श्री आशिष मुळे

☆ कविता ☆

☆ “फ़रियाद-ए-क़लम…☆ श्री आशिष मुळे ☆

क़लम आज शर्मिंदा है,

हालात इतने बेहूदा हैं।

फूल कभी खिल ही न पाए,

धूप यहाँ कुछ ज़्यादा है।

 *

उम्मीद लगाई थी छाँव की,

समझे थे कि वह पेड़ है।

एक बार क़रीब से देखा तो,

वह बस सूखी-सी लकड़ी है।

 *

जिनको फलने की थी सहूलत,

अफ़सोस, उन्होंने नफ़रत बोई है।

ऐसी है कुछ हालत-ए-गुलिस्ताँ —

गुलों में अब रंग नहीं है।

© श्री आशिष मुळे

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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