श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ५५ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ संशय ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

महेंद्र को उम्मीद थी कि, वे एक दिन उसके घर जरूर आयेंगें । वह पलक पावड़े बिछाए उनका बराबर इंतजार करता रहता था । अपने मन में वह तमाम ख्वाहिशों को बुनता और सोचता कि अगर वे उनके घर आये तो वह अपनी टूटी चारपाई पर एक फटा ही सही लेकिन सुन्दर साफ बढ़िया सा चादर बिछायेगा। छोटी सी कटोरी में गइया के थोड़े से दूध में जमी मीठी दही खिलायेगा।

कई बार उसे ऐसा लगता था कि वे आज उसके घर की तरफ आ रहे हैं, बस चंद पलों में आ ही जायेगे, ये सब सोच कर उसका मन बाँसो उछलने लगता था ।

वह स्वयं तो रोज उनके घर जाता, उनको नमस्ते कर हालचाल भी पूछता, उनके हर दुख सुख में अपने सामर्थ्य के हिसाब से खड़ा रहताl

पिछले दिनों जब उनके घर में उनका लड़का करोना से बीमार था, तब उनके अपने लोग दूर से झाँक कर चले गए थे, लेकिन महेन्द्र इन बातों से बेफिक्र न सिर्फ उनके घर गया था, बल्कि उनका हाल चाल पूछते हुए बोला था कि बाबूजी, भईया ठीक हो जायेगे, मैंने भईया के लिए हनुमान जी से मन्नत मांगी है ।

भला हो कोरोना का, शायद वह भी उसके प्रेम और समर्पण को समझ गया था, यही कारण था कि चौदह दिन बीतने के बाद उसका नन्हका भी पहले की तरह स्वस्थ होकर किलकारी भर रहा था।

लेकिन महेन्द्र को एक बात समझ में आ रही थी कि वे उसके घर तो नही आते है लेकिन उनके मन में मेरे बाबू के प्रति ममता और प्यार तो जरूर है।

आखिर वे मेरे घर क्यों नही आते है, इस बात का उसे उत्तर नहीं मिल रहा था ।

एक जब उसने थोड़ा दिमाग लगाया, तो उसे हल्का हल्का समझ में आया कि इसमे तो पद और कद का मामला है, जिसके बढ़ने और घटने का संकट या संशय है । बस..बस.. बस यही बात है कि वह नही आते है ।

चलो उनके इस संशय – संकोच पर भी आंच न आये । वे भले ही न आएं, लेकिन उनकी यशकीर्ति और ऊंचाइया छुए, अंततः वह ऐसा सोच कर खुश हो गया थाl

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

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© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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