हिन्दी साहित्य – ई-अभिव्यक्ति संवाद ☆ अतिथि संपादक की कलम से ……. अब तक 2557 !….✍️ ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )  

सम्माननीय श्री संजय भारद्वाज जी की आत्मीय पोस्ट एक रचना ही नहीं अपितु ऐसी सम्पादकीय ओजस्वी एवं प्रेरक रचना है जिसे संभवतः मेरी लेखनी भी उस ऊंचाई को स्पर्श नहीं कर सकती। अतः सादर प्रस्तुत है आदरणीय श्री संजय भारद्वाज जी की लेखनी से अतिथि सम्पादकीय……

-हेमन्त बावनकर

? ई-अभिव्यक्ति संवाद -अतिथि संपादक की कलम से ?

? अब तक 2557 !….✍️ ? ?

(दैनिक लेखन का आठवाँ वर्ष)

(आज स्मृतिशेष प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी को उनकी प्रथम पुण्य तिथि पर सादर नमन) 

आज 25 जुलाई है। इस दिनांक के साथ मेरे लेखकीय जीवन का एक महत्वपूर्ण प्रसंग भी जुड़ा हुआ है।

 प्रसंग यह है कि लेखन करते हुए लगभग चार दशक से अधिक बीत चुके हैं। इसमें गत नौ-दस वर्ष से लिखना नियमित-सा रहा है। कविता, लघुकथा, आलेख, संस्मरण, व्यंग्य और ‘उवाच’ के रूप में अभिव्यक्ति जन्म लेती रही है। 15 जून 2019 से ‘ई-अभिव्यक्ति’ ने ‘संजय उवाच’ को साप्ताहिक रूप से प्रकाशित करना आरंभ किया। 

फिर संपादक आदरणीय हेमंत बावनकर जी का एक पत्र मिला। पत्र में उन्होंने लिखा था, “आपकी रचनाएँ इतनी हृदयस्पर्शी हैं कि मैं प्रतिदिन उदधृत करना चाहूँगा। जीवन के महाभारत में ‘संजय उवाच’ साप्ताहिक कैसे हो सकता है?” 

 ‘संजयकोश’ में यूँ भी लिखना और जीना पर्यायवाची हैं। फलत: इस पत्र की निष्पत्तिस्वरूप 25 जुलाई 2019 से सोमवार से शनिवार ‘संजय दृष्टि’ के अंतर्गत ‘ई-अभिव्यक्ति’ ने इस अकिंचन के ललित साहित्य को दैनिक रूप से प्रकाशित करना आरम्भ किया। रविवार को ‘संजय उवाच’ प्रकाशित होता रहा।

इस दैनिक यात्रा ने आज आठवें वर्ष में चरण रखा है।

आज पीछे मुड़कर देखने पर पाता हूँ कि इन  वर्षों ने बहुत कुछ दिया। ‘नियमित-सा’ को नियमित होना पड़ा। अलबत्ता नियमित दैनिक लेखन की अपनी चुनौतियाँ और संभावनाएँ भी होती हैं। नियमित होना अविराम होता है। हर दिन शिल्प और विधा की नई संभावना बनती है तो पाठक को प्रतिदिन कुछ नया देने की चुनौती भी मुँह बाए खड़ी रहती है। अनेक बार पारिवारिक, दैहिक, भावनात्मक कठिनाइयाँ भी होती हैं जो शब्दों के उद्गम पर कुंडली मारकर बैठ जाती हैं। विनम्रता से कहना चाहता हूँ कि यह कुंडली, भीतर की कुंडलिनी को कभी प्रभावित नहीं कर पाई। माँ शारदा की अनुकंपा ऐसी रही कि लेखनी हाथ में आते ही पथ दिखने लगा और शब्द पथिक बन गए।

अनेक बार यात्रा के बीच पोस्ट लिखी और भेजी। कभी किसी आयोजन में मंच पर बैठे-बैठे रचना भीतर कल्लोल करने लगी, तभी लिखी और भेजी। ड्राइविंग में कुछ रचनाओं ने जन्म पाया तो कुछ ट्रैफिक के चलते प्रसूत ही नहीं हो पाईं। 

तब भी जो कुछ जन्मा, पाठकों ने उसे अनन्य नेह और अगाध ममत्व प्रदान किया। कुछ टिप्पणियाँ तो ऐसी मिलीं कि लेखक नतमस्तक हो गया।

नतमस्तक भाव से ही कहना चाहूँगा कि लेखन का प्रभाव रचनाकार मित्रों पर भी देखने को मिला। अपनी रचना के अंत में दिनांक और समय लिखने का आरम्भ से स्वभाव रहा। आज प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से जुड़े 90 प्रतिशत से अधिक रचनाकारों ने अपनी रचना का समय और दिनांक लिखना आरंभ कर दिया है। रेकॉर्डकीपिंग की यह आदत भविष्य में मित्रों को अपनी रचनाधर्मिता के पड़ाव खंगालने में सहायक सिद्ध होगी।

विनम्रता से एक और आयाम की चर्चा करना चाहूँगा। लेखन की इस नियमितता से प्रेरणा लेकर अनेक मित्र नियमित रूप से लिखने लगे। किसी लेखक के लिए यह अनन्य और अद्भुत पारितोषिक है।

आदरणीय भाई हेमंत बावनकर जी इस नियमितता के प्रथम कारण और कारक बने। ‘दक्षिण भारत राष्ट्रमत’ के संपादक श्रीकांत पाराशर जी विगत लगभग सात वर्ष से साप्ताहिक उवाच को बैंगलुरू और चेन्नई दोनों संस्करणों में स्थान दे रहे हैं। भिवानी से दैनिक ‘चेतना’ के संपादक श्रीभगवान वसिष्ठ जी भी साढ़े छह वर्ष से ‘उवाच’ को नियमित रूप से प्रकाशित कर रहे हैं।  इस सदाशयता के आप तीनों महानुभावों को हृदय की गहराइयों से अनेकानेक धन्यवाद।

इस दैनिक स्तंभ को आज तक 2557 दिन हो चुके हैं। नियमित रूप से मेरे लेखन को पढ़नेवाले और अपनी प्रतिक्रिया देनेवाले पाठकों के प्रति आभारी हूँ। ‘आप हैं सो मैं हूँ।’ मेरा अस्तित्व आपका ऋणी है।

दो हाथोंवाला

साधारण मनुष्य था मैं मित्रो!

