श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “सुलगती रात” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १५२ ☆

सुलगती रात ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

धुआँ उठा है

कहीं रात सुलगी होगी।

 

तस्वीरों में

ओढ़े बैठे

कुछ नक़ली असली चेहरे

अभिव्यक्ति की

आजादी पर

बिठा रहे हैं बस पहरे

कौन सगा है

किस पर मूठ दगी होगी।

 

धार नदी के

सँग-सँग बहना

क्या बस नियति हुई ऐसी

घबराहट में

मौन सुलगते

स्थितियाँ मूक बधिर जैसी

कहाँ उगा है

सूरज,रात ठगी होगी।

 

ठोकर खाना

खाकर गिरना

गिर-गिर कर चलना दस्तूर

लिए विरासत

काँधे लादे

पग-पग उम्र हुई मजबूर

कहीं दगा है

कहीं रार उमगी होगी।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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