( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक समसामयिक विषय पर आधारित रचना “हमारा मध्यप्रदेश…“.)
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख स्वास्थ्य, पैसा व संबंध। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # २९८ ☆
☆ स्वास्थ्य, पैसा व संबंध… ☆
आप जिस वस्तु पर आप ध्यान देना छोड़ देते हैं, नष्ट हो जाती है–चाहे वह स्वास्थ्य हो, पैसा हो या संबंध; यह तीनों आपकी तवज्जो चाहते हैं। जब तक आप उन्हें अहमियत देते हैं, आपका साथ देते हैं और जब आप उनकी ओर ध्यान देना बंद कर देते हैं, वे मुख मोड़ लेते हैं तथा अपना आशियाँ बदल लेते हैं। वे स्वार्थी हैं तथा तब तक आप के अंग-संग रहते हैं, जब तक आप उन्हें पोषित करते हैं अर्थात् उनके साथ अमूल्य समय व्यतीत करते हैं।
स्वस्थ बने रहने के लिए व्यायाम की आवश्यकता होती है और यह दो प्रकार का होता है। व्यायाम से आप शारीरिक रूप से स्वस्थ रहेंगे और सकारात्मक सोच व चिंतन-मनन से मानसिक रूप से दुरुस्त रहेंगे, जो जीवन का आधार है। वास्तव में शरीर तभी स्वस्थ रह सकता है– यदि मन स्वस्थ व जीवंत हो और उसका चिंतन सार्थक हो। दुर्बल मन असंख्य रोगों का आग़ार है। भय, चिंता आदि मानव को तनाव की स्थिति में ले जाते हैं, जो भविष्य में अवसाद की स्थिति ग्रहण कर लेते हैं। यह एक ऐसा भंवर है, जिससे बाहर आना नामुमक़िन होता है। यह एक ऐसा चक्रव्यूह है, जिसमें मानव प्रवेश तो कर सकता है, परंतु बाहर निकलना उसके वश में नहीं होता। वह आजीवन उस भूल-भुलैया में भटकता रहता है और अंत में दुनिया से अपने सपनों के महल के साथ रुख़्सत हो जाता है। इसलिए इसे मानसिक स्वास्थ्य से अधिक अहमियत प्रदान की गई है।
मन बहुत चंचल है और पलभर में तीन लोगों की यात्रा कर लौट आता है। उसे वश में रखना बहुत कठिन होता है। मन भी लक्ष्मी की भांति चंचल है, एक स्थान पर नहीं टिकता। परंतु बावरा मन अधिकाधिक धन कमाने में अपना पूरा जीवन नष्ट कर देता है और भूल जाता है कि यह ‘दुनिया है दो दिन का मेला/ हर शख़्स यहाँ है अकेला/ तन्हाई संग जीना सीख ले/ तू दिव्य खुशी पा जाएगा।’ इतना ही नहीं, वह इस तथ्य से भी अवगत होता है कि ‘खाली हाथ तू आया है बंदे/ खाली हाथ तू जाएगा।’ और यह भी शाश्वत् सत्य है कि तूने जो कमाया है/ दूसरा ही खायेगा।’ परंतु बावरा मन स्वयं को इस मायाजाल से मुक्त नहीं कर पाता। जब तक साँसें हैं, तब तक रिश्ता है और साँसों की लड़ी जिस समय टूट जाती है; रिश्ता भी टूट जाता है। ‘जीते जी तू माया में राम नाम को भूला/ मौत का समय आया, तो राम याद आएगा ‘–इन पंक्तियों में छिपा है जीवन का सार। जब तुम पैदा भी नहीं हुए थे, यह किसी दूसरे की संपत्ति थी और जब तुम मर जाओगे, तो भी यह किसी दूसरे की होगी। एक अंतराल के लिए यह तुम्हें प्रयोग करने के लिए मिली है। यह प्रभु की संपदा है; किसी की धरोहर नहीं। आज सुबह यह संदेश व्हाट्सएप पर सुना तो हृदय सोचने को विवश हो गया कि इंसान क्यों स्वयं को इस मायाजाल के विवर्त से मुक्त नहीं कर पाता, जबकि वह जानता है कि ‘कलयुग केवल नाम अधारा।’ पैसा तो हाथ की मैल है और वक्त में सामर्थ्य है कि वह मानव को किसी भी पल अर्श से फ़र्श पर ला सकता है। इसलिए हमें पैसे की नहीं, वक्त की अहमियत को स्वीकारना चाहिए। पैसा इंसान को अहंवादी बनाता है, संबंधों में दूरियाँ लाता है और दूसरों की अहमियत को नकारना उसकी दिनचर्या में शामिल हो जाता है। पैसा ‘हॉउ से हू’ तक लाने का कार्य करता है। जब तक इंसान के पास धन-संपदा होती है, सब उसे अहमियत देते हैं। उसके न रहने पर वह ‘हू आर यू ‘ तक पहुँच जाता है। सो! आप अनुमान लगा सकते हैं कि पैसा कितना बलवान, शक्तिशाली व प्रभावशाली है। यह पलभर में संबंधों को लील जाता है। इसके ना रहने पर सब अपने पराए हो जाते हैं तथा मुख मोड़ लेते हैं, क्योंकि पैसा सबको एक लाठी से हाँकता है। जब तक मानव के पास धन रहता है, उसके कदम धरा पर नहीं पड़ते। वह आकाश की बुलंदियों को छू लेना चाहता है तथा अपने सुख-ऐश्वर्य व खुशियाँ दूसरों से साँझा नहीं करना चाहता।