तुम्हारी आशा और

विश्वास ने

मुझे सहस्त्रबाहु कर दिया!

आप सबके ऋण से उऋण होना भी नहीं चाहता। घोर स्वार्थी हूँ। चाहता हूँ कि समय के अंत तक लिखता रहूँ। चाहता हूँ कि समय के अंत तक हज़ार हाथों से रचता रहूँ।

?

संजय भारद्वाज ✍️🙏

( लिखता हूँ, सो जीता हूँ।)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – ई-अभिव्यक्ति संवाद ☆ दिग्गज श्रेष्ठ साहित्यिक  ‘पद्मभूषण’ श्री. पु. ल. देशपांडे यांचा स्मृतिदिन. – मनःपूर्वक श्रद्धांजली ☆ संपादक मंडळ,  ई – अभिव्यक्ति ☆

 

💐🙏 १२ जून… केवळ महाराष्ट्रातीलच नव्हे तर जगभरातील मराठी रसिकांचे अतिशय लाडके आणि आदरणीय व्यक्तिमत्व अशीच ओळख असणारे दिग्गज श्रेष्ठ साहित्यिक ‘पद्मभूषण’ श्री. पु. ल. देशपांडे यांचा स्मृतिदिन. 💐🙏

खरं तर पु.ल. हे एक असं व्यक्तिमत्व जे रसिकांच्या विस्मरणात कधीच जाऊ शकत नाही. मानवी स्वभावाचे अगदी अचूक परीक्षण करून त्यावर नेमकेपणे प्रकाश टाकणारे ‘ व्यक्ती आणि वल्ली ‘, ‘ बटाट्याची चाळ’ सारखे त्यांचे कथासंग्रह, ‘ अपूर्वाई ‘,’ पूर्वरंग ‘ यासारखी त्यांची बोलकी आणि चित्रमय भाषेतली प्रवासवर्णने, ‘ तुझे आहे तुजपाशी ‘, ‘ ती फुलराणी ‘ सारखी समाजातल्या विसंगत मनोवृत्तीवर नेमके बोट ठेवणारी आणि बोधप्रद कथाबीज असणारी त्यांची नाटके, अशी त्यांची  साहित्य-क्षेत्रातली अष्टपैलू कामगिरी ‘ कालातीत ‘ म्हणावी अशीच आहे यात दुमत असणारच नाही. 

पु.ल. हे केवळ लेखक नव्हते हे तर सर्व रसिक जाणतातच. ते एक उत्तम हार्मोनियम वादक तर होतेच, पण तितकेच उत्तम संगीतकारही होते…. हो, आणि उत्तम अभिनेतेही. ‘ गुळाचा गणपती ‘ सारख्या मोजक्याच चित्रपटातला त्यांचा अभिनय मनाला भिडणारा होता. आणि ‘ बटाट्याची चाळ ‘ सारखे त्यांचे एकपात्री प्रयोग तर प्रेक्षकांना अक्षरशः वेड लावणारे .. आत्मपरीक्षण करण्यास भाग पाडणारे. 

या असामान्य साहित्यिकाबद्दल आणि त्यांच्या अमर साहित्यकृतींबद्दल बोलावे तितके कमीच. पण या बरोबरच त्यांच्या व्यक्तित्वातला एक असामान्य गुण म्हणजे त्यांचे “ दातृत्व “. “ पु.ल.देशपांडे फाउंडेशन “ या स्वस्थापित संस्थेच्या नावाने त्यांनी आपल्या कमाईतला खूप मोठा हिस्सा वेगवेगळ्या सामाजिक संस्थांना आणि शाळांना देणगी म्हणून दिलेला होता.  

त्यांच्या अष्टपैलू साहित्यासाठी आणि कलासेवेसाठी अनेक मानाचे पुरस्कार त्यांना प्रदान करण्यात आलेले होतेज्यात प्रामुख्याने १९६५ चा साहित्य अकादमी पुरस्कार (व्यक्ती आणि वल्लीसाठी), १९६६ चा पद्मश्री आणि १९९० चा पद्मभूषण यांचा समावेश आहे. त्यांना संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (१९६७), कालिदास सन्मान (१९८७) आणि महाराष्ट्र भूषण (१९९६) पुरस्कारांनीही गौरविण्यात आले आहे.पु.ल. देशपांडे यांना मिळालेले प्रमुख पुरस्कार:साहित्य अकादमी पुरस्कार: १९६५ (व्यक्ती आणि वल्लीसाठी)पद्मश्री: १९६६संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार: १९६७संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप: १९७९कालिदास सन्मान: 

शिवाय १९८७ पद्मभूषण: १९९० पुण्यभूषण: १९९२ महाराष्ट्र भूषण पुरस्कार: १९९६ महाराष्ट्र फाउंडेशन गौरव पुरस्कार… असे कितीतरी मानाचे पुरस्कार मिळालेले होते.  

