सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’
(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता !! मानवता !!)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १० ☆
☆ !! मानवता !! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆
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मेरे मन की एक तमन्ना, हे ठाकुर पूरी हो जाए ।
घृणित सोच हो खत्म सभी की, मानव में मानव मिल पाए ।।
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भरे हुए मन अँधियारों से, कर्म भाव की कलुषित समता।
बचा नहीं अब नर में पौरुष, नहीं रही नारी में ममता।।
व्यथित रुग्ण मन नर नारी के, इक दूजे पर घात लगाए।
घृणित सोच हो खत्म सभी की, मानव में मानव मिल पाए ।।
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सियाराम सी अमर प्रीत को, भूल गए क्यों सब नर- नारी।
प्राण हनन करने को आतुर, ढोंग रचाते अत्याचारी।
धर्म-कर्म की परिभाषा नव, कोई तो आकर सिखलाए।
घृणित सोच हो खत्म सभी की, मानव में मानव मिल पाए ।।
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नारी तन सामान बना क्यों, बेच रहे जन बन व्यापारी ।
अस्मत नित्य विलाप करे है, कैसी नारी की लाचारी ।।
दंड मिले दोषी को ऐसा, अग्रिम पाप सभी रुक जाए ।
घृणित सोच हो खत्म सभी की, मानव में मानव मिल पाए ।।
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मेरे मन की एक तमन्ना, हे ठाकुर पूरी हो जाए ।
घृणित सोच हो खत्म सभी की, मानव में मानव मिल पाए ।।
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© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”
झालरापाटन राजस्थान
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





