श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “यह बरसात का मौसम…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७० ☆

☆ # “यह बरसात का मौसम…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

यह बरसात का मौसम

यह ठंडी हवाएं

यह तपती हुई धरती

घटाओं को बुलाएं 

 

तपता हुआ कण-कण है

व्याकुल तन मन है

दीवानें मेंघों को

धरती बुला रही है हर क्षण है

दीवानेपन की तड़प किसको बताएं

 

कागज की कश्ती में

खोया हुआ बचपन है

फुवारों की मस्ती में

डूबा हुआ यौवन है

अंतिम प्रहर में

यह यादें कितना रुलाएं 

 

यह पानी की बूंदे

सब है आंखें मूंदे

भीगती तरुणाई

अपने प्रीतम को ढूंढें

प्रीतम की दूरी

अब उसको कितना सताएं

 

यह मेघों की आंख  मिचोली

धरती से ठिठौली

कहीं भीषण गर्मी

तो कहीं वर्षा की होली

वर्षा है जीवन

अब कैसे समझाएं

 

यहां तो मर गया है

लोगों के आंखों का पानी

हर तरफ देखो

बस यही है कहानी

हर शख्स दूसरे को

कदम कदम पर आजमाएं

 

यह बरसात का मौसम

यह ठंडी हवाएं

यह तपती हुई धरती

घटाओं को बुलाएं/

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈


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