१९९९ साली त्यांच्या योगदानाबद्दल भारत सरकारने त्यांच्या नावानेपु.ल.देशपांडे महाराष्ट्र कला अकादमी ‘ ही त्यांच्या स्मरणार्थ मुंबईत उभारलेली संस्था ही त्यांना दिलेली सर्वात मोठी आदरांजली म्हणायला हवी. 

आज त्यांच्या स्मृतिदिनी आपल्या ई-अभिव्यक्ती समूहातर्फे या ‘ग्रेट’ साहित्यिकाला मनःपूर्वक श्रद्धांजली देतांना त्यांचे आत्मचिंतनपर आणि हृद्य विचार नक्कीच विचार करावा असेच – – – 

मला एकच समाधान आहे. हे जे काही केलं त्यातून कुणाच्या तरी जीवनामध्ये थोडाफार आनंद निर्माण करू शकलो. म्हणूनच …. ‘ तुका म्हणे गर्भवासी । सुखे घालावे आम्हांसी । ‘ असे म्हणणारे तुकाराम मला आप्त वाटतात. माझं गणगोत खूप आहे. आता संध्याछायांना केव्हा दाटायचं तेव्हा दाटू देत. ऐलतीरावरचं पाहण्यासारखं इतकं आहे, की पैलतीराची चिंता मी कशाला करायची ? माझी मैफिल चालूच आहे ….  

मनःपूर्वक श्रद्धांजली 💐🙏


संपादक मंडळ

ई – अभिव्यक्ति, मराठी विभाग. 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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ई-अभिव्यक्ति: संवाद ☆ एक संवाद ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆ ई-अभिव्यक्ति – एक संवाद ☆ हेमन्त बावनकर ☆

प्रिय मित्रो,

ई-अभिव्यक्ति के सभी प्रबुद्ध लेखकगण तथा पाठकगण के आत्मीय स्नेह के लिए हृदय से आभार।

अक्तूबर २०२६ में आपकी प्रिय वैबसाइट ने सफलवर्ष पूर्ण करने जा रही है एवं १५ अगस्त २०२६ को ई-अभिव्यक्ति (मराठी) अपने सफल ६ वर्ष पूर्ण करने जा रही है।  

इन पंक्तियों के लिखे जाते तक ३४,३००+ रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं एवं 802964 से अधिक विजिटर्स आपकी प्रिय वैबसाइट https://www.e-abhivyakti.com पर विजिट कर अपना आत्मीय स्नेह और प्रतिसाद दे चुके हैं.

हमें इस सूचना को आपसे साझा करते हुए अत्यंत गर्व का अनुभव हो रहा है कि ई-अभिव्यक्ति भारत का प्रथम प्रकाशन है जो विगत चार वर्षों से फ्लिपबुक फोर्मेट में हिंदी एवं मराठी भाषा में दीपावली विशेषांक का निःशुल्क प्रकाशन कर रहा है.    

श्री संजय भारद्वाज

ई-अभिव्यक्ति के प्रकाशन के प्रारंभिक दिनों से प्रतिदिन एक रचना के प्रकाशन में श्री संजय भरद्वाज जी का अविराम साहित्यिक सहयोग रहा है. उन्होंने कई मील के पत्थर पार कर लिए हैं. 

श्री प्रदीप शर्मा

इसी कड़ी में हमें आज श्री प्रदीप शर्मा जी के अविराम १००० आलेखों के अविराम प्रकाशित करने का सौभाग्य मिला है. श्री प्रदीप शर्मा जी विगत कई वर्षों से लगातार अपने फेसबुक पेज पर प्रतिदिन एक आलेख प्रातः  ६ बजे तक पोस्ट कर देते हैं, जो अपने आप में एक अकल्पनीय उपलब्धि है. इसके लिए उन्हें हार्दिक बधाई। माँ सरस्वती उनकी कलम को यह शक्ति अविराम रखे यही मंगलकामना। इस अवसर पर हम प्रिय मित्र स्मृतिशेष भाई जय प्रकाश पाण्डेय जी का भी स्मरण करते हैं जिन्होंने हमें श्री प्रदीप शर्मा जी से परिचय कराया था. 

हमारे सम्पादक मंडल ने अपने प्रबुद्ध लेखकगण एवं पाठकगण के सहयोग से साहित्य सेवा में अपना निःस्वार्थ योगदान देकर साहित्य को नए आयाम देने का प्रयास किया है. 

आप को आश्चर्य होगा कि हमारे संपादक मंडल के सदस्य वरिष्ठ नागरिकों / साहित्यकारों का एक छोटा सा समूह है, जो बिना किसी व्यावसायिक लाभ के अपनी अभिरुचि स्वरुप  स्वान्तः सुखाय उत्कृष्ट साहित्य प्रदान करने को तत्पर है. ई-अभिव्यक्ति नवोदित साहित्यकारों से लेकर सम्माननीय वरिष्ठ साहित्यकारों के साहित्य को एक सम्माननीय  मंच प्रदान करता है और ससम्मान प्रकाशित करने का प्रयास करता है.

