श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  सरकारी सांड़ और आवारा सांड

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २७

☆ व्यंग्य ☆ “सरकारी सांड़ और आवारा सांड” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

किसी पुराने समाचार पत्र के टुकड़े में मैंने एक समाचार पढ़ा कि एक जगह – “अच्छी नस्ल तैयार करने के लिए शासन से उपलब्ध सांड़ दुबला हो रहा है जबकि वहां के डॉक्टर के पालतू पशु मोटे हो रहे हैं। मुझे इस समाचार से बिल्कुल आश्चर्य नहीं हुआ। चिकित्सक रूपी सांड़ के सामने आखिर मूक पशु रूपी सांड़ की क्या हैसियत? समाचार में बताया गया कि डॉक्टर सांड़ की खुराक में कटौती कर उसे अपने पालतू पशुओं को खिला रहा था।

सरकार चाहे केंद्र की हो अथवा राज्यों की नेताओं, अधिकारियों, कर्मचारियों रूपी सांड़ों से भरी पड़ी हैं। शायद ही कोई सरकारी विभाग हो जिसमें सांड़ न हों, देखा तो यह गया है कि प्रत्येक विभाग में नीचे से ऊपर तक अलग – अलग शक्लों, कद – काठियों, स्वभावों और खुराकों वाले सांड़ भरे पड़े हैं। क्यों न हों सरकार और उसके विभाग सांड़ों के लिए सर्वश्रेष्ठ चारागाह जो हैं। सांड़ या तो सरकार और उसके अधीन विभिन्न विभागों में होते हैं या फिर आवारा। स्वभाव और प्रकृति में सरकारी सांड़ों और आवारा सांड़ों में कोई खास अंतर नहीं होता, किंतु सरकारी सांड़ों को सरकारी होने का सम्मान और जोर – जबरदस्ती से माल हड़पने के लिए एक निश्चित क्षेत्र का मालिक होने का संतोष, नियमित खुराक मिलते रहने की निश्चिंतता तो रहती ही है। सरकारी सांड़ अपने कार्यालय की कुर्सी पर बैठे – बैठे अथवा मात्र अपने कार्य क्षेत्र में रह कर ही वह सब प्राप्त कर लेते हैं जो वह चाहते हैं। लेकिन आवारा सांड़ों को इसके लिए अपेक्षाकृत अधिक मेहनत करना पड़ती है। इनका कार्य क्षेत्र भी विस्तृत होता है जो सरकारी विभागों से लेकर जनता तक फैला रहता है। देखा गया है कि सशक्त आवारा सांड़ों से सरकारी सांड़ डरते हैं और इसी कारण अधिकांश आवारा सांड़ों को सरकारी सांड़ों का संरक्षण व सहयोग प्राप्त रहता है। बहुत से सरकारी कर्मचारी/अधिकारी रूपी सांड़ लोगों को फंसाकर उनको चरने का कार्य दलाल रूपी आवारा सांड़ों के माध्यम से ही सम्पन्न करते हैं किन्तु इस अघोषित संरक्षण के बाद भी सरकारी और आवारा सांड़ों में अंतर तो है ही। सरकारी सांड़ मिलकर आवारा सांड़ की सारी सांड़गिरी धूल में मिलाकर उसे बैल बनने पर मजबूर कर सकते हैं। यदि सरकारी सांड़ चाहें तो समाज को लूटने खसोटने और आतंक मचा कर परेशान करने वाले आवारा सांड़ों से मुक्ति दिला सकते हैं, किन्तु वे मजबूर हैं ऐसा नहीं चाह सकते। आखिर आवारा सांड़ों के सहयोग से ही तो उनकी अवैध कमाई का धंधा – पानी और सांड़ गिरी चलती है। अतः समाज में सरकारी सांड़ों और आवारा सांड़ों का तालमेल सदा बना रहता है। सुरक्षित रिश्वत पाकर सरकारी सांड़ खुश, कमीशन पाकर आवारा सांड़ खुश।

सामान्यतः नेताओं की तरह अधिकारी, कर्मचारी भी सांड़ों की तरह तंदरुस्त होते हैं। मेरा अर्थ नेताओं को सांड़ कहना नहीं है। नेता सांड़ की सुधरी हुई परिष्कृत रचना है वह सरकारी और आवारा सांड़ों को पालने, उन्हें वश में करने में सक्षम होता है क्यों न हो, वह भी तो इन्हीं से मिले क्लाइंटों को निचोड़ता है। ज्यादातर नेता अपनी मुफ्तखोरी, लूट खसोट, रिश्वत आदि की चाह के कारण सांड़ रूपी सरकारी अधिकारियों – कर्मचारियों और दलाल रूपी आवारा सांड़ों को प्रश्रय देते हैं उनसे दूरी नहीं बनाते। इसीलिए तो सरकार में मलाईदार पदों पर खींचतान बनी रहती है। मैं समझता हूं कि सरकारी और आवारा सांड़ों पर लंबी चर्चा व्यर्थ है क्योंकि आप भी अपने क्षेत्र के ऐसे अनेक सांड़ों से परिचित होंगे।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted