श्री सुरेश पटवा
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ३५ ☆ श्री सुरेश पटवा
7.पग-पग नर्मदा यात्रा
भेड़ाघाट से बिजना घाट: 15 अक्टूबर 2018
एक दिन पहले, जैसे ही हम तिलवारा घाट के पुल पर जाकर खड़े हुए, वहाँ पान की दुकान वाले ने बताया कि नर्मदा के किनारे से रास्ता बहुत दलदली है। आप लोगों को घूँसोर होते हुए सिवनी गाँव से होकर लम्हेंटा पहुँचना होगा। हमने उससे आगे की जानकारी ली। जबलपुर और आसपास में दूधिया कत्था और मलाईदार चूना का जैसा ज़ायक़ेदार बीड़ा मिलता है वैसा कहीं नहीं मिलता सिवाय बनारस के अतः हमने एक मीठा पत्ता पान चटनी, चमन-बहार, लोंग, इलायची, पिपरमिंट का बनवा कर मुँह में दबाया और निकल पड़े। हम घूँसोर गाँव पहुँचे वहाँ पहले घर में पीने को पानी माँगा तो वे पानी देने में हिचकिचा रहे थे। हमने कहा हम छुआछूत नहीं मानते। आप साफ़-सफ़ाई से रहते हो बस यही हमारे लिए काफ़ी है। वे सतनामी समाज के थे। यह सतनामी समाज नर्मदा घाटी में कब, कैसे और कहाँ से आया। नर्मदा के उस पार दक्षिण के गाँवो में सतनामी समाज की सघन वसाहट है। जबलपुर जिले में नर्मदा के दक्षिण तट की तरफ़ बसे गाँवों में सतनामी बसे हैं।
जब भारत में ग्यारहवीं सदी से मुस्लिम तेग़ की ख़ूनी ख़ूँख़ार आँधी चली तब हिमालय की तराई, दक्षिण के पथरीले पहाड़ और सतपुड़ा-विंध्याचल में नर्मदा के दोनों तरफ़ दो सौ किलोमीटर चौड़ी और एक हज़ार किलोमीटर लम्बी घाटी हिंदुओं के लिए सुरक्षित अभयारण्य बन गई। जहाँ भी इस्लामी सुल्तान या बादशाह का अत्याचारी दबाव पड़ता था वहाँ के रघुवंशी, गूज़र, लोधी, कुर्सी, कलार, काछी, सतनामी और उनके साथ लगे-लगे ब्राह्मण, चमार, बँसोड, भंगी नर्मदा घाटी की गोद में आकर बस जाते थे। सघन जंगलों से पूरी तरह ढँकी रहने वाली घाटी आबाद होने लगी थी। अंग्रेज़ों द्वारा रेल लाइन बिछाने के पहले तक नर्मदा घाटी में पहुँच दुरूह हुआ करती थी।
1672 में वर्तमान हरियाणा के नारनौल नामक स्थान पर साध बीरभान और जोगीदास नामक दो भाइयों ने सतनामी साध मत का प्रचार किया था। सुप्रसिद्ध इतिहासकार चोपड़ा, पुरी और श्रीदास ने मैकमिलन कम्पनी द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘ए सोसल कल्चरल एंड इकोनामिक हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ के भाग तीन में लिखा है। “18वीं शताब्दी में अवध के बाबा जगजीवनदास ने एक अलग धार्मिक पंथ बनाया जो कि सत्य और ज्ञान पर विश्वास करने वाला सतनाम पंथ कहलाया।”
इस पंथ के लोग उत्तरी भारत में विस्तृत रूप से फैले थे। औरंगज़ेब के शासनकाल में कट्टर नीतियों के चलते सिक्ख, जाट, मराठों के साथ-साथ सतनामी लोगों ने भी विद्रोह का परचम लहराया था। इस सम्प्रदाय के गुरू घासीदास माने जाते हैं। जो मध्य युगीन सतनामी समाज में विश्वास और उपासना विधि को जीवित रखना चाहते थे तथा उनमें अभिनव चेतना लाने की आकांक्षा रखते थे। उन्होंने प्रचारित किया कि वास्तविक भगवान कर्मकांड में निहित नहीं है सतनाम ध्यान में प्रकट होते हैं। उन्होंने अक्षर ब्रह्म का शब्द देकर