उपरोक्त सभी उपलब्धियों से ई-अभिव्यक्ति परिवार गौरवान्वित अनुभव करता है। हम कामना करते हैं कि – आप सभी का अपूर्व आत्मीय स्नेह एवं प्रतिसाद इसी प्रकार हमें मिलता रहेगा। 

आपसे सस्नेह विनम्र अनुरोध है कि आप ई-अभिव्यक्ति में प्रकाशित साहित्य को आत्मसात करें एवं अपने मित्रों से सोशल मीडिया पर अवश्य साझा करें। 

आपके विचारों एवं सुझावों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।

एक बार पुनः आप सभी का हृदय से आभार ।

सस्नेह

हेमन्त बावनकर

पुणे (महाराष्ट्र)   

२५ मई २०२६   

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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ई-अभिव्यक्ति – संवाद ☆ स्मृतिशेष डॉ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ द्वितीय पुण्यतिथि पर विशेष ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆ ई-अभिव्यक्ति – संवाद ☆ स्मृतिशेष डॉ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ द्वितीय पुण्यतिथि पर विशेष 💐 हेमन्त बावनकर ☆

दो वर्ष के बाद भी ऐसा नहीं लगता कि सुमित्र जी नहीं रहे। ऐसा लगता है कि उनसे कल ही तो बात हुई थी। किन्तु, मृत्यु तो अटल सत्य है जिसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता। वे अपने स्वजनों को शारीरिक रूप से अवश्य छोड़ कर चले गए किन्तु, उनकी स्मृतियाँ सदैव उनकी पीढ़ी एवं वर्तमान पीढ़ी के मस्तिष्क में आजीवन रहेंगी।

सुमित्र जी से पहली मुलाक़ात मेरे स्व. पिताश्री टी डी बावनकर जी (सुमित्र जी के मित्र) के साथ 1982 की एक शाम को उनके निवास पर हुई। उसके बाद एक ऐसा संबंध बना जो आजीवन चलता रहेगा। उनके द्वारा प्रकाशित मेरी प्रथम कहानी “चुभता हुआ सत्य’ नवीन दुनिया के पाक्षिक तरंग के प्रवेशांक में प्रकाशित हुई थी। उनके पत्र एवं तरंग की प्रति मेरे पास अभी तक सुरक्षित है।

मेरी उपरोक्त स्मृति तो मात्र एक प्रतीकात्मक उदाहरण है, उनसे जुडने वाले अनेकों मित्रों का जिन्हें उन्होने आजीवन अपना आत्मीय स्नेह और मार्गदर्शन दिया है। ऐसी अनेक कहानियाँ और संस्मरण आपको संस्कारधानी के साहित्य जगत में ही नहीं अपितु सारे विश्व के कई मित्रों में मिलेगी।

ई-अभिव्यक्ति के प्रथम अंक के लिए उनके आशीष स्वरूप प्राप्त कविता उद्धृत कर रहा हूँ जो मुझे ई-अभिव्यक्ति के सम्पादन में सदैव सकारात्मक मार्गदर्शन देती रहती है, एक गुरुमंत्र की मानिंद।

☆ अभिव्यक्ति  ☆

संकेतों के सेतु पर

साधे काम तुरंत |

दीर्घवयी हो जयी हो

कर्मठ प्रिय हेमंत

काम तुम्हारा कठिन है

बहुत कठिन अभिव्यक्ति

बंद तिजोरी सा यहां

दिखता है हर व्यक्ति

मनोवृति हो निर्मला

प्रकटें निर्मल भाव

यदि शब्दों का असंयम

हो विपरीत प्रभाव ||

सजग नागरिक की तरह

जाहिर हो अभिव्यक्ति

सर्वोपरि है देशहित

बड़ा न कोई व्यक्ति|

डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’

स्थान – दिल्ली 15 /10/18

मित्र श्री संतोष नेमा जी ने ‘सुमित्र संस्मरण’ प्रकाशित किया है। जिसमें 60 से अधिक लोगों के संस्मरण प्रकाशित किए गए हैं। श्री नेमा जी के शब्दों में ही “साहित्य के गंभीर अध्येता, अद्भुत रचनात्मकता, माधुर्य व्यवहार के चलते उनके हजारों चाहने वाले हैं जिनके दिलों में राजकुमार की तरह राज करते हैं. इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनकी श्रद्धांजलि सभा में भीड़ में उपस्थित हर एक आदमी अपनी भावांजलि देने के लिए आतुर था. जब मैंने यह देखा तब उसी क्षण मेरे मन में यह विचार आया की क्यों ना एक सुमित्र संस्मरण का प्रकाशन किया जाए जिसमें उनके प्रति सभी साहित्यकारों के संस्मरण एवं भाव समाहित किए जा सकें.”

सुमित्र जी के अनेकों स्वजनो के अनेकों संस्मरण हैं जो आजीवन उनकी याद दिलाते रहेंगे। उनकी प्रथम पुण्यतिथि पर ई-अभिव्यक्ति द्वारा प्रकाशित विशेष संस्करण भी मात्र एक प्रतीक ही था. यह विशेष संस्करण अपने प्रबुद्ध पाठकों के लिए पुनः प्रस्तुत कर रहे हैं.  

 

हेमन्त बावनकर

पुणे 

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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ई-अभिव्यक्ति: संवाद ☆ एक संवाद ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆ ई-अभिव्यक्ति – एक संवाद ☆ हेमन्त बावनकर ☆

प्रिय मित्रो,

ई-अभिव्यक्ति के सभी प्रबुद्ध लेखकगण तथा पाठकगण के आत्मीय स्नेह के लिए हृदय से आभार।

अक्तूबर २०२५ में आपकी प्रिय वैबसाइट ने सफलवर्ष पूर्ण किये हैं एवं १५ अगस्त २०२५ को ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ने अपने सफल ५ वर्ष पूर्ण कर लिए हैं।  

इन पंक्तियों के लिखे जाते तक ३१,२००+ रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं एवं  710958 से अधिक विजिटर्स आपकी प्रिय वैबसाइट https://www.e-abhivyakti.com पर विजिट कर अपना आत्मीय स्नेह और प्रतिसाद दे चुके हैं.

