रोड आ चुकी थी। मैं फटियाते हुए आगे निकला, सोच रहा था कि

जिस दिन ‘आम’ आदमी शीशे की दीवार हटाकर भीतर की बातों में हिस्सेदारी का साहस करेगा, उस दिन शायद सारी कृत्रिम व्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी।

तब तक, बस लॉली पाप चूसते हुए, मुंह बंद रख मुस्कुराते रहिए। हंसी अभी भी टैक्स-फ्री है। पर डर तो यह है कि कहीं अगली बजट मीटिंग में ‘हंसी कर’ न लग जाए। आखिर, ‘खास’ को अपनी लग्जरी गाड़ियों के लिए पेट्रोल और  खामोशी के लिए साउंड-प्रूफ दीवारों का खर्चा तो ‘आम’ के पसीने से ही निकालना है!

  

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३२ – हास्य-व्यंग्य – “कुछ कुछ होता है का मतलब” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  कुछ कुछ होता है का मतलब

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३२

 व्यंग्य ☆ “कुछ कुछ होता है का मतलब” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

 मैं रात्रि का भोजन करके पान खाने झब्बूलाल की दुकान पहुंचा। दुकान बंद होने का समय था इक्का दुक्का ग्राहक थे। दुकान में गाना बज रहा था

“तुम पास आए, यूं मुस्कुराए

तुमने न जाने क्या सपने दिखाए।

अब तो मेरा दिल जागे न सोता है।

क्या करूं हाए, कुछ कुछ होता है…

मुझे देखते ही झब्बू ने नमस्ते भाई साहब कहते हुए एक पान लपेट कर मेरी ओर बढ़ा दिया। मैंने पान मुंह के हवाले किया ही था कि झब्बू ने प्रश्न दाग दिया – भाई साहब, “ये कुछ कुछ होता है” का मतलब आखिर क्या होता है ? मैंने कहा झब्बू फालतू की बात मत छेड़ो, मुझे घर जाकर अभी एक लेख लिखना है। झब्बू बोला – भैया फालतू बात नहीं कर रहा। जब जब ये गाना सुनता हूँ देर तक सोचता रहता हूं कि आखिर ये “कुछ – कुछ” है क्या ? आप पत्रकार हैं। आप नहीं बताएंगे तो कौन बता पाएगा? मैंने कहा – प्यारे भाई पत्रकार क्या सब कुछ जानता है ?

झब्बू ने मेरी ओर लम्बी मुस्कान फेंकते हुए कहा – भैया में तो ऐसा ही समझता हूं। पत्रकार चोरी, डकैती, खून के बारे में पुलिस से ज्यादा, बजट के बारे में वित्त मंत्री और अर्थशास्त्रियों से ज्यादा, विदेश नीति के बारे में विदेश मंत्री और देश की सुरक्षा के बारे में रक्षा एवं गृह मंत्री व सेना से ज्यादा जानता है। अभी राम मंदिर में चंदा चोरी पर समाचार पत्रों को पढ़कर लग रहा है कि जैसे पत्रकार इस मामले में भी जांच अधिकारियों से ज्यादा जानते – समझते हैं। खेल पत्रकार तो क्रिकेट, हॉकी, फुटबॉल, बैडमिंटन जैसे बड़े खेलों तक में यह बता देते हैं कि जीतने के लिए किस खिलाड़ी को कैसे खेलना चाहिए। शायद इसी कारण से लोग पत्रकारों के प्रश्नों का जवाब नहीं दे पाते, पत्रकारों से बचने की कोशिश करते हैं। मैंने झब्बूलाल से पीछा छुड़ाने के उद्देश्य से कहा भाई मुझे माफ करो मैं सादा पत्रकार हूं, खोजी या खेल पत्रकार नहीं और वापस लौटने लगा। झब्बू ने आवाज दी भाई साहब ये भाभी जी का पान तो लेते जाएं। मैं वापस मुड़ और पान की पुड़िया ली। झब्बू ने मार्मिक शब्दों में कहा, भैया आपने मेरी शंका का समाधान नहीं किया। अब मुझे रात भर नींद नहीं आएगी। सोचता रहूंगा कि आखिर “कुछ कुछ होता है” का मतलब क्या होने से है।