परंतु सब संबंध स्वार्थ के होते हैं, जो धनाश्रित होते हैं, परंतु आजकल तो यह अन्योन्याश्रित हैं। इंसान भूल जाता है कि यह संसार मिथ्या है; नश्वर है और पानी के बुलबुले के समान क्षणभंगुर है। इसलिए उसे माया में उलझे नहीं रहना चाहिए, बल्कि प्रभु के साथ शाश्वत् संबंध बनाए रखना ही कारग़र उपाय है। ‘सुमिरन कर ले बंदे/ यह तेरे साथ जाएगा।’ प्रभु नाम ही सत्य है और अंतकाल वही मानव के साथ जाता है।
संबंध ऐसे बनाओ कि आपके चले जाने के पश्चात् भी लोग आपका अभाव अनुभव करें और परदा गिरने के पश्चात् भी तालियाँ निरंतर बजती रहें। परंतु आजकल संबंध रिवाल्विंग चेयर की भांति होते हैं। नज़रें घुमाते ही वे सदैव के लिए ओझल हो जाते हैं, क्योंकि अक्सर लोग स्वार्थ साधने हेतू संबंध स्थापित करते हैं। मानव को ऐसे लोगों से दूर रहने की सलाह दी जाती है, क्योंकि वे अपने बनकर अपनों पर घात लगाते व निशाना साधते हैं।
दूसरी ओर यदि आप पौधारोपण करने के पश्चात् उसे खाद व पानी नहीं देते, तो वह मुरझा जाता है; पल्लवित-पोषित नहीं हो पाता। उसके आसपास कुकुरमुत्ते उग आते हैं, जिन्हें उखाड़ना अनिवार्य होता है, अन्यथा वे ख़रपतवार की भांति बढ़ते चले जाते हैं। एक अंतराल के पश्चात् बाड़ ही खेत को खाने लगती है। इसी प्रकार संबंधों को पोषित करने के लिए समय, देखभाल और संबंध बनाए रखने के लिए स्नेह, त्याग, समर्पण व पारस्परिक सौहार्द की दरक़ार होती है। यदि हमारे अंतर्मन में ‘मैं अर्थात् अहं’ का अभाव होता है, तो वे संबंध पनप सकते हैं, अन्यथा मुरझा जाते हैं। ‘मैं और सिर्फ़ मैं’ का भाव तिरोहित होने पर ही हम शाश्वत् संबंधों को संजोए रख सकते हैं। वहाँ अपेक्षा व उपेक्षा का भाव समाप्त हो जाता है। आत्मविश्वास व परिश्रम सफलता प्राप्ति का सोपान है। सो! स्वास्थ्य, पैसा व संबंध तीनों की एक की दरक़ार है। यदि हम समय की ओर ध्यान देते हैं, तो यह संबंध स्वतंत्र रूप से पनपते है, अन्यथा दरक़िनार कर लेते हैं। आइए! मर्यादा में रहकर सीमाओं का अतिक्रमण ना करें और उन्हें खुली हवा में स्वतंत्र रूप से पल्लवित होने दें।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। आज से प्रत्येक शुक्रवार हम आपके लिए श्री संजय भारद्वाज जी द्वारा उनकी चुनिंदा पुस्तकों पर समीक्षा प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)
संजय दृष्टि – समीक्षा का शुक्रवार # 26
विदेश में हिंदी पत्रकारिता – डॉ. जवाहर कर्नावट समीक्षक – श्री संजय भारद्वाज
पुस्तक- विदेश में हिंदी पत्रकारिता
लेखक- डॉ. जवाहर कर्नावट
प्रकाशक- राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत
मूल्य- रुपए 400/-
विदेशों में हिंदी पत्रकारिता का इनसाइक्लोपीडिया☆ श्री संजय भारद्वाज
*
खींचो न कमानों को न तलवार निकालो,
जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो।
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पत्रकारिता हर अंधेरे के विरुद्ध अग्निशलाका है। अकबर इलाहाबादी का उपर्युक्त शेर, पत्रकारिता के असीम सामर्थ्य को परिभाषित करता है। जनता का अघोषित प्रतिनिधि होता है पत्रकार और जनता की आवाज़ बनती है पत्रकारिता।
