श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ५९ ☆

☆ आत्मकथ्य ☆ ~ श्रेयस कृत काव्य कथा वीथिका की कविताएं : कविता में लघुकथा ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

कोविड अपने चरम पर था, उन दिनों मैं फेसबुक पर लगभग प्रतिदिन एक कविता लिखा करता था। इस पोस्ट का नाम मैंने काव्य कथा वीथिका ही रखा था। धीरे धीरे मेरी ऐसी कई रचनाएं बनकर तैयार हो गयीं। फिर मैंने इन रचनाओं को संकलित कर संकलित कर पुस्तक का स्वरूप दिया। यह पुस्तक काव्य कथा वीथिका थी। इस पुस्तक की कविताएं, सामान्य, सरल एवं आम जन के लिए आसानी से समझ में आने वाली थी। इन कविताओं की विशेषता यह थी कि मेरे जीवन में (पूर्व में और वर्तमान में) जो कुछ भी घटनाएं घटती या जो कुछ भी मैंने अपने आंखों से घटते हुए देखता, उनका आश्रय लेते हुए कुछ काल्पनिक पुट से उसे साहित्यिक ढंग में सजाते हुए कविता के रूप दे देता। इसके अतिरिक्त भी सामाजिक समताओ एवं विषमताओं पर आधारित मनोभावों को कविता का स्वरूप दे देता था। यह सब उपक्रम करते एवं कविता लिखते वक्त मुझे यह पता ही नहीं चला कि कब इन कविताओं में छोटी सी लघुकथाएँ समा गयीं। मैं तो इन्हें बस एक सरल, तुकबंदी वाली, अगेय कविता ही समझ रहा था।

खैर पुस्तक के प्रकाशन की अवधि नजदीक आयी तो मैंने इसकी पांडुलिपि को मॉरीशस में जन्मे, भारतीय मूल के हिंदी गद्य साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी के पास पुस्तक भूमिका लिखने हेतु भेज दी।

अब प्रश्न उठता है कि काव्य की भूमिका एक गद्य लेखक कैसे लिख सकता है। इस विषय में क्या सोच सकता है, तो इस पर मेरा मानना यह है कि एक गद्य लेखक अवश्य ही गद्य लिखता है लेकिन वह एक पाठक भी होता है। उसके भीतर भी हृदय होता है तथा शब्दों के भाव और रस को समझने की क्षमता होती है। कविताएं जो मन को प्रमुदित करती है, उनको सुनने का चाव सबके अंदर होता है. 

जब इस सुप्रसिद्ध कथाकार ने मेरी कविताओं के अंदर एक लघुकथा को समाते हुए देखा तो उन्होंने अपनी भूमिका में निम्न पंक्ति डाल दीं –

काव्य कथा वीथिका – यह आपका निजी शीर्षक था, जिसे आपने धारा प्रवाह बनाकर अब तक अनेक रचनाओं का पाठकों को रसास्वादन करवा दिया है। विशेष कर आपबीती को आप आधार बना कर लिखते हैं जो किसी भी कोण से साहित्य होता है। मैंने शुरू में लिखा था आप अपनी ओर से एक विधा की नींव रख रहे हैं आज भी मैं अपनी इस बात पर कायम हूँ. “

प्रसिद्ध गीतकार स्व.श्री नीरज अवस्थी (लखीमपुर) के देख रेख में प्रकाशित इस पुस्तक की एक रचना आपके समक्ष रखता हूँ, जो कि निम्नवत है

☆ दादी की होली ☆

*

होली का त्योहार आज था, दादी घर पर न थी।

 अम्मा चाचा को दादी की, चिंता आज लगी थी। ।

 बुधिया काकी के घर में, चूल्हा नहीं जला क्यों।

 चिंता न हो दादी को, इसकी आज भला क्यों। ।

 ऐसे कैसे हो सकता था, हम सब पूआ खाएं।

 बुधिया काकी के घर के, बच्चे भूखे भूखे सोए। ।

 घर से आँटा घी लेकर के, दादी वही गई थी।

 मेरी दादी की होली, ऐसे आज मनी थी।।

मुझे बेशक अपनी कविताओं में लघुकथा नहीं समझ में आयी लेकिन श्री रामदेव तुरंत ने इन कविताओं में एक लघुकथा देखा था।

युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच उत्तर प्रदेश इकाई के तत्वावधान में दिनांक 28 -10 2023 को, कविता में लघुकथा विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन गूगल मीट के आभासी पटल पर किया गया l कार्यक्रम में श्री राम किशोर उपाध्याय जी, राष्ट्रीय अध्यक्ष युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच, श्री रामदेव धुरंधर मॉरीशस, डॉ0 नूतन पाण्डेय जी, सहायक निदेशक केंद्रीय हिंदी निदेशालय नई दिल्ली रहीं l डॉ 0 अभय नाथ सिंह, प्राचार्य किसान स्नात्तकोत्तर महाविद्यालय रकसा, रतसर बलिया, श्री चंद्रेश्वर प्रताप सिंह छ. ग., प्रवासी साहित्यकर डा. अनिता कपूर जी (अमेरिका) एवं डा. दीपक पाण्डेय जी सहायक निदेशक, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, नई दिल्ली श्रीमती प्रमिला कानपुर डॉ मोहम्मद जावेद, श्री रामसनेही विश्वकर्मा ‘सजल’, डॉ श्री प्रकाश मिश्रा, श्री मृदुल कुमार सिंह ‘मृदुल’, श्री नरेंद्र सिंह सिसोदिया, श्री अमित कुमार गुप्ता नेश्री शकील अहमद (बिलासपुर छ. ग.), श्री रामराज भारती, श्री बृजेश यादव, श्री अतुल राय, श्री नंदकिशोर वर्मा जी आदि ने अपने वक्तव्य एवं विचार रखें।

इस विषय में एक प्रस्ताव युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच केंद्रीय इकाई के समक्ष भी रखा गया कि क्या इसे एक विधा का रूप में देख सकते हैं या नहीं।

“श्रेयस की काव्य कथा विथिका का कविताओं के माध्यम से छोटी-छोटी लघुकथाओं और घटनाओं का अवलोकन कराती है।

इनकी कविताओं में किसी लघु कथा के विभिन्न तत्व – पात्र, परिवेश, संघर्ष, समस्या घटनाक्रम और संदेश सभी समाहित है।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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