श्रीमती शशि सराफ
(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘कुछ पता नहीं…‘।)
☆ शशि साहित्य # २९ ☆
कविता – कुछ पता नहीं… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ
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इस छोर को तो थामा मैंने,
उस छोर का कुछ पता नहीं…
क्यों डर रही पतंग हवा में,
पकड़ कुछ ढीली,
कुछ पता नहीं…
थी अब तक खुशियां मेरी मुट्ठी में,
रेत की तरह फिसल रही,
कुछ पता नहीं…
जो मेरे भी इंतजार में तड़प उठे,
उन तरसती निगाहों का,
कुछ पता नहीं…
हम तो चले थे कदम ब कदम पीछे तेरे,
कब मिटा दिए निशां लहरों ने,
कुछ पता नहीं…
उतावली हो रही बहारें,
महकने को मचलने को…
मगर अब इंतजार…
कुछ पता नहीं…
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© श्रीमती शशि सराफ
जबलपुर, मध्यप्रदेश
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