पत्रकारिता, पंक्ति में सबसे पीछे खड़े व्यक्ति के प्रश्न भी उठाती है। अतः पत्रकारिता की भाषा बहुत महत्वपूर्ण है। जनता की भाषा में, जनता के प्रश्नों को स्वर देना पत्रकारिता को आम आदमी से जोड़ता है। ऐसे में अपने देश से दूर परदेसियों के बीच अपनी भाषा में, अपने प्रश्नों की बात करना अतुलनीय है। ऐसी ही अतुलनीय पत्रकारिता के इतिहास का अधिकृत दस्तावेज़ है डॉ. जवाहर कर्नावट की पुस्तक ‘विदेश में हिंदी पत्रकारिता।’ प्रस्तुत पुस्तक में तथ्यों के साथ विवरण एवं इतिहास का उल्लेख भी किया गया है।
डॉ. जवाहर कर्नावट
पुस्तक में 27 देशों की हिंदी पत्रकारिता का सिंहावलोकन है। लेखक ने इन देशों को चार वर्गों में विभाजित किया है। गिरमिटिया देश अर्थात मॉरीशस, दक्षिण अफ्रीका, फीजी, सूरीनाम, गयाना, त्रिनिडाड, टुबैगो इसमें सम्मिलित हैं। उत्तरी अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के वर्ग में अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड हैं। यूरोप के देशों में ब्रिटेन, नीदरलैंड, जर्मनी, नॉर्वे, हंगरी, बुल्गारिया, रूस का समावेश है। एशिया महाद्वीप में जापान, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, कतर, चीन, तिब्बत, सिंगापुर, म्यांमार, श्रीलंका, थाईलैंड, नेपाल सम्मिलित हैं।
एग्रीमेंट द्वारा मॉरीशस, फीजी और अन्य देशों में ले जाए गए भारतीय श्रमिकों ने न केवल अपनी धरती से निर्वासन झेला अपितु अन्याय, शोषण और अपमान का सामना भी किया। सारी विसंगतियों के बीच भी अपनी भाषा, संस्कृति और धर्म को बचाए रखने के लिए एक होकर अनवरत संघर्ष किया। इसकी बानगी मॉरीशस में हिंदी पत्रकारिता का आरंभ करने वाले मणिलाल डॉक्टर के ‘हिंदुस्तानी’ पत्र के घोषवाक्य के रूप में मिलती है। यह वाक्य था- ‘व्यक्ति की स्वतंत्रता, मनुष्य की समानता, जातियों का भाईचारा।’
यहीं से प्रकाशित ‘आर्यवीर’ अपने उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहता है कि उद्देश्य भी वही होना चाहिए जिसमें स्वजाति, देश और धर्म की रक्षा हो। हस्तलिखित ‘दुर्गा’ के उद्देश्यों की सूची में एक उद्देश्य है- ‘हिंदी कैसी जानदार और शानदार भाषा है, अँग्रेजी-फ्रेंच पर लट्टू रहने वालों को दिखाना।’
23 फरवरी 2003 को सूरीनाम से प्रकाशित ‘शब्द शक्ति’ के पहले अंक में अपने संपादकीय में श्री हरदेव सहतू ने पत्रिका के उद्देश्यों की चर्चा की है। उनमें से कुछ पर दृष्टि डालिए- 1) अपने आजा- आजी के श्रमदान के सम्मान में भाषा का प्रचार। )2 भारतीय संस्कृति के द्वारा अपने धर्म-संस्कृति के प्रचार के लिए हिंदी भाषा का प्रचार। 3) हिंदी भाषा को जानकर हम अपने धर्म, पूजन, मंदिरों और संस्कारों की गहराई जान सकें। 4) हम सब आपस में एक हो सकें। एक दूसरे की खुशी में सुखी होने की भाषा सीख लें।
अंतिम उद्देश्य भाषा के रूप में हिंदी की व्यापकता को पराकाष्ठा तक ले जाता है।
संस्कृति के साथ धर्म की बात इसलिए भी महत्वपूर्ण लगती है क्योंकि अन्यान्य देशों में मिशनरियाँ प्रवासी मजदूरों में अपने धर्म का प्रचार करने में जुटी थीं। पुस्तक में उल्लेख है कि सूरीनाम में मिशनरियाँ ‘क्रूस की रोशनी’ नामक धर्म प्रचारक पत्रिका हिंदी में निकालने लगी थीं। ऐसे में प्रवासियों द्वारा आरंभ किए गए पत्र-पत्रिकाओं में भी अपने धर्म को अधिक स्थान दिया जाने लगा।
संस्कृति और सभ्यता के साथ भाषा के अंतर्सम्बंध को गयाना से प्रकाशित ‘ज्ञानदा’ के संपादक योगराज शर्मा ने मात्र एक वाक्य में परिभाषित कर दिया। ‘हमारा लक्ष्य’ के अंतर्गत पत्रिका कहती है, “मातृभाषा सभ्यता का मोक्ष बिंदु है।”
पंडित परसराम महाराज ने 1997 में ऑस्ट्रेलिया में ‘हिंदी समाचार पत्रिका’ की स्थापना की। इसके 16 वर्ष पूर्ण होने पर अप्रैल 2013 के अंक के संपादकीय में पंडित जी की यह एक पंक्ति पाठकों के मन में गहरे पैठती है। वे लिखते हैं, “हिंदी भाषा व भारतीय संस्कृति, एक भारतीय की वेशभूषा है।”