ध्यान लगाने और निर्गुण ईश्वर के भजन गाने की प्रणाली सतनामी समाज में विकसित की थी। ईश्वर की नजर में सभी समान हैं। इसलिये मानव समाज में कोई भेद नहीं होना चाहिये जैसा कि जाति प्रथा से भेदभाव परिलक्षित होता है। छतीसगढ में सतनाम आंदोलन पिछड़े, निम्न और अछूत समझे जाने वाले वर्गो में धार्मिक और सामाजिक चेतना लाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। यह कबीर, नानक, दादू पंथ की कड़ी को मानने वाले हैं।
सतनामी मत के अनुयायी किसी भी मनुष्य के सामने नहीं झुकने के सिद्धांत का पालन करते हैं। एक सतनामी किसान ने तत्कालीन मुगल बादशाह औरंगजेब के कारिंदे को झुक कर सलाम नहीं किया तो उसने इसको अपना अपमान मानते हुए उस पर लाठी से प्रहार किया जिसके प्रत्युत्तर में उस सतनामी ने मुग़ल कारिन्दे को लाठी से पीट दिया। यह विवाद यहीं खत्म न होकर तूल पकड गया और एक बड़े संघर्ष में बदल गया। धीरे धीरे मुगल बादशाह औरंगजेब तक पहुँच गया कि सतनामियों ने बगावत कर दी है। यहीं से औरंगजेव और सतनामियों का ऐतिहासिक युद्ध हुआ था। जिसका नेतृत्व सतनामी साध बीरभान और साध जोगीदास ने किया था। यूद्ध कई दिनों तक चला जिसमें सशक्त शाही फौज निहत्थे सतनामी समूह से मात खाती चली जा रही थी। शाही फौज में ये बात फैल गई कि सतनामी कोई जादू टोना करके शाही फौज को हरा रहे हैं। इसके लिये औरंगजेब ने अपने फौजियों को कुरान की आयतें लिखे तावीज भी बंधवाए थे लेकिन इसके बावजूद कोई फ़र्क़ नहीं पडा था। उन्हें ये पता नहीं था कि सतनामी साधों के पास आत्मदान करने वाले भक्तों की शक्ति के कारण यह स्थिति थी।
सतनामी संघर्ष को मुग़लों द्वारा बेरहमी से कुचलने की प्रक्रिया में बचे-खुचे सतनामी अपनी जान बचा कर अलग अलग दिशाओं में भाग निकले थे। जिनमें घासीदास के पूर्वजों का भी एक परिवार रहा जो कि महानदी के किनारे-किनारे वर्तमान छत्तीसगढ तक जा पहुचा था। जहाँ पर संत घासीदास जी का जन्म हुआ औऱ वहाँ पर उन्होंने सतनाम पंथ का प्रचार-प्रसार किया। वे गिरौदपुरी तहसील बलौदाबाजार जिला रायपुर में पिता महंगुदास जी एवं माता अमरौतिन के यहाँ पैदा हुये थे। गुरूजी को सतनाम पंथ सतनाम धर्म जिसे आम बोल चाल में सतनामी पंथ के प्रवर्तक कहा जाता है। उन्होंने अपने समय की सामाजिक आर्थिक विषमता, शोषण तथा जातिभेद को समाप्त करके मानव-मानव एक समान का संदेश दिया। गुरू घासीदास का जन्म 1756 में रायपुर जिले के गिरौदपुरी में एक गरीब और साधारण परिवार में हुआ था। उन्होंने हिन्दु धर्म की कुरीतियों पर कुठाराघात किया था। ब्राम्हणों और मन्दिर के पुजारियों द्वारा हिन्दुओं के धार्मिक शोषण का विरोध करने का यही मार्ग उनको सूझा था। जिसका असर आज तक दिखाई पड रहा है। उनकी जयंती हर साल पूरे छत्तीसगढ़ में 18 दिसम्बर को मनाई जाती है। बिलासपुर के विश्वविद्यालय का नाम गुरु घासीदास विश्वविद्यालय है। सतनामियों के घरों से चाय-पानी प्रसाद पाकर आगे बढ़ते जा रहे थे।
