मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – एक अहम फ़िलासफ़ी है यह … ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

ज़िंदगी में बहुत कुछ सोचा..

ख्वाहिशें की, हसरतें भी पाली,

कुछ पूरी हुईं, कुछ अधूरी रहीं,

कुछ मयस्सर ही न हुईं।

लेकिन कोई गिला- शिक़वा नहीं,

इस बात का।

हम भी अपने जीवन में ..

किसको क्या कुछ दे पाते हैं,

बस लेते ही तो रहते हैं।

और इसी मानसिकता में कुंठित भी रहते हैं।

ये नहीं हुआ, वो नहीं मिला ???

सोचिये ज़रा, क्या यही ज़िंदगी का हासिल है,

मेरे ख़याल से कतई नहीं।

देने वाला बनने में जो खुशी और सुकून है,

वह लेने वाला बनने में नहीं है।

मैंने आजमा कर महसूस किया..

आपने भी शायद किया हो —

न किया हो तो करियेगा,

इसका आनंद ही कुछ और है…!!!!!

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्कबिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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