सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – युद्ध के विरुद्ध …।
रचना संसार # १०० – गीत – युद्ध के विरुद्ध … ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
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बात पर, आज क्यों, बंधु देखो अड़े।
दुश्मनी, है बढ़ी, प्राण लेने खड़े।।
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है चकित, यह धरा, शांत आकाश है।
रो रहे, खग सभी, हो रहा नाश है।।
वीर जो, थे बहुत, पार्थ साथी थके।
मित्र के, सारथी, क्रुद्ध होके रुके।।
स्वार्थ में, क्रूर हो, वीर योद्धा लड़े।
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नित्य बम, फेंकते, दुष्ट शैतान हैं।
ताकतें, चीख कर, ले रहीं जान हैं।।
लक्ष्य है जीत का, बंध सब टूटते।
उर चुभे, शूल हैं, बंधु हैं छूटते।।
आज तो, शर्म से, वीर सारे गड़े।
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है नियति, यह निठुर, पार्थ भी जानते।
भाग्य में, जो लिखा, वो हुआ मानते।।
धर्म ही, कर्म है, युद्ध पर काल है।
कौरवों, पाँडवों, का बुरा हाल है।।
मर रहे, युद्ध में, आज छोटे बड़े।
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शक्ति पर, गर्व है, युद्ध थोपा नया।
नाश है, त्रास दें, मूढ़ भूले दया।।
रोक दो, युद्ध को, श्याम आधार हो।
हो विजय, सत्य की, झूठ की हार हो।।
गिर गये, हैं मुकुट, भ्रात मोती जड़े।
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युद्ध की, त्रासदी, भोगते लोग सब।
धैर्य सब, खो दिया, मौत का योग अब।।
संधि की, दूर सब, देख संभावना।
चैन की, लोग बस, कर रहे याचना।।
ये कदम, क्यों भला, युद्ध के हैं पड़े।
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यह धरा, तो बनी, देख श्मशान है।
धूल में, है मिला, राष्ट् का मान है।।
युद्ध है, हल नहीं, शांति की बात हो।
विश्व को, शांति की, कृष्ण सौगात हो।।
रो रही, है प्रजा, प्रण लिए क्यों कड़े।
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© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)
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