श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ६३ ☆

☆ आलेख ☆ ~ वाकई लेखक होना गौरव की बात है ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

आज बड़ी तेज बरसात हो रही थी। ऑफिस पहुंचने में विलंब तो हो ही रहा था, लेकिन  किया ही क्या जा सकता था। बेटे ने कार स्टार्ट  की और यह कहते हुए  कि –  “पापा, बरसात तेज हो रही है मैं आपको मेट्रो स्टेशन तक छोड़ आता हूँ। आप कार चला कर जा सकते हो लेकिन उम्र के लिहाज से और जब इतनी बरसात हो रही हो, सड़कें पानी से लबालब भरी हों, तो आपको कार से जाना उचित नहीं है।”

मेट्रो रेल ही सिर्फ ऐसा साधन है जिससे आप, भीषण बारिश, भारी जाम के बावजूद भी निश्चित समय में लखनऊ के एक छोर एयरपोर्ट से इंदिरानगर के मुंशी पुलिया तक आप जा सकते हैं।

“पापा, यदि बिलम्ब हो रहा तो आप मेट्रो से ही चले जाइये, समय से पहुंचने की गारंटी मेट्रो के सिवाय कोई दूसरा नहीं देगा। आप बिना किसी तनाव के अपने ऑफिस समय से पहुंच सकेंगे।”

मुझे उसका सुझाव बिल्कुल अच्छा लगा। अपने आगामी उपन्यास के कुछ पंक्तियों को मन में संजोये मै कार में बैठा और टीपी नगर मेट्रो स्टेशन पहुँच गया।  लेखक अपने मन के अंदर आए भाव को एक झटके में कलम से कागज़ पर उतार देना चाहता है, ऐसा एक लेखक की फितरत होती है। मन में आयी पंक्तियां कहीं विस्मृति न हो जाए, मैं मेट्रो में बैठने के साथ ही फोन के स्क्रीन की ओर मुँह करके बकबकाना शुरू कर दिया। मैं धारा प्रवाह बोल रहा था, मोबाइल के नोटपैड पर मेरे अगले भोजपुरी उपन्यास का कथानक बड़ी ही मस्ती के साथ अपना स्थान बनाते हुए आगे बढ़ रहे थे। मैं अपनी धुन में इतना मगन था कि मैं बायें -दाएँ कुछ भी नही देख रहा था कि लोग क्या सोचते होंगे या मेरा उपहास कर रहे होंगे।

इस आलेख के बीच में लेखन और उसके लेखन के विषय में एक बात कहता चलूँ, नहीं तो यह बात भूल जाएगी – 

“कभी-कभी तो लेखकों को यह कहते सुनता हूँ। भाई मैं नही लिखता हूँ, वह जो ऊपर वाला है वह लिखवाता है। यह ऊपर से ही उतरता है। मुझे इस विषय में बहुत ज्यादा नहीं कहना क्योंकि  सच में होता तो वही है जो ऊपर वाला चाहता है। लेकिन यह बात थोड़ी अतिशयोक्ति सी लगती है।  दरअसल जब लेखक की दृष्टि किसी एक चीज पर म एकाग्र भाव के साथ पड़ती है, और उस विषय में दिल और दिमाग़ दोनों  एक साथ समन्वय स्थापित करते हैं, तब मन  के भीतर उस विषय पर एक कहानी, कविता और उपन्यास रचने के लिए भाव प्रकट हो उठते हैं। शब्दों की तेज बौछार शुरू हो जाती है जो वाणी और कलम के माध्यम से, वर्षो पहले सिर्फ कागज़ पर और अब कागज  या कंप्यूटर मोबाइल के स्क्रीन पर छपने लगते है। यानि ये शब्द भाव ऊपर से न  उतरकर, मन के अंदर से निकलतें है। लेखक समय, परिस्थिति अपने इर्द-गिर्द के वातावरण- जैसे दिल तक पहुंची गहरी चोट, खुशी से उछल कर बाहर निकल आने वाले दिल, क्या दिन थे वे, होगा क्या आगे, कहीं गम -कहीं खुशी, ब्रह्मांड में चमकते तारे, पहाड़ों से निकलती नदियां, झुरमुट में छुप कर बैठे हुए जीव, गांव की मिट्टी की भीनी भीनी सुगंध, शहर की चमक दमक,  ब्रह्म एक है, चौरासी कोटि देव हैं, हमहुँ लिखिबे, हमहुँ लिखव, हमउ लिखेंगे, हमाऊँ भी लिखियै, आम्ही सुद्धा लिहू”, अमारो लिखबो, हर चीज से कथानक ढूढ़ निकालता है। फिर तैयार होती है,  एक लघु कथा, एक नाटक, एक उपन्यास, एक संस्मरण, एक यात्रा वृतांत, एक पत्र, कुछ व्यंग, कुछ हास्य एक गद्य एक पद्य की क्षणिका, कुछ छंद, कुछ दोहे, कुछ सवैईया, कुछ मुक्तक, कुछ गजल कुछ सजल, कुछ छंद मुक्त कुछ छंद बद्ध, कुछ अगेय, कुछ गेय, कविताएं।”