विशेष बात रही कि विदेशों में बसे भारतीयों ने हिंदी पत्रकारिता के माध्यम से अपने देश, अपनी जड़ों, जन्मभूमि, भाषा, धर्म, संस्कृति की बात तो की पर अपनी कर्मभूमि के विरुद्ध कभी कोई सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक गतिविधि नहीं चलाई। इसका उल्लेख पुस्तक में अपने अभिमत में विजयदत्त श्रीधर जी ने किया भी है। इसी संदर्भ में ‘नीदरलैंड में हिंदी पत्रकारिता’ के अध्याय में सूरीनाम के प्रथम हिंदी साहित्यकार और दो दशक नीदरलैंड में बिताने वाले मुंशी रहमान खान के इस दोहे का पुस्तक में उल्लेख है-
रहियो तुम जिस देश में पलियों नृप की नीति,
चलियो अपने धर्म पर सबसे करियो प्रीति।
अपने परिश्रम और निष्ठा से भारतवंशियों ने प्रवासी देश में अपना स्थान कैसे बनाया, इस संबंध में दक्षिण अफ्रीका के ‘इंडियन ओपिनियन’ के हिंदी संस्करण में 5 अगस्त 1905 को नटाल के प्रोटेक्टर पोलिंग होटन की एक अंग्रेजी रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी। इसमें गिरमिटियों की प्रशंसा करते हुए कहा गया है, ‘हिंदिओं की ज़रूरत विशेष है। बिना हिंदी, देश आबाद न हो सके।’ यह वाक्य भारतीयों की कर्मनिष्ठा और उनके परिश्रम पर बहुत कुछ कह देता है।
भारतीयों के मातृभूमि-प्रेम पर दक्षिण अफ्रीका में हिंदी पत्रकारिता के शलाकापुरुष भवानीदयाल संन्यासी का ‘हिंदी’ के 26 मई 1922 के संपादकीय में लिखा यह ब्रह्मवाक्य देखिए-‘जिस तरह एक अंग्रेज को अपनी मदरलैंड और एक जर्मन को अपना फादरलैंड प्यारा है, हम दावे के साथ कहते हैं कि एक हिंदुस्तानी को अपना वतन उससे कम प्यारा नहीं।’
काठमांडू से प्रकाशित ‘हिम किरण’ साप्ताहिक का राष्ट्र को सर्वोच्च स्थान देने वाला यह सूत्र देखिए- “हे ईश्वर! नेताओं और लोगों की चेतना में यह भर दे कि राष्ट्र किसी व्यक्ति से बड़ा होता है।”
सच्ची पत्रकारिता के प्रारब्ध में अखंड संघर्ष लिखा होता है। पत्र-पत्रिकाएँ जन्मती हैं, मरती हैं। कुछ अल्पायु होती हैं, कुछ दीर्घायु। अल्पायु पत्र-पत्रिकाएँ समाप्त होकर सृजनात्मकता और संघर्ष की उसी मिट्टी में समाहित हो जाती हैं। तथापि यही छोटे-छोटे प्रयास भविष्य की पत्रकारिता के लिए उर्वरक भी बनते हैं। फीजी के ‘वृद्धि’ का अंतिम अंक 1929 में प्रकाशित हुआ था। इसके बंद होने पर एक पाठक के लिखे पत्र का एक अंश देखिए- “वृद्धि की इस अचानक मृत्यु से कौन ऐसा हिंदी प्रेमी भारतीय न होगा, जिसके हृदय पर वज्राघात ना हुआ हो। जो-जो हिंदी की सेवाएँ ‘वृद्धि’ द्वारा आज तक हुई हैं, वह किसी भारतीय पत्र प्रेमी से छिपी नहीं हैं। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि ‘वृद्धि’ पुन: जन्म ले। हम अब आगे प्रवासी भारतवासियों की सहायता करने पर तत्पर रहे।”
जब देश में ही हिंदी पत्र-पत्रिकाओं के सामने पाठकों का संकट हो, आर्थिक स्थिति डाँवाडोल हो, ऐसे में विदेश में हिंदी के माध्यम से पत्रकारिता का विचार, किसी आशंका से कम नहीं हो सकता। तथापि पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध संपादकों और पत्रकारों का साहस और समर्पण है कि उन्होंने अपने लाभ-हानि की चिंता ना करते हुए, देश के बाहर भी हिंदी पत्रकारिता के बीज बोए। इस संदर्भ में अबू धाबी से प्रकाशित ‘निकट’ के जनवरी-जून 2013 के अंक में संपादक कृष्ण बिहारी ने लिखा- “मैं ‘निकट’ को सिद्धांतविहीन नहीं बना सकता। वक़्त लगेगा मगर यकीन है कि ‘निकट’ को अपनी ज़मीन मिलेगी। मेरी अपनी मेहनत की कीमत क्या है, यह मैंने कभी सोचा ही नहीं। सोचा होता तो क्या साहित्य से रिश्ता जोड़ता?”