भेड़ाघाट से बिजना घाट की यात्रा सबसे लम्बी थकाऊ और उबाऊ थी। पहले हमने तय किया था कि रामघाट में रुककर रात गुज़ारेंगे। मंगल सिंघ परिहार जी वहाँ से चार किलोमीटर आगे रास्ता देख रहे थे। सुबह से कुछ भी नहीं खाया था। खजूर, मूँगफली दाने और चने व पानी के दम पर सभी को खींचे जा रहे थे। चार घण्टे पैदल चल चुके थे। दोपहर में तेज़ धूप में चलने से शरीर का ग्लूकोस जल जाता है और हवा में ऑक्सिजन भी कम हो जाती है। मांसपेशियाँ जल्दी थकने लगतीं हैं और साँस फूलने लगती है। दो बजे के बाद सूर्य की किरणे सामने से परेशान करने लगती है। ऐसे माहौल में नदी किनारे रास्ता भी नहीं था। बर्मन लोगों ने नदी के कछार को हल चलाकर मिट्टी के बड़े-बड़े ढेले में बदल दिया था। खाने पीने का कोई ठिकाना नहीं था। साथियों को बाटी-भर्ता का लालच देकर खींचे जा रहे थे, जबकि भोजन का कहीं कोई ठिकाना नहीं था। उधर दनायक जी को परिहार जी मोबाइल से जल्दी पहुँचने को कह रहे थे। सब थक कर चूर थे। ऐसे में दल को खींच कर आगे ले जाना ज़रूरी था।
मंगल सिंग परिहार बहुत पुराने परिचित सहकर्मी रहे हैं। उन्होंने दिन के ग्यारह बसे से, जब हम भेड़ाघाट से चले ही थे, तब से बिजना गाँव से नर्मदा पार करके मुरकटिया घाट आकर मोबाईल से सम्पर्क साध कर हमारी स्थिति लेना शुरू कर दिया। वे हर आधा घंटे में दनायक जी को मोबाईल से सम्पर्क साध कर स्थिति पूछते जा रहे थे। कभी मोबाईल लगता था और कभी नहीं लगता था। हम लोग रामघाट से सड़क छोड़ नर्मदा किनारे आ गए, वहाँ से अत्यंत दुरुह यात्रा शुरू हुई। छोटी नदी, नाले, झरने, सघन हरियाली और ताज़े गोंड़े गए खेतों की मिट्टी के बड़े-बड़े ढेलों के बीच से घुटनों और ऐडियों की परीक्षा का समय था क्योंकि कहीं भी समतल ज़मीन नहीं थी। आगे छोटी पहाड़ियों का जमघट एक के बाद एक घाटियाँ का सिलसिला जिनको स्थानीय बोली में ड़ांगर कहते हैं। चम्बल में जैसे बीहड़ होते हैं जिनमे कँटीले पेड़-पौधे होते हैं वैसे नर्मदा के आजु-बाजु ड़ांगर का साम्राज्य है उनके बीच से पानी झिर कर जंगली नालों को आकार देते हैं। उनको पार करने के लिए ऊपर चढ़ाई चढ़ना फिर उतरना फिर चढ़ना। यात्रियों का दम निकलने लगता है। पसीने से तरबतर शरीर में पूरी साँस धौंकनी के साथ भरकर पहाड़ियों को पार करने के बीच में नर्मदा दर्शन से हिम्मत बनती टूटती रहती है। चार बजे हाल-बेहाल और निढ़ाल-पस्त हालत में बिजना घाट के सामने वाले मुरकटिया घाट पर मंगल सिंघ परमार बिस्कुट और केले फल के साथ स्वागत आतुर मिले। वहाँ उनकी सिकमी ज़मीन थी। उसी पर खड़े थे। बैठने को कोई छायादार जगह नहीं थी। यात्री बिस्कुट और केलों को क्षणभर में चट कर गए। नाव से नर्मदा पार करके दूसरी पार उतरे वहाँ एक बर्मन दादा पूड़ी और खीर का भंडारा करा रहे थे। यात्रियों ने भंडारा खाया। ख़ूब पानी पिया तो कुम्लाए चेहरों की रंगत और ढीले शरीरों में जान लौटने लगी।