बात कहां से शुरू हुई कहां चली गयी, मैं तो इस धारा प्रवाह लेखन में भूल ही गया। आइये पुनः वही से शुरु करें, जहाँ छोड़ा था – अब आगे क्या घटित हुआ।

दरअसल मेरे मोबाइल में देसी हिंदी गूगल टाइपिंग का एक ऐप है, जो मेरी आवाज को पहचान कर हिंदी टाइप करता है। उसके साथ मेरी दोस्ती का आलम यह है, मुझे टाइपिंग में लिखने में त्रुटि हो जाएगी लेकिन मेरे बोलने और उसके लिखने में बिल्कुल ही त्रुटि नहीं होती है। लेखन का नशा ऐसा कि शर्म भी बेशर्म हो जाती है।

अब भीड़ भरी मेट्रो में कौन इस संवाद को सुन रहा था, यह कौन नहीं सुन रहा था, इससे मुझको कुछ भी लेना देना नहीं था। हालांकि मैं इतना भी तेज नहीं बोल रहा था कि किसी को दिक्कत हो,  मुझे तो लगता है कि शायद मेरे बगल के व्यक्ति को छोड़कर कोई सुन ही नहीं पा रहा था। बस सुन रहा था मेरे होठों से सटा हुआ मेरा प्यारा मोबाइल। अपना तो हर हाल में दिल में आए भाव को मोबाइल पर उतारने का नशा रहता है। मैं वही काम कर रहा था। अचानक एक बुजुर्ग से दिखने वाले लेकिन दिव्य व्यक्तित्व और आभामंडल वाले शालीन, शिष्ट- भद्र  व्यक्ति मेट्रो में हमारे सीट के सामने आए हैं। स्थानाभाव के कारण वे आगे बढ़ जाना चाहते थे। मेट्रो में आस-पास कोई जगह नहीं थी। अचानक मुझे और मेरे बगल में बैठी हुई एक बिटिया दोनों के मन में एक साथ यह भाव आया कि अभी तो इतनी जगह रिक्त ही है कि यदि हम लोग थोड़ा-थोड़ा खिसक जाए तो एक व्यक्ति के बैठने के लिए पर्याप्त जगह हो जाएगी। सच में हम दोनों ने ऐसा ही किया।

वे भद्र व्यक्ति जो मुझसे करीब 4-5 साल उम्र में बड़े ही थे, आगे निकलने ही वाले थे कि हमने टोका –

“भाई साहब!  ठहरिये, आइये आप भी बैठ लीजिए।” इतना कुछ सोचने और अपनी बात को कहने के बीच ट्रेन खुली। इसी बीच भाई साहब का संतुलन बिगड़ा लेकिन मैंने उन्हें अपने हाथों से पकड़ा और वे हमारे बगल में बैठ गए। यह बताना उचित होगा कि यह सब काम मैंने अपने लेखन को विराम देकर किया था।

