(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “बब्बर शेर ब्रिटिश साम्राज्य के राजचिन्ह का रूपक” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२१ ☆
व्यंग्य – भंडारा श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
दीनू दान उड़ा रहा है। चंदू चंदा डकार रहा है। ठेकेदार मुनाफा बटोर रहा है। नेता बजट का श्रेय और बजट का हिस्सा दोनों ले रहा है। अधिकारी कमीशन को प्रशासनिक संस्कार मानकर आत्मसात कर रहा है। जमीन पर कब्जा हो रहा है। जनता मुफ्त प्रसाद की प्रतीक्षा में खड़ी है।
देश में भंडारों की बड़ी परंपरा है। पहले लोग पुण्य कमाने के लिए भंडारे करते थे। अब प्रभाव, प्रभुत्व और प्रायोजन कमाने के लिए करते हैं। पहले कड़ाही में दलिया और खिचड़ी पकती थी, अब कागजों में योजनाएं पकती हैं। पहले पूड़ी सब्जी बंटती थी, अब घोषणाएं, विज्ञापन और सपने बांटे जाते हैं।
भंडारे की शुरुआत हमेशा श्रद्धा से होती है और समापन हिसाब से। श्रद्धालु धन देता है, आयोजक धन्यवाद देता है और बीच का रास्ता धन के चरित्र को बदल देता है। चंदा जब तक दानदाता की जेब में रहता है, धर्म के लिए संकल्प कहलाता है। दान खाते में पहुंचते ही अवसर बन जाता है।
चंदू इसी अवसरवाद का पुरोहित है। वह चंदे को इस कौशल से पचाता है कि आयकर विभाग भी उसके पाचन तंत्र पर शोध करना चाहे। वह पारदर्शिता का इतना बड़ा समर्थक है कि हर सवाल पूछने वाले को आरपार देख लेता है, लेकिन अपने खाते किसी को नहीं दिखाता। उसके अनुसार समाजसेवा में हिसाब मांगना आस्था पर हमला है। वह उदाहरण देता है, प्रतिप्रश्न करता है कि अमुक धर्म या खास ट्रस्ट पर कोई सवाल क्यों नहीं उठा रहे, केवल हमारी आस्था ही क्यों सवाल की परिधि में है।
दीनू सेवा का ब्रांड एंबेसडर है। वह हर फोटो में गरीब के कंधे पर हाथ रखता है और हर सौदे में अपना दूसरा हाथ जेब के भीतर रखता है। उसके चेहरे पर करुणा टपकती है और व्यवहार में गणित। उसे मालूम है कि पांच लाख का दान पचास लाख की प्रतिष्ठा और पांच करोड़ का प्रभाव पैदा कर सकता है। इसलिए वह परोपकार को निवेश की तरह करता है।
नेता जी मंच पर विराजमान हैं। वे जनता को अपना परिवार बताते हैं। यह वही परिवार है जिससे वे चुनाव के बाद उतनी ही दूरी बना लेते हैं जितनी दूरी सुरक्षा घेरा जनता से बनाए रखता है। वे बताते हैं कि विकास गांव गांव पहुंच चुका है। गांव वाले सहमति में सिर हिलाते हैं क्योंकि विकास उनसे मिलने नहीं आया, लेकिन उसका विज्ञापन रोज उनके मोबाइल पर पहुंच जाता है।
अब विकास का अर्थ भी बदल गया है। सड़क टूट जाए तो मरम्मत का बजट विकास है। मरम्मत टूट जाए तो नया टेंडर विकास है। टेंडर रद्द हो जाए तो पुनः स्वीकृति विकास है। काम हो जाए तो वह चमत्कार की श्रेणी में आता है।
ठेकेदार लोकतंत्र का अनसुना जन कवि है। वह सीमेंट में दर्शन और बजरी में संभावना मिलाकर निर्माण करता है। उसकी बनाई सड़कें बरसात आते ही आत्मनिर्भर होकर मिट्टी में विलीन हो जाती हैं। पुल उद्घाटन के समय मजबूत और जांच के समय भावुक पाए जाते हैं। मगर चिंता की कोई बात नहीं। हर दुर्घटना के बाद संवेदना का नया भंडारा शुरू हो जाता है।
अधिकारी व्यवस्था के योगी हैं। वे फाइलों के पद्मासन पर बैठकर निर्णय की साधना करते हैं। उनकी कलम तब तक मौन व्रत में रहती है जब तक उसे समुचित ऊर्जा प्राप्त न हो जाए। इस ऊर्जा के कई नाम हैं, पर जनता इसे सुविधा शुल्क के नाम से पहचानती है।
भंडारे का एक स्वादिष्ट व्यंजन जमीन भी है। जिस भूमि पर स्कूल बनना था, वहां कॉम्प्लेक्स उग आता है। जहां तालाब था, वहां टावर खड़ा हो जाता है। जहां पार्क प्रस्तावित था, वहां प्लॉट बिक जाते हैं। नक्शे बदलते हैं, सीमाएं बदलती हैं, मालिक बदलते हैं, केवल सरकारी रिकॉर्ड अपनी नींद में खर्राटे भरता रहता है।
इस पूरे आयोजन में जनता की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण और सबसे नगण्य है। उसी के नाम पर चंदा आता है, उसी के नाम पर बजट आता है, उसी के नाम पर योजनाएं बनती हैं और उसी के नाम पर भाषण दिए जाते हैं। दरअसल पूरा भंडारा ही जनता के नाम पर आयोजित होता है, जनता का , जनता के लिए , जनता के धन से , बस वही जनता भंडारे के स्वादिष्ट भोजन की लाभार्थियों वाली लाइन में कहीं पीछे छूट जाती है।
भंडारा समाप्त होने पर पत्तलें उठ जाती हैं, बैनर उतर जाते हैं, नारे बदल जाते हैं। लेकिन दीनू बना रहता है, चंदू बना रहता है, ठेकेदार बना रहता है, कमीशन बना रहता है। और बने रहते हैं, नेता जी , जो अवसर के अनुसार नई पार्टी में नजर आ सकते हैं। केवल जनता हर बार नए विश्वास के साथ फिर अगले भंडारे की पंक्ति में लग जाती है।
लोकतंत्र की यही सबसे अद्भुत व्यवस्था है। यहां भंडारा जनता के नाम पर होता है, खर्च खजाने से होता है, लाभ प्रभावशालियों को मिलता है और धन्यवाद जनता देती है। फिर अगला भंडारा घोषित होता है। फिर वही श्रद्धा, वही शोर, वही भाषण, वही बजट, वही बंटवारा।
लोक में बहुत दिनों से एक मुहावरा हलचल मचा रहा है. “कानों पर जूँ भी नहीं रेंगती.” अव्वल तो रेंगती शब्द से स्पष्ट है कि वह लेडी जूँ है। मर्द जूँ को कान पर रेंगने से परहेज क्यों है, यह एक यक्ष प्रश्न है। वैसे भी इन दिनों जूँ दुर्लभ प्रजाति हो गई है। आखिर वह आशियाना बनाये भी तो कहाँ! बढ़िया बढ़िया शैंपू से काले काले रेशमी लहराते हुये बाल स्वच्छ सिल्की सिल्की, धूल पसीने से चिपचिपे हों तो जूँ का काम बने।
खैर, एक पत्रकार ने इस दिशा में एक लेडी जूँ का इंटरव्यू लिया। पूछा– आप को आकाओं के कान क्यों पसंद नहीं?
