श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पतिव्रता।)

?अभी अभी # १०४१ ⇒ आलेख – पतिव्रता ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

००० पतिव्रता ०००

जो पत्नी अपने पति के लिए व्रत-उपवास रखे, वह पतिव्रता कहलाती है। ये पतिव्रताएं भारतवर्ष में बहुतायत से पाई जाती हैं। पति, देव भी है, और परमेश्वर भी। पत्नी केवल धर्म-पत्नी है। धर्म-पिता, धर्म-भाई और धर्म-बहन तो होते हैं, लेकिन धर्म-पति नहीं होते।

पति चूँकि परमेश्वर होते हैं, इसलिए वे व्रत-उपवास नहीं रखते! हड़ताली तीज और करवा चौथ की तरह पत्नी के लिए कोई भी व्रत-उपवास के बंधनों से वे मुक्त रहते हैं। विवाह के वक्त सात फेरों में ही सात जन्मों का एडवांस बुकिंग हो जाता है। बहु-पत्नी होने पर सात जन्मों तक इन पत्नियों को बहुतायत से झेलना भी पड़ सकता है।।  

अक्सर पतिव्रताएं, अगले जनम मोहे यही पति दीजो, के लिए और पति की लंबी उम्र के लिए निर्जला व्रत रखती हैं, लेकिन अपने पति को भूखा नहीं रखती। पतिव्रता का यही त्याग रिज़र्व बैंक के गवर्नर की तरह अगले जन्म में उसी पति के लिए वचन-बद्ध होता है, लेकिन नोटबन्दी की तरह इस वचन में शिथिलता भी लाई जा सकती है।

आदतन सभी पतिव्रताएं धार्मिक ही होती हैं। लेकिन उनके पुण्य एक अलिखित विधान के तहत 50 प्रतिशत पतिदेव को ट्रांसफर हो जाते हैं। पति तो एक धार्मिक, सुशील पत्नी पाकर ही धन्य हो जाता है, जब कि एक पतिव्रता, जैसा भी है, मेरा पति देवता है, मानकर अपने जीवन को धन्य मान लेती है।।  

पत्नी को अन्नपूर्णा भी कहा गया है और गृह-लक्ष्मी भी! लेकिन यह अन्नपूर्णा अपने पति के भोजन करने के बाद ही अन्न ग्रहण करती है। दहेज में लक्ष्मी लाने के कारण ही वह लक्ष्मी कहलाती है और पति लक्ष्मी-पति होता है, स्वामी होता है, घर वाला होता है। पड़ोसियों की दृष्टि में ज़रूर वह उसकी घर-वाली होती है।

जब देश डिजिटल हो रहा है, तो पुरानी मान्यताएँ भी बदल रही हैं। पतिदेव भी आजकल धर्म-पत्नी के लिए व्रत-उपवास रखने लगे हैं। चाँद सी महबूबा के होते हुए वे क्यूँ पति-व्रताओं की देखादेखी करवा-चौथ के दिन चलनी की आड़ में चाँद को देख अपना व्रत तोड़ें।।  

21 वीं सदी साथ-साथ चलने की है। महिला सशक्तिकरण ने पति-व्रताओं के दायरे बढ़ा दिए हैं।

अब वह पति के चरणों की दासी नहीं, पति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली सह-धर्मिणी हो गई है। अपनी मर्यादा में रहते हुए वह सभी कर्त्तव्यों का पालन भी कर लेती है और घर-गृहस्थी सुचारू रूप से चलाते हुए, तीज-व्रत-उपवासों का भी मनोयोग से पालन करते हुए, अपने जीवन को धन्य करती है।

यूँ ही नहीं कहा गया है!

तुमसे ही घर, घर कहलाया।।  

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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