हमें इस सूचना को आपसे साझा करते हुए अत्यंत गर्व का अनुभव हो रहा है कि ई-अभिव्यक्ति भारत का प्रथम प्रकाशन है जो विगत चार वर्षों से फ्लिपबुक फोर्मेट में हिंदी एवं मराठी भाषा में दीपावली विशेषांक का निःशुल्क प्रकाशन कर रहा है.    

इस सम्पूर्ण यात्रा में हम लोग काफी उतार चढ़ाव से गुजरे. गत एक वर्ष में हमने आपने प्रिय मित्र स्मृतिशेष जय प्रकाश पाण्डेय जी के साथ ही गुरुवर डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ और प्रो. चित्रभूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी को खोया है जिनकी स्मृतियाँ सदैव अविस्मृत रहेंगी.  

हमारे सम्पादक मंडल ने अपने प्रबुद्ध लेखकगण एवं पाठकगण के सहयोग से साहित्य सेवा में अपना निःस्वार्थ योगदान देकर साहित्य को नए आयाम देने का प्रयास किया है. 

आप को आश्चर्य होगा कि हमारे संपादक मंडल के सदस्य वरिष्ठ नागरिकों / साहित्यकारों का एक छोटा सा समूह है, जो बिना किसी व्यावसायिक लाभ के अपनी अभिरुचि स्वरुप  स्वान्तः सुखाय उत्कृष्ट साहित्य प्रदान करने को तत्पर है. ई-अभिव्यक्ति नवोदित साहित्यकारों से लेकर सम्माननीय वरिष्ठ साहित्यकारों के साहित्य को एक सम्माननीय  मंच प्रदान करता है और ससम्मान प्रकाशित करने का प्रयास करता है.

हमारे संपादक मंडल का प्रयास रहता है कि – अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को पूरा सम्मान देते हुए निर्विवादित साहित्य प्रस्तुत करें। हम रंग, धर्म, जाति और राजनीति से सम्बंधित विवादित साहित्य को कदापि प्रोत्साहित नहीं करते. यदि हमें कोई साहित्य मिलता है तो उसे हम ससम्मान प्रकाशित करते हैं। हाँ साहित्य की अधिकता में कुछ विलम्ब की संभावना हो सकती है. यदि आपका कोई साहित्य प्रकाशित नहीं होता है तो कृपया यह समझा जाए कि वह हमारे निर्धारित साहित्यिक मानदंडों के अंतर्गत नहीं आते और इस सन्दर्भ में आपका सादर सहयोग अपेक्षित है. साहित्य के चुनाव में संपादक मंडल का निर्णय अंतिम एवं मान्य होता  है. 

उपरोक्त सभी उपलब्धियों से ई-अभिव्यक्ति परिवार गौरवान्वित अनुभव करता है। हम कामना करते हैं कि – आप सभी का यह अपूर्व आत्मीय स्नेह एवं प्रतिसाद इसी प्रकार हमें मिलता रहेगा। 

आपसे सस्नेह विनम्र अनुरोध है कि आप ई-अभिव्यक्ति में प्रकाशित साहित्य को आत्मसात करें एवं अपने मित्रों से सोशल मीडिया पर साझा करें। 

आपके विचारों एवं सुझावों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।

एक बार पुनः आप सभी का हृदय से आभार ।

सस्नेह

हेमन्त बावनकर

पुणे (महाराष्ट्र)   

१४ नवम्बर २०२५  

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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ई-अभिव्यक्ति: संवाद ☆ एक संवादी सहप्रवासएक संवादी सहप्रवास ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆ ई-अभिव्यक्ती : एक संवादी सहप्रवास ☆ हेमन्त बावनकर ☆

सस्नेह नमस्कार.

ई-अभिव्यक्ती : साहित्य मंचाचे सर्व सुजाण साहित्यिक आणि वाचक यांचे मी मनापासून आभार मानू इच्छितो.

ऑक्टोबर २०२५ मध्ये आपली ही आवडती वेबसाईट सुरु झाल्याला ७ वर्षं पूर्ण झाली आहेत, आणि ई-अभिव्यक्ती – मराठी विभागाने दि. १५ ऑगस्ट २०२५ रोजी ५ वर्षांचा यशस्वी टप्पा पार केला आहे, ही गोष्ट अतिशय आनंददायक आहे.

…. या मंचावरून आजपर्यंत ३१,२००  पेक्षाही जास्त संख्येने विविध प्रकारच्या साहित्य-रचना प्रकाशित केल्या गेल्या आहेत. आणि 710958  पेक्षाही जास्त संख्येने रसिकांनी https:www.e-abhivyakti.com या आपल्या वेबसाईटला भेट देत उत्तम प्रतिसाद दिलेला आहे.

आपणा सर्वाना हेही ज्ञातच आहे की ई – अभिव्यक्ती साहित्य मंच गेल्या चार वर्षांपासून ‘ फ्लिपबुक ‘ या format मध्ये हिंदी आणि मराठी दिवाळी अंक नि:शुल्क प्रकाशित करत आहे, आणि अशा स्वरूपाचा भारतात प्रकाशित होणारा हा पहिला अंक आहे हे आम्ही अतिशय आनंदाने आणि अभिमानाने सांगू इच्छितो.