पुस्तक बताती है कि विसंगतियों के बीच भी पत्रकारिता को सदैव क्रियाशील रहना होगा। इस क्रियाशीलता को जापान से प्रकाशित ‘ज्वालामुखी’ के संपादक योशिआकि सुजुकि, जो स्वयं को योगेश्वरनाथ सुजुकि कहलाना पसंद करते हैं, ने अपने संपादकीय में कुछ यूँ व्यक्त किया है-“मैंने इस पत्रिका को सुंदर बनाने के लिए यह नाम नहीं दिया। मैंने ‘ज्वालामुखी’ नाम इसलिए दिया कि सक्रिय ज्वालामुखी की तरह हम भी सदैव क्रियाशील रहें।”
लेखक ने संबंधित देशों में हिंदी पत्रकारिता के जन्म से लेकर वर्तमान काल खण्ड की यात्रा तक क्रमश: वर्णन किया है। किसी पत्र-पत्रिका के आरंभिक संघर्ष से लेकर उसमें छपे पहले विज्ञापन का भी उल्लेख है।
उन दिनों के संघर्ष को याद करते हुए नॉर्वे से प्रकाशित ‘परिचय’ पत्रिका के संपादक सुरेशचंद्र शुक्ल ने इस पुस्तक के लेखक को बताया, “हमारे पास हिंदी का कोई टाइपराइटर नहीं था और न ही ले-आउट के लिए कोई मेज़ थी। आम मेज़ और फर्श पर बैठकर 32 और 40 पृष्ठों की यह पत्रिका हस्तलिखित रूप में तैयार कर ओस्लो नगर के दागब्लादे प्रेस में छपती थी।”
अपनी भाषा में अपनी बात कहने, सुनने, पढ़ने की इच्छा का प्रमाण बना ‘सिंगापुरी अख़बार।’ अंग्रेजों द्वारा इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में भारतीय सैनिकों को नियुक्त किया गया था। इसे दृष्टिगत रखते हुए मई 1941 में ‘सिंगापुर अख़बार’ की शुरुआत हुई। ‘द सिंगापुर फ्री प्रेस एंड मर्केंटाइल एडवरटाइजर्स’ ने 11 सितंबर 1941 को इस समाचार को इस हेडलाइन के साथ प्रकाशित किया- ‘इंडियन सोल्जर्स नाव हैव ओन न्यूज़पेपर।’ आगे चलकर ‘जवान’ अख़बार भी प्रकाशित होना शुरू हुआ। विशेष बात थी कि सेना के तीन अधिकारी ही इसके संपादक एवं उप-संपादक थे।
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में म्यांमार में मंदिरों ने अपने प्रांगण में हिंदी पाठशालाएं आरंभ की। 1960 में वहाँ की सरकार द्वारा शिक्षा का सरकारीकरण करने के बाद हिंदी को कोई स्थान नहीं दिया गया। इस स्थिति में मंदिरों और चौपालों ने फिर से कमर कसी और हिंदी कक्षाएँ पुनः आरंभ हुईं। इन्हीं कक्षाओं ने आगे चलकर म्यांमार में हिंदी पत्रकारिता को जन्म दिया।
न्यूजीलैंड से प्रकाशित हिंदी की प्रथम पत्रिका ‘भारत दर्शन’ विदेश में हिंदी पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। संपादक रोहित कुमार हैप्पी 1996 से इसका दायित्व संभाले हुए हैं। उन दिनों पत्रिका के अंतिम पृष्ठ पर छपने वाला यह अनुरोध देखिए- “कृपया पत्रिका को पढ़ने के बाद फेंके नहीं बल्कि किसी और हिंदी प्रेमी को पढ़ने को दे दें। पत्रिका के प्रचार-प्रसार में आपके योगदान के लिए आभार।”
यूके से प्रकाशित ‘पुरवाई’ प्रवासी लेखन को मंच देने के क्षेत्र में एक जाज्वल्यमान नाम है। 1997 में संपादक श्री पद्मेश गुप्त एवं सहायक संपादक उषा राजे सक्सेना ने इसका आरंभ किया था। वर्तमान में श्री तेजेंद्र शर्मा के संपादन में यह पत्रिका प्रवासी और निवासी भारतीयों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है।
15 अगस्त 2000 को संयुक्त अरब अमीरात से जन्मी ‘अभिव्यक्ति’ ने हिंदी वेबपत्रिका के क्षेत्र में एक नए युग का सूत्रपात किया। संपादिका पूर्णिमा वर्मन ने एक वर्ष बाद कविताओं के लिए ‘अनुभूति’ नाम से अलग पत्रिका आरंभ की। इन पत्रिकाओं पर संपादिका की यह टिप्पणी देखिए, “अभिव्यक्ति और अनुभूति केवल पत्रिकाएँ नहीं हैं। यह पुस्तकालय है जिसमें हमने साहित्यिक रुचि के लोगों की प्रिय रचनाओं और उनके प्रयत्नों को सहेजा है। अनेक रचनाकारों का जन्म यहाँ पर हुआ है और अनेक उदीयमान रचनाकार यहाँ से प्रसिद्धि के पथ पर आगे बढ़े हैं।”
डॉ. कर्नावट ने सोवियत संघ से लेकर नीदरलैंड, चीन, तिब्बत तक की हिंदी पत्र-पत्रिकाओं का सिंहावलोकन किया है। इस संदर्भ में भारत और सोवियत रूस के संबंधों के स्वर्णिम काल में भारतीय बाज़ार में दिखने वाली ‘सोवियत नारी’, ‘सोवियत संघ’, ‘सोवियत भूमि’, ‘लाल स्पूतनिक’ आदि को कौन भूल सकता है? जर्मनी की ‘बसेरा’ हो या हंगरी की ‘दिन’, लेखक ने छोटी-बड़ी हर पत्रिका का यथासंभव उल्लेख किया है और उनके स्रोत की जानकारी भी दी है।