खैर फिर मैं भूल गया कि मुझे कौन देख रहा है मैं धीरे-धीरे बोलकर लिखना शुरू किया। मुझे शायद मेरे पड़ोसी से अधिक कोई नहीं सुन समझ रहा था कि मैं उपन्यास लिख रहा हूँ या किसी से बात कर रहा हूँ।

मैंने लिखना बंद किया तब तक बगल वाले उसे भद्र व्यक्ति ने मुझसे कहा-

“सर ! आप राइटर है क्या?” उन्होंने मुझसे यह कह कर कहा मेरा सिर गर्व से ऊपर उठा दिया। वाह, मुझे राइटर बोल रहे हैं। आप बताएंगे कि आप कैसे इसे लिखते हैं?  कौन सा ऐप यूज करते हैं?

मैंने उन्हें विधिवत सब कुछ समझा दिया, इतना ही नहीं उनके मोबाइल में इस ऐप को डाउनलोड और एक्टिव भी कर दिया।

जीवन के चौथे पड़ाव पर लेखन शक्ति, स्मरण शक्ति, चलने फिरने में सब कुछ में दिक्कत आती है। ऐसे में यह ऐप काफी कारगर है। ईश्वर से कामना करता हूं कि सब शक्ति कमजोर हो जाए लेखन शक्ति और स्मरण शक्ति बनी रहे।

हम दोनों के बीच आपसी परिचय हुआ, बातचीत हुई, मुझे पता चला कि मेरे बगल में बैठे हुए अग्रज पुलिस डिपार्टमेंट के बड़े सीनियर अफसर रह चुके थे और अभी हाल में दो-तीन साल पूर्व सेवानिवृत हुए थे। लेखक के रूप में उनके मन में मेरे प्रति  बहुत सारा सम्मान का भरा प्रतीत हो रहा था। बात की बात में उन्होंने कहा कि मेरे एक सीनियर डीआईजी साहब थे, उन्होंने भी कई किताबें लिखी है। मैं भी मन ही मन कहा, चलो मैंने भी लगभग एक दर्जन पूरे कर लिए।

खैर तब तक अगला मेट्रो स्टेशन हजरतगंज आ गया हम दोनों ने एक दूसरे का   हाथ जोड़कर  अभिवादन किया और वे हजरतगंज मेट्रो स्टेशन उतर गये। मुझे भी अगले मेट्रो स्टेशन केडी सिंह बाबू स्टेडियम  पर उतरना था। लेकिन मेरे बगल में बैठे दूसरे सज्जन की दृष्टि मेरे ऊपर पड़ी उन्होंने बड़े ही आदर से कहा, भाई साहब आप लेखक है ?

 मैं भी शरमाते और सकुचाते हुए कहा –

“जी.. हाँ थोड़ा बहुत जरूर लिख लेता हुँ। नहीं भाई साहब आप जिस तरह से बोलकर लिख रहे थे वाकई कहानी मेरे दिल तक पहुँच रही थी।” मैं तो बिल्कुल भाव विभोर हो गया था। आप अच्छा लिखते हैं। मुझे अपने उपन्यास लेखन के बीच ही श्रोता और पाठक दोनों मिल चुका था। मै बहुत ख़ुश था।

भाई साहब आप रहते कहाँ हैं?.. मैने उन्हें बताया, तो वे भी बोल पड़े,

“जी, मैं भी इधर रायबरेली रोड पर ही रहता हूँ।” वे सज्जन किसी  गवर्नमेंट जॉब में तो नहीं थे, लेकिन किसी कारपोरेट सेक्टर के  पदाधिकारी थे,  जैसा उन्होंने मुझे अपना परिचय दिया।

अब मेरा मेट्रो स्टेशन आ चुका था। मैंने अपना पिट्ठू बैग अपने पीठ पर लादा और  मन में यह सोचता हुआ बाहर निकला कि वाकई लेखक होना गौरव की बात है।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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