रेंगना आपका संस्कार है, धर्म है, फिर ये बगावत कैसी?
जूँ का जवाब था— हम बहरे लोगों के कानों पर रेंग कर क्या करेंगे? यह तो खुद का अपमान ही हुआ ना, इसलिए हमने ठिकाना बदल लिया है। हम उनके कानों पर रेंगते हैं, जो हमारे रेंगने के मानी समझते हैं या उसका महत्व जानते हैं।
— देखिए जूँ जी, कभी कभी कुछ काम ऐसे भी करने पड़ते हैं जो पसंद नहीं होते। मुझे आपकी देशभक्ति पर सन्देह है।
— मैं जानती थी, तुम मुझे अर्बन नक्सल, देशद्रोही, आतंकवादी, पाक परस्त कहोगे है ना?
— मैंने ऐसा तो नहीं सोचा, पर आप से एक गुज़ारिश है। रेंगो तो सही। फल की चिंता मत करो। अगर रेंगते हुए शहीद भी हो गईं, तो यह राष्ट्र हित हेतु कुर्बानी होगी। आपका नाम इतिहास में लिखा जाएगा।
— मुझे अपने “मन की बात “सुना सुना कर मत पकाओ। भूलो मत यहां सभी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त है। मैं, कहाँ, किस हद तक अभिव्यक्त होऊं, ये मेरी मर्जी है। आप मुझे मजबूर नहीं कर सकते। मुझे संविधान की दुहाई न दें।
— जूँ जी! आप ना, बेहद अक्खड़, ढीठ और जिद्दी हैं। —– जब लोग अपनी खतरनाक जिद पाले हुए हैं, तो मुझे आत्मरक्षार्थ ऐसा सोचना ही पड़ेगा।
— इतना तो आपको पता है कि व्यक्ति से बड़ा देश है. सभी का कर्तव्य है कि हर हाल में उसकी रक्षा करें. बापू के तीनों बंदरों ने काया बदल कर माया इकट्ठी कर ली। मैंने तो ऐसा कुछ नहीं किया।
— आप बंदर युग तक ना पहुँचें तो अच्छा है। वर्तमान की बात कीजिये। आज बहरे कानों को आपकी जरूरत है, जितनी कभी नहीं थी।
मैं कई बार रेंग आई पर देखा, नतीजा सिफ़र। फिर लगा, कि आत्मसम्मान भी कोई चीज है। जूँ हूँ तो क्या हुआ?
— देखिये, भगवान ने आपको किसी खास प्रयोजन से बनाया है। संभवतः आप उसे जानती होंगी।
अंत में एक बार फिर कहूंगा कि प्रयास कीजिए। कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।।
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आज प्रस्तुत है आपका समसामयिक विषय पर एक विचारणीय व्यंग्य “रामचंद्र कह गए सिया से…”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३१ ☆
☆ व्यंग्य ☆ “रामचंद्र कह गए सिया से…” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆
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वर्षों पहले एक फिल्म आई थी गोपी जिसमें दिलीप कुमार पर फिल्माया गया एक गाना बहुत चर्चित हुआ था।
“रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलयुग आएगा,
हँस चुनेगा दाना जुन का कौवा मोती खाएगा।”
अयोध्या के राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा दिये गए दान के पैसों और आभूषणों की चोरी ने इस वर्षों पुराने गीत को सही साबित कर दिया। गीत लंबा है और इसमें जितनी भी बातें कही गई हैं वे सभी सच साबित हो रहीं हैं। राम मंदिर में चोरी की चर्चा न सिर्फ भारत वरन पूरी दुनिया में हो रही है। दान की चोरी करने वालों को श्रद्धालु और तमाम ईमानदार लोग तो धिक्कार ही रहे हैं, ईश्वर पर आस्था रखने वाले सिद्धांतवादी चोर, डाकू, लुटेरे, रिश्वतखोर, जमाखोर भी मंदिर के दान और चढ़ोत्तरी पर हाथ साफ करने वालों की निंदा कर रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि मंदिर में दान राशि – संग्रह के लिए बनाए गए नियमों का सख्ती से पालन नहीं हुआ। वैसे देखा गया है कि तमाम नियमों कानूनों के बाद भी देश में अरबों के घोटालों, चोरियों, धोखाधड़ी से लेकर प्रश्न पत्रों व अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेजों की चोरी का लम्बे इतिहास के साथ – साथ वर्तमान भी है।
चोर, चौकीदार से शातिर होते हैं। वे लोगों की आंखों के काजल से लेकर दिल तक चुरा लेते हैं और पता चोरी होने के बाद ही चल पाचौड़ाता है। इसलिए तो कहा गया है कि डाल – डाल चलने वाले चौकीदारों की अपेक्षा पात – पात चलने वाले चोर हमेशा सफलता प्राप्त कर लेते हैं। यह ठीक है कि चोरी बुरी बात है पर चोर होना कोई मामूली बात नहीं। चोरी के लिए 56 इंच का सीना होना चाहिए ये तो मैं नहीं कहूंगा क्योंकि इस नाप का सीना निर्विवाद है, लेकिन विशाल सीना होना आवश्यक है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों विशेषकर संस्कृत साहित्य जैसे “दशकुमारचरितम्” में चोरी को चतुषष्टिक कलाओं में से एक विशेष विद्या “चौर्य कला” के रूप में उल्लेखित किया गया है। अर्थात चोरी एक कला है इस आधार पर यह मानना पड़ता है कि राम मंदिर के चोर पहुंचे हुए साहसी कलाकार हैं।
एक लोक प्रिय कहावत भी है “राम जी की चिड़िया, राम जी का खेत; खाओ चिड़िया भर-भर पेट“। जो हमारी नजर में चोर हैं वे शायद चंदे को अपना ही समझ कर खा रहे थे। “अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम। दास मलूका कह गए, सब के दाता राम॥” कहीं ये राम मंदिर में बैठे अजगर तो नहीं थे।
श्रीरामचरितमानस के रचनाकार संत गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी रामचरितमानस में वर्षों पूर्व ही बालकाण्ड में लिख दिया था -“होइ है वही जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा।।” अर्थात् संसार में वही होकर रहेगा जो भगवान श्रीराम ने पहले से तय कर रखा है। व्यर्थ के तर्क – वितर्क करके कौन इसे बढ़ाए। दान के करोड़ों रुपयों और जेवरों का गबन हुआ है। जांच जारी है, कई लोगों से सघन पूछताछ की जा रही है, अनेक लोग गिरफ्तार हुए हैं। संभवतः जांच से सब सामने आ जाए। दूध का दूध पानी का पानी हो जाए। शायद न भी हो क्योंकि “होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥” हम तो सिर्फ परिणाम की प्रतीक्षा कर सकते हैं। वैसे यदि चोर राम मंदिर में चोरी करने की जगह कृष्ण मंदिर में चोरी करते तो सफाई में कुतर्क कर सकते थे कि हमने चोर (माखनचोर) के घर चोरी की है, किंतु मर्यादा पुरुषोत्तम के मंदिर में चोरी करके वे बुरी तरह फंस चुके हैं। यों आज के युग में लोग बेशर्मी से चिल्ला – चिल्ला कर चोरी कर रहे हैं, कई लोगों के जीवन यापन का साधन ही फिल्म “चोरी मेरा काम” के हीरो की तरह खुल कर चोरी करना है, ऐसे लोगों पर अब तक क्या प्रतिबंध लगे ? इस फिल्म के गाने के बोल ही देख लीजिये –
चोरी मेरा काम यारो, चोरी मेरा काम।
अरे वो करते हैं चोरी चोरी करून मैं खुले आम।
सुना था स्वतंत्रता पूर्व चोरों – डाकुओं को राजाओं – जमीदारों आदि का संरक्षण प्राप्त रहता था। संरक्षण प्राप्त चोर – डाकू दूसरे राज्यों – क्षेत्रों में चोरी – डकैती करते थे और लूट का धन अपने राज्य राजकोष में जमा करके कमीशन, सुरक्षा व सम्मान प्राप्त करते थे। कहां तक बात करें, दुनिया चोरों से भरी पड़ी है। बहरहाल राम मंदिर के चोरों को राम जी भले ही माफ कर दें लेकिन सरकार और राम भक्त जनता उन्हें कभी माफ नहीं करेगी।
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘टेढ़े-मेढ़े रास्ते‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३९ ☆
गोस्वामी जी ऑफिस के बड़े बाबू के पास पहुंचे। कहा, ‘बड़े बाबू, वाइफ का ट्रांसफर कराना है। छः साल से सीतापुर में पड़ी हैं। परेशानी बनी हुई है।’
बड़े बाबू सुंघनी का एक डोज़ लेकर बोले, ‘हो जाएगा। हम किस दिन काम आएंगे?’