मैंने कहा देखो भाई झब्बू – “कुछ कुछ होने” का कोई एक मतलब नहीं है। इसके हजार मतलब हैं जो अलग – अलग परिस्थितियों में अलग – अलग होते हैं। शाहरुख खान, काजोल, रानी मुखर्जी को जो “कुछ कुछ” हुआ था वह अलग था। किसी राष्ट्राध्यक्ष को टॉफ़ी पाकर और झुमके पहनने से  किसी राष्ट्राध्यक्ष को जो “कुछ कुछ” हुआ वह अलग था, भारत की तरक्की देखकर चीन, पाकिस्तान और अमेरिका को जो “कुछ कुछ” हो रहा है वह अलग है, ईरान युद्ध में फंस कर ट्रंप को और यूक्रेन युद्ध में फंस कर पुतिन को होने वाला “कुछ कुछ” अलग है। इसी तरह बंगाल चुनाव हारकर ममता को और जीतकर भाजपा नेताओं को होने वाला “कुछ कुछ” भी अलग – अलग है। प्रियंका और राहुल को होने वाले “कुछ कुछ” की तुलना, बराबरी या समानता भी किसी दूसरे के “कुछ कुछ” से नहीं की जा सकती। मेरी बात से झब्बू के चेहरे पर समाधान के भाव उभरते देखकर मुझे प्रसन्नता हुई। मैं वापस लौटने लगा तो झब्बू ने टोका, बोला – भाई साहब, मुझे पता था कि पत्रकार के पास हर बात का जवाब होता है, वह अति दूरदर्शी होता है तभी तो जब चंद्रशेखर जी प्रधान मंत्री थे तब एक बार उन्होंने कहा था कि अब पत्रकारिता इतने आगे बढ़ गई है कि मुझे सुबह समाचार पत्र पढ़कर पता चलता है कि मैंने कल रात क्या सोचा अथवा मैं आगे क्या करने वाला हूं। पत्रकारों पर झब्बू की बात सुनकर मेरे पास कोई जवाब नहीं था।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – व्यंग्य ☆ काजल चोर (वन लाइनर)… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ व्यंग्य ☆ काजल चोर (वन लाइनर)☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

आँखों से काजल चुराना, मुझे तो ये मुहावरा सही नहीं लगता, और समझ में भी नहीं आता– क्या ये मुमकिन है ? वीणा ने पतिदेव से कहा, तो उनका जवाब था— तुम्हारी शंका निराधार नहीं है।

“आँखें हमारी, काजल हमारा, लगाने वाले हाथ भी हमारे, फिर आँखों को छुए बगैर, काजल कैसे चुरा सकता है कोई?

पर जानती हो – जादू भी कोई चीज है। कोई पहुँचा हुआ जादूगर ही ऐसा कर सकता है। जिसे दूसरे शब्दों में हाथ की सफाई कहते हैं। दुनिया में बहुत कुछ ऐसा होता है, जो हमारी सोच से परे होता है।

जादूगर सरकार का कारनामा देखा है। उन्हें लोग मोटे से लोहे की संदूक में बिठा देते और बाहर से भारी भरकम ताला लगाकर समुद्र में फेंक देते। वे पलक झपकते ही बाहर निकल आते थे।

अब तुम्हारी ही बात ले लो- कितनी सफाई से मेरी जेब से पैसे चुराती हो।

देखिए जी–पति की जेब किसी मंदिर से कम थोड़े ही है। उससे पैसे उड़ाने में कैसा संकोच, कैसा पाप। जब आपने उड़ाते हुये  देखा ही नहीं तो इल्जाम कैसा? अब तो न्याय की देवी की आँखों से पट्टी भी हट गई है। वो तो सबूतों के बिना मानेगी नहीं।

और सबूत आपके पास हैं नहीं।

—    देखो डार्लिंग, इधर उधर की बातें न करो. जेब में 200 रुपए हों और 100 गायब हो जाएं !सोचनेवाली बात ये है कि घर में तुम और मैं, मैं और तुम, तीसरा कोई नहीं। फिर—-

हँसते हुये वीणा ने कहा- डाॅगी है ना। आपका वफादार।

उसकी वफादारी और कब काम आयेगी।

–अब मुझे डाॅगी की गवाही लेनी होगी।

–देखिए जी, अपनों के पैसे अपने चुरा लें, तो उसे चोरी नहीं कहते। उसे पाप भी नहीं कहते। उसे प्यार कहते हैं।

मैंने तुम्हारा दिल चुराया था कि नहीं? तब तो तुमने चोरी का इल्जाम नहीं लगाया। लोग तो जाने क्या-क्या नहीं चुराते, चैन चुराते हैं। नज़र चुराते हैं। और तो और नींदे भी चुराते हैं। अब तो कविता कहानी चोर भी सीना ताने घूमते नज़र आते हैं।

—सब कुछ शब्दों का ही तो खेल है. इसमें महारत होनी चाहिए।

—इसका मतलब डिग्री, रसूख आवाज़, विरासत, रंगरूप, ओहदे से ज्यादा जरूरी है हाथ की सफाई।    

—अब तो समझ में आ ही गया होगा। आँखों से काजल चुराना– मुहावरा यूँ ही नहीं बना।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०४२ ⇒ व्यंग्य – सफ़ेद बाल ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका व्यंग्य- “सफ़ेद बाल।)