…… “ दुधात साखर “ म्हणता येईल अशी ‘ई-अभिव्यक्ती मराठी’ बाबतची आणखी एक विशेष गोष्ट म्हणजे >>> “ Feedspot “ या कंपनीने आपणहून केलेल्या सर्व्हेनुसार, ‘ ९० सर्वोत्तम मराठी ब्लॉग्स च्या त्यांनी केलेल्या यादीमध्ये आपला हा ब्लॉग २८ व्या क्रमांकावर आहे. ( आधीच्या २७ ब्लॉग्सपैकी १३ ब्लॉग्स फक्त वेगवेगळ्या वृत्तपत्रांचे आहेत हे या संदर्भात लक्षात घ्यायला हवे.)

आमच्या जाणकार आणि अनुभवसंपन्न लेखक/लेखिका, आणि कवी/कवयित्रींच्या, तसेच रसिक वाचकांच्या सहकार्याने आमचे संपादक मंडळ या निखळ साहित्य-सेवेसाठी नि:स्वार्थपणे संपूर्ण योगदान देते आहे, आणि साहित्याला एक नवे परिमाण देण्याचा सातत्याने प्रयत्न करत आहे.

… आपणास हे जाणून आश्चर्य वाटेल की आमचे संपादक मंडळ म्हणजे स्वतः साहित्यिक असणाऱ्या ज्येष्ठ नागरिकांचा एक अगदी लहानसा ग्रुप आहे आणि या कामात कुठलाही व्यावसायिक वा आर्थिक लाभ नसतांनाही, निव्वळ त्यांना स्वतःला साहित्याची मनापासून असणारी आवड आणि इतर साहित्यिकांबद्दल वाटणारा सहभाव याच कारणाने अनेकांचे चांगले साहित्य इतर असंख्य लोकांपर्यंत निरपेक्षपणे पोहोचवण्यासाठी हे सगळे संपादक मनापासून, तत्परतेने आणि सातत्याने काम करताहेत…. याला ‘स्वान्त सुखाय‘ असेही म्हणता येईल. नवोदित साहित्यिकांपासून ते सन्मान्य ज्येष्ठ साहित्यिकांपर्यन्त सर्वांसाठीच हा एक सन्माननीय साहित्य मंच सातत्याने उपलब्ध आहे, आणि अशा सर्वांनी आमच्याकडे पाठवलेले साहित्य नियमित स्वरूपात योग्य प्रकारे प्रकाशित करण्याचा मनापासूनचा प्रयत्न या मंचावरून सातत्याने केला जात आहे.

इथे आवर्जून एक गोष्ट सांगायला हवी ती अशी की, प्रत्येकाच्या अभिव्यक्ती-स्वातंत्र्याचा पूर्णतः आदर करत असतांनाच, कुठच्याही प्रकारचा जातीयवाद, धर्मवाद, किंवा राजकारण या संदर्भातले, किंवा इतर कुठलेही.. कुठल्याही प्रकारे विवाद्य ठरेल असे साहित्य वगळता, आम्हाला पाठवलेले सर्व साहित्य सन्मानपूर्वक प्रकाशित करायचे हाच संपादक मंडळाचा सततचा प्रयत्न असतो. अर्थात जेव्हा आमच्याकडे एकाच वेळी जास्त प्रमाणात साहित्य आलेले असते तेव्हा ते प्रकाशित व्हायला उशीर होण्याची शक्यता असते… नव्हे, बऱ्याचदा असा उशीर नाईलाजाने होतोही… पण ते प्रकाशित केले जातेच आणि याची दक्षता घेतली जाते.

…. पण आपले एखादे साहित्य अजिबातच प्रकाशित केलेच गेले नाही तर कृपया असे गृहीत धरावे की आम्ही निर्धारित केलेले साहित्यिक मानदंड लक्षात घेऊनच अशा साहित्याचा समावेश केला गेलेला नाही….. आणि या बाबतीत आपणा सर्वांचे सकारात्मक सहकार्य अपेक्षित आहे. साहित्याची निवड करण्याबाबतचा अंतिम निर्णय संपादक मंडळाचा असेल याची कृपया दखल घ्यावी

ई – अभिव्यक्ती परिवारासाठी आपल्या सर्वांचा उत्स्फूर्त सहभाग खरोखरच गौरवास्पद आहे…

आपणा सर्वांचा हा अनोखा स्नेह आणि मनापासूनचा प्रतिसाद असाच आम्हाला सतत मिळत राहू दे.

या निमित्ताने एक नम्र विनंती अशी की या मंचाद्वारे दैनिक स्वरूपात प्रकाशित होणारे सगळे साहित्य आपण स्वतः तर न चुकता वाचावेच, आणि सोशल मीडियाद्वारे आपल्या परिचितांनाही पाठवावे … जेणेकरून, एक साहित्यिक लिखाण अनेकांपर्यंत सहजपणे पोहोचावे हा या मंचाचा निरपेक्ष हेतू सफल होईल.

आपले विचार आणि सूचना नेहेमीच स्वागतार्ह आहेत.

आपणा सर्वांचे पुन्हा एकदा अगदी मनापासून आभार … आपल्यामधली ही स्नेहभावना सतत वृद्धिंगत होवो हीच कामना.