गोस्वामी जी ने पूछा, ‘कुछ चंदन-पानी लगेगा क्या?’
बड़े बाबू ने जवाब दिया, ‘तीन लाख का रेट चल रहा है। ले आओ और हफ्ते भर में आर्डर ले लो।’
गोस्वामी जी की आंखें फैल गयीं, बोले, ‘तीन लाख? यह तो बहुत है। इतना कौन देगा?’
बड़े बाबू इत्मीनान से फाइल पलटते हुए बोले, ‘देख लो। हमने सीधा रास्ता बता दिया। काम बिलकुल सही और ईमानदारी से होगा। हफ्ते भर में आर्डर मिल जाएगा।’
गोस्वामी जी हाथ उठाकर बोले, ‘न बाबा! यह तो बहुत ज्यादा है। मेरी मंत्री जी के पीए से रसाई है। मेरी कॉलोनी में ही रहते हैं। उनसे कहूंगा। वह ज़रुर मदद करेंगे।’
बड़े बाबू बोले, ‘देख लो। हमने तो आपको सीधा-सादा रास्ता बता दिया, एकदम एक्सप्रेस वे वाला। आपको टेढ़े-मेढ़े रास्ते पसंद हैं तो उन्हीं को पकड़ो। आपकी मर्जी।’
गोस्वामी जी पंद्रह दिन बाद फिर आकर बड़े बाबू के पास बैठ गये। मायूसी के स्वर में बोले, ‘हमें पीए साहब ने आश्वासन दिया था, लेकिन कुछ नहीं हुआ। सब झटका देते हैं। कोई भरोसे के लायक नहीं है। अब तो ट्रांसफर बंद भी हो गये ।’
बड़े बाबू ने जवाब दिया, ‘हमने तो आपको पहले ही सलाह दी थी कि सीधे रास्ते पर चलो, लेकिन आपको टेढ़े-मेढ़े रास्ते ही पसंद हैं तो हम क्या कर सकते हैं? जमाने के हिसाब से नहीं चलोगे तो तकलीफ तो उठानी पड़ेगी।’
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – कर्म चाहे नंगा, बस बहती रहे गंगा।)
☆ चुभते तीर # १०९ – व्यंग्य – कर्म चाहे नंगा, बस बहती रहे गंगा ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
गंगा नदी नहीं है भाई, हम भारतीयों के लिए एक यूनिवर्सल वॉशिंग मशीन है। डिटर्जेंट की ज़रूरत नहीं, बस एक डुबकी मारो और जनम-जनम के पाप ऐसे ग़ायब, जैसे गधे के सिर से सिंग।
हम बचपन से सुनते आ रहे हैं “मन चंगा तो कठौती में गंगा।” लेकिन हमने इसका प्रैक्टिकल वर्ज़न ढूंढ निकाला है: “कर्म चाहे नंगा, बस बहती रहे गंगा।”
ऋषिकेश से लेकर बनारस के घाटों तक चले जाइए, गंगा किनारे खड़े होकर आपको लगेगा कि यहाँ मोक्ष का कोई स्टार्ट-अप चल रहा है। लोग घाट पर ऐसे आते हैं जैसे किसी बैंक की कैश-डिपॉज़िट मशीन के सामने खड़े हों। जेब से निकाला ‘घोटाला नंबर 1’, ‘झूठ नंबर 2’, ‘पड़ोसी की चुगली नंबर 3’ और ‘धपाक!’… सब गंगा जी के खाते में। गंगा मैया भी मन ही मन सोचती होंगी, “भैया, मैं मोक्षदायिनी हूँ, तुम्हारी रीसायकल बिन नहीं कि जो कचरा समाज में नहीं खपा पाए, वो लाकर मुझमें वाश आउट कर दिया।”
हमारी श्रद्धा इतनी भारी है कि वह सीधे प्लास्टिक के थैलों में बंद होकर नदी में तैरती है। हम गंगा को ‘माँ’ कहते हैं, और माँ के प्रति हमारा प्यार इतना अगाध है कि हम उनके आँचल में फूल, अगरबत्ती के रैपर, अधजली लकड़ियाँ, लाशें और ज़हरीला केमिकल सब कुछ उड़ेल देते हैं।
“गंगा पुत्र” होने का हमारा दावा तब तक ज़ोरदार रहता है, जब तक बात नारे लगाने की हो। जैसे ही बात कचरा डस्टबिन में डालने की आती है, हम सब अचानक “सौतेले” हो जाते हैं।
हम हर साल हज़ारों करोड़ के ‘नमामि गंगे’ प्रोजेक्ट्स लाते हैं। फाइलें तैरती हैं, बजट बहता है, मगर गंगा का पानी? वह आज भी इस ताक में रहता है कि कोई उसमें अपनी आस्था बहाने से पहले थोड़ा सा ‘कॉमन सेंस’ भी बहा दे।
आजकल गंगा किनारे मोक्ष कम, ‘इंस्टाग्राम रील्स’ ज़्यादा मिलती हैं। घाट की आरती में लीन भक्त का ध्यान इस बात पर कम होता है कि मंत्र क्या हैं, और इस बात पर ज़्यादा कि ‘सिनेमैटिक शॉट’ में बैकग्राउंड ब्लर सही आ रहा है या नहीं।
एक आदमी हाथ जोड़कर गंगा जी से प्रार्थना कर रहा था: “हे माँ, मेरे सारे पाप धो देना।”
तभी पीछे से आवाज़ आई, “भैया, थोड़ा राइट होना, फ्रेम में तुम्हारी वजह से सूरज छिप रहा है!”
