श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )  

सम्माननीय श्री संजय भारद्वाज जी की आत्मीय पोस्ट एक रचना ही नहीं अपितु ऐसी सम्पादकीय ओजस्वी एवं प्रेरक रचना है जिसे संभवतः मेरी लेखनी भी उस ऊंचाई को स्पर्श नहीं कर सकती। अतः सादर प्रस्तुत है आदरणीय श्री संजय भारद्वाज जी की लेखनी से अतिथि सम्पादकीय……

-हेमन्त बावनकर

? ई-अभिव्यक्ति संवाद -अतिथि संपादक की कलम से ?

? अब तक 2557 !….✍️ ? ?

(दैनिक लेखन का आठवाँ वर्ष)

(आज स्मृतिशेष प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी को उनकी प्रथम पुण्य तिथि पर सादर नमन) 

आज 25 जुलाई है। इस दिनांक के साथ मेरे लेखकीय जीवन का एक महत्वपूर्ण प्रसंग भी जुड़ा हुआ है।

 प्रसंग यह है कि लेखन करते हुए लगभग चार दशक से अधिक बीत चुके हैं। इसमें गत नौ-दस वर्ष से लिखना नियमित-सा रहा है। कविता, लघुकथा, आलेख, संस्मरण, व्यंग्य और ‘उवाच’ के रूप में अभिव्यक्ति जन्म लेती रही है। 15 जून 2019 से ‘ई-अभिव्यक्ति’ ने ‘संजय उवाच’ को साप्ताहिक रूप से प्रकाशित करना आरंभ किया। 

फिर संपादक आदरणीय हेमंत बावनकर जी का एक पत्र मिला। पत्र में उन्होंने लिखा था, “आपकी रचनाएँ इतनी हृदयस्पर्शी हैं कि मैं प्रतिदिन उदधृत करना चाहूँगा। जीवन के महाभारत में ‘संजय उवाच’ साप्ताहिक कैसे हो सकता है?” 

 ‘संजयकोश’ में यूँ भी लिखना और जीना पर्यायवाची हैं। फलत: इस पत्र की निष्पत्तिस्वरूप 25 जुलाई 2019 से सोमवार से शनिवार ‘संजय दृष्टि’ के अंतर्गत ‘ई-अभिव्यक्ति’ ने इस अकिंचन के ललित साहित्य को दैनिक रूप से प्रकाशित करना आरम्भ किया। रविवार को ‘संजय उवाच’ प्रकाशित होता रहा।

इस दैनिक यात्रा ने आज आठवें वर्ष में चरण रखा है।

आज पीछे मुड़कर देखने पर पाता हूँ कि इन  वर्षों ने बहुत कुछ दिया। ‘नियमित-सा’ को नियमित होना पड़ा। अलबत्ता नियमित दैनिक लेखन की अपनी चुनौतियाँ और संभावनाएँ भी होती हैं। नियमित होना अविराम होता है। हर दिन शिल्प और विधा की नई संभावना बनती है तो पाठक को प्रतिदिन कुछ नया देने की चुनौती भी मुँह बाए खड़ी रहती है। अनेक बार पारिवारिक, दैहिक, भावनात्मक कठिनाइयाँ भी होती हैं जो शब्दों के उद्गम पर कुंडली मारकर बैठ जाती हैं। विनम्रता से कहना चाहता हूँ कि यह कुंडली, भीतर की कुंडलिनी को कभी प्रभावित नहीं कर पाई। माँ शारदा की अनुकंपा ऐसी रही कि लेखनी हाथ में आते ही पथ दिखने लगा और शब्द पथिक बन गए।

अनेक बार यात्रा के बीच पोस्ट लिखी और भेजी। कभी किसी आयोजन में मंच पर बैठे-बैठे रचना भीतर कल्लोल करने लगी, तभी लिखी और भेजी। ड्राइविंग में कुछ रचनाओं ने जन्म पाया तो कुछ ट्रैफिक के चलते प्रसूत ही नहीं हो पाईं। 

तब भी जो कुछ जन्मा, पाठकों ने उसे अनन्य नेह और अगाध ममत्व प्रदान किया। कुछ टिप्पणियाँ तो ऐसी मिलीं कि लेखक नतमस्तक हो गया।

नतमस्तक भाव से ही कहना चाहूँगा कि लेखन का प्रभाव रचनाकार मित्रों पर भी देखने को मिला। अपनी रचना के अंत में दिनांक और समय लिखने का आरम्भ से स्वभाव रहा। आज प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से जुड़े 90 प्रतिशत से अधिक रचनाकारों ने अपनी रचना का समय और दिनांक लिखना आरंभ कर दिया है। रेकॉर्डकीपिंग की यह आदत भविष्य में मित्रों को अपनी रचनाधर्मिता के पड़ाव खंगालने में सहायक सिद्ध होगी।

विनम्रता से एक और आयाम की चर्चा करना चाहूँगा। लेखन की इस नियमितता से प्रेरणा लेकर अनेक मित्र नियमित रूप से लिखने लगे। किसी लेखक के लिए यह अनन्य और अद्भुत पारितोषिक है।

आदरणीय भाई हेमंत बावनकर जी इस नियमितता के प्रथम कारण और कारक बने। ‘दक्षिण भारत राष्ट्रमत’ के संपादक श्रीकांत पाराशर जी विगत लगभग सात वर्ष से साप्ताहिक उवाच को बैंगलुरू और चेन्नई दोनों संस्करणों में स्थान दे रहे हैं। भिवानी से दैनिक ‘चेतना’ के संपादक श्रीभगवान वसिष्ठ जी भी साढ़े छह वर्ष से ‘उवाच’ को नियमित रूप से प्रकाशित कर रहे हैं।  इस सदाशयता के आप तीनों महानुभावों को हृदय की गहराइयों से अनेकानेक धन्यवाद।

इस दैनिक स्तंभ को आज तक 2557 दिन हो चुके हैं। नियमित रूप से मेरे लेखन को पढ़नेवाले और अपनी प्रतिक्रिया देनेवाले पाठकों के प्रति आभारी हूँ। ‘आप हैं सो मैं हूँ।’ मेरा अस्तित्व आपका ऋणी है।

दो हाथोंवाला

साधारण मनुष्य था मैं मित्रो!

तुम्हारी आशा और

विश्वास ने

मुझे सहस्त्रबाहु कर दिया!

आप सबके ऋण से उऋण होना भी नहीं चाहता। घोर स्वार्थी हूँ। चाहता हूँ कि समय के अंत तक लिखता रहूँ। चाहता हूँ कि समय के अंत तक हज़ार हाथों से रचता रहूँ।

?

संजय भारद्वाज ✍️🙏

( लिखता हूँ, सो जीता हूँ।)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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