15 अक्टूबर को मंगल सिंग परिहार के आश्रम नुमा फ़ार्म हाऊस में विश्राम का अवसर मिला। मंगल सिंघ परिहार ने प्राकृतिक छटाओं में बसा अपना आश्रम दिखाया। जिसमें पारिजात और रुद्राक्ष के वृक्ष लगे हैं। सूर्यास्त का दृश्य अत्यंत सुंदर नज़र आता है। उन्होंने बताया कि उनके पूर्वज नागौद रियासत के राजा रहे हैं। परमार, परिहार, बुंदेले और बघेल सब गहडवाल राजपूत हैं। परमारों ने महोबा, परिहारों ने नागौद, बुन्देलों ने छतरपुर और बघेलों ने रीवा रियासत स्थापित की थी। ये सब पहले अजमेर के पृथ्वीराज़ चौहान या कन्नौज के जयचंद राज्यों के सरदार थे। 1091-92 में मुहम्मद गोरी के हाथों अजमेर, दिल्ली और कन्नौज हारने के बाद इन्होंने इन राज्यों को स्थापित किया था। नागौद कभी स्वतंत्र राज्य और कभी रीवा के बघेलों का करद राज्य हुआ करता था। उसके उत्तर-पश्चिम में केन नदी का अत्यंत ऊपजाऊ कछारी भाग था लेकिन दक्षिण-पूर्व में पथरीली ज़मीन थी। अतः राजपूतों ने नर्मदा के कछारी मे बसने का निर्णय लिया था।
अंग्रेज़ों ने 1861 में जबलपुर को राजधानी बनाकर सेंट्रल प्रोविंस राज्य बनाया तो रीवा, ग्वालियर, इंदौर, भोपाल रियासत छोड़कर मध्य प्रांत के नागौद सहित बाक़ी सब इलाक़े उसमें रख दिए। तब ही नर्मदा घाटी का सर्वे करके जबलपुर की सीमा नर्मदा के दक्षिण में चरगवाँ-बरगी तक निर्धारित कर दी। परिहारों को ज़मींदारी में मगरमुहां का इलाक़ा दिया गया। कई परिहार सौ-सौ एकड़ के ज़मींदार बनकर आज के पाटन और शाहपुरा इलाक़े में आ बसे। उनमें मंगल सिंघ परिहार के पूर्वज भी थे। मंगल सिंघ के पिताजी मुल्लुसिंघ परमार निरक्षर थे परंतु उन्होंने अपने आठ बेटों को पोस्ट-ग्रेजुएट कराया।
मंगल सिंघ जी से देर रात तक बातें होतीं रहीं। वे हमें एक वेदान्ती साधु के दरबार में ले गए। हमसे कहा कि साधु जी वेदों के प्रकांड विद्वान हैं। आप उनसे गूढ़ प्रश्न कीजिए तब उनकी ज्ञान गंगा बहने लगेगी। हम लोग उनके दरबार मे पहुँचे पाँव-ज़ुहार होने के बाद बातचीत चली तो मौक़ा देखकर हमने एक सवाल का तीर चलाया कि हमारी जानने कि इच्छा है कि महाराज रुद्र और शिव का अंतर बताएँ, तो बड़ी कृपा होगी। स्वामी जी ने थोड़ा इधर-उधर घुमाया। फिर विनम्रतापूर्वक स्वीकार किया कि प्रश्न गूढ़ है और उनका ज्ञान वेदों तक ही सीमित है उन्होंने पुराण नहीं पढ़े हैं। वे नेपाल से नर्मदा की गोद में आकर बस गए हैं। नर्मदा परिक्रमा कर चुके हैं। वापस आकर परिहार जी ने शिमला मिर्च की साग-रोटी और दाल-चावल का बढ़िया भोजन कराया। उसके बाद बातों का सिलसिला चल पड़ा। परिहार जी की बातें सुनते रहे। उनकी बातों के क्रम को बीच में बोलकर तोड़ना उनके रुतबे को कम करने जैसा होता है यह बात हम जानते थे परंतु अन्य लोगों को नहीं पता था। एक सहयात्री ने टोकने की कोशिश कि तो हमने उसे चुपके से समझा दिया कि भैया:-
बंभना जाय खाय पीय से
क्षत्री जाय बतियाय
लाला जाय लेय-देय से
शूद्र जाय लतियाय।
इस बुंदेलखंड की कहावत को गाँठ बाँध लो और क्षत्री की बातें चुपचाप सुनो। सुबह दो-दो रोटियाँ तोड़कर आश्रम से फिर नर्मदा की गोद मे पहुँच गए। इस प्रकार 13, 14 और 15 अक्टूबर की यात्रा पूरी हुई। यहाँ से हमारे एक और साथी प्रयास जोशी ने हमसे विदा ली।
क्रमशः…
© श्री सुरेश पटवा
भोपाल, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