गंगा चुपचाप बह रही है। वह पहाड़ों की पवित्रता लेकर आती है और हमारे मैदानों की चालाकियों को समेटकर समंदर की तरफ बढ़ जाती है। वह मैली इसलिए नहीं हो रही कि उसमें पानी कम है, वह मैली इसलिए हो रही है क्योंकि हमारे भीतर का ‘पाप-साफ़’ करने का लालच बहुत ज़्यादा है।
अगर गंगा सचमुच इंसानी ज़ुबान में बोल पाती, तो घाट पर डुबकी लगाते ही पहला श्राप नहीं, बल्कि एक सीधा सा सवाल पूछती: “शर्मा जी, पिछले हफ़्ते जो टैक्स चोरी की थी, उसका कीचड़ मुझमें धो रहे हो, या सीधे अकाउंटेंट का सिर मुंडवा कर आए हो?”
लेकिन माँ तो माँ है, चुपचाप ज़हर पीकर भी अमृत का आशीर्वाद दिए जा रही है। इस उम्मीद में कि किसी दिन, हम डूबने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें बचाने के लिए हाथ बढ़ाएंगे।
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – विज्ञापित स्वर्ग।)
☆ चुभते तीर # १०८ – व्यंग्य – विज्ञापित स्वर्ग ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
शहर के मुख्य चौराहे पर लगे उस अस्सी फीट ऊँचे डिजिटल होर्डिंग ने पिछले एक पखवाड़े से जनता की रातों की नींद और दिन का चैन छीन रखा था, क्योंकि उस पर ‘अंतिम मोक्ष टावर्स’ की बुकिंग का विज्ञापन इस कदर चमक रहा था जैसे साक्षात चित्रगुप्त ने अपना नया स्टार्टअप खोल लिया हो। बिल्डर महोदय की मुस्कुराहट विज्ञापन में इतनी मखमली थी कि उसे देखकर मोहल्ले के वे लोग भी अपनी वसीयत बदलने पर विचार करने लगे थे, जिनके पास अपनी साइकिल के टायर बदलवाने के पैसे तक नहीं थे। उस ‘स्वर्गीय’ सोसाइटी के ब्रोशर में स्विमिंग पूल का पानी इतना नीला दिखाया गया था कि उसे देखकर समुद्र को भी अपने खारेपन पर शर्म आ जाए, और जिम की मशीनों को देखकर ऐसा लगता था कि वहाँ कसरत करने मात्र से इंसान की उम्र रिवर्स गियर में चलने लगेगी। दफ्तरों में बाबू लोग अपनी फाइलों को ताक पर रखकर इस बात पर बहस कर रहे थे कि क्या किश्तों में स्वर्ग खरीदा जा सकता है, जबकि हकीकत में उनकी पगार महीने के दसवें दिन ही आईसीयू में भर्ती हो जाती थी। सपनों का यह सौदागर शहर की हर दीवार पर अपनी कामयाबी के ऐसे पोस्टर चिपका रहा था, मानो वह कंक्रीट के जंगल में नहीं बल्कि बादलों के ऊपर कॉलोनी काट रहा हो, जहाँ प्रदूषण के बजाय केवल इत्र की बारिश होने का वादा किया गया था।
उस प्रोजेक्ट के लिए जिस जमीन का अधिग्रहण किया गया था, वह दरअसल शहर का वह पुराना कब्रिस्तान था जहाँ कभी शांति का साम्राज्य हुआ करता था, पर अब वहाँ ‘प्रगति’ का शोर गूँजने वाला था। आर्किटेक्ट ने नक्शे में इस तरह की बाजीगरी दिखाई थी कि पच्चीस बाई पचास के प्लॉट में भी उसे गोल्फ कोर्स और अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा नजर आ रहा था, जिसे देखकर भौतिक विज्ञान के सिद्धांत भी आत्मग्लानि से भर उठे थे। रेरा के नियमों को उस फाइल में इस तरह दबाया गया था जैसे किसी अपराधी को कालकोठरी में डाल दिया जाता है, और मंजूरी देने वाले अधिकारी के चेहरे पर वह दिव्य तेज था जो केवल करोड़ों के वारे-न्यारे होने के बाद ही अवतरित होता है। लोग अपनी जीवन भर की जमापूँजी उस काल्पनिक खिड़की के लिए लुटा रहे थे, जहाँ से बिल्डर ने ‘हिमालय के दर्शन’ कराने का वादा किया था, जबकि असल में वहाँ से केवल बगल वाले नाले की दुर्गंध और पड़ोसी के फटे हुए बनियान ही नजर आने वाले थे। विज्ञापनों की उस मायावी दुनिया में नैतिकता एक ऐसी वस्तु बन चुकी थी, जिसे सेल में भी कोई खरीदने को तैयार नहीं था, और मध्यमवर्ग अपनी ईएमआई के बोझ तले दबकर उस ‘अंतिम मोक्ष’ की प्रतीक्षा में अभी से ही अधमरा हुआ जा रहा था।
‘अंतिम मोक्ष टावर्स’ के उद्घाटन समारोह में स्वयं सूबे के सबसे बड़े रईस को रिबन काटने के लिए बुलाया गया और जैसे ही उन्होंने सोने की कैंची चलाई, वह डिजिटल होर्डिंग अचानक फट पड़ा। लोग घबराकर पीछे हटे, लेकिन वहाँ से धुआँ नहीं बल्कि हजारों की तादाद में असली सफेद कबूतर निकले जो देखते ही देखते काले कौवों में तब्दील होकर पूरे प्रशासन पर हमला करने लगे। ताज्जुब तो तब हुआ जब वह नवनिर्मित बिल्डिंग अपनी जगह से किसी रॉकेट की तरह ऊपर उठी और हवा में लटक गई, जहाँ से बिल्डर की आवाज गूँजी कि ‘पैसे पूरे मिल चुके हैं, अब फ्लैट भी स्वर्ग में ही मिलेंगे’। हतप्रभ भीड़ ने देखा कि वह पूरी बिल्डिंग अब कांच की तरह पारदर्शी हो गई थी और उसके भीतर वे सभी अधिकारी और नेता कैद थे जिन्होंने इस फर्जीवाड़े में हिस्सा लिया था, जो अब हाथ जोड़कर नीचे उतरने की भीख माँग रहे थे। अंत में, वह पूरी इमारत एक विशाल बुलबुले की तरह फूटी और आसमान से नोटों की बारिश होने लगी, पर वे नोट असली नहीं बल्कि उन मासूमों की ‘बददुआओं’ के कागजी टुकड़े थे जिन्हें घर के नाम पर बेघर कर दिया गया था। पूरा शहर इस भयावह और चमत्कारी दृश्य को देखकर जड़ हो गया था, क्योंकि स्वर्ग की बुकिंग कराने वाले अब नरक के दरवाजे पर अपनी रसीदें लिए कतार में खड़े थे।
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम हास्य व्यंग्य “झुमकों का जादू और उनके दुश्मन”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३० ☆
☆ हास्य व्यंग्य ☆ “झुमकों का जादू और उनके दुश्मन” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆
जब झुमकों का जिक्र होता है तो महिलाओं के सौंदर्य में चार चांद लगाते उनके कानों में लटकते-झूलते, मचलते झुमकों के साथ-साथ न जाने कितनी झुमकाधारी महिलाओं के चेहरे आँखों के सामने आ जाते हैं, झुमकों पर बने गीत और उन पर इठलाती हीरोइनें स्मृति में उभर आती हैं। वह गाना तो आपको याद ही होगा – “ढूंढो ढूंढो रे बलमा, ढूंढो रे सजना मेरे कान का बाला”। बाला गुम जाने से कितनी परेशान थी फिल्म गंगा जमुना की हीरोइन। …और वह गाना “कान में झुमका, चाल में ठुमका”। मैं समझता हूं कि कान में झुमका पहनने के बाद चाल में ठुमका शायद इसलिए लगाना पड़ता है कि ठुमके के कारण झुमका हिले और देखने – चाहने वालों के दिलों की धड़कने बढ़े। यों तो अब सभी जगह अच्छे झुमके मिलने लगे हैं किन्तु पहले बरेली के झुमके बहुत प्रसिद्ध थे – “झुमका बरेली वाला कानों में ऐसा डाला झुमके ने ले ली मेरी जान, हाय रे मैं तेरे कुर्बान।
यहां झुमके की ताकत समझिये और अपनी प्रिये को झुमके की सरप्राइज गिफ्ट देने की योजना बनाइये, निःसंदेह आपको मनचाहा फल मिलेगा। अभी हाल ही में इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी ने भी भारतीय परम्परा वाले झुमके पहिन कर पूरी दुनिया में झुमकों का हल्ला बोल दिया है। मुझे नहीं मालूम कि मेलोनी जी को झुमके पहनने के लिए किसने प्रेरित किया अथवा उन्हें ये झुमके किसने भेंट किये? आप चाहें तो भेंटकर्ता का अनुमान लगा सकते हैं, हो सकता है कि आपका अनुमान सही हो। बरेली शहर में बना झुमका चौराहा और वहाँ स्थापित विशाल झुमका इस बात का प्रमाण है कि हमारे देश में झुमके और झुमके पहनने वालियों का कितना सम्मान है। मैंने तो जब से इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी की झुमके वाली फोटो देखी है तब से उनके प्रति मेरी श्रद्धा बढ़ गई है, वे मुझे जरा ज्यादा ही अपनी सी लगने लगी हैं। मेलोनी जी से मेरा आग्रह है कि वे जब भी भारत आएं झुमके पहिन कर ही आएं और बरेली का झुमका चौराहा घूमने अवश्य जाएं, किंतु सतर्क रहें न जाने कौन सा श्राप है कि बरेली के बाजार में महिलाओं के झुमके गिर जाया करते हैं। उल्लेखनीय है कि भारत का साहित्य झुमकों से भरा पड़ा है। झुमकों पर शायरों ने खुलकर लिखा है –
मुसीबत है ये तेरा झुमका जो तेरे गालों पर झूल गया,
कहने आया था मैं दिल की
बात और मैं भूल गया।
*
तेरे कानों का झुमका देख दिल जलता है,
मुझसे बेहतर तेरा झुमका है जो गालों को चूम जाता है।
*
इश्क की महाभारत में
झुमका किसी ब्रम्हास्त्र से कम नहीं ..।
*
जुल्फें सिर्फ बाईं तरफ न रखो,
दायां झुमका खुद को महफूज नहीं समझता।
भाइयो अब तो आप महिलाओं से झुमकों का रिश्ता समझ ही गए होंगे। दुख की बात है कि पुलिस की सतर्कता के बाद भी टुच्चे लुटेरों द्वारा सड़क पर महिलाओं के गले से चेन खींच कर भागने की घटनाओं में तो कोई कमी नहीं आई, हां अब मोटर साइकल सवार लुटेरे महिलाओं के झुमके भी खींच कर भागने लगे हैं। इससे महिलाओं का आर्थिक नुकसान तो हो ही रहा है, कान फटने से वे लहूलुहान भी हो रही हैं। कहीं ऐसा न हो कि लूट के डर से भयभीत महिलाएं झुमके पहनना ही छोड़ दें। इससे नारी के सौंदर्य की हानि के साथ साथ झुमका साहित्य की समृद्धि भी प्रभावित होगी। लुटेरों से आग्रह है कि झुमकों पर हाथ न डालें।
(श्री प्रशान्त चतुर्वेदी जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. आप सेवा निवृत्त सदस्य, म प्र विद्युत नियामक आयोग, स्वतंत्र लेखक, कवि एवं ब्लॉगर। प्रकाशित काव्य संग्रह- मेरी बातें मेरे किससे याद रखोगे। अभिरुचि – कविता पाठ। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य “सपना मेरा टूट गया”।)
मेरी पत्नी किराए के मकान में रह कर ऊब चुकी हैं। अब वे अपनी सहेलियों की तरह ख़ुद का मकान चाहती हैं। मैंने उन्हें यूरोपियन कहावत का हवाला दिया कि मूर्ख व्यक्ति मकान बनाते हैं और बुद्धिमान उसमें रहते हैं। वे बोलीं, हमारा मुँह मत खुलवाओ कि हम दोनों में मूर्ख कौन है। जब पैदाइशी हो, तो एक मकान भी बना ही लो। और फिर उसमें रहने के लिए मेरे जैसी एक अदद बुद्धिमान महिला भी उपलब्ध है।
हमने हथियार डाल दिए और अखबार में नज़र गड़ा दी। अख़बार में एक विज्ञापन दिखा, न्यू मनिपाल रीजेंसी में फ्लैट और पंक्तिबद्ध मकान विक्रय पर हैं। याद आया कि व्यंग्यकार मित्र शुकुल जी वहीं रहते हैं। वे नौकरी भी करते रहे और व्यंग्य भी लिखते रहे, इसलिए आज ख़ुद के मकान में हैं। हमारी तो खैर जीवन कथा स्वयं में ही एक व्यंग्य रही।
बहरहाल हम तैयार होकर शुकुल जी के घर पहुंच गये और औपचारिकताओं के बाद जानकारी लेने का सिलसिला शुरू किया। पूछा कि भाईसाब जिंदगी किराये के मकान में निकल गई, अब अगर न्यू मनिपाल रीजेंसी में आयेंगे तो कैसा महसूस होगा? उन्होंने तपाक से उत्तर दिया, अरे आप तो आ जाइये। आपको किराये का मकान छोड़ने की कमी ही नहीं महसूस होगी। वहाँ आप किराया देते हैं, यहाँ नगर निगम को सम्पत्ति कर, कचरा डिस्पोजल कर, जल कर, बिल्डर का सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट न होने की एवज में कर तो आप देंगे ही। इसके अलावा बिल्डर को भी मेंटेनेंस चार्ज, वाटर चार्ज, नर्मदा जल चार्ज, सीवेज लाइन बदलने का चार्ज और पानी कम आ रहा हो तो पाइप लाइन बदलने का चार्ज देते रहेंगे, आपको ऐसा ही लगेगा कि मकान में किराया देकर रह रहे हों। और फिर बिल्डर के कर्मचारी आपको फील दिलाते रहेंगे, जैसे मकान मालिक वो लोग हैं और आप किरायेदार। किराए का मकान छोड़ने का ग़म तो आप बिल्कुल मत कीजिए।
