सुश्री इन्दिरा किसलय
☆ व्यंग्य ☆ काजल चोर (वन लाइनर)… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆
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आँखों से काजल चुराना, मुझे तो ये मुहावरा सही नहीं लगता, और समझ में भी नहीं आता– क्या ये मुमकिन है ? वीणा ने पतिदेव से कहा, तो उनका जवाब था— तुम्हारी शंका निराधार नहीं है।
“आँखें हमारी, काजल हमारा, लगाने वाले हाथ भी हमारे, फिर आँखों को छुए बगैर, काजल कैसे चुरा सकता है कोई?
पर जानती हो – जादू भी कोई चीज है। कोई पहुँचा हुआ जादूगर ही ऐसा कर सकता है। जिसे दूसरे शब्दों में हाथ की सफाई कहते हैं। दुनिया में बहुत कुछ ऐसा होता है, जो हमारी सोच से परे होता है।
जादूगर सरकार का कारनामा देखा है। उन्हें लोग मोटे से लोहे की संदूक में बिठा देते और बाहर से भारी भरकम ताला लगाकर समुद्र में फेंक देते। वे पलक झपकते ही बाहर निकल आते थे।
अब तुम्हारी ही बात ले लो- कितनी सफाई से मेरी जेब से पैसे चुराती हो।
देखिए जी–पति की जेब किसी मंदिर से कम थोड़े ही है। उससे पैसे उड़ाने में कैसा संकोच, कैसा पाप। जब आपने उड़ाते हुये देखा ही नहीं तो इल्जाम कैसा? अब तो न्याय की देवी की आँखों से पट्टी भी हट गई है। वो तो सबूतों के बिना मानेगी नहीं।
और सबूत आपके पास हैं नहीं।
— देखो डार्लिंग, इधर उधर की बातें न करो. जेब में 200 रुपए हों और 100 गायब हो जाएं !सोचनेवाली बात ये है कि घर में तुम और मैं, मैं और तुम, तीसरा कोई नहीं। फिर—-
हँसते हुये वीणा ने कहा- डाॅगी है ना। आपका वफादार।
उसकी वफादारी और कब काम आयेगी।
–अब मुझे डाॅगी की गवाही लेनी होगी।
–देखिए जी, अपनों के पैसे अपने चुरा लें, तो उसे चोरी नहीं कहते। उसे पाप भी नहीं कहते। उसे प्यार कहते हैं।
मैंने तुम्हारा दिल चुराया था कि नहीं? तब तो तुमने चोरी का इल्जाम नहीं लगाया। लोग तो जाने क्या-क्या नहीं चुराते, चैन चुराते हैं। नज़र चुराते हैं। और तो और नींदे भी चुराते हैं। अब तो कविता कहानी चोर भी सीना ताने घूमते नज़र आते हैं।
—सब कुछ शब्दों का ही तो खेल है. इसमें महारत होनी चाहिए।
—इसका मतलब डिग्री, रसूख आवाज़, विरासत, रंगरूप, ओहदे से ज्यादा जरूरी है हाथ की सफाई।
—अब तो समझ में आ ही गया होगा। आँखों से काजल चुराना– मुहावरा यूँ ही नहीं बना।
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© सुश्री इंदिरा किसलय
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