यह पुस्तक केवल मुद्रित नहीं बल्कि दृक-श्राव्य साधनों यथा रेडियो और दूरदर्शन के माध्यम से की गई पत्रकारिता की पड़ताल भी करती है। बीबीसी हिंदी एक समय असंख्य भारतीयों के हृदय की धड़कन था। रेडियो ‘उजाला’ हो ‘ओम वाणी’ या रेडियो ‘डायचे वेले’ या विभिन्न एफ.एम. चैनल, डॉ. कर्नावट ने सबकी समुचित जानकारी देने का प्रयास किया है।
उल्लेखनीय है कि लेखक ने एक परिशिष्ट बनाकर विनम्रतापूर्वक उन महानुभावों और संस्थाओं के नाम का उल्लेख भी किया है जिन्होंने लेखक को विभिन्न देशों की हिंदी पत्र-पत्रिकाएँ उपलब्ध करवाईं।
अपने समय की महत्वपूर्ण कुछ पत्र पत्रिकाओं के मुखपृष्ठों के चित्र भी पुस्तक में समाविष्ट किए गए हैं। पुस्तक का मुखपृष्ठ आकर्षक बना पड़ा है।
डॉ. जवाहर कर्नावट की पुस्तक एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ बनकर उभरती है। इतिहास को परिश्रामपूर्वक तथ्यों सहित सहेजा गया है।
यह पुस्तक विदेशों में हिंदी पत्रकारिता के लिए एक इनसाइक्लोपीडिया का काम करेगी। यह संग्रहणीय पुस्तक, एक तरह का पोर्टेबल संग्रहालय है। इस क्षेत्र में रुचि रखने वाले हर जिज्ञासु को यह पुस्तक पढ़नी चाहिए। शोधार्थियों के लिए यह पुस्तक शोध-सामग्री के रूप में उपयोगी होगी।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – अनुशासन…।
रचना संसार # ७० – गीत – अनुशासन… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – किसान।)
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.“साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है – संतोष के दोहे – छठ का पावन पर्व । आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २८० ☆
☆ संतोष के दोहे – छठ का पावन पर्व… ☆ श्री संतोष नेमा ☆
(छठी के पावन पर्व की आप सभी को बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं बधाई)
(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में अवश्य मिली है किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है एक विचारणीय लघुकथा ‘वाह रे इंसान!‘। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # १५५ ☆
☆ लघुकथा – वाह रे इंसान!☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆
लक्ष्मी जी दीवाली-पूजा के बाद पृथ्वीलोक के लिए निकल पड़ीं। एक झोपड़ी के पास पहुँचीं, चौखट पर रखा नन्हा- सा दीपक अमावस के घोर अंधकार को चुनौती दे रहा था। लक्ष्मी जी अंदर गईं, देखा एक बुजुर्ग स्त्री छोटी बच्ची के गले में हाथ डाले निश्चिंत सो रही थी। वहीं पास में लक्ष्मी जी का चित्र रखा था उस पर दो- चार फूल चढ़े थे और एक दीपक यहाँ भी मद्धिम जल रहा था। प्रसाद के नाम पर थोड़े से खील – बतासे एक कुल्हड़ में रखे हुए थे।
लक्ष्मी जी को ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ कहानी की बूढ़ी स्त्री याद आ गई- ‘जिसने जबरन उसकी झोपड़ी हथियानेवाले जमींदार से चूल्हा बनाने के लिए झोपडी में से एक टोकरी मिट्टी उठाकर देने को कहा था। ‘लक्ष्मी जी ने फिर सोचा – ‘बूढ़ी स्त्री तो अपनी पोती के साथ चैन की नींद सो रही है, अब जमींदार का भी हाल लेती चलूँ। ‘
जमींदार की आलीशान कोठी के सामने दो दरबान खड़े थे। कोठी पर दूधिया प्रकाश की चादर बिछी हुई थी। जगह- जगह झूमर लटक रहे थे। सब तरफ संपन्नता थी,मंदिर में भी खान -पान का वैभव भरपूर था। लक्ष्मी जी ने जमींदार के कक्ष में झांका, तरह- तरह के स्वादिष्ट व्यंजन खाने के बाद भी उसे नींद नहीं आ रही थी। कीमती साड़ी और जेवरों से सजी अपनी पत्नी से वह कह रहा था –“एक बुढ़िया की झोपड़ी लौटाने से दुनिया में मेरे नाम की जय-जयकार हो गई। यही तो चाहिए था मुझे, लेकिन गरीबों पर ऐसे ही दया दिखाकर उनकी जमीन वापस करता रहा तो यह वैभव कहाँ से आएगा। एक बार दिखावा कर दिया,बस बहुत हो गया। “ वह घमंड से हँसता हुआ मंदिर की ओर हाथ जोड़कर बोला– “यह धन–दौलत सब लक्ष्मी जी की ही तो कृपा है। “