हमने पूछा कि शुकुल जी, यहाँ रहने का कोई फ़ायदा भी है क्या? शुकुल जी बोले आपने एस ई जेड का नाम सुना है। हमारे चेहरे पर विस्मय बोध देख कर लगा मानो वे पुराने ओरिएंट पंखे के विज्ञापन की तरह कह रहे हों, अरे ये पी एस पी ओ नहीं जानता। खैर शुकुल जी ने ख़ुद ही समझाया एस ई जेड उद्योगों का ऐसा हिस्सा होता है, जो भारत में है, फिर भी नहीं है। उसे कई नियमों से छूट ऐसे मिलती है, जैसे वो सिंगापुर में हो। आप यहाँ रह कर तो देखें, आपको लगेगा कि भारत सरकार के ट्रैफिक नियम यहाँ नहीं लगते। बिल्डर की गाड़ियाँ धड़ल्ले से बिना हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट के स्पीड लिमिट की परवाह किए बग़ैर दौड़ती नज़र आयेंगी। बिल्डर के कर्मचारी तीन सवारी बिना हेलमेट के ऐसे फर्राटे से चलते नज़र आएँगे, जैसे उन्हें ट्रैफिक विभाग ही नहीं, यमराज से भी अभयदान मिला हो। आप भी बहती गंगा में हाथ धोइये, कॉलोनी के भीतर बिना हेलमेट दोपहिया चलाइये और बिना सिक्योरिटी नम्बर प्लेट वाले चौपहिया को बिना सीट बेल्ट पहने चलाइये।
हमने अपने भोंदूपन का प्रदर्शन करते हुए पूछा कि किराए के मकान में कोई समस्या आने पर मकान मालिक को बताते थे। यहाँ क्या करना होगा? शुकुल जी ने प्रतिप्रश्न किया आपने अपनी जवानी के दिनों में हिंदी जासूसी फ़िल्म देखीं थीं या नहीं। इस बार हमने जल्दी से हामी भर दी। उन्होंने याद दिलाया कि उन फ़िल्मों में बॉस के अड्डे पर कुछ लाल, पीली, नीली बत्तियाँ जलती बुझती थीं और बैकग्राउंड में कभी कभी बॉस की भारी आवाज़ आती थी। बॉस नज़र नहीं आता था, लेकिन उसके गुर्गे सारे काम बॉस की आवाज पर करते थे। कॉलोनी में बिल्डर का एक ऑफिस है, वहाँ का नज़ारा भी कुछ इससे मिलता जुलता दिखाई देगा। अगर कर्मचारियों को आपका काम करने के लिये बॉस का ऑर्डर मिल गया, तो समझिये काम हो जाएगा।
हमारी समझ में ही नहीं आ रहा था कि शुकुल जी व्यंग्य की तरंग में हैं या फिर वे चाहते ही नहीं कि हम उनके आस-पड़ोस में रहें। हमने उनसे इजाज़त माँगी तो उन्होंने कहा कि थोड़ी और देर रुकते, तो तुम्हारी भाभी आ जातीं। फिर चाय पकौड़े खा कर ही जाते।
हम क्षमा याचना करते हुए वहाँ से निकल पड़े, लेकिन न्यू मनिपाल रीजेंसी कॉलोनी में मकान लेने का विचार तो हमने त्याग ही दिया था।
(नोट- इस व्यंग्य कथा में वर्णित कॉलोनी, किरदार और घटनायें काल्पनिक हैं। यदि किसी से कोई साम्य हो तो यह मात्र संयोग है।)
(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य “जवाबदेही किस चिड़िया का नाम है?” ।)
☆ शेष कुशल # ६३ ☆
☆ व्यंग्य – “जवाबदेही किस चिड़िया का नाम है?”– शांतिलाल जैन ☆
आईपीएल खत्म हो गया है सो ठिया आबाद करके शाम का खालीपन भरने की कोशिश में यार-दोस्त यहाँ जुटने लगते हैं. ठिए का ओटला अपन की तशरीफ़ का रोज़ाना इंतज़ार करता है. मैं जाता हूँ. मगर इन दिनों कुछ ज्यादा ही परेशान फील करता हूँ. कल तक अपन की मेधा रनों के चेज़, विकेटों के पतन, ओरेंज, पर्पल केपों, टूटते-बनते रिकार्डों जैसी जानकारियों पर सक्रिय नज़र आती थी. घर की बैठक से लेकर यार-दोस्तों के ठियों तक क्रिकेट ही टाकिंग पॉइंट हुआ करे था. आज नीट एग्जाम के पेपर लीक का मुद्दा सोच को बार-बार अपनी ओर खींच रहा है. दो महीने से चौकों-छक्कों की आतिशबाजी और विकेटों के गिरने के रोमांच में डूबी शाम का मजा सीबीएसई स्टूडेंट्स के साथ घट रही त्रासदियों के कड़वे घूँट ने किरकिरा कर रखा है. दोस्त चाहते हैं मैं इन गैर जरूरी मुद्दों को झटककर फिर से क्रिकेट के कार्निवाल में रम जाऊँ मगर नहीं हो पा रहा. बार-बार अपने नातियों का मासूम उदास चेहरा अपन के जेहन में घूम जाता है.
मैं यारों के बीच इन पर बहस उकेरना चाहता था मगर उस रोज़ ठिए पर दादू के अलावा कोई आया ही नहीं. बोले – “तुम्हारी सोच नकारात्मक हो गई है, सांतिभिया. दुश्वारियाँ आईपीएल से पहले कम थीं क्या?”
“नहीं दादू, दुश्वारियाँ तो आईपीएल के दरम्यान भी रहीं मगर निज़ाम ने हर शाम मस्ती में बिताने का फुल बंदोबस्त कर रखा था. उसने सस्ता डाटा भी मुहैया करा रखा था. नहीं करा पाया निज़ाम तो बस! आटा सस्ता नहीं करा पाया.”
दादू बोला – “हर समय महंगे आटे का रोना लेकर बैठ जाते हो तुम, सांतिभिया. आईपीएल ख़त्म हुआ तो क्या! रील एन्जॉय कीजिए. हर समय रोते मत रहिए. सीबीएसई की परीक्षा के आगे जहाँ और भी हैं. क्या हो जाएगा एक पीढी पूरी अनपढ़ भी रह ली तो!! जो पढ़े लिखे हैं वे कौनसे नैतिक काम कर रहे हैं? पढ़ा-लिखा बिका हुआ जज, बिका हुआ अफसर, बिका हुआ चुनाव अधिकारी, बिके हुए हाकिम, मुलाज़िम, उतने ही बिके बिके से सम्पादक और पत्रकार पढ़े लिखे नहीं हैं क्या? बिके हुए पढ़े लिखे समाज से बेहतर है एक पूरी पीढ़ी का अनपढ़ अनबिका रह जाना. करियर और रोज़गार के गम मत पालिए सांतिभिया क्रिकेट का अफगानिस्तान दौरा एन्जॉय कीजिए. महंगे पेट्रोल के गम को वैभव सूर्यवंशी के छक्कों, जोफ्रा आर्चर की यॉर्करों में भूल जाईए.”
मैंने कहा – “ऐसे कैसे हो सकता है दादू ? नाती ट्वेल्थ में नाईंटी एट परसेंट पर कॉंफिडेंट था. उसके रोल नंबर पर किसी और की कॉपी स्कैन हो गई है. दूसरावाला दो साल से नीट की तैयारी कर रहा था. कोचिंग क्लास की फीस ने पहले ही बजट घाटे में ला दिया है. आईपीएल में रन रेट के ऊपर-नीचे होने से जिंदगी हलाकान नहीं होती, घर के बजट का रन रेट गिरने से होती है. अपन के बजट का विकेट तो महीने के पहले ओवर में ही गिर जा रहा है. न पॉवर बचा है न प्ले. दो महीने तक टीवी का रिमोट जिस तरह का ‘स्ट्राइक रेट’ दिखाता था, अब वह थम गया है. उसकी जगह डॉलर के रेट ने ले ली है. सिक्स के काउंटर पर इन्क्रिजिंग नंबर देखने की लत लग गई थी, अब पेट्रोल डिस्पेंसर के घटते काउंटर ने टेंशन बढ़ा दी है. एक बात बताओ दादू मुद्दों के ये ‘बक’ कभी तो कहीं तो ‘स्टॉप’ करते होंगे?”