?अभी अभी # १०४२⇒ व्यंग्य – सफ़ेद बाल ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

बाल उगाना तो बच्चों का खेल है, लेकिन उन्हें हमेशा काले बनाए रखना बड़े-बूढ़ों का खेल है। सभी बच्चे अमूमन बाल लेकर पैदा होते हैं, कुछ ज़्यादा तो कुछ कम। बिना बाल के बच्चे कम ही पैदा होते हैं। इसीलिए उन्हें बाल बच्चे कहते हैं।

बच्चों के साथ बाल भी बढ़ते हैं। लड़कों के बाल कटते रहते हैं, लड़कियों के बाल बढ़ते रहते हैं। बाल और नाखून साथ साथ बढ़ते हैं, दोनों में खून नहीं होता। लेकिन जब कोई उखाड़ता है तो दर्द होता है। नाखून घर में काटे जाते हैं, केश, आपले केश कर्तनालय में।।

बहुत से घरों में छुट्टी के दिन बाल दिवस मनाया जाता है। एक समय था जब शिकाकाई और मुल्तानी मिट्टी से महिलाएँ बाल-सेवा में व्यस्त रहा करती थी। रेडियो सीलोन पर लोमा हेयर आयल का विज्ञापन आता था। तब तक शैम्पू का तो जन्म भी नहीं हुआ था। केवल दादियों के बाल सफ़ेद हुआ करते थे। बालों में जुओं और घरों में खटमलों का राज हुआ करता था।

बालों की सुरक्षा शरीर की सुरक्षा का एक प्रमुख अंग है। किसी के सर में एक भी सफेद बाल बुढापे की निशानी समझा जाता था। इसी कारण हाथों में लगने वाली मेंहदी सर पर चढ़ गई। बाज़ार में बालों की सुरक्षा के लिए शैम्पू, कंडीशनर और मॉइस्चराइजर आ गए। इंदौर में एक मॉडर्न लांड्री थी, जो अपनी दुकान के नाम के नीचे डायर्स और ड्राइकलीनर्स भी लिखती थी।।

जब से वॉशिंग मशीन घरों में आ गई कपड़े घरों में ही ड्राई-क्लीन होने लगे और गोदरेज डाई से बाल भी काले होने लगे। बाल डाई करने के बाद किसी भद्र महिला-पुरुष की उम्र का पता ही नहीं चलता। महिलाओं के चेहरे और बालों की सुंदरता के लिए ब्यूटी पार्लर की सेवाएँ ली जाने लगी तो पुरुषों ने भी जेंट्स पार्लर की ओर रुख कर लिया।

जॉनीवाकर का एक मशहूर गीत है -तेल मालिश चम्पी ! सर की मालिश और शरीर की मालिश अब फेशियल और बॉडी मसाज हो गई है। ए के हंगल भी जब मेन्स पार्लर से बाहर आता है तो अपने आप को देवानंद समझता है। बाल काले करने से दुनिया उजली नज़र आने लगती है।।

कुछ ही भाग्यशाली पुरुष ऐसे होते हैं जिन्हें बालों की चिंता नहीं होती। लोग उन्हें मुफ्त ही बदनाम करते हैं कि चिंता से बाल उड़ जाते हैं। महिलाओं के बाल कम उड़ते हैं, जब कि उन पर जिम्मेदारियों का बोझ अधिक होता है।

एक ऐसी मान्यता है कि धूप में बाल सफेद होते हैं। जिनके बाल सफेद होने लगते हैं, वे सफाई देते हैं कि हमने बाल धूप में सफेद नहीं किये। कहाँ किये, कभी नहीं बताते। उन्हें इतना नहीं समझता कि सफेद बाल काले करना तो आसान है लेकिन काले बाल सफेद करना इतना आसान नहीं।।

जिन्हें हम सफ़ेद बाल कहते हैं, उन्हें अंग्रेज़ी में grey hair कहते हैं। सफेद बाल सम्मान का प्रतीक है। लोग सम्मान की आशा तो रखते हैं, लेकिन बूढ़ा नहीं दिखना चाहते। बुढापा विचारों से तो आता ही है, बार बार आईना देखने, और सफ़ेद बाल गिनने से भी आता है।

बाल काले हों, सफेद हों, कोई फ़र्क नहीं पड़ता ! बस दिल काला न हो। सुंदर दिखना और लगना आपका जन्मसिद्ध अधिकार है। अच्छे दिखें, अच्छे लगें, साथ साथ अच्छे बनें भी। जो देखे, बस यही कहे, अहा ! आप मुझे अच्छे लगने लगे। कितना पुराना गीत है, लेकिन हमेशा जवां ;

अभी तो मैं जवान हूँ,

अभी तो मैं जवान हूँ,

अभी तो मैं जवान हूँ…

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© श्री प्रदीप शर्मा

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