आपला स्नेहांकित,

हेमन्त बावनकर

पुणे (महाराष्ट्र)   

१४ नवम्बर २०२५  

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ – लघुकथा – संस्मरण… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा “– संस्मरण… –” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ — संस्मरण…  — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

विश्व लेखक थामस के अद्भुत संस्मरणों की चार खंडीय नवीनतम कृति को विश्व पुरस्कार प्राप्त हो रहा था। पर कृति में उसका अपना एक भी संस्मरण नहीं था। उसने तमाम अनगढ़ लोगों से उनके संस्मरण पूछ कर अपने नाम से लिखे थे। उसने कहा उसके अपने संस्मरण न हो से वह पुरस्कार छोड़ रहा है। अपने इस सच के लिए थामस को एक विशेष पुरस्कार मिला। पुरस्कार में पैसा होने से उसने उन लोगों में बाँट दिया जिनके संस्मरण थे।

 © श्री रामदेव धुरंधर

17 – 03 – 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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ई-अभिव्यक्ति: संवाद ☆ प्रिय भाई और मित्र अभिमन्यु शितोले जी  – अश्रुपूर्ण विनम्र श्रद्धांजलि ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

☆ जब तक चाहें आपका ☆

🙏💐 प्रिय भाई और मित्र अभिमन्यु शितोले जी  – अश्रुपूर्ण विनम्र श्रद्धांजलि 💐🙏

उफ़…! भाई अभिमन्यु, यह कोई उम्र थी जाने की। अभिमन्यु शितोले का असमय जाना, नवभारत टाइम्स के राजनीतिक विषयों के सम्पादक का जाना, एक सच्चे और निर्भीक पत्रकार का जाना, मेरे एक बहुत अच्छे मित्र का जाना है। हम जब मिलते, अधिक से अधिक देर तक साथ रहने का प्रयास करते। दोनों सिद्धांतप्रिय, अधिकांश मसलों पर दोनों एकमत। महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी में हमने साथ काम किया। मित्रता का जन्म भी यहीं हुआ और परवान भी यहीं चढ़ी। अकादमी की बैठक के लिए मुंबई जाते और लौटते समय प्राय: मैं कोई आलेख या कविता लिखता। अभिमन्यु न केवल उसके पहले पाठकों में होते बल्कि सदा अपनी प्रतिक्रिया भी देते। अकादमी के लिए मैंने अटल जी की कविताओं पर आधारित एक कार्यक्रम रवींद्र नाट्य मंदिर में किया था। उसका धन्यवाद प्रस्ताव अभिमन्यु ने किया। उन्होंने कहा कि आज तक संजय को लेखक के रूप में जानता था, आज पहली बार निर्देशक, सूत्रधार संजय से मिला और बस उसका ही हो गया। यह पहला मौका था जब अभिमन्यु ने मेरे नाम के साथ ‘जी’ लगाने की औपचारिकता उतार फेंकी थी। वह दिल से गले मिले। तब से कभी संजय कहते, कभी संजय भैया।

बाद में जब कभी मैं मुंबई होता, हम यथासंभव मिलते। गत वर्ष 10 और 11 जनवरी को एस.एन.डी.टी. विश्वविद्यालय के बोर्ड ऑफ स्टडीज़ की बैठक थी। 10 जनवरी की रात मिलना तय हुआ। उन्होंने कहा कि रात का भोजन साथ करेंगे। किसी कारणवश उस दिन हम नहीं मिल पाए। अगले दिन शाम 5 की ट्रेन से मैं लौटने वाला था। वे डोंबिवली से जल्दी निकले। प्रेस क्लब में बैठकर हमने लम्बी चर्चा की। गत वर्ष किसी विवाह में बेटे के साथ पुणे आए थे। तय हुआ कि विवाह में भोजन करने के बजाय हम शहर के एक रेस्टोरेंट में साथ में भोजन करेंगे, पर इस बार भी साथ में भोजन नहीं हो पाया। हम रेल्वे स्टेशन पर मिले। लगभग डेढ़-दो घंटे साथ थे। बहुत सारी बातें कीं। घर-परिवार, नौकरी-कारोबार, बाल-बच्चे, चढ़ाव-उतार और भी जाने क्या-क्या! उनकी चिंताओं को पहली बार उन्होंने अभिव्यक्त किया। स्टेशन के सामने एक चालू किस्म की होटल में हमने चाय पी। संभवत: उनसे वह अंतिम प्रत्यक्ष संवाद था।

अपनी-अपनी रोटी सेंकने के इस दौर में अभिमन्यु ने लेखनी से सच के पक्ष में सदैव  आवाज़ उठाई। एक विषय पर तो नामोल्लेख के साथ मेरे पक्ष का उन्होंने समर्थन किया। बात मेरे या आपके पक्ष की नहीं, बात सच के समर्थन की थी।

भाई अभिमन्यु! कल ही किसी संदर्भ में याद किया था। यह भी कोई आयु थी जाने की? अपनी बीमारी के बारे में बताया होता तो कभी मिल ही लेते।

श्री संजय भारद्वाज

अकादमी के लिए मुंबई अप-डाउन करते हुए एक कविता लिखी थी। इसमें पौराणिक अभिमन्यु का संदर्भ था। इसे आज अभिमन्यु को ही श्रद्धांजलि के रूप में अर्पित कर रहा हूँ।

मेरे इर्द-गिर्द

कुटिलता का चक्रव्यूह

आजीवन खड़ा रहा,

सच और हौसले

की तलवार लिए

मैं द्वार बेधता रहा,

कितने द्वार बाकी,

कितने खोल चुका,

क्या पता….,

जीतूँगा या

खेत रहूँगा

क्या पता….,

पर इतना

निश्चित है-

जब तक

मेरा श्वास रहेगा,

अभिमन्यु मेरे भीतर

वास करेगा..!

अंतिम बात, तुम्हारी डीपी की बायो थी, जब तक चाहें आपका… हम मित्रों की चाहत में तुम हमेशा थे, हमेशा रहोगे। हम तुम्हें हमेशा चाहेंगे यार!