“ये नया निज़ाम है सांतिभिया, वज़ीर-ए-तालीम से लेकर वज़ीर-ए-आज़म तक, स्टॉप करने तो दूर बक अब किसी की टेबुल के आस पास फटकने भी नहीं पाते. झेड-प्लस सिक्युरिटी लगी होती है कि परिंदा भी पर नहीं मार पाता, जवाबदेही किस चिड़िया का नाम है? वैसे निज़ाम के कंसिडरेशन में है कि आईपीएल के टाईम स्लॉट में क्या नया लाए जाए कि जेन-जी जंतर मंतर पहुँचने की बनिस्बत स्टेडियम की दीर्घाओं में नज़र आए. वो चियर-लीडर्स के ठुमकों में गिरते सेंसेक्स को भूल जाए. अवाम को जीवन की आपाधापी से निजात दिलापाना शायद उसके वश में नहीं रहा तो क्यों न उसे रील के समंदर में स्कूबा डाइविंग का मज़ा लेने के लिए छोड़ दिया जाए. कोशिश में है निज़ाम कि साल में दो-चार आईपीएल आयोजित करवाए. जब तक स्क्रीन पर गेंद घूमती रहेगी, तब तक आप जैसे सिरफिरों का भेजा घूमेगा नहीं. वरना ये पेपर लीक, बेरोजगारी, महंगाई, स्कैम के बाउंसर आप को ज्यादा दिन सकारात्मक रहने नहीं देगे. जस्ट चिल माई डियर सांति, उबलने की जिम्मेदारी चाय पर छोड़ दीजिए. कड़क मीठी का कट एन्जॉय कीजिए और निकलिए.”
उस रोज़ ठिए पर बहस लम्बी नहीं चली.
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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – सीट नं. 71, वह भी आरएएसी, न बाबा न!।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०४ – व्यंग्य – सीट नं. 71, वह भी आरएएसी, न बाबा न! ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
गाड़ी छूटने में अभी पंद्रह मिनट बाकी थे और मैं प्लेटफार्म पर ऐसे टहल रहा था जैसे बकरे को ईद से पहले आखिरी बार टहलाया जाता है। जेब से टिकट निकालकर मैंने तीसरी बार देखा। नंबर वही, बोगी वही, और वह कुख्यात कोना भी वही था जहाँ पहुँचकर आदमी को अपने पूर्वजों के कर्मों पर शक होने लगता है। रेल विभाग ने शायद ब्रह्मांड के सारे बचे-खुचे पापों की ईएमआई वसूलने के लिए उस जगह सीट नं. 71 साइड लोअर का आविष्कार किया होगा।
मैं जब वहाँ पहुँचा तो लगा किसी ने इंसानों के लिए नहीं, कबाड़ की बोरियों के लिए सीट बनाई है। आधी जगह पर एक राजस्थानी भाई साहब पहले से पालथी मारे जमे थे। मूँछें ऐसी कड़क जैसे दो नेवले आपस में कुश्ती लड़ने की पोजीशन में हों। मुझे देखते ही कबीलाई अंदाज़ में बोले, “आओ सा, बैठ जाओ। यहाँ आदमी नहीं बैठता, आदमी की केवल उम्मीद बैठती है।” मैं अभी इस भारी-भरकम फिलॉसफी पर विचार ही कर रहा था कि एक तमिल युवक भी वहाँ आ टपका। उसने पहले सीट देखी, फिर हमें देखा, फिर सीधे ऊपर वाले को देखा और रोनी सूरत बनाकर बोला, “अय्यो, हम किधर बैठेगा।”
तभी पीछे का जादुई दरवाजा खुला।
एक झोंका आया।
फिर दूसरा आया।
फिर तीसरा आया।
तीनों झोंकों ने मिलकर मेरे जीवन की सारी पुरानी यादों का दूरदर्शन पर लाइव री-टेलीकास्ट शुरू कर दिया। मुझे पहली कक्षा की वो मारकुटानी मास्टरनी याद आ गई। गाँव का वो कीचड़ भरा पोखरा याद आ गया। बचपन में नाली में खोया हुआ लट्टू याद आ गया। इतनी तीव्र और भयानक अनुभूति तो ऋषियों को घोर तपस्या में भी न हुई होगी। राजस्थानी भाई ने तुरंत जेब से रूमाल निकाला, उसे डिटॉल की तरह नाक पर बाँधा और बोले, “म्हारे यहाँ ऊँट के तबेले में भी इतनी आत्मीयता और खुशबू नहीं मिलती सा!” तमिल युवक तड़पकर बोला, “हमारे गाँव में मछली बाजार है भाई, पर वहाँ भी हवा अपनी मर्यादा में रहती है।”
गाड़ी चली और हमारी रही-सही इज्जत का कचरा होना भी शुरू हुआ। पहला यात्री आया, उसने हमारी बदहाल हालत को देखा, एक कुटिल मुस्कान दी और आगे बढ़ गया। दूसरा आया, उसने हमें देखकर ऐसे सिर हिलाया जैसे किसी भयानक एक्सीडेंट स्पॉट का मुआयना कर रहा हो। तीसरा आया, उसने जेब से फॉग का डब्बा निकाला, फिर हमारी शक्लें देखकर न जाने क्या सोचा और चुपचाप जेब में रख लिया। शायद उसे लगा कि टीवी के विज्ञापन तो सब फेकमफाक होते हैं, यहाँ तो साक्षात यमराज की हवा चल रही है।
कुछ ही देर में हमारी वह सीट सार्वजनिक चौपाल और लावारिस बस स्टैंड में बदल गई। कोई हमारे कंधे पर कोहनी रखकर खड़ा था, कोई अपना भारी-भरकम पेट हमारे सिर पर टिकाकर रील सरका रहा था। कोई हमारे घुटनों को रेल मंत्रालय की लावारिस संपत्ति समझकर उन पर पैर रखकर सुस्ता रहा था।
तभी एक बच्चा अपनी मम्मी से बोला, “मम्मी, ये तीनों अंकल सो क्यों नहीं रहे?”