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय लघुकथा – आउटडेटेड।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ६९ – लघुकथा – आउटडेटेड ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
कभी-कभी परिवार की गर्माहट एक ठंडी हवा की तरह लगती है, जो आपको घर से बाहर धकेल देती है, ठीक वैसे ही जैसे उस छोटे से शहर के नर्सिंग होम में अभी-अभी पहुंचे बुजुर्ग कृष्णदास के चेहरे पर खिली मुस्कान ने सबको हैरान कर दिया, जहां बाकी वृद्ध उदास कोनों में बैठे अपनी यादों से जूझ रहे थे। वहां एक साथी ने हारकर पूछ ही लिया कि ऐसी जगह पर आकर वह इतने खुश कैसे दिख रहे हैं, मानो कोई त्योहार मनाने आए हों, कृष्णदास की हंसी और फैल गई, जैसे कोई पुराना राज खोल रहे हों। उन्होंने बताया कि वह सरकारी दफ्तर से क्लर्क की नौकरी से सेवानिवृत्त हुए हैं, पत्नी को दुनिया छोड़े चार साल बीत चुके, बेटी अब बड़ी कंपनी में मैनेजर है, उसके पति और बच्चों के साथ उनके बनाए उस आलीशान फ्लैट में रहती है, जहां हर कमरा चमकता है, लेकिन वह खुद तो बस एक साधारण क्लर्क थे, उनकी सादगी उस चमचमाती जिंदगी से मेल नहीं खाती।
बेटी की पार्टियों में वह पुराने कुर्ते में फिट नहीं बैठते, उनके पुराने किस्से नए दोस्तों को बोरिंग लगते, और ऊपर से उनकी आदतें जैसे सुबह की चाय खुद बनाना या शाम को पुरानी किताबें पढ़ना, वह सब बेटी के आधुनिक घर में ‘आउटडेटेड’ लगतीं।
सच तो यह है कि अकेले रहने की सारी काबिलियत उनमें है, अपना खाना बनाना, दवाइयां याद रखना, यहां तक कि छोटी-मोटी मरम्मत भी, लेकिन परिवार ने सोचा कि नर्सिंग होम में वह ‘बेहतर’ रहेंगे, जहां कोई उनकी देखभाल करेगा, व्यंग्य की ठंडक देखिए कि जो घर उन्होंने अपनी हड्डियां गलाकर बनाया, वह अब उनके लिए अनफिट हो गया, जैसे कोई पुराना फर्नीचर जो स्टाइल से बाहर हो गया हो, कृष्णदास हंसते हुए कहते हैं कि यहां कम से कम वह किसी की राह में रोड़ा नहीं बनते, कोई उनका इंतजार नहीं करता, कोई उनकी आदतों पर नाक-भौं सिकोड़ता नहीं, लेकिन जैसे-जैसे बात आगे बढ़ती है, उनकी हंसी में एक हल्की सी कंपकंपी आ जाती है।
वह बताते हैं कि बेटी कभी-कभी फोन करती है, पूछती है ‘पापा ठीक हो न’, लेकिन विजिट करने का वादा हमेशा ‘बिजी शेड्यूल’ में टल जाता है, नाती-नातिन की तस्वीरें व्हाट्सएप पर आती हैं, लेकिन उनके हाथों में वह गर्माहट नहीं, कृष्णदास की आंखें अब चमकने लगती हैं, लेकिन हंसी से नहीं, बल्कि उन अनकहे आंसुओं से जो परिवार की इस ‘देखभाल’ की सच्चाई छिपाते हैं, वह याद करते हैं पत्नी के साथ बिताए वे दिन जब घर में हंसी गूंजती थी, बेटी की शादी का वह पल जब उन्होंने सब कुछ दांव पर लगाया था, लेकिन अब वह घर एक ठंडा महल है जहां उनकी जगह नहीं, सिस्टम की यह क्रूर विडंबना ऐसी है कि बुजुर्गों को ‘आराम’ के नाम पर अलग कर दिया जाता है, जैसे कोई पुरानी किताब को शेल्फ से हटा देना, और जैसे-जैसे शाम ढलती है, कृष्णदास की मुस्कान फीकी पड़ जाती है, वह अकेले में फुसफुसाते हैं ‘मैं योग्य हूं अकेले रहने का, लेकिन क्या परिवार योग्य है मुझे रखने का’, और वह आखिरी हंसी एक करुण सिसकी में बदल जाती है, जब वह पुरानी फोटो देखते हैं जहां बेटी उनकी गोद में खेल रही थी, अब वह गोद सूनी है।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “कैसे और क्यों व्यंग्यकार बने परसाई?” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३८० ☆
व्यंग्य – पहचाना आप ने? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
पहचाना आप ने? अरे कैसी बात करते हैं, आप भी! संकोच में ऐसा कह चुकने के बाद, वे बातों बातों में वह सूत्र ढूंढते हैं कि किसी तरह मिलने वाले का नाम याद आ जाए? दरअसल, नाम आदमी की पहचान है, पर याददाश्त के साथ उसका रिश्ता हमेशा लुका-छुपी का ही रहा है। चेहरा तो लोग पहचान लेते हैं, पर नाम जैसे हमारी स्मृति से सबसे पहले पलायन कर जाता है। किसी को फोन करना हो तो याद ही नहीं आता कि बंदे का नंबर किस नाम से सेव किया था।
एक विवेक ढूंढो तो तीन निकल आते हैं, इसलिए रिफरेंस या शहर का नाम साथ लिखना पड़ता है।