ईश्वर, पुण्यात्मा को मोक्ष में स्थान दीजिएगा।

 

संजय भारद्वाज

अतिथि संपादक (ई-अभिव्यक्ति)

08 मार्च 2025 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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ई-अभिव्यक्ति – संवाद ☆ स्मृतिशेष डॉ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ विशेष ☆ हेमन्त बावनकर ☆

💐 ई-अभिव्यक्ति – संवाद ☆ स्मृतिशेष डॉ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ विशेष ☆ हेमन्त बावनकर 💐

हेमन्त बावनकर

प्रिय मित्रों,

एक वर्ष के बाद भी ऐसा नहीं लगता कि सुमित्र जी नहीं रहे। ऐसा लगता है कि उनसे कल ही तो बात हुई थी। किन्तु, मृत्यु तो अटल सत्य है जिसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता। वे अपने स्वजनों को शारीरिक रूप से अवश्य छोड़ कर चले गए किन्तु, उनकी स्मृतियाँ सदैव उनकी पीढ़ी एवं वर्तमान पीढ़ी के मस्तिष्क में आजीवन रहेंगी।

सुमित्र जी से पहली मुलाक़ात मेरे स्व. पिताश्री टी डी बावनकर जी (सुमित्र जी के मित्र) के साथ 1982 की एक शाम को उनके निवास पर हुई। उसके बाद एक ऐसा संबंध बना जो आजीवन चलता रहेगा। उनके द्वारा प्रकाशित मेरी प्रथम कहानी “चुभता हुआ सत्य’ नवीन दुनिया के पाक्षिक तरंग के प्रवेशांक में प्रकाशित हुई थी। उनके पत्र एवं तरंग की प्रति मेरे पास अभी तक सुरक्षित है।

मेरी उपरोक्त स्मृति तो मात्र एक प्रतीकात्मक उदाहरण है, उनसे जुडने वाले अनेकों मित्रों का जिन्हें उन्होने आजीवन अपना आत्मीय स्नेह और मार्गदर्शन दिया है। ऐसी अनेक कहानियाँ और संस्मरण आपको संस्कारधानी के साहित्य जगत में ही नहीं अपितु सारे विश्व के कई मित्रों में मिलेगी।

ई-अभिव्यक्ति के प्रथम अंक के लिए उनके आशीष स्वरूप प्राप्त कविता उद्धृत कर रहा हूँ जो मुझे ई-अभिव्यक्ति के सम्पादन में सदैव सकारात्मक मार्गदर्शन देती रहती है।

संकेतों के सेतु पर

साधे काम तुरंत |

दीर्घवयी हो जयी हो

कर्मठ प्रिय हेमंत

काम तुम्हारा कठिन है

बहुत कठिन अभिव्यक्ति

बंद तिजोरी सा यहां

दिखता है हर व्यक्ति

मनोवृति हो निर्मला

प्रकटें निर्मल भाव

यदि शब्दों का असंयम

हो विपरीत प्रभाव ||

सजग नागरिक की तरह

जाहिर हो अभिव्यक्ति

सर्वोपरि है देशहित

बड़ा न कोई व्यक्ति|

स्थान – दिल्ली 15 /10/18

मित्र श्री संतोष नेमा जी ने हाल ही में ‘सुमित्र संस्मरण’ प्रकाशित किया है। जिसमें 60 से अधिक लोगों के संस्मरण प्रकाशित किए गए हैं। श्री नेमा जी के शब्दों में ही “साहित्य के गंभीर अध्येता, अद्भुत रचनात्मकता, माधुर्य व्यवहार के चलते उनके हजारों चाहने वाले हैं जिनके दिलों में राजकुमार की तरह राज करते हैं. इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनकी श्रद्धांजलि सभा में भीड़ में उपस्थित हर एक आदमी अपनी भावांजलि देने के लिए आतुर था. जब मैंने यह देखा तब उसी क्षण मेरे मन में यह विचार आया की क्यों ना एक सुमित्र संस्मरण का प्रकाशन किया जाए जिसमें उनके प्रति सभी साहित्यकारों के संस्मरण एवं भाव समाहित किए जा सकें.”

सुमित्र जी के अनेकों स्वजनो के अनेकों संस्मरण हैं जो आजीवन उनकी याद दिलाते रहेंगे। उनकी प्रथम पुण्यतिथि पर यह विशेष संस्करण भी मात्र एक प्रतीक ही है।

इस प्रयास में हम आपके संस्मरणों/विचारों को श्रद्धासुमन स्वरूप स्मृतिशेष डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ जी को समर्पित करते है।  

बस इतना ही।

हेमन्त बावनकर, पुणे 

वर्तमान में बेंगलुरु से 

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ गय… ☆ सुश्री तृप्ती कुलकर्णी ☆

सुश्री तृप्ती कुलकर्णी

? कवितेचा उत्सव ?

☆ गय… ☆ सुश्री तृप्ती कुलकर्णी 

सुखाला नुसते ‘शब्द’देखील सहज गवसत नाहीत

पण दुःख मात्र सोबतच घेऊन येते आपली ‘लय’

*

त्या वेशीवरती जर नसतीच झाली आपुली भेट

तर डोळ्यांमध्ये का दाटून आली असती ‘सय’

*

रोज सुचतच नाही लिहायला मजला काहीबाही

पण लिहिते करते दुःखानेही सोडून जायाचे ‘भय’

*

तसे ऋतूंचे बहरणे होते नेहमी‌प्रमाणेच सुरळीत

पण बेसावध क्षणी मोहरण्याचे होते आपुले ‘वय’

*

मी थांबले होते नंतर त्या मोहक वळणापाशी

पण होकाराच्या विलंबाने केलीच नाही माझी ‘गय’

©  सुश्री तृप्ती कुलकर्णी

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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