मम्मी ने बड़े गंभीर लहजे में कहा, “बेटा, ये लोग सो नहीं रहे, ये जीवन का कड़वा अनुभव ले रहे हैं।”
मैंने जिंदगी में पहली बार महसूस किया कि साला दुख भी कभी-कभी टूरिस्ट स्पॉट बन जाता है, जहाँ लोग आते हैं, आपको तड़पता देखते हैं और अपनी किस्मत को दुआ देकर चले जाते हैं।
रात जैसे-जैसे गहरी हुई, हमारा वो कोना किसी इंटरनेशनल बॉर्डर की चौकी बन गया। जो भी उधर टॉयलेट की तरफ जाता, चेहरे पर वीर रस के भाव लेकर जाता। और जो उधर से लौटता, वो किसी हारी हुई जंग को जीतकर लौटे विजयी सेनापति की मुद्रा में मुस्कुराता। हर बार दरवाजा खुलता और हवा का एक नया बदबूदार अध्याय शुरू हो जाता। हमारी आँखें जल रही थीं, घुटने कराह रहे थे और कमर तो बाकायदा पंचायत बुलाने की जिद पर अड़ी थी।
रात के दस बजते-बजते हमारी सीट रेलवे की बोगी कम और देश का जीवंत लोकतंत्र ज़्यादा लगने लगी। जिस ऐरे-गैरे का मन होता, वह हमारे पास आता, अपना हक जताता और चला जाता। एक अजनबी चाचा जी आए और बिना किसी हाय-हेलो के हमारी सीट पर अपना बदबूदार गमछा फैला गए। पाँच मिनट बाद लौटे और रौब से बोले, “जरा ध्यान रखना भाई साहब, यह मेरा तकिया है।” मैं उन्हें फटी आँखों से देखता रह गया। आदमी पहली बार मिला था और जाते-जाते मुझे अपनी चल-संपत्ति का परमानेंट चौकीदार नियुक्त कर गया था।
उधर एक और नमूना युवक आया। उसने अपना मोबाइल चार्जिंग पर लगाया। प्लग बहुत दूर था, मोबाइल हमारे पास था। नतीजा यह हुआ कि चार्जर की वो पतली तार हम तीनों की गर्दनों के ठीक ऊपर से कपड़े सुखाने वाली रस्सी की तरह गुजर रही थी। हम तीनों गर्दन झुकाए ऐसे बैठे थे जैसे किसी मकड़ी ने ताज़ा-ताज़ा जाला बुना हो और हम उसमें फँसी हुई लाचार मक्खियाँ हों, जो हिलेंगी तो सीधे हलाल हो जाएँगी।
राजस्थानी भाई खिसियाकर बोले, “म्हारे खेत में जो बिजूका खड़ा रहता है, वो भी इससे ज्यादा सम्मान पाता है सा।”
तमिल युवक बिलबिलाकर बोला, “यह सीट नहीं है, यह हमारे पिछले सात जन्मों के पापों का कलेक्टिव रिजल्ट है।”
तभी एक और बुजुर्ग अवतार लिए। उन्होंने हमारे पैरों के ठीक बीच में पुराना अखबार बिछाया और सुल्तान की तरह उस पर बैठ गए। फिर जेब से मुरमुरे का लिफाफा निकाला और निशाना साधकर खाने लगे। हर तीसरा मुरमुरा मेरी शर्ट की जेब में गिर रहा था, हर चौथा तमिल भाई की गोदी में और पाँचवाँ बमुश्किल उनके खुद के मुँह में जा रहा था। पूरा डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम बिगड़ा हुआ था।
आधी रात तक हमारी दशा ऐसी हो गई कि शरीर का कोई भी अंग अपने मूल मालिक के कंट्रोल में नहीं था। मेरा बायाँ घुटना राजस्थानी भाई के क्षेत्राधिकार में चला गया था। उनकी कोहनी तमिल युवक की सीमाओं में घुसपैठ कर चुकी थी। तमिल युवक का भारी बैग मेरे पेट पर वीटो पावर लगाकर बैठ गया था। हम तीनों मिलकर एक मजबूर संयुक्त परिवार बन चुके थे।
इसी बीच फिर वही खूनी दरवाजा खुला और बदबू की एक नई सुनामी लहर आई।
राजस्थानी भाई ने तुरंत रूमाल को और कस लिया।
तमिल युवक ने तंग आकर अपनी आँखें ही बंद कर लीं।
और मैंने हाथ-पैर ढीले छोड़कर जीवन के असली अर्थ पर गहराई से विचार करना शुरू कर दिया।
तभी एक सज्जन एक्सप्रेस की रफ्तार से तेज कदमों से आए, ट्रेन का थोड़ा सा संतुलन बिगड़ा और वो महाशय सीधे मेरी गोद में आ गिरे। उठकर कपड़े झाड़ते हुए बोले, “माफ करना भाई, अचानक ब्रेक लग गया।”
मैंने चिढ़कर कहा, “भाई साहब, गाड़ी तो साठ की स्पीड पर सीधी चल रही है!”
वह बड़े ढीठ अंदाज़ में बोले, “अच्छा? तो फिर शायद मेरी किस्मत फिसल गई होगी।”
उस रात हमारी किस्मत इतनी बार फिसली कि गिनती भूल गई। किसी की कटी हुई चप्पल हमारे नीचे फँसी, किसी की पानी की आधी खुली बोतल हमारे पैरों में लुढ़ककर पानी-पानी कर गई। किसी का लावारिस टूथब्रश न जाने कैसे तमिल युवक के खुले बैग में सीधे लैंड कर गया।
हमारे ठीक सामने वाली बर्थों पर दो बंदे हमें बार-बार घूर रहे थे। फिर चादर ताने खर्राटे लेने लगे। उसकी नींद जितनी गहरी और कुंभकरणी थी, हमारी जिज्ञासा उतनी ही सातवें आसमान पर पहुँच रही थी। वे सोने के दौरान भी बार-बार मुस्कुरा क्यों रहे थे? उनके चेहरे पर ऐसा अजीब आत्मविश्वास क्यों था जैसे किसी डाकू ने पूरी बैंक की तिजोरी अकेले लूट ली हो और पुलिस उसका कुछ न बिगाड़ पाई हो?
सुबह हुई। जब टीटीई आया और उसने हमारी टिकटें चेक करके जो असली सच्चाई बताई, कसम से हमारी हालत उस गरीब किसान जैसी हो गई जिसे अचानक पता चले कि जिस ज़मीन को वो बंजर और बकवास समझकर रात भर रो रहा था, उसके नीचे तो सोने की पूरी खदान दबी पड़ी थी!
वो सामने वाले चालाक युवक रात भर जिस पूरी की पूरी कंफर्टेबल बर्थ पर राजा और शहंशाह बनकर सोए थे, वो वास्तव में हमारी थी।
जी हाँ, हम तीनों सीट कंफर्म हो चुकी थी!
यह सुनते ही पूरी बोगी में पहले दो सेकंड का सन्नाटा छाया, और फिर ऐसा भयानक ठहाका गूँजा कि ऊपर वाली बर्थ पर सो रहा पैसेंजर भी भूकंप के डर से हड़बड़ाकर उठ बैठा।
राजस्थानी भाई ने तुरंत उन युवकों के सामने हाथ जोड़ लिए और बोले, “महाराज, आप लोगों की यह गहरी नींद अमर रहे।”
तमिल भाई तालियाँ बजाते हुए बोले, “भाई, तुम लोगों ने जो सुख भोगा है, उस पर तो इतिहास में अलग से चैप्टर लिखा जाएगा।”
वे युवक पहले तो शर्म से लाल-पीले हुए, फिर खुद ही बेशर्मों की तरह हँसने लगे। फिर उसे देखकर पूरी बोगी पागलों की तरह हँसने लगी। मैं शर्ट पर पड़े मुरमुरे झाड़ते हुए खिड़की के बाहर देख रहा था और सोच रहा था कि इस देश की रेल यात्रा में सबसे महँगी चीज़ टिकट का किराया नहीं होती बॉस, सबसे महँगी चीज़ होती है सही ‘जानकारी’। जिस रात वो जानकारी हमारे पास नहीं थी, उसी एक रात में हमने बिना एक भी रुपया फीस दिए भारतीय रेल से ‘पीएचडी’ का पूरा कोर्स टॉप रैंक के साथ पूरा कर लिया था।
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)