किसी पार्टी या सभा में मिलते समय नाम स्मरण की यह समस्या सबसे अधिक होती है। सामने वाला मुस्कराते हुए “कैसे हैं आप” कहता है और हम भी उतनी ही आत्मीयता से “अरे आप!” कह देते हैं। इस “आप” के पीछे कितनी मजबूरी और कितना अपराध बोध छुपा होता है, यह वही समझ सकता है जिसने मिलने वाले का नाम दिमाग की हार्ड डिस्क से डिलीट कर ‘रीसायकल बिन’ में पहुंचा दिया होता है। और रिसाइकिल बिन क्लीन कर दी होती है। दिमाग को सारे खाए हुए बादाम की कसम देते रहो पर नाम याद ही नहीं आते, तब सभ्यता के नाते दिमाग से काम लेना पड़ता है, और पहचानने की एक्टिंग करनी पड़ती है।
शशि कपूर साहब ने इस विसंगति का हल खोज निकाला था। वे मिलते ही सामने वाले से कहते, “हाय, आई एम शशि कपूर। ” सामने वाला भी शिष्टाचार निभाने के चक्कर में अपना परिचय दे देता। यह फार्मूला कलाकारों और सेलिब्रिटीज के लिए तो ठीक है, पर अगर मोहल्ले का गजोधर प्रसाद या हरिप्रसाद यही तरीका अपनाए तो सामने वाला शक करने लगेगा कि कहीं यह बीमा बेचने वाला एजेंट तो नहीं।
कुछ लोग इस समस्या को छिपाने के लिए ऐसे रचनात्मक वाक्य गढ़ते हैं कि सुनकर हंसी भी आए और दया भी। जैसे कोई कहे “भाई साहब, आप तो बिल्कुल नहीं बदले!” अब सामने वाला सोचता है कि मैं पचास साल से यही हूँ, बदली तो तुम्हारी याददाश्त है। या फिर लोग बचने के लिए रिश्तों का सहारा लेते हैं “भाभी जी”, “भाई साहब”, “चाचा जी”। यही तो भारतीय संस्कृति का अद्भुत चमत्कार है। जब नाम याद न आए तो रिश्ते का लेबल चिपका दो, सामने वाला खुद ही नाम बता देगा।
हमारे एक अंकल ने इस समस्या को सीधे ईमानदारी से हल किया। वे मिलते ही कहते, “बेटा, याददाश्त कमजोर हो चुकी है, बातें करने से पहले नाम और पता बता दीजिए। ” अब उनकी इस सादगी में न दिखावा है, न शिष्टाचार का जाल। सामने वाला झट से नाम बता देता है, जैसे परीक्षा हॉल में अपना एडमिशन कार्ड दिखा रहा हो।
नाम भूलने की समस्या अक्सर हास्यास्पद हालात पैदा कर देती है। शादी ब्याह में रिश्तेदार एक-दूसरे से टकराते हैं, पर नाम भूलने का अपराधबोध दोनों ओर इतना गहरा होता है कि बातचीत का सारांश यही रह जाता है “अरे आप!” और “जी, वही!”
ऑफिस पार्टियों में तो यह विसंगति और भी दिलचस्प हो जाती है। कोई पूरे आत्मविश्वास से पांच मिनट तक बतियाता रहता है और फिर पूछ बैठता है “वैसे आपने मेरा नाम तो नहीं भुलाया?” तब तक नाम सचमुच स्मृति की फाइलों से प्रसंगवश रिकवर हो गया तो हम पूरे आत्मीय भाव से मुस्कराते हुए कहते हैं, अरे फलां जी कैसी बात करते हैं आप भी।
वरना बाद में सिर खुजाते मिलने वाले का नाम स्मृति पटल पर खोजना होता है।
सच यह है कि नाम भूलना कोई व्यक्तिगत कमजोरी नहीं है, यह भीड़ में घुल जाने की कला है। हम रोज़ इतने चेहरों से मिलते हैं कि दिमाग भी कभी-कभी ‘सिस्टम हैंग’ कर देता है। और तब “अरे आप” या “भाई साहब” जैसे संबोधन जीवनरक्षक ऐप साबित होते हैं।
अब समय आ गया है कि सरकार आधार कार्ड में एक नया फीचर जोड़ दे। जैसे ही हम किसी से मिलें, दोनों के मोबाइल पास लाते ही ब्लूटूथ से स्क्रीन पर स्वयं ही नाम चमक उठे। पर तब तक हमें अंकल की ही ईमानदार शैली अपनानी होगी कहना होगा “ओ मिलने वाले, जरा अपना नाम तो बता। ” क्योंकि बिना नाम का संदर्भ समझे बातचीत करना वैसा ही है जैसे अंधेरे में रेडियो सुनना। आवाज तो आती है, मज़ा भी आता है, लेकिन यह समझ ही नहीं पड़ता कि प्रसारण किस स्टेशन से चल रहा है।
मैं एक सज्जन के यहां, रात्रि भोज पर निमंत्रित था, भोजन कर आया। उनकी पत्नी से यह पहली भेंट थी। सभ्यता से भाभी जी की ओर बहुत ध्यान से देखा भी नहीं। अगले दिन जब बाजार में जब एक महिला मेरी ओर देख कर मुस्करा रही थी, तो मुझे समझ ही नहीं आया कि यह क्या और क्यों हो रहा है। मुझे अजनबी सा देखते पा कर देवी जी बोली, अरे खाना खाकर भी आपने पहचाना नही, झेंपने के सिवा क्या कर सकता था मैं। दरअसल महिलाएं हेयर स्टाइल बदल दें, या देसी परिधान की जगह पाश्चात्य ड्रेस पहन लें तो उन्हें पहचानना मेरे लिए वैसे भी कठिन हो जाता है। सच तो यह है कि एक नग अपनी पत्नी के मूड तक को भी अब तक कभी पहचान